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  • 20 Dec 2021 रिवीज़न टेस्ट्स सामान्य अध्ययन पेपर 1

    सम्पूर्ण टेस्ट पाठ्यक्रम सामान्य अध्ययन पेपर 1

    1. उत्तरी भारतीय राज्यों में हिमालय क्षेत्र में मंदिर वास्तुकला का एक अनूठा रूप विकसित हुआ। स्पष्ट कीजिये। (150 शब्द)

    2. राष्ट्रवाद का साम्राज्यवाद के साथ सुयोजन, 1914 में यूरोप को विपत्ति की ओर ले गया। टिप्पणी कीजिये। (150 शब्द)

    3. प्रागैतिहासिक चित्रकला से हमें प्रारंभिक मानवों की मनोदशा (दिमागी स्थिति) समझने में सहायता मिलती है। सुस्पष्ट कीजिये। (150 शब्द)

    4. अधिकांश महाद्वीपों की तुलना में अंटार्कटिका वैश्विक जलवायु प्रव्रियाओं को बनाए रखने में एक बड़ी और महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। विश्लेषित कीजिये। (150 शब्द)

    5. सांप्रदायिकता क्या है? क्या आप सहमत हैं कि सांप्रदायिकता की समस्या औपनिवेशिक शासकों की भारत को एक भेंट है? (150 शब्द)

    6. वेलेज़ली की विस्तार नीति के अंतर्निहित कारक एवं शक्तियाँ कौन-सी थीं? (150 शब्द)

    7. भारत में युवाओं पर वैश्वीकरण के विभिन्न सामाजिक-आर्थिक प्रभावों की चर्चा कीजिये। (150 शब्द)

    8. भारत में जाति तथा आर्थिक असमानता के मध्य संबंध स्थापित कीजिये। जाति असमानता के उन्मूलन हेतु अभिकल्पित कुछ नीतिगत उपायों का वर्णन कीजिये। (150 शब्द)

    9. 'भारत छोड़ो' आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि इसने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध भारतीय जनता को एकजुट किया। चर्चा कीजिये। (150 शब्द)।

    10. पश्चिमी विक्षोभ की व्याख्या करते हुए भारतीय मौसम प्रणालियों पर उसके प्रभाव का वर्णन कीजिये।

    11. भारत में लिंग आधारित हिंसा के कारणों पर चर्चा कीजिये। यह देश में महिलाओं के विकास को कैसे बाधित करता है? (250 शब्द)

    12. दक्षिण भारत में मंदिर स्थापत्य के उद्भव और विकास की रूपरेखा को उनकी प्रादेशिक शैलियों और विभिन्नताओं का उल्लेख करते हुए प्रदर्शित कीजिये।

    13. अर्बन कॉमन्स क्या हैं? ‘‘अर्बन कॉमन्स’’ के महत्त्व तथा इनके द्वारा सामना की जाने वाली चुनौतियों का विश्लेषण कीजिये। (250 शब्द) 

    14. ‘‘पृथक् निर्वाचन व्यवस्था उस ज़हरीले वृक्ष के समान थी जिसने आने वाले वर्षों में कड़वी फसल उत्पन्न की।’’
    टिप्पणी कीजिये। (250 शब्द)

    15. महात्मा गांधी और सुभाष चंद्र बोस अपने तरीके एवं पद्धति में तथा अपनी राजनीतिक एवं आर्थिक विचारधाराओं में व्यापक रूप से भिन्न थे। चर्चा कीजिये। (250 शब्द)

    16. ‘‘पिछले कुछ वर्षों से भारतीय मानसून आगमन, वितरण तथा वर्षण प्रतिरूप में अत्यधिक परिवर्तनों से गुज़र रहा है।’’ विस्तृत व्याख्या कीजिये। (250 शब्द)

    17. क्या आप सहमत हैं कि महिलाओं के विवाह की वैधानिक उम्र बढ़ाने से भारत के लिये आर्थिक और सामाजिक लाभ सुनिश्चित होंगे? अपने दृष्टिकोण का औचित्य सिद्ध करें। (150 शब्द)

    18. स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान भारतीयों में राष्ट्रवाद की भावना को जगाने में प्रेस की भूमिका का विश्लेषण कीजिये। (250 शब्द)

    19. वैश्वीकरण ने राज्यों की भूमिका को परिवर्तित किया है। विकासशील देशों के संबंध में इसके प्रभावों का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिये। (250 शब्द)

    20. जवाहरलाल नेहरू की नीतियों ने किस प्रकार राष्ट्र-निर्माण और स्वतंत्रता के बाद भारत के एकीकरण में मदद की? विवेचना कीजिये।

    उत्तर-1: 

    हल करने का दृष्टिकोण 

    • प्राचीन भारत की मुख्य मंदिर स्थापत्य शैली के बारे में संक्षेप में बताइये।
    • उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिये कि किस प्रकार पहाड़ी वास्तुकला अन्य कला रूपों से भिन्न थी।
    • उपयुक्त निष्कर्ष लिखिये।

    परिचय

    प्राचीन और मध्यकालीन भारत के अधिकांश स्थापत्य अवशेष धार्मिक प्रकृति के हैं। देश के विभिन्न भागों में मंदिरों की विशिष्ट स्थापत्य शैली भौगोलिक, जातीय और ऐतिहासिक विविधताओं का परिणाम थी।

    देश में मंदिरों की दो प्रसिद्ध शैलियाँ उत्तर में नागर और दक्षिण में द्रविड़ के नाम से जानी  जाती हैं।

    कभी-कभी मंदिरों की बेसर शैली को एक स्वतंत्र शैली के रूप में देखा जाता है, जिसे नागर और द्रविड़ शैलियों के मिश्रण के माध्यम से बनाया गया है।

    प्रारूप 

    • गांधार प्रभाव: यह कुमाऊँ, गढ़वाल, हिमाचल और कश्मीर की पहाड़ियों में विकसित वास्तुकला का एक अनूठा रूप है। प्रमुख गांधार स्थलों (जैसे तक्षशिला, पेशावर तथा उत्तर-पश्चिम सीमा) से कश्मीर की निकटता ने इस क्षेत्र को पाँचवीं शताब्दी तक एक मज़बूत गांधार प्रभाव क्षेत्र बना दिया।            
    • गुप्त और उत्तर-गुप्त परंपराओं का प्रभाव सारनाथ, मथुरा और यहाँ तक ​​कि गुजरात एवं बंगाल के केंद्रों से संबंधित है।
      • लक्ष्मण-देवी मंदिर में महिषासुरमर्दिनी और नरसिम्हा की छवियाँ उत्तर-गुप्त परंपरा के प्रभाव का प्रमाण हैं। दोनों छवियाँ कश्मीर की धातु मूर्तिकला परंपरा के प्रभाव को दर्शाती हैं।
    • पहाड़ी क्षेत्रों की छतों वाली काष्ठ इमारतों की भी अपनी परंपरा थी। इस क्षेत्र में कई स्थानों पर मुख्य गर्भगृह और शिखर, रेखा-प्रसाद या लैटिना शैली में बनाए गए हैं। मंडप, काष्ठ वास्तुकला का एक पुराना रूप है।
    • कभी-कभी मंदिरों को पगोड़ा का आकार भी दे दिया गया है।
    • सबसे महत्त्वपूर्ण मंदिरों में से एक पंड्रेथन है, जिसे आठवीं और नौवीं शताब्दी के दौरान बनाया गया था। मंदिर से जुड़ी एक पानी की टंकी की परंपरा को ध्यान में रखते हुए यह मंदिर एक तालाब के बीच में बने चबूतरे पर बनाया गया है।
    • यह एक हिंदू मंदिर है और संभवतः शिव को समर्पित है। इस मंदिर की वास्तुकला लकड़ी की इमारतों की सदियों पुरानी कश्मीरी परंपरा के अनुरूप है।
    • कश्मीर में बर्फीले हालात के कारण पहाड़ी मंदिरों की छत नुकीली और हल्की सी बाहर की ओर झुकी हुई बनाई गई है।
    • भारी नक्काशी के गुप्तोत्तर सौंदर्यशास्त्र से दूर जाते हुए मंदिर को मध्यम रूप से अलंकृत किया गया है।
    • हालाँकि कुमाऊँ, अल्मोड़ा में जागेश्वर और पिथौरागढ़ के पास चंपावत मंदिर इस क्षेत्र में नागर वास्तुकला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

    निष्कर्ष

    इस प्रकार बौद्ध और हिंदू दोनों परंपराएँ आपस में मिल गईं तथा पहाड़ी क्षेत्रों में विस्तृत हो गईं जिसके परिणामस्वरूप वास्तुकला की एक अनूठी शैली अस्तित्व में आई।


      उत्तर-2: 

      हल करने का दृष्टिकोण:

      • संक्षिप्त ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से शुरू कीजिये।
      • चर्चा कीजिये कि 1871 के बाद यूरोप में राष्ट्रवाद और साम्राज्यवाद ने कैसे तनाव पैदा किया।
      • निष्कर्ष लिखिये।

      उन्नीसवीं शताब्दी की अंतिम तिमाही तक राष्ट्रवाद, शताब्दी की पहली छमाही की अपनी आदर्शवादी उदारवादी-लोकतांत्रिक भावना को बरकरार नहीं रख पाया, बल्कि एक सीमित संकीर्ण पंथ बनकर रह गया। इस अवधि के दौरान राष्ट्रवादी समूह एक-दूसरे के प्रति असहिष्णु हो गए और युद्ध के लिये हर समय तैयार रहते थे। प्रमुख यूरोपीय शक्तियों ने स्वयं के साम्राज्यवादी उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिये यूरोप में राष्ट्रवादी आकांक्षाओं वाले लोगों को गुमराह किया।

      • राष्ट्रवाद
        • प्रथम विश्व युद्ध का एक महत्त्वपूर्ण कारण राष्ट्रवाद की लहर थी जो पूरे यूरोप में बह रही थी। यह वास्तव में फ्राँसीसी क्रांति के विरासतों में से एक था।
        • इटली और जर्मनी में राष्ट्रवाद की शानदार जीत ने इसे नए जोश से भर दिया और इसे राजनीति में एक शक्तिशाली शक्ति बना दिया। इटली और जर्मनी का एकीकरण संभव था क्योंकि काबूर और बिस्मार्क राष्ट्रवाद की भावना को जगाने में सफल रहे थे।
        • इस प्रक्रिया में, इसने लोगों के नस्लीय गौरव को बढ़ाया, उन्हें अपने देश को अन्य सभी से ऊपर उठाने के लिये प्रेरित किया और उन्हें अपने पड़ोसियों के प्रति अपने दृष्टिकोण में अभिमानी बनाया। यह राष्ट्रवाद का अत्यधिक प्रसार था, जिसने जर्मनी और ग्रेट ब्रिटेन जैसे राज्यों की प्रतिद्वंद्विता को तेज़ किया।
        • यह आक्रामक राष्ट्रवाद था जिसने यूरोपीय शक्तियों को एशिया, अफ्रीका और बाल्कन में उनके हितों पर कुठाराघात के लिये प्रेरित किया।
        • अंतत:, बाल्कन लोगों की असामयिक राष्ट्रीय आकांक्षाएँ प्रथम विश्व युद्ध का तात्कालिक कारण बन गईं।
      • साम्राज्यवाद
        • औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप अधिशेष पूंजी में वृद्धि हुई, जिसने विदेशों में निवेश को प्रोत्साहित किया, परिणामत: आर्थिक शोषण और राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा बढ़ गई।
        • बाज़ारों, कच्चे माल और उपनिवेशों के लिये संघर्ष 19वीं शताब्दी के अंत और 20वीं शताब्दी की शुरुआत में एक महान जुनून बन गया क्योंकि जर्मनी और इटली भी 19वीं शताब्दी के अंतिम दो या तीन दशकों के दौरान इस दौड़ में शामिल हो गए थे। बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा और अधिक साम्राज्यों की इच्छा के कारण टकराव में वृद्धि हुई जिसने दुनिया को प्रथम विश्व युद्ध में धकेल दिया।
        • अंग्रेज़ केप से काहिरा तक, रूस ट्रांस-साइबेरियन रेलवे और जर्मन बगदाद रेलवे का निर्माण कर रहे थे। इसका कारण यह था कि रेलवे का निर्माण आर्थिक साम्राज्यवाद के सबसे महत्त्वपूर्ण रूपों में से एक था, साथ ही इसमें राजनीतिक और आर्थिक हित शामिल थे। रेलवे के निर्माण ने औपनिवेशिक शक्तियों के बीच हितों के टकराव को बढ़ा दिया।

      साम्राज्यवादी वर्चस्व से जुड़े उग्र राष्ट्रवाद ने देशों के बीच दरार को बढ़ा दिया, साथ ही इसने सैन्यवाद और गठबंधनों के निर्माण के लिये ईंधन का काम किया। यह सब एक अभूतपूर्व विनाशकारी युद्ध में परिणत हुआ, जिसके परिणामस्वरूप 20 मिलियन से अधिक लोग मारे गए।


      उत्तर-3: 

      हल करने का दृष्टिकोण:

      • सबसे पहले भारत में प्रागैतिहासिक चित्रकला (विषयों एवं स्थानों) का संक्षिप्त परिचय दीजिये।
      • बताएँ कि प्रागैतिहासिक चित्रकला हमें प्रारंभिक मानव की मनोदशा को समझने में कैसे सहायता करती हैं
      • वर्तमान में इन पेंटिंग्स का महत्त्व बताते हुए निष्कर्ष दीजिये।

      प्रागैतिहासिक काल पृथ्वी पर मानव सभ्यता के विकास का प्रारंभिक चरण था जहाँ मानव जंगली अवस्था में था और तब किसी भी प्रकार के शब्दों, भाषाओं और कागज़ों के साथ-साथ कोई लिखित पुस्तक अथवा दस्तावेज़ मौजूद नहीं थे। पेंटिंग एवं ड्राइंग मानव द्वारा स्वयं को अभिव्यक्त करने की प्राचीनतम कला के रूप थे। मानव द्वारा गुफाओं तथा उनकी दीवारों को अपने कैनवास के रूप में प्रयोग कर उन पर अपने मनोभावों को उकेरा।

      उनके चित्रों के विषय मानव आकृतियों, मानवीय गतिविधियाँ, ज्यामितीय डिज़ाइन तथा प्रतीक थे। भारत में प्रारंभिक शैलचित्रों के कुछ उदाहरण- उत्तराखंड में लाखुडियार, तेलंगाना में कुप्पलल्लू, कर्नाटक में पिकलीहल तथा टेवकल्फोहा व मध्य प्रदेश में भीमबेटका एवं जोगीमारा आदि प्रमुख हैं।

      • ये प्रागैतिहासिक चित्र हमें शुरुआती मानव, उसकी जीवन शैली, उनकी भोजन संबंधी आदतों तथा उनकी दिनचर्या को समझने में सहायता करते हैं, और इन सबसे बढ़कर ये चित्र उस समय के मानव की सोच को समझने में सहायता करते हैं।
      • भीमबेटका में पाए गए चित्रों की विषयवस्तु अत्यधिक विविध है, जो उस समय की दैनिक घटनाओं से लेकर पवित्र एवं शाही चित्रों तक कई विषय स्वयं में समाए हैं। इनमें शिकार, नृत्य, संगीत, घोड़े व हाथी सवार, जानवरों की लड़ाई, शब्द संग्रह, शवों का दाह संस्कार और अन्य घरेलू दृश्य शामिल हैं।
      • मेसोलिथिक कलाकारों को जानवरों को चित्रित करना पसंद था। कुछ तस्वीरों में जानवर, मानवों का पीछा करते हुए दिखाए गए हैं। कुछ में मानवों द्वारा जानवरों का पीछा करना व शिकार करना दिखाया गया है।
      • कुछ जानवरों के चित्र विशेषकर शिकार के दृश्यों में जानवरों का डर तथा कई अन्य चित्र उनके प्रति कोमलता व प्रेम की भावना को प्रदर्शित करते हैं।
      • पुरुषों, महिलाओं व बच्चों की कुछ तस्वीरें पारिवारिक जीवन को दर्शाती हैं।
      • चारकोलिथिक काल के चित्रों से मालवा के मैदानी इलाकों में ऐसे कृषि समुदायों के साथ इस क्षेत्र की गुफाओं में रहने वालों के बीच संबंधों, संपर्क और पारस्परिक आदान-प्रदान का पता चलता है।
      • कुछ सबसे खूबसूरत पेंटिंग्स शैलाश्रयों में ऊँचाई पर या छतों पर बनी हुई हैं। इन स्थानों पर बनाए गए चित्र शायद लोगों द्वारा दूर से ही पहचानने के लिये बनाए गए थे।
      • चित्रों में जीवित रहने के लिये संघर्षरत व्यक्तियों तथा जानवरों को चित्रित किया गया है। 
      • अलग-अलग जानवरों में अंतर करने तथा उन्हें जीवंतता प्रदान करने में आदिम कलाकारों को महारत हासिल थी।
      • भीमबेटका में कुछ स्थानों पर चित्रों की एक के ऊपर एक परतें मिलती हैं। ऐसा शायद इसलिये था कि कलाकार को अपनी पिछली पेंटिंग पसंद न आई हो या कुछ चित्र और स्थानों को पवित्र माना जाता था शायद अलग-अलग पीढ़ियों के लिये इनका महत्त्व अलग-अलग रहा हो।

      अंतत: देखा जाए तो प्रागैतिहासिक काल के अवशेष मानव सभ्यता के विकास के महानतम गवाह हैं। कई पाषाण, औज़ारों, मृद्भांडों तथा हड्डियों के साथ-साथ चित्रित शैलाश्रय आदिम मनुष्यों द्वारा पीछे छोड़ी गई सबसे मूल्यवान संपत्ति है।


      उत्तर-4: 

      हल करने का दृष्टिकोण:

      • अंटार्कटिका का संक्षिप्त परिचय देते हुए भूमिका लिखिये।
      • जलवायु संतुलन में अंटार्कटिका की भूमिका को बताइये।
      • अंटार्कटिका में पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने की आवश्यकता पर बल देते हुए निष्कर्ष लिखिये।

      अंटार्कटिका पृथ्वी पर दक्षिणतम महाद्वीप है, जो कि लगभग बर्फ से ढका हुआ भू-क्षेत्र है। यह सबसे ठंडा, सबसे शुष्क तथा सबसे तेज़ हवाओं वाला महाद्वीप है। जहाँ पृथ्वी पर मौजूद बर्फ का 90% (लगभग 26.9 मिलियन क्यूबिक किलोमीटर) है, जो पृथ्वी पर उपलब्ध मीठे जल का 70 प्रतिशत भाग है। इसके साथ ही अन्य महाद्वीपों से अलग यह विश्व की महासागरीय एवं वायुमंडलीय परिसंचरण  प्रणालियों का महत्त्वपूर्ण चालक है और पृथ्वी पर तापमान संतुलन का मुख्य अंग है।

      • विशाल अंटार्कटिका हिम चादर पृथ्वी की सतह से सौर विकिरण को परावर्तित करके एल्बीडो बढ़ाने में सहायक है।
      • जैसे ही वैश्विक हिम चादरें पिघलती हैं या उनमें कमी होती है तो पृथ्वी का एल्बीडो कम हो जाता है। आधे सौर विकिरण के अवशोषण की दर में वृद्धि होती है, जिससे वैश्विक उष्णता में इजाफा होता है।
      • अंटार्कटिका के चारों ओर स्थित महासागरीय जल वैश्विकमहासागरीय कन्वेयर बेल्टका महत्त्वपूर्ण भाग है।
      • दक्षिणी महासागर तीन मुख्य महासागरीय बेसिन (प्रशांत, हिंद व अटलांटिक) को जोड़ता है और वैश्विक संचलन प्रणाली को संभव बनाता है तथा यह अंटार्कटिक सर्कुलर करंट द्वारा संचालित होता है।
      • अंटार्कटिका के चतुर्दिक ठंडे जल को अंटार्कटिक बॉटम वाटर के नाम से जाना जाता है और वह अत्यधिक घनत्व युक्त है, जो कि सागर तल पर अपवेलिंग का कारण बनते हैं।
      • अंटार्कटिक अपवेलिंग अत्यधिक शक्तिशाली है, जो कि पूरे ग्रह के चारों ओर जल को स्थानांतरित करने में सहायता करता है। जल की यह गति तीव्र अंटार्कटिक पवनों के कारण संचालित हो पाती है। बिना अंटार्कटिक महासागरीय संचलन के वैश्विक महासागरों में जल संतुलन संभव नहीं हो पाएगा।
      • मौसम प्रतिरूप को प्रभावित करने में मुख्य भूमिका निभाने के साथ अंटार्कटिक पर्यावरण जलवायु परिवर्तन से संबंधित बहुमूल्य जानकारी उपलब्ध कराता है।
      • अंटार्कटिक हिम चादरों में कुल वैश्विक मीथेन का 25% भंडारित है, जो बर्फ पिघलने के बाद जलवायु परिवर्तन में सबसे बड़ा योगदानकर्त्ता साबित हो सकता है।
      • अंटार्कटिका की बर्फ पिघलने से समुद्र का स्तर 58 मीटर तक बढ़ सकता है, जो कि विश्व के अधिकांश द्वीपों और तटीय क्षेत्रों को डुबाने हेतु पर्याप्त होगा।

      अंटार्कटिका विश्व की सबसे बड़ी प्राकृतिक प्रयोगशाला में से एक है, जो कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन का अध्ययन करने में सहायक है। अंटार्कटिका का पर्यावरण वैश्विक जलवायु परिवर्तनों के लिये अत्यधिक संवेदनशील संकेतक है, जो वैश्विक जलवायु संतुलन को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है।


        उत्तर-5: 

        हल करने का दृष्टिकोण:

        • सांप्रदायिकता को परिभाषित कीजिये।
        • संक्षेप में चर्चा कीजिये कि कैसे ऐतिहासिक रूप से भारत एक सहिष्णु समाज रहा है।
        • इसके उपरांत चर्चा कीजिये कि कैसे औपनिवेशिक शासन के दौरान सांप्रदायिकता एक बड़ी समस्या बन गई।
        • उपयुक्त निष्कर्ष के साथ उत्तर पूर्ण कीजिये।

        ‘सांप्रदायिकता’ का अभिप्राय धार्मिक पहचान पर आधारित आक्रामक अहम्मन्यता अथवा मिथ्याभिमान (Chauvinism) से है। अहम्मन्यता एक ऐसा दृष्टिकोण है जो अपने समूह को एकमात्र वैध या योग्य समूह के रूप में देखता है और दूसरे समूहों को हीन, अवैध एवं विरोधी मानता है। सांप्रदायिकता का मानना ​​है कि विभिन्न धर्मों के लोगों के राजनीतिक और आर्थिक मामलों में अलग-अलग हित होते हैं, भले वे एक ही राष्ट्र या प्रांत में रहते हों। सांप्रदायिक हिंसा सांप्रदायिक विचारधारा का ऊहात्मक परिणाम है।

        प्राचीनकाल से ही भारत सनातन जैन, बौद्ध, इस्लाम, ईसाईयत जैसे विभिन्न धर्मों और संप्रदायों का देश रहा है। इस भूमि पर सबका स्वागत किया गया और ऐसा कोई दृष्टांत नहीं मिलता कि किसी व्यक्ति के साथ उसके धर्म के कारण किसी प्रकार की घृणा या दुराव किया गया हो। 

        आधुनिक राजनीति के उदय के परिणामस्वरूप सांप्रदायिकता में उभार आया जिसने प्राचीन या मध्ययुगीन या वर्ष 1857 से पूर्व की राजनीति के मध्य एक बड़े अंतराल को चिह्नित किया। उपनिवेशवाद के प्रभाव में भारतीय समाज में हुए रूपांतरण और उपनिवेशवाद के विरुद्ध संघर्ष की आवश्यकता के परिणामस्वरूप सांप्रदायिक चेतना को बल मिला।

        • अंग्रेज़ों ने भारतीय इतिहास का एक विकृत संस्करण पेश किया और ऐतिहासिक कालक्रम को सांप्रदायिक विभाजन में प्रस्तुत किया। उन्होंने प्राचीन काल को हिंदू (बौद्ध, जैन आदि की उपेक्षा करते हुए) और मध्य काल को मुस्लिम (न केवल भक्ति व सूफी आंदोलन की उपेक्षा करते हुए बल्कि अफगानों-तुर्कों के बीच सत्ता संघर्ष की अनदेखी करते हुए) काल के रूप में प्रस्तुत किया।
        • हिंदुओं और मुसलमानों के बीच धार्मिक व सांस्कृतिक मतभेदों के प्रबलन अथवा स्वराघात तथा पृथक् सांप्रदायिक पहचानों के समेकन को विशेष रूप से वर्ष 1857 के विद्रोह के बाद ‘फूट डालो और राज करो’ (डिवाइड एंड रूल) की सुचिंतित ब्रिटिश नीति द्वारा समर्थन दिया गया। 
        • सांप्रदायिक मांगों को आसानी से स्वीकार कर लिया गया जिससे सांप्रदायिक संगठन राजनीतिक रूप से सशक्त हुए और लोगों पर उनका प्रभाव बढ़ता गया। उदाहरण के लिये, वर्ष 1885 से 1905 के बीच कॉन्ग्रेस ब्रिटिश सरकार से अपनी एक भी मांग नहीं मनवा सकी जबकि वर्ष 1906 में मुस्लिम सांप्रदायिक मांगों को वायसराय के समक्ष प्रस्तुत करते ही तुरंत स्वीकार कर लिया गया। 
        • बंगाल का विभाजन भी सांप्रदायिक दृष्टिकोण पर आधारित था क्योंकि ब्रिटिश सरकार ने धार्मिक आधार पर ही बंगाल का विभाजन किया था। 
        • ब्रिटिश सरकार ने सांप्रदायिक संगठनों और नेताओं को उनके समुदायों के वास्तविक प्रवक्ता के रूप में सहजता से स्वीकार कर लिया जबकि राष्ट्रवादी नेताओं को एक सूक्ष्म अल्पसंख्यक (कुलीन वर्ग) वर्ग का ही प्रतिनिधि माना गया। 
        • वर्ष 1909 में मुस्लिम समुदाय के लिये पृथक् निर्वाचक मंडल की स्वीकृति के साथ हिंदू-मुस्लिम संघर्ष के एक नए युग की शुरुआत हुई क्योंकि पृथक निर्वाचक मंडल के मुद्दे ने सांप्रदायिक राजनीति के विकास में एक महत्त्वपूर्ण साधन के रूप में कार्य किया। 
        • ‘फूट डालो और शासन करो’ की ब्रिटिश नीति को एक और अभिव्यक्ति अगस्त 1932 में सांप्रदायिक पंचाट की घोषणा से मिली। यह पंचाट इस ब्रिटिश सिद्धांत पर आधारित था कि भारत एक राष्ट्र नहीं है बल्कि नस्लीय, धार्मिक व सांस्कृतिक समूहों, जातियों और हितों का एक समूह है। 
        • अंग्रेज़ों ने सदैव हिंदुओं, मुसलमानों और सिखों को अलग-अलग समुदायों तथा सामाजिक-राजनीतिक निकायों के रूप में देखा जिनमें समानता के तत्त्व कम हैं। उन्होंने इन समुदायों के बीच आपसी विद्वेष को बढ़ावा दिया। 

        इस प्रकार भारत के ऐतिहासिक अतीत के आधार पर यह निष्कर्ष दिया जा सकता है कि अपने इतिहास के एक वृहत् हिस्से में भारत एक शांतिपूर्ण और सहिष्णु देश बना रहा है। तथापि अंग्रेज़ों के आगमन और उनकी औपनिवेशिक विस्तारवादी नीति ने भारत के सांस्कृतिक ताने-बाने को भंग किया तथा सांप्रदायिकता की उन शक्तियों को उन्मुक्त किया जो आज भी देश की शांति एवं स्थिरता को चुनौती दे रही हैं।


          उत्तर-6: 

          हल करने का दृष्टिकोण:

          • विस्तार नीति के अंतर्निहित कारकों को तथा शक्तियों को बताइये।
          • संतुलित निष्कर्ष दीजिये।

          लॉर्ड वेलेज़ली वर्ष 1798 में गवर्नर-जनरल बनकर भारत आया जिसके काल में ब्रिटिश साम्राज्य का अत्यधिक विस्तार हुआ। जिसने सहायक संधि का प्रयोग कर भारत में ब्रिटिश श्रेष्ठता स्थापित करने का प्रयास किया। इस प्रणाली ने भारत में अंग्रेज़ी साम्राज्य के प्रसार में विशिष्ट भूमिका निभाई।

          वेलेज़ली की विस्तार नीति के पीछे निहित प्रमुख कारक

          • वेलेज़ली भारत में ब्रिटिश शक्ति का प्रसार कर ब्रिटिश सरकार को भारत में संप्रभु बनाना चाहता था।
          • यह भारत को ब्रिटिश अधीनस्थ बनाकर ब्रिटिश सर्वोच्चता स्थापित करना चाहता था।
          • अन्य प्रमुख कारक फ्राँसीसी सत्ता को भारत से उखाड़ पेंकने की उसकी मंशा थी ताकि भारत में फ्राँसीसी प्रसार को रोक कर ब्रिटिश सर्वोच्चता स्थापित की जा सके।

          वेलेज़ली की विस्तार नीति के पीछे विद्यमान शक्तियाँ/ताकतें-

          • वेलेज़ली के दिशानिर्देशन में ईस्ट इंडिया कंपनी ने अधीनस्थ देशी राज्यों के साथ अहस्तक्षेप की नीति अपनाई तथा प्रचलित पूर्वगामी युद्ध नीतियों को समाप्त किया।
          • सहायक संधि प्रणाली के तहत वेलेज़ली ने भारतीय राजाओं को ब्रिटिश सेना के लिये खर्च उठाने, अपने दरबार में एक ब्रिटिश रेजीडेंट रखने, कंपनी की अनुमति के बिना विदेश संबंध स्थापित न करने आदि हेतु बाध्य किया। जिसके बदले ब्रिटिश कंपनी द्वारा शत्रुओं से रक्षा करने तथा आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने की बात कही गई।
          • इस नीति ने ब्रिटिश सेना का बिना अपना पैसा खर्च लिये सुदृढ़ीकरण करने में अहम भूमिका निभाई।
          • यह नीति ब्रिटिश कंपनी के लिये अत्यधिक लाभकारी सिद्ध हुई जिसने भारतीय राज्यों की सेना को सीमित करके ब्रिटिशों के लिये भारतीय साम्राज्य के द्वार खोल दिये।
          • भारतीय राज्यों की विदेशी नीति को नियंत्रित करके इस नीति ने विदेशी शत्रुओं को भारत में हस्तक्षेप करने से दूर रखा।

          सहायक संधि प्रणाली ने भारतीय राजाओं की संप्रभुता को छीनकर उन्हें ब्रिटिश सेना पर निर्भर बना  दिया जिसने ब्रिटिश कंपनी को भारत में अपनी संप्रभुता स्थापित करने का एक स्वर्णिम अवसर प्रदान किया तथा भारतीय राज्यों को औपनिवेशिक शोषण के अँधेरे की तरफ धकेल दिया।


            उत्तर-7: 

            हल करने का दृष्टिकोण:

            • वैश्वीकरण का संक्षिप्त परिचय दीजिये।
            • भारतीय युवाओं पर वैश्वीकरण के विभिन्न सामाजिक-आर्थिक प्रभावों की चर्चा कीजिये।
            • वैश्वीकरण के नकारात्मक प्रभाव को कम करने के लिये कुछ उपाय देते हुए निष्कर्ष लिखिये।

            वैश्वीकरण विभिन्न देशों के लोगों, कंपनियों और सरकारों के बीच वार्ता, एकता और परस्पर निर्भरता की प्रक्रिया को संदर्भित करता है। इसमें राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति शामिल हैं। वैश्वीकरण का समाज पर सकारात्मक तथा नकारात्मक दोनों परिणाम होते हैं।

            वैश्वीकरण का प्रभाव अत्यधिक व्यापक है। वैश्वीकरण का प्रभाव युवाओं में तीव्र परिवर्तन एवं अनिश्चिता लाने हेतु उत्तरदायी है। इस प्रकार, वैश्वीकरण न केवल युवाओं के बीच आर्थिक अवसर प्रदान करता है, बल्कि सामाजिक परिवर्तनों हेतु भी उत्तरदायी है।

            • सूचना और संचार प्रौद्योगिकी के साथ, भारत में युवाओं के पास अब एक विशाल संसाधन है। इसके परिणामस्वरूप, उनमें वैश्विक मनोवैज्ञानिक चेतना का विकास हुआ है।
            • वैश्वीकरण ने खुले बाज़ार की अवधारणा के परिणामस्वरूप रोज़गार के अधिक अवसर पैदा किये हैं।
            • वैश्वीकरण युवाओं में उत्कृष्टता प्राप्त करने तथा अधिक प्रतिस्पर्द्धी बनने के लिये प्रोत्साहन एवं स्वतंत्रता प्रदान करता है।
            • इसने ग्रामीण भारत से बढ़ते प्रवासन के परिणामस्वरूप शहरी गरीबी को जन्म दिया है। यह समाज में संरचनात्मक असमानताओं को भी जन्म देता है। जाति, वर्ग, लिंग, धर्म और आवास में विभाजन के परिणामस्वरूप युवा लोगों में सुभेद्यता, अस्थिरता और असुरक्षा की भावना बढ़ रही है।
            • वैश्वीकरण के पश्चात् पश्चिमी मूल्यों और संस्कृति का अंधानुकरण हुआ है और युवाओं ने इसे अपनी भारतीय पहचान में शामिल किया है। जैसा कि न केवल आधिकारिक उद्देश्यों के लिये, बल्कि दैनिक जीवन में भी अंग्रेज़ी भाषा युवाओं के बीच भारतीय भाषाओं पर हावी होती जा रही है।
            • वैश्वीकरण ने विवाह एवं परिवार की संस्थाओं को भी प्रभावित किया है। आज युवा अपने बुजुर्गों के पास नहीं हैं, जिसके परिणामस्वरूप सामाजिक संबंधों में अंतराल आए हैं।
            • वैश्वीकरण के परिणामस्वरूप ही सामाजिक-आर्थिक अनिश्चितता के बढ़ने से युवाओं में अवसाद तथा आत्महत्या की घटनाओं में वृद्धि हुई है।
            • वैश्वीकरण ने युवाओं में धार्मिक विश्वास को भी प्रभावित किया है। इस प्रकार अधिकांश धार्मिक गतिविधियाँ युवा वर्ग के लिये अप्रासंगिक होती जा रही हैं।
            • सुखवाद की संस्कृति ने भारतीयों की पारंपरिक मान्यताओं को पूर्णत: बदल दिया है। नतीजतन, आज युवा आबादी, विशेष रूप से शहरी युवा पश्चिमी नए फैशन के पक्ष में हैं।

            युवाओं पर वैश्वीकरण के नकारात्मक प्रभाव को कम करने के लिये उन्हें शिक्षा, कौशल विकास तथा रोज़गार, उद्यमिता, स्वास्थ्य एवं स्वस्थ जीवन शैली आदि में अपनी पूरी क्षमता हासिल करने के लिये सशक्त करना चाहिये। राष्ट्रीय युवा नीति -2014 (एन.वाई.पी. -2014) में उल्लेखित सामाजिक मूल्यों का संवर्द्धन, सामुदायिक सहभागिता, राजनीति एवं शासन में भागीदारी, युवा सहभागिता, समावेश और सामाजिक न्याय जैसे कारकों जोर देना चाहिये।


            उत्तर-8: 

              हल करने का दृष्टिकोण:

              • भारत में व्याप्त जाति तथा आर्थिक असमानता से संबंधित कुछ आँकड़े या तथ्य के साथ उत्तर की शुरुआत कीजिये। 
              • जाति तथा आर्थिक असमानता के मध्य संबंध स्थापित कीजिये।
              • जाति असमानता को समाप्त करने हेतु किये गए कुछ नीतिगत उपायों का उल्लेख कीजिये। 

              भारत में यह कहा जाता है कि ‘संपत्ति अनुक्रम जाति अनुक्रम का अनुसरण करता है।’ विश्व असमानता डेटाबेस के हाल के पत्र के अनुसार, भारत के उच्च जाति वर्ग के परिवारों ने वर्ष 2012 में राष्ट्रीय औसत वार्षिक घरेलू आय से लगभग 47 प्रतिशत अधिक धन अर्जित किया।

              वर्ष 2011-12 के एन.एस.एस.ओ. के आँकड़े दर्शाते हैं कि दलितों के अपने स्वयं के उद्यम शुरू करने की संभावना न्यूनतम है जबकि दूसरों के लिये मज़दूरों के रूप में काम करने की संभावना अधिकतम है। इस आँकड़े के अनुसार, अनुसूचित जातियों (एस.सी.) की स्व-नियोजित श्रेणी में हिस्सेदारी सबसे कम है और असंगठित श्रमिकों की श्रेणी में उनका योगदान अधिकतम है।

              भारत में जाति तथा आर्थिक असमानता के मध्य संबंध

              • शैक्षिक पिछड़ापन: अनुसूचित जातियों (एस.सी.) की साक्षरता दर लगभग 66% है जो राष्ट्रीय औसत दर 74% से भी कम है।
              • अल्प आय रोज़गार: शिक्षा के अभाव के परिणामस्वरूप निम्न जाति के लोग अल्प आय रोज़गार जैसे- कृषि श्रमिक या गैर-कृषि क्षेत्र में कम कुशल श्रमिक के रूप में कार्यरत हैं।
              • परिसंपत्तियों का अल्प स्वामित्त्व: भारत में उच्च जातियों के पास भूमि का स्वामित्त्व है। भूमिहीन होने के कारण निम्न जाति के लोगों को अपनी आजीविका के लिये शारीरिक श्रम का सहारा लेना पड़ता है।

              जाति असमानता के उन्मूलन हेतु किये गए नीतिगत उपाय

              • संवैधानिक उपाय: जाति के आधार पर भेदभाव को संवैधानिक उपायों द्वारा संबोधित किया गया है:
                • अनुच्छेद 15 धर्म, जाति, लिंग, वंश या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का प्रतिषेध करता है।
                • अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोज़गार के संदर्भ में अवसर की समानता सुनिश्चित करता है।
                • अनुच्छेद 46 राज्य को कमज़ोर वर्गों विशेषत: अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लोगों के शैक्षिक एवं आर्थिक हितों को बढ़ावा देने का प्रावधान करता है।
              • विधिक उपाय: निम्नलिखित अधिनियमों को निम्न जाति वर्ग को उच्च जाति के अत्याचार से बचाने के लिये प्रस्तुत किया गया।
                • अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989
                • नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955
                • मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में रोज़गार का निषेध और पुनर्वास अधिनियम, 2013
              • आर्थिक उपाय: विद्यमान आर्थिक असमानताओं को दूर करने के लिये निम्न जाति वर्ग को वित्तीय सहायता प्रदान करने हेतु निम्नलिखित विभिन्न वित्तीय एजेंसियों की स्थापना की गई है:
                • राष्ट्रीय अनुसूचित जाति वित्त तथा विकास निगम- अनुसूचित जाति वर्ग के बीच समृद्धि को बढ़ावा देने के लिये वित्तीय सहायता और कौशल विकास अन्य नवाचारी पहलों के माध्यम से उनकी स्थिति में सुधार करना।  
              • राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी वित्त एवं विकास निगम: सफाई कर्मचारियों के आर्थिक उत्थान के लिये जो अधिकांशत: निम्न जाति वर्ग से आते हैं।
                • युवा उद्यमियों को बढ़ावा देने के लिये अनुसूचित जाति के लिये वेंचर कैपिटल फंड।
                • स्टैंड-अप इंडिया परियोजना और अनुसूचित जातियों के लिये ऋण संवर्द्धन गारंटी योजना।

                उत्तर-9: 

                हल करने का दृष्टिकोण 

                • भारत छोड़ो आंदोलन के बारे में संक्षेप में बताइये।
                • ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीय लोगों को एकजुट करने में आंदोलन की सफलता पर चर्चा कीजिये।
                • आंदोलन की विफलता पर भी चर्चा कीजिये।
                • उपयुक्त रूप से निष्कर्ष लिखिये।

                परिचय

                8 अगस्त 1942 को, महात्मा गांधी ने ब्रिटिश शासन को समाप्त करने का आह्वान किया और मुंबई में अखिल भारतीय काॅन्ग्रेस कमेटी के सत्र में भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत की।

                ग्वालिया टैंक मैदान में दिये गए अपने भाषण में गांधी जी ने "करो या मरो" का नारा दिया था।

                • आंदोलन के कारण
                  • आंदोलन का तात्कालिक कारण क्रिप्स मिशन का पतन था। मिशन विफल हो गया क्योंकि इसने भारत को पूर्ण स्वतंत्रता नहीं बल्कि विभाजन के साथ डोमिनियन स्टेटस देने की पेशकश की।
                  • द्वितीय विश्व युद्ध में भारत से अंग्रेज़ों को बिना शर्त समर्थन की ब्रिटिश धारणा भारतीय राष्ट्रीय काॅन्ग्रेस द्वारा स्वीकार नहीं की गई थी।
                  • ब्रिटिश विरोधी भावनाओं और पूर्ण स्वतंत्रता की मांग ने भारतीय जनता के बीच लोकप्रियता हासिल की थी।
                • आवश्यक वस्तुओं की कमी: द्वितीय विश्व युद्ध के परिणामस्वरूप अर्थव्यवस्था चरमरा गई थी।

                आंदोलन की सफलता

                भविष्य के नेताओं का उदय:

                • राम मनोहर लोहिया, जेपी नारायण, अरुणा आसफ अली, बीजू पटनायक, सुचेता कृपलानी आदि नेताओं ने भूमिगत गतिविधियों को अंजाम दिया जो बाद में प्रमुख नेताओं के रूप में उभरे।

                महिलाओं की भागीदारी:

                • आंदोलन में महिलाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उषा मेहता जैसी महिला नेताओं ने एक भूमिगत रेडियो स्टेशन स्थापित करने में मदद की जिससे आंदोलन के बारे में जागरूकता पैदा हुई।

                राष्ट्रवाद का उदय:

                • भारत छोड़ो आंदोलन के कारण देश में एकता और भाईचारे की एक विशिष्ट भावना पैदा हुई। कई छात्रों ने स्कूल-कॉलेज छोड़ दिये और लोगों ने अपनी नौकरी छोड़ दी।

                स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त:

                • यद्यपि वर्ष 1944 में भारत छोड़ो आंदोलन को कुचल दिया गया था और अंग्रेज़ों ने यह कहते हुए तत्काल स्वतंत्रता देने से इनकार कर दिया था कि स्वतंत्रता युद्ध समाप्ति के बाद ही दी जाएगी, किंतु इस आंदोलन और द्वितीय विश्व युद्ध के बोझ के कारण ब्रिटिश प्रशासन को यह अहसास हो गया कि भारत को लंबे समय तक नियंत्रित करना संभव नहीं था। 
                • इस आंदोलन के कारण अंग्रेज़ों के साथ भारत की राजनीतिक वार्ता की प्रकृति ही बदल गई और अंततः भारत की स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त हुआ।

                आंदोलन की असफलता

                क्रूर दमन:

                • आंदोलन के दौरान कुछ स्थानों पर हिंसा देखी गई, जो कि पूर्व नियोजित नहीं थी।
                • आंदोलन को अंग्रेज़ों द्वारा हिंसक रूप से दबा दिया गया, लोगों पर गोलियाँ चलाई गईं, लाठीचार्ज किया गया, गाँवों को जला दिया गया और भारी जुर्माना लगाया गया।
                • इस तरह सरकार ने आंदोलन को कुचलने के लिये हिंसा का सहारा लिया और 1,00,000 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया।

                समर्थन का अभाव

                • मुस्लिम लीग, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और हिंदू महासभा ने आंदोलन का समर्थन नहीं किया। भारतीय नौकरशाही ने भी इस आंदोलन का समर्थन नहीं किया।
                  • मुस्लिम लीग, बँटवारे से पूर्व अंग्रेज़ों के भारत छोड़ने के पक्ष में नहीं थी।
                  • कम्युनिस्ट पार्टी ने अंग्रेज़ों का समर्थन किया, क्योंकि वे सोवियत संघ के साथ संबद्ध थे।
                  • हिंदू महासभा ने खुले तौर पर भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया और इस आशंका के तहत आधिकारिक तौर पर इसका बहिष्कार किया कि यह आंदोलन आंतरिक अव्यवस्था पैदा करेगा और युद्ध के दौरान आंतरिक सुरक्षा को खतरे में डाल देगा।
                • इस बीच सुभाष चंद्र बोस ने देश के बाहर ‘भारतीय राष्ट्रीय सेना’ और ‘आज़ाद हिंद सरकार’ को संगठित किया।
                • सी. राजगोपालाचारी जैसे कई काॅन्ग्रेस सदस्यों ने प्रांतीय विधायिका से इस्तीफा दे दिया, क्योंकि वे महात्मा गांधी के विचार का समर्थन नहीं करते थे।

                निष्कर्ष 

                यह आंदोलन स्वतंत्रता के अंतिम चरण को इंगित करता है। इसने गाँव से लेकर शहर तक ब्रिटिश सरकार को चुनौती दी। इससे भारतीय जनता के अंदर आत्मविश्वास बढ़ा और समानांतर सरकारों के गठन से जनता काफी उत्साहित हुई। इसमें महिलाओं ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और जनता ने नेतृत्व अपने हाथ में लिया। जो राष्ट्रीय आंदोलन के परिपक्व चरण को सूचित करता है। इस आंदोलन के दौरान पहली बार राजाओं को जनता की संप्रभुता स्वीकार करने को कहा गया। ज्ञातव्य है कि भारत छोड़ो आंदोलन में कम्युनिस्ट पार्टी व मुस्लिम लीग ने भागीदारी नहीं की थी।


                  उत्तर-10: 

                  दृष्टिकोण 

                  • पश्चिमी विक्षोभ को परिभाषित करके उत्तर की शुरुआत कीजिये।
                  • भारतीय मौसम प्रणालियों पर पश्चिमी विक्षोभ के प्रभाव की चर्चा कीजिये।
                  • उपयुक्त निष्कर्ष दीजिये।

                  परिचय

                  ‘पश्चिमी विक्षोभ’ एक मौसमी परिघटना है जो पछुआ पवनों के ऊपरी वायु परिसंरचरण क्षेत्र में विकसित एक निम्न वायुदाब का क्षेत्र या गर्त है, जो हवा के तापमान, दाब एवं वायु संचार प्रणाली में परिवर्तन लाकर वर्षण की दशा उत्पन्न करता है।

                  ये हवाएँ राजस्थान, पंजाब और हरियाणा में तीव्र गति से बहती हैं। ये उप-हिमालयी पट्टी के आस-पास पूर्व की ओर मुड़ जाती हैं और सीधे अरुणाचल प्रदेश तक पहुँच जाती हैं। इससे गंगा के मैदानी इलाकों में हल्की वर्षा और हिमालयी पट्टी में हिमवर्षा होती है।

                  भारतीय मौसम प्रणालियों पर पश्चिमी विक्षोभ का प्रभाव:

                  • पश्चिमी विक्षोभ भारत की कुल वार्षिक वर्षा के 5-10% हेतु उत्तरदायी होता है। यह उत्तर-पश्चिम भारत में सर्दियों में होने वाली वर्षा और प्री-मानसून सीजन की बारिश का कारण है।
                  • पश्चिमी विक्षोभ आमतौर पर बादल वाली रात, उच्च तापमान और असामान्य बारिश से जुड़ा होता है।
                  • गेहूँ सबसे महत्त्वपूर्ण फसलों में से एक है, जो भारत की खाद्य सुरक्षा को पूरा करने में मदद करती है। गेहूँ और अन्य रबी फसलों की वृद्धि में पश्चिमी विक्षोभ से होने वाली वर्षा का बहुत महत्त्व है।
                  • हालाँकि मज़बूत पश्चिमी विक्षोभ से अत्यधिक वर्षा होती है जो फसल क्षति, भूस्खलन, बाढ़ और हिमस्खलन का कारण बन सकता है।
                  • दूसरी ओर कमज़ोर पश्चिमी विक्षोभ से उत्तर भारत में फसल पैदावार में कमी और पानी से संबंधित समस्याएँ देखने को मिलती है।
                  • ये हिमालय के ऊपरी क्षेत्र में हिमपात हेतु उत्तरदायी हैं जो भारत के सदाबहार नदियों की सततता एवं पर्यटन के दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण है।
                  • यह शीतकाल में वर्षा कर भौम जल स्तर को ऊपर उठाने एवं जल संचयन को बढ़ावा देता है।
                  • यह प्रवासी पक्षियों के लिये अनुकूल दशा प्रदान करता है।
                  • यह संपूर्ण पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी की उत्पादकता व पोषण स्तर में वृद्धि लाता है।

                  निष्कर्ष

                  पश्चिमी विक्षोभ को आमतौर पर एक अनुकूल लाभकारी घटना के रूप में देखा जाता है। हालाँकि जलवायु परिवर्तन के चलते बादल फटने और ओलावृष्टि जैसी प्राकृतिक आपदाएँ उत्पन्न होती हैं।


                  उत्तर-11: 

                  हल करने का दृष्टिकोण:

                  • लिंग आधारित हिंसा से आप क्या समझते हैं, व्याख्या कीजिये।
                  • इन हिंसा के कारणों पर प्रकाश डालिये।
                  • चर्चा कीजिये कि कैसे यह व्यवहार महिलाओं के विकास को गंभीर रूप से प्रभावित करता है।
                  • लैंगिक हिंसा को समाप्त करने के लिये संक्षेप में सुझाव देकर निष्कर्ष लिखिये ।

                  लिंग आधारित हिंसा, किसी व्यक्ति के विरुद्ध उसके लिंग के कारण निर्देशित हिंसा है। महिला और पुरुष दोनों लिंग आधारित हिंसा का अनुभव करते हैं लेकिन पीड़ितों में अधिकांश महिलाएँ और लड़कियाँ हैं। लिंग आधारित हिंसा एक ऐसी घटना है जो लैंगिक असमानता से गहराई से जुड़ी हुई है और सभी समाजों में सबसे प्रमुख मानव-अधिकारों के उल्लंघनों में से एक है। यह माँ के गर्भ से मृत्यु तक महिलाओं के पूरे जीवन चक्र में प्रकट होता है। लिंग आधारित हिंसा की कोई सामाजिक या आर्थिक पृष्ठभूमि नहीं होती तथा यह सभी सामाजार्थिक पृष्ठभूमि की महिलाओं और लड़कियों को प्रभावित करती है।

                  लिंग आधारित हिंसा के विभिन्न कारणों में शामिल हैं:

                  • सामाजिक/राजनीतिक/सांस्कृतिक कारण:
                    • भेदभावपूर्ण सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक कानून, मानदंड और व्यवहार जो महिलाओं और लड़कियों को हाशिये पर रखते हैं और उनके अधिकारों को मान्यता प्रदान करने में विफल होते हैं।
                    • महिलाओं के खिलाफ हिंसा को सही ठहराने के लिये अक्सर लिंग संबंधी रूढ़ियों का इस्तेमाल किया जाता है। सांस्कृतिक मानदंड अक्सर यह तय करते हैं कि पुरुष आक्रामक, नियंत्रित करने वाले और प्रभावी होते हैं जबकि महिलाएँ विनम्र, अधीन और प्रदाताओं के रूप में पुरुषों पर निर्भर करती हैं। ये मानदंड एक प्रकार के दुरुपयोग की संस्कृति को बढ़ावा दे सकते हैं।
                    • पारिवारिक, सामाजिक और सांप्रदायिक संरचनाओं का पतन और परिवार के भीतर महिलाओं की बाधित भूमिका अक्सर महिलाओं और लड़कियों को जोखिम में डालती है और इसके निवारण के लिये मुकाबला करने वाले रास्तों एवं तंत्रों के जोखिम एवं सीमा को उजागर करती हैं। 
                  • न्यायिक बाधाएँ:
                    • न्याय संस्थानों और तंत्रों तक पहुँच का अभाव हिंसा और दुर्व्यवहार हेतु दंड के भय की समाप्ति की संस्कृति उत्पन्न करती है।
                    • पर्याप्त और वहनीय कानूनी सलाह और प्रतिनिधित्व का अभाव।
                    • पीड़ित/उत्तरजीवी और गवाह सुरक्षा तंत्र का पर्याप्त अभाव।
                    • अपर्याप्त न्यायिक ढाँचा जिसमें राष्ट्रीय, पारंपरिक, प्रथागत और धार्मिक कानून शामिल हैं जो महिलाओं और लड़कियों के साथ भेदभाव करते हैं।
                  • व्यक्तिगत बाधाएँ
                    • धमकी या कलंक का भय, अलगाव, सामाजिक बहिष्कार तथा अपराधी व्यक्ति के हाथों दोबारा हिंसा, समुदाय या प्राधिकरण, गिरफ्तारी सहित नज़रबंद, दुर्व्यवहार और सज़ा इत्यादि का भय रहता है।
                    • मानवाधिकारों के बारे में जानकारी की कमी और उपचार कैसे और कहाँ करना है।
                  • निम्नलिखित कारणों से महिलाओं की उन्नति में लैंगिक हिंसा सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है: 
                    • यह महिलाओं के स्वास्थ्य के सभी पहलुओं- शारीरिक, यौन और प्रजनन, मानसिक और व्यवहार संबंधी स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित करता है। इस प्रकार उन्हें अपनी पूर्ण क्षमता का एहसास होने से रोकता है।
                    • हिंसा और हिंसा का खतरा, सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में महिलाओं की सक्रिय रूप से और समान रूप से भाग लेने की क्षमता को प्रभावित करता है।
                    • कार्यस्थल पर उत्पीड़न और घरेलू हिंसा कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी और उनके आर्थिक सशक्तिकरण को प्रभावित करता है।
                    • यौन उत्पीड़न लड़कियों के शैक्षिक अवसरों और उपलब्धियों को सीमित करता है।

                  समाज, सरकार और व्यक्तियों के सामूहिक प्रयासों से लिंग आधारित हिंसा (GBV) को समाप्त किया जा सकता है। निम्नलिखित कदमों से लिंग संबंधी असमानता को मिटाने में काफी मदद मिल सकती है:

                  • लिंग आधारित हिंसा को पहचानने और सहायता करने के लिये स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं का प्रशिक्षण सबसे महत्त्वपूर्ण तरीकों में से एक है।
                  • मीडिया लिंग आधारित हिंसा को सामने लाने, समाधान के विज्ञापन, नीति-निर्माताओं को सूचित करने और जनता को कानूनी अधिकारों के बारे में शिक्षित करने तथा लिंग आधारित हिंसा को पहचानने में मुख्य भूमिका निभा सकती है।
                  • शिक्षा लिंग आधारित हिंसा को शुरू होने से पहले ही रोकने हेतु महत्त्वपूर्ण उपकरण है। नियमित पाठ्यक्रम, यौन संबंधी शिक्षा, परामर्श कार्यक्रम तथा विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाएँ, सभी यह संदेश दे सकते हैं कि हिंसा गलत है और उसे रोका जा सकता है।
                  • कई अध्ययनों से पता चला है कि लिंग आधारित हिंसा को रोकने, पहचानने और संबोधित करने में सभी समुदायों को शामिल करना, इसे समाप्त करने का सबसे प्रभावी तरीका है।

                  उत्तर-12: 

                  सातवीं से नौवीं शताब्दी के मध्य दक्षिण भारत में अलवार और नयनार संतों के नेतृत्व में धार्मिक आंदोलनों का प्रादुर्भाव हुआ। पल्लव एवं चोल शासकों द्वारा इसी भक्ति परंपरा को मंदिर स्थापत्य से जोड़ने एवं कालांतर में अन्य दक्षिण भारतीय राजवंशों द्वारा मंदिरों के निर्माण से दक्षिण भारत में मंदिर स्थापत्य की अनेक प्रादेशिक शैलियों का विकास हुआ, जो पारस्परिक भिन्नताएँ लिये हुई थी।

                  दक्षिण भारत में विकसित विभिन्न प्रादेशिक शैलियाँ

                  द्रविड़ शैली: 7वीं से 8वीं शताब्दी के मध्य दक्षिण भारतीय पल्लव शासकों द्वारा तमिलनाडु के महाबलीपुरम् एवं कांचीपुरम् के शैलकृत एवं संरचनात्मक मंदिरों में द्रविड़ मंदिर स्थापत्य के आरंभिक लक्षण देखने को मिलते हैं। आगामी चोल शासकों द्वारा इसी शैली को अपनाकर एवं इसमें परिष्करण कर इसे परिपक्वता के उच्च स्तर पहुँचा दिया गया , जैसे- तंजौर का वृहदेश्वर मंदिर।

                  द्रविड़ शैली के मंदिर स्थापत्य की प्रमुख विशेषताएँ

                  • सीढ़ीदार पिरामिडनुमा आकार में मंदिर के विमान की उपस्थिति।
                  • मंदिरों में प्रतिमाओं के अंकनयुक्त गोपुरमों का निर्माण।
                  • मंदिरों में जलाशयों की उपस्थिति।
                  • मंदिर के गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर द्वारपालों की भयानक आकृतियाँ।
                  • दीवारों और स्तंभों पर वास्तुकलात्मक डिज़ाइन।
                  • मंदिरों के चारों ओर चारदीवारी का निर्माण।

                  मंदिर स्थापत्य की बेसर शैली: कर्नाटक के दक्षिणी भाग यानी कर्नाटक में चालुक्यकालीन एवं होयसलकालीन, अनेक शैलियों के संकरण एवं समावेशन से युक्त, बेसर शैली में मंदिर स्थापत्य का विकास हुआ। पट्टदकल में स्थित विरुपाक्ष मंदिर, पापनाथ मंदिर, ऐहोल का दुर्गा मंदिर, लाडखान मंदिर एवं बेलूर का चेन्नाकेशव मंदिर इस शैली के मंदिर स्थापत्य के प्रमुख उदाहरण है।

                  प्रमुख विशेषताएँ

                  • द्रविड़ एवं नागर शैली के मंदिर स्थापत्य विशेषताओं का मिश्रण एवं समावेशन।
                  • मुख्य पूजा स्थल/वेदी की बाहरी दीवारों पर अलंकरण।
                  • मानव आकृतियों, जैसे- रामायण एवं महाभारत के नायकों और प्रेमी युगल (मिथुन) की आकृतियों का अंकन इस शैली के मंदिर स्थापत्य की प्रमुख विशेषता है।
                  • भारी मात्रा में सजावट, जैसे- बेलूर का चेन्नाकिशन मंदिर।
                  • मंदिरों की दीवारों व स्तंभों पर हिंदू पौराणिक आख्यानों से संबंधित भित्ति चित्रों का निर्माण।
                  • ‘कल्याण मंडपों’ के रूप में नवीन मंडपों का निर्माण।
                  • सरोवरों के साथ मंदिरों का निर्माण, जैसे- हरे राम मंदिर, विरुपाक्ष मंदिर, रघुनाथ मंदिर, विट्ठल मंदिर एवं महानवमी डिब्बा।

                  नायक शैली: विजयनगर शासन के पत्तन के पश्चात् 16वीं से 18वीं शताब्दी के मध्य नायक शासकों ने शासन किया। इन्होंने नायक/मदुरई शैली में अनेक मंदिरों का निर्माण करवाया। मदुरै का मीनाक्षी मंदिर इसका प्रमुख उदाहरण है।

                  प्रमुख विशेषताएँ

                  • मंदिरों में लंबे गलियारों का निर्माण।
                  • नक्काशीदार सौ-स्तंभों व हजार स्तंभों वाले मंडपों की उपस्थिति।
                  • ऊँचे व बहुमंजिली गोपुरमों का निर्माण।
                  • चमकीले पत्थर तथा पशुओं, देवताओं और राक्षसों की मूर्तियों द्वारा सजावट।

                  इस प्रकार अपनी विशिष्ट भौगोलिक स्थिति, स्थानीय परंपराओं तथा सामग्री की उपलब्धता, शासकों की व्यक्तिगत रुचि एवं विभिन्न शैलियों के संकट एवं समावेशन के फलस्वरूप दक्षिण भारत में अनेक प्रादेशिक शैलियों का विकास हुआ, जिसमें पर्याप्त विभिन्नताएँ विद्यमान थी।

                  होयसल शैली: चोलों और पांड्यों की शक्ति के अवसान के पश्चात् कर्नाटक के होयसल शासक दक्षिण भारत में वास्तुकला के प्रमुख संरक्षक के रूप में उभरे। बेलूर, हेलेसिड तथा सोमनाथपुर के मंदिर इनके द्वारा निर्मित मंदिरों में विशेष उल्लेखनीय है।

                  प्रमुख विशेषताएँ

                  • केंद्रीय वर्गाकार योजना से आगे बढ़े हुए कोणों के कारण मंदिरों की तारकीय योजना।
                  •  मंडपों के प्रवेश द्वार के रूप में ‘मकर तोरणों’ का निर्माण।
                  • पौराणिक महिला आकृति शालमंजिका/मदनिका का उत्कीर्णन।

                  विजयनगर शैली

                  कर्नाटक के तुंगभद्रा क्षेत्र में पल्लव, चोल तथा पांड्यों की द्रविड़ वास्तु शैलियों तथा सल्तनतों द्वारा प्रस्तुत इस्लामिक वास्तुकला के सामंजस्यपूर्ण संयोजन से विजयनगर शैली के मंदिर स्थापत्य का विकास हुआ।

                  महत्त्वपूर्ण लक्षण

                  • ‘प्रोविदा’ नामक स्वयं की शैली का विकास, जिसमें विशाल गोपुरम् तथा उत्कीर्णित स्तंभों का निर्माण करवाया गया।

                  उत्तर-13: 

                  हल करने का दृष्टिकोण:

                  • अर्बन कॉमन्स को परिभाषित कीजिये।
                  • अर्बन कॉमन्स के महत्त्व को रेखंकित कीजिये।
                  • इनके द्वारा सामना की जाने वाली विभिन्न चुनौतियों की चर्चा कीजिये।
                  • इनके संरक्षण के उपाय सुझाइये।

                  अर्बन कॉमन्स अलग-अलग विकसित होते शहरों में उन विरले स्थानों को कहते हैं जिसका इस्तेमाल सामाजिक एवं आर्थिक असमानता के बावजूद सभी करते हैं। इन स्थानों में शहरों की सड़कें, हरे क्षेत्र, पार्क, पब्लिक स्क्वायर एवं सामुदायिक बाग-बगीचे शामिल हैं।

                  अर्बन कॉमन्स का महत्त्व: 

                  • झीलें, पार्क, आर्द्रभूमियाँ, नदियाँ यहाँ तक की सड़कों के किनारे लगे पेड़ भी वायु को स्वच्छ रखने, भौमजल स्तर को बढ़ाने तथा लोगों के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को बनाए रखने में सहायता करते हैं। 
                  • ये देश के संकट/अभावग्रस्त वाले क्षेत्रों से शहरों में एकत्रित होने वाले प्रवासियों को जंगली पौधे, हरे पौधे और झाड़, नहाने, कपड़े धोने और शौच के लिये स्थान उपलब्ध करातें हैं एवं शीत ऋतु की रातों से सुरक्षा प्रदान कर उनके लिये पोषण संबंधी प्रतिरोध एवं सुरक्षा जाल का कार्य करते हैं।
                  • अर्बन कॉमन्स द्वारा प्रदान की जाने वाली सब्जियाँ, फल, जड़ी-बूटी, ईंधन के लिये लकड़ी, जल और चारों उनके चारो ओर रहने वाले समूहों के जीवन निर्वाह एवं आजीविका के लिये महत्त्वपूर्ण होते हैं।
                  • ये किसी जगह पर रहने वाले नागरिकों के मध्य नए संपर्क बनाने के लिये एक प्लेटफार्म की तरह कार्य करते हैं। इस तरह के संपर्क अकेलेपन के उस भय को कम कर सकते हैं जो समाज के अनेक वर्गों के बीच पनप रही है।

                  अर्बन कॉमन्स द्वारा सामना की जाने वाली विभिन्न चुनौतियाँ:

                  • शहरों में इनको सबसे अधिक खतरा विकासात्मक गतिविधियों से है। जैसे मुंबई के आरे (aarey) के जंगल अवसंरचनात्मक परियोजनाओं के कारण खतरे में हैं, इसी तरह तिरुवनंतपुरम में तकनीक पार्क के निर्माण के लिये आर्द्रभूमि का अधिग्रहण किया गया है एवं दक्षिण दिल्ली में भवनों के निर्माण के लिये पेड़ों को काटा गया है।
                  • अर्बन कॉमन्स को निजी क्षेत्रों अथवा समुदायों द्वारा वित्तपोषण किया जाना पार्क, स्टेडियम, सड़क या फुटपाथ के निर्माण एवं रखरखाव तक ही सीमित है, वह भी एक सीमित संख्या में। अत: ये सरकारों पर निर्भर हैं, विशेष रूप से स्थानीय सरकारों पर, जो स्वयं वित्तीय रूप से कमज़ोर हैं।
                  • स्मार्ट शहरी योजनाएँ और पुनरुद्धार परियोजनाएँ अर्बन कॉमन्स पर अधिकतर निर्भर रहने वाले लोगों को हटाकर इन कॉमन्स को समाप्त करने का कार्य करती हैं। समुद्र तट, नदी किनारे की भूमि, झील एवं पार्क आदि को घेर कर रखा जाने लगा है और ये अब उन्हीं के लिये उपलब्ध हैं जो भुगतान कर सकते हैं। इनका उपयोग अब केवल मनोरंजन के लिये ही होने लगा है। 
                  • शहरों के तेजी से विस्तार होने के साथ बिल्डर्स अब हासिल की गई आर्द्रभूमियों, बाढ़ के मैदानों या शहरों के निचले इलाकों पर निर्माण कार्यों को अंजाम दे रहे हैं क्योंकि ये क्षेत्र सस्ते दामों पर मिल जाते हैं। सबसे आश्चर्य की बात यह है कि न केवल निजी बिल्डर्स बल्कि सरकार भी संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण कार्यों में लगी हुई है। 

                  इनके संरक्षण के उपाय:  

                  • इसमें स्थानीय समुदायों को शामिल कर, झीलों एवं जलग्रहण क्षेत्रों को वैज्ञानिक तरीके से सुधार करके आर्द्रभूमियों को पुन: बहाल किया जाए।  
                  • सरकार को विशेष भौगोलिक सूचना तंत्र (GIS) मानचित्र अवश्य बनाना चाहिये जहाँ कॉमन क्षेत्र एवं उनकी सीमाएँ स्पष्ट रूप से चिन्हित की गई हों। 
                  • शहरी समितियों के प्रबंधन एवं उनके अतिक्रमण से संरक्षण के लिये वार्ड समितियों को अवश्य ही सशत्त किया जाना चाहिये। 

                  हालाँकि अभी भी सब समाप्त नहीं हुआ है, फिर भी यह बिल्कुल स्पष्ट है कि हमारे शहर इसी तरह अविचलित नहीं रह सकते। यद्यपि कुछ जैव समृद्ध क्षेत्र बचे हैं परंतु हमें कड़े एवं ठोस उपाय करने होंगे। जल, भूमि और अपशिष्ट माफिया के साथ-साथ बेतरतीब शहरीकरण एक चुनौती बनी हुई है। यदि ऐसा ही चलता रहा तो शीघ्र ही हमारे भूदृश्य में जैव तत्त्व नज़र ही नहीं आएँगे।


                  उत्तर-14: 

                  हल करने का दृष्टिकोण:

                  • पृथक् निर्वाचन व्यवस्था की पृष्ठभूमि को बताइये।
                  • इस व्यवस्था के प्रमुख प्रावधानों को बताइये।
                  • बताइये कि कैसे पृथक् निर्वाचन प्रणाली भारत-पाक विभाजन हेतु उत्तरदायी बनी।
                  • संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिये।

                  भारत में व्यापक आरक्षण प्रणाली का उद्भव एक पृथक् निर्वाचन प्रणाली से हुआ, जिसे पहली बार भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 के द्वारा परिचित कराया गया। पृथक् निर्वाचन प्रणाली का समुचित विश्लेषण करने से यह तथ्य प्रकट होता है कि यह प्रणालीट डालो और राज करोकी नीति का एक उपकरण था जिसे ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों को धर्म के आधार पर बांटने के लिये अपनाया।

                  प्रमुख प्रावधान

                  • इस अधिनियम के तहत ब्रिटिश सरकार ने केंद्रीय व्यवस्थापिका सभा में सदस्यों की संख्या 16 से बढ़ाकर 60 कर दी। जिसके साथ 9 पदेन सदस्य नियुक्त किये गए।
                  • कुल 69 सदस्यों में से 27 सदस्य निर्वाचित होते थे। इन 27 सदस्यों में से 8 सीटें मुस्लिमों हेतु आरक्षित की गई।
                  • मुसलमानों को पृथक् सामुदायिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तहत निर्वाचन का अधिकार दिया गया। साथ ही उन्हें प्रतिनिधित्व के मामले में विशेष रियायत दी गई। उन्हें केंद्रीय एवं प्रांतीय विधान परिषद में जनसंख्या के अनुपात में अधिक प्रतिनिधि भेजने का अधिकार दिया गया। हिंदुओं के मुकाबले साथ की योग्यता मुस्लिमों के लिये कम रखी गई।
                  • 1919 के अधिनियम में इस प्रणाली का विस्तार अन्य समुदायों हेतु किया गया।

                  ब्रिटिश सरकार ने इस प्रणाली को इस उम्मीद में लागू किया कि वे भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष से मुस्लिमों को अलग रखने में सफल होंगे। जिसकी ही परिणती रही कि मुस्लिमों का भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष में योगदान कम रहा। जिसने हिेंदु एवं मुस्लिमों के बीच की खाई को और अधिक गहरा कर दिया। हालाँकि 1916 के कॉन्ग्रेस अधिवेशन में लीग एवं कॉन्ग्रेस की बीच समझौता हो गया था किंतु यह खाई इतनी गहरी थी कि जो इस समझौते से नहीं भर पाई। जल्द ही जिन्ना के नेतृत्व में पृथक् पाकिस्तान की मांग ज़ोर पकड़ने लगी।

                  पृथक् पाकिस्तान की मांग ने इतना उग्र स्वरूप धारण कर लिया कि मुस्लिम लीग ने स्वतंत्रता संघर्ष में कॉन्ग्रेस का साथ छोड़
                  दिया तथा कृत्य किये। जिसने भारत में साम्प्रदायिक हिंसा  को बढ़ावा दिया। जिसके परिणामस्वरूप लॉर्ड माउंटबेटेन को भारत विभाजन की योजना प्रस्तुत करनी पड़ी तथा द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत को स्वीकारना पड़ा। 1947 में स्वतंत्रता के साथ ही भारत को विभाजन का दंश भी झेलना पड़ा।


                  उत्तर-15: 

                  हल करने का दृष्टिकोण:

                  • गांधीजी तथा बोस का संक्षिप्त परिचय देते हुए भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिकाओं की चर्चा करें।
                  • चर्चा करें कि कैसे एक-दूसरे के प्रति गहरे सम्मान के बावजूद उनके तरीकों तथा विचारधाराओं में भिन्नता थी।
                  • उपयुक्त निष्कर्ष लिखें।

                  महात्मा गांधी संभवत: अहिंसक नागरिक विद्रोह के लिये भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के सबसे व्यापक रूप से मान्यता प्राप्त व्यक्ति थे। सुभाष चंद्र बोस (जिन्हें नेता जी भी कहा जाता है) को भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका के लिये जाना जाता है। भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस के नेता के रूप में वे उग्र पक्ष का हिस्सा अधिक थे और समाजवादी नीतियों की वकालत के लिये जाने जाते थे। ये दोनों ही भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के दिग्गज थे तथा एक-दूसरे के प्रति गहरा सम्मान रखते थे।

                  गांधीजी, बोस को ‘‘देशभक्तों के बीच राजकुमार’’ कहते थे जबकि बोस भारतीय राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में गांधी जी के महत्त्व से पूरी तरह से अवगत थे और उन्हें ‘‘देश के राष्ट्रपिता’’ पुकारते थे।

                  अपने एकसमान लक्ष्यों तथा इच्छाओें और एक-दूसरे के प्रति सम्मान के बावजूद उनकी विचारधारा और कार्यप्रणाली में काफी अंतर था।

                  गांधी जी

                  सुभाष चंद्र बोस

                  अहिंसा बनाम सैनिक दृष्टिकोण

                  • अंहिसा और सत्याग्रह में विश्वास था।
                  • जनता को केवल इसी आधार पर शामिल किया जा सकता है।
                  • अकेले हिंसक प्रतिरोध ही भारत से विदेशी साम्राज्यवादी शासन को बाहर कर सकता है।

                  साधन और साध्य

                  • साधन और साध्य समान रूप से अच्छे हैं।
                  • साध्य प्राप्ति के लिये, कोई किसी भी साधन का प्रयोग नहीं कर सकता चाहे साध्य कितना भी वांछनीय क्यों न हो।
                  • बोस अपनी कार्रवाई के परिणामों पर नजरें रखते थे।
                  • उन्होंने स्वतंत्रता के संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिये जो भी अवसर उपलब्ध था, उसे जब्त करने में विश्वास किया।

                  सरकार का स्वरूप

                  • पूर्व-आधुनिक, नैतिक रूप से प्रबुद्ध और अराजनीतिक भारत राज्य।
                  • उनके स्वराज के अनुसार व्यक्तियों और समुदाय के निर्माण द्वारा स्वशासन पर जोर होना चाहिये।
                  • लोकतांत्रिक व्यवस्था अपर्याप्त होगी।
                  • यहाँ एक प्रकार का संश्लेषण होना चाहिये जिसे आधुनिक यूरोप ‘‘समाजवाद’’ या फासीवाद कहता है।

                  अर्थव्यवस्था पर विचार

                  • गांधी जी के स्वराज की अवधारणा स्वदेशी के आर्थिक दृष्टिकोण पर आधारित थी।
                  • वे राज्य के नियंत्रण से मुक्त विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था चाहते थे।
                  • बोस ने आर्थिक स्वतंत्रता को सामाजिक और राजनीतिक स्वतंत्रता का सार माना।
                  • वे पूर्णत: आधुनिकीकरण के पक्ष में थे जो औद्योगीकरण लाने हेतु आवश्यक था।

                  धर्म

                  • उनका धर्म उनके अन्य सभी विचारों का आधार था।
                  • सुभाषचंद्र बोस ने उपनिषद् की शिक्षा में विश्वास किया और वे विवेकानंद से प्रेरित थे।

                  जाति और अस्पृश्यता

                  • समाज के लिये गांधी जी के 3 मुख्य लक्ष्य थे: अस्पृश्यता का उन्मूलन जाति व्यवस्था के वर्णभेद को बनाए रखना और सहिष्णुता, नम्रता और भारत में धर्मनिष्ठा को मजबूत करना। 
                  • बोस, समाजवादी क्रांति द्वारा भारत बदलने के पक्षधर थे जो अपनी जाति व्यवस्था के साथ पारंपरिक सामाजिक पदानुक्रम को समाप्त करेगा। इसके स्थान पर समतावादी, जातिविहीन, वर्गविहीन समाज आना चाहिये। 

                  महिलाएँ

                  • गांधी ने महिलाओं के बहादुरी और स्वतंत्रता के गुणों तथा दु:ख सहन करने की क्षमता का प्रचार किया।
                  • उन्होंने महिला मुक्ति, सदियों पुराने रीति-रिवाजों के बंधनों, पुरूषों द्वारा निर्धारित सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक अक्षमताओं से महिलाओं को स्वतंत्र कराने पर विश्वास किया।

                  शिक्षा

                  • वे अंग्रेज़ी शिक्षा व्यवस्था के विरुद्ध थे।
                  • गांधी हिन्दू शास्त्रों को शिक्षा के भाग के रूप में शामिल करना चाहते थे ताकि वे आत्म संयम और अनुशासन स्थापित कर सकें।
                  • सुभाष चंद्र बोस खासकर तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्रों में उच्च शिक्षा के पक्षधर थे।

                  गांधी जी तथा सुभाष चंद्र बोस अपनी अलग-अलग विचारधाराओं के बावजूद एक-दूसरे के प्रति गहन सम्मान रखते थे। प्रत्येक ने स्वतंत्रता के लिये राष्ट्रीय संघर्ष में एक दूसरे द्वारा किये गए कार्यों की सराहना की।


                    उत्तर-16: 

                    हल करने का दृष्टिकोण:

                    • मानसून का संक्षिप्त परिचय देते हुए इसकी निरंतरता की चर्चा कीजिये।
                    • भारतीय मानसून की प्रकृति में आए प्रमुख बदलावों को बताते हुए इसके पीछे विद्यमान कारणों को बताइये।
                    • मानसून की अनिश्चित प्रकृति के भारतीय जलवायु एवं कृषि पर पड़ने वाले प्रभावों को बताइये।

                    मानसून शब्द की उत्पत्ति अरबी शब्दमौसिमसे हुई है जिसका तात्पर्य पवनों की दिशा का ऋतुवत प्रत्यार्वतन से है इसका संबंध ग्रीष्म ऋतु में होने वाले वायुमंडलीय परिसंचरण में परिवर्तन से है। जिसके परिणामस्वरूप हवाएँ दक्षिण-पश्चिमी हिंद महासागर से आर्द्रता लाकर भारतीय उपमहाद्वीप में वर्षा करती है। भारतीय मानसून एक स्थायी प्रणाली है जिसमें पिछली कई सदियों से अत्यधिक परिवर्तन नहीं हुए हैं जो कि लगभग प्रतिवर्ष समान प्रतिरूप में भारतीय उपमहाद्वीप में वर्षा करने हेतु उत्तरदायी है किंतु पिछले कुछ वर्षों से इसकी प्रकृति एवं आगमन में महत्त्वपूर्ण बदलाव देखे जा रहे हैं।

                    मानसून की प्रवृत्ति में हालिया स्थानिक एवं कालिक परिवर्तन

                    • भारत में वर्षा ऋतु लगभग चार महीनों की मानी जाती है, यहाँ मानसून का आगमन जून माह के प्रथम सप्ताह में केरल तट पर होता है जो कि सितंबर के अंतिम सप्ताह तक भारत से निवर्तित होता है। किंतु पिछले कई वर्षों से इसकी इस प्रवृत्ति में परिवर्तन दर्ज किये गए हैं कई बार इसका आगमन मई के अंतिम सप्ताह में हो जाता है तो कई बार यह जून के द्वितीय सप्ताह में आती है इसी प्रकार निवर्तन में भी ऐसे ही परिवर्तन दर्ज किये गए हैं।
                    • दूसरा महत्त्वपूर्ण परिवर्तन वर्षण प्रतिरूप में देखा गया है जब कहीं अतिवृष्टि तो कही अनावृष्टि देखी जाती है। आई.एम.डी. के अनुसार भारत के 22 महत्त्वपूर्ण नगरों में कुल 95% वर्षा केवल 27 दिनों में दर्ज की गई है। इसी के साथ अन्य परिवर्तन वर्षण प्रतिरूप में अंतरक्षेत्रीय असमानता के रूप में देखा गया है।
                    • कुछ क्षेत्र जो कि वर्षा ऋतु में औसत वर्षा की प्राप्ति करते थे वहाँ सूखे की स्थिति दर्ज की गई तथा कुछ क्षेत्रों में अतिवृष्टि एवं बादल फटने की घटनाएँ भी दर्ज की गई हैं।

                    वस्तुत: भारतीय मानसून में इन परिवर्तनों के पीछे कई प्राकृतिक एवं मानव जनित कारण विद्यमान हैं जिनमें वैश्विक जलवायु परिवर्तन, एल नीना घटना, ला-नीनी, इंडियन डाईपोल तथा मैडन जूलियन घटना प्रमुख हैं जिनसे भारतीय मानसून में क्षेत्रीय एवं कालिक भिन्नताएँ उत्पन्न होती हैं। भारतीय मौसम की अनिश्चितता में हुई इस वृद्धि से भारतीय जलवायु एवं कृषि पर कई नकारात्मक प्रभाव पड़ रहे हैं जिसमें भारतीय अर्थव्यवस्था को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है।


                      उत्तर-17: 

                      हल करने का दृष्टिकोण:

                      • विषय को संक्षिप्त में बताते हुए उत्तर की शुरुआत करें।
                      • चर्चा करें कि महिलाओं की शादी के लिये कानूनी उम्र बढ़ाने से भारत के लिये लाभ सुनिश्चित होंगे।
                      • शादी की उम्र बढ़ाने से उत्पन्न चिंताओं का उल्लेख करें।
                      • आगे की राह बताते हुए निष्कर्ष लिखें।

                      जून 2020 में, केंद्र सरकार ने महिलाओं के लिये विवाह की पूर्व निर्धारित कानूनी उम्र (18 वर्ष) को बदलने हेतु 10 सदस्यीय टास्क फोर्स का गठन किया है। महिलाओं की शादी की कानूनी उम्र बढ़ाने का यह प्रस्ताव भारत के आर्थिक और सामाजिक लाभ को बढ़ावा देने के संदर्भ में है। इसे निम्नलिखित तथ्यों के माध्यम से समझा जा सकता है-

                      • भारतीय स्टेट बैंक ने ‘‘महिलाओं की शादी की कानूनी उम्र बढ़ाना: सामाजिक रूप से अच्छा, आर्थिक रूप से सशक्त महिलाओं के लिये एक प्रभावी रणनीति’’, शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट के अनुसार मातृत्व मृत्यु में कमी और पोषण के स्तर में सुधार से लड़कियों के लिये कॉलेज समयावधि में वृद्धि होगी तथा दीर्घावधि में यह प्रस्तावित कानूनी सुधार महिलाओं को अधिक वित्तीय स्वतंत्रता प्राप्त करने में सक्षम बनाएगा।
                      • यह सिर्फ उन महिलाओं और उनके परिवारों के लिये नहीं है जो कम उम्र में विवाह की समस्या से पीड़ित हैं, बल्कि यह पूरे देशवासियों के लिये है। वर्तमान में भारत के कार्यबल में महिलाओं का योगदान 18 प्रतिशत से अधिक नहीं है। बावजूद इसके कि हम डिजिटल युग में जी रहे हैं, आज भी देश की अधिकांश महिलाएँ घरेलू कार्यों तक ही सीमित हैं।
                      • महिलाओं की श्रमशक्ति भागीदारी में मात्र 10 प्रतिशत की वृद्धि से वर्ष 2025 तक भारत के जीडीपी में + 770 बिलियन की वृद्धि हो सकती है। साथ ही, सशक्त महिलाएँ जो उद्यमी बन जाती हैं, अकेले ही अगले दशक में 150 मिलियन से 170 मिलियन नौकरियों को जोड़ने में सक्षम हैं।
                      • भारत की युवा जनसांख्यिकी से पता चलता है कि यदि वर्ष 2027 तक 234 मिलियन श्रमिकों को श्रमशक्ति से जोड़ दिया जाए तो यह दुनिया की सबसे बड़ी श्रमशक्ति बन सकती है। वहीं शिक्षित और प्रशिक्षित महिला श्रमिकों की एक बड़ी संख्या को श्रमबल में शामिल करने से यह पूरे देश के लिये एक अभूतपूर्व बदलाव साबित हो सकता है।
                      • आर्थिक संपदा से इतर, महिलाओं को सशक्त बनाने से भारत के प्रसन्नता सूचकांक में योगदान मिलेगा और इससे अकल्पनीय समृद्धि आएगी।
                      • दुर्भाग्यवश, भारत भी दुनिया में सर्वाधिक मातृ मृत्यु दर वाले देशों में से एक है। बाध्यकारी मातृत्व से ग्रस्त कई युवा महिलाएँ एनीमिया, एचआईवी/एड्स संक्रमण जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के लिये अतिसंवेदनशील होती हैं। ऐसी महिलाओं के घरेलू हिंसा का शिकार होने के साथ ही बच्चों को जन्म देने की संभावना अधिक होती है, चूँकि वे खुद अल्पवयस्क होती हैं, अत: गर्भावस्था और प्रसव के दौरान जटिलताएँ भी उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिये, महिलाओं की शादी के लिये कानूनी उम्र बढ़ाने से मातृ मृत्यु दर को कम करने जैसे सामाजिक लाभ प्राप्त होंगे।

                      शादी की उम्र बढ़ाने से उत्पन्न चिंताएँ:

                      • भारत में 21 वर्ष की आयु तक अधिकांश महिलाओं का विवाह हो जाता है, अत: महिलाओं के विवाह की आयु बढ़ाने का कानूनी निर्णय इन महिलाओं और उनके परिवारों को अपराधीकरण की ओर ले जाएगा।
                      • शादी की कानूनी उम्र बढ़ाने से उन युवा विधवाओं के हकों और अधिकारों की हानि भी होगी जो पहले से ही असुरक्षित हैं।
                      • प्रस्तावित कानूनी सुधार के बारे में यह चिंता व्यक्त की जा रही है कि इससे बाल विवाह को रोकने की बजाय युवा सहमति वाले जोड़ों को अधिक नुकसान होगा। अध्ययनों से पता चलता है कि माता-पिता मुख्य रूप से मौजूदा कानूनों का इस्तेमाल कुंडली विवाह कराने के लिये करते हैं।
                      • शादी की कानूनी उम्र बढ़ाना, माता-पिता को अपनी बेटी के निर्णय लेने और महिला की पसंद के ऊपर अधिक नियंत्रण को बढ़ावा देगा।
                      • शादी की न्यूनतम उम्र बढ़ाना, उचित रूप से एक प्रगतिशील कदम है, लेकिन यह ग्रामीण भारत में महिलाओं को सशक्त बनाने की बजाय दलित और आदिवासी समुदायों की मौजूदा कमज़ोरियों और अपराधीकरण को बढ़ावा देता है।

                      निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि भारत में बाल विवाह के संदर्भ में किये जाने वाले प्रयास सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं के अनुरूप होने चाहिये जो महिलाओं के लिये शिक्षा, कल्याण और अवसरों में निवेश की मांग को बढ़ावा दे सकें।


                      उत्तर-18: 

                      हल करने का दृष्टिकोण:

                      • संक्षिप्त परिचय से आरंभ कीजिये।
                      • राष्ट्रवाद उत्पन्न करने में प्रेस की भूमिका का विश्लेषण कीजिये।
                      • राष्ट्रवाद को विकसित करने में प्रेस की भूमिका के साथ निष्कर्ष दीजिये।

                      ब्रिटिश शासन के दौरान क्रांतिकारियों एवं स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा जिस सबसे बड़ी समस्या का सामना करना पड़ता था वह था भारतीयों के बीच सूचनाओं के समुचित प्रसार के लिये उपयुक्त माध्यमों की कमी। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये प्रेस ने एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। इसने लोगों में राष्ट्रवाद एवं एकता की भावना को जगाया तथा उन्हें राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लेने के लिये प्रेरित किया।

                      भारतीयों में राष्ट्रवाद उत्पन्न करने में प्रेस की भूमिका:

                      • प्रेस द्वारा सामाजिक या राजनीतिक जागरूकता का प्रसार किये जाने के फलस्वरूप राष्ट्रीय आंदोलन संभव हो सका। प्रेस ने लोगों को भारत में उनकी हालत के बारे में जागरूक करने का कार्य किया।
                      • भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस (INC) की स्थापना ने भी लोगों में राष्ट्रवादी आकांक्षाओं को मज़बूत किया। भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस के कई प्रमुख सदस्य, जैसे- दादा भाई नौरोजी, एम. जी. रानाडे नरेंद्रनाथ सेन आदि प्रख्यात पत्रकार और संपादक थे।
                      • अनेक भारतीय किसान नील के सौदागरों एवं औपनिवेशिक सरकार द्वारा शोषित किये जा रहे थे। अखबारों ने किसानों के इन मुद्दों को उठाया और उनके लिये संघर्ष भी किया।
                      • इन अखबारों के माध्यम से इनके संपादक ब्रिटिश सरकार के विभिन्न कानूनों एवं नीतियों की छानबीन करते थे। उन्होंने ब्रिटिश सरकार तथा उनके कार्यों के खिलाफ संघर्ष छेड़ा एवं जनता को राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लेने के लिये सदैव प्रोत्साहित किया।
                      • प्रेस ने ब्रिटिश सरकार के अनेक औपनिवेशिक कठोर कानूनों के खिलाफ संघर्ष किया।
                      • जनता तक प्रेस की पहुँच व्यापक थी, उसने देश में प्रख्यात पुस्तकालय आंदोलन को हवा दी। पुस्तकालय आंदोलन केवल शहरों या नगरों तक सीमित नहीं था बल्कि यह दूरदराज के गाँवों तक भी फैला था जहाँ प्रत्येक व्यक्ति अखबार एवं उसके संपादकीय पढ़ सकता था और उस पर चर्चा कर सकता था। इसने भारतीयों में राजनीतिक जागरूकता बढ़ाने में सहायता की। यही जागरूकता बाद में स्वतंत्रता संघर्ष में राजनीतिक भागीदारी के रूप में तब्दील हुई।   

                      इस तरह प्रेस ने राष्ट्रीय आंदोलन के विकास एवं समेकन में, राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय साहित्यों के सृजन में, संस्कृति में तथा वाह्य दुनिया के प्रगतिशील लोगों एवं वर्गों के साथ भ्रातृत्व को गढ़ने में निर्णायक भूमिका अदा की।


                      उत्तर-19: 

                      हल करने का दृष्टिकोण:

                      • ‘वैश्वीकरण’ की संक्षिप्त परिभाषा दीजिये। 
                      • संबंधित विभिन्न आयामों को परिभाषित कीजिये जिसमें वैश्वीकरण ने राज्य की भूमिका को प्रभावित किया है।
                      • विकासशील देशों पर वैश्वीकरण के प्रभाव की चर्चा कीजिये।
                      • वैश्वीकरण के प्रभावों का मूल्यांकन कर आगे की राह बताते हुए निष्कर्ष लिखिये।

                      वैश्वीकरण विभिन्न देशों के लोगों, कंपनियों और सरकारों के मध्य अंतर्क्रिया और एकीकरण की प्रक्रिया है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो अंतर्राष्ट्रीय व्यापार एवं निवेश द्वारा संचालित और सूचना प्रौद्योगिकी द्वारा सहायता प्राप्त है।

                      बहुआयामी और वैश्विक प्रकृति की यह प्रक्रिया विश्वभर के समाजों के पर्यावरण, संस्कृति, राजनैतिक व्यवस्था, आर्थिक विकास एवं संवृद्धि और मानव के भौतिक सुख को प्रभावित करती है। 21वीं सदी में एक विचारधारा और प्रक्रिया दोनों के रूप में वैश्वीकरण प्रभावशाली राजनीतिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक ताकत बन चुका है और राज्यों की भूमिका को महत्त्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया है।

                      राजनीतिक भूमिका में परिवर्तन:

                      • वैश्वीकरण ने अंतर-राज्यीय संबंधों और एक-दूसरे पर निर्भरता को मज़बूत बनाते हुए राज्य की भूमिका को राजनीतिक रूप से परिवर्तित कर दिया है। राज्यों का गठन संप्रभु होने के लिये किया गया था परंतु अब वैश्वीकरण के परिणामस्वरूप व सम्मेलनों, अनुबंधों, दबावों और अधिरोपणों से स्वयं को एकीकृत करने के लिये प्राय: अपनी संप्रभुता से समझौता कर लेते हैं। इससे राज्यों के अधिकार क्षेत्र में समान रूप से वृद्धि हुई है और सत्ता को राजनीतिक प्रगति के बजाय एक आर्थिक ताकत के रूप में देखा जा रहा है क्योंकि राज्य अब एक साथ राजनीतिक प्रगति और प्रतिगमन करते हैं, जिससे वे अधिक विकासात्मक हो जाते हैं।

                      आर्थिक भूमिका में परिवर्तन:

                      • वैश्विक आर्थिक परिवर्तनों का राज्य की भूमिका पर अधिक प्रभाव पड़ता है। वैश्विक अर्थव्यवस्था ऑनलाइन बैंकिंग, शेयर बाजारों और वृहद् स्तर पर वैश्विक फ्रेंचाइजी द्वारा निर्मित होती है। अमूर्त परिसंपत्ति और आयात के साथ-साथ ऑनलाइन एवं इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग तथा कई राज्यों के मध्य एक साझा मुद्रा (जैसे- यूरोप में) के प्रयोग के कारण अब राज्यों का मुद्रा पर पर्याप्त नियंत्रण नहीं है।
                      • वैश्विक बाज़ार मानकों को अपनाने हेतु देशों को प्रभावित करने में डब्ल्यू.टी.ओ. जैसे अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की प्रमुख भूमिका है।

                      सामाजिक आयाम:

                      • सामाजिक वैश्वीकरण ने मानवाधिकारों के उल्लंघन, बाल श्रम की समस्या और भ्रष्टाचार के संबंध में व्यापक स्तर सामाजिक जागरूकता का प्रसार किया है। परिणमस्वरूप यह चुनौतियाँ लोक प्रशासन एवं सरकार की भूमिका को प्रभावित करती हैं। कॉर्पोरेट क्षेत्र को वैश्विक बनाने के लिये सार्वजनिक-निजी क्षेत्रों के व्यवस्था-प्रारूप में बड़े परिवर्तनों ने संसाधनों के आवंटन, धन का वितरण, अर्थव्यवस्था के स्थिरीकरण और आर्थिक विकास में सरकार की अग्रणी भूमिका को परिवर्तित कर दिया है।

                      विकासशील देशों पर प्रभाव

                      लाभ

                      • आर्थिक एकीकरण के माध्यम से आर्थिक विकास में वृद्धि तथा गरीबी की समस्या, आर्थिक विकास, गरीबी आदि के समाधान द्वारा यह विकासशील देशों को सहायता प्रदान करता है। 
                      • राज्य और उसकी कार्यविधियों का मॉडल भी राजनीतिक विचारों के स्वतंत्र प्रवाह के परिणामस्वरूप विकसित होता है।
                      • सरकार द्वारा स्वास्थ्य, शिक्षा एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नीतिगत पहल का नेतृत्व करना वैश्वीकरण का प्रत्यक्ष परिणाम है।
                      • भारत में LGBTQ समुदाय के अधिकारों पर हाल में लिये गए निर्णय नागरिकों को अधिकार प्रदान करने में राज्य की परिवर्तित भूमिका का आदर्श उदाहरण है।

                      हानियाँ

                      • विश्व व्यापार संगठन में भारत की अनुदान व्यवस्था से संबंधित मामले वैश्विक स्तर पर प्रमुख शक्तिशाली देशों के हस्तक्षेप को दर्शाते हैं।
                      • वैश्वीकरण विभिन्न देशों के बीच यात्रियों के आवागमन के कारण विकासशील देशों में नए रोगों के प्रसार में सहायता करता है और विकासशील देशों में इन रोगों से निपटने की क्षमताओं में कमी के कारण उन्हें विकसित देशों पर निर्भर रहना पड़ता है।
                      • विकासशील देशों में कुशल मानव श्रम में कमी आई है क्योंकि अन्य देशों में कुशल मानव श्रम के उच्च अवसर उपलब्ध होने के कारण वे आसानी से पलायन कर जाते हैं।
                      • वैश्वीकरण ने विकासशील देशों में आर्थिक असमानता का नेतृत्व किया है।
                      • इस प्रकार वैश्वीकरण ने राज्यों की भूमिका को विभिन्न तरीकों से परिवर्तित किया है: राज्यों की अंतर्निर्भरता व स्वतंत्रता के माध्यम से राजनीतिक रूप से, आतंकवाद व घातक बीमारियों की समस्या के कारण सामाजिक रूप से, मीडिया तथा इंटरनेट के माध्यम से तकनीकी रूप से और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था से वैश्विक अर्थव्यवस्था में परिवर्तन के कारण आर्थिक रूप से।

                      वैश्वीकरण को प्राय: राज्यों के महत्त्व को कम करने के रूप में उल्लेखित किया जाता है लेकिन अंतत: वहीं राज्य सफल होंगे जो वैश्वीकरण के इस दौर में परिवर्तित भूमिकाओं को तीव्रता से अपनाएंगे।


                      उत्तर-20: 

                      दृष्टिकोण

                      • उत्तर की शुरुआत नव स्वतंत्र भारत के सामने आने वाली चुनौतियों को संक्षेप में बताते हुए कीजिये।
                      • स्वतंत्रता के बाद के सुदृढ़ीकरण और राष्ट्र निर्माण में नेहरू की भूमिका पर चर्चा कीजिये।
                      • उपयुक्त निष्कर्ष लिखिये।

                      परिचय

                      वर्ष 1947 में भारत को स्वतंत्रता तो मिली लेकिन एक राष्ट्र के रूप में इसे बहुत कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। उदाहरण के लिये स्वतंत्रता देश के विभाजन और सांप्रदायिक हिंसा के साथ आई। पूरा देश गरीबी, अशिक्षा और विकास की कमी के बोझ तले दब गया था। विदेश नीति के मोर्चे पर, भू-राजनीति शीत युद्ध की शुरुआत देख रही थी।

                      इस परिदृश्य में, जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री बने और कई सुधारों एवं नीतियों की शुरुआत की जिन्होंने राष्ट्र निर्माण तथा स्वतंत्रता के बाद भारत के एकीकरण में मदद की।

                      • राष्ट्र का एकीकरण: नेहरू ने लोगों की क्षेत्रीय आकांक्षाओं को पूरा करने के लिये राज्य पुनर्गठन समिति की स्थापना की ताकि उनके राष्ट्र से अलग होने की संभावना कम हो जाए।
                      • शरणार्थियों का पुनर्वास: पाकिस्तान के शरणार्थियों को आश्रय दिया गया और सांप्रदायिकता को कम करने के प्रयास किये गए।
                      • धर्मनिरपेक्षता: विशेष रूप से नेहरू के प्रयासों के कारण ही भारत बीसवीं शताब्दी के मध्य में एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के रूप में उभरा।
                      • स्वतंत्रता से बहुत पहले, उन्होंने भारतीय राजनीति के लिये एक धर्मनिरपेक्ष आधार के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
                      • इससे 'अनेकता में एकता' के आख्यान के निर्माण में मदद मिली।
                      • कल्याणकारी राज्य: नेहरू एक व्यावहारिक आदर्शवादी थे और उनका मानना ​​था कि समाजवाद तथा लोकतंत्र परस्पर विरोधी नहीं बल्कि एक दूसरे के पूरक हैं।
                      • वह धन के समान वितरण के लिये एक कल्याणकारी राज्य का निर्माण करना चाहते थे।
                      • योजना आयोग: एक व्यावहारिक समाजवादी के रूप में जवाहरलाल नेहरू ने एक ऐसे देश में कल्याणकारी राज्य के महत्त्व को समझा, जिसके पास पर्याप्त बुनियादी ढाँचा उपलब्ध नहीं था और सामाजिक कल्याण हेतु दीर्घकालिक योजना के लिये एक योजना आयोग की स्थापना की।
                      • गुटनिरपेक्ष नीति (NAM): विदेश मंत्री होने के नाते, नेहरू किसी भी शक्ति गुट में शामिल नहीं होना चाहते थे। साथ ही वह नहीं चाहते थे कि भारत विश्व राजनीति से अलग रहे। इसलिये अन्य तीसरी दुनिया के देशों के साथ NAM स्थापित करने का नेहरू का दूरदर्शी दृष्टिकोण एक आदर्श विदेश नीति दृष्टिकोण साबित हुआ।

                      निष्कर्ष

                      कठिन चुनौतियों का सामना करने के बावजूद नेहरू राष्ट्र को मज़बूत बनाए रखने में सफल रहे। उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन की परंपराओं को आगे बढ़ाते हुए नवजात राष्ट्र भारत का पोषण किया। यही कारण है कि उन्हें व्यापक रूप से आधुनिक भारत के वास्तुकारों में से एक के रूप में प्रशंसित किया जाता है।

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