प्रिलिम्स फैक्ट्स (30 Mar, 2026)



FATF ने ऑफशोर वर्चुअल एसेट सर्विस प्रोवाइडर्स (VASPs) के विरुद्ध भारत की कार्रवाइयों को रेखांकित किया

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों?

‘ऑफशोर वर्चुअल एसेट सर्विस प्रोवाइडर्स के जोखिमों को समझना और कम करना’ विषय पर मार्च 2026 की FATF रिपोर्ट भारत द्वारा ऑफशोर वर्चुअल एसेट सर्विस प्रोवाइडर्स (oVASP) के विरुद्ध मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवाद वित्तपोषण के जोखिमों को कम करने के लिये उठाए गए सख्त नियामक और प्रवर्तन कदमों को उजागर करती है।

ऑफशोर वर्चुअल एसेट सर्विस प्रोवाइडर्स पर भारत की कार्रवाइयों के संदर्भ में FATF द्वारा रेखांकित मुद्दे क्या हैं?

  • वर्चुअल एसेट लैब: भारत एक विशेषीकृत केंद्र स्थापित कर रहा है जो अनारक्षित और उच्च जोखिम वाले क्रिप्टो प्लेटफॉर्म का पता लगाने के लिये स्वचालित वेब निगरानी, ओपन-सोर्स इंटेलिजेंस और विश्लेषण करेगी।
  • नियामक परिधि और FIU के निर्देश: वित्तीय आसूचना इकाई–भारत (FIU–IND) ने VASP के प्रिंसिपल ऑफिसर्स (PO) के लिये भारत में भौतिक रूप से स्थित होना अनिवार्य कर दिया है, ताकि धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (PMLA, 2002) के अनुपालन के लिये कानूनी जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके।
  • ‘स्कैम कंपाउंड’ के विरुद्ध कार्रवाई: भारतीय एजेंसियाँ, जैसे– राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (NIA), केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) और प्रवर्तन निदेशालय (ED) म्याँमार-थाईलैंड सीमा, कंबोडिया और लाओस में साइबर अपराध केंद्रों की जाँच कर रही हैं, जहाँ तस्करी किये गए नागरिकों को क्रिप्टो से जुड़े स्कैम में शामिल होने के लिये विवश किया गया था।
  • अनुपालनहीन संस्थाओं पर कार्रवाई: सहयोग पोर्टल (जिसे केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा सरकारी एजेंसियों तथा सोशल मीडिया मध्यस्थों के मध्य समन्वय सुदृढ़ करने हेतु प्रारंभ किया गया) के माध्यम से प्राधिकारियों ने गैर-पंजीकृत एवं अनुपालनहीन अपतटीय प्लेटफॉर्मों से संबंधित 85 URL को अवरुद्ध करने के निर्देश दिये हैं।
  • अंतर-एजेंसी समन्वय: वर्ष 2023 में राजस्व विभाग के अंतर्गत स्थापित वर्चुअल एसेट्स कॉन्टैक्ट सब-ग्रुप कानून प्रवर्तन एजेंसियों तथा विनियामक संस्थाओं के मध्य गुप्त सूचनाओं के आदान-प्रदान को सुगम बनाता है, जिससे क्रिप्टो-अपराधों की उभरती प्रवृत्तियों की पहचान की जा सके।
  • विनियामक मध्यस्थता का निराकरण: रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2022 की वर्चुअल परिसंपत्ति कर व्यवस्था के कारण व्यापारिक मात्रा का स्थानांतरण अपतटीय संस्थाओं की ओर हुआ। इसके प्रत्युत्तर में भारत यह सुनिश्चित कर रहा है कि घरेलू उपयोगकर्त्ताओं को सेवाएँ प्रदान करने वाले ऑफशोर वर्चुअल एसेट सर्विस प्रोवाइडर्स (oVASPs), अपनी भौतिक उपस्थिति की परवाह किये बिना, स्थानीय स्तर पर अनिवार्य रूप से पंजीकरण कराएँ।
  • रेड फ्लैग संकेतक: FIU ने बैंकों और पेमेंट गेटवे सहित एक कार्यसमूह का गठन किया है, ताकि ऑफशोर वॉलेट्स से संदिग्ध जमा पैटर्न की पहचान करने के लिये रणनीतियाँ विकसित की जा सकें।

ऑफशोर वर्चुअल एसेट सर्विस प्रोवाइडर्स (oVASPs) क्या हैं?

