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भारतीय राजनीति

कॉलेजियम सिस्टम

  • 07 Nov 2022
  • 13 min read

प्रिलिम्स के लिये:

कॉलेजियम सिस्टम, भारत का मुख्य न्यायाधीश।

मेन्स के लिये:

कॉलेजियम सिस्टम का विकास और इसकी आलोचना।

चर्चा में क्यों?

हाल ही में केंद्रीय कानून और न्याय मंत्री ने सर्वोच्च न्यायालय की कॉलेजियम प्रणाली की आलोचना करते हुए कहा कि न्यायाधीश योग्यता को दरकिनार कर अपने पसंद के लोगों की नियुक्ति या पदोन्नति की सिफारिश करते हैं।  

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(2) और 217 क्रमशः सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित हैं।

कॉलेजियम प्रणाली और इसका विकास:

  • परिचय:
    • यह न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण की प्रणाली है, जो संसद के किसी अधिनियम या संविधान के प्रावधान द्वारा स्थापित न होकर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के माध्यम से विकसित हुई है।
  • कॉलेजियम प्रणाली का विकास:
    • प्रथम न्यायाधीश मामला (1981):
      • इसने यह निर्धारित किया कि न्यायिक नियुक्तियों और तबादलों पर भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के सुझाव की "प्रधानता" को "ठोस कारणों" के चलते अस्वीकार किया जा सकता है।
      • इस निर्णय ने अगले 12 वर्षों के लिये न्यायिक नियुक्तियों में न्यायपालिका पर कार्यपालिका की प्रधानता स्थापित कर दी है।
    • दूसरा न्यायाधीश मामला (1993):
      • सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट करते हुए कॉलेजियम प्रणाली की शुरुआत की कि "परामर्श" का अर्थ वास्तव में "सहमति" है।
      • इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने आगे कहा कि यह CJI की व्यक्तिगत राय नहीं होगी, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के दो वरिष्ठतम न्यायाधीशों के परामर्श से ली गई एक संस्थागत राय होगी।
    • तीसरा न्यायाधीश मामला (1998):
      • राष्ट्रपति द्वारा जारी एक प्रेज़िडेंशियल रेफरेंस (Presidential Reference) (अनुच्छेद 143) के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने पाँच सदस्यीय निकाय के रूप में कॉलेजियम का विस्तार किया, जिसमें CJI और उनके चार वरिष्ठतम सहयोगी शामिल होंगे।

कॉलेजियम प्रणाली का प्रमुख:

  • सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम की अध्यक्षता CJI द्वारा की जाती है और इसमें सर्वोच्च न्यायालय के चार अन्य वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं।
  • उच्च न्यायालय के कॉलेजियम का नेतृत्व उसके मुख्य न्यायाधीश और उस न्यायालय के चार अन्य वरिष्ठतम न्यायाधीश करते हैं।
  • उच्च न्यायपालिका के न्यायाधीशों की नियुक्ति कॉलेजियम प्रणाली के माध्यम से ही की जाती है और इस प्रक्रिया में सरकार की भूमिका कॉलेजियम द्वारा नाम तय किये जाने के बाद की प्रक्रिया में ही होती है।

विभिन्न न्यायिक नियुक्तियों के लिये निर्धारित प्रक्रिया:

  • भारत का मुख्य न्यायाधीश (CJI) के लिये:
    • CJI और सर्वोच्च न्यायालय के अन्य जजों की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
    • अगले CJI के संदर्भ में निवर्तमान CJI अपने उत्तराधिकारी के नाम की सिफारिश करता है।
    • हालाँकि वर्ष 1970 के दशक के अतिलंघन विवाद के बाद से व्यावहारिक रूप से इसके लिये वरिष्ठता के आधार का पालन किया जाता है।
  • सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के लिये:
    • सर्वोच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों के लिये नामों के चयन का प्रस्ताव CJI द्वारा शुरू किया जाता है।
    • CJI कॉलेजियम के बाकी सदस्यों के साथ-साथ उस उच्च न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश से भी परामर्श करता है, जिससे न्यायाधीश पद के लिये अनुशंसित व्यक्ति संबंधित होता है।
    • निर्धारित प्रक्रिया के तहत परामर्शदाताओं को लिखित रूप में अपनी राय दर्ज करानी होती है और इसे फाइल का हिस्सा बनाया जाना चाहिये।
    • इसके पश्चात् कॉलेजियम केंद्रीय कानून मंत्री को अपनी सिफारिश भेजता है, जिसके माध्यम से इसे राष्ट्रपति को सलाह देने हेतु प्रधानमंत्री को भेजा जाता है।
  • उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के लिये:
    • उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति इस आधार पर की जाती है कि मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने वाला व्यक्ति संबंधित राज्य से न होकर किसी अन्य राज्य से होगा।
    • यद्यपि चयन का निर्णय कॉलेजियम द्वारा लिया जाता है।
    • उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सिफारिश CJI और दो वरिष्ठतम न्यायाधीशों वाले एक कॉलेजियम द्वारा की जाती है।
    • हालाँकि इसके लिये प्रस्ताव को संबंधित उच्च न्यायालय के निवर्तमान मुख्य न्यायाधीश द्वारा अपने दो वरिष्ठतम सहयोगियों से परामर्श के बाद पेश किया जाता है।
    • यह सिफारिश मुख्यमंत्री को भेजी जाती है, जो इस प्रस्ताव को केंद्रीय कानून मंत्री को भेजने के लिये राज्यपाल को सलाह देता है।

