डेली न्यूज़ (14 Jan, 2026)



भारत-जर्मनी संबंध

प्रिलिम्स के लिये: मिलान, इंडियन ओशन नेवल सिंपोज़ियम, तरंग शक्ति, सेमीकंडक्टर 

मेन्स के लिये: भारत-जर्मनी रणनीतिक साझेदारी: विकास और महत्त्व, वैश्विक शासन सुधारों में मध्य देशों की भूमिका

स्रोत: पीआईबी

चर्चा में क्यों? 

भारत और जर्मनी ने जर्मन चांसलर की भारत यात्रा के दौरान अपनी रणनीतिक साझेदारी को नई गति प्रदान की है, जो रणनीतिक साझेदारी के 25 वर्ष और कूटनीतिक संबंधों के 75 वर्ष पूरे होने का प्रतीक है।

सारांश

  • जर्मन चांसलर की यात्रा ने भारत-जर्मनी रणनीतिक साझेदारी को नई ऊर्जा प्रदान की, जिससे रक्षा, प्रौद्योगिकी, जलवायु कार्रवाई, हिंद-प्रशांत सुरक्षा और वैश्विक शासन संबंधी सुधारों में सहयोग का विस्तार हुआ।
  • यह साझेदारी मज़बूत गति के बावज़ूद भू-राजनीतिक मतभेदों, रक्षा असमानताओं और भारत-यूरोपीय संघ व्यापार प्रगति की धीमी गति से उत्पन्न चुनौतियों का सामना करती है, जिसके लिये गहन आर्थिक एकीकरण और रणनीतिक समन्वय की आवश्यकता है।

जर्मन चांसलर की भारत यात्रा के प्रमुख परिणाम क्या हैं?

  • रक्षा औद्योगिक सहयोग: रक्षा के सह‑विकास, सह‑उत्पादन और प्रौद्योगिकी साझेदारी को बढ़ावा देने के लिये एक संयुक्त रोडमैप पर सहमति बनी, जिसमें जर्मनी ने तीव्र निर्यात अनुमोदन के लिये प्रतिबद्धता व्यक्त की।
    • जर्मनी ने भारतीय नौसेना और वायुसेना के अभ्यासों, जैसे– मिलान, इंडियन ओशन नेवल सिंपोज़ियम और तरंग शक्ति में भाग लेने की इच्छा व्यक्त की।
    • दोनों पक्षों ने ट्रैक 1.5 विदेश नीति एवं सुरक्षा संवाद स्थापित किया, जो सरकारी अधिकारियों और गैर‑सरकारी विशेषज्ञों के बीच संरचित लेकिन अनौपचारिक वार्त्ता के माध्यम से रणनीतिक समझ और नीतिगत समन्वय को सुदृढ़ करेगा।
  • वीज़ा‑फ्री एयरपोर्ट ट्रांज़िट: भारतीय पासपोर्टधारकों को जर्मन हवाई अड्डों से वीज़ा‑फ्री ट्रांज़िट की अनुमति दी जाएगी, जिससे यात्रा और गतिशीलता सुगम होगी।
  • शिक्षा और कौशल विकास: एक उच्च शिक्षा रोडमैप अपनाया गया, जर्मन विश्वविद्यालयों को भारत में परिसर खोलने के लिये आमंत्रित किया गया और नवीकरणीय ऊर्जा कौशल विकास के लिये सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की घोषणा की गई।
  • क्रिटिकल मिनरल्स और सेमीकंडक्टर: आपूर्ति शृंखला के लचीलापन को बढ़ाने के लिये दोनों पक्षों ने क्रिटिकल मिनरल्स और सेमीकंडक्टर ईकोसिस्टम पर सहयोग करने हेतु सहमति व्यक्त की।
  • डिजिटल और उभरती प्रौद्योगिकियाँ: इंडो‑जर्मन डिजिटल डायलॉग कार्ययोजना (2026–27) को अंतिम रूप दिया गया, जिसमें AI, डेटा गवर्नेंस, दूरसंचार और इंडस्ट्री 4.0 जैसे क्षेत्रों को शामिल किया गया।
  • इंडो‑पैसिफिक और संपर्क सहयोग: इंडो‑पैसिफिक पर एक द्विपक्षीय संवाद शुरू हुआ, ताकि नियम‑आधारित क्षेत्रीय व्यवस्था को समर्थन मिल सके। 
  • वैश्विक शासन में सुधार: भारत और जर्मनी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सहित वैश्विक संस्थाओं में सुधार के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पुनः पुष्ट किया, विशेषकर G4 फ्रेमवर्क के माध्यम से। 
  • आतंकवाद‑रोधी सहयोग: भारत और जर्मनी ने सीमा-पार आतंकवाद सहित आतंकवाद के सभी रूपों की निंदा की, संयुक्त राष्ट्र-नामित 1267 शासन के तहत आतंकवादी समूहों के खिलाफ सहयोग की पुष्टि की, परस्पर कानूनी सहायता संधि की पुष्टि का स्वागत किया और आतंकवादी वित्तपोषण तथा सुरक्षित ठिकानों के खिलाफ खुफिया साझाकरण, कानूनी सहयोग और कार्रवाई को गहरा करने पर सहमति व्यक्त की।

भारत-जर्मनी संबंधों के मुख्य पहलू क्या हैं?

