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  • 10 Nov 2021 सामान्य अध्ययन पेपर 1 इतिहास

    प्रश्न. स्वतंत्रता पश्चात्, विशेषकर 1970 के बाद भारत में हुए महिला आंदोलनों की विभिन्न धाराओं का विश्लेषण कीजिये। (150 शब्द)

    उत्तर

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • भारत में 19वीं शताब्दी से आरंभ हुए महिला आंदोलनों के संदर्भ में संक्षेप में भूमिका लिखिये।
    • स्वतंत्रता के बाद उभरने वाले महिला आंदोलनों की विभिन्न धाराओं की चर्चा कीजिये।
    • 1970 के बाद इन आंदोलनों में हुई उत्तरोत्तर वृद्धि के परिप्रेक्ष्य में चर्चा कीजिये।
    • उपरोक्त संदर्भ में वर्तमान महिला आंदोलनों की प्रवृत्ति को दर्शाते हुए समग्र निष्कर्ष लिखिये।

    महिलाओं की स्वाधीनता सामाजिक आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में इस अर्थ में महत्त्वपूर्ण है कि इसका उद्देश्य समाज की उन संस्थागत व्यवस्थाओं, मूल्यों, रीति-रिवाजों और मान्यताओं में परिवर्तन लाना है, जिन्होंने वर्षों से महिलाओं को अपने अधीन रखा है। 19वीं सदी का भारत कई बुरी सामाजिक कुप्रथाओं से प्रभावित रहा, जैसे- सती प्रथा, बाल विवाह, विधवा पुनर्विवाह पर प्रतिबंध और बहुविवाह आदि।

    उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के शुरुआती आंदोलनों ने इन्हीं सामाजिक मुद्दों को हल करने पर ध्यान केंद्रित किया। राजा राममोहन राय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, ज्योतिबा फुले जैसे सुधारवादियों एवं ब्रह्म समाज, प्रार्थना सभा एवं आर्य समाज जैसी संस्थाओं ने महिलाओं से संबंधित मुद्दों को उठाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 1920 के दशक के बाद से बड़े पैमाने पर लोकप्रिय संघर्षों में महिलाओं द्वारा राजनीतिक भागीदारी ने उनके लिये संभावनाओं के नए द्वार खोले। महिलाओं ने गांधीवादी आंदोलनों से लेकर समाजवादी और कम्युनिस्ट तक राष्ट्रीय आंदोलन की सभी धाराओं में भाग लिया। इसके साथ ही अब वे न केवल 19वीं शताब्दी के न्याय की प्राप्तकर्त्ता थीं, बल्कि राष्ट्रवादी आंदोलन की सक्रिय समर्थक भी बन गईं।

    स्वतंत्रता के पश्चात्

    • स्वतंत्रता के बाद, राष्ट्रीय आंदोलन में विभिन्न राजनीतिक शक्तियों ने अपने तरीके से महिलाओं के आंदोलन को भी विविधता प्रदान की। कई महिला लीडर महिलाओं के कल्याण हेतु आगे आईं एवं शहरों में कामकाजी महिलाओं के छात्रावास और महिलाओं के व्यावसायिक केंद्रों की स्थापना की। हालाँकि, 1950 और 1960 के दशक में महिलाओं के संघर्षों के ज़्यादा प्रमाण नहीं मिलते, यद्यपि इस चरण के दौरान महिलाओं के आंदोलन में सापेक्ष निष्क्रियता को चिह्नित किया गया।
    • 1970-1980 के दशक के अंत में महिलाओं के संघर्ष के पुनरुत्थान और महिलाओं के नए समूहों एवं संगठनों का उद्भव हुआ। उन्नीस के दशक के उत्तरार्द्ध में कई ऐसे महिला संगठन उभरे, जो राजनीतिक दलों या ट्रेड यूनियनों से संबद्ध नहीं थे, जिन्हें ‘स्वायत्त महिला संगठन’ कहा जाता था। उन्होंने पिछले महिला संगठनों द्वारा अपनाए गए ‘कल्याणकारी’ दृष्टिकोण को खारिज कर दिया (जिनमें से कई स्वतंत्रता-पूर्व काल के दौरान स्थापित किये गये थे) और दहेज़ विरोधी, बलात्कार विरोधी, सती प्रथा विरोधी आंदोलन, वनों की कटाई पर रोक एवं पारिस्थितिकी जैसे विशिष्ट मुद्दों पर महिलाओं को एकजुट करने के लिये ‘विरोध की राजनीति’ को अपनाया।
    • हाल के समय में सामूहिक अभियानों से अपेक्षाकृत प्रभावशाली कार्यों में एक स्पष्ट बदलाव आया है, जैसे- महिलाओं के लिये कानूनी सहायता, परामर्श, प्रलेखन, अनुसंधान, प्रकाशन आदि के लिये केंद्र स्थापित करना। इसके साथ ही अन्य लोगों ने पत्रिकाएँ निकालीं, महिलाओं के संदर्भ में अपमानजनक फिल्मों और विज्ञापनों पर मीडिया हितप्रहरी के रूप में कार्रवाई की। महिलाओं के स्वास्थ्य से संबंधित मुद्दों को उठाया, भ्रूणहत्या के खिलाफ अभियान चलाया एवं कन्याओं के अधिकारों के लिये और मलिन बस्तियों में महिलाओं हेतु पानी तथा आवास आदि के लिये अभियान चलाया।
    • महिलाओं के कई समूहों को ऐसा भी लगता है कि महिलाओं की समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करने के साथ-साथ उनकी खुशियों पर भी ध्यान देना आवश्यक है। इसके लिये महिलाओं को संगीत, नृत्य और कला के माध्यम से खुद को अभिव्यक्त करने के लिये प्रोत्साहित करना चाहिये। मी टू, टच द पिकल आदि अभियानों के माध्यम से सोशल मीडिया भी एक बड़े संगठनकर्त्ता के रूप में कार्य कर रहा है और इसने जीवनशैली के संदर्भ में सार्वजनिक एवं व्यक्तिगत स्तर पर जागरूकता भी फैलाई है।

    निष्कर्षत: 19वीं शताब्दी से लेकर अब तक महिलाओं की आकांक्षाओं में काफी बदलाव आया है, किंतु अभी भी इस दिशा में एक लंबा रास्ता तय करना है।

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