  • परिचय: oVASPs ऐसी संस्थाएँ हैं, जो आभासी डिजिटल परिसंपत्तियों (जैसे– क्रिप्टोकरेंसी, स्टेबलकॉइन या नॉन-फंजिबल टोकन) से संबंधित सेवाएँ प्रदान करती हैं, हालाँकि इनका मुख्यालय या परिचालन उस देश के अधिकार क्षेत्र से पृथक् होता है।
  • मुख्य कार्य: ये प्लेटफॉर्म आमतौर पर अपने उपयोगकर्त्ताओं के लिये निम्नलिखित भूमिका निभाते हैं:
    • विनिमय (एक्सचेंज): आभासी परिसंपत्तियों (जैसे– बिटकॉइन से एथेरियम) या फिएट करेंसी और आभासी परिसंपत्तियों (जैसे– INR से USDT) के बीच व्यापार की सुविधा प्रदान करना।
    • हस्तांतरण (ट्रांसफर): आभासी परिसंपत्तियों को एक पते या खाते से दूसरे में हस्तांतरित करना। 
    • सुरक्षित रखना/प्रशासन (सेफकीपिंग/एडमिनिस्ट्रेशन): निजी कुंजियों को संगृहीत और प्रबंधित करने के लिये डिजिटल वॉलेट सेवाएँ प्रदान करना।
    • वित्तीय सेवाएँ: किसी जारीकर्त्ता के आभासी परिसंपत्ति के प्रस्ताव या बिक्री से संबंधित वित्तीय सेवाओं में भाग लेना।
  • संबद्ध चुनौतियाँ: इन संस्थाओं को वित्तीय कार्रवाई कार्यबल (FATF) और भारत की वित्तीय खुफिया इकाई (FIU) जैसे नियामकों द्वारा उजागर किया जाता है, इसमें "रेगुलेटरी अर्बिट्रेज” प्राथमिक कारण है। यह तब होता है जब:
    • क्षेत्राधिकार संबंधी अंतराल: डिजिटल प्लेटफॉर्म अक्सर उन देशों से संचालित होते हैं जहाँ एंटी मनी लॉन्ड्रिंग (AML) या आतंकरोधी वित्तपोषण (CFT) से संबंधित कानून अपेक्षाकृत शिथिल होते हैं।
    • जवाबदेही का अभाव: इनके उपयोगकर्त्ता के देश में कोई भौतिक कार्यालय नहीं होता है, ये स्थानीय कर संबंधी कानूनों (जैसे– भारत की वर्ष 2022 की आभासी परिसंपत्ति कर व्यवस्था) और रिपोर्टिंग आवश्यकताओं को दरकिनार कर सकते हैं।
    • गुमनामी (Anonymity): ये प्रायः उच्च स्तर की गुमनामी प्रदान करते हैं, जिसका उपयोग "स्कैम कंपाउंड" द्वारा या अवैध आय को सीमाओं के पार ले जाने के लिये किया जा सकता है।
  • संचालन का तरीका: अवैध आय को oVASPs के माध्यम से आभासी परिसंपत्तियों में परिवर्तित किया जाता है और बाद में अनुपालन करने वाले भारतीय VASPs के माध्यम से घरेलू वित्तीय प्रणालियों में भेजा जाता है। उदाहरण के लिये, कैरिबियन स्थित एक ऑनलाइन गैंबलिंग प्लेटफॉर्म ने एंटी मनी लॉन्ड्रिंग (AML) ब्लाइंड स्पॉट का फायदा उठाकर सीमापार धनराशि हस्तांतरित की और बाद में इसे भारत में ब्लॉक कर दिया गया।
  • भारत में नियामक आवश्यकताएँ: PMLA, 2002 और हाल के FIU जनादेशों के तहत भले ही कोई VASP "ऑफशोर" हो, यदि वह भारतीय उपयोगकर्त्ताओं को सेवा प्रदान करता है तो उसे निम्नलिखित का पालन करना होगा:
    • अनिवार्य पंजीकरण: इन्हें FIU-IND के साथ एक रिपोर्टिंग यूनिट के रूप में पंजीकरण करना होगा।
    • प्रधान अधिकारी (PO): इन्हें कानूनी और ट्रांजेक्शन मॉनिटरिंग के लिये संपर्क सूत्र के रूप में कार्य करने के लिये भारत में एक प्रधान अधिकारी नियुक्त करना आवश्यक है।
    • KYC अनुपालन: इन्हें "अपने ग्राहक को जानें" (नो योर कस्टमर) की समीक्षा करनी होगी और संदिग्ध लेनदेन रिपोर्ट (STR) अधिकारियों को प्रस्तुत करनी होगी।