  • आर्थिक और वाणिज्यिक संबंध: भारत और जर्मनी के बीच वस्तु और सेवाओं का द्विपक्षीय व्यापार वर्ष 2024 में 50 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक हो गया, जो भारत–यूरोपीय संघ कुल व्यापार का 25% से अधिक हिस्सा है।
    • जर्मनी वर्ष 2024–25 में भारत का आठवाँ सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया, जबकि वर्ष 2024 में भारत, जर्मनी का 23वाँ सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार था, जो दोनों देशों के बीच आर्थिक एकीकरण की गहराई को दर्शाता है। 
    • मेक इन इंडिया मित्तेलस्टैंड (MIIM) कार्यक्रम जर्मनी की लघु और मध्यम उद्यम (SMEs) तथा पारिवारिक स्वामित्व वाली कंपनियों को भारत में निवेश और उत्पादन करने के लिये समर्थन प्रदान करता है।
  • विकास सहयोग: हरित और सतत विकास साझेदारी के तहत जर्मनी ने वर्ष 2030 तक वार्षिक 1 अरब यूरो का योगदान देने की प्रतिबद्धता व्यक्त की है, जो जलवायु कार्रवाई, नवीकरणीय ऊर्जा, सतत शहरी विकास, जल, वन और कृषि के क्षेत्रों में समर्थन प्रदान करेगा।
    • दोनों देश त्रिकोणीय विकास सहयोग (Triangular Development Cooperation) के माध्यम से भी सहयोग करते हैं, ताकि तीसरे देशों में सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के अनुरूप विकास परियोजनाओं को लागू किया जा सके।
  • रक्षा: भारत–जर्मनी रक्षा सहयोग 2006 के रक्षा सहयोग समझौते और 2019 के इसके क्रियान्वयन प्रावधान पर आधारित है, जिसे नियमित उच्च-स्तरीय रक्षा संवादों द्वारा समर्थित किया जाता है।
    • सैन्य संबंधों को नौसैनिक बंदरगाह दौरों और PASSEX अभ्यासों के माध्यम से गहरा किया गया है। वायुसेना सहयोग अभ्यास तरंग शक्ति के माध्यम से बढ़ा है, जो बढ़ती अंतःसंचालन क्षमता और रणनीतिक विश्वास को दर्शाता है।

Germany

भारत-जर्मनी संबंधों में क्या चुनौतियाँ हैं?

  • रूस–यूक्रेन संघर्ष पर मतभेद: जर्मनी रूस–यूक्रेन संघर्ष पर निकट समन्वय की चाह रखता है, जबकि भारत रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए रूस के साथ ऊर्जा और रक्षा संबंधों को जारी रखता है, जिससे पूर्ण राजनीतिक संगति सीमित रहती है।
  • रक्षा सहयोग में विषमता: रक्षा संबंध बेहतर हो रहे हैं, लेकिन भारत की लंबे समय से रूस पर निर्भरता, जर्मन रक्षा निर्यात की उच्च लागत और शर्तें तथा प्रमुख सौदों (जैसे - पनडुब्बियाँ) के अंतिम रूप में विलंब के कारण ये संबंध सीमित बने हुए हैं।
  • असमान आर्थिक सहभागिता: हालाँकि द्विपक्षीय व्यापार बढ़ रहा है, फिर भी यह जर्मनी–चीन व्यापार की तुलना में सीमित है, जिससे जर्मनी की विविधीकरण महत्त्वाकांक्षाओं और वर्तमान भारत–जर्मनी आर्थिक एकीकरण के स्तर में अंतर स्पष्ट होता है।
    • जर्मनी चीन को मुख्यतः एक प्रणालीगत आर्थिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखता है, जबकि भारत इसे प्रत्यक्ष सुरक्षा और क्षेत्रीय खतरे के रूप में मानता है। इस खतरे की भिन्न धारणा के कारण इंडो-पैसिफिक में दोनों देशों के मध्य रणनीतिक समन्वय सीमित होता है।
  • भारत–यूरोपीय संघ व्यापार ढाँचे में धीमी प्रगति: भारत–यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर लंबी वार्त्ता दीर्घकालिक अवधि के निवेश और आपूर्ति शृंखला नियोजन में अनिश्चितता पैदा करती है, जिससे द्विपक्षीय संबंध प्रभावित होते हैं।
  • प्रवासन और एकीकरण संबंधी चुनौतियाँ: यद्यपि प्रवासन एवं विद्यार्थियों के आवागमन में वृद्धि हुई है, किंतु भाषा की बाधाएँ, योग्यताओं की मान्यता और सामाजिक एकीकरण जैसी समस्याएँ अभी भी बनी हुई हैं।

भारत-जर्मनी संबंधों को बेहतर बनाने हेतु क्या कदम उठाए जा सकते हैं?

  • आर्थिक और व्यापारिक एकीकरण को गति देना: भारत–यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को शीघ्र निष्कर्ष तक पहुँचाने का प्रयास करना, नियामक प्रक्रियाओं को सरल बनाना और आपूर्ति शृंखला साझेदारी को सुदृढ़ करना, ताकि चीन पर अत्यधिक निर्भरता कम हो सके।
  • जलवायु और हरित संक्रमण को मज़बूत करना: हरित हाइड्रोजन, नवीकरणीय ऊर्जा, सतत गतिशीलता और जलवायु-प्रतिरोधी अवसंरचना के लिये GSDP का उपयोग करना।
  • SME और मित्तेलस्टैंड की भागीदारी को बढ़ावा देना: मेक इन इंडिया मित्तेलस्टैंड (MIIM) जैसे कार्यक्रमों का विस्तार करके जर्मन SMEs को भारतीय निर्माण और नवाचार पारिस्थितिक तंत्र में आकर्षित करना।
    • यह यूरोप की चीन पर निर्भरता को कम करेगा और भारत को यूरोपीय संघ (EU) केंद्रित मूल्य शृंखलाओं (Value Chains) में गहराई से स्थापित करेगा, विशेष रूप से आसियान (ASEAN) और अफ्रीका की ओर उन्मुख निर्यातों हेतु।
  • वैश्विक शासन में एक साझा मानक विकल्प का निर्माण: भारत और जर्मनी को मूल्य-आधारित, फिर भी अवज्ञापरक नहीं, ऐसे वैश्विक शासन मॉडल का संयुक्त नेतृत्व करना चाहिये, जो लोकतांत्रिक, समावेशी, विकासोन्मुख हो तथा संप्रभुता व विविधता का सम्मान करता हो। 
    • इस तरह का दृष्टिकोण सत्तावादी पुनरावृत्ति (Authoritarian Revisionism) और पश्चिमी एकपक्षीयता (Western Unilateralism) दोनों के लिये एक विश्वसनीय विकल्प प्रदान करेगा, साथ ही उन्हें उत्तरदायी और स्थिरीकरणकारी वैश्विक हितधारक के रूप में उनकी प्रतिष्ठा बढ़ाने में सहायता करेगा।
    • भारत-जर्मनी त्रिकोणीय विकास सहयोग को अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में नवीकरणीय ऊर्जा, स्वास्थ्य देखभाल, कौशल विकास और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना जैसे क्षेत्रों में बढ़ाया जाना चाहिये।
  • डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना: भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (आधार जैसे प्लेटफॉर्म, UPI, ONDC) और यूरोपीय संघ डिजिटल शासन ढाँचे के बीच अंतरसंचालनीयता (Interoperability) को इंडो-जर्मन डिजिटल संवाद के माध्यम से बढ़ावा दिया जाना चाहिये।

निष्कर्ष

भारत-जर्मनी संबंध रक्षा, प्रौद्योगिकी, जलवायु कार्रवाई और वैश्विक शासन में रणनीतिक गहराई प्राप्त कर रहे हैं। भले ही भू-राजनीति और व्यापार को लेकर मतभेद हों, यह साझेदारी प्रबल गतिशीलता प्रदर्शित करती है। सुदृढ़ आर्थिक एकीकरण और साझा मूल्य दोनों देशों को स्थिरीकरणकारी वैश्विक साझेदार बना सकते हैं।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में नियम-आधारित व्यवस्था को बढ़ावा देने में भारत-जर्मनी सहयोग की भूमिका का मूल्यांकन कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. जर्मनी के चांसलर के भारत दौरे का प्रमुख महत्त्व क्या था?
इस दौरे ने भारत-जर्मनी रणनीतिक साझेदारी के 25 वर्ष पूरे होने का संकेत दिया और रक्षा, प्रौद्योगिकी, जलवायु कार्रवाई तथा वैश्विक शासन में सहयोग को विस्तारित किया।

2. इस दौरे के मुख्य रक्षा परिणाम क्या हैं?
डिफेंस इंडस्ट्रियल कोऑपरेशन रोडमैप, MILAN और तरंग शक्ति अभ्यासों में भागीदारी और ट्रैक 1.5 सुरक्षा संवाद की शुरुआत।

3. भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता भारत-जर्मनी संबंधों के लिये क्यों महत्त्वपूर्ण है?
यह व्यापार को बढ़ावा, निवेश को आकर्षित करने और सुदृढ़ आपूर्ति शृंखलाओं के माध्यम से चीन पर अधिक निर्भरता को कम करने में सहायता कर सकता है।

4. ग्रीन और सतत विकास साझेदारी (GSDP) क्या है?
यह एक ढाँचा है जिसके अंतर्गत जर्मनी 2030 तक प्रतिवर्ष 1 अरब यूरो भारत में जलवायु कार्रवाई, नवीकरणीय ऊर्जा और सतत विकास के लिये प्रतिबद्ध है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

प्रिलिम्स 

प्रश्न. ‘व्यापक-आधारयुक्त व्यापार और निवेश करार' (ब्रॉड-बेस्ड ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट एग्रीमेंट/BTIA)' कभी-कभी समाचारों में भारत तथा निम्नलिखित में से किस एक के बीच बातचीत के संदर्भ में दिखाई पड़ता है। (2017)

(a) यूरोपीय संघ

(b) खाड़ी सहयोग परिषद

(c) आर्थिक सहयोग और विकास संगठन

(d) शंघाई सहयोग संगठन

उत्तर: A


मेन्स 

प्रश्न. ‘यूरोपीय प्रतिस्पर्द्धा की दुर्घटनाओं द्वारा अफ्रीका को कृत्रिम रूप से निर्मित छोटे-छोटे राज्यों में काट दिया गया।’ विश्लेषण कीजिये। (2013)

प्रश्न. किस सीमा तक जर्मनी को दो विश्व युद्धों का कारण बनने का ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है? समालोचनात्मक चर्चा कीजिये। (2015)


भारत की समुद्री रणनीति

प्रिलिम्स के लिये: हिंद महासागर, चोल शासक, इंडो-पैसिफिक, ब्लू इकोनॉमी, सागर विज़न, बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव

भारत की समुद्री रणनीति और नौसेना सिद्धांत का विकास, हिंद महासागर क्षेत्र में एक प्रमुख सुरक्षा प्रदाता के रूप में भारत की भूमिका, समुद्री भारत विज़न 2030

स्रोत: द हिंदू 

चर्चा में क्यों? 

द रूटलेज हैंडबुक ऑफ मैरीटाइम इंडिया  से प्राप्त दृष्टिकोण के बाद भारत की विकसित हो रही समुद्री रणनीति ने तीव्रता के साथ ध्यान केंद्रित किया है, जो भारत के समुद्री विकास का व्यापक विश्लेषण प्रदान करती है।

सारांश

  • भारत की समुद्री रणनीति ऐतिहासिक रूप से भू-केंद्रित दृष्टिकोण से विकसित होकर एक व्यापक नियम-आधारित दृष्टिकोण में तब्दील हो गई है, जो सभ्यतागत समुद्री परंपराओं और सागर, महासागर एवं हिंद-प्रशांत महासागर पहल जैसी आधुनिक पहलों पर आधारित है, ताकि भारत को एक सुरक्षा प्रदाता और समुद्री केंद्र के रूप में स्थापित किया जा सके।
  • भारत को, चीन की समुद्री सीमा क्षेत्र (IOR) में बढ़ती उपस्थिति, क्षमता अंतराल, जलवायु जोखिम और अधोजलीय क्षेत्र की कमज़ोरियों से उत्पन्न चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
  • कानूनी एकीकरण, समुद्री प्रौद्योगिकी, क्षेत्रीय नियम, जलवायु-लचीले बुनियादी ढाँचे और मानव पूंजी का सुदृढ़ीकरण भारत के समुद्री भविष्य और प्रमुख शक्ति बनने की आकांक्षाओं को सुरक्षित करने की कुंजी है।

भारत की समुद्री रणनीति का विकास कैसे हुआ है?

  • भारत का प्रारंभिक समुद्री अभिविन्यास: भारत का रणनीतिक भूगोल उत्तर में हिमालय और दक्षिण में हिंद महासागर से परिभाषित है, जो महाद्वीपीय और समुद्री दोनों क्षेत्रों में अवसर उत्पन्न करता है।
    • ऐतिहासिक रूप से, जहाँ आक्रमण ज़मीनी मार्गों से हुए, वहीं भारत ने व्यापार, संस्कृति और नौवहन के माध्यम से समुद्र की ओर अपना प्रभुत्व बढ़ाया
    • प्राचीन और मध्यकालीन समुद्री नेटवर्क ने भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया, अरब देशों और पूर्वी अफ्रीका से जोड़ा।
    • चोल शासकों तथा मराठा शासकों ने संगठित नौसैन्य शक्ति, विदेशी अभियानों और समुद्री राजनीति का प्रदर्शन किया।
      • चोल शासकों को नॉटिकल टाइगर्स के रूप में वर्णित किया जाता है, जो संगठित नौसैन्य शक्ति और विदेशी अभियानों का प्रतीक है।
    • इस प्रारंभिक अनुभव ने हिंद महासागर को खतरे के बजाय एक अवसर के रूप में स्थापित किया।
  • औपनिवेशिक और स्वतंत्रता के बाद का प्रारंभिक काल: ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने भारतीय समुद्री शक्ति को साम्राज्यवादी हितों के अधीन कर दिया, जिससे स्वदेशी नौसैन्य परंपराएँ नष्ट हो गईं।
    • स्वतंत्रता के बाद, से ही भारत को महाद्वीपीय सुरक्षा का दृष्टिकोण विरासत में प्राप्त हुआ है, जो विभाजन और पाकिस्तान के साथ शत्रुता, वर्ष 1962 के युद्ध तथा निरंतर सीमावर्ती और आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों से आकार ग्रहण करता रहा।
    • परिणामस्वरूप, प्रारंभिक रणनीतिक चेतावनियों के बावज़ूद समुद्री मुद्दे प्रथम की बजाय दूसरे स्थान पर रहे।
    • हालाँकि जवाहरलाल नेहरू ने चेतावनी दी कि हिंद महासागर पर नियंत्रण भारत के व्यापार और स्वतंत्रता को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है, हालाँकि नीतिगत ध्यान मुख्य रूप से भू-केंद्रित ही बना रहा।
  • समुद्री पुनर्संरेखण: वर्ष 1980 के दशक के मध्य में एक रणनीतिक बदलाव देखने को मिला। समुद्री मार्गों से होने वाले व्यापार और ऊर्जा आयात पर बढ़ती निर्भरता, नौसैनिक आधुनिकीकरण तथा ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ बेहतर होते संबंधों के चलते भारत ने समुद्रों को केवल रक्षात्मक बफर नहीं, बल्कि रणनीतिक राजमार्ग के रूप में देखना शुरू किया
    • आर्थिक उदारीकरण ने वैश्विक समुद्री आपूर्ति शृंखलाओं के साथ एकीकरण को गहरा किया, हालाँकि समुद्री दृष्टिकोण हिंद महासागर से इंडो-पैसिफिक तक विस्तृत हुआ, जिससे जापान, फ्राँस, ऑस्ट्रेलिया और आसियान के साथ अभिसरण सक्षम हुआ और नियम-आधारित व्यवस्था को मज़बूती मिली।
    • 2000 के दशक के प्रारंभ में, अरब सागर में भारतीय नौसेना की विस्तारित पहुँच और समुद्री डकैती-रोधी अभियानों ने भारत को एक नेट सुरक्षा प्रदाता के रूप में स्थापित किया। इस दौरान समुद्री कूटनीति, संयुक्त सैन्य अभ्यास और मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (HADR) भारत के प्रभाव के प्रमुख उपकरण बनकर उभरे।
    • भारत की समुद्री रणनीति अब पारंपरिक रक्षा-केंद्रित दृष्टिकोण से आगे बढ़कर पड़ोसी देशों में क्षमता-निर्माण के साथ समुद्री सुरक्षा को एकीकृत करती है तथा ब्लू इकॉनमी, अंडरवॉटर डोमेन अवेयरनेस, समुद्री प्रौद्योगिकियों, जलवायु अनुकूलन और तटीय सुरक्षा जैसे बहुआयामी क्षेत्रों को समाहित करती है। इस व्यापक दृष्टिकोण में महासागरों को रणनीतिक, आर्थिक एवं पारिस्थितिक परिसंपत्तियों के रूप में परिकल्पित किया गया है।
  • कानूनी आधार और विनियामक आधुनिकीकरण: भारत ने औपनिवेशिक काल के कानूनों का स्थान लेकर मर्चेंट शिपिंग अधिनियम, 2025, समुद्र द्वारा माल परिवहन अधिनियम, 2025 तथा भारतीय बंदरगाह अधिनियम, 2025 के माध्यम से अपने समुद्री शासन का आधुनिकीकरण किया है।
    • ये सुधार भारतीय कानूनों को वैश्विक सम्मेलनों (Global Conventions) के अनुरूप बनाते हैं, सुरक्षा और पर्यावरणीय मानकों को सुदृढ़ करते हैं तथा नियम-आधारित विनियामक ढाँचे के माध्यम से ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस में सुधार करते हैं।
  • नीतिगत दृष्टि: मैरीटाइम इंडिया विज़न, 2030 और मैरीटाइम अमृत काल विज़न, 2047 के माध्यम से भारत की समुद्री दृष्टि का उद्देश्य भारत को एक वैश्विक समुद्री केंद्र (Global Maritime Hub) के रूप में परिवर्तित करना है। 
    • भारत की समुद्री रणनीति SAGAR विज़न द्वारा निर्देशित है, जो हिंद महासागर को साझा क्षेत्र के रूप में देखती है जो सामूहिक सुरक्षा और विकास पर आधारित है, विशेषकर ग्लोबल साउथ के लिये।
    • इस दृष्टिकोण का वैश्विक विस्तार MAHASAGAR विज़न के माध्यम से किया गया है, जिसमें समुद्री सुरक्षा को विकास और स्थिरता के साथ एकीकृत किया गया है।
  • संस्थागत तैयारी: इसे इंडो-पैसिफिक ओशंस इनिशिएटिव के माध्यम से सुदृढ़ किया गया है, जो भारत के रणनीतिक उद्देश्यों को व्यापक इंडो-पैसिफिक क्षेत्र तक विस्तारित करता है।

भारत की समुद्री रणनीति के समक्ष क्या चुनौतियाँ हैं?

  • चीन का IOR में प्रवेश: बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत दोहरे उपयोग वाले बंदरगाहों (ग्वादर, हंबनटोटा, कयॉकफ्यू) और पनडुब्बियों की तैनाती के माध्यम से हिंद महासागर क्षेत्र में चीन के व्यवस्थित विस्तार ने क्षेत्र में शक्ति संतुलन को परिवर्तित किया है।
    • भारत को जहाज़ निर्माण क्षमता, रक्षा-औद्योगिक पैमाना और लॉजिस्टिक्स पहुँच में संरचनात्मक असमानता का सामना करना पड़ता है। चुनौती यह है कि दबाव का निरोध किया जाए बिना किसी अस्थिर सुरक्षा दुविधा या शून्य-योग नौसैनिक प्रतिस्पर्द्धा को उत्पन्न किये।
  • पड़ोसी क्षेत्र में अप्रभावी समुद्री शासन: दक्षिण एशियाई तटीय राज्यों में अप्रभावी संस्थाएँ, भ्रष्टाचार और अभिजात वर्ग का वर्चस्व बाहरी रणनीतिक प्रभुत्व को सक्षम बनाते हैं।
    • श्रीलंका के हंबनटोटा अनुभव यह दर्शाते हैं कि सिद्धांत या विचारधारा नहीं, बल्कि शासन में कमियाँ चीन के साथ संरेखण को प्रेरित करती हैं।
    • भारत के लिये समय पर, वित्तीय रूप से प्रतिस्पर्द्धी और संस्थागत रूप से विश्वसनीय विकल्प प्रदान करना कठिन है, जिससे यह अपने नज़दीकी पड़ोसी क्षेत्र में समुद्री शासन मानकों को आकार देने में सीमित रहता है।
  • क्षमता अंतर और बल प्रक्षेपण की सीमाएँ: भारतीय नौसेना हॉर्मुज जलडमरूमध्य से मलक्का जलडमरूमध्य तक विस्तृत क्षेत्र में कार्य करती है, लेकिन स्वदेशी जहाज़ निर्माण में विलंब, पनडुब्बियों की कमी और इंजन, सेंसर व कॉम्बैट सिस्टम के आयात पर निर्भरता के कारण लगातार चुनौतियों का सामना करती है।
    • राजकोषीय सीमाएँ प्लेटफॉर्म-केंद्रित आधुनिकीकरण से नेटवर्क-केंद्रित समुद्री प्रभुत्व की ओर संक्रमण को और जटिल बना देती हैं।
  • इंडो-पैसिफिक की महत्त्वाकांक्षा और साझेदार अस्थिरता: एक समय में वैश्विक रणनीतिक विमर्श का केंद्र रहे इंडो-पैसिफिक ने यूक्रेन, गाज़ा और लाल सागर में संघर्षों तथा चीन के प्रति अमेरिकी जोखिम की बदलती धारणा के कारण गति खो दी है।
    • भारत को अब क्वाड सहयोग को बिना किसी औपचारिक गठबंधन के संचालित करना है, जिसमें रणनीतिक स्वायत्तता, साझेदारों की अपेक्षाएँ और ब्लॉक-राजनीति से बचाव का संतुलन बनाना शामिल है, जिससे सतत समुद्री समन्वय और अधिक जटिल हो गया है।
  • आर्थिक जोखिम और चोक-पॉइंट भेद्यता: हॉर्मुज और बाब एल-मंडेब के माध्यम से समुद्री ऊर्जा मार्गों पर भारत की निर्भरता इसे क्षेत्रीय अस्थिरता, समुद्री डकैती और समुद्री आतंकवाद से उत्पन्न होने वाले व्यवधानों के प्रति संवेदनशील बनाती है।
  • जलमग्न क्षेत्र में तकनीकी कमी: समुद्री प्रतिस्पर्द्धा की अगली सीमा सतह के नीचे स्थित है।
    • अंडरवॉटर डोमेन अवेयरनेस (UDA), समुद्रतल निगरानी, स्वायत्त पनडुब्बी प्रणालियों और साइबर-समुद्री एकीकरण में भारत की कमी, विवादित हिंद महासागर क्षेत्र में उसकी निवारक क्षमता तथा स्थितिजन्य जागरूकता को कमज़ोर करने का जोखिम उत्पन्न करती है।
  • बल गुणक के रूप में जलवायु परिवर्तन: समुद्र-स्तर में वृद्धि, चरम मौसम की घटनाएँ और तटीय कटाव अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह जैसे द्वीपीय क्षेत्रों तथा महत्त्वपूर्ण नौसैनिक अवसंरचना के लिये गंभीर जोखिम उत्पन्न कर रहे हैं।
    • साथ ही हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में जलवायु-प्रेरित मानवीय संकट भारत को आपदा प्रतिक्रिया और स्थिरीकरण की भूमिकाओं में लगातार अधिक शामिल करेंगे, जिससे पारंपरिक सुरक्षा अभियानों से परे नौसैनिक संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा।

भारत की समुद्री रणनीति को मज़बूत बनाने हेतु क्या कदम उठाए जा सकते हैं?

वैधानिक एकीकरण: समुद्री सुरक्षा रणनीति (2015), सागरमाला और ब्लू इकॉनमी नीति को समन्वित करते हुए एक समेकित राष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा ढाँचा स्थापित किया जाए, जिसमें नौसेना, तटरक्षक बल, बंदरगाहों और तटीय राज्यों की स्पष्ट कानूनी भूमिकाएँ निर्धारित हों।

अंडरवॉटर डोमेन अवेयरनेस: नौसेना–इसरो–वैज्ञानिक संस्थानों के एकीकरण के माध्यम से UDA को एक राष्ट्रीय मिशन के रूप में क्रियान्वित किया जाए, ताकि समुद्रतल के केबलों, अपतटीय परिसंपत्तियों और विशेष आर्थिक क्षेत्रों (EEZ) की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

क्षेत्रीय नियम-निर्माण: हिंद महासागर के तटीय देशों को संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून अभिसमय (UNCLOS)- अनुरूप समुद्री कानूनों, तटरक्षक विधानों और EEZ शासन को लागू करने में सहायता प्रदान की जाए, ताकि सहयोग को दीर्घकालिक रणनीतिक समन्वय में बदला जा सके।

जलवायु–सुरक्षा अभिसरण: बंदरगाहों, नौसैनिक अड्डों और द्वीपीय क्षेत्रों को जलवायु-संवेदनशील महत्त्वपूर्ण अवसंरचना के रूप में मानते हुए समुद्री सुरक्षा योजना को राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC) और तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) मानकों के साथ संरेखित किया जाए।

समुद्री कूटनीति के लिये मानव पूंजी: दीर्घकालिक समुद्री नेतृत्व के लिये आवश्यक नागरिक और सैन्य विशेषज्ञता विकसित करने हेतु महासागर विज्ञान, हाइड्रोग्राफी, समुद्री साइबर विशेषज्ञता और रणनीतिक अध्ययन में निवेश किया जाए।

निष्कर्ष

भारत का समुद्री दृष्टिकोण अब कोई वैकल्पिक या गौण विषय नहीं है, समुद्र अब राष्ट्रीय सुरक्षा, व्यापार और ऊर्जा प्रवाह, जलवायु प्रतिरोध क्षमता और क्षेत्रीय नेतृत्व को आकार देने में निर्णायक भूमिका निभाता है। महासागर भारत के रणनीतिक, आर्थिक और पर्यावरणीय हितों के केंद्र में हैं और एक महाशक्ति के रूप में भारत का उदय उतना ही समुद्री क्षेत्र में उसकी सक्रिय भागीदारी पर निर्भर करेगा जितना कि स्थलीय घटनाओं पर।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. भारत की समुद्री रणनीति का विकास भूमि-केंद्रित दृष्टिकोण से लेकर हिंद-प्रशांत पर केंद्रित दृष्टिकोण तक कैसे हुआ, इसका विश्लेषण कीजिये?

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. भारत की समुद्री रणनीति में SAGAR क्या है?
SAGAR (क्षेत्र में सभी के लिये सुरक्षा और विकास) हिंद महासागर को साझा संपदा के रूप में देखता है तथा विशेष रूप से ग्लोबल साउथ के लिये सामूहिक सुरक्षा, क्षमता निर्माण एवं विकास पर केंद्रित है।

2. महासागर विज़न क्या है?
महासागर SAGAR को वैश्विक स्तर पर विस्तारित करता है, समुद्री सुरक्षा, विकास और स्थिरता को हिंद महासागर से परे एकीकृत करता है तथा भारत की व्यापक नेतृत्व महत्त्वाकांक्षाओं को दर्शाता है।

3. भारत के लिये अंडरवाटर डोमेन अवेयरनेस (UDA) क्यों आवश्यक है?
अंडरवॉटर डोमेन अवेयरनेस (UDA) पनडुब्बियों की निगरानी, समुद्रतल के केबलों और अपतटीय परिसंपत्तियों की सुरक्षा तथा विवादित हिंद महासागर क्षेत्रों में समुद्री निवारक क्षमता सुनिश्चित करने के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

4. आज भारत को किन बड़ी समुद्री चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है?
मुख्य चुनौतियों में चीन का हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में विस्तार, नौसैनिक क्षमता में कमी, चोक-पॉइंट की कमज़ोरियाँ, पड़ोसी देशों में कमज़ोर समुद्री शासन और जलवायु परिवर्तन से संबंधित सुरक्षा जोखिम शामिल हैं।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

प्रिलिम्स

प्रश्न. 'क्षेत्रीय सहयोग के लिये इंडियन ओशन रिम एसोसिएशन फॉर रीजनल को-ऑपरेशन' (IOR-ARC) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2015)

  1. इसकी स्थापना हाल ही में घटित समुद्री डकैती की घटनाओं और तेल अधिप्लाव (आयल स्पिल्स) की दुर्घटनाओं के प्रतिक्रियास्वरूप की गई है।
  2. यह एक ऐसी मैत्री है जो केवल समुद्री सुरक्षा हेतु है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (d)


मेन्स

प्रश्न. भारत में समुद्री सुरक्षा चुनौतियाँ क्या हैं? समुद्री सुरक्षा में सुधार के लिये की गई संगठनात्मक, तकनीकी और प्रक्रियात्मक पहलों की विवेचना कीजिये। (2022)


वर्षांत समीक्षा 2025: व्यय विभाग

स्रोत: पीआईबी

चर्चा में क्यों?

वित्त मंत्रालय का व्यय विभाग (DoE) बड़े पैमाने पर लाभों के डिजिटलीकरण, राज्यों में रणनीतिक पूंजी निवेश और व्यापक नीतिगत सुधारों के माध्यम से वित्तीय प्रबंधन में परिवर्तनकारी क्षमता प्रदर्शित कर चुका है।

व्यय विभाग की मुख्य उपलब्धियाँ क्या हैं?

  • पारदर्शिता के लिये DBT का विस्तार: सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन प्रणाली (PFMS) वर्ष 2025-26 में 966 प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) योजनाओं की आधारशिला बन गई है, जिससे 210.56 करोड़ लेनदेन (31 दिसंबर, 2025 तक) के माध्यम से लाभार्थियों को 2.87 लाख करोड़ रुपये सीधे और वास्तविक समय में भुगतान किये गए।
    • प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (Direct Benefit Transfer–DBT) से संबंधित ओपन हाउस सेशंस एवं क्षेत्रीय सम्मेलनों के माध्यम से नागरिक सहभागिता को सुदृढ़ कर शासन को अधिक उत्तरदायी, समावेशी एवं नागरिक-उन्मुख बनाया जा रहा है। इसके साथ ही केंद्र और राज्यों के मध्य बेहतर समन्वय स्थापित कर सरकारी निधियों के पारदर्शी, दक्ष तथा जवाबदेह प्रबंधन को सुनिश्चित किया जा रहा है, ताकि संसाधनों का दुरुपयोग रोका जा सके एवं लाभ का प्रेषण सही पात्रों तक समयबद्ध रूप से हो सके।
  • राज्यों में पूंजी निवेश को बढ़ावा देना:पूंजीगत निवेश हेतु राज्यों को विशेष सहायता (SASCI) योजना’ को लागू किया गया, जिसके तहत आवंटन 12,000 करोड़ रुपये (2020-21) से बढ़ाकर 1,50,000 करोड़ रुपये (2025-26) किया गया।
    • वर्ष 2020-21 से अब तक राज्यों को 4,49,845 करोड़ रुपये वितरित किये गए हैं, जिससे उनकी उत्पादक क्षमता में वृद्धि हो और निजी निवेश को प्रोत्साहन मिले।
    • Covid-19 महामारी के बीच वर्ष 2020-21 में शुरू की गई 'SASCE' (राज्यों को पूंजीगत व्यय के लिये विशेष सहायता) योजना राज्यों को विशेष रूप से पूंजीगत व्यय हेतु 50 वर्षीय ब्याजमुक्त ऋण प्रदान करती है। यह आर्थिक सुधार को गति देती है, क्योंकि पूंजीगत व्यय का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) पर 'उच्च गुणक प्रभाव/मल्टीप्लायर इफेक्ट' बहुत अधिक होता है, इसमें खर्च किये गए प्रत्येक ₹1 के बदले ₹3 का आर्थिक लाभ प्राप्त होता है।
  • सुधारों से जुड़े प्रोत्साहनों के साथ राज्यों को उधार की सुविधा: 15वें वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुरूप वर्ष 2025-26 के लिये राज्यों की शुद्ध उधार सीमा (NBC) को सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) के 3% पर निर्धारित किया गया।
  • सार्वजनिक खरीद प्रणाली का आधुनिकीकरण: व्यापार सुगमता बढ़ाने के लिये खरीद मैनुअलों (सामान, परामर्श एवं गैर-परामर्श सेवाएँ, कार्य) में व्यापक संशोधन किया गया तथा रिवर्स ऑक्शन और परफॉर्मेंस सिक्योरिटी सुधार जैसी आधुनिक प्रक्रियाएँ लागू की गईं।
  • वित्त आयोग के अनुदानों और आपदा कोष का प्रबंधन: 15वें वित्त आयोग की अनुशंसाओं को लागू किया, जिसमें विकास-पश्चात राजस्व घाटा, स्थानीय निकायों और स्वास्थ्य क्षेत्र के लिये अनुदान जारी किये गए।
  • शिकायत निवारण: स्वचालित ग्राहक शिकायत निवारण प्रबंधन प्रणाली के माध्यम से प्रतिवर्ष 150,000 से अधिक शिकायतों के समाधान को सुव्यवस्थित किया गया।
  • वेतन संबंधी सुधार: केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के वेतन ढाँचों की समीक्षा और संशोधन के लिये 8वें केंद्रीय वेतन आयोग का गठन किया गया।

ऋण संबंधी प्रावधान

  • भारतीय संविधान के भाग बारह का अध्याय II संघ और राज्यों के ऋण से संबंधित है। इसमें दो प्रमुख प्रावधान हैं:
    • अनुच्छेद 292 के तहत भारत सरकार (केंद्र सरकार) द्वारा ऋण को नियंत्रित किया जाता है, जो उसे भारत की संचित निधि के संपार्श्विक ऋण लेने का अधिकार देता है, यह संसद द्वारा निर्मित कानून द्वारा निर्धारित सीमाओं के अधीन है।
    • अनुच्छेद 293 राज्यों द्वारा ऋण को नियंत्रित करता है।
  • अनुच्छेद 293 (3) स्पष्ट करता है कि एक राज्य, यदि वह केंद्र सरकार (या केंद्र या उसके पूर्ववर्ती से कोई बकाया ऋण/गारंटी) का ऋणी बना रहता है, तो उसे कोई अन्य ऋण लेने से पहले भारत सरकार की पूर्व सहमति प्राप्त करनी होगी।

वर्तमान ऋण संरचना

  • केंद्र सरकार के लिये, ऋण-से-GDP अनुपात वर्ष 2024–25 में 57.1% और 2025–26 में 56.1% होने का अनुमान है। सरकार का लक्ष्य इसे वर्ष 2030–31 तक 50 ± 1% तक पहुँचाना है।
  • वर्तमान में, राज्य सरकारें कुल सामान्य सरकारी ऋण का लगभग एक-तिहाई भाग धारित करती हैं, वर्ष 2014–15 और 2019–20 के बीच समग्र सार्वजनिक ऋण में वृद्धि के 50% से अधिक में योगदान दिया।

वित्त मंत्रालय

  • परिचय: वित्त मंत्रालय सरकार की वित्तीय व्यवस्था का प्रबंधन करता है और सभी आर्थिक एवं वित्तीय मामलों की देख-रेख करता है। इसकी ज़िम्मेदारियों में कराधान, वित्तीय विधान, वित्तीय संस्थान, पूंजी बाज़ार, केंद्र-राज्य वित्त तथा केंद्रीय बजट की तैयारी शामिल हैं।
    • यह भारतीय राजस्व सेवा, भारतीय आर्थिक सेवा, भारतीय लागत लेखा सेवा तथा भारतीय सिविल लेखा सेवा जैसी सेवाओं/कैडरों का भी नियंत्रण करता है।
  • वित्त मंत्रालय के अंतर्गत विभाग: यह मंत्रालय छह विभागों के माध्यम से कार्य करता है, जिनमें आर्थिक कार्य विभाग, राजस्व विभाग, व्यय विभाग तथा वित्तीय सेवाएँ विभाग शामिल हैं।
    • आर्थिक कार्य विभाग: यह केंद्रीय बजट की तैयारी करता है तथा समष्टि-अर्थव्यवस्था और राजकोषीय नीति, सार्वजनिक ऋण और पूंजी बाज़ारों का प्रबंधन करता है। यह मुद्रा निर्माण, बाह्य वित्तीय संबंधों (जैसे– G20, BRICS) का संचालन करता है और निवेशों (FDI, NIIF) की निगरानी भी करता है।
    • वित्तीय सेवाएँ विभाग: यह बैंकिंग, बीमा और पेंशन सुधारों की देख-रेख करता है, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSB) और NABARD जैसे वित्तीय संस्थानों का प्रबंधन करता है, तथा PMJDY, PMSBY और PMMY जैसी प्रमुख योजनाओं का संचालन करता है।

निष्कर्ष

व्यय विभाग डिजिटल प्लेटफाॅर्म, सुधार-आधारित प्रोत्साहनों, पूंजीगत व्यय समर्थन तथा खरीद सुधारों के माध्यम से राजकोषीय दक्षता और सहकारी संघवाद को सुदृढ़ करता है। ये प्रयास पारदर्शी शासन, राज्य वित्त और सेवा प्रदायगी को प्रबल करते हुए दीर्घकालिक आर्थिक विकास लक्ष्यों के अनुरूप सार्वजनिक व्यय को संरेखित करते हैं।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्र. आर्थिक विकास को बढ़ावा देने में राज्यों को पूंजीगत व्यय हेतु विशेष सहायता योजना की भूमिका का परीक्षण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. भारत के DBT पारिस्थितिक तंत्र में PFMS की क्या भूमिका है?
PFMS वास्तविक समय में पारदर्शी निधि अंतरण को सक्षम बनाता है और 966 DBT योजनाओं का समर्थन करता है, जिससे लास्ट-माइल डिलीवरी और राजकोषीय जवाबदेही सुनिश्चित होती है।

2. राज्यों को पूंजीगत व्यय हेतु विशेष सहायता योजना क्या है?
यह योजना राज्यों को 50 वर्षों की ब्याज-मुक्त ऋण सहायता प्रदान करती है, जिससे पूंजीगत व्यय बढ़े, निजी निवेश आकर्षित हो और उत्पादक क्षमता में वृद्धि हो।

3. नेट बॉरोइंग सीलिंग राजकोषीय अनुशासन को कैसे समर्थन देती है?
15वें वित्त आयोग के अनुसार GSDP के 3% की नेट बॉरोइंग सीलिंग राज्यों की राजकोषीय स्वायत्तता और समष्टि-अर्थव्यवस्था में संतुलन स्थापित करती है।

 

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न 

प्रिलिम्स 

प्रश्न. निम्नलिखित में से किसको/किनको भारत सरकार के पूंजी बजट में शामिल किया जाता है? (2016)

1. सड़कों, इमारतों, मशीनरी आदि जैसी परिसंपत्तियों के अधिग्रहण पर व्यय 

2. विदेशी सरकारों से प्राप्त ऋण

3. राज्यों और संघ राज्यक्षेत्रों को अनुदत्त ऋण और अग्रिम

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1

(b) केवल 2 और 3

(c) केवल 1 और 3

(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (d)


मेन्स

प्रश्न. प्रत्यक्ष लाभ अंतरण योजना के माध्यम से सरकारी प्रदेय व्यवस्था में सुधार एक प्रगतिशील कदम है, किंतु इसकी अपनी सीमाएँ भी हैं। टिप्पणी कीजिये। (2022)


शक्सगाम घाटी विवाद

स्रोत: एफई

भारत ने शक्सगाम घाटी में चीन द्वारा की जा रही अवसंरचनात्मक गतिविधियों को अस्वीकार करते हुए, चीन–पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के अंतर्गत संचालित परियोजनाओं को अवैध एवं अमान्य घोषित किया तथा यह स्पष्ट किया कि शक्सगाम घाटी भारत का अविभाज्य अंग है।

शक्सगाम घाटी

  • परिचय: शक्सगाम घाटी (ट्रांस-काराकोरम ट्रैक्ट) काराकोरम पर्वतमाला के पूर्वी भाग में ऊँचाई पर स्थित एक विरल आबादी वाला क्षेत्र है। यह सियाचिन हिमनद के उत्तर में अवस्थित है, जो पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर (PoK) के हुंजा–गिलगित क्षेत्र का भाग है तथा उत्तर दिशा में चीन के शिनजियांग प्रांत से सीमा साझा करता है।
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: वर्ष 1947 से पूर्व यह क्षेत्र जम्मू एवं कश्मीर रियासत का अभिन्न अंग था। वर्ष 1947–48 के भारत–पाक संघर्ष के उपरांत पाकिस्तान ने इसके कुछ भागों पर कब्जा कर लिया तथा 1963 के चीन–पाकिस्तान सीमा समझौते के अंतर्गत शक्सगाम घाटी को चीन को सौंप दिया।
    • भारत वर्ष 1963 के इस समझौते को अवैध मानता है, क्योंकि भारत के अनुसार पाकिस्तान को जम्मू–कश्मीर एवं लद्दाख से संबंधित भू-भाग के हस्तांतरण का कोई वैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं था।
  • वर्तमान प्रशासन: वर्तमान में यह क्षेत्र चीन के प्रशासनिक नियंत्रण में है और शिनजियांग उइगर स्वायत्त क्षेत्र के अंतर्गत प्रशासित किया जा रहा है, जहाँ चीन द्वारा CPEC से संबद्ध सड़कों सहित व्यापक अवसंरचनात्मक विकास किया गया है।
    • CPEC का प्रमुख उद्देश्य पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह को चीन के काशगर (शिनजियांग) से जोड़ना है, जिससे चीन को मलक्का जलडमरूमध्य को बायपास करते हुए एक वैकल्पिक ऊर्जा आपूर्ति मार्ग प्राप्त हो सके।
  • रणनीतिक एवं सैन्य महत्त्व: सियाचिन हिमनद के निकट इसकी अवस्थिति पाकिस्तान की सैन्य तैनाती पर निगरानी की सामरिक क्षमता प्रदान करती है, जबकि काराकोरम दर्रे तक पहुँच चीन की सैन्य गतिविधियों पर सतत निगरानी में सहायक सिद्ध होती है।

Shaksgam_Valley

और पढ़ें: कश्मीर मुद्दे पर UNCHR की रिपोर्ट