डेली न्यूज़ (18 Feb, 2026)



वन अधिकार अधिनियम के खिलाफ जनजातियों का विरोध प्रदर्शन

प्रारंभिक परीक्षा के लिये: वन अधिकार अधिनियम (FRA)PESA अधिनियम, अनुसूचित क्षेत्र, व्यक्तिगत वन अधिकार (IFR), सामुदायिक वन अधिकार (CFR), न्यूनतम समर्थन मूल्य

मुख्य परीक्षा के लिये: वन अधिकार अधिनियम (FRA) के कार्यान्वयन में कमियाँ, जनजातीय भूमि अधिकार, केंद्र-राज्य शासन संबंधी मुद्दे, वनवासियों की आजीविका की सुरक्षा, संरक्षण बनाम अधिकार संबंधी वार्त्ता  

स्रोत: द हिंदू 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में महाराष्ट्र में जनजातीय किसानों ने वन अधिकार अधिनियम (FRA) के प्रभावी कार्यान्वयन, भूमि के पट्टों, सिंचाई, रोज़गार और शिक्षा सुधारों की मांग को लेकर 'लंबी पदयात्रा' निकाली।

सारांश

  • महाराष्ट्र में जनजातीय विरोध प्रदर्शन वन अधिकार अधिनियम (FRA) को लागू करने में लगातार हो रही विफलताओं को रेखांकित करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप अनुसूचित क्षेत्रों में भूमि अधिकार असुरक्षित हैं और आजीविका अनिश्चित बनी हुई है।
  • खंडित भूमि रिकॉर्ड, वन अधिकार दावों का बड़े पैमाने पर खारिज होना और सीमांत ग्रामसभा जैसे संरचनात्मक मुद्दे सहभागी वन शासन को कमज़ोर करना जारी रखते हैं।
  • कृषि संकट, अपर्याप्त सिंचाई, MSP कवरेज की कमी और रोज़गार एवं शिक्षा में अंतराल ने जनजातीय समुदायों के बीच सामाजिक-आर्थिक सुभेद्यता को और बढ़ा दिया है।
  • यह आंदोलन अधिकार-आधारित और आजीविका-केंद्रित शासन दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल देता है, जो संरक्षण के उद्देश्यों को सामुदायिक भागीदारी और संवैधानिक सुरक्षा उपायों के साथ संतुलित करता हो।

वनों में रहने वाले समुदायों को किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है?

  • औपनिवेशिक काल से पूर्व: उपनिवेशवाद से पहले स्थानीय समुदायों के पास अपने क्षेत्र या उससे भी विस्तृत क्षेत्र के वनों पर पारंपरिक अधिकार थे। भले ही राजा या सरदार विशिष्ट वनों में शिकार के अधिकारों का दावा करते थे, फिर भी स्थानीय समुदायों की वनों से मिलने वाले अन्य सभी लाभों तक पहुँच बनी रहती थी।
  • औपनिवेशिक काल: औपनिवेशिक सरकार ने भारतीय वन अधिनियम, 1878 पेश किया, जो 'सर्वोपरि अधिकार' के विचार पर आधारित था (जिसका अर्थ है कि शासक का सदैव सभी संपत्ति पर स्वामित्व होता है)।
    • इमारती लकड़ी और राजस्व को अधिकतम करने के लिये वनों की कटाई और उनके स्वरूप को परिवर्तित करने हेतु इंपीरियल फॉरेस्ट डिपार्टमेंट की स्थापना की गई थी।
      • इसका कार्य 'राज्य' की संपत्ति को स्थानीय समुदायों से बचाना भी था, जिन्हें अब 'अतिक्रमणकारी' माना जाने लगा।
    • इस औपनिवेशिक वन नीति द्वारा थोपे गए अतिक्रमण के कई रूप थे:
      • वनों को अब मुख्य रूप से इमारती लकड़ी के संसाधन के रूप में देखा जाने लगा था, इसलिये झूम कृषि पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
      • कृषि भूमियों का तथाकथित सर्वेक्षण और अधिवास अपूर्ण था और पूर्ण रूप से राज्य (सरकार) के पक्ष में केंद्रित था।
      • वानिकी कार्यों के लिये श्रम सुनिश्चित करने हेतु 'वन ग्राम' बनाए गए, जहाँ परिवारों (मुख्यतः जनजातियों) को अनिवार्य श्रम (जो वास्तव में बँधुआ मज़दूरी थी) के बदले कृषि के लिये वन भूमि पट्टे पर दी गई थी।
      • चूँकि वन अब राज्य की संपत्ति थे, इसलिये वनोपज तक सीमित पहुँच अस्थायी और सशुल्क कर दी गई। यह पूरी तरह से पुलिस शक्तियों से लैस वन नौकरशाही की दया पर निर्भर था।
        • स्थानीय आजीविका की ज़रूरतों के लिये दी गई किसी भी छूट को 'विशेषाधिकार' कहा गया, जिसे किसी भी समय वापस लिया जा सकता था।
      • जहाँ‑जहाँ वन तक पहुँच की अनुमति भी दी जाती थी, वहाँ भी स्थानीय समुदाय को वन प्रबंधन का कोई अधिकार नहीं था, क्योंकि राज्य की ओर से मूल्यवान वनों की कटाई की जाती थी और अधिक उपयोग किये जाने वाले वनों को व्यवहारतः खुली पहुँच वाला क्षेत्र बना दिया जाता था।
  • स्वतंत्रता के बाद का युग: 
    • आज़ादी के बाद भी स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ। जब सरकार ने रियासतों और ज़मींदारी संपदाओं को जल्दबाजी में संघ में शामिल किया, तो वहाँ के निवासियों की जाँच किये बिना ही उनके वन क्षेत्रों को राज्य की संपत्ति घोषित कर दिया गया।
      • जो लोग पीढ़ियों से वहाँ रह रहे थे, वे अचानक ‘अतिक्रमणकारी’ घोषित कर दिये गए।
    • बढ़ती जनसंख्या की खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करने के उद्देश्य से सरकार ने 'अधिक भोजन उगाओ' जैसे विभिन्न अभियानों के तहत वन भूमि को पट्टे पर दिया। हालाँकि, इन पट्टों का उचित विनियमन कभी नहीं किया गया।
    • बांधों के कारण विस्थापित हुए लोगों को वैकल्पिक भूमि प्रदान नहीं की गई, जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने अंततः अन्यत्र वन भूमि पर 'अतिक्रमण' कर लिया।
    • वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 और वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 (FCA), ये दोनों ही मान्यता प्राप्त डोमेन के ढाँचे के भीतर परिकल्पित किये गए थे। 
      • अभयारण्य और राष्ट्रीय उद्यान स्थापित करने के लिये कई समुदायों को जबरन विस्थापित किया गया था। 
    • विकास परियोजनाओं हेतु वनों के उपयोग के दौरान स्थानीय निवासियों के विचारों को नज़रअंदाज़  कर दिया गया। पर्याप्त शुल्क वसूलने के बावजूद उनके जीवन पर पड़े नकारात्मक प्रभावों के लिये उन्हें उचित मुआवज़ा नहीं दिया गया।
      • कृषि योग्य वन भूमि को लंबे समय तक मान्यता न मिलने के कारण आदिवासी समुदायों द्वारा बार-बार बड़े पैमाने पर लामबंदी और लंबी पदयात्राएँ की गई हैं।

वन अधिकार अधिनियम, 2006 क्या है और इसके प्रावधान क्या हैं?

  • मान्यता: यह अधिनियम उन वनवासी अनुसूचित जनजातियों (FDST) और अन्य पारंपरिक वनवासियों (ओटीएफडी) को वन भूमि में वन अधिकार एवं कब्ज़े की मान्यता देता है और उन्हें यह अधिकार प्रदान करता है जो पीढ़ियों से ऐसे जंगलों में निवास कर रहे हैं।
  • पात्रता: वन अधिकारों का दावा कोई भी सदस्य या समुदाय कर सकता है जो 13 दिसंबर, 2005 से पहले कम-से-कम तीन पीढ़ियों (75 वर्ष) तक वास्तविक आजीविका आवश्यकताओं के लिये मुख्य रूप से वन भूमि में निवास करता रहा हो।
  • संरक्षण: यह पहल वनों के संरक्षण तंत्र को सुदृढ़ करती है, जिसके परिणामस्वरूप वन आश्रित समुदायों (FDST) और अन्य पारंपरिक वन निवासियों (OTFD) के लिये आजीविका एवं खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
  • विकेंद्रीकरण: ग्राम सभा FDST और OTFD को दिये जाने वाले व्यक्तिगत वन अधिकार (IFR) या सामुदायिक वन अधिकार (CFR) या दोनों की प्रकृति और सीमा निर्धारित करने की प्रक्रिया शुरू करने के लिये प्राधिकारी है।
  • इस अधिनियम में चार प्रकार के अधिकारों की पहचान की गई है:
    • स्वामित्व अधिकार: यह FDST (वन में रहने वाली अनुसूचित जनजातियाँ) और OTFD (अन्य पारंपरिक वनवासी) को उस भूमि पर स्वामित्व अधिकार प्रदान करता है जिस पर वे खेती करते हैं, जिसकी अधिकतम सीमा 4 हेक्टेयर है। यह स्वामित्व केवल उस भूमि पर लागू होगा जिस पर परिवार वास्तव में खेती कर रहा है और किसी भी नई भूमि का आवंटन नहीं किया जाएगा।
    • उपयोग के अधिकार: वन निवासियों को लघु वन उपज (MFP) इकट्ठा करने, चरागाह भूमि का उपयोग करने और पशुचारण मार्गों तक पहुँचने का कानूनी अधिकार है।
    • राहत एवं विकास संबंधी अधिकार: अवैध बेदखली या जबरन विस्थापन की स्थिति में नागरिकों को पुनर्वास और बुनियादी सुविधाओं का अधिकार प्राप्त है, हालाँकि यह अधिकार वन संरक्षण संबंधी प्रतिबंधों के अधीन होगा।
    • वन प्रबंधन अधिकार: इसमें किसी भी सामुदायिक वन संसाधन की रक्षा, पुनर्जनन, संरक्षण या प्रबंधन का अधिकार शामिल है, जिसे वे पारंपरिक रूप से सतत उपयोग के लिये संरक्षित और सुरक्षित करते आ रहे हैं।

वन अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन में क्या-क्या समस्याएँ हैं?

  • व्यक्तिगत अधिकार बनाम सामुदायिक अधिकार: कुछ राज्यों में राजनेताओं द्वारा व्यक्तिगत अधिकारों को प्रमुखता दिये जाने के कारण वन अधिकार अधिनियम (FRA) का स्वरूप बदलकर मात्र 'अतिक्रमण नियमितीकरण' योजना जैसा हो गया है। इस दृष्टिकोण से सामुदायिक अधिकारों की अनदेखी हुई है, जबकि ये अधिकार सतत वन प्रबंधन के लिये अपरिहार्य हैं।
  • व्यक्तिगत वन अधिकारों (IFR) की अपर्याप्त मान्यता: व्यक्तिगत वन अधिकारों की मान्यता में बाधाएँ हैं। यह प्रक्रिया असंगत तरीके से संचालित की गई है, जो अक्सर वन विभाग के प्रतिरोध, अन्य विभागों की उदासीनता और प्रौद्योगिकी के दुरुपयोग से प्रभावित होती है।
    • कुछ क्षेत्रों में कथित तौर पर 45% से अधिक दावों को खारिज कर दिया गया है और स्वीकृत किये गए कई दावों में वास्तव में खेती की गई भूमि की तुलना में छोटे भूमि क्षेत्र दिये गए हैं।
  • संचार का अभाव वाले क्षेत्रों में डिजिटल प्रक्रियाएँ: संचार का अभाव और निम्न साक्षरता दर वाले क्षेत्रों में डिजिटल प्रक्रियाएँ, जैसे– मध्य प्रदेश में वनमित्र सॉफ्टवेयर को लागू करने में चुनौतियाँ आई हैं। इन चुनौतियों के कारण मौजूदा अन्याय और बढ़ जाता है, जिससे दावों को प्रभावी ढंग से दर्ज करने और संसाधित करने में बाधा आती है।
  • सामुदायिक वन अधिकारों (CFR) की अपूर्ण मान्यता: वन अधिकार अधिनियम (FRA) को लागू करने में एक बड़ी कमी सामुदायिक वन अधिकारों (CFR) की धीमी और अपूर्ण मान्यता है। वन नौकरशाही इन अधिकारों को पहचानने में प्रतिरोध दिखाती है। यह प्रतिरोध स्थानीय समुदायों को उनके वनों के प्रबंधन में सशक्त बनाने की प्रक्रिया में बाधा डालता है तथा CFR के पूर्ण लाभ को प्राप्त होने से रोकता है।
  • वन ग्रामों की अनदेखी: अधिकांश राज्यों में ‘वन ग्रामों’ से संबंधित समस्याओं को पर्याप्त रूप से हल नहीं किया गया है, जो व्यापक और समग्र कार्यान्वयन की कमी को दर्शाता है।
    • वन अधिकार अधिनियम और PESA के तहत वैधानिक अधिकारों के बावजूद ग्राम सभाओं को दावे की सत्यापन तथा अनुमोदन प्रक्रिया में अक्सर हाशिये पर रखा जाता है।

FRA के कार्यान्वयन में समस्याओं को दूर करने के लिये आवश्यक कदम क्या हैं?

  • ग्राम सभा का सशक्तीकरण: सुनिश्चित कीजिये कि ग्राम सभा, जो गाँवों में स्थानीय स्वशासन का प्रतिनिधित्व करती है, वन प्रबंधन से संबंधित निर्णय प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग ले।
  • समावेशी निर्णय निर्माण: यह सुनिश्चित करने के लिये कि अधिकारधारियों के दृष्टिकोण और आवश्यकताओं को ध्यान में रखा जाए, उन्हें निर्णय प्रक्रिया में शामिल करने को बढ़ावा दिया जाना चाहिये।
  • जवाबदेही उपाय: FRA के किसी भी उल्लंघन या अनुपालन न करने की स्थिति में जवाबदेही उपाय लागू करें, यह सुनिश्चित करते हुए कि ज़िम्मेदार प्राधिकरणों को जवाबदेह ठहराया जाए।
  • एकीकृत योजना: ऐसी एकीकृत योजनाएँ विकसित कीजिये जो वनों के विकास और संरक्षण दोनों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखें, साथ ही वनवासियों के अधिकारों तथा हितों का सम्मान करें।
  • PESA के कार्यान्वयन को मज़बूत करना: अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासी आत्म-शासन को सुदृढ़ करें और शिक्षित आदिवासी युवाओं के लिये रोज़गार के अवसर बढ़ाएँ।
  • जीविकोपार्जन सहायता को भूमि अधिकारों से जोड़ना: सामाजिक-आर्थिक सशक्तीकरण के लिये सिंचाई, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) तक पहुँच और ग्रामीण बुनियादी ढाँचे के समर्थन को वन अधिकारों की मान्यता के साथ एकीकृत करें।
  • समन्वय आधारित विकास योजना: आदिवासी क्षेत्रों में वन अधिकारों की मान्यता को कृषि, जल प्रबंधन और शिक्षा संबंधित पहलों के साथ जोड़ें।

निष्कर्ष 

महाराष्ट्र में आदिवासी प्रदर्शन यह दर्शाते हैं कि अनुसूचित क्षेत्रों में भूमि प्रशासन, कल्याण सेवाओं की आपूर्ति और अधिकारों की मान्यता में गंभीर कमज़ोरियाँ हैं। वन अधिकार अधिनियम का कमज़ोर क्रियान्वयन, जीविकोपार्जन की असुरक्षा तथा प्रशासनिक अड़चनें आदिवासी संकट को बनाए रखती हैं। इसके समाधान के लिये एक ऐसा अधिकार-आधारित दृष्टिकोण आवश्यक है, जो संरक्षण एवं समुदाय की भागीदारी के बीच संतुलन बनाए, भूमि अभिलेखों को सही करे व स्थानीय स्वशासन को सुदृढ़ करे।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. वन अधिकार अधिनियम (FRA) में कार्यान्वयन की कमियाँ आदिवासी जीवन यापन और भागीदारी पर आधारित वन शासन दोनों को गंभीर रूप से प्रभावित करती हैं। महाराष्ट्र में हालिया विरोध प्रदर्शनों के संदर्भ में चर्चा कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. वन अधिकार अधिनियम, 2006 का मुख्य उद्देश्य क्या है?
अनुसूचित जनजातियों और पारंपरिक वनवासियों को कानूनी वन भूमि अधिकार प्रदान करना, जो पीढ़ियों से वन में रह रहे हैं।

2. FRA के तहत अधिकार कौन दावा कर सकता है?
वन क्षेत्र में कम-से-कम तीन पीढ़ियों (75 वर्ष) से रहने वाले अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासी, जो 13 दिसंबर, 2005 से पहले से निवास कर रहे हों।

3. FRA में ग्राम सभा की भूमिका क्या है?
ग्राम सभा दावों की पुष्टि करती है और व्यक्तिगत तथा सामुदायिक वन अधिकारों की प्रकृति व सीमा तय करती है।

4. वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत कौन-कौन से अधिकार मान्यता प्राप्त हैं?
शीर्षक अधिकार, उपयोग अधिकार, राहत और विकास संबंधी अधिकार, वन प्रबंधन अधिकार।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

प्रिलिम्स:

प्रश्न. राष्ट्रीय स्तर पर अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 के प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिये कौन-सा मंत्रालय नोडल एजेंसी है?

(a) पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय

(b) पंचायती राज मंत्रालय

(c) ग्रामीण विकास मंत्रालय

(d) जनजातीय मामलों का मंत्रालय

उत्तर: (d)


प्रश्न. भारत के संविधान की किस अनुसूची के अधीन जनजातीय भूमि का खनन के लिये निजी पक्षकारों को अंतरण अकृत और शून्य घोषित किया जा सकता है? (2019)

(a) तीसरी अनुसूची

(b) पाँचवीं अनुसूची

(c) नौवीं अनुसूची

(d) बारहवीं अनुसूची

उत्तर: (b)


प्रश्न. यदि किसी विशिष्ट क्षेत्र को भारत के संविधान की पाँचवीं अनुसूची के अधीन लाया जाए, तो निम्नलिखित कथनों में कौन-सा एक इसके परिणाम को सर्वोत्तम रूप से दर्शाता है? (2022)

(a) इससे जनजातीय लोगों की ज़मीनें गैर-जनजातीय लोगों को अंतरित करने पर रोक लगेगी।

(b) इससे उस क्षेत्र में एक स्थानीय स्वशासी निकाय का सृजन होगा।

(c) इससे वह क्षेत्र संघ राज्य क्षेत्र में बदल जाएगा।

(d) ऐसे क्षेत्रों वाले राज्य को विशेष श्रेणी का राज्य घोषित किया जाएगा।

उत्तर: (a)


प्रश्न. स्वतंत्रता के बाद अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के प्रति भेदभाव को दूर करने के लिये राज्य द्वारा की गई दो प्रमुख विधिक पहलें क्या हैं? (मुख्य परीक्षा- 2017)


भारत-फ्राँस विशेष वैश्विक रणनीतिक साझेदारी

प्रिलिम्स के लिये: इंडिया-एआई इंपैक्ट समिट  2026, महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकियाँ, स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR), शांति अधिनियम, 2025, इंडो-पैसिफिक महासागर पहल (IPOI), संयुक्त राष्ट्र महासागर सम्मेलन (UNOC-3), BBNJ संधि, युगे युगीन भारत संग्रहालय, शक्ति (सेना), वरुण (नौसेना), गरुड़ (वायु सेना), प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI), मानव अंतरिक्ष उड़ान केंद्र (HSFC), स्वच्छता और पादप स्वच्छता (SPS), सामान्य डेटा संरक्षण विनियमन (GDPR), महत्त्वपूर्ण खनिज, राष्ट्रीय समुद्री विरासत परिसर।                   

मेन्स के लिये: फ्राँस के राष्ट्रपति की भारत यात्रा के प्रमुख परिणाम, भारत-फ्राँस रणनीतिक साझेदारी के प्रमुख बिंदु, भारत-फ्राँस संबंधों में चिंता के प्रमुख क्षेत्र और आगे की राह।

स्रोत: IE

चर्चा में क्यों? 

फरवरी 2026 में भारत और फ्राँस ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को एक ऐतिहासिक ‘विशेष वैश्विक रणनीतिक साझेदारी’ के स्तर तक बढ़ाया। यह प्रगति इंडिया-एआई इंपैक्ट समिट , 2026 में फ्राँस के राष्ट्रपति के भारत दौरे के दौरान हुई, जहाँ उन्होंने इस शिखर सम्मेलन में भी भाग लिया।

  • रक्षा, नागरिक परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष, AI और बहुपक्षीय मामलों में सहयोग का विस्तार करने पर सहमति बनी, जिसका आधार 25 वर्षों का रणनीतिक सहयोग और होराइज़न 2047 रोडमैप है।

सारांश

  • भारत और फ्राँस ने अपने संबंधों को एक विशेष वैश्विक रणनीतिक साझेदारी (2026) के रूप में उन्नत किया है। इस साझेदारी के तहत रक्षा, परमाणु ऊर्जा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), अंतरिक्ष और हिंद-प्रशांत क्षेत्र जैसे प्रमुख क्षेत्रों में सहयोग का दायरा बढ़ाया जाएगा।
  • भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) और बढ़ते रणनीतिक निवेशों के समर्थन से द्विपक्षीय व्यापार 12.67 बिलियन यूरो तक पहुँच गया।
  • रक्षा परियोजनाओं में देरी, AI विनियमन में अंतर, व्यापार बाधाएँ और भू-राजनीतिक मतभेद जैसी चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं।

फ्राँस के राष्ट्रपति की भारत यात्रा के प्रमुख परिणाम क्या हैं?

  • रक्षा एवं सामरिक सहयोग: 26 राफेल-मरीन लड़ाकू जेट विमानों की खरीद के अनुबंध को अंतिम रूप दिया गया। H125 फाइनल असेंबली लाइन (टाटा-एयरबस) का उद्घाटन- भारत में निजी क्षेत्र की पहली हेलीकॉप्टर सुविधा। उभरती महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों के लिये एक संयुक्त उन्नत प्रौद्योगिकी विकास समूह का गठन।
  • परमाणु ऊर्जा सहयोग: वर्ष 2025 आशय घोषणा के तहत स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टरों (SMR) और उन्नत मॉड्यूलर रिएक्टरों (AMR) पर सहयोग को मज़बूत करना। जैतापुर परमाणु ऊर्जा संयंत्र परियोजना सहित मूल्य शृंखला में सहयोग।
    • फ्राँस ने वर्ष 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा के भारत के लक्ष्य और निजी निवेश की अनुमति देने वाले सुधारों (शांति अधिनियम, 2025) की सराहना की।
  • अंतरिक्ष सहयोग: तीसरा भारत-फ्राँस रणनीतिक अंतरिक्ष संवाद 2026 में आयोजित किया जाएगा। भारत अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष शिखर सम्मेलन (जुलाई 2026, फ्राँस) में भाग लेगा।
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता और नवाचार: भारत-फ्राँस नवाचार नेटवर्क का शुभारंभ, डिजिटल विज्ञान और प्रौद्योगिकी में अनुसंधान के लिये द्विपक्षीय डिजिटल विज्ञान केंद्र (फ्राँसीसी राष्ट्रीय संस्थान-विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के सहयोग से), उन्नत सामग्री के लिये संयुक्त केंद्र की स्थापना।
  • इंडो-पैसिफिक सहयोग: इंडो-पैसिफिक ओशंस इनिशिएटिव (IPOI) और इंडियन ओशन रिम एसोसिएशन (भारत की अध्यक्षता में) के तहत सहयोग को बढ़ावा देना। ऑस्ट्रेलिया और यूएई के साथ त्रिपक्षीय प्रारूपों में सहयोग
  • जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण: दोनों नेताओं ने जून 2025 में नीस में आयोजित संयुक्त राष्ट्र महासागर सम्मेलन (UNOC-3) की सफलता का स्वागत किया और राष्ट्रीय क्षेत्राधिकार से परे क्षेत्रों में समुद्री जैव विविधता के संरक्षण और सतत उपयोग पर समझौते (BBNJ संधि) के लागू होने की सराहना की
  • स्वास्थ्य सहयोग: स्वास्थ्य क्षेत्र में AI पर शोध केंद्र जिसमें सॉर्बोन विश्वविद्यालय, ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़, दिल्ली और पेरिस ब्रेन इंस्टिट्यूट शामिल हैं।
    • पैरिसांटे कैंपस और सेलुलर एवं आणविक प्लेटफॉर्म केंद्र, हेल्थ डेटा हब और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के बीच सहयोग।
  • शिक्षा और संस्कृति: वर्ष 2030 तक फ्राँस में 30,000 भारतीय छात्रों का लक्ष्य (वर्तमान में 10,000)। युगे युगीन भारत राष्ट्रीय संग्रहालय का France Muséums Développement के साथ सहयोग। रणनीतिक साझेदारी के 30 वर्ष पूरे होने पर नमस्ते फ्राँस 2028 कार्यक्रम।
  • क्षेत्रीय मुद्दे: 
    • यूक्रेन: UN चार्टर के सिद्धांतों (संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता) के आधार पर संघर्ष विराम और न्यायपूर्ण शांति के समर्थन में।
    • गाज़ा: गाज़ा के लिये शांति योजना (UNSC संकल्प 2803) और टू स्टेट सॉल्यूशन के समर्थन में।
    • ईरान: संवाद और कूटनीति पर ज़ोर।
  • बहुपक्षीय मुद्दे: फ्राँस ने भारत की UNSC की स्थायी सदस्यता के लिये दृढ़ समर्थन दोहराया; बड़े पैमाने पर अत्याचारों में वीटो के प्रयोग के नियमों पर समन्वय।
    • फ्राँसीसी राष्ट्रपति ने भारत के प्रधानमंत्री को फ्राँस में 2026 G7 शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिये आमंत्रित किया और अफ्रीका के साथ साझेदारी को मज़बूत करने हेतु मई 2026 में नैरोबी में होने वाले अफ्रीका फॉरवर्ड समिट में भी आमंत्रित किया।

भारत-फ्राँस रणनीतिक साझेदारी के प्रमुख बिंदु क्या हैं?

  • रणनीतिक साझेदारी: 1998 में स्थापित भारत–फ्राँस  रणनीतिक साझेदारी तीन मुख्य स्तंभों पर आधारित है: आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना, रणनीतिक स्वायत्तता के प्रति प्रतिबद्धता और एक-दूसरे की गठबंधनों और सैन्य गठनों में भाग न लेना।
  • रक्षा सहयोग: रक्षा सहयोग भारत–फ्राँस संबंधों का मुख्य स्तंभ है, जिसमें रूस के बाद फ्राँस भारत का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्त्ता बनकर उभरा है।
  • आर्थिक और व्यापारिक संबंध: फ्राँस भारत का तीसरा सबसे बड़ा यूरोपीय संघ व्यापारिक साझेदार है (नीदरलैंड और जर्मनी के बाद), जिसमें द्विपक्षीय व्यापार 2024-25 में 12.67 अरब यूरो तक दोगुना हो गया और यह आँकड़ा भारत-EU मुक्त व्यापार समझौते के बाद और बढ़ने की संभावना है।
    • भारत में 11वें सबसे बड़े विदेशी निवेशक के रूप में फ्राँस ने अप्रैल 2000 से मार्च 2025 तक कुल 9.79 अरब यूरो का निवेश किया है, जो कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) प्रवाह का 1.61% है।
  • नागरिक परमाणु सहयोग: भारत और फ्राँस ने वर्ष 2008 में नागरिक परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किये। दोनों देशों ने लागत-कुशल SMRs (स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर) पर साझेदारी करने पर सहमति व्यक्त की, जिसे तेज़ी से लागू करने के लिये यह भारत की 20,000 करोड़ रुपये की न्यूक्लियर एनर्जी मिशन द्वारा समर्थित है।
  • अंतरिक्ष और एयरोस्पेस सहयोग: वर्ष 2021 में ISRO और CNES ने बंगलुरु के मानव अंतरिक्ष उड़ान केंद्र (HSFC) में एक नया अंतरिक्ष सहयोग समझौता किया। भारत के अंतरिक्ष स्टार्टअप्स को फ्राँस की AI-आधारित उपग्रह अनुप्रयोगों में विशेषज्ञता से लाभ मिल रहा है।
    • यह ISRO और CNES दोनों की एक संयुक्त उपग्रह मिशन है, जिसे त्रिशना मिशन (TRISHNA Mission) कहा जाता है, जिसका पूरा नाम है थर्मल इंफ्रारेड इमेजिंग सैटेलाइट फॉर हाई-रिज़ॉल्यूशन नेचुरल रिसोर्स असेसमेंट
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI): दोनों देशों ने भारत-फ्राँस कृत्रिम बुद्धिमत्ता रोडमैप जारी किया है, जो सुरक्षित, खुले, विश्वसनीय और भरोसेमंद AI पर केंद्रित है। भारतीय स्टार्टअप्स फ्राँसीसी स्टार्टअप इन्क्यूबेटर स्टेशन F में भाग ले रहे हैं।
  • सागरीय सहयोग: सागरीय सहयोग भारत-फ्राँस ब्लू इकॉनमी और महासागर शासन रोडमैप (2022) के मार्गदर्शन में किया जाता है। फ्राँस, अपने इंडो-पैसिफिक क्षेत्रों के साथ, भारत की स्वतंत्र, खुली और नियम-आधारित सागरीय व्यवस्था की दृष्टि के साथ तालमेल रखता है।

भारत-फ्राँस संबंधों में मुख्य चिंताजनक क्षेत्र क्या हैं?

  • रक्षा खरीद और तकनीकी हस्तांतरण में विलंब: राफेल जेट, स्कॉर्पीन पनडुब्बियाँ और जेट इंजन सहयोग जैसे परियोजनाएँ अनुबंध वार्त्ता, नीतिगत बदलाव और स्थानीयकरण की मांगों के कारण धीमी हुईं।
  • भिन्न रक्षा और सुरक्षा प्राथमिकताएँ: भारत का क्षेत्रीय दृष्टिकोण और ‘गैर-संरेखित’ नीति कभी-कभी फ्राँस के वैश्विक हितों से टकराती है (जैसे– रूस-यूक्रेन संघर्ष पर भिन्न रुख)।
  • बाज़ार पहुँच संबंधी मुद्दे: फ्राँस अपनी फार्मास्यूटिकल, लक्ज़री उत्पाद और रक्षा उद्योगों के लिये अधिक पहुँच चाहता है, जबकि भारत आईटी, कृषि और जेनेरिक दवाओं हेतु आसान प्रवेश की मांग करता है। भारत को सैनिटरी और फाइटो सैनिटरी (SPS) नियमों के कारण फ्राँस में निर्यात करने में कठिनाइयाँ आती हैं, जिससे भारतीय उत्पादों का फ्राँसीसी बाज़ार में प्रवेश बाधित होता है।
  • वैश्विक AI और डेटा नियमों पर असहमति: फ्राँस EU के कड़े सामान्य डेटा संरक्षण विनियमन (GDPR) मॉडल का समर्थन करता है, जबकि भारत अपनी डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम, 2023 के तहत लचीले और नवाचार-अनुकूल दृष्टिकोण को प्राथमिकता देता है।
    • ओपन-सोर्स AI, साइबर सुरक्षा मानदंडों और डिजिटल संप्रभुता पर मतभेद गहन AI सहयोग को सीमित कर सकते हैं।
  • रणनीतिक स्वायत्तता पर मतभेद: ऊर्जा और सुरक्षा के लिये रूस के साथ भारत के मज़बूत संबंध फ्राँस के साथ तनाव उत्पन्न करते हैं, जिसने यूक्रेन पर रूस के आक्रमण का कड़ा विरोध किया है। भारत ने यूक्रेन युद्ध के बाद नाटो (NATO) के नेतृत्व वाले रूस पर प्रतिबंधों में शामिल होने से इनकार कर दिया, हालाँकि फ्राँस यूक्रेन का एक प्रमुख सैन्य समर्थक रहा है।
  • प्रवासन और गतिशीलता पर प्रतिबंध: बढ़ते संबंधों के बावज़ूद, वीजा प्रतिबंध, वर्क परमिट की सीमाएँ अभी भी भारतीय छात्रों और पेशेवरों के लिये चुनौतियाँ बनी हुई हैं।
    • भारत अपने कुशल कार्यबल के लिये आवास और काम के अवसरों की तलाश में है, लेकिन फ्राँस यूरोपीय संघ (EU) की व्यापक प्रवासन नीतियों को प्राथमिकता देता है, जिससे लचीलापन सीमित हो जाता है।

भारत-फ्राँस संबंधों को और सुदृढ़ करने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?

  • रक्षा और सुरक्षा सहयोग को गहरा करना: रक्षा प्रौद्योगिकियों में संयुक्त उत्पादन और अनुसंधान को गति देना, जिसमें प्रिसीजन-गाइडेड मिसाइलों, हेलीकॉप्टरों और उन्नत जेट इंजनों का सह-निर्माण शामिल है। साथ ही आत्मनिर्भरता के लिये भारत की 'आत्मनिर्भर भारत' पहल पर बल देना।
  • ऊर्जा सहयोग को आगे बढ़ाना: आपसी जलवायु लक्ष्यों का समर्थन करने के लिये नवीकरणीय ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन और स्वच्छ प्रौद्योगिकियों में सहयोग का विस्तार करना, जिसमें महत्त्वपूर्ण खनिजों और उन्नत सामग्रियों में संयुक्त निवेश शामिल है।
  • आर्थिक और व्यापारिक संबंधों को बढ़ाना: व्यापार असंतुलन और टैरिफ को कम करने के लिये हाल ही में हस्ताक्षरित भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते का लाभ उठाना, जिसका लक्ष्य द्विपक्षीय व्यापार में संतुलित विकास करना है। 
    • बाज़ार पहुँच संबंधी बाधाओं को दूर करने और वैमानिकी, अंतरिक्ष और हाई-स्पीड रेल जैसे क्षेत्रों को बढ़ावा देने के लिये समर्पित संयुक्त कार्य समूहों की स्थापना करना।
  • तकनीकी साझेदारी: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल विज्ञान और जैव प्रौद्योगिकी में 'उत्कृष्टता केंद्र' स्थापित करके 'भारत-फ्राँस नवाचार वर्ष 2026' का शुभारंभ करना, जिससे स्टार्टअप, अनुसंधान संस्थानों और उद्योगों के बीच सहयोग को बढ़ावा मिले।
  • सांस्कृतिक आदान-प्रदान को सुदृढ़ करना: शैक्षिक, सांस्कृतिक और गतिशीलता कार्यक्रमों का विस्तार करना, जिसमें पेरिस में 'स्वामी विवेकानंद सांस्कृतिक केंद्र' जैसे सांस्कृतिक केंद्रों की स्थापना और लोथल में 'राष्ट्रीय समुद्री विरासत परिसर' जैसी विरासत परियोजनाओं पर सहयोग शामिल है।

निष्कर्ष

होराइज़न 2047 रोडमैप के तहत यह साझेदारी सुरक्षा, परमाणु ऊर्जा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), अंतरिक्ष और बहुपक्षीय कूटनीति सहित कई क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण रूप से बढ़ी और रणनीतिक रूप से व्यापक हुई है। प्रमुख परिणामों में राफेल-मरीन जेट, छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) और भारत-प्रशांत सहयोग शामिल हैं। हालाँकि दीर्घकालिक रणनीतिक स्वायत्तता और वैश्विक प्रभाव के लिये निरंतर संवाद के माध्यम से खरीद में विलंब, व्यापार असंतुलन और भू-राजनीतिक मतभेदों को सुलझाना आवश्यक बना हुआ है।

दृष्टि मेंस प्रश्न:

प्रश्न. भारत-फ्राँस संबंध रक्षा खरीद से परे एक व्यापक सामरिक भागीदारी के रूप में विकसित हुए हैं। परीक्षण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. भारत-फ्राँस रणनीतिक साझेदारी की स्थापना कब हुई थी?
इसकी स्थापना वर्ष 1998 में हुई थी, यह तीन स्तंभों पर आधारित है: आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना, रणनीतिक स्वायत्तता के प्रति प्रतिबद्धता और एक-दूसरे के गठबंधनों और गठबंधन समूहों में शामिल होने से बचना।

2. वर्ष 2026 में फ्राँस के राष्ट्रपति की भारत यात्रा के प्रमुख रक्षा परिणाम क्या थे?
26 राफेल-मरीन फाइटर जेट की खरीद के अनुबंध को अंतिम रूप दिया गया और भारत की पहली निजी क्षेत्र की हेलीकॉप्टर निर्माण सुविधा, H125 फाइनल असेंबली लाइन (TATA-एयरबस) का उद्घाटन किया गया।

3. भारत-फ्राँस AI रोडमैप क्या है?
यह सुरक्षित, संरक्षित, खुले और विश्वसनीय AI पर केंद्रित है, जिसमें डिजिटल विज्ञान और 'स्टेशन एफ' (Station F) जैसे स्टार्टअप ईकोसिस्टम में सहयोग शामिल हैं।

 

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न 

प्रिलिम्स

प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2016)

  1. अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन को 2015 के संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में प्रारंभ किया गया था।
  2. इस गठबंधन में संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देश सम्मिलित हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1, न ही 2

उत्तर: (a)


मेंस 

प्रश्न. I2U2 (भारत, इज़रायल, संयुक्त अरब अमीरात और संयुक्त राज्य अमेरिका) समूहन वैश्विक राजनीति में भारत की स्थिति को किस प्रकार रूपांतरित करेगा? (2022)


रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह के 80 वर्ष

प्रारंभिक परीक्षा के लिये: रॉयल इंडियन नेवी (RIN) विद्रोह, भारत छोड़ो आंदोलन, आज़ाद हिंद फौज (INA), मुस्लिम लीग, सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल, इंडियन इंडिपेंडेंस लीग, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस             

मुख्य परीक्षा के लिये: रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह 1946 से संबंधित प्रमुख तथ्य और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में इसका महत्त्व।

स्रोत: द हिंदू 

चर्चा में क्यों?

18 फरवरी, 2026 को वर्ष 1946 में हुए रॉयल इंडियन नेवी (RIN) विद्रोह की 80वीं वर्षगाँठ है। यह एक अल्पकालिक लेकिन अत्यंत महत्त्वपूर्ण सशस्त्र विद्रोह था, जो ब्रिटिश शासन के अंतिम चरण में बढ़ते एंटी-कॉलोनियल रेजिस्टेंस और हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक है।

सारांश 

  • रॉयल इंडियन नेवी (RIN) विद्रोह (1946) नस्लीय भेदभाव और 'आज़ाद हिंद फौज' (INA) के मुकदमों के खिलाफ 20,000 नौसैनिकों द्वारा किया गया एक बड़े पैमाने पर सशस्त्र विद्रोह था।
  • इसने हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रदर्शन किया, जहाँ प्रदर्शनकारियों ने कांग्रेस, मुस्लिम लीग और कम्युनिस्ट पार्टी के झंडे एक साथ फहराए थे।
  • हालाँकि इस विद्रोह को दबा दिया गया था, लेकिन इसने ब्रिटिशों के लौटने की प्रक्रिया को तेज़ कर दिया, उन्हें महत्त्वपूर्ण रियायतें देने के लिये मजबूर किया और भारत में नागरिक सर्वोच्चता के सिद्धांत को स्थापित किया।

रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह 1946 क्या है?

  • परिचय: यह एक व्यापक विद्रोह था, जिसमें 20,000 से अधिक नौसैनिकों ने भाग लिया। इसमें 78 जहाज़ और 20 तटीय प्रतिष्ठान शामिल थे, जिनमें बॉम्बे में HMIS तलवार भी शामिल था, यह कराची, मद्रास, कोचीन, विशाखापट्टनम, कलकत्ता और अंडमान द्वीप समूह के नौसैनिक अड्डों तक फैल गया। 
    • बॉम्बे, पुणे, कलकत्ता, जेस्सोर और अंबाला में रॉयल इंडियन एयर फोर्स में भी सहानुभूतिपूर्ण हड़तालें हुईं।
  • तात्कालिक कारण और शिकायतें: यह विद्रोह बॉम्बे में HMIS तलवार के नौसैनिकों द्वारा खराब भोजन, कम वेतन, जातीय/नस्लीय भेदभाव, वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा दुर्व्यवहार और जहाज़ पर 'भारत छोड़ो' लिखने के लिये एक नौसैनिक की गिरफ्तारी के कारण भड़का था।
  • व्यापक राजनीतिक संबंध: एक नौसेना केंद्रीय हड़ताल समिति का गठन किया गया, उन्होंने आज़ाद हिंद फौज (INA) के युद्धबंदियों के ट्रायल तथा वियतनाम और इंडोनेशिया में फ्राँसीसी एवं डच औपनिवेशिक शासन को बहाल करने हेतु भारतीय सैनिकों की नियुक्ति के विरुद्ध विरोध प्रदर्शन किया।
  • INA ट्रायल के व्यापक संदर्भ:
    • ट्रायल: अंग्रेज़ों द्वारा पहला ट्रायल नवंबर 1945 में दिल्ली के लाल किले में किया गया, जिसमें एक हिंदू (प्रेम कुमार सहगल), एक मुस्लिम (शाह नवाज़ खान) और एक सिख (गुरबक्श सिंह ढिल्लों) को एक साथ कटघरे में खड़ा किया गया।
    • कांग्रेस का समर्थन: सितंबर 1945 में अपने बॉम्बे अधिवेशन में कांग्रेस ने INA के उद्देश्य का समर्थन करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया। बचाव पक्ष का संगठन भूलाभाई देसाई, तेज बहादुर सप्रू, कैलाश नाथ काटजू, जवाहरलाल नेहरू और आसफ अली द्वारा किया गया।
    • समर्थन: इस अभियान में मुस्लिम लीग, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, संघीय, अकाली, जस्टिस पार्टी, अहरार, आरएसएस, हिंदू महासभा और सिख लीग सहित विविध समूहों ने भाग लिया। यहाँ तक कि वफादारों और सरकारी कर्मचारियों ने भी धन संग्रह किया।
  • एकता का प्रतीक: विद्रोह के दौरान, नौसैनिकों ने सुभाष चंद्र बोस का चित्र लेकर एक जुलूस निकाला। 
    • विद्रोही बेड़े के मस्तूल पर उन्होंने कांग्रेस, मुस्लिम लीग और कम्युनिस्ट पार्टी (हथौड़ा और दराँती) के झंडे एक साथ विद्रोहपूर्वक फहराए।
  • सशस्त्र संघर्ष में वृद्धि: शांतिपूर्ण भूख हड़ताल सशस्त्र विद्रोह में बदल गई, जब ब्रिटिश सैन्य बलों ने नौसैनिकों पर गोलियाँ चला दीं। 
    • इसकी प्रतिक्रिया में बैरकों के अंदर मौजूद नौसैनिकों ने सशस्त्र संघर्ष किया और बंदरगाह में खड़े विद्रोही जहाज़ों ने अपने साथियों की रक्षा के लिये अपनी तोपें तैनात कर दीं, जिससे व्यापक स्तर पर सैन्य संघर्ष का खतरा उत्पन्न हो गया।
  • सड़कों पर सांप्रदायिक एकता: इस विद्रोह ने बॉम्बे (मुंबई) में एक जन-उभार की लहर पैदा कर दी। हिंदू और मुस्लिम प्रदर्शनकारी संयुक्त रूप से सड़कों पर उतर आए और हड़ताल का आह्वान किया। उग्र भीड़ ने डाकघरों पर छापे मारे, ट्राम की पटरियाँ उखाड़ दीं, पत्थरों और पीपों से घेराबंदी कर दी, जगह-जगह अलाव जलाए और बसों तथा सैन्य वाहनों को आग के हवाले कर दिया।
    • बॉम्बे का मिल इलाका इस आंदोलन का केंद्र बनकर उभरा। सभी कपड़ा मिलें, रेलवे कार्यशालाएँ और कारखाने बंद कर दिये गए।
  • दमन और जनहानि: व्यवस्था बहाल करने के लिये ब्रिटिश सरकार ने सेना की बटालियनों और बख्तरबंद वाहनों को तैनात किया। ब्रिटिश सैनिक, जो मशीन गनों और खंजरों से लैस थे, ने भीड़ पर बेखौफ गोलीबारी की।
  • विद्रोह का अंत और इसके नेता: विद्रोह 23 फरवरी, 1946 को समाप्त हुआ, जब सरदार पटेल और मुहम्मद अली जिन्ना ने सैनिकों को आत्मसमर्पण करने के लिये मनाया तथा उन्हें आश्वासन दिया कि राष्ट्रीय पार्टियाँ किसी भी प्रतिशोध से बचाव सुनिश्चित करेंगी

भारतीय राष्ट्रीय सेना (INA)

  • परिचय: भारतीय राष्ट्रीय सेना (INA) एक सैन्य बल था, जिसे द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय युद्धबंदियों (POWs) ने भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराने के लिये बनाया था। इसके बाद हुए अदालतों के मुकदमों ने पूरे देश में विद्रोह और आंदोलनों को भड़काया, जिससे ब्रिटिश शासन के अंत में तेज़ी आई।
  • गठन: शुरुआत में इसे मोहन सिंह ने जापानी समर्थन के साथ प्रस्तावित किया और 40,000 सैनिकों की भर्ती की। इसके साथ ही रासबिहारी बोस ने टोक्यो (1942) में इंडियन इंडिपेंडेंस लीग की स्थापना की।
    • सुभाष चंद्र बोस ने 25 अगस्त, 1943 को कमान सँभाली और 21 अक्तूबर, 1943 को सिंगापुर में अस्थायी आज़ाद भारत सरकार की स्थापना की, जिसे जापान और जर्मनी सहित 9 देशों द्वारा मान्यता प्राप्त थी।
  • अभियान और पतन: INA ने ‘चलो दिल्ली’ अभियान शुरू किया और मणिपुर के मोइरांग में तिरंगा फहराया। जापान के आत्मसमर्पण (15 अगस्त, 1945) और सुभाष चंद्र बोस की ताइवान हवाई दुर्घटना में कथित मृत्यु (18 अगस्त, 1945) के बाद यह अभियान समाप्त हो गया।
  • INA के मुकदमे (रेड फोर्ट): पहला मुकदमा रेड फोर्ट में नवंबर 1945 में हुआ, जिसमें प्रेम कुमार सहगल (हिंदू), शाह नवाज़ खाँ (मुस्लिम) और गुरबक्श सिंह ढिल्लों (सिख) शामिल थे, जो समानता तथा एकता का प्रतीक थे। इन नायकों को बचाने के लिये भारत के सबसे दिग्गज कानूनविद एक साथ आए जिनमें भूलाभाई देसाई, तेज बहादुर सप्रू, जवाहरलाल नेहरू और असफ अली शामिल थे।  बॉम्बे कांग्रेस सत्र (सितंबर 1945) ने भी इन कैदियों का समर्थन किया।
  • मुख्य विद्रोह (1945–46): इन घटनाओं ने तीन हिंसक टकरावों को जन्म दिया, 21 नवंबर, 1945 (कलकत्ता), 11 फरवरी, 1946 (राशिद अली के खिलाफ, कलकत्ता) और 18 फरवरी, 1946 (रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह, बॉम्बे)।

रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह 1946 का क्या महत्त्व है?

  • ब्रिटिश नीति पर प्रभाव: इन विद्रोहों ने ब्रिटिश को रियायतें देने के लिये मजबूर कर दिया:
    • कैबिनेट मिशन को जनवरी 1946 में भारत भेजा गया था।
    • 1 दिसंबर, 1946 को सरकार ने घोषणा की कि केवल हत्या या क्रूरता के आरोपित INA सदस्य ही मुकदमे के दायरे में आएंगे।
    • INA के पहले समूह के कैदियों को दिये गए कारावास की सज़ा को जनवरी 1947 में माफ कर दिया गया।
  • सशस्त्र बलों पर ब्रिटिश नियंत्रण का क्षरण: इस विद्रोह ने स्पष्ट रूप से दिखाया कि औपनिवेशिक सेना में भारतीय कर्मियों की निष्ठा, जो ब्रिटिश शासन की नींव थी, अब स्वाभाविक रूप से भरोसेमंद नहीं रही। इसने ब्रिटिशों को यह समझने में मदद की कि बल के माध्यम से नियंत्रण बनाए रखना अब असंभव हो गया है
  • ब्रिटिश वापसी में तेज़ी: यह विद्रोह उस महत्त्वपूर्ण समय पर हुआ जब स्वतंत्रता के लिये वार्त्ता चल रही थी। इसे आमतौर पर इस तथ्य के रूप में देखा जाता है कि इसने ब्रिटिशों के जल्दी रवाना होने के निर्णय को तेज़ किया।
  • राष्ट्रीय जागरूकता और एकता का प्रतीक: हालाँकि यह विद्रोह स्वचालित तथा अधिकांशतः बिना नेतृत्व वाला था, फिर भी इसने हिंदू और मुस्लिम नाविकों के बीच असाधारण सांप्रदायिक एकता को प्रदर्शित किया, जबकि अन्य जगहों पर सांप्रदायिक तनाव बढ़ रहा था।
    • प्रतिभागियों ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, मुस्लिम लीग और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के झंडे फहराए, जबकि ‘क्विट इंडिया’, ‘जय हिंद’ तथा ‘इंक़िलाब ज़िंदाबाद’ जैसे नारों ने व्यापक अंग्रेज़ विरोधी भावनाओं को दर्शाया, जो क्विट इंडिया आंदोलन एवं आज़ाद हिंद फौज जैसी घटनाओं से प्रेरित थीं।
    • प्रगतिशील कवि साहिर लुधियानवी ने इस एकता को अमर किया और इसे कहा: "झुलसे हुए वीरान गुलशन में, एक आस-उम्मीद का फूल खिला"। इससे उन्होंने बढ़ते हुए सांप्रदायिक संघर्ष के बीच इस एकता की दुर्लभता को रेखांकित किया।
  • स्वतंत्रता के बाद के भारत के लिये उदाहरण: इस घटना ने सैनिकों पर नागरिक नियंत्रण के सिद्धांत को मज़बूत किया, क्योंकि राजनीतिक नेताओं ने अशांति को समाप्त करने के लिये हस्तक्षेप किया और ब्रिटिशों ने इसे सुपीरियर बल के माध्यम से दबाया। इसके अलावा इसने यह भी दिखाया कि औपनिवेशिक शासन के अंतिम चरण में सशस्त्र विद्रोहों की सीमाएँ थीं।

वर्ष 1946 के शाही भारतीय नौसेना (रॉयल इंडियन नेवी) विद्रोह की सीमाएँ क्या थीं?

  • केंद्रीकृत नेतृत्व का अभाव: यह विद्रोह अधिकांशतः अचानक हुआ और इसमें कोई स्पष्ट नेतृत्वकर्त्ता नहीं था। हालाँकि, एक नौसेना केंद्रीय स्ट्राइक कमेटी का गठन किया गया था, जिसमें एक अनुभवी सैन्य या राजनीतिक कमान की संरचना का अभाव था।
  • प्रमुख राजनीतिक संगठनों से समर्थन का अभाव: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अखिल भारतीय मुस्लिम लीग ने विद्रोह की आलोचना की और नाविकों से आत्मसमर्पण करने का आग्रह किया। 
    • महात्मा गांधी ने राजनीतिक अधिकार के बिना की गई इस कार्रवाई की आलोचना की, जबकि वल्लभभाई पटेल ने इसे सत्ता के अहिंसक हस्तांतरण के लिये एक खतरे के रूप में देखा। इस राजनीतिक अलगाव ने विद्रोहियों को वैधता और व्यापक लामबंदी से वंचित कर दिया।
  • सीमित क्षेत्र और व्यापक समर्थन का अभाव: इस विद्रोह को भारतीय सेना से समन्वित समर्थन नहीं मिला। यह नौसेना कर्मियों और बॉम्बे, कराची एवं मद्रास जैसे चुनिंदा शहरी केंद्रों तक ही सीमित रहा और एक व्यापक सशस्त्र विद्रोह में तब्दील नहीं हुआ।
  • ब्रिटिश सेना की श्रेष्ठ प्रतिक्रिया: अंग्रेज़ों ने विद्रोहियों को घेरने के लिये रॉयल नेवी के युद्धपोतों और वफादार सैनिकों सहित एक विशाल सैन्य बल इकट्ठा किया। विद्रोहियों के पास भारी हथियारों, गोला-बारूद के भंडार और मज़बूत रक्षात्मक स्थिति का अभाव था, जिसके कारण वे इस विशाल सैन्य शक्ति के सामने अपरिहार्य रूप से पराजित हुए।
  • स्वतंत्रता संग्राम का रणनीतिक संदर्भ: यह विद्रोह ऐसे समय में हुआ जब भारत में संवैधानिक वार्त्ताएँ, जैसे कि आगामी कैबिनेट मिशन, निर्णायक चरण में थीं। भारत के प्रमुख राजनीतिक दल सशस्त्र जन अशांति के बजाय शांतिपूर्ण और वार्त्ता-आधारित सत्ता हस्तांतरण को प्राथमिकता दे रहे थे। विद्रोह का उग्र स्वरूप राजनीतिक नेतृत्व की नियंत्रित सत्ता परिवर्तन की प्रचलित रणनीति के विपरीत था।

निष्कर्ष:

शाही भारतीय नौसेना (रॉयल इंडियन नेवी) का 1946 का विद्रोह एक निर्णायक घटना थी, जिसने भारत में ब्रिटिश सैन्य शक्ति के कमज़ोर होते आधार को स्पष्ट कर दिया। हालाँकि यह विद्रोह थोड़े समय के लिये चला और इसे कुचल दिया गया, फिर भी इसने हिंदू-मुस्लिम एकता का एक अभूतपूर्व प्रदर्शन किया। इस विद्रोह ने ब्रिटिश शासन की वापसी की प्रक्रिया को गति दी और स्वतंत्र भारत में सशस्त्र बलों पर नागरिक नियंत्रण (सर्वोच्चता) के सिद्धांत को दृढ़ किया।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. वर्ष 1946 का रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह केवल एक सैन्य विद्रोह नहीं था, बल्कि यह एक जन-आंदोलन था, जिसने ब्रिटिश सत्ता के क्षरण का प्रतीक प्रस्तुत किया। विश्लेषण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न: रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह कब हुआ था?
उत्तर: यह विद्रोह 18 फरवरी, 1946 को बॉम्बे (मुंबई) में शुरू हुआ तथा 23 फरवरी, 1946 को आत्मसमर्पण के साथ समाप्त हुआ।

प्रश्न: रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह के तात्कालिक कारण क्या थे?
उत्तर: इसके तत्काल कारणों में भोजन की गुणवत्ता में कमी, कम वेतन, नस्लीय भेदभाव, वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा दुर्व्यवहार और HMIS तलवार पर ‘भारत छोड़ो’ लिखने के कारण एक नौसैनिक की गिरफ्तारी शामिल थी।

प्रश्न: INA मुकदमों ने RIN विद्रोह को किस प्रकार प्रभावित किया?
उत्तर: नवंबर 1945 में लाल किले में हुए INA (आज़ाद हिंद फौज) के मुकदमों ने देश भर में उपनिवेश-विरोधी भावना को व्यापक रूप से बढ़ावा दिया। इन मुकदमों के विरोध में नौसैनिकों ने अपनी सैन्य शिकायतों को राष्ट्रीय मुद्दों के साथ जोड़ते हुए खुलकर विरोध प्रदर्शन किया।

प्रश्न: विद्रोह के दौरान प्रदर्शित सांप्रदायिक एकता की विशेषता क्या थी?
उत्तर: नौसैनिकों ने कांग्रेस, मुस्लिम लीग एवं कम्युनिस्ट पार्टी के झंडे एक साथ फहराए और हिंदू-मुस्लिम प्रदर्शनकारियों ने बॉम्बे की सड़कों पर मिलकर ब्रिटिश सेनाओं के खिलाफ संघर्ष किया।

 UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न  

प्रिलिम्स:

प्रश्न. औपनिवेशिक भारत के संदर्भ में शाह नवाज़ खान, प्रेम कुमार सहगल और गुरबक्श सिंह ढिल्लों किस रूप में याद किये जाते हैं? (2021) 

(a) स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन के नेता के रूप में

(b) 1946 में अंतरिम सरकार के सदस्यों के रूप में

(c) संविधान सभा में प्रारूप समिति के सदस्यों के रूप में

(d) आज़ाद हिंद फौज (इंडियन नेशनल आर्मी) के अधिकारियों के रूप में

उत्तर: (d)


प्रश्न. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान निम्नलिखित में से किसने 'फ्री इंडियन लीजन' नामक सेना स्थापित की थी? (2008)

(a) लाला हरदयाल

(b) रासबिहारी बोस

(c) सुभाष चंद्र बोस

(d) वी.डी. सावरकर

उत्तर: (c)


मेन्स 

प्रश्न: गांधीवादी प्रावस्था के दौरान विभिन्न स्वरों ने राष्ट्रवादी आंदोलन को सुदृढ़ एवं समृद्ध बनाया था। विस्तारपूर्वक स्पष्ट कीजिये। (2019) 

प्रश्न: स्वतंत्रता के लिये संघर्ष में सुभाष चंद्र बोस एवं महात्मा गांधी के मध्य दृष्टिकोण की भिन्नताओं पर प्रकाश डालिये। (2016) 

प्रश्न: महात्मा गांधी के बिना भारत की स्वतंत्रता की उपलब्धि कितनी भिन्न हुई होती? चर्चा कीजिये। (2015)

प्रश्न: किन प्रकारों से नौसैनिक विद्रोह भारत में अंग्रेज़ों की औपनिवेशिक महत्त्वाकांक्षाओं की शव-पेटिका में लगी अंतिम कील साबित हुआ था? (2014)