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यूक्रेन संकट और भारत

Posted By : Dr. Santosh Kumar Singh     Posted Date : May 28,14   Hits : 9252    

यूक्रेन संकट की शुरुआत विक्टर यानुकोविच के नेतृत्ववाली सरकार द्वारा यूरोप के साथ होने वाले व्यापार एवं सहभागिता समझौते (Trade and Association Agreement) को रद्द करने एवं उसकी जगह रूस के साथ और प्रगाढ़ संबंध स्थापित करने के प्रयास के बाद हुई। यूक्रेन की यानुकोविच सरकार द्वारा रूस से नजदीकियाँ बढ़ाने से यूक्रेन का वह वर्ग नाराज हो गया जो रूस से दूरी रखना चाहता है और पश्चिमी देशों से नजदीकी बढ़ाने के पक्ष में है। उपरोक्त समझौता रद्द करने के बाद यूक्रेन के अतिराष्ट्रवादी, दक्षिणपंथी एवं चरमपंथी तत्त्वों ने यूक्रेन की राजधानी कीव में बड़े पैमाने पर हिंसक विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिए। मामला बिगड़ता चला गया और फरवरी 2014 में यूक्रेन की संसद द्वारा राष्ट्रपति को अपदस्थ कर दिया गया। उपरोक्त समझौते के लिए उन्होंने पहले सैद्धान्तिक सहमति दी थी लेकिन बाद में उन्होंने रूस से व्यापारिक संबंध खराब होने की आशंका के आधार पर इस समझौते से इंकार कर दिया था। हिंसक प्रदर्शन यूक्रेन की राजधानी कीव के इंडिपेंडेन्स स्क्वायर पर हो रहा था जिसे मैदान (Maidan) भी कहा जाता है। इस हिंसक प्रदर्शन को रोकने के लिए यानुकोविच ने विरोध प्रदर्शन विरोधी कानून (Anti-Protest Law) भी बनाया जिसे बाद में निरस्त कर दिया गया।

हिंसा समाप्त करने के लिए बढ़ते अंतर्राष्ट्रीय दबाव के बीच यानुकोविच तथा विरोधी दल के नेताओं के बीच फरवरी 2014 में एक समझौता किया गया जिसमें जल्द चुनाव करवाने, एक नया संविधान बनाने तथा मिलीजुली सरकार (Unity Government) बनाने की बात कही गई थी लेकिन संसद ने जल्द ही राष्ट्रपति को अपदस्थ कर दिया। नई गठित अंतरिम सरकार ने यानुकोविच की गिरफ्तारी का आदेश जारी कर दिया। उन्हें विरोध-प्रदर्शनों में भाग लेने वाले लोगों की बड़ी संख्या में हत्या का दोषी ठहराया गया। इन परिस्थतियों में यानुकोविच देश छोड़कर रूस चले गए। उन्हें रूस समर्थक नेता माना जाता रहा है लेकिन अपने शासन काल के दौरान उन्होंने विदेश नीति के संदर्भ में यूरोपीय संघ एवं रूस के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया था। रूस अभी भी यानुकोविच को यूक्रेन का वैध राष्ट्रपति मानता है। फिलहाल ओलेक्सैंडर तुर्चिनोव को अंतरिम राष्ट्रपति नियुक्त किया गया है। यूक्रेन के वर्तमान घटनाक्रम से यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि अक्षम शासन, राजनीतिज्ञों की आपसी प्रतिस्पर्द्धा, बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार एवं आर्थिक गतिहीनता आदि के कारण 2004 में हुई ऑरेंज क्रांति (Orange Revolution) की छाया से यूक्रेन अभी भी पूरी तरह नहीं निकल पाया है। यूक्रेन के दक्षिणी एवं पूर्वी भागों में जहाँ रूसी भाषी लोग रहते हैं वे भावनात्मक रूप से रूस से जुड़े हैं। वहाँ उनके खिलाफ हिंसात्मक घटनाएँ हो रही हैं। रूस ने इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए अपनी सेना को चौकन्ना रहने को कहा है। दूसरी तरफ अमेरिका रूसी भाषी लोगों के साथ हो रहे हिंसात्मक घटनाओं को रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में अंतर्राष्ट्रीय निगरानी (International Monitoring Misson) मिशन की तैनाती की माँग कर रहा है जिसे रूस ने अब तक गंभीरता से नहीं लिया है।


