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वैश्विक भुखमरी सूचकांकः सामाजिक-आर्थिक विश्लेषण

Posted By : Mr. Sunny Kumar     Posted Date : Dec 09,16   Hits : 9482    

Global Hunger Index
आज प्रत्येक देश प्रगतिपथ पर आगे बढ़ने का दावा करता है। हर किसी की चाह है कि वो अल्पविकसित से विकासशील तथा विकासशील से विकसित राष्ट्र का दर्जा प्राप्त कर ले। इसके लिये सरकारें तमाम प्रयास भी करती हैं तथा ‘विकास के प्रतिमानों’ के संदर्भ में अपनी उपलब्धियाँ भी गिनाती हैं। कभी किसी ग्रह पर यान भेज देने से किसी देश को विकास दिखने लगता है तो कभी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में बढ़ोत्तरी में सारी समस्याओं का हल ढूंढ़ा जाने लगता है। सामान्यतः विकास दर के बढ़ते आँकड़ों से भी देश की खुशहाली को व्यक्त किया जाता रहा है। आँकड़ों के इसी खेल में जब कोई ऐसा आँकड़ा दिख जाता है, जो यह बताता है कि अभी ‘भूख’ जैसी ‘समस्या’ का भी समाधान नहीं किया जा सका है तो विकास के दावे झूठे प्रतीत होने लगते हैं। ‘वैश्विक भुखमरी सूचकांक’ (Global Hunger Index) ऐसा ही एक आँकड़ा प्रस्तुत करता है जो यह बताता है कि कौन सा देश भुखमरी के किस स्तर से जूझ रहा है। यह सूचकांक सिर्फ शुष्क भुखमरी के आँकड़े ही नहीं बताता बल्कि गहरे अर्थों में यह उस नीति की संवेदनहीनता व गैर-जनोन्मुखी स्वरूप को भी उजागर करता है जो असमानता को बढ़ावा देती है।

वर्तमान संदर्भ (Global Hunger Index- GHI) 

अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान (International Food Policy Research Institute- IFPRI) द्वारा प्रतिवर्ष जारी किया जानेवाला वैश्विक भुखमरी सूचकांक, भुखमरी को मापने का एक पैमाना है जो वैश्विक, राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर भुखमरी को प्रदर्शित करता है। इस सूचकांक में उन देशों को शामिल नहीं किया जाता है जो विकास के एक ऐसे स्तर तक पहुँच चुके हैं जहाँ भुखमरी नगण्य मात्रा में है। ऐसे देशों में पश्चिमी यूरोप के अधिकांश देश, अमेरिका, कनाडा इत्यादि शामिल हैं। साथ ही, कुछ ऐसे अल्पविकसित देश भी इस सूचकांक से बाहर रहते हैं जिनके भुखमरी संबंधी आँकड़ें उपलब्ध नहीं हो पाते या अपर्याप्त होते हैं, जैसे बुरूंडी, इरीट्रिया, लीबिया, सूडान, सोमालिया आदि।

इस सूचकांक से संबंधित कुछ प्रश्न हमारे मन में उठने स्वाभाविक ही हैं, मसलन- ऐसे आँकड़ों को ज्ञात करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? इससे क्या लाभ होंगे? यह सूचकांक भुखमरी का मापन किस प्रकार करता है? इसके लिये किन आधारों को चुना जाता है और इसे आँकड़े कौन उपलब्ध कराता है?

1990 के दशक से वैश्विक अर्थव्यवस्था काफी तेज़ी से बदलने लगी थी। उदारीकृत अर्थव्यवस्था को विकास के लिये अनिवार्य मॉडल के रूप में मान्यता मिल चुकी थी और लगभग सभी राष्ट्र अपने-अपने बाज़ार को मुक्त कर रहे थे। यही वह दौर था जब उपभोक्तावाद को भी बढ़ावा मिला तथा मूलभूत आवश्यकताओं में कुछ अन्य सुविधाएँ जुड़ने लगीं। ज़ाहिर है ये बढ़ती समृद्धि की सूचक थीं। वहीं दूसरी ओर, वैश्विक जनसंख्या का एक बड़ा भाग अपने लिये भोजन की न्यूनतम मात्रा भी नहीं जुटा पा रहा था। भुखमरी, कुपोषण एवं महामारी जैसी गंभीर समस्याएँ इसी वैश्वीकरण के उपोत्पाद थे जिनका समाधान भी इसी के अंतर्गत खोजा जाना था। इसके लिये आवश्यक था कि भुखमरी आदि से संबंधित सुस्पष्ट आँकड़े हों ताकि इनका विश्लेषण कर यह ज्ञात किया जा सके कि अलग-अलग देशों व क्षेत्रों में भुखमरी की क्या स्थिति है। यही वजह है कि प्रत्येक वर्ष इसके आँकड़े प्रकाशित किये जाते हैं ताकि नीतियाँ अधिक जनोन्मुखी हो सकें। इस सूचकांक का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य यह है कि इसके प्रदत्त स्कोर के माध्यम से विभिन्न देश अन्य देशों से या स्वयं के पिछले वर्ष के आँकड़ों से भुखमरी की स्थिति का तुलनात्मक मूल्यांकन कर इससे निपटने की दिशा में प्रयास कर सकते हैं।

