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भारतीय राजनीति

सज़ा निलंबन की शक्ति और सुधारवादी सिद्धांत

  • 03 Oct 2020
  • 9 min read

प्रिलिम्स के लिये

आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) और भारतीय संविधान की विशिष्ट धाराएँ

मेन्स के लिये

सज़ा का सुधारवादी सिद्धांत और इसका महत्त्व

चर्चा में क्यों?
सर्वोच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय पीठ ने अपने एक हालिया निर्णय में कहा है कि जेल की सज़ा की अवधि अथवा अपराध की गंभीरता जेल से समय पूर्व रिहाई की याचिका को खारिज करने का एकमात्र आधार नहीं हो सकती है।

प्रमुख बिंदु

  • जस्टिस एन.वी. रमण की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि रिहाई के बाद पुनः अपराध करने की आशंका का अनुमान ‘जेल की अवधि के दौरान उस व्यक्ति के आचरण और उसके अतीत के आधार पर लगाया जाना चाहिये, न कि केवल उस व्यक्ति की उम्र और पीड़ितों तथा गवाहों की आशंका के आधार पर।’

सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय

  • सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ ने कहा कि प्रत्येक समाज को शांतिपूर्ण और भयमुक्त जीवन जीने का अधिकार प्राप्त है, किंतु भारतीय न्याय प्रणाली में सुधारवादी सिद्धांत भी इस अधिकार जितना ही महत्त्वपूर्ण है।
  • न्यायालय के अनुसार, हमें सुधारवादी न्याय में केवल सार्वजनिक सद्भाव पर ध्यान केंद्रित नहीं करना चाहिये, बल्कि भाईचारे और आपसी स्वीकार्यता को भी बढ़ावा देना चाहिये।
    • इस संबंध में पहली बार अपराध करने वाले अपराधियों को विशेष रूप से सुधरने का दूसरा अवसर दिया जाना चाहिये।

पृष्ठभूमि 

  • सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय उत्तर प्रदेश के दो कैदियों के संबंध में आया है, जिन पर फिरौती की रकम के लिये एक असफल अपहरण का आरोप लगाया था।
  • दोनों कैदियों ने जेल में तकरीबन 16 वर्ष बिता लिये हैं और उन्होंने अपनी समय पूर्व रिहाई के संबंध में याचिका दायर की थी, किंतु अपराध की प्रकृति, अपराधियों की आयु, गवाहों की आशंका और समाज पर प्रत्यक्ष प्रभाव के चलते उनकी याचिका को रद्द कर दिया गया था।
  • इसके बाद उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की और अब न्यायालय ने दोनों कैदियों की समय पूर्व रिहाई का आदेश दे दिया है।

संबंधित कानून

  • आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC)
    • आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 432(1) राज्य सरकारों को किसी भी दोषी की सज़ा को पूर्णतः अथवा आंशिक रूप से निलंबित करने की शक्ति प्रदान करती है।
    • आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 432(2) के मुताबिक, यदि राज्य सरकार के पास किसी दोषी की सज़ा को निलंबित करने का कोई आवेदन आता है तो संबंधित राज्य सरकार इस मामले पर उस पीठासीन न्यायाधीश की राय ले सकती है जिसने दोषी को सज़ा सुनाई थी।
    • CrPC की धारा 433 राज्य सरकारों को न्यायालय द्वारा दी गई सज़ा को परिवर्तित करने की शक्ति प्रदान करती है, जबकि धारा 433A इस शक्ति के प्रयोग पर प्रतिबंध लगाती है।
    • CrPC की धारा 433A के अनुसार, यदि किसी दोषी को उम्रकैद की सज़ा हुई है तो उसे कारावास से तब तक रिहा नहीं किया जा सकता है, जब तक कि वह कम-से-कम 14 वर्ष की सज़ा पूरी न कर ले।
  • भारतीय संविधान 
    • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 72 में राष्ट्रपति को अधिकार दिया गया है कि वह किसी अपराध के लिये दोषी करार दिये गए व्यक्ति को क्षमादान देने अर्थात् दंडादेश का निलंबन, प्राणदंड स्थगन, राहत और माफी प्रदान कर सकता है।
    • ध्यातव्य है कि राष्ट्रपति उन सभी मामलों में अपनी इस शक्ति का प्रयोग कर सकता है, जहाँ सज़ा कोर्ट मार्शल द्वारा सुनाई गई हो, जहाँ किसी ऐसे कानून का उल्लंघन किया गया हो जो कि संघ की कार्यकारी शक्तियों के अधीन हो और जहाँ किसी अपराध के लिये मृत्यु दंड दिया गया हो।
    • वहीं भारतीय संविधान का अनुच्छेद 161 राज्य के राज्यपाल को क्षमादान करने और कुछ विशिष्ट मामलों में सज़ा को निलंबित करने, कम करने अथवा परिवर्तित करने की शक्ति प्रदान करता है।
    • किसी भी राज्य के राज्यपाल को ऐसे सभी मामलों में क्षमादान, सज़ा को निलंबित करने, कम करने और परिवर्तित करने की शक्ति प्राप्त है, जहाँ किसी ऐसे कानून का उल्लंघन किया गया हो जो कि राज्य की कार्यकारी शक्तियों के अधीन हो।

