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भारत में स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र की उपलब्धियाँ

  • 20 Apr 2018
  • 13 min read

चर्चा में क्यों?
भारत में स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र लगातार दूसरे वर्ष भी अपनी क्षमताओं में विस्तार के लक्ष्य को प्राप्त नही कर सका।

प्रमुख बिंदु 

  • भारत में स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र 14,450 मेगावाट के लक्ष्य के मुकाबले केवल 11,754 मेगावाट क्षमता वृद्धि कर सका।
  • नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र लगातार दूसरे वर्ष भी अपने क्षमता वृद्धि के लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सका है।
  • नवीन और अक्षय ऊर्जा मंत्रालय (Ministry of New and Renewable Energy) से उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2017-18 के लिये 14,450 मेगावाट के लक्ष्य के मुकाबले, इस क्षेत्र के सभी प्रमुख खंडों की नई क्षमता वृद्धि 11,754 मेगावाट थी, जो कि 31 मार्च, 2018 को समाप्त होने वाले वित्तीय वर्ष के लिये निर्धारित लक्ष्य का केवल 81 प्रतिशत मात्र थी।
  • हालाँकि, वित्तीय वर्ष 2016-17 में 11,320 मेगावॉट क्षमता वृद्धि हुई थी। जबकि लक्ष्य 16,660 मेगावॉट क्षमता वृद्धि का रखा गया था। इसकी तुलना में वित्तीय वर्ष 2017 -18 में थोड़ी अधिक वृद्धि हुई है।
  • सौर ऊर्जा-ज़मीन पर स्थापित संयंत्र (Solar energy ground mounted), स्वच्छ ऊर्जा क्षमता वृद्धि में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है और बायो-पावर सेगमेंट (bio-power segments) में वित्तीय वर्ष 2017-18 के दौरान क्षमता वृद्धि निर्धारित लक्ष्यों की तुलना में अधिक रही है।
  • वित्तीय वर्ष 2017-18 के दौरान सौर ऊर्जा (जमीन पर स्थापित संयंत्र) में 9,010 मेगावाट की अतिरिक्त क्षमता वृद्धि हुई है, जो कि 9,000 मेगावाट के निर्धारित लक्ष्य से थोड़ा अधिक है।
  • रूफटॉप सोलर सेगमेंट (Rooftop Solar Segment) में 1,000 मेगावाट क्षमता वृद्धि के लक्ष्य की तुलना में  केवल 353 मेगावाट क्षमता की वृद्धि हुई।
  • वित्तीय वर्ष 2017-18 में नई जैव-ऊर्जा क्षमता (New bio-power capacity) में 340 मेगावाट के लक्ष्य के मुकाबले 519 मेगावाट की वृद्धि की गई। 
  • लघु जल विद्युत में 100 मेगावाट के निर्धारित लक्ष्य से अधिक 106 मेगावाट की क्षमता वृद्धि हुई।
  • वित्तीय वर्ष 2017-18 पवन ऊर्जा के लिये काफी चुनौतीपूर्ण वर्ष साबित हुआ है, इस क्षेत्र ने हाल के वर्षों में सबसे कम वृद्धि की है। पवन ऊर्जा में 4,000 मेगावाट के लक्ष्य की तुलना में केवल 1,766 मेगावाट की वृद्धि हुई है।
  • 31 मार्च, 2018 तक अक्षय ऊर्जा क्षेत्र (renewable energy sector) में कुल ग्रिड-इंटरैक्टिव स्थापित क्षमता (grid-interactive installed capacity) 69,022 मेगावाट थी।
  • पवन ऊर्जा की कुल स्थापित क्षमता 34,046 मेगावाट थी। सौर खंड (दोनों ज़मीन और रूफटॉप पर स्थापित संयंत्र) 21,652 मेगावाट की संचयी क्षमता के साथ दूसरे स्थान पर बना रहा।
  • बायो-पावर (Bio-power) की कुल क्षमता 8,701 मेगावाट थी, जबकि छोटे जल विद्युत क्षेत्र की संचयी क्षमता (small hydro segment’s cumulative capacity) 4,486 मेगावाट थी। अपशिष्ट से बिजली निर्माण क्षेत्र की क्षमता 138 मेगावाट थी।
  • चालू वित्त वर्ष के लिये, पवन ऊर्जा क्षेत्र में काफी अधिक संभावनाएँ विद्यमान हैं, क्योंकि इसमें अगले 2-3 वर्षों तक लगातार प्रतिवर्ष 10-12 गीगावाट क्षमता को जोड़ने की संभावना विद्यमान है।
  • जून 2017 से सौर परियोजनाओं के लिये निविदा देने की प्रवृत्ति के कारण, इस वित्तीय वर्ष में सौर ऊर्जा वृद्धि की क्षमता में 40 प्रतिशत तक की कमी हो सकती है।

