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विश्व व्यवस्थाः 1914 से 2014, वैश्वीकरण की आड़ में

Posted By : Dr. Santosh Kumar Singh     Posted Date : Apr 29,15   Hits : 11622    

( World Order: 1914 to 2014, In shadow of Globalization )



2014 में प्रथम विश्व युद्ध की घटना के 100 साल पूरे हो गए। इसने पुनः विश्व व्यवस्था की ओर ध्यान आकृष्ट किया है। समकालीन विश्व व्यवस्था में कई तरह के उथल-पुथल जारी हैं। इनमें से कई का संबंध वैश्वीकरण की प्रक्रियाओं से भी है। वैश्वीकरण ने लाखों लोगों को गरीबी से बाहर करने में अपनी भूमिका निभाई है। लोगों एवं राज्यों की विविधता एवं परस्पर विरोधी हितों एवं मूल्यों के बावजूद भी यह तेजी से एकीकरण एवं अंतर्संबद्धता के लिए दबाव डाल रहा है। परिणामस्वरूप देशों एवं सरकारों तथा सरकारों एवं उनके नागरिकों के बीच विश्वास का स्तर चिंताजनक रूप से कम होता जा रहा है। इससे अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा एवं समृद्धि को भी खतरा पहुँच सकता है। 

विश्व की बड़ी शक्तियों के बीच विश्वास (Trust between the World's Major Powers)

वैश्वीकरण के परिणामस्वरूप वैश्विक आर्थिक एवं राजनीतिक शक्तियों के बीच संबंधों का पुनर्निर्धारण हो रहा है। वैश्विक आर्थिक एकीकरण जो कि वैश्वीकरण का अभिन्न भाग है, के कारण देशों की जनसांख्यिकी आकार (Demographic Size) तथा उनके राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के बीच परस्पर संबंध विकसित होता जा रहा है। इसने उच्च जनसंख्या वाले चीन, भारत, इंडोनेशिया जैसे देशों को नए अवसर उपलब्ध कराए हैं। पहले इन देशों के लिए जनसंख्या आर्थिक बोझ के समान होती थी। घटती जनसंख्या वाले रूस, जापान एवं अधिकांश यूरोपीय देशों के मामले में इसका प्रभाव मिश्रित है। रूस का अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव बनाए रखने में इसकी परमाणु शस्त्र संपन्न स्थिति, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में वीटो पावर के साथ स्थायी सदस्यता, राजनीतिक एवं आर्थिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए अपने असाधारण संसाधनों के उपयोग करने की इसकी योग्यता तथा एक स्थायी सक्रिय विदेश एवं सुरक्षा नीति प्रमुख हैं। अर्थव्यवस्था के खुलापन तथा बहुलवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था अपनाने के प्रति रूस की कुछ शंकाएँ भी स्पष्ट हैं। 

अन्य शक्तियों जैसे चीन और अमेरिका की बात करते हैं तो चीन के नेता अमेरिका पर पूरी तरह भरोसा नही करते हैं। आर्थिक आकार (Economic Size) बढ़ने के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक प्रभाव तथा क्षेत्रीय राजनीतिक शक्ति में बढ़ोत्तरी हो रही है। फिर भी चीनी लोग एक तरह का भय का वातावरण प्रदर्शित करते हैं कि अमेरिका चीन को घेरने की नीति के तहत कार्य कर रहा है। यह कार्य अमेरिका द्वारा घोषित दक्षिण-एशिया प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी कूटनीति एवं सैन्य शक्ति का पुनर्संतुलन (Rebalancing) द्वारा या तकनीकी संरक्षणात्मक उपायों जिसके तहत अमेरिकी बाजारों में चीनी कंपनियों को निवेश करने से रोका जा रहा है, के द्वारा किया जा रहा है। चीन, अमेरिका पर यह भी आरोप लगाता है कि वह चीनी साम्यवादी शासन को नुकसान पहुँचाने या खोखला करने के प्रयास में लगा रहता है। 

