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शासन व्यवस्था

फास्ट ट्रैक कोर्ट के लिये योजना को जारी रखना

  • 05 Aug 2021
  • 10 min read

प्रिलिम्स के लिये

निर्भया फंड, फास्ट ट्रैक कोर्ट, किशोर न्याय अधिनियम , यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण

मेन्स के लिये

फास्ट ट्रैक कोर्ट की आवश्यकता एवं संबंधित मुद्दे  

चर्चा में क्यों?

हाल ही में केंद्र सरकार ने दो वर्षों (अप्रैल 2021-मार्च 2023) के लिये केंद्र प्रायोजित योजना (CSS) के रूप में 1000 से अधिक फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSC) को जारी रखने की मंज़ूरी दी।

प्रमुख बिंदु 

पृष्ठभूमि:

  • फास्ट ट्रैक कोर्ट (FTC) को पहली बार 2000 में ग्यारहवें वित्त आयोग द्वारा "अगले पाँच वर्षों में ज़िला और अधीनस्थ अदालतों में लंबित मामलों को काफी हद तक कम करने के लिये"अनुशंसित किया गया था।
  • वित्त आयोग की रिपोर्ट के बाद केंद्र द्वारा पाँच साल की अवधि के लिये विभिन्न राज्यों में 1,734 अतिरिक्त अदालतें बनाने हेतु 502.90 करोड़ रुपए जारी किये गए।
  • वर्ष 2011 में केंद्र सरकार ने फास्ट ट्रैक कोर्ट को फंड देना बंद कर दिया था।
    • इस फैसले को वर्ष 2012 में  सर्वोच्च न्यायलय (SC) में चुनौती दी गई थी, लेकिन शीर्ष अदालत ने कहा कि यह राज्यों पर निर्भर है कि वे अपनी वित्तीय स्थिति के आधार पर इन अदालतों को जारी रखें या बंद करें।
  • तीन राज्यों - महाराष्ट्र, तमिलनाडु और केरल ने इन अदालतों का संचालन जारी रखा, जबकि दिल्ली, पश्चिम बंगाल, हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक ने कहा था कि वे 2013 तक जारी रखेंगे।
  • दिसंबर 2012 के गैंगरेप और हत्या के बाद केंद्र सरकार ने 'निर्भया फंड' की स्थापना की, किशोर न्याय अधिनियम में संशोधन किया और फास्ट-ट्रैक महिला न्यायालयों की स्थापना की।
    • इसके बाद कुछ अन्य राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, बिहार आदि ने भी बलात्कार के मामलों के लिये FTC की स्थापना की।

फास्ट ट्रैक कोर्ट संबंधी योजना

  • वर्ष 2019 में सरकार ने भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत लंबित दुष्कर्म के मामलों और पॉक्सो अधिनियम के तहत अपराधों के शीघ्र निपटान के लिये देश भर में 1,023 फास्ट ट्रैक कोर्ट (FTSCs) स्थापित करने की एक योजना को मंज़ूरी दी थी।
    • जुलाई 2019 में सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसे प्रत्येक ज़िले में केंद्र द्वारा वित्तपोषित एक विशेष अदालत स्थापित करने का भी निर्देश दिया था, जहाँ 100 से अधिक प्राथमिकी दर्ज की गई हैं, ताकि इन मामलों से विशेष रूप से निपटा जा सके।
  • इस प्रकार फास्ट ट्रैक कोर्ट ऐसी समर्पित अदालतें हैं जिनसे न्याय की त्वरित व्यवस्था सुनिश्चित करने की अपेक्षा की जाती है। नियमित अदालतों की तुलना में उनके पास बेहतर निपटान दर है और वे त्वरित परीक्षण करते हैं।
  • यह यौन अपराधियों के लिये निवारक ढाँचे को भी मज़बूत करता है।

फास्ट ट्रैक कोर्ट का अब तक का प्रदर्शन:

  • इनका प्रदर्शन अब तक आवश्यक लक्ष्यों को प्राप्त करने में सफल नहीं रहा है।
  • नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, वर्ष 2019 के अंत में दुष्कर्म के लंबित मामलों की दर (वर्ष के अंत में लंबित मामले, मुकदमे के लिये कुल मामलों के प्रतिशत के रूप में) 89.5% और दोषसिद्धि दर 27.8% थी।
  • पॉक्सो अधिनियम के तहत वर्ष के अंत में 88.8% मामले लंबित थे और जिन मामलों का निपटारा किया गया, उनमें से 34.9% मामलों में दोष सिद्ध हुए थे।

