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जीव विज्ञान और पर्यावरण

मियावाकी पद्धति

  • 06 Jul 2019
  • 3 min read

चर्चा में क्यों ?

तेलंगाना सरकार ने जापानी वृक्षारोपण ‘मियावाकी पद्धति’ (Miyawaki method) की तर्ज़ पर तेलंगानाकु हरिता हरम (Telanganaku Haritha Haaram- TKHH) योजना की शुरुआत की है जिसका उद्देश्य शहरी क्षेत्रों में वृक्षारोपण को बढ़ावा देना है।

प्रमुख बिंदु

  • मियावाकी पद्यति के प्रणेता जापानी वनस्पति वैज्ञानिक अकीरा मियावाकी (Akira Miyawaki) हैं। इस पद्यति से बहुत कम समय में जंगलों को घने जंगलों में परिवर्तित किया जा सकता है।
  • इस योजना ने घरों के आगे अथवा पीछे खाली पड़े स्थान (Backyards) को छोटे बागानों में बदलकर शहरी वनीकरण की अवधारणा में क्रांति ला दी है।
  • इस पद्धति में देशी प्रजाति के पौधे एक दूसरे के समीप लगाए जाते हैं, जो कम स्थान घेरने के साथ ही अन्य पौधों की वृद्धि में भी सहायक होते हैं।
  • सघनता की वज़ह से ये पौधे सूर्य की रौशनी को धरती पर आने से रोकते हैं, जिससे धरती पर खरपतवार नहीं उग पाता है। तीन वर्षों के पश्चात् इन पौधों को देखभाल की आवश्यकता नही होती है।
  • पौधे की वृद्धि 10 गुना तेज़ी से होती है जिसके परिणामस्वरूप वृक्षारोपण सामान्य स्थिति से 30 गुना अधिक सघन होता है।
  • जंगलों को पारंपरिक विधि से उगने में लगभग 200 से 300 वर्षों का समय लगता है, जबकि मियावाकी पद्धति से उन्हें केवल 20 से 30 वर्षों में ही उगाया जा सकता है।

miyawaki method

मियावाकी पद्धति

  • सर्वप्रथम क्षेत्र विशेष के मूल पेड़ों की पहचान की जाती है और उन्हें चार भागों में विभाजित किया जाता है-
    • झाड़ी (Shurb)
    • छोटे पेड़ (Sub-Tree )
    • पेड़
    • कैनोपी (canopy)
  • मिट्टी की गुणवत्ता का विश्लेषण करने के पश्चात् इसमें बायोमास (Biomass) मिलाया जाता है जो मिट्टी की जल धारण क्षमता तथा इसमें पोषक तत्वों को बढ़ाने में मदद करता है।
  • हालाँकि कई पर्यावरणविदों ने इस पद्धति के तहत होने वाले वृद्धि और विकास पर सवाल उठाया है।
  • पर्यावरणविदों के अनुसार, पौधों को तीव्र प्रकाश संश्लेषण की क्रिया हेतु उत्तेजित करना उचित नहीं है।

स्रोत: द हिंदू

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