Drishti IAS
Request call
call 87501 87501 LoginRegister
call 87501 87501 or 011-47532596

नैतिकता, सत्यनिष्ठा और अभिवृत्ति Hits:56920

केस स्टडी क्या है(What is Case Study)?

केस स्टडी इस प्रश्न-पत्र के पूरे पाठ्यक्रम का अनुप्रयुक्त रूप (Applied form) है। यह इकाई पाठ्यक्रम की अन्य इकाइयों की तरह स्वतंत्र अस्तित्व नहीं रखती बल्कि सभी इकाइयों का सम्मिलित रूप है। केस स्टडी से संबंधित प्रश्न हल करने के लिए आवश्यक है कि पहली सात इकाइयों की अध्ययन सामग्री आपकी विचार प्रक्रिया का अंग बन जाए। विचार प्रक्रिया का अंग बनने का अर्थ है कि जब कोई केस स्टडी आपके सामने आये तो यह सोचने की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिए कि इसे टीलियोलॉजी से करना है या डीआन्टोलॉजी से। बल्कि केस स्टडी का जो हल आप निकालें उसे अपने आप उपयुक्त विचारधारा के संगत होना चाहिए।

इस प्रश्न-पत्र में बेहतर अंक लाने का सबसे अच्छा तरीका है इसके पाठ्यक्रम में पढ़ी हुई बातों को जीवन में लागू करके देखना। अपने आस-पास की परिस्थितियों व घटनाओं पर गौर करें और विभिन्न लोगों (स्वयं, मित्र, माता-पिता, भाई-बहन) के निर्णयों का विश्लेषण करें। क्या इनके द्वारा लिए गए विभिन्न निर्णय नैतिक दृष्टि से उचित हैं? यदि निर्णयों में औचित्य का अभाव है या वे अनैतिक हैं तो निर्णय को प्रभावित करने वाली परिस्थितियों पर विचार कीजिए। ऐसे कौन से कारक हैं जो व्यक्तियों को अनैतिक निर्णय लेने के लिए बाध्य करते हैं और आप स्वयं ऐसे दबावों से किस हद तक मुक्त हैं? केस स्टडी का हल आपको प्रायः ऐसे ही प्रश्नों से टकराते हुए खोजना होगा।

केस स्टडी को हल करने की रणनीति :

1. कृत्य अथवा घटना की परिस्थिति तथा उसके प्रभाव का विश्लेषण करना चाहिए। जैसे-

(i) अनैतिक कार्य किया जा चुका है या किया जा रहा है या बाद में होने वाला है। यदि कार्य किया जा रहा है या होने वाला है तो कृत्य को रोकने के उपाय प्राथमिक होंगे परंतु अगर घटना हो चुकी है तो उसके प्रभाव का प्रबंधन प्राथमिकता में होगा।

(ii) जिस व्यक्ति ने कार्य किया क्या उसकी परिस्थितियाँ बाध्यकारी थीं या वह अनुकूल परिस्थितियों के बावजूद ऐसा कर रहा था। परिस्थितियों के अनुरूप दण्ड में कठोरता या विनम्रता का समावेश होना चाहिए।


(iii) कार्य का प्रभाव किस पर पड़ा और कितना पड़ा? यदि किए गए कार्य से कर्ता की ही हानि हुई है तो विशेष कार्यवाही की आवश्यकता नहीं है। कई मामलों में तो कर्ता दया का पात्र भी हो सकता है। अगर प्रभाव किसी अन्य व्यक्ति पर हुआ है तो स्थिति को गम्भीरता से लेना होगा। अगर कार्य का प्रभाव अतिव्यापक रूप से समाज पर हुआ है तो यह अति गम्भीर मामला बनता है। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि प्रभाव का स्तर क्या है? जैसे यदि कार्य से किसी व्यक्ति अथवा समाज के अस्तित्व को चुनौती मिलती है तो अति गंभीर मामला बनता है परंतु यदि कार्य से केवल साधारण स्तर पर थोड़ा बहुत प्रभाव पड़ रहा है जैसे किसी कक्षा में बच्चे का चिल्लाना, तो हल्के उपायों से ही समाधान किया जाना चाहिए।