फास्ट ट्रैक कोर्ट संबंधी मुद्दे

  • अवसंरचना का अभाव
    • फास्ट-ट्रैक कोर्ट नियमित अदालतों से अलग तरीके से काम नहीं करती हैं। यह ज़िला न्यायपालिका के किसी भी अन्य कोर्ट हॉल की तरह ही है।
    • मामलों को तेज़ी से आगे बढ़ाने में सक्षम बनाने के लिये कानूनी प्रक्रिया में कोई भी विशिष्ट बदलाव नहीं किया गया है। इस व्यवस्था के तहत आवश्यक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये महत्त्वपूर्ण सहायक बुनियादी अवसंरचना का अभाव देखने को मिलता है।
  • कोई स्पष्ट जनादेश नहीं:
    • फास्ट-ट्रैक अदालतों को किस तरह के मामलों की सुनवाई करनी चाहिये, इससे संबंधित कोई स्पष्ट आदेश नहीं है।
    • उदाहरण के लिये निर्भया फंड के तहत स्थापित फास्ट-ट्रैक अदालतें स्पष्ट नहीं थीं कि लिंग आधारित हिंसा जैसे 'ईव-टीज़िंग' (सड़कों पर उत्पीड़न) या घरेलू हिंसा के सभी मामले उनके दायरे में आते हैं या नहीं।
  • फैसले में देरी:
    • एक अध्ययन से पता चला है कि गवाहों की अनुपस्थिति के कारण देरी को स्थगन के मुख्य कारणों में से एक के रूप में देखा गया था।
    • देरी का एक अन्य कारण वकीलों द्वारा मांगे गए स्थगन हैं।
      • भारत में मुकदमेबाज़ी की संस्कृति स्थगन की मांग को प्रोत्साहित करती है; दरअसल, मुवक्किल मामलों में देरी करने के लिये वकीलों के पास आते हैं।
    • देरी इसलिये भी हो सकती है क्योंकि कई बार फास्ट ट्रैक कोर्ट के फैसले को उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय दोनों में चुनौती दी जाती है।
  • न्यायाधीशों पर कार्य का अत्यधिक भार:
    • न्यायिक अधिकारियों की कम संख्या।
      • फरवरी 2020 तक विभिन्न राज्यों में अधीनस्थ न्यायालयों में न्यायिक अधिकारियों की स्वीकृत संख्या (24,018) का लगभग 21% पद खाली थे; 5,146 रिक्तियों में से उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात राज्यों में बड़ी संख्या में सीटें खाली थीं।
    • वे कमोबेश सत्र न्यायालयों के न्यायाधीश होते हैं जिन्हें फास्ट-ट्रैक अदालतों की अतिरिक्त ज़िम्मेदारी दी जाती है।

आगे की राह

फास्ट-ट्रैक कोर्ट की आवश्यकता:

  • फास्ट-ट्रैक कोर्ट को अधिक प्रभावी बनाने के लिये समयबद्ध तरीके से परीक्षण पूरा किया जाना चाहिये। इसके लिये पुनर्गठन प्रक्रियाओं के दौरान समर्पित न्यायाधीशों और सक्षम कर्मचारियों के साथ इन अदालतों की मानवीय क्षमता में सुधार करने हेतु दो-आयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है।

क्षमता निर्माण:

  • उनके पास समर्पित न्यायाधीश होने चाहिये ताकि मामलों की नियमित आधार पर सुनवाई हो सके।
  • सक्षम कर्मचारी जैसे- आशुलिपिक और लिपिक साक्ष्य प्रसंस्करण व गवाहों तथा जाँच अधिकारियों को नोटिस देने में मदद कर सकते हैं जिससे समय की काफी बचत होती है।

अभियांत्रिकी प्रक्रिया: 

  • कुछ समय लेने वाली प्रक्रियाओं को फिर से तैयार किया जाना चाहिये ताकि सिस्टम को और अधिक कुशल बनाया जा सके।
  • प्रत्येक सुनवाई के लिये लगने वाले समय का वास्तविक मूल्यांकन होना चाहिये और फिर एक उचित समय सारिणी होनी चाहिये जो हर मामले को पर्याप्त समय प्रदान करे।

स्पष्ट जनादेश:

  • फास्ट-ट्रैक कोर्ट के लिये एक स्पष्ट जनादेश होना चाहिये जैसा कि स्पेन और लाइबेरिया जैसे देशों में होता है।
  • सुनवाई एक निर्धारित समय-सीमा में होती है और जेंडर आधारित हिंसा से संबंधित कोई भी मामला स्वचालित रूप से इन अदालतों में स्थानांतरित हो जाता है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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