नवीन और अक्षय ऊर्जा मंत्रालय (Ministry of New & Renewable Energy)
नवीन और अक्षय ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) नवीन और अक्षय ऊर्जा से संबंधित सभी मामलों के लिये भारत सरकार का नोडल मंत्रालय है। मंत्रालय का मुख्‍य उद्देश्‍य देश की ऊर्जा आवश्‍यकताओं की पूर्ति के लिये नवीन और अक्षय ऊर्जा का विकास तथा स्‍थापना करना है।

मंत्रालय का सृजन :

  1. 1981 में अतिरिक्‍त ऊर्जा स्रोत आयोग (Commission for Additional Sources of Energy -CASE)
  2. 982 में अपारंपरिक ऊर्जा स्रोत विभाग (Department of Non- Conventional Energy Sources -DNES )
  3. 1992 में अपारंपरिक ऊर्जा स्रोत मंत्रालय (Ministry of Non-Conventional Energy Sources -MNES)
  4. 2006 में अपारंपरिक ऊर्जा स्रोत मंत्रालय (Ministry of Non-Conventional Energy Sources) का नाम बदल कर नवीन और अक्षय ऊर्जा मंत्रालय (Ministry of New and Renewable Energy – MNRE) किया गया।             
  • नवीन और अक्षय ऊर्जा की भूमिका को देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिये बढ़ती चिंता के साथ हाल के दिनों में अत्‍यधिक महत्त्व दिया गया है। 
  • ऊर्जा 'आत्‍मनिर्भरता' को 1970 के दौरान दो तेल घटनाओं को ध्‍यान रखते हुए देश में नवीन और अक्षय ऊर्जा के लिये प्रमुख प्रेरक के रूप में पहचाना गया। 
  • तेल की कीमतों में अचानक वृद्धि, इसकी आपूर्ति से जुड़ी अनिश्चितता और भुगतानों के संतुलन पर प्रतिकूल प्रभाव से मार्च 1981 में विज्ञान और प्रौद्योगिक विभाग में अतिरिक्‍त ऊर्जा स्रोत आयोग की स्‍थापना की गई। 
  • इस आयोग को नीति निर्धारण और उनके कार्यान्‍वयन, नवीन और अक्षय ऊर्जा के विकास हेतु कार्यक्रम बनाने के साथ इस क्षेत्र में अनुसंधान और विकास को बढ़ाने तथा समन्‍वय करने का दायित्‍व भी सौंपा गया। 

वर्ष 1982 में तत्‍कालीन ऊर्जा मंत्रालय में एक नए विभाग, अर्थात् अपारंपरिक ऊर्जा स्रोत विभाग (डीएनईएस) बनाया गया, जिसमें केस (CASE) को शामिल किया गया था। वर्ष 1992 में डीएनईएस को अपारंपरिक ऊर्जा स्रोत मंत्रालय बनाया गया। अक्‍तूबर 2006 में इसे नवीन और अक्षय ऊर्जा मंत्रालय का नया नाम दिया गया।