(iv) कर्ता की परिस्थितियों में उसकी आयु पृष्ठभूमि तथा तात्कालिक परिस्थितियों पर ध्यान दें। यदि तात्कालिक परिस्थितियाँ कठिन हैं तो यह ध्यान दें कि उनके पीछे उसकी स्वयं की जिम्मेदारी कितनी बनती है।

2. निर्णयकर्ता के सामने कौन-कौन से नैतिक विकल्प उपलब्ध हैं उनकी सूची बनाएँ। कदम दर कदम (Step by Step) सोचते हुए अधिकतम विकल्पों पर विचार करें।

3. विभिन्न नैतिक विकल्पों को अपनाने से होने वाले संभावित परिणामों पर विचार करें। यह विचार अल्पकालिक तथा दीर्घ कालिक दोनों दृष्टियों से होना चाहिए। यह भी सोचना चाहिए कि नैतिक विकल्प का परिणाम हमारे उद्देश्य से सुसंगत होगा कि नहीं। परिणाम पर विचार करने के कुछ आधार हैंः

(i) कर्ता पर प्रभाव।

(ii) जिसके साथ कृत्य हुआ उस पर प्रभाव।


(iii) समाज पर व सामाजिक नैतिकता पर प्रभाव।

4. सर्वाधिक उपयुक्त विकल्प का चयन करनाः

(i) अगर कर्ता में सुधार की संभावना है और उसकी भूल मानवीय भूल है या परिस्थितियों के दबाव पर आधारित है तो प्रयास करना चाहिए कि उसे सुधरने का अवसर अवश्य मिले। स्वयं को उस परिस्थिति में रखकर देखने से बात और साफ हो जाएगी।

(ii) यदि सुधरने की संभावना कम हो या अपराध बार-बार दोहराया जा रहा हो तो दण्ड देना अनिवार्य हो जाता है। किंतु प्रयास करना चाहिए कि दण्ड इतना कठोर न हो कि वह व्यक्ति उससे कभी उबर ही न सके। सिर्फ सोचे समझे तथा अति जघन्य कृत्यों में ही अपूर्णीय क्षति पर आधारित दण्ड देना चाहिए।


(iii) बदला लेना अपने आप में नैतिक मानसिकता का संकेतक नहीं है। इसलिए सिर्फ बदला लेने की भावना से किया गया कोई भी कृत्य अनैतिक माना जाएगा।

(iv) अगर आप कभी चाहें कि दण्ड ऐसा हो जिससे बाकी लोग सबक ले सकें तो इसमें एक नैतिक समस्या पैदा होती है। जिस व्यक्ति को दण्ड दिया जा रहा है वह साधन बन जाता है और जिन व्यक्तियों को सुधारना है वे साध्य बन जाते हैं। किसी मनुष्य के लिए किसी अन्य मनुष्य को साधन बना लेना मूलतः अनैतिक है।

उदाहरणात्मक दण्ड देने के सिद्धांत का प्रयोग एक विशेष तरह से नैतिक हो सकता है। दण्ड ऐसा हो जो कृत्य के अनुपात से ज्यादा न हो, दण्ड सार्वजनिक रूप से न दिया जाए और दण्डित व्यक्ति की पहचान गुप्त रखी जाए पर लोगों को यह बताया जाए कि किसी को उसके अपराध के लिए दण्ड दिया गया है तो दूसरों को सुधारने वाला पक्ष भी नैतिक माना जा सकता है।

5. दण्ड देते समय तीन बातें हमेशा ध्यान में रखनी हैं-

(i) दण्ड कृत्य से अधिक न हो।

(ii) अपराधी को भी जहां तक संभव हो उसकी निजता का अधिकार मिलना चाहिए।


(iii) संबंध निजी है या सार्वजनिक।

केस स्टडी की इस रणनीति को कुछ उदाहरणों के माध्यम से समझना और बेहतर रहेगा।

 

Helpline Number : 87501 87501
To Subscribe Newsletter and Get Updates.
×
Drishti IAS Prelims Test Series 2017 View Details