वर्चुअल एसेट्स

  • परिचय: वर्चुअल एसेट (VA) मूल्य का एक डिजिटल प्रतिनिधित्व है, जिसे डिजिटल रूप से व्यापार, हस्तांतरण या भुगतान अथवा निवेश के लिये उपयोग किया जा सकता है। ये विशिष्ट डिजिटल परिसंपत्तियाँ हैं, जो क्रिप्टोग्राफी और वितरित लेज़र प्रौद्योगिकी (ब्लॉकचेन) पर आधारित होती हैं।
    • वर्चुअल एसेट्स में “फिएट” मुद्राओं (जैसे– भारतीय रुपया का डिजिटल रूप — ई-रुपया या बैंक ऐप में रखा गया अमेरिकी डॉलर) के डिजिटल रूप शामिल नहीं होते।
  • सामान्य उदाहरण:
    • क्रिप्टोकरेंसी: ऐसी डिजिटल मुद्राएँ जो विनिमय (जैसे– बिटकॉइन, इथेरियम) के माध्यम के रूप में उपयोग की जाती हैं।
    • स्टेबलकॉइंस: ऐसे वर्चुअल एसेट्स जिनका मूल्य किसी अन्य परिसंपत्ति (जैसे– अमेरिकी डॉलर या सोना) से जुड़ा होता है, ताकि मूल्य में उतार-चढ़ाव (जैसे– USDT, USDC) को कम किया जा सके।
    • नॉन-फंजिबल टोकन (NFTs): ये अद्वितीय डिजिटल परिसंपत्तियाँ होती हैं, जो किसी विशिष्ट वस्तु, जैसे– डिजिटल कला या संगीत के स्वामित्व का प्रतिनिधित्व करती हैं।
    • गवर्नेंस टोकन: ऐसे परिसंपत्ति टोकन जो धारकों को किसी विशिष्ट ब्लॉकचेन परियोजना या प्रोटोकॉल के भविष्य से जुड़े निर्णयों पर मतदान का अधिकार देते हैं।
  • भारत में VDA: भारत में वित्त अधिनियम, 2022 के तहत वर्चुअल डिजिटल एसेट (VDA) शब्द का उपयोग करती है।
    • कराधान: भारत में किसी भी वर्चुअल डिजिटल एसेट (VDA) के हस्तांतरण से होने वाली आय पर 30% कर लगाया जाता है।
    • TDS: वर्चुअल डिजिटल एसेट (VDA) के हस्तांतरण पर किये गए भुगतान पर 1% स्रोत पर कर कटौती (TDS) लागू होती है, ताकि लेन-देन के ट्रेल को ट्रैक किया जा सके।
    • PMLA कवरेज: वर्ष 2023 से वर्चुअल डिजिटल एसेट (VDA) लेन-देन धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 के अंतर्गत आते हैं। इसका अर्थ है कि क्रिप्टो एक्सचेंजों को ‘अपने ग्राहक को जानें’ (KYC) मानकों का पालन करना होता है और संदिग्ध गतिविधियों की रिपोर्ट वित्तीय आसूचना इकाई–भारत को करनी होती है।

FATF

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. FATF 2026 रिपोर्ट में उल्लिखित 'वर्चुअल एसेट लैब' क्या है?
यह भारत की एक विशेष प्रणाली है जो AI, ओपन-सोर्स इंटेलिजेंस और स्वचालित निगरानी का उपयोग करके अपंजीकृत तथा उच्च-जोखिम वाले अपतटीय वर्चुअल एसेट प्लेटफॉर्म का पता लगाती है।

2. भारत में VASP के प्रधान अधिकारी (POs) के लिये निवास की क्या आवश्यकता है?
FIU यह अनिवार्य करता है कि प्रिंसिपल ऑफिसर भारत में स्थित हों, ताकि लेन-देन की निगरानी और धन शोधन निवारण अधिनियम के अनुपालन के लिये प्रत्यक्ष कानूनी जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके।

3. 'सहयोग पोर्टल' डिजिटल सामग्री को विनियमित करने में किस प्रकार सहायता करता है?
गृह मंत्रालय द्वारा शुरू किया गया यह प्लेटफॉर्म अवैध सामग्री के लिये मध्यस्थों को टेकडाउन नोटिस भेजने की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करता है, इसका उपयोग पहले ही 85 गैर-अनुपालन करने वाले oVASP URL को ब्लॉक करने हेतु किया जा चुका है।

4. 'सहयोग पोर्टल' डिजिटल सामग्री को विनियमित करने में किस प्रकार सहायता करता है?
वर्चुअल एसेट्स मूल्य के निजी और विकेंद्रीकृत डिजिटल रूप होते हैं (जैसे बिटकॉइन), जबकि ई-रुपया जैसी CBDC केंद्रीय बैंक (RBI) द्वारा जारी की गई आधिकारिक और वैध मुद्रा होती है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

प्रश्न. ‘‘ब्लॉकचेन तकनीकी’’ के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2020)

  1. यह एक सार्वजनिक खाता है, जिसका हर कोई निरीक्षण कर सकता है, परंतु जिसे कोई भी एक उपभोक्ता नियंत्रित नहीं करता। 
  2. ब्लॉकचेन की संरचना और डिज़ाइन ऐसी है कि इसका समूचा डेटा केवल क्रिप्टोकरेंसी के विषय में है।
  3. ब्लॉकचेन के आधारभूत वैशिष्ट्यों पर आधारित अनुप्रयोगों को बिना किसी व्यक्ति की अनुमति के विकसित किया जा सकता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) केवल 1 और 2

(d) केवल 1 और 3

उत्तर: (d)


प्रश्न. निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिये: (2018)

 

कभी-कभी समाचारों में आने वाले शब्द

संदर्भ/विषय 

1. 

