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  • 13 Nov 2021 सामान्य अध्ययन पेपर 1 इतिहास

    प्रश्न. 16वीं से 18वीं शताब्दी का साम्राज्यवादी विस्तारवाद 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तथा 20वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध से कैसे भिन्न था?

    उत्तर

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • साम्राज्यवाद शब्द की व्याख्या कीजिये।
    • नव-साम्राज्यवाद, पुराने साम्राज्यवाद से कैसे भिन्न है।
    • विश्व पर साम्राज्यवाद के परिणामों को बताते हुए निष्कर्ष लिखिये।

    साम्राज्यवाद यूरोप द्वारा विकसित व्यापारवादी नीति थी जिसमें क्षेत्रीय और आर्थिक लाभ के लिये एक राष्ट्र की संप्रभुता पर बलपूर्वक विस्तार और अधीनता शामिल थी। यह बल द्वारा किया जाता था और विजित राज्यों पर अंतिम राजनीतिक वर्चस्व इसकी विशेषता थी।

    • एशिया के लिये एक सीधा व्यापारिक मार्ग खोजने के अपने प्रयासों में यूरोपीय राष्ट्रों ने अमेरिका, भारत, दक्षिण अफ्रीका और ईस्ट इंडीज में अपने उपनिवेश स्थापित किये और 16वीं शताब्दी की शुरुआत में अफ्रीका और चीन के तटों के साथ के क्षेत्र भी प्राप्त किये। यह चरण पुराने साम्राज्यवाद के रूप में जाना जाता है। इसी बीच यूरोप की वाणिज्यिक क्रांति ने पूंजी ओर कच्चे माल की नई ज़रूरतों और इच्छाओं को पैदा किया।
    • व्यापारियों ने उपनिवेशों को धन के स्रोत के रूप में बनाए रखा जबकि शासकों, राजनेताओं, खोजकर्ताओं और मिशनरियों के व्यक्तिगत उद्देश्यों ने ‘‘ग्लोरी, गॉड और गोल्ड’’ के शाही विश्वास का समर्थन किया। उन्होंने व्यापारिक चुंगियाँ स्थापित कीं तथा अफ्रीका और चीन के तटों पर पैर जमाने लगे साथ ही यूरोपीय आर्थिक हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये स्थानीय शासकों के साथ मिलकर कार्य किया। पुराने साम्राज्यवाद में प्रमुख भूमिका निभाने वाले राष्ट्रों में स्पेन, पुर्तगाल, नीदरलैंड, प्राँस, ब्रिटेन थे।
    • नव-साम्राज्यवाद
    • 1870 के दशक में शुरू हुए नव-साम्राज्यवाद के युग में, यूरोपीय राज्यों ने मुख्य रूप से अफ्रीका में, साथ ही एशिया और मध्यपूर्व में भी विशाल साम्राज्य स्थापित किये। सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी के तरीकों के विपरीत, नव-साम्राज्यवादियों ने औपनिवेशिक सत्ता के लाभ के लिये देशी क्षेत्रों का प्रशासन स्थापित किया।
    • नव-साम्राज्यवाद एक बड़े आर्थिक उद्देश्य से प्रेरित था। इसमें सस्ते कच्चे माल की आवश्यकता थी जिसमें कीमती धातुएँ, वनस्पति तेल, डाई, कपास ओर भारतीय भांग आदि शामिल हैं।
    • सीमित सैनिक और वित्तीय जोखिम के माध्यम से बड़े मुनाफे प्राप्त करना नव-साम्राज्यवाद की विशेषता थी। जैसा कि पहले वर्णन किया गया है कि उपनिवेशों ने अधिशेष सामग्री हेतु बाज़ार के रूप में सेवाएँ प्रदान की।
    • यूरोपीय राष्ट्रों ने एक आक्रामक विस्तार नीति अपनाई जो आर्थिक आवश्यकताओं से प्रेरित थी तथा औद्योगिक क्रांति द्वारा उत्पन्न हुई थी। 1870 और 1914 के मध्य, यूरोप ‘‘द्वितीय औद्योगिक क्रांति’’ से गुजरा जिसने विज्ञान, प्रौद्योगिकी और उद्योग के रूप में परिवर्तन की गति को तीव्र किया और आर्थिक विकास को गति प्रदान की।
    • रेलमार्ग के विकास, आंतरिक दहन ईंजन और विद्युत शक्ति ने यूरोप की बढ़ती औद्योगिक अर्थव्यवस्था और विस्तार के नए मार्ग तलाशने में योगदान दिया।
    • विस्तार की नीति भी राजनीतिक ज़रूरतों से प्रेरित थी जो राष्ट्रीय महानता के साथ राज्य निर्माण और ‘‘पिछड़े’’ समाजों पर पश्चिमी राज्य की श्रेष्ठता को बढ़ावा देने वाले सामाजिक और धार्मिक कारणों से जुड़ी थी।
    • प्रत्यक्ष सैन्य बल के प्रयोग से तथा आर्थिक प्रभाव क्षेत्र और संयोजन के माध्यम से यूरोपीय देशों ने अफ्रीका और एशिया महाद्वीप पर प्रभुत्व जमाया।

    साम्राज्यवाद, इस प्रकार धोखे, क्रूरता और सशस्त्र शक्ति की कहानी के रूप में समझा जा सकता है। साम्राज्यवादी शक्तियाँ, हालाँकि अन्य देशों और लोगों पर अपनी दासता को सभ्यता के प्रसार के नाम पर सही ठहरा सकती हैं लेकिन नए बाज़ार, कच्चे माल और सस्ते श्रम के लिये उनके उत्साह ने कई छोटे युद्धों और दो विश्व युद्धों को जन्म दिया।

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