यूक्रेन एवं रूस के बीच बढ़ते तनाव के बीच यूक्रेन के वर्तमान प्रधानमंत्री आरसेनी यात्सेंयुक द्वारा रूस से बुडापेस्ट समझौता ज्ञापन (Budapest Memorandum) का सम्मान करने की अपील की गई थी। यह समझौता ज्ञापन 1994 में यूक्रेन द्वारा परमाणु हथियारों के अप्रसार संबंधी समझौता पर हस्ताक्षर करने से संबंधित है। यूक्रेन के अलावा इस समझौता ज्ञापन पर रूस, यूनाइटेड किंगडम तथा अमेरिका द्वारा हस्ताक्षर किए गए थे। इसके माध्यम से यूक्रेन को सुरक्षा का आश्वासन दिया गया था। उसकी स्वतंत्रता, संप्रभुता का सम्मान करने तथा उसके क्षेत्रीय अखंडता के विरुद्ध बल प्रयोग से दूर रहने की बात कही गई है। उसके बाद यूक्रेन में यूरोपीय संघ समर्थक एवं रूस समर्थक नागरिकों के बीच विवाद बढ़ता गया।


रूस द्वारा क्रीमिया का विलय (Annexation of Crimea by Russia)


बढ़ती हिंसा के बीच यूक्रेन के क्रीमिया में रूसी भाषी लोग यूक्रेन से अलग होने तथा रूस में शामिल होने के लिए विरोध-प्रदर्शन करने लगे। हिंसक घटनाएँ भी घटी। 16 मार्च 2014 को वहाँ जनमत संग्रह कराया गया जिसमें क्रीमिया के लोगों से पूछा गया था कि क्या वे रूस में विलय करना चाहते हैं या वे ज्यादा स्वायतता के साथ यूक्रेन में ही रहना चाहते हैं। जनमत संग्रह में शामिल 95.5 प्रतिशत लोगों ने रूस में विलय का समर्थन किया। रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने क्रीमिया के लोगों की इच्छाओं का सम्मान करते हुए विलय से संबंधित आदेश पत्र पर 21 मार्च को हस्ताक्षर कर दिए। यूक्रेन समर्थक क्रीमियाई लोगों ने इस जनमत संग्रह का बहिष्कार किया। यूरोपीय संघ एवं अमेरिका ने इसे अवैध बताया और इसकी निंदा की। उन्होंने इसके परिणाम को मानने से इंकार कर दिया। अमेरिका ने क्रीमिया के जनमत संग्रह पर कहा कि यह यूक्रेन के संविधान तथा अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है तथा इसे रूसी सैनिकों के दबाव में कराया गया है तथा यह यूक्रेन की संप्रभुता एवं अखंडता पर चोट के समान है। रूसी सेनाओं ने फरवरी 2014 में ही क्रीमिया को अपने नियंत्रण में ले लिया था। अमेरिका का कहना था कि रूस को पूर्वी यूक्रेन में एक अंतर्राष्ट्रीय निगरानी मिशन  (International Monitoring Mission) का समर्थन करना चाहिए। रूस द्वारा प्रत्युतर न देने के बाद रूस पर अमेरिका के नेतृत्व में आर्थिक एवं कूटनीतिक प्रतिबंध लगाए गए जिन्हें 28 अप्रैल 2014 को और कठोर बना दिया गया और इसके अंतर्गत पुतिन से नजदीकी रखने वाले राजनीतिज्ञों, राजनयिकों, सेना अधिकारियों एवं उद्योगपतियों पर कठोर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए गए। उनके अमेरिका आने पर पाबंदी लगा दी गई और उन्हें वीजा जारी करना बंद कर दिया। रूस को विकसित देशों के समूह जी-8 से निष्कासित कर दिया गया है। जी-8 की बैठक जून महीने में रूस के सोची में होने वाली थी लेकिन अब इस समूह (जी-7) की बैठक ब्रुसेल्स में आयोजित करने का निर्णय हुआ है। क्रीमिया में 58 प्रतिशत लोग रूसी भाषी हैं, शेष यूक्रेन तथा तातार (Tatar) हैं। तातारों को सोवियत संघ के नेता जोसेफ स्टालिन द्वारा मध्य एशिया निर्वासित कर दिया गया था और वे सोवियत संघ के विघटन के बाद ही यूक्रेन वापस लौट सके थे। वे अब भी यूक्रेन के साथ ही रहना चाहते हैं। क्रीमिया 1954 तक सोवियत संघ का ही हिस्सा था। 1954 में सोवियत संघ के नेता निकिता ख्रुश्चेव (Nikita Khrushchev) ने इसे यूक्रेन को उपहार स्वरूप दे दिया था तब यूक्रेन सोवियत संघ में ही शामिल था।