बेल II प्रयोग 

कृत्रिम बुद्धि 

2. 

ब्लॉकचेन प्रौद्योगिकी 

डिजिटल/क्रिप्टोकरेंसी

3. 

CRISPR–Cas9 

कण भौतिकी 

उपर्युक्त युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?

(a) केवल 1 और 3
(b) केवल 2
(c) केवल 2 और 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)


ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (GIB) के लिये पहली अंतर-राज्यीय पहल

स्रोत: द हिंदू 

गुजरात के कच्छ में एक दशक के बाद 'जंपस्टार्ट' पद्धति के माध्यम से 'ग्रेट इंडियन बस्टर्ड' (GIB) के एक चूज़े का जन्म हुआ है। यह एक संरक्षण पद्धति है जिसमें कैप्टिव ब्रीडिंग प्रोग्राम के अंतर्गत प्राप्त उर्वर, ऊष्मायित अंडे को जंगली मादा के घोंसले में स्थानांतरित किया जाता है, जिससे उसके प्राकृतिक रूप से विकसित होने की संभावना बढ़ती है।

  • यह अपनी तरह की पहली अंतर-राज्यीय पहल है, जिसे पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने राजस्थान एवं गुजरात के वन विभागों और भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के साथ मिलकर 'प्रोजेक्ट ग्रेट इंडियन बस्टर्ड' (2016 में शुरू) के तहत समन्वित किया था, जिसका उद्देश्य इस गंभीर रूप से लुप्तप्राय प्रजाति को पुनरुज्जीवित करना है।

ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (GIB)

  • GIB, राजस्थान का राज्य पक्षी, भारत का गंभीर रूप से लुप्तप्राय पक्षी है। यह दुनिया के सबसे भारी उड़ने वाले पक्षियों में से एक है और मुख्य रूप से राजस्थान के थार रेगिस्तान में पाया जाता है, जिसकी छोटी आबादी गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में है। 
    • GIB भारत में पाए जाने वाले चार बस्टर्ड प्रजातियों में से एक है, साथ में लेसर फ्लोरिकन, बंगाल फ्लोरिकन और मैक्वीन बस्टर्ड शामिल हैं।
    • GIB सर्वाहारी है और आगे देखने की क्षमता में कमी के कारण बिजली की लाइनों से टकराने के लिये संवेदनशील है।
  • पारिस्थितिकीय महत्त्व: GIB एक संकेतक प्रजाति के रूप में कार्य करता है; यह ग्रासलैंड ईकोसिस्टम के स्वास्थ्य को दर्शाता है। इसकी संख्या में कमी देशी घास के मैदानों के क्षरण का संकेत देती है।
  • संरक्षण स्थिति: IUCN रेड लिस्ट (गंभीर रूप से लुप्तप्राय), CITES (परिशिष्ट I), प्रवासी प्रजातियों पर अभिसमय (CMS) (परिशिष्ट I) और वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 (अनुसूची I)।
  • खतरा: कृषि, खनन और अवसंरचना से आवास का नुकसान, साथ ही बिजली की लाइनों से टकराना (वयस्क मृत्यु दर का प्रमुख कारण) GIB के लिये खतरा हैं।
  • संरक्षण के प्रयास: यह संरक्षण के लिये पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के वन्यजीव आवासों के एकीकृत विकास के अंतर्गत शामिल है।
    • परियोजना GIB, जो वर्ष 2016 में शुरू हुई, का उद्देश्य ब्रीडिंग इनक्लोज़र का निर्माण करना और आवासों पर मानवीय दबाव को कम करना, दीर्घकालिक संरक्षण सुनिश्चित करना है।

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और पढ़ें: ग्रेट इंडियन बस्टर्ड


ज़ोजिला दर्रे पर हिमस्खलन

स्रोत: इकॉनोमिक टाइम्स 

ज़ोजिला दर्रे के पास एक विनाशकारी हिमस्खलन के परिणामस्वरूप कई लोगों की मौत हो गई और कई घायल हो गए, जिससे कश्मीर घाटी और लद्दाख के बीच इस महत्त्वपूर्ण कड़ी की सुरक्षा पर बहस छिड़ गई।

  • हिमस्खलन से तात्पर्य एक तीव्र, गुरुत्वाकर्षण-प्रेरित हिम, हिम एवं अपशिष्ट का पर्वतीय ढाल के पश्चात् दक्षिण की ओर खिसकने से है। संरचनात्मक अस्थिरता, अधिक हिमपात अथवा तापमान वृद्धि से प्रेरित, ये मुख्यतः 30°-45° ढालों पर घटित होते हैं।