चीन के पड़ोसी जो पिछले 20 सालों से इसकी आर्थिक संवृद्धि का लाभ उठाते रहे हैं, अब वे चीन के दक्षिण-चीन एवं पूर्वी चीन सागर में उसके ऐतिहासिक आधार पर क्षेत्रीय दावे करने के कारण चिंतित है, लेकिन ये केवल चीन जैसी उभरती शक्तियाँ ही नहीं हैं जो उभरती राजनीतिक व्यवस्था पर विश्वास नही करती बल्कि 1945 से विश्व व्यवस्था के शीर्ष पर विद्यमान अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया तथा जापान जैसी शक्तियाँ भी नियमों एवं मूल्यों को उभरती शक्तियों द्वारा संरक्षित करने के प्रयास को अविश्वास की नजर से देखती हैं। ये शक्तियाँ इन पर अपना परंपरागत अधिकार समझती हैं। साइबर जासूसी, चीन की सरकारी एजेंसियों द्वारा बौद्धिक संपदा की चोरी, राज्यों द्वारा सब्सिडी का प्रयोग तथा राज्य स्वामित्व वाले उद्योगों के कथित राजनीतिक उत्प्रेरण से स्पष्ट होता है कि पश्चिमी देशों के लिए पहले की तुलना में खुली एवं वैश्विक विश्व व्यवस्था में संवृद्धि प्राप्त करना कठिन कार्य होगा। 

संस्थाओं पर प्रभाव (Effects on Institutions)

सरकारों के बीच आपसी विश्वास की कमी के कारण अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के स्तर पर वैश्वीकरण की वास्तविकताओं तथा मांगों को अपनाने के संदर्भ में उनकी सहयोग करने की क्षमता प्रभावित हो रही है। सभी देशों की सुरक्षा एवं कल्याण को बढ़ाने वाली अनेक शुरुआतों पर रोक लगी हुई है। एक जीता जागता उदाहरण कार्बन उत्सर्जन के संबंध में पिछले 20 वर्षों में भी सहमति न हो पाना हम सबके सामने है। एक ऐसे विश्व में जहाँ वैश्विक आर्थिक प्रतिस्पर्द्धा जारी है। अपने अल्पकालिक लाभों को खोने के डर से साझा हितों पर आधारित दीर्घकालिक सार्थक समझौते नही हो पा रहे हैं। आर्थिक एकीकरण बहुपक्षीय बाजार खोलने संबंधी उपाय अपनाने की मांग करता है। उभरते देशों ने व्यापार वार्ताओं में अमेरिका एवं यूरोपीय देशों को चुनौती देने हेतु आत्म विश्वास (Self Confidence) प्राप्त कर लिया है। इस कारण विश्व व्यापार संगठन (WTO) जैसे मंचों पर कई बार वार्ता असफल हो जाते हैं। इस समस्या का एक कारण यह भी है कि उभरती शक्तियाँ अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर स्वतंत्र मत या संप्रभु दृष्टिकोण (Sovereign approach) अपनाने लगी हैं। उन्होंने यह देखा है कि किस तरह पश्चिमी शक्तियों ने अपने आर्थिक हितों के अनुरूप आर्थिक नियम तय किए और उससे लाभ प्राप्त किया। क्योंकि उस समय कानून तय करने की शक्ति उन्हीं के पास थी। अब उभरती शक्तियाँ भी अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर स्वहित की प्राप्ति के प्रयास में लगी हुईं हैं। 

विश्व शक्ति का बदलता संतुलन (The changing balance of world power)