राज्य सज़ा समीक्षा बोर्ड

  • वर्ष 1999 से पूर्व देश के सभी राज्य सज़ा निलंबित करने की अपनी शक्ति का प्रयोग भिन्न-भिन्न तरीकों से करते थे, जिसके कारण प्रायः जटिलताएँ उत्पन्न होती थीं।
  • इस मामले पर संज्ञान लेते हुए वर्ष 1999 मैं राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने एक समिति का गठन किया और इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि समय-पूर्व रिहाई अथवा सज़ा के निलंबन से संबंधित मामलों पर विचार करने के लिये सभी राज्यों में राज्य सज़ा समीक्षा बोर्डों के गठन की सिफारिश की।
  • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने नवंबर 1999 मैं सभी राज्यों के सज़ा समीक्षा बोर्डों में एकरूपता सुनिश्चित करने के लिये कुछ व्यापक दिशा-निर्देश जारी किये।

सज़ा का सुधारवादी सिद्धांत

  • सज़ा का सुधारवादी सिद्धांत मानता है कि किसी भी दोषी को सज़ा देने का उद्देश्य उस व्यक्ति में सुधार लाना होना चाहिये, न कि सज़ा के माध्यम से एक उदाहरण प्रस्तुत करना।
  • इस प्रकार के सिद्धांत की वकालत करने वाले लोग मानते हैं कि अपराधी ने किसी विशिष्ट परिस्थिति में अपराध किया होगा और यह परिस्थिति पुनः उत्पन्न नहीं होगी, इसलिये उसे कारावास अवधि के दौरान सुधारने का प्रयास किया जाना चाहिये। 
  • इस प्रकार अपराधियों को दी जानी वाली सज़ा का उद्देश्य अपराधी में नैतिक सुधार लाना होना चाहिये। साथ ही अपराधी को कारावास की अवधि के दौरान किसी विशिष्ट कौशल में प्रशिक्षित किया जाना चाहिये, ताकि वह जेल से बाहर आने के बाद एक नया जीवन शुरू कर सके।

सुधारवादी सिद्धांत का महत्त्व

  • सुधारवादी सिद्धांत का प्रमुख ज़ोर कारावास अवधि के दौरान कैदियों के पुनर्वास पर होता है ताकि वे कानून का पालन कर अच्छे नागरिक बन सकें।
  • यह सिद्धांत कारावास के दौरान कैदियों के साथ मानवीय व्यवहार करने और मानवीय गरिमा बनाए रखने पर अधिक ध्यान केंद्रित करता है।
  • इस सिद्धांत की वकालत करने वालों का दावा है कि अपराधियों के साथ सहानुभूतिपूर्ण और विनम्र व्यवहार किये जाने से उनके व्यक्तित्त्व में एक क्रांतिकारी बदलाव लाया जा सकता है।

स्रोत: द हिंदू

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