ज़ोजिला दर्रा

  • परिचय: ज़ोजिला दर्रा केंद्रशासित प्रदेश लद्दाख में एक उच्च-तुंगता वाला पहाड़ी दर्रा है। यह लगभग 11,575 फीट की ऊँचाई पर राष्ट्रीय राजमार्ग 1 (NH-1) पर स्थित है।
    • भारी हिमपात और हिमस्खलन के लगातार खतरे के कारण यह दर्रा पारंपरिक रूप से प्रत्येक वर्ष लगभग 6 माह (देर से शरद ऋतु से वसंत तक) के लिये बंद रहता है। यह लद्दाख को सड़क मार्ग से देश के बाकी हिस्सों से काट देता है, जिससे हवाई यात्रा ही एकमात्र विकल्प रह जाता है।
    • हालाँकि, यह 2025-26 की शीतकालीन अवधि में खुला रहा, जो उन्नत हिम-निर्मूलन उपकरण और उत्कृष्ट संचालन योजना के माध्यम से प्राप्त एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।
  • भौगोलिक और रणनीतिक महत्त्व: ज़ोजिला दर्रा जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर को लद्दाख के लेह से जोड़ता है और यह दोनों क्षेत्रों के बीच एक महत्त्वपूर्ण मार्ग के रूप में कार्य करता है।
    • महान हिमालयी शृंखला में स्थित कश्मीर घाटी की हरित उपत्यका और द्रास तथा कारगिल के शुष्क परिदृश्यों के बीच एक प्राकृतिक विभाजन बनाता है।
    • यह लद्दाख को भारत के अन्य हिस्सों से जोड़ने वाले दो प्रमुख भौगोलिक मार्गों में से एक है, जिसमें श्रीनगर-लेह सड़क (434 किमी.) और मनाली-लेह सड़क (सार्चू मार्ग के माध्यम से 475 किमी.) शामिल हैं।
  • ऐतिहासिक महत्त्व: जोज़िला दर्रा 1948 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान एक प्रमुख युद्धक्षेत्र रहा। ऑपरेशन बायसन (1948) के तहत भारतीय सेना ने इस ऊँचाई पर पहली बार इतिहास में टैंक (स्टुअर्ट लाइट टैंक्स) तैनात किये, ताकि पाकिस्तानी घुसपैठियों से पास को पुनः प्राप्त किया जा सके।
  • ज़ोजिला सुरंग: लद्दाख की मौसमी अलगाव की समस्या को दूर करने के लिये भारत सरकार वर्तमान में ज़ोजिला सुरंग का निर्माण कर रही है। पूर्ण होने पर यह भारत की सबसे लंबी सड़क सुरंग होगी और एशिया की सबसे लंबी द्विदिश सुरंग बनने की संभावना है, जिसकी लंबाई 14.15 किमी. है। यह दर्रा पार करने का समय 3.5 घंटे से घटाकर केवल 15 मिनट कर देगा।

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और पढ़ें: हिमस्खलन का बढ़ता जोखिम


होप आइलैंड पर ऑलिव रिडले कछुओं का संरक्षण

स्रोत: द हिंदू

लगभग 20,000 ऑलिव रिडले कछुओं के अंडों का संरक्षण होप आइलैंड में वन्यजीव प्रबंधन प्राधिकरण और कोरिंगा वन्यजीव अभयारण्य द्वारा किया गया है।

  • होप आइलैंड आंध्र प्रदेश में ऑलिव रिडले कछुओं के लिये एक सुरक्षित घोंसला स्थल है, जहाँ अंडों की सुरक्षा इन-सीटू संरक्षण विधि का उपयोग करके की जाती है।

