drishtiias.com Twitter

वैश्विक भुखमरी सूचकांक, 2016: एक तथ्यात्मक विश्लेषण

Posted By : Ms. Neha Chaudhary     Posted Date : Nov 30,16   Hits : 13554    

Global Hunger Index 2016

वैश्विक भुखमरी सूचकांक (Global Hunger Index-GHI), विकासशील देशों में भुखमरी तथा कुपोषण की गणना एवं इनके तुलनात्मक अध्ययन हेतु प्रयोग किया जाने वाला एक बहुआयामी सूचकांक है। इस सूचकांक को ‘अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान’ (International Food Policy Research Institute - IFPRI) द्वारा प्रकाशित किया जाता है। गौरतलब है कि वैश्विक भुखमरी सूचकांक 100 आधार बिंदुओं के आधार पर तैयार किया जाता है, जिनमें शून्य सबसे अच्छा स्कोर माना जाता है, जिसका अर्थ होता है कि उक्त देश में कोई व्यक्ति भूखा नहीं है; इसके विपरीत 100 सबसे खराब स्कोर होता है जिसका आशय देश में उपस्थित लगभग सभी व्यक्तियों की भुखमरी की स्थिति से है। हालाँकि व्यवहार में ये दोनों ही स्थितियाँ उपस्थित नहीं होती हैं।

ध्यातव्य है कि गत वर्ष तक इस सूचकांक को तीन संकेतकों- ‘अल्पपोषण’, ‘बाल अल्पवज़न’  एवं ‘बाल मृत्यु दर’ के आधार पर तैयार किया जाता था, जबकि इस वर्ष (2016) में यह सूचकांक चार संकेतकों- ‘अल्पपोषण’ (Undernourishment), ‘लंबाई के अनुपात में कम वज़न’ (Child Wasting), ‘आयु के अनुपात में कम लंबाई’ (Child Stunting ) तथा ‘बाल मृत्यु दर’ (Child Mortality) के आधार पर तैयार किया गया है। इस वर्ष GHI रिपोर्ट का मुख्य विषय यानी थीम है- "GETTING TO ZERO HUNGER" 

गौरतलब है कि विश्व के तकरीबन 118 विकासशील देशों से प्राप्त आँकड़ों के आधार पर  वैश्विक भुखमरी सूचकांक तैयार किया गया है। ध्यान देने वाली बात यह है कि इन 118 देशों में से लगभग 50 देश अभी भी भुखमरी की भयावह स्थिति के शिकार हैं। इनमें प्रमुख हैं- नाइजर, चाड, इथोपिया तथा सिएरा लियॉन। भुखमरी सूचकांक 2016 में शामिल किये गए देशों में 5 से कम स्कोर प्राप्त करने वाले मात्र 16 देश हैं, जिनमें शीर्ष पाँच देश क्रमशः अर्जेंटीना, बेलारूस, बोस्निया और हेरजेगोविना (संयक्त रूप से), ब्राज़ील, चिली तथा कोस्टा रिका हैं।

 सूचकांक में 118 देशों की सूची में भारत को 97वाँ स्थान प्राप्त हुआ, जबकि पड़ोसी देश- नेपाल (72वाँ), म्याँमार (75वाँ), श्रीलंका (84वाँ) और बांग्लादेश (90वाँ स्थान) भारत से आगे रहे। हालाँकि, पाकिस्तान 107वें स्थान के साथ भारत से पीछे है। इस रिपोर्ट के अनुसार भारत अभी भी भुखमरी की ‘गंभीर’ (Serious) स्थिति में बना हुआ है।

सूचकांक को बनाने के लिये किये गए सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में तकरीबन 39  फीसदी बच्चे  बौनेपन, अल्पपोषण तथा कुपोषण के शिकार हैं। हालाँकि, यह पहली रिपोर्ट नहीं है जिसने भारत के विकास की पोल खोली है। इससे पूर्व भी संयुक्त राष्ट्र संघ की वर्ष 2014-15 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 20 लाख लोग भूख के शिकार थे। अब, अगर हम इस समस्या की जड़ में जाएँ तो ज्ञात होता है कि भारत की स्थिति बिगड़ने की अहम वजह पाँच साल की आयु तक के बच्चों में व्याप्त कुपोषण का स्तर है, जिसका एक प्रमुख कारण मध्याह्न भोजन, एकीकृत बाल विकास योजना, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत उचित एवं प्रामाणिक तरीके से किया जाने वाला खाद्य आवंटन तथा मनरेगा जैसे बहुआयामी कार्यक्रमों और योजनाओं का सही ढंग से अनुपालन न हो पाना है। 