भुखमरी के मापन के लिये IFPRI चार आधारों (अल्पपोषण, चाइल्ड स्टन्टिंग, चाइल्ड वेस्टिंग तथा बाल मृत्यु दर) को चुनता है और उनके आनुपातिक मूल्यों का समेकन कर सूचकांक जारी करता है। इनमें से अल्पपोषण तथा बाल मृत्यु दर को ज़्यादा भारांश दिया जाता है जबकि शेष दो को कम।

महत्त्वपूर्ण शब्दावली   भुखमरी (Hunger): सामान्यतः भुखमरी से हमारा आशय भोजन की अनुपलब्धता से होता है। किंतु खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) प्रतिदिन 1800 किलो कैलोरी से कम ग्रहण करने वाले लोगों को भुखमरी का शिकार मानता है। अल्पपोषण (Under Nutrition): स्वस्थ शरीर के लिये अपेक्षित पोषक पदार्थों की मात्रा जब किसी वजह से उपलब्ध नहीं हो पाती है तो व्यक्ति अल्पपोषण का शिकार हो जाता है। इसलिये भोजन की मात्रा के साथ-साथ गुणवत्ता का होना भी ज़रूरी है। इसका अर्थ है कि भोजन में आवश्यक कैलोरी की मात्रा के साथ-साथ प्रोटीन, विटामिन और खनिज भी पर्याप्त मात्रा में होने चाहियें।   चाइल्ड वेस्टिंग (Child Wasting): 5 वर्ष तक की उम्र के ऐसे बच्चे जिनका वज़न उनकी लम्बाई के अनुपात में काफी कम हो।   चाइल्ड स्टन्टिंग (Child Stunting): जिनकी लम्बाई उनकी उम्र की तुलना में कम हो।   बाल मृत्यु दर (Child Mortality Rate): 5 वर्ष तक की आयु में प्रति 1000 बच्चों में मृत्यु के शिकार बच्चों का अनुपात। ध्यातव्य है कि चाइल्ड वेस्टिंग व चाइल्ड स्टन्टिंग को पहली बार भुखमरी का पैमाना माना गया है। इससे पहले केवल बच्चों में कम वज़न (Under Weight) होना ही भुखमरी की निशानी माना जाता था।

अब, प्रश्न यह है कि इन चार आधारों को ही क्यों चुना जाता है जबकि इनमें से तीन सिर्फ 5 वर्ष तक की आयु के बच्चों से ही संबंधित हैं। फिर भुखमरी की स्थिति को समग्रता से प्रदर्शित करने का इसका दावा कितना तार्किक है? इसके जवाब में यह कहा जा सकता है कि समाज में बच्चे ही सर्वाधिक संवेदनशील और सुभेद्य होते हैं, इसलिये उनके पोषण स्तर में थोड़ी सी लापरवाही उनके लिये गंभीर संकट खड़े कर देती है। इसके अलावा, छोटे बच्चों के स्वास्थ्य को देखकर सामान्यतः उनकी माताओं की स्थिति का भी अनुमान लगाया जा सकता है। साथ ही, चूँकि इतने छोटे बच्चे किसी उत्पादक गतिविधि से नहीं जुड़े होते हैं, इसलिये सीमित संसाधनों में उनके पोषाहार से समझौता कर लिया जाता होगा।

वर्तमान परिद्वश्य

अब, यदि 2016 में जारी वैश्विक भुखमरी सूचकांक की बात करें तो इस वर्ष कुल 118 विकासशील देशों में भुखमरी का आकलन किया गया, जिनमें भारत 28.5 स्कोर के साथ 97वें स्थान पर रहा। गौरतलब है कि GHI का स्कोर जितना ज़्यादा होगा भुखमरी की स्थिति उतनी ही भयावह होगी। भारत की स्थिति इसलिये भी अच्छी नहीं कही जा सकती क्योंकि पाकिस्तान और अफगानिस्तान को छोड़कर यह अपने सभी पड़ोसियों (यथा- चीन, नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश इत्यादि) से पीछे है। इतना ही नहीं, बांग्लादेश जो 2000 ई. के भूख सूचकांक में भारत से पीछे था 2016 के सूचकांक में भारत से आगे निकल गया है। लगभग 22 ऐसे देश हैं जिन्होंने पिछले 15 वर्षों में अपने GHI स्कोर को आधे से भी (50% से अधिक की कमी) कम कर लिया है। इन देशों में म्याँमार, कम्बोडिया, रवांडा जैसे देश भी शामिल हैं। वहीं भारत की बात करें तो यह अपने GHI स्कोर को 25% तक ही कम कर पाया है। अभी भी भारत की कुल आबादी का 15% अल्पपोषित है और लगभग इतना ही अनुपात चाइल्ड वेस्टिंग का है। चाइल्ड स्टन्टिंग की स्थिति ज़्यादा चिंताजनक है क्योंकि 5 वर्ष से कम उम्र के लगभग 39% बच्चे इसके शिकार हैं। इसी आयु वर्ग में उनकी मृत्यु दर 4.8% है।

उपर्युक्त आँकड़ों को सार रूप में कहें तो भारत में भुखमरी की समस्या ‘गंभीर’ है। इसके समाधान के लिये किये जा रहे तमाम प्रयास संतोषजनक नहीं हैं; फिर चाहे समेकित बाल विकास कार्यक्रम (ICDS) हो या मिड डे मील योजना, इनके मूल्यांकन में इतना ही कहा जा सकता है कि भारत अभी भी भुखमरी सूचकांक में 97वें नम्बर पर है।

(सन्नी कुमार)
  संपादक
"दृष्टि करेंट अफेयर्स टुडे"

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