ऑलिव रिडले कछुए

  • परिचय: ऑलिव रिडले कछुए विश्व के सबसे छोटे समुद्री कछुए होते हैं और इनका कवच (कैरापेस) हृदयाकार, जैतूनी या धूसर-हरे रंग का होता है।
    • इनका वितरण मुख्य रूप से प्रशांत, हिंद और अटलांटिक महासागरों के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों तक विस्तृत है। ये जीव खुले महासागरीय परिवेश और तटीय जल—दोनों ही प्रकार के पर्यावासों में निवास करने के लिये अनुकूलित हैं।
  • आहार और व्यवहारऑलिव रिडले कछुए सर्वाहारी जीव हैं, जो जेलीफिश, घोंघे, केकड़े और शैवाल का सेवन करते हैं। यह प्रशांत महासागर से हिंद महासागर तक लंबी दूरी का प्रवास कर नवंबर-दिसंबर माह के मध्य भारतीय तटों पर पहुँचकर अप्रैल-मई माह तक वहीं रहते हैं।  
    • यह प्रजाति खाड़ियोंसँकरे रेतीले समुद्र तटों पर अपने मॉस नेस्टिंग (अरीबादा) के लिये जानी जाती है, जहाँ प्रत्येक मादा एक बार में लगभग 100-140 अंडे देती है।
    • भारत में प्रमुख स्थल गहिरमाथा (सबसे बड़ा सामूहिक मॉस नेस्टिंग), रुशिकुल्या, ओडिशा में देवी नदी का मुहाना, विशाखापत्तनम और काकीनाडा (आंध्र प्रदेश) तथा अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह हैं।
  • विधिक संरक्षण: भारत में पाई जाने वाली समुद्री कछुओं की सभी 5 प्रजातियाँ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची I और CITES सम्मेलन के परिशिष्ट I के अंतर्गत कानूनी रूप से संरक्षित हैं। समुद्री कछुए IUCN की रेड लिस्ट में संकटग्रस्त प्रजाति के रूप में सूचीबद्ध हैं।
  • संरक्षण उपाय: भारतीय तटरक्षक बल द्वारा संचालित 'ऑपरेशन ओलिविया के तहत मत्स्य ग्रहण पर प्रतिबंध लागू किया गया है। ओडिशा में टर्टल एक्सक्लूडर डिवाइसेस (TED) अनिवार्य हैं। टैगिंग कार्यक्रम प्रवास पर नज़र रखने में सहायक होते हैं।
  • प्रमुख खतरे: अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर प्रतिबंध के बावजूद ऑलिव रिडले कछुए अवैध शिकार और अंडों के व्यापार के कारण गंभीर रूप से प्रभावित हैं। इनमें सर्वाधिक मृत्यु दर निडन (नेस्टिंग) के मौसम में ट्रॉल और गिल जालों में फँसने के कारण होती है।

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और पढ़ें: ऑलिव रिडले कछुए


सरकार ने PM e-DRIVE योजना में संशोधन किया

स्रोत: द हिंदू 

हाल ही में सरकार ने PM e-DRIVE (रिवोल्यूशन इन इनोवेटिव वेहिकल एन्हांसमेंट) योजना में संशोधन किया है, जिसमें EV के प्रोत्साहन के लिये नई समय-सीमा पेश की गई है।

PM e-DRIVE योजना

  • परिचय: PM e-DRIVE एक प्रमुख योजना है, जिसका परिव्यय 10,900 करोड़ रुपये (अक्तूबर 2024–मार्च 2026) है, जिसमें इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों के लिये प्रोत्साहन की संशोधित समय-सीमा 31 जुलाई, 2026 तक और इलेक्ट्रिक तिपहिया वाहनों के लिये 31 मार्च, 2028 तक बढ़ा दी गई है।
  • उद्देश्य: इस पहल का प्राथमिक उद्देश्य विभिन्न श्रेणियों में इलेक्ट्रिक वेहिकल (EV) को अपनाने में तेज़ी  लाना, मज़बूत EV चार्जिंग अवसंरचना का निर्माण करना और आत्मनिर्भर भारत के दृष्टिकोण के अनुरूप एक मज़बूत घरेलू EV मैन्युफैक्चरिंग ईकोसिस्टम विकसित करना है।
  • मुख्य घटक:
    • लक्षित लाभार्थी: उन्नत बैटरी वाले वाणिज्यिक और निजी इलेक्ट्रिक दोपहिया और तिपहिया वाहन, ई-एंबुलेंस, स्क्रैपिंग सर्टिफिकेट वाले ई-ट्रक तथा सार्वजनिक परिवहन के लिये इलेक्ट्रिक बसें।
    • मांग में वृद्धि: यह योजना कारखाने से बाहर की कीमत (ex-factory price) के 15% (या एक निर्धारित सीमा) पर सीमित मांग के लिये प्रोत्साहन प्रदान करती है, जिसकी पात्रता 1.5 लाख रुपये (ई-2W) और 2.5 लाख रुपये (ई-3W) से कम कीमत वाले वाहनों तक सीमित है।
      • इलेक्ट्रिक तिपहिया वाहनों की L5 श्रेणी को दिसंबर 2025 में अपना लक्ष्य प्राप्त करने के बाद पहले ही बंद कर दिया गया है।
      • यह योजना 24,79,120 इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों और 39,034 इलेक्ट्रिक तिपहिया वाहनों के लिये सहायता को सीमित करती है।
    • चार्जिंग अवसंरचना विकास: यह योजना EV अपनाने को बढ़ावा देने के लिये प्रमुख शहरों और चुनिंदा राजमार्गों पर 72,300 सार्वजनिक फास्ट चार्जर स्थापित करने का लक्ष्य रखती है।
      • भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (BHEL), जो MHI के तहत एक सार्वजनिक क्षेत्र की इकाई है, EV उपयोगकर्त्ताओं के लिये स्लॉट बुक करने, भुगतान करने और चार्जर उपलब्धता की जाँच करने के लिये एक डिजिटल "सुपर ऐप" विकसित करेगा
    • परीक्षण एजेंसियों का उन्नयन: यह योजना हरित गतिशीलता का समर्थन करने के लिये MHI के तहत परीक्षण एजेंसियों को उन्नत प्रौद्योगिकियों के साथ उन्नत करने के लिये 780 करोड़ रुपये आवंटित करती है।
  • पात्रता: केवल उन्नत बैटरी वाले EV ही प्रोत्साहनों के लिये पात्र हैं। आंतरिक निधि हस्तांतरण को रोकने के लिये सरकार द्वारा खरीदे गए ईवी को बाहर रखा गया है।