उक्त सर्वेक्षण के अनुसार भारत में मौजूद तकरीबन 39 फीसदी बच्चे न केवल अविकसित हैं वरन् उन्हें संपूर्ण पोषण तत्त्वों से युक्त संतुलित भोजन तक उपलब्ध नहीं हो पाता है। यही कारण है कि भारत की कुल जनसंख्या का लगभग 15.2 फीसदी हिस्सा कुपोषण तथा अल्पपोषण की समस्या से जूझ रहा है। इस रिपोर्ट के मुताबिक अस्वच्छता तथा स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के कारण बच्चों को अल्पायु में ही गंभीर रोगों, जैसे- अतिसार, हैजा आदि से ग्रसित होना पड़ता है। वस्तुतः देश की इस अति दयनीय दशा के लिये कई कारक ज़िम्मेवार हैं, जिनमें  अशिक्षा,  अस्वच्छता तथा स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के कारण बच्चों का कम आयु में गंभीर रोगों से ग्रसित होना, सब्सिडी प्राप्त खाद्यान्न का अनुचित एवं अपर्याप्त आवंटन, स्वच्छ जल की कमी, बेरोज़गारी, अमीर एवं गरीब के मध्य दिनों-दिन बढ़ता अंतर इत्यादि कुछ प्रमुख कारक हैं। 

विश्व में सर्वाधिक तेज़ी से विकास की और अग्रसर भारतीय अर्थव्यवस्था की यह दयनीय दशा देखकर तो यही स्पष्ट होता है कि भारत अपने लोगों को पर्याप्त मात्रा में पोषणयुक्त संतुलित आहार तक उपलब्ध करा सकने में असमर्थ है। ऐसे में यह प्रश्न व्यथित करने वाला है कि अगर वर्तमान में भारत की यह स्थिति है तो आने वाले 10 वर्षों में, विशेषकर जब भारत की जनसंख्या विश्व में सबसे अधिक होगी तब तो यह स्थिति और भी अधिक बदतर हो जाएगी।

पिछले वर्ष सम्पूर्ण विश्व ने एक मत से सतत् विकास लक्ष्यों (SDGs) को प्राप्त करने हेतु वर्ष 2030 तक वैश्विक भुखमरी के स्तर को शून्य तक लाने का एकमत संकल्प किया था। हालाँकि, यदि दक्षिण एशिया तथा उप-अफ्रीका के देशों में भुखमरी का स्तर वर्तमान के स्तर से ऊपर जाता है तो भविष्य में इसे कम करना अथवा पूर्णतया समाप्त करना बहुत मुश्किल होगा। 

ऐसे में यह कहना अप्रासंगिक नहीं होगा कि यदि वैश्विक समुदाय SDG के तहत तय किये गए लक्ष्यों को प्राप्त करना चाहता है अथवा वैश्विक भुखमरी जैसी गंभीर समस्या के सम्बन्ध में किसी समाधान तक पहुँचना चाहता है, तो इसे न केवल बच्चों के लिये वरन गर्भवती माताओं और किशोरियों के लिये भी सभी पोषक तत्त्वों से युक्त संतुलित आहार एवं स्वास्थ्य हेतु एक बेहतर व्यवस्था का प्रबंधन करना होगा, बल्कि विश्व के सभी देशों को भी इस दिशा में आवश्यक कुछ अति महत्त्वपूर्ण कदम उठाने होंगे।  

प्रत्येक देश को यह तय करना होगा की उसकी भावी पीढ़ी के उज्ज्वल भविष्य तथा बेहतर स्वास्थ्य के लिये यह आवश्यक है कि किसी भी देश में व्यापार तथा कृषि हेतु एक उचित वातावरण विद्यमान हो ताकि किसान जैविक खादों का इस्तेमाल करके स्वास्थ्यवर्द्धक फसलों का उत्पादन करने में सक्षम हो सकें जिससे देश में मौजूद प्रत्येक व्यक्ति को पोषक खाद्यान्न उपलब्ध कराया जा सके
 इसके साथ-साथ एक प्रभावी गरीबी निवारक नीति का भी कार्यान्वयन किया जाना चाहिये तथा सभी लोगों से खाद्य सामग्री को व्यर्थ न करने की अपील भी की जानी चाहिये।

(नेहा चौधरी)
  संपादक
"दृष्टि करेंट अफेयर्स टुडे"

ias study meterial

Recent Post