ॉलेजियम प्रणाली से संबंधित प्रमुख मुद्दे

  • कार्यपालिका का बहिष्करण: न्यायिक नियुक्ति प्रक्रिया से कार्यपालिका के पूर्ण बहिष्करण ने एक ऐसी प्रणाली का निर्माण किया है जहाँ कुछ न्यायाधीश पूर्ण गोपनीय तरीके से अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति करते हैं।
  • इसके अलावा, वे किसी भी प्रशासनिक निकाय के प्रति जवाबदेह नहीं होते हैं जिसके कारण सही उम्मीदवार की अनदेखी करते हुए गलत उम्मीदवार का चयन किया जा सकता है।
  • पक्षपात और भाई-भतीजावाद की संभावना: कॉलेजियम प्रणाली CJI पद के उम्मीदवार के परीक्षण हेतु कोई विशिष्ट मानदंड प्रदान नहीं करती है, जिसके कारण यह पक्षपात एवं भाई-भतीजावाद (Favouritism and Nepotism) की व्यापक संभावना की ओर ले जाती है।
    • यह न्यायिक प्रणाली की गैर-पारदर्शिता को जन्म देती है, जो देश में विधि एवं व्यवस्था के विनियमन के लिये अत्यंत हानिकारक है।
  • नियंत्रण एवं संतुलन के सिद्धांत के विरुद्ध: इस प्रणाली में नियंत्रण एवं संतुलन के सिद्धांत (Principle of Checks and Balances) का उल्लंघन होता है। भारत में व्यवस्था के तीनों अंग-विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका यूँ तो अंशतः स्वतंत्र रूप से कार्य करते हैं लेकिन वे किसी भी अंग की अत्यधिक शक्तियों पर नियंत्रण के साथ ही संतुलन भी बनाए रखते हैं।
    • कॉलेजियम प्रणाली न्यायपालिका को अपार शक्ति प्रदान करती है, जो नियंत्रण का बहुत कम अवसर देती है और दुरुपयोग का खतरा उत्पन्न करती है।
  • ‘क्लोज़-डोर मैकेनिज़्म : आलोचकों ने रेखांकित किया है कि इस प्रणाली में कोई आधिकारिक सचिवालय शामिल नहीं है। इसे एक ‘क्लोज्ड डोर अफेयर’ के रूप में देखा जाता है, जहाँ कॉलेजियम की कार्य प्रणाली और निर्णयन प्रक्रिया के बारे कोई सार्वजनिक सूचना उपलब्ध नहीं होती।
    • इसके अलावा कॉलेजियम की कार्यवाही का कोई आधिकारिक कार्यवृत्त भी दर्ज नहीं होता।
  • असमान प्रतिनिधित्व: चिंता का एक अन्य क्षेत्र उच्च न्यायपालिका की संरचना है, जहाँ महिलाओं का प्रतिनिधित्व काफी कम है।

नियुक्ति प्रणाली में सुधार के प्रयास:

  • इसे 'राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग' (99वें संशोधन अधिनियम, 2014 के माध्यम से) द्वारा प्रतिस्थापित करने के प्रयास को 2015 में ने इस आधार पर खारिज कर दिया कि यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिये खतरा है।

आगे की राह

  • कार्यपालिका और न्यायपालिका को शामिल करते हुए रिक्तियों को भरना एक सतत् व सहयोगी प्रक्रिया है तथा इसके लिये कोई समय-सीमा नहीं हो सकती है। हालांँकि यह एक स्थायी, स्वतंत्र निकाय के बारे में सोचने का समय है जो न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाए रखने हेतु पर्याप्त सुरक्षा उपायों के साथ प्रक्रिया को संस्थागत बनाने के लिये न्यायिक प्रधानता की गारंटी देता है लेकिन न्यायिक विशिष्टता की नहीं।
  • इसे स्वतंत्रता सुनिश्चित करनी चाहिये, विविधता को प्रतिबिंबित करना चाहिये, पेशेवर क्षमता और अखंडता का प्रदर्शन करना चाहिये।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)  

्रश्न: निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (वर्ष 2019)

  1. भारत के संविधान में 44वें संशोधन ने प्रधानमंत्री के चुनाव को न्यायिक समीक्षा से परे रखने वाला एक अनुच्छेद पेश किया।
  2. भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता के उल्लंघन के रूप में भारत के संविधान में 99वें संशोधन को रद्द कर दिया।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

 (a) केवल 1
 (b) केवल 2
 (c) दोनों 1 और 2 दोनों
 (d) न तो 1 और न ही 2

 उत्तर: (b)

व्याख्या:

  • यह वर्ष 1975 में संविधान का 39वाँ संशोधन था, जिसके माध्यम से संसद ने राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और लोकसभा के अध्यक्ष के चुनावों के संबंध में याचिकाओं पर निर्णय लेने के लिये सर्वोच्च न्यायालय की शक्ति को खत्म करने के लिये एक अनुच्छेद पेश किया। इसके बजाय संसद द्वारा गठित एक निकाय को ऐसे चुनावी विवादों को हल करने की शक्ति प्राप्त होगी। अतः कथन 1 सही नहीं है।
  • 99वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के लिये प्रावधान किया, जो सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के बाद कॉलेजियम प्रणाली की जगह लेगा। इस अधिनियम को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रद्द कर दिया गया था क्योंकि यह 'न्यायपालिका की स्वतंत्रता' के सिद्धांतों के साथ-साथ 'शक्तियों के पृथक्करण' के सिद्धांतों को प्रभावित करता था। अत: कथन 2 सही है।

अतः विकल्प (b) सही है।


प्रश्न: भारत में उच्च न्यायपालिका के न्यायाधीशों की नियुक्ति के संदर्भ में 'राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम, 2014' पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिये। (मुख्य परीक्षा, 2017)

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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