मिशन
मंत्रालय का अभियान निम्‍नलिखित को सुनिश्चित करना है :-

  • ऊर्जा सुरक्षा : वैकल्पिक ईंधनों (हाइड्रोजन, जैव ईंधन और संश्‍लेषित ईंधन) के विकास ओर इस्‍तेमाल द्वारा तेल आयातों पर निर्भरता में कमी लाना तथा घरेलू तेल आपूर्ति और मांग के बीच अंतराल को पाटने की दिशा में योगदान हेतु अनुप्रयोग।
  • स्‍वच्‍छ विद्युत में हिस्‍सेदारी बढ़ाना : अक्षय (जैव, पवन, हाइड्रो, सौर, भूतापीय और ज्‍वारीय) विद्युत से जीवाश्‍म ईंधन आधारित विद्युत उत्‍पादन में पूरकता प्रदान करना।
  • ऊर्जा उपलब्‍धता और अभिगम्‍यता : ग्रामीण, शहरी, औद्योगिक तथा वाणिज्यिक क्षेत्रों में भोजन पकाने, गर्म करने, मोटिव विद्युत और कैप्टिव उत्‍पादन की ऊर्जा आवश्‍यकताओं को पूरा करना।
  • ऊर्जा वहनीयता : लागत प्रतिस्‍पर्द्धी, सुविधाजनक, सुरक्षित और भरोसेमंद नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा आपूर्ति विकल्‍प। 
  • ऊर्जा साम्‍यता : एक स्‍थायी और विविध ईंधन सम्मिश्रण के माध्‍यम से  वर्ष 2050 तक वैश्विक औसत स्‍तर के समकक्ष प्रति व्‍यक्ति ऊर्जा खपत। 

विजन
नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा प्रौद्योगिकियों, प्रक्रमों, सामग्रियों, घटकों, उप प्रणालियों, उत्‍पादों और सेवाओं को अंतरराष्‍ट्रीय विशिष्टियों, मानकों और निष्‍पादन प्राचलों के समकक्ष बनाना, ताकि देश इस क्षेत्र में निवल विदेशी मुद्रा अर्जक बन सके और इन स्‍वदेशी रूप से विकसित और/या निर्मित उत्‍पादों और सेवाओं का ऊर्जा सुरक्षा के राष्‍ट्रीय लक्ष्‍य को आगे बढ़ाने में उपयोग किया जा सके।

कार्य
ग्रामीण, शहरी, औद्योगिक और वाणिज्यिक क्षेत्रों में परिवहन, पोर्टेबल और स्‍टेशनरी अनुप्रयोगों के लिये नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियों / युक्तियों के अनुसंधान, डिज़ाइन, विकास, निर्माण और उपयोग की सुविधा प्रदान करना।

  • प्रौद्योगिकी मानचित्र और बेंचमार्किंग।
  • अनुसंधान, डिज़ाइन, विकास और निर्माण प्रबलन क्षेत्रों की अभिज्ञा करना और इसकी सुविधा प्रदान करना। 
  • अंतर्राष्ट्रीय स्‍तर के समकक्ष मानकों, विशिष्टियों और निष्‍पादन प्राचलों को तैयार करना तथा उद्योगों को उन्‍हें प्राप्‍त करने की सुविधा प्रदान करना।
  • नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा उत्‍पादों तथा सेवाओं को अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर की लागतों के बराबर लाना तथा उद्योग को उन्‍हें प्राप्‍त करने की सुविधा प्रदान करना।
  • उपयुक्‍त अंतर्राष्ट्रीय स्‍तर के गुणवत्ता आश्‍वासन प्रत्‍यायन और उद्योगों को उन्‍हें प्राप्‍त करने की सुविधा प्रदान करना।
  • नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा उत्‍पादों और सेवाओं के निष्‍पादन प्राचलों पर विनिर्माताओं को निरंतर उन्‍नयन लागू करने के लक्ष्‍य सहित फीडबैक प्रदान करना, ताकि वे लघुतम समय अवधि के अंदर अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर प्राप्‍त कर सकें।
  • अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्‍पर्द्धी और निवल विदेशी मुद्रा अर्जक बनने में उद्योगों को सहायता देना।
  • संसाधन सर्वेक्षण, आकलन, मानचित्र तथा प्रसार।
  • उन क्षेत्रों को अभिज्ञात करना जहाँ नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा उत्‍पादों और सेवाओं को राष्‍ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा और ऊर्जा स्‍वतंत्रता का लक्ष्‍य पूरा करने के लिये इस्‍तेमाल करने की ज़रूरत है।
  • स्‍वदेशी रूप से विकसित और निर्मित विभिन्‍न नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा उत्‍पादों तथा सेवाओं के लिये उपयोग की कार्यनीति।
  • लागत प्रतिस्‍पर्द्धी नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा आपूर्ति विकल्‍पों का प्रावधान।
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