और पढ़ें: PM ई-ड्राइव योजना


काकोरी ट्रेन एक्शन

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने काकोरी ट्रेन एक्शन (1925) के वीर नायकों– रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान और रोशन सिंह की प्रतिमाओं को सड़क सौंदर्यीकरण परियोजना के दौरान हटाए/ध्वस्त किये जाने के बाद सख्त दंडात्मक कार्रवाई के आदेश दिये।

काकोरी ट्रेन एक्शन, 1925

  • परिचय: काकोरी ट्रेन एक्शन (1925) भारत के स्वतंत्रता संग्राम को वित्तपोषित करने के उद्देश्य से हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) के सदस्यों द्वारा किया गया एक ऐतिहासिक क्रांतिकारी कार्य था।
    • इसने ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता को चुनौती दी और राष्ट्रीय आंदोलन के भीतर संगठित सशस्त्र प्रतिरोध की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन को चिह्नित किया।
  • प्रतिरोध की उत्पत्ति: असहयोग आंदोलन, 1922 की वापसी  और जलियाँवाला बाग हत्याकांड, 1919 के बाद निराश हुए युवा राष्ट्रवादियों ने क्रांतिकारी मार्ग अपनाने का निर्णय लिया। उन्होंने सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से भारत की स्वतंत्रता प्राप्त करने के उद्देश्य से वर्ष 1924 में कानपुर में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) की स्थापना की।
  • मिशन का कार्यान्वयन: नेताओं, जिनमें रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, चंद्रशेखर आज़ाद और राजेंद्र लाहिड़ी शामिल थे, ने काकोरी स्टेशन के पास शाहजहाँपुर से लखनऊ की ओर जा रही 8-डाउन ट्रेन को रोका ताकि वे राज्य खज़ाने को लूटकर अपने संघर्ष को वित्तपोषित कर सकें।
    • काकोरी ट्रेन के एक्शन में भाग लेने वाले अन्य प्रमुख क्रांतिकारियों में शचींद्रनाथ बख्शी, मुकुंदी लाल, बनवारी लाल और मन्मथनाथ गुप्ता शामिल थे।
  • न्यायिक दमन: काकोरी ट्रेन एक्शन (1925) के बाद लगभग 18 महीनों तक मुकदमा चला; इसके परिणामस्वरूप रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह को दिसंबर 1927 में फाँसी दी गई। चंद्रशेखर आज़ाद पुलिस की गिरफ्तारी से बचने में सफल रहे।
  • वैचारिक विरासत: यह घटना हिंदू-मुस्लिम एकता का एक महत्त्वपूर्ण प्रतीक है (जिसका उदाहरण बिस्मिल और खान हैं) और इसने भगत सिंह के नेतृत्व में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के पुनर्गठन के लिये मार्ग प्रशस्त किया।

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अर्थ ऑवर 2026

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

भारत ने अर्थ ऑवर 2026 (28 मार्च, 2026, रात 8:30–9:30 बजे) में उत्साहपूर्वक भाग लिया, जिसमें इंडिया गेट, कुतुब मीनार और लाल किले जैसे प्रमुख ऐतिहासिक स्मारकों ने एकजुटता दिखाते हुए अपनी लाइटें बंद रखीं।

  • परिचय: अर्थ ऑवर एक वैश्विक पहल है, जिसका आयोजन वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड (WWF) द्वारा किया जाता है, जो व्यक्तियों, सरकारों और संस्थानों से जलवायु परिवर्तन तथा पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने हेतु एक घंटे के लिये गैर-आवश्यक लाइटें बंद करने का आह्वान करती है।
    • अर्थ ऑवर 2026 इस अभियान के 20 वर्ष पूरे होने का प्रतीक है, जो एक साधारण पहल से विकसित होकर स्थिरता और जलवायु कार्रवाई के लिये एक शक्तिशाली वैश्विक आह्वान बन गया है।
  • विषय: इस वर्ष का विषय ‘गिव एन ऑवर फॉर अर्थ’ सभी को केवल लाइट बंद करने से आगे बढ़कर प्रकृति के लिये 60 मिनट समर्पित करने हेतु प्रोत्साहित करता है, जैसे– प्रकृति से जुड़ना, उसका पुनर्स्थापन करना, उसके बारे में सीखना या दूसरों को उसकी देखभाल के लिये प्रेरित करना।
  • उत्पत्ति: इसकी शुरुआत वर्ष 2007 में ऑस्ट्रेलिया के सिडनी में एक प्रतीकात्मक ‘लाइट्स ऑफ’ आंदोलन के रूप में हुई थी और तब से यह विश्व के सबसे बड़े जन-आधारित पर्यावरण अभियानों में से एक बन गया है।
    • यह अभियान अब 190 से अधिक देशों और क्षेत्रों में लाखों लोगों को जोड़ चुका है, जो केवल प्रतीकात्मक कार्रवाई ही नहीं बल्कि पृथ्वी के हित में व्यापक सकारात्मक गतिविधियों को भी बढ़ावा देता है।
  • भारत में भागीदारी: भारत में यह पहल 2009 से वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड-भारत के तहत उल्लेखनीय रूप से विस्तारित हुई है, जिसमें 58 शहरों की भागीदारी, व्यापक संस्थागत समर्थन और बढ़ती डिजिटल भागीदारी शामिल है।
    • स्विच-ऑफ (लाइटें बंद करने) से इतर, भारत में यह अभियान स्वच्छता अभियान, नेचर वॉक,  साइक्लोथॉन, नागरिक विज्ञान पहल और शैक्षिक कार्यक्रमों जैसी गतिविधियों को बढ़ावा देता है, जो दीर्घकालिक पर्यावरणीय कार्रवाई के लिये प्रोत्साहित करते हैं।

और पढ़ें: अर्थ ऑवर


सरकार ने विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (SAED) घटाया

स्रोत: द हिंदू 

केंद्र सरकार ने ईंधन कर व्यवस्था में सुधार किया है, जिसमें पेट्रोल और डीज़ल पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (SAED) कम किया गया है, जबकि डीज़ल और एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) पर निर्यात शुल्क बढ़ाया गया है, ताकि तेल विपणन कंपनियों (OMC) के वित्तीय स्वास्थ्य का प्रबंधन किया जा सके।

  • यह कटौती इस उद्देश्य से की गई है कि सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियाँ (IOCL, BPCL और HPCL), जो ईंधन को अंतर्राष्ट्रीय आपूर्ति लागत से कम में बेच रही हैं, उनकी ‘अंडर-रिकवरी’ (हानियों) को कम किया जा सके।
  • कीमतों में वृद्धि पश्चिम एशियाई संघर्ष के कारण हुई है, जिसने ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स को 111 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल से ऊपर धकेल दिया।

उत्पाद शुल्क

  • परिचय: उत्पाद शुल्क एक अप्रत्यक्ष कर है जो किसी देश के भीतर वस्तुओं के निर्माण या उत्पादन पर लगाया जाता है। GST के विपरीत (जो आपूर्ति शृंखला के हर चरण पर लगता है) उत्पाद शुल्क विशेष रूप से वस्तुओं के निर्माण/उत्पादन की प्रक्रिया से संबंधित होता है।
  • कार्यप्रणाली: हालाँकि निर्माता को कानूनी रूप से उत्पादन के समय उत्पाद शुल्क का भुगतान करना होता है, यह कर आमतौर पर उपभोक्ता को उच्च खुदरा मूल्य के माध्यम से स्थानांतरित कर दिया जाता है। इस प्रक्रिया के माध्यम से कर का आर्थिक बोझ निर्माता से अंतिम खरीदार पर स्थानांतरित हो जाता है।
  • उत्पाद शुल्क के अंतर्गत आने वाले उत्पाद: उत्पाद शुल्क मुख्य रूप से ‘गैर-GST’ वस्तुओं पर लगाया जाता है। ये अक्सर उच्च-राजस्व या ‘सिन’ गुड्स होती हैं, जिन्हें सरकार प्रोत्साहित नहीं करना चाहती, जैसे:
    • पेट्रोलियम उत्पाद: पेट्रोल, डीज़ल, क्रूड ऑयल/कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस और एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF)।
    • मद्यपान पेय हेतु: विशेष रूप से मानव उपभोग के लिये (राज्य उत्पाद शुल्क)।
    • तंबाकू उत्पाद: सिगरेट और तंबाकू पर GST के अलावा केंद्रीय उत्पाद शुल्क भी लगाया जाता है।
    • विशेष मामले: बायोगैस मिश्रित CNG (ग्रीन ऊर्जा को प्रोत्साहित करने के लिये संघीय बजट 2026-27 में छूट दी गई)।

उत्पाद शुल्क बनाम सीमा शुल्क बनाम GST:

विशेषता

उत्पाद शुल्क

सीमा शुल्क

GST

ट्रिगर

भारत में निर्माण

भारत में आयात

वस्तुओं/सेवाओं की आपूर्ति

क्षेत्र

सीमित (पेट्रोल, शराब, तंबाकू)

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

लगभग सभी वस्तुएँ और सेवाएँ

अधिकार क्षेत्र

केंद्र/राज्य सरकार

केंद्र सरकार

केंद्र और राज्य (दोहरी)

और पढ़ें: भारत में पेट्रोल और डीज़ल के मूल्य निर्धारण का मुद्दा