वैश्विक अर्थव्यवस्था के संदर्भ में क्षेत्रों एवं देशों की महत्ता में परिवर्तन आ रहा है। सन् 2000 में वैश्विक जीडीपी में अमेरिका, जापान तथा यूरोपीय संघ की भागीदारी क्रमशः 31 प्रतिशत, 14 प्रतिशत तथा 26 प्रतिशत की थी जबकि चीन, दक्षिण पूर्व एशियाई देशों (आसियान) तथा लैटिन अमेरिकी एवं कैरीबियन देशों की भागीदारी क्रमशः 3.7 प्रतिशत, 1.5 प्रतिशत तथा 6.6 प्रतिशत की थी। इसके विपरीत विभिन्न अध्ययनों के अनुसार 2018 तक विश्व जीडीपी में अमेरिका, जापान एवं यूरोपीय संघ की हिस्सेदारी सिमटकर 21.6 प्रतिशत, 6 प्रतिशत तथा 20 प्रतिशत हो जाएगी। जबकि चीन,आसियान तथा लैटिन अमेरिका की बढ़कर क्रमशः 15.3 प्रतिशत, 3.3 प्रतिशत तथा 8.3 प्रतिशत होगी। पिछले तीस वर्षों के वैश्वीकरण के फलस्वरूप व्यक्तियों की संपत्ति पर आश्यर्चजनक प्रभाव पड़ा है। चीन में प्रति व्यक्ति जीडीपी 1990 के 314 डॉलर से बढ़कर 2012 में 6091 डॉलर हो गया है। जबकि सब सहारा अफ्रीका में यह 2004 के 627 डॉलर से बढ़कर 2012 में 1349 डॉलर हो गया है। अब उभरते देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ विश्व की सबसे बड़ी कंपनियाँ हैं। ये केवल पश्चिमी देशों में ही नही बल्कि दक्षिण के देशों में भी व्यापार एवं निवेश कर रही हैं। विश्व की नई आर्थिक शक्तियाँ अपने धन का निवेश विश्व के उन क्षेत्रों में कर रही हैं जहाँ से उन्हें बेहतर लाभ प्राप्त हो सकता है। लेकिन ऐसे अवसरों के साथ-साथ  इन देशों के लिए कुछ चुनौतियाँ भी उभर रही हैं। भारत में भी विश्व शक्ति बनने की संभावनाएँ मौजूद हैं। लोकतंत्र, आर्थिक संवृद्धि तथा सांस्कृतिक विविधता के क्षेत्र में भारत ने महत्त्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है लेकिन इसकी संरचनात्मक कमजोरियों, व्यापक भ्रष्टाचार, अत्यधिक सामाजिक एवं धार्मिक विभाजन, धार्मिक अतिवाद, आर्थिक विषमता तथा आंतरिक सुरक्षा चुनौतियाँ इसके विश्व शक्ति बनने की संभावना में अवरोध उत्पन्न कर सकते हैं।  

अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के लिए जोखिम (Risks to International Order)

क्या यह मान लिया जाए कि हम जिस अत्यधिक अंतनिर्भरता के दौर में रह रहे हैं, उससे 100 या 60 साल पहले होने वाले संघर्षों का दौर समाप्त हो गया है। वैश्वीकरण एक बर्बर प्रक्रिया है। इसमें अलग-अलग रहने वाले समाजों को भी संरचनात्मक सामंजस्य करने हेतु कठोर कदम उठाने पड़ते हैं। इस प्रक्रिया को अपनाने में जितना विलम्ब होता है सामंजस्य प्रक्रिया उतना ही कठोर एवं बर्बर होता जाता है। पूर्वी यूरोपीय देशों को ऐसा अनुभव करना पड़ा है। इससे लोगों में निराशा की भावना पैदा होती है। आर्थिक संरक्षण (Economic Protection) की मांग की जाती है तथा लोकप्रिय दलों एवं मनोभावों (Populist Parties and Sentiments) का उदय होता है। ऐसा जापान, रूस, यूरोपीय संघ तथा कुछ हद तक अमेरिका में भी देखा गया है। चीन साम्यवादी शासन व्यवस्था के बावजूद भारत से ज्यादा संवृद्धि दर प्राप्त करने में सफल रहा है। चिली और ब्राजील ने वेनेजुएला एवं क्यूबा की तुलना में सापेक्षतया बाजार का ज्यादा लाभ उठाया है। पोलैंड जैसा देश पिछले 20 वर्षों में प्रति व्यक्ति जीडीपी चार गुणा करने में सफल रहा है लेकिन दूसरी ओर यूक्रेन जैसे देश में शायद ही कोई बदलाव आया है। 

