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 सिविल सेवा मुख्य परीक्षा - 2018 प्रश्नपत्र   Download

बेसिक इंग्लिश का दूसरा सत्र (कक्षा प्रारंभ : 22 अक्तूबर, शाम 3:30 से 5:30)

उम्मीदवार का परिचय

नामः आलोक कुमार
पिता का नामः माधवेन्द्र नाथ
माता का नामः मालविका नाथ
जन्म स्थानः बहराइच (उत्तर प्रदेश)
जन्म तिथिः 27 अगस्त, 1984

शैक्षणिक योग्यताः
प्रारंभिक शिक्षाः सरस्वती शिशु मंदिर, बहराइच
जूनियर हाई स्कूलः पं. दीनदयाल उपाध्याय सनातन धर्म विद्यालय, कानपुर
हाई स्कूलः पं. दीनदयाल उपाध्याय सनातन धर्म विद्यालय, कानपुर (78.5%)
इण्टरमीडिएटः पं. दीनदयाल उपाध्याय सनातन धर्म विद्यालय, कानपुर (76.4%)
स्नातक (बी.टेक): मोती लाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, इलाहाबाद (इलेक्ट्रॉनिक्स एवं कम्यूनिकेशन में इंजीनियरिंग)
परास्नातक (एम.ए.): इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद (प्राचीन इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व- 65.2%)

शोधकार्य में प्रवेश तथा UGC-JRF में चयन
पूर्व चयनः UPPCS 2007 में ARTO
माध्यमः हिंदी
प्रयासः प्रथम
रुचिः फुटबॉल, फिल्म देखना, स्वतंत्र अध्ययन, संगीत सुनना
सेवा संबंधी वरीयताएँ: IAS, IPS, IFS, IRS, IC&ES, IRTS, IRAS
राज्य संबंधी वरीयताएँ: उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा, बिहार, झारखण्ड, ओडिशा, गुजरात, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, पंजाब, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, केरल, तेलंगाना, असम-मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा, नागालैंड, अग्मुट।

आलोक कुमार पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक छोटे-से शहर बहराइच के रहने वाले हैं। प्रारंभिक शिक्षा सरस्वती शिशु मंदिर में हुई जहाँ उन्होंने पाँचवीं  कक्षा में प्रांत स्तरीय मेधावी छात्र योग्यता परीक्षा में द्वितीय स्थान प्राप्त किया। उनके पिता स्थानीय किसान पी.जी. कॉलेज में संस्कृत के प्राध्यापक हैं तथा माँ अर्द्धशिक्षित गृहणी हैं। आलोक शुरू से ही पढ़ने में अच्छे थे, अतः उनके अंदर की संभावनाओं को देखते हुए उनके पिताजी ने उन्हें छठी कक्षा से ही बाहर पढ़ने के लिये पं. दीनदयाल उपाध्याय सनातन धर्म विद्यालय, कानपुर भेज दिया। 12वीं कक्षा तक आलोक अपने विद्यालय के हॉस्टल में रहे और यहीं से उनका चयन मोती लाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, इलाहाबाद में हो गया। यहाँ से आलोक ने इलेक्ट्रॉनिक्स और कम्यूनिकेशन में बी.टेक. किया, फिर 1 साल भारती एयरटेल में नौकरी भी की। इसके बाद घरवालों तथा आत्मीयजनों की प्रेरणा से उन्होंने नौकरी छोड़ दी और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राचीन इतिहास में एम.ए. करने लगे। एम.ए. के दौरान ही उन्होंने JRF निकाला और आईएएस की मुख्य परीक्षा भी पास कर ली। 2010 में इंटरव्यू देते समय वे शोध-छात्र के रूप में प्रवेश ले चुके थे तथा ‘प्राचीन भारतीय इतिहास लेखन के अंतर्विरोध’ विषय पर शोधरत थे। हालाँकि वे कभी-कभी यह भी सोचते थे कि कुछ वर्ष तक सिविल सेवा में रहने के बाद राजनीति में प्रवेश करूंगा। एक बात और उल्लेखनीय है कि आलोक बचपन से ही क्रिकेट के दीवाने थे तथा स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक अपनी टीम का प्रतिनिधित्व कर चुके थे, हालाँकि अपनी हॉबी के रूप में उन्होंने फुटबॉल का ज़िक्र किया, जो उन्हें पसंद तो था पर वे उसके दीवाने नहीं थे (हो सकता है कि खुद की प्रोफाइल को थोड़ा हटकर दिखाने या क्रिकेट के लगाव के साधारणीकरण को सोचकर उन्होंने ऐसा किया हो)। जो भी हो, एक बात बेहद सामान्य थी कि घरवालों से लेकर क्षेत्र वाले तथा उनके संस्थान व विश्वविद्यालय के साथी एक स्वर से मानते थे कि आलोक एक दिन आईएएस ज़रूर बनेंगे और आलोक ने यह करके भी दिखाया। आइये देखते हैं कि बेहद संभावनाशील और अत्यधिक अपेक्षाओं के भार से युक्त आलोक ने अपना वह सफल साक्षात्कार कैसे दिया, जिसने उन्हें अपने परिवार एवं क्षेत्र का नाम रोशन करने का अवसर दिया; आपके लिये निश्चय ही यह सब जानना बेहद रोमांचक व प्रेरणादायी होगा। अच्छी बात यह है कि यह मॉक इंटरव्यू आलोक कुमार द्वारा स्वयं आपबीती के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिसे बगैर काट-छाँट के आपके लिये प्रस्तुत किया जा रहा है।

साक्षात्कार

यूपीएससी भवन में प्रमाण-पत्रों की प्रारंभिक जाँच के बाद हमें एक हॉल में बिठा दिया गया जिसमें कई टेबल थीं। मुझे बताया गया था कि उस टेबल के अभ्यर्थियों को श्री पुरुषोत्तम अग्रवाल के बोर्ड का सामना करना है। इसी बीच मेरा बुलावा आ गया। मुझे कुछ देर बाहर ही बैठने का निर्देश मिला, थोड़ी देर में मुझसे ठीक पहले गए अभ्यर्थी राजकुमार जी मुस्कुराते हुए बाहर निकले और उनके बाद मैं बोर्ड के सामने उपस्थित हुआ। मैंने बोर्ड के चेयरमैन और शेष 5 सदस्यों का अभिवादन किया, बाद में पता चला कि इनमें से एक दुभाषिये की भी उपस्थिति थी। चेयरमैन सर ने अभिवादन का जवाब देते हुए मुझे कुर्सी पर बैठने का संकेत किया और मैं आभार प्रदर्शित करते हुए बैठ गया और फिर शुरू हुआ मेरा साक्षात्कारः


चेयरमैनः
(मुस्कुराते हुए) आपने बी.टेक. किया है आलोक जी... और आपने न केवल ह्यूमेनिटी का सब्जेक्ट लिया बल्कि परीक्षा भी हिंदी माध्यम में दी!

आलोकः
सर... दरअसल मेरी पृष्ठभूमि कुछ मिली-जुली सी है। मैंने बी.टेक करने के बाद प्राचीन इतिहास से परास्नातक भी किया और इस बीच सिविल सेवा परीक्षा के प्रश्नपत्रों के स्वरूप का अवलोकन करने के बाद मुझे लगा कि हिंदी माध्यम में मैं ज़्यादा  सहज रहूंगा और बेहतर भी कर सकूंगा।

चेयरमैनः चलिये कोई बात नहीं, पर आमतौर पर ऐसा कम देखा जाता है। अच्छा, आपने  बी.टेक. करके नौकरी के पश्चात् अचानक एम.ए. करने का विचार कैसे बनाया?

आलोकः सर, विचार तो बहुत पहले से था, पर किस विषय में एम.ए. करूँ और नौकरी छोड़ूँ या नहीं, ये सब सोच-विचार करने में मैंने एक साल का वक्त लिया। लेकिन जब मुझे लगा कि नौकरी करते हुए मैं अपना सपना पूरा नहीं कर सकता तो मैंने नौकरी छोड़ दी। सर, मैं टेक्निकल फील्ड से था इसलिये मानविकी आधारित माहौल से जुड़ने के लिये मैंने एम.ए. करने का निश्चय किया।

चेयरमैनः अच्छा... लेकिन प्राचीन इतिहास ही क्यों?

आलोकः सर... इतिहास में मेरी बहुत रुचि थी और एम.एन.एन.आई.टी. में पढ़ाई के दौरान मैंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग की बड़ी ख्याति सुनी थी। यही कारण था कि मैंने प्राचीन इतिहास को परास्नातक के लिये चुना।

चेयरमैनः तब तो आपका इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्यूनिकेशन में इंजीनियरिंग करना बेकार गया?... गया न? (मुझसे हामी भरवाने का प्रयास करते हुए)

आलोकः (मैंने हल्का-सा मुस्कुराते हुए निवेदन किया, जिससे यह न लगे कि मैं उनके आग्रह को काट रहा हूँ) नहीं सर, मेरे पिताजी की इच्छा थी कि मैं IIT में पढ़ने के पश्चात् सिविल सेवा में जाऊँ, और मैं इसी पर आगे बढ़ा। खैर, मैं IIT में तो नहीं जा पाया पर NIT में पढ़ाई के दौरान मुझे जब भी समय मिलता था मैं सिविल सेवा की तैयारी के लिये मेहनत करता रहा। मेरे सामने इंजीनियरिंग व मेडिकल पृष्ठभूमि के अभ्यर्थियों के ऐसे अनेक उदाहरण थे जो सिविल सेवा में सफल हुए थे।

चेयरमैनः हम्म... क्या यह संसाधन की बर्बादी नहीं है?

आलोकः सर, जहाँ तक मैं समझता हूँ ऐसा नहीं है। हमारे देश में सिविल सेवकों का कार्यक्षेत्र बहुत व्यापक है, अगर वे चाहें तो अपनी अकेडमिक पृष्ठभूमि का उपयोग लोगों का जीवन बदलने में कर सकते हैं। इस बारे में देवास के कलेक्टर उमाकांत उमराव एक उदाहरण हो सकते हैं, जिन्होंने देवास खेत-तालाब मॉडल में अपनी इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि का सदुपयोग करके इलाके की तस्वीर बदल दी।

चेयरमैनः चलिये ठीक है। ... अच्छा, आपने अपनी अभिरुचियों में ‘स्वतंत्र अध्ययन’ का उल्लेख किया है, यह स्वतंत्र अध्ययन क्या है?

आलोकः
सर (थोड़ा मुस्कुराते हुए) डिग्रियाँ लेने के लिये पढ़ी गई टेक्स्ट-बुक्स के अतिरिक्त जो भी साहित्य पढ़ा जाए उसे स्वतंत्र अध्ययन कह सकते हैं।

चेयरमैनः क्या पढ़ना पसंद है आपको?

आलोकः सर... मैं हर तरह का साहित्य पढ़ता हूँ- कथात्मक, गैर-कथात्मक, कविता, नाटक।

चेयरमैनः आप फिल्में देखने का भी शौक रखते हैं, किस तरह की फिल्में पसंद करते हैं आप- हिंदी या अन्य भाषाओं की?

आलोकः
सर, मैं अच्छे कथानकों पर फिल्में देखना पसंद करता हूँ चाहे वे किसी भाषा की हों।

चेयरमैनः
 फिर तो आपको फिल्म समीक्षकों की राय या ‘जनता के निर्णय’ पर आश्रित होना पड़ेगा (मुस्कुराते हुए)।

आलोकः हाँ सर, कुछ ऐसा ही होता है; पर ऐसा तो हर मामले में करना पड़ता है।

चेयरमैनः मतलब...?

आलोकः सर... वस्तुओं की खरीद से लेकर... स्कूलों के चयन तक हम लोग समाज या मीडिया पर ही तो निर्भर होते हैं।
(चेयरमैन सहमति से सिर हिलाते हैं... और सदस्य-1 से प्रश्न पूछने के लिये संकेत करते हैं।)

सदस्य-1: आलोक जी, आपके ज़िले से नेपाल तो नज़दीक होगा?... आजकल नेपाल में जो चल रहा है उस पर आपकी क्या राय है?

आलोकः सर, मुझे अक्सर नेपाल जाने का मौका मिला है, वहाँ के लोगों से बात भी होती रहती है। वहाँ पहाड़ और मैदानी, उच्चवर्गीय पहाड़ी व निम्नवर्गीय पहाड़ी, राजा के समर्थकों और विरोधियों, हिंदू और धर्मनिरपेक्ष, भारतीय निकटता व चीनी निकटता को लेकर स्पष्ट विभाजन दिखता है। साथ ही, लोगों को भारत से कई तरह की शिकायतें भी हैं, जैसे भारत का अपने को बड़ा भाई समझना, नेपालियों को नौकर समझा जाना आदि। इन सबके अलावा, नेपाल में चीन और पाकिस्तान की भारत-विरोधी लॉबी भी मज़बूत हो रही है।

सदस्य-1: आपको ऐसा नहीं लगता कि नेपाल से सीमाएँ खुली रखने के कारण भारत को कई सुरक्षात्मक दिक्कतें पैदा होती हैं?
आलोकः सर, जहाँ तक खुली सीमा का सवाल है, तो वह भारत में तस्करों और आतंकियों के प्रवेश का सुगम रास्ता है, पर उसे बंद करने की बजाय सीमा-सुरक्षा उपायों को और ज़्यादा मज़बूत करना ही अच्छा विकल्प होगा। अगर भारत सीमा बंद करता है तो दोनों देशों में एक स्थायी मनमुटाव की नींव पड़ सकती है।


सदस्य-1:  अच्छा, आलोक जी आप पं. दीनदयाल सनातन धर्म विद्यालय से पढ़े हैं। ये सनातन धर्म से क्या अभिप्राय है?

आलोकः सर, सनातन का अभिप्राय है जो शुरू से चला आ रहा हो, शाश्वत हो या हमेशा बना रहने वाला हो। सामान्य रूप से प्राचीन हिंदू धर्म एवं आचारशास्त्र को सनातन धर्म अथवा सनातन हिंदू धर्म की संज्ञा दी जाती है।

सदस्य-1: अच्छा... ये दीनदयाल उपाध्याय जी के नाम से एक शोध संस्थान भी है, यह क्या शोध करवाता है?

आलोकः सर, यह नानाजी देशमुख द्वारा स्थापित ग्रामीण विकास से संबंधित एक शोध संस्थान है, जिसका मुख्यालय दिल्ली में है। इसकी शुरुआत गोंडा ज़िले के जयप्रभा ग्राम में 1978 में हुई थी, बाद में चित्रकूट में भी इसका विस्तार किया गया और ग्रामोदय विश्वविद्यालय की स्थापना हुई।

सदस्य-1:  आप उत्तर प्रदेश में ए.आर.टी.ओ. के पद पर भी चयनित हैं, क्या काम करना होता है इस पद पर?

आलोकः सर यह परिवहन विभाग से संबंधित पद है। वाहनों के समुचित संचालन, ड्राइविंग लाइसेंस और परमिट आदि का काम ए.आर.टी.ओ. कार्यालय से होता है। यह अवैध वाहनों के खिलाफ छापेमारी का काम भी करता है।
(सदस्य-1 कुछ सेकेंड के लिये चुप हो जाते हैं और इस बीच महिला सदस्य प्रश्न करती हैं)।

महिला सदस्यः अच्छा आप कम्यूनिकेशन क्षेत्र से जुड़े हैं। कहा जा रहा है कि रूरल बिज़नेस प्रॉसेस आउटसोर्सिंग में भी गाँवों को बदल देने की संभावनाएँ हैं... इसके बारे में कुछ जानते हैं आप?

आलोकः
हाँ मैम, अब गाँव इंटरनेट से जुड़ रहे हैं, आई.टी.सी. के ई-चौपाल जैसे कार्यक्रमों ने इस बारे में पहल आरंभ की थी। ग्राम ज्ञान केंद्र भी ग्रामीणों को कृषि एवं अन्य सूचनाएँ उपलब्ध करा रहे हैं। मैम, मैंने कहीं पढ़ा है कि कई घरेलू कंपनियों ने ग्रामीण क्षेत्रों में BPO भी खोले हैं, पर इसके बारे में मुझे अभी पूरी जानकारी नहीं है। हाँ, इतना कह सकता हूँ कि सूचना प्रौद्योगिकी का सही प्रयोग ग्रामीण जीवन को सकारात्मक रूप से बदलने की ताकत रखता है।

महिला सदस्यः हम्म...। अच्छा, आप कुर्दों के बारे में कुछ जानते हैं? आजकल उनकी समस्या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर काफी चर्चित है।

आलोकः जी मैम, कुर्द लोगों के बारे में पत्र-पत्रिकाओं से जानकारी मिलती रहती है... ये सीरिया, दक्षिणी तुर्की, उत्तरी इराक एवं ईरान के एक बड़े क्षेत्र में फैले सुन्नी मुस्लिम लोग हैं, जो हिंद-यूरोपीय नस्ल के कबीलों से संबंधित रहे हैं। तुर्की व इराक में वे स्वतंत्र कुर्दिस्तान की लड़ाई लड़ रहे हैं। इराकी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन तथा तुर्क सत्ता ने इनके ऊपर अमानुषिक अत्याचार किये हैं। इनके लड़ाकू दलों को पेशमरगा कहा जाता है, इसके अलावा कुर्द समाज में महिलाओं का बड़ा ही उच्च स्थान है।

महिला सदस्यः  हम्म... अच्छा, आपकी रुचि संगीत सुनना भी है, किस तरह का संगीत पसंद करते हैं आप- भारतीय या पश्चिमी?

आलोकः
मैम, मुझे पश्चिमी संगीत से परहेज़ तो नहीं है पर मैं ज़्यादातर भारतीय संगीत ही सुनता हूँ।

महिला सदस्यः आपके प्रिय गायक अथवा गायिका?

आलोकः मैम एक नाम तो बताना मुश्किल है, पर मैं पं. भीमसेन जोशी, पं. जसराज, लता, किशोर, मन्ना डे को काफी पसंद करता हूँ।

महिला सदस्यः  (प्रशंसा के भाव से) आपका चयन तो बड़ा गंभीर किस्म का है। अच्छा, आप उत्तर प्रदेश से हैं, वहाँ समय-समय पर राज्य विभाजन की मांग की जाती रही है, क्या वाकई उत्तर प्रदेश को कुछ और भागों में बाँटने की ज़रूरत है?

आलोकः मैम, मेरी राय ये है कि उत्तर प्रदेश  का विभाजन ही यहाँ की समस्याओं का एकमात्र हल नहीं है। देखा जाए तो बुंदेलखंड लगातार सूखे और अकाल का सामना कर रहा है, पर एक तो बुंदेलखंड का प्रश्न उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश दोनों राज्यों का है तथा दूसरा यह कि गैर-ज़िम्मेदार और असंवेदनशील तंत्र, अदूरदर्शी विकास योजनाओं तथा तात्कालिक उपायों ने उस क्षेत्र की दुर्दशा की है। पूर्वांचल में कानून एवं व्यवस्था की समस्या के साथ-साथ, बिजली, सड़क और शिक्षा की गुणवत्ता की दिक्कतें हैं... हरित प्रदेश की मांग किसानों से जुड़ी है किंतु यह मुझे राजनीति से प्रेरित लगती हैं। मैम, मुझे नहीं लगता कि नेतृत्व का यही स्तर रहा तो नए राज्य बनने के बावजूद कुछ बदलेगा। इसलिये मैं नए राज्यों के नहीं बल्कि नए संवेदनशील, समावेशी तथा समग्र रवैये का पक्षधर हूँ।

महिला सदस्यः  आपकी रुचियों में स्वतंत्र अध्ययन एवं फिल्में देखना शामिल रहा है। फिल्मों में और साहित्य में आपको अब तक सबसे मज़बूत महिला पात्र कौन-सी लगीं?

आलोकः मैम, फिल्मों में तो किसी एक पात्र के बारे में कहना बहुत मुश्किल है। हिन्दी फिल्मों में मदर इंडिया, मिर्च मसाला, अर्थ, कहानी जैसी फिल्मों और हॉलीवुड में एरिन ब्रोकोविच, मिलियन डॉलर बेबी और फ्रीडा जैसी फिल्मों की महिला पात्रों ने बहुत प्रभावित किया। साहित्य में इधर प्रतिभा राय की द्रौपदी ने बहुत प्रभावित किया। इसके अलावा टैगोर की ‘चारूलता’ ने भी प्रभावित किया।

महिला सदस्यः (बात को बीच में काटते हुए)... आपने नारीवादी लेखन को पढ़ा है?

आलोकः जी मैम, ज़्यादा  तो नहीं लेकिन साइमन दि बुआर, जर्मेन ग्रियर, वर्जीनिया वुल्फ, राधा कुमार और प्रभा खेतान वगैरह को पढ़ा है।

महिला सदस्यः लिंग विशिष्टता से आपका क्या अभिप्राय है?

आलोकः मैम, स्त्रियों की अपनी विशिष्ट लैंगिक स्थिति की वज़ह से पुरुषों से उनकी समस्याएँ भिन्न हैं, जैसे कि पुरुषों को गर्भ धारण नहीं करना पड़ता, सेक्सुअल टॉर्चर का सामना नहीं करना पड़ता, वे रात-बेरात कहीं भी आ जा सकते हैं। ऐसे में स्त्रियों की मांग रही है कि केवल लिंग समानता उनकी समस्या का हल नहीं है, इसके लिये लिंग विशिष्टता को बढ़ावा देना ज़रूरी है।
(महिला सदस्य चेयरमैन की तरफ संतुष्ट नज़र से देखती हैं और चेयरमैन सदस्य-2 की ओर संकेत करते हैं)।

सदस्य-2: आपने बताया कि आपकी अभिरुचि स्वतंत्र अध्ययन भी है। अभी हाल-फिलहाल में कौन-सी पुस्तक पढ़ी है आपने?

आलोकः जी, स्टीफन हॉकिंग की ‘द थ्योरी ऑफ एवरीथिंग’।

सदस्य-2:  क्या विषयवस्तु है इसमें?

आलोकः सर, यह पुस्तक मूलतः स्ट्रिंग थ्योरी के बारे में है... दरअसल सैद्धांतिक भौतिकी में यह लोकप्रिय विचार हमेशा से रहा है कि ऐसा कोई सिद्धांत गढ़ा जाना चाहिये जो हमारे भौतिक ब्रह्मांड में घटित होने वाली हर घटना को वैज्ञानिक दृष्टि से समझने की क्षमता प्रदान करे। अगर ऐसा कोई सिद्धांत हो तो प्रयोगों की पहले से सही भविष्यवाणी संभव रहे। वस्तुतः हॉकिंग स्ट्रिंग सिद्धांत में ऐसी संभावना खोजते हैं जो क्वांटम मैकेनिक्स और 
थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी के बीच तालमेल भी बनाती है। स्ट्रिंग सिद्धांत के अनुसार परमाणु में स्थित मूलभूत कण, जैसे इलेक्ट्रॉन, क्वार्क वगैरह बिंदु कणों के रूप में नहीं हैं अर्थात् इनकी विमा शून्य नहीं है, बल्कि वे एक-विमीय स्ट्रिंगों से बने हुए हैं।

सदस्य-2: (बीच में टोकते हुए) अच्छा आप क्या मानते हैं, ऐसा कोई सिद्धांत हो सकता है?

आलोकः (मुस्कुराते हुए) सर, उस बारे में मैं कुछ भी कहने मैं समर्थ नहीं हूँ, हाँ जिज्ञासु रहता हूँ बस।

सदस्य-2:  इस पर कोई फिल्म भी बनी है क्या?

आलोकः फिलहाल बनी तो नहीं है पर शायद ऐसी कोई योजना है, संभवतः वह स्टीफन हॉकिंग के जीवन पर होगी।

सदस्य-2: आप साइंस फिक्शंस पसंद करते हैं?

आलोकः
हाँ सर, पर पढ़ना नहीं, बस देखना।

सदस्य-2: अच्छा, कुछ फिल्मों के बारे में बताएँ।

आलोकः सर, 2001 ए स्पेस ओडिसी, स्टार वार्स, एलियन्स, द मैट्रिक्स, क्लोज़ इनकाउंटर्स, मैड मैक्स, अवतार आदि फिल्में याद आ रही हैं।

सदस्य-2:  आपने जुरासिक पार्क सीरीज़ का नाम नहीं लिया?

आलोकः हाँ सर, कई नाम छूट रहे थे।

सदस्य-2: : इनमें से कोई फिल्म भारत में नहीं बनी है, भारत में विज्ञान फिल्में नहीं बनतीं क्या?

आलोकः
सर, मुझे तो याद नहीं आ रही... दक्षिण में कुछ बनी हैं, जो दुर्भाग्य से मैंने देखी नहीं हैं।

सदस्य-2: अच्छा आलोक जी, आपने तकनीकी शिक्षा भी ली और अब मानविकी में भी शोधरत हैं... मैं आपसे यह जानना चाहता हूँ कि क्या कोई ऐसी समस्या है जो दोनों ही जगहों पर हो?

आलोकः हाँ सर, दोनों जगह शोध कार्य में जड़ता का ही साम्राज्य लगता है। हमारे तकनीकी संस्थान तथा IIT जैसे बड़े संस्थान भी शोध क्षेत्र की जड़ता के शिकार हैं, मानविकी क्षेत्र में तो बहुत दुःखद स्थितियाँ हैं। सर, शोध क्षेत्र की दुर्दशा मैंने दोनों जगह समान रूप से महसूस की।

सदस्य-2: (मुस्कुराते हुए) आप तो जड़ता के शिकार नहीं हुए हैं?

आलोकः सर, मैंने यही सब देखकर ऐसा विषय चुना है जिसमें शोध करने में चुनौती भी है और उस शोध के निष्कर्षों का महत्त्व भी हो सकता है। 

सदस्य-2:  तो आपने मूलनिवासी सिद्धांत को अपने शोध के दायरे में रखा है?

आलोकः
हाँ सर, व्यक्तिगत रूप से इस बारे में मेरे ज्ञान का क्षेत्र अभी बहुत संकरा है पर मैं मूलनिवासी जैसे किसी विचार से सहमत नहीं हो पाता, क्योंकि दुनिया की सबसे विश्वसनीय मानवशास्त्रीय परियोजनाएँ बताती हैं कि अफ्रीका के बुशमैन जैसे कुछ कबीलों को छोड़कर कोई कहीं का मूलनिवासी नहीं है,
सभी आप्रवासी हैं। फर्क इतना ही है कि कोई 5 लाख साल पहले आया तो कोई 5 हज़ार... लेकिन सवाल ये है कि मूलनिवासी होने के लिये कितने वर्ष की अवधि होनी चाहिये, यह अनिश्चित है।

सदस्य-2: हम्म... आपने तो इसकी बड़ी अनोखी कहानी बताई... इसका मतलब आप मूलनिवासी सिद्धांत को नहीं मानते?

आलोकः हाँ सर, अभी तक मेरी जानकारी का जो स्तर है, मैं नहीं मानता। इसके बारे में मैंने नेशनल ज्योग्राफिक चैनल पर एक सीरीज़ भी देखी थी जो येल-स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी की एक एंथ्रोपोलॉजिकल रिसर्च पर आधारित थी।

सदस्य-2:  तो आदिवासी शब्द ठीक है क्या? (थोड़ा व्यंग्यात्मक स्वर में)

आलोकः
हाँ-हाँ सर, आदिवासी शब्द से कोई दिक्कत नहीं है क्योंकि कहीं का आदिम निवासी होने में कोई अनैतिहासिक दावा नहीं छिपा होता।
(सदस्य-2 चेयरमैन की तरफ देखते हैं, और चेयरमैन सदस्य-3 की तरफ मुखातिब होते हैं)।

सदस्य-3:
अच्छा आलोक जी, आपको वित्त मंत्रालय में सचिव बना दिया जाए तो आप फिलहाल किन चीज़ों पर काम करना चाहेंगे?

आलोकः सर, फिलहाल अमेरिका एवं यूरोप में जो वित्तीय अस्थिरता का माहौल है उससे भारतीय अर्थव्यवस्था को बचाए रखना मेरी पहली प्राथमिकता होगी।

सदस्य-3:
 क्या वज़हें रही हैं इस संकट की?

आलोकः
सर, यह संकट अमेरिका में लिक्वीडिटी की कमी से पैदा हुआ, जो बड़ी वित्तीय संस्थाओं के पतन, बैंकों के संकट एवं शेयर बाज़ारों में गिरावट के रूप में सामने आया। कहा गया कि 1930 की महामंदी के बाद यह सबसे बड़ा संकट है।

सदस्य-3: ये ऑक्युपाई वॉल-स्ट्रीट आंदोलन क्या था?

आलोकः सर, यह अमेरिकी वित्तीय मंदी के बाद उपजी बेरोज़गारी और गिरते जीवन स्तर की प्रतिक्रिया में सामने आया आंदोलन था, जो इन चीज़ों के लिये ‘क्रोनी पूंजीवाद’ को ज़िम्मेदार मानता था।

सदस्य-3: अच्छा... आपने प्राचीन इतिहास व पुरातत्त्व से परास्नातक भी कर रखा है। कुछ लोग हड़प्पा सभ्यता का नाम बदलकर सरस्वती सभ्यता करना चाहते हैं... इस बारे में अपनी राय दीजिये?

आलोकः हाँ सर, मैंने भी अखबारों एवं पत्रिकाओं में पढ़ा है इस बारे में। इसलिये मैंने इस मुद्दे को अपनी शोध योजना में शामिल किया है, लेकिन सर अभी मैं इसके बारे में कुछ ज़्यादा  नहीं जान पाया हूँ, इसलिये निर्णायक रूप से कुछ नहीं कह सकता।

सदस्य-3: अच्छा... आपकी एक हॉबी फुटबॉल है; फुटबॉल खेलना या देखना?

आलोकः सर दोनों।

सदस्य-3: तब तो आप भारतीय टीम को देखकर बड़े निराश होते होंगे? क्या कारण है कि भारत गुआम और जिबूती जैसे देशों से भी फुटबॉल में हार जाता है?

आलोकः
हाँ सर, यह सब बड़ा निराशाजनक है कि 1 अरब लोगों से अधिक जनसंख्या वाला देश 130वें स्थान के आसपास रहे... पर मुझे लगता है कि भारत के स्कूलों का ढाँचा और भारत की मानसूनी जलवायु में उपजने वाला सर्वव्यापी अमीबा इस दुर्दशा के सबसे बड़े ज़िम्मेदार हैं। स्कूली फुटबॉल की प्रतिस्पर्द्धा के बगैर हमारे पास अच्छे खिलाड़ियों का पूल नहीं रहता, ऊपर से अमीबा की उपस्थिति की वज़ह से हमारी फिटनेस अन्य देशों की तुलना में कमज़ोर होती है।

सदस्य-3:
 यह अमीबा वाली बात क्या वैज्ञानिक है?

आलोकः सर, एक खिलाड़ी होने के नाते तो मैं यह कह सकता हूँ कि स्टेमिना के मामले में हम यूरोपीय, लैटिन अमेरिकी ही नहीं अफ्रीकी तथा अन्य एशियाई देशों से भी पिछड़े हैं, जो मानसूनी जलवायु के नहीं हैं। वस्तुतः मैंने यह बात खेलों के विषय पर हुए एक सेमिनार में सुनी थी, पर मैंने उसकी तथ्यात्मक रूप से पुष्टि तो नहीं की, लेकिन बात मुझे ठीक लगी।
(इस बीच चेयरमैन सर मुखातिब होते हैं, और मेरे सुखद भविष्य के लिये शुभकामनाएँ देते हैं, फिर अचानक पूछ लेते हैं...)

चेयरमैनः
आलोक जी, आप साल भर बाद इसी वक्त क्या कर रहे होंगे?

आलोकः
सर, आप गुरुजनों की कृपा दृष्टि होगी तो मैं सिविल सेवा में रहूंगा और अगर आपकी नज़र में इस बार अयोग्य रहा तो अपनी कमियों में सुधार करके मैं पुनः अगले वर्ष आपके समक्ष प्रस्तुत हो जाऊंगा (बोर्ड मेरे अभिवादन का जवाब देता है, मैं बोर्ड की अनुमति लेकर बाहर आता हूँ। बाहर निकलता हूँ तो चौथे नम्बर के प्रतियोगी अभिषेक रंजन घबराए हुए से अपनी टाई संभालते हुए मिले। मैंने उनको मुस्कुराहट के साथ प्रत्युत्तर दिया व शुभकामना दी। फिर अपना टी.ए. लेने एकाउंट सेक्शन चला गया।)  

मॉक इंटरव्यू का मूल्यांकन

आलोक एक पूर्व चयनित प्रत्याशी हैं जिन्होंने हिन्दी माध्यम से उच्च स्थान प्राप्त किया। हालाँकि वे इंटरव्यू में अपेक्षाकृत उतने अंक नहीं प्राप्त कर सके जितना वे डिज़र्व करते थे। उन्हें 300 में से 165 अंक मिले थे, इसकी वज़ह व्यक्तित्व एवं पृष्ठभूमि में छिपी थी। कहीं-कहीं तो उनका मंच प्रेमी होना (नेतागिरी की छिपी आकांक्षा के संदर्भ में) और एक जगह पहले से ही चयन हो जाने की वज़ह से अति आत्मविश्वासी होना (हालाँकि शुक्र रहा कि यह दंभ में नहीं बदला)। हालाँकि ऐसी आम धारणा है कि यूपीएससी के इंटरव्यू में आपको कुछ छिपाना नहीं चाहिये और अपना ‘नेचुरल परफॉरमेंस’ देना चाहिये। फिर भी आलोक ने अपनी सबसे बड़ी हॉबी क्रिकेट को छिपाए रखा और साथ ही अपने राजनैतिक रुझान को भी ज़ाहिर नहीं होने दिया। उनके उत्तरों में कहीं-कहीं सतर्क वस्तुनिष्ठता दिखी तो कहीं-कहीं बेफिक्री (उसे लापरवाही नहीं कह सकते)। शायद इसका कारण यही था कि वे ‘करो या मरो’ की स्थिति में नहीं थे, क्योंकि वे पहले से चयनित थे। हालाँकि उन्होंने कहीं सीमा तो नहीं लांघी (वे इस बारे में सचेत थे) पर वे चाहते तो ज़्यादा  सतर्क उत्तर दे सकते थे।

आलोक के इंटरव्यू की सकारात्मक बातें

1. आलोक का तनावरहित होना, आत्मविश्वास से युक्त होना उनकी एक बड़ी पूंजी है। वे खुद तो तनावरहित हैं ही, साथ ही दूसरों का भी तनाव दूर करने के लिये प्रयासरत दिखते हैं। यूपीएससी में पहले इंटरव्यू का उन्हें वह तनाव नहीं था जो आमतौर पर सामान्यतः लोगों पर हावी रहता है, इसलिये ज़्यादातर मामलों में उनके उत्तर सधे हुए, संक्षिप्त एवं प्रभावी थे।


2. आलोक ने बड़ी ईमानदारी व बेलाग ढंग से हिन्दी माध्यम व मानविकी पृष्ठभूमि चुनने के बारे में अपना पक्ष रखा। इसके लिये उन्होंने घुमा-फिराकर बातें नहीं की; जो सच था उसे सधे रूप में सामने रख दिया। हालाँकि इस मामले में उन्हें बोर्ड से सहयोग मिला और टेढ़े सवालों का सामना नहीं करना पड़ा। बोर्ड चाहता तो उनसे पूछ सकता था कि एक राष्ट्रीय संस्थान से बी.टेक. की डिग्री लेने के बाद वे फिजिक्स व मैथ्स जैसे विषय भी चुन सकते थे, पर उन्होंने मानविकी ही क्यों चुना? अच्छा रहा कि बोर्ड ने इस मुद्दे को ज़्यादा  तूल नहीं दिया (या फिर आलोक की साफगोई उन्हें छू गई हो और उन्होंने यह मुद्दा न खींचने का मन बना लिया हो)।

3. आलोक ने सरल शब्दों में संक्षिप्त जवाब दिये, जो एक प्रभावी तरीका है। बस ग्रामीण BPO वाले मुद्दे को छोड़कर (जिसे उन्होंने थोड़ा घुमाया फिराया था और मूल मुद्दे पर सॉरी बोलकर काम चला लिया) उन्होंने स्पष्टवादिता भरे एवं संक्षिप्त उत्तर दिये।

4. आलोक की रुचियाँ विविध एवं परिष्कृत हैं, यह बात उनके जवाबों से कोई भी जान सकता है। यह उनके पक्ष में सबसे अच्छी चीज़ों में से एक है। आमतौर पर यूपीएससी के ‘व्यक्तित्व परीक्षण’ में यह चीज़ बहुत निर्णायक प्रकृति की हो सकती है, अगर इन रुचियों के साथ आपमें ऐसी कोई कमज़ोरी नहीं है जो बोर्ड में नकारात्मकता भर दे।

5. आलोक के सामने ‘करो या मरो’ का प्रश्न नहीं है क्योंकि वे UPPCS में पहले से ही चयनित हैं। साथ ही, विकल्प के तौर पर उनके पास इंजीनियरिंग का कॅरियर भी है। उनकी इस विशेष स्थिति ने उन्हें काफी रिलैक्स कर रखा है। हालाँकि यह स्थिति दोधारी तलवार जैसी भी है।

6. आलोक ने इंजीनियरिंग छोड़कर प्रशासनिक सेवा में आने के बारे में बड़ा प्रभावी उत्तर दिया। निश्चित रूप से इस उत्तर ने बोर्ड को प्रभावित किया होगा। अगर यहाँ वे आदर्शवादी बातें दुहराते तो, उतने प्रभावी नहीं हो सकते थे।

7. नेपाल, भारत तथा चीन के त्रिकोणीय संबंधों के बारे में आलोक का उत्तर बड़ा ही संतुलित और यथास्थिति के करीब था। इससे बोर्ड को राजनैतिक स्थितियों और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति पर उनकी अच्छी पकड़ का संकेत मिला होगा।

8. स्वतंत्र अध्ययन की अपनी हॉबी के बारे में आलोक ने काफी स्पष्ट एवं आत्मविश्वास से युक्त जवाब दिया। महिला सदस्य को लिंग विशिष्टता पर दिया गया उत्तर वाकई बेहद प्रभावशाली था।

9. फिल्म और संगीत संबंधी प्रश्नों के भी आलोक ने अच्छे जवाब दिये। साइंस फिक्शन वाली फिल्मों में एक भी भारतीय फिल्म का नाम याद न होना थोड़ी अखरने वाली बात हो सकती थी, पर यह कहकर कि फिल्में तो बनी हैं पर दुर्भाग्य से मैं देख नहीं पाया हूँ, उन्होंने नकारात्मक हो सकने वाले प्रभाव को दूर कर दिया।

10. ‘स्ट्रिंग 
थ्योरी’ को इतने सरलतम तरीके से समझाना आलोक के साक्षात्कार की एक और उपलब्धि रही। इसके अलावा, कुर्द समस्या पर भी काफी गहराई से उत्तर देकर उन्होंने अपनी अंतर्राष्ट्रीय राजनीति व इतिहास की समझ का परिचय दिया। उन्होंने तकनीकी फील्ड छोड़कर मानविकी लेने के कारण को भी व्यावहारिक नज़रिये से स्पष्ट किया, बोर्ड ने निश्चय ही उनके इस रुख को सराहा होगा।

आलोक के इंटरव्यू की कुछ नकारात्मक बातें

1. आलोक के इंटरव्यू में जो नकारात्मक पक्ष हैं उन्हें अगर थोड़े मानवीय पहलू की तरह लें, तो ये नकारात्मक पहलू भी आलोक के बेबाकपन, ईमानदारी और सहजता के रूप में लिये जा सकते हैं। यह आवश्यक नहीं कि सिविल सेवा परीक्षा का एक अभ्यर्थी अपने-आप में परिपूर्ण हो। उसमें सहज मानवीय कमज़ोरियों की उपस्थिति तब तक क्षम्य है जब तक कि व्यक्तित्व की नकारात्मकताएँ हावी न दिखें।


2. यूँ तो आलोक के साक्षात्कार के दौरान सकारात्मक बातें ज़्यादा देखी गईं पर कहीं-कहीं अपने अति आत्मविश्वास, बेलागपन एवं अपनी कुछ पूर्वधारणाओं की वज़ह से आलोक से कुछ गलतियाँ भी हुईं। खासकर शोध कार्य के बारे में उनका कमेंट, मूलनिवासी सिद्धांत को खारिज़ करने, उत्तर प्रदेश के विभाजन और फुटबॉल में अमीबा प्रकरण आदि पर उनके उत्तर संतुलित नहीं दिखे।

3. ग्रामीण क्षेत्र के BPO के बारे में पूछने पर उन्होंने गाँव के लिये सूचना क्रांति के लाभ गिनाने शुरू कर दिये तथा ग्रामीण BPO के बारे में माफी मांगकर काम चला लिया। इलेक्ट्रॉनिक्स व कम्यूनिकेशन में बी.टेक. होने की वज़ह से इस प्रश्न पर उनका उत्तर और भी अनपेक्षित था। बेहतर होता वे इसके बारे में शुरुआत में ही अनभिज्ञता प्रदर्शित करके क्षमा मांग लेते।

4. उत्तर प्रदेश के विभाजन के मसले पर खासकर हरित प्रदेश व पूर्वांचल की मांग को पूरी तरह से खारिज करके और शेष में अड़चनें बताकर उन्होंने अखंड उत्तर प्रदेश के प्रति एक तरह से प्रतिबद्धता ही प्रदर्शित कर दी; यह कदम व्यावहारिक न था। अगर वे चाहते तो इन सभी राज्यों की मांगों के पीछे के कारकों को रेखांकित करके तथा उनके बनने की राजनैतिक-संवैधानिक अड़चनों को दिखाकर खुद को तटस्थ रख सकते थे। उनके लिये यही सबसे उचित स्थिति होती। व्यावहारिक धरातल पर देखें तो यह प्रश्न इतना राजनैतिक हो गया है कि इस तरह की असावधानी सिविल सेवा के उम्मीदवार से अपेक्षित नहीं होती है।

5. खुद शोध छात्र होते हुए भारतीय विश्वविद्यालयों व संस्थानों में संपूर्ण शोधकार्य को जड़ता व दुहराव से प्रभावित बताकर आलोक ने भले ही कुछ हद तक सही बात कही हो; पर थी यह अतिवादी। किसी भी अभ्यर्थी को ऐसे फतवे देने से बचना चाहिये। हद तो तब हो गई जब अपने शोध विषय को उन्होंने ‘जड़ता मुक्त’ घोषित कर एक तरह से अहंकार प्रदर्शन भी कर दिया। वस्तुतः पूरे इंटरव्यू के दौरान यह सबसे कमज़ोर क्षण था जिसने आलोक के प्रति सहानुभूति को अवश्य कम किया होगा।

6. मूलनिवासी सिद्धांत के मामले में वे मुद्दे को इस तरह से भी प्रस्तुत कर सकते थे जिसमें वे तटस्थ समीक्षक की भूमिका निभा सकें, पर इस बारे में अपनी राय को (भले ही वह कुछ शोध निष्कर्षों का सहारा लेकर बनाई गई हो) इस तरह से प्रस्तुत करके इस संवेदनशील मुद्दे में एक पक्षकार बन जाना, यह बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय नहीं था। अभ्यर्थियों को ऐसे अवसरों पर विद्वान बनने से बचना चाहिये तथा महज़ जिज्ञासु अध्येता के रूप में अपने को विनम्रता के साथ प्रस्तुत करना चाहिये। शोध मामले के साथ-साथ मूलनिवासी मामले में आलोक द्वारा काफी हद तक बौद्धिक अनुशासन की सीमा लांघी गई। इसने निश्चय ही कुछ नकारात्मक प्रभाव पैदा किया होगा।

7. आलोक ने फुटबॉल में भारत की कमज़ोरी का एक कारण अमीबा को घोषित करके सदस्यों के चेहरे पर व्यंग्यात्मक मुस्कान ला दी। हालाँकि इससे बड़े कारण भी मौजूद थे, जैसे खेल संघों पर राजनेताओं का वर्चस्व, भारत में फुटबॉल संस्कृति का न होना इत्यादि; पर संदिग्ध स्रोतों के आधार पर अमीबा को स्टेमिना की कमी का कारण बताना एक बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय नहीं था।

व्यक्ति हर इंटरव्यू से कुछ-न-कुछ सीख सकता है। आलोक कुमार जो आईआरएस (IRS) के लिये चयनित हुए, उनके इंटरव्यू से भी काफी कुछ सीखा जा सकता है। पहली बात यही कि थोड़े से बेबाकपन एवं अधैर्य ने उन्हें प्रॉपर IAS बनने से वंचित कर दिया, जिसके लिये उन्हें एक और प्रयास करना पड़ा और अपनी कमियों को दूर कर अगले प्रयास में वे IAS बने थे। आलोक को इस साक्षात्कार में 300 में से 165 अंक मिले जो 55% अंक होते हैं। हालाँकि अगर उन्होंने कुछ सावधानियाँ बरती होतीं तो वे 30 से 35 अंक और बढ़ा सकते थे। वैसे यह भी मामूली बात नहीं थी कि उनसे करीब 45-50 प्रश्न पूछे गए, उनमें से 90% अवसरों पर उन्होंने सटीक एवं उपयुक्त जवाब दिये। हाँ, वे थोड़ी और सकारात्मक रणनीति बनाते तो जो थोड़ा-बहुत भी नकारात्मक प्रभाव गया, उससे भी बच सकते थे। आलोक के साक्षात्कार में इसी तरह विशेष रूप से गौर करने लायक बात ये है कि कुछेक प्रश्नों को छोड़कर बोर्ड ने उनसे प्रश्नों को गहराई से छानबीन करते हुए नहीं पूछा, जबकि आमतौर पर यूपीएससी में ऐसा नहीं होता है। इसके दो कारण हो सकते हैं- पहला कारण सकारात्मक है कि बोर्ड को शुरुआत में ही (अच्छी शुरुआत के कारण) आलोक पर विश्वास हो गया था, इसलिये वे बस उनके व्यक्तित्व के विभिन्न आयामों को जानना चाहते थे, वे आलोक की गंभीरता को लेकर पहले ही आश्वस्त हो चुके थे। दूसरा कारण नकारात्मक हो सकता है; हो सकता है कि बोर्ड यह मानकर चल रहा हो कि आलोक कुमार हैं तो ऑल-राउंडर पर उनसे ज़्यादा  गंभीरता की अपेक्षा नहीं करनी चाहिये। हालाँकि बोर्ड का उनके प्रति जो रवैया रहा उससे लगता है कि सकारात्मक कारण ही प्रभावी रहा होगा, क्योंकि आलोक के कुछ गैर-गंभीर प्रकृति के उत्तरों पर भी बोर्ड की ज़्यादा  विपरीत प्रतिक्रिया नहीं हुई।

आलोक के साक्षात्कार में जो भी ‘गलतियाँ’ हुईं, वे ऐसी हैं जो दूर की जा सकती हैं। ऐसी चीज़ों के प्रति सतर्क रहकर जब उन्होंने अगले साल इंटरव्यू दिया तो उन्हें 205 अंक मिले। ज़ाहिर है कि इंटरव्यू की प्रक्रिया ‘व्यक्तित्व परीक्षण’ तो है ही, पर व्यक्तित्व की खामियों को अपने तथा दूसरे के अनुभवों से सीखकर दूर भी किया जा सकता है। सफल (तथा असफल भी) अभ्यर्थियों के साक्षात्कार इस कड़ी में सबसे ज़्यादा  महत्त्वपूर्ण होते हैं, वे साक्षात्कार का माहौल तो प्रस्तुत करते ही हैं, साथ ही उस बौद्धिक स्तर को उद्घाटित भी करते हैं जिसकी प्राप्ति करने के बाद हम सफलता का वरण कर सकते हैं।


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