क्रीमिया के अलावा दक्षिण-पूर्वी शहर दानेतस्क (Donetsk), स्लोवियांस्क खारकिव, लुहांस्क में भी विरोध-प्रदर्शन जारी है। स्लोवियांस्क को भी रूसी समर्थक लोगों ने अपने नियंत्रण में ले लिया है। इसके अलावा भी यूक्रेन के कई शहरों में विरोध-प्रदर्शन जारी हैं। यूक्रेन के घटनाक्रम से अमेरिका एवं रूस शीतयुद्ध के बाद एक बार फिर आमने-सामने खड़े दिखाई दे रहे हैं। अमेरिका और यूरोपीय संघ के देश रूस पर कई तरह के प्रतिबंध लगा रहे हैं। लेकिन जिस मात्रा में अमेरिका प्रतिबंध लगाना चाहता है, यूरोपीय संघ उसके पक्ष में नहीं है क्योंकि यूरोपीय संघ के देश तेल, गैस जैसी आवश्यक सामग्रियों के मामले में रूस पर निर्भर हैं। यूरोपीय संघ एवं रूस के बीच सालाना 460 बिलियन डॉलर से ज्यादा का व्यापार होता है जबकि अमेरिका एवं रूस के बीच मात्र 38 बिलियन डॉलर का ही सालाना व्यापार है। यूरोप अपनी आवश्यकता की 30 प्रतिशत गैस रूस से प्राप्त करता है। कुछ यूरोपीय देश तो अपनी आवश्यकता की सौ फीसदी गैस रूस से ही प्राप्त करते है। इन कारणों से यूरोपीय संघ प्रतिबंध के मामले में उस तरह कदम नहीं उठा रहा है जैसे अमेरिका उठा रहा है। यूरोपीय संघ के देशों का यह कहना है कि यूरोपीय सुरक्षा एवं सहयोग संगठन (Organisation for security and Co-operation in Europe- OSCE) से यूक्रेन के विवादित क्षेत्रों में ज्यादा संख्या में पर्यवेक्षक भेजे जाने चाहिए। दूसरी ओर रूस का कहना है कि यूक्रेन सरकार कट्टरपंथी समूहों के साथ मिलकर यूक्रेन के पूर्वी एवं दक्षिण पूर्वी भागों में तनाव एवं अस्थिरता पैदा कर रही है। उसने आरोप लगाया कि पश्चिमी देश यूक्रेन में हिंसात्मक संघर्ष एवं अस्थिरता को बढ़ावा दे रहे हैं। अभी यूक्रेन में एक सैन्य निगरानी मिशन (Military Observation Mission) तैनात है लेकिन उसे क्रीमिया में जाने से रोक दिया गया है। यूक्रेन ने यूरोपीय सुरक्षा एंव सहयोग संगठन (ओएससीई) से एक राजनयिक निगरानी मिशन (Diplomatic Monitoring Mission) भेजने की माँग भी की है।


रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने 16 अप्रैल 2014 को यूक्रेन में तनाव कम करने हेतु रूस, अमेरिका, यूरोपीय संघ तथा यूक्रेन के बीच जेनेवा समझौता होने की बात कही थी। जेनेवा समझौते के अंतर्गत चार प्रमुख बिंदुओं पर बल दिया गया था, जिसमें सभी गैर-कानूनी सैन्य संगठनों को भंग करना, गैर-कानूनी रूप से सरकारी एवं अन्य भवनों से कब्जे को समाप्त करना तथा इन भवनों को उनके वैध स्वामियों को लौटाना, सभी सरकार विरोधी प्रदर्शनकारियों को माफी देना तथा रूसी भाषी क्षेत्रों को ज्यादा स्वायत्तता देना शामिल थे। इनके क्रियान्वयन की निगरानी यूरोपीय सुरक्षा एवं सहयोग संगठन के पर्यवेक्षकों द्वारा किया जाना था। लेकिन यह प्रभावी नहीं हो सका। यूरोपीय संघ के जर्मनी एवं फ्रांस जैसे सदस्य देश अब जेनेवा-2 की मांग कर रहे हैं ताकि यूक्रेन संकट का जल्द से जल्द समाधान किया जा सके।


आखिर रूस क्या प्राप्त करना चाहता है? (What does Russia want to Achieve?)


यूक्रेन में 2004 की ‘आरेंज क्रांति’ के समय से ही आर्थिक स्थिति बिगड़ी हुई है। भ्रष्टाचार, चुनिंदा धनी लोगों का एकाधिकार, लोगों के जीवन स्तर में ठहराव ने लोगों में असंतोष भर दिया। इसका फायदा पश्चिमी देशों ने उठाने का प्रयास किया। उन्होंने पूर्व सोवियत गणराज्यों तथा पूर्वी यूरोप के देशों पर आर्थिक एवं सैन्य रूप से आधिपत्य स्थापित करने का प्रयास किया जिसे यूक्रेन के दक्षिणपंथी पूँजीपतियों द्वारा समर्थन भी किया गया। यह एक तरह से रूस को घेरने के समान था। अमेरिका एवं यूरोपीय देश नाटो का विस्तार पूर्वी यूरोप के देशों तक करना चाहते हैं जिसे रूस अपने आर्थिक एवं सुरक्षा हितों के लिए खतरा मानता है। जार के समय से ही रूस इन देशों को अपने प्रभााव क्षेत्र में मानता रहा है। अमेरिका एवं पश्चिमी देशों ने यूक्रेन को अपने प्रभाव में लेने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) को भी हथियार बनाया। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने यूक्रेन द्वारा अपनी मुद्रा का अवमूल्यन न करने तथा घरेलू गैस पर सब्सिडी समाप्त न करने के आधार पर प्रस्तावित ऋण पर दिसंबर 2013 में रोक लगा दी। यूरोपीय संघ भी यूक्रेन के साथ आंशिक एकीकरण (Partial Integration) के बदले वहाँ राजनीतिक एवं आर्थिक सुधार करवाना चाहता है। यह एक तरह से यूक्रेन को रूस से दूर करने का प्रयास माना गया।


यूक्रेन के क्रीमिया में रूस को कई सैन्य सुविधाएँ हैं। रूस का ब्लैक सी नौसेना बेड़ा (Black sea Fleet) वहाँ तैनात रहता है। यहाँ तक नाटो की पहुँच से रूस के सुरक्षा एवं आर्थिक हित बाधित हो सकते हैं जिसे वह अपना वैध अधिकार मानता है। फिलहाल रूस यूक्रेन के मामले में सधा कदम उठा रहा है। जबसे ब्लादिमीर पुतिन रूस के नेता के रूप में उभरे हैं, उन्होंने अपनी मंशा एवं लक्ष्य स्पष्ट कर दिए हैं। वे रूस को वह मुकाम एवं सम्मान दिलाना चाहते हैं जो कभी सोवियत संघ को प्राप्त था। वे रूस का भूराजनीतिक महत्त्व बढ़ाना चाहते हैं। इसके पहले 2008 में भी रूस ने जार्जिया के साथ युद्ध के माध्यम से अबखाजिया (Abkhazia) एवं साऊथ ओसेटिया (South Ossetia) को बलपूर्वक अलग कर दिया था। रूस अपने आस-पास एक ऐसा प्रभाव क्षेत्र तैयार करना चाहता है जहाँ यूरोपीय संघ या नाटो जैसे संगठन प्रभावी न हों। यूक्रेन एवं जार्जिया जैसे देशों को नाटो में शामिल करने का मुद्दा अमेरिका एवं रूस के बीच विवाद का कारण रहा है। रूस किसी भी कीमत पर नाटो का विस्तार अपने दरवाजे तक नहीं  देखना चाहता है। इसके पहले रूस ने 2009 में पोलैंड तथा चेक गणराज्य में अमेरिका द्वारा नाटो के साथ मिलकर मिसाइल रक्षा प्रणाली (Missile Defence System) की तैनाती का विरोध किया था। जिसे अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने स्थगित कर दिया था। हालाँकि रूस नाटो के विस्तार की तुलना में यूरोपीय संघ के विस्तार का कम विरोधी रहा है। फिलहाल मामला सिर्फ यूक्रेन का नहीं है बल्कि रूस अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को भी एक नया आकार देना चाहता है।


यूक्रेन संकट पर भारत का मत (Stand of India On Ukraine Crisis)


पिछले दशक में भारत ने अमेरिका के साथ अपने संबंधों में सुधार किया है। भारत अमेरिका का वैश्विक सामरिक भागीदार है। दूसरी तरफ, रूस भारत का हर परिस्थिति में काम आने वाला मित्र है। फिलहाल रूस भारत का विशेष एवं विशेषाधिकार प्राप्त (Special and priviledged) सामरिक भागीदार है लेकिन यूक्रेन संकट के मामले में अमेरिका एवं रूस आमने-सामने खड़े दिखाई दे रहे हैं। इस स्थिति में भारत का पहला प्रयास तो यही है कि दोनों देशों के साथ आपसी संबंध गंभीर रूप से प्रभावित न हो। इस मामले में बहुत दिन तक चुप्पी साधने के बाद अंत में भारत ने रूस का पक्ष लिया। भारत संयुक्त राष्ट्र में क्रीमिया में जनमत संग्रह के विरुद्ध लाए गए प्रस्ताव के दौरान अनुपस्थित रहा। भारत यूक्रेन में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को बढ़ावा देने के पक्ष में है ताकि यूक्रेन के सभी वर्गों की इच्छाओं को पूरा किया जा सके लेकिन भारत यूक्रेन में रूस के वैध हितों को भी मान्यता देता है। वैसे भारत किसी भी देश की एकता एवं अखंडता में विश्वास करता है। क्रीमिया के घटनाक्रम को लेकर भारत कुछ हद तक चिंतित भी है क्योंकि इस मामले  में रूस द्वारा आत्मनिर्णय के अधिकार (Right to self determination) को ही प्रवर्तित किया गया है। भारत जम्मू-कश्मीर एवं उत्तर-पूर्व राज्यों के संदर्भ में हमेशा संवेदनशील रहा है। कश्मीर में संयुक्त राष्ट्र संघ की जनमत संग्रह की मांग को भारत हमेशा अस्वीकार करता रहा है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि भारत रूस को समर्थन देकर अपने दीर्घकालीन लक्ष्यों को प्राप्त करना चाहता है।


रूस-यूक्रेन विवाद का वैश्विक प्रभाव (Worldwide Ramifications of Russia-Ukraine Dispute)

  • यूक्रेन में रूस की सफलता से अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में पश्चिमी देशों एवं विशेषकर अमेरिका के प्रभाव में कमी आ सकती है।

  • रूस की आमदनी का एक बड़ा भाग यूरोप को निर्यात किए जाने वाले तेल एवं गैस निर्यात से प्राप्त होता है। ऐसी स्थिति में यदि यूरोप से संबंध बिगड़ते हैं तो रूस की अर्थव्यवस्था में गिरावट आ सकती है।

  • संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 27 मार्च 2014 को क्रीमिया में जनमत संग्रह को अस्वीकार करने हेतु लाए गए प्रस्ताव के पक्ष में 100 तथा विरोध में 11 देशों ने मतदान किया था जबकि 58 देश मतदान से अनुपस्थित रहे थे। इससे स्पष्ट है कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय यूक्रेन संकट के मामले में विभाजित है।

  • चीन ने इस पूरे मामले पर किसी प्रकार की स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं दी है, जिसे चीन द्वारा रूस के प्रति अप्रत्यक्ष समर्थन के रूप में देखा जा रहा है।

  • यूक्रेन संकट का एक अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव यह भी हो सकता है कि ईरान एवं सीरिया संकट का समाधान करने हेतु अंतर्राष्ट्रीय प्रयास शिथिल पड़ सकते हैं या इसमें गतिरोध उत्पन्न हो सकता है।

  • यदि यूक्रेन में गृहयुद्ध आरम्भ होता है तो इसका प्रभाव उसके आस-पास के देशों पर भी पड़ सकता है जो अंततः क्षेत्रीय अस्थिरता का कारण बन सकता है।

  • अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष एवं अन्य अंतर्राष्ट्रीय संगठनों द्वारा यूक्रेन में आर्थिक एवं राजनीतिक सुधार के प्रयास ठप्प पड़ सकते हैं।

  • रूस तेल एवं गैस का एक बड़ा निर्यातक है और यदि यह संघर्ष बढ़ता है तो तेल एवं गैस के अंतर्राष्ट्रीय मूल्यों में वृद्धि हो सकती है।

  • यूक्रेन विश्व में मक्का एवं गेहूँ का एक बड़ा निर्यातक है। संघर्ष से इनके निर्यात प्रभावित हो सकते हैं या इनके मूल्यों में बढ़ोतरी हो सकती है।

यूक्रेन संकट का भारत पर प्रभाव (Effects of Ukraine Crisis On India)

रूस भारत का सबसे बड़ा हथियारों का आपूर्तिकर्त्ता है। उसने भारत द्वारा 1974 एवं 1998 में परमाणु परीक्षण के दौरान पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के दौर में भी भारत को समर्थन दिया था। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान भी उसने भारत को महत्त्वपूर्ण सहायता एवं समर्थन दिया था। हालाँकि यूक्रेन से भी भारत के अच्छे संबंध रहे हैं। पिछले वर्ष ही भारत ने यूक्रेन के साथ असैन्य परमाणु सहयोग हेतु समझौता किया था। सोवियत संघ के दिनों से ही यूक्रेन एवं भारत के बीच हथियारों के कल-पुर्जे आदि के क्षेत्र में सहयोग होता रहा है। लेकिन जब बात यूक्रेन एवं रूस के बीच की हो तो भारतीय विदेश नीति का झुकाव स्पष्ट रूप से रूस के पक्ष में ही दिखाई देता है। फिर भी भारत राजनयिक प्रयासों एवं रचनात्मक बातचीत के माध्यम से इस मुद्दे का समाधान चाहता है। भारत ने अभी तक यूक्रेन की अंतरिम सरकार को मान्यता नहीं दी है। भारत ने यूक्रेन में यूरोपीय संघ एवं अमेरिका द्वारा की गई शुरुआती दखल का समर्थन नहीं किया था। सैद्धान्तिक रूप से भारत किसी देश के आंतरिक राजनीतिक मामलों में दखल देने के विरुद्ध है। सामरिक रूप से यदि यूक्रेन संकट के संदर्भ में अमेरिका एवं रूस के बीच लम्बे समय तक गतिरोध बना रहता है तो फिर भारत को अपना पक्ष स्पष्ट करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। उस स्थिति में भारत-अमेरिका संबंधों पर असर पड़ सकता है।


वैसे तो कहा जा रहा है कि यूक्रेन संकट का भारत पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ेगा लेकिन कई विश्लेषकों का यह मानना है कि इस संकट का भारतीय अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। रुपए के मूल्य एवं तेल गैस की कीमतों में परिवर्तन हो सकता है। अन्य व्यापारिक हितों पर कम ही असर पड़ने की संभावना है क्योंकि भारत-यूक्रेन के बीच मात्र 3.1 बिलियन डॉलर प्रतिवर्ष का ही व्यापार होता है। सोने के मूल्यों में वृद्धि हो सकती है हालांकि सोने के मूल्यों में बढ़ोतरी से अर्थव्यवस्था पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा लेकिन तेल मूल्यों में बढ़ोतरी से चालू खाते के घाटे में बढ़ोतरी हो सकती है। विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय शेयर बाजार से पैसे वापस निकाल सकते हैं जिससे स्टॉक एवं रुपए पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। चूँकि यूक्रेन भारत का प्रमुख निर्यात गंतव्य नहीं है इसलिए निर्यात पर कम ही प्रभाव पड़ने की संभावना है।


फिक्की का मानना है कि लम्बे समय तक संकट बने रहने की स्थिति यूक्रेन में स्थित भारतीय औषध कंपनियों पर प्रभाव पड़ सकता है क्योंकि औषध निर्माण में काम आने वाली सामग्रियों का यूक्रेन में आयात महंगा हो सकता है। फिलहाल इसका असर नहीं देखा जा रहा है। 2012-13 के दौरान भारत ने यूक्रेन के साथ अपने कुल 3.18 बिलियन डॉलर के व्यापार में 154 मिलियन डॉलर यानि लगभग 30 प्रतिशत निर्यात औषधियों का ही किया था। यूक्रेन स्वतंत्र राष्ट्रों के राष्ट्रमंडल (Commonwealth of Independent States) में रूस के बाद भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है। कुछ लोगों का तो यह भी मानना है कि यदि यूक्रेन में लम्बे समय तक संकट बना रहता है तो विशेषकर भारत के गेहूँ निर्यातकों को लाभ मिल सकता है क्योंकि यूक्रेन विश्व का एक बड़ा गेहूँ निर्यातक देश है। संकट की स्थिति में भारत अपने विशाल गेहूँ के भंडार का निर्यात करने में सक्षम होगा क्योंकि यूक्रेन से गेहूँ का निर्यात महँगा हो सकता है।

 

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