21वीं शताब्दी की अंतर्निर्भरता से जुड़े कुछ जोखिम स्पष्ट हैं। कुछ लोगों के लिए अंतनिर्भरता से तात्पर्य दूसरों पर निर्भरता से है। जापान-चीन व्यापार तथा जापान द्वारा चीन में किए गए व्यापक निवेश को ध्यान में रखते हुए जापानी नेता चीन के साथ बढ़ते तनाव की अतार्किकता स्पष्ट करते हैं। चीनी दृष्टिकोण के अनुसार संवृद्धि के लिए घरेलू कारकों के कमजोर होने के कारण इसने चीन पर अपने को निर्भर बनाया है। इससे जापान को आर्थिक उत्पीड़न (Economic Coercion) का सामना करना पड़ सकता है। इसी तरह रूस यह समझता है कि रूसी गैस एवं तेल की बिक्री से ज्यादा महत्त्वपूर्ण आयाम रूसी गैस एवं तेल पर यूरोपीय देशों की निर्भरता है। इस कारण वह यूक्रेन में अपने प्रभुत्व को बनाए रख सकता है। अन्य उभरती शक्तियाँ भी अपने संप्रभु अधिकारों की सुरक्षा एवं उन्हें प्रोत्साहन देने को प्राथमिकता दे रही हैं। इसका स्पष्ट प्रमाण वैश्विक सैन्य व्यय (Global Military Spending) में आयी अचानक वृद्धि है। चीन, भारत, सऊदी अरब तथा रूस पिछले पाँच वर्षों से औसत 22.5 बिलियन अतिरिक्त सैन्य व्यय कर रहे हैं। 

वर्तमान विश्व व्यवस्था में राष्ट्रवाद (Nationalism) अभी भी महत्त्वपूर्ण बना हुआ है। जैसे ही देश अपने प्रभाव की पुनर्प्राप्ति करते हैं या सापेक्षिक रूप से इसमें गिरावट महसूस करते हैं, इनके राष्ट्रीय पहचान से जुड़े अनसुलझे मुद्दे उभर आते हैं। क्रीमिया एवं यूक्रेन के संदर्भ में रूस के व्यवहार या दक्षिण-पूर्व एशिया में चीनी व्यवहार से समझा जा सकता है जहाँ चीनी नेता अपनी बढ़ती आर्थिक एवं सैन्य क्षमता का प्रयोग दक्षिणी एवं पूर्वी चीन सागर में क्षेत्रीय दावे (territorial claim) करने में कर रहे हैं। उनका ऐसा मानना है कि ये क्षेत्र 20वीं शताब्दी के प्रथम पूर्वाद्ध (First half of 20th century) में उनसे अन्यायपूर्वक ले लिए गए थे।

जोखिम एवं अवसरों में समन्वय (Conciliation between risk and opportunities)

आज विश्व संस्थात्मक ढाँचों (Institutional infrastructure) के द्वारा इस तरह जुड़ा हुआ है जिसकी तुलना इतिहास के किसी समय से नहीं की जा सकती है। 1940 एवं 1950 के दशक में सृजित संस्थाएँ अंतर्राष्ट्रीय संघर्षों को रोकने में काफी हद तक सफल रही हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद्, महासभा, अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय, मानवाधिकार परिषद् जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ सदस्य देशों द्वारा की गई कानूनी उल्लंघनों को प्रकट करती हैं लेकिन वे शायद ही सदस्य देशों पर प्रभावी प्रतिबंध आरोपित कर पाते हों। हालाँकि सुरक्षा परिषद् ने विश्व के सबसे ज्यादा विवादास्पद संघर्षों को समाप्त करने के लिए शायद ही कभी ठोस कदम उठाए हों लेकिन इसने उन संघर्षों को रोकने का कार्य (Serve as Brake) अवश्य किया है। इसके कारण इसके स्थायी सदस्यों में संघर्ष बढ़ने की नौबत उत्पन्न नही हो पाई। 

यह एक सच्चाई है कि हम परमाणु हथियारों के युग में रह रहे हैं और इसने बड़े संघर्षों पर रोक भी लगाई है लेकिन यह एक राज्य के अंदर संघर्ष को रोकने में नाकाम रहा है। इजराइल, पाकिस्तान के उदाहरण से इसे स्पष्टतः समझा जा सकता है। परमाणु अप्रसार संधि (NPT) तथा अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के कारण विश्व के बड़े भाग का सैन्य परमाणुकरण (Military nuclearisation) नही हो सका है, जिसका कि 1960 एवं 1970 के दशक में बड़ा भय व्याप्त था। हालाँकि मध्य-पूर्व एवं पूर्व-एशिया में परमाणु युद्ध का जोखिम बना हुआ है। 

पश्चिमी देश अभी भी निवारण (Deterrence) एवं गठबंधन की महत्ता को भूल नही पाए हैं। शीत युद्ध की समाप्ति तथा इसके सामरिक उद्देश्यों को लेकर सदस्य देशों के बीच विरोधाभास होने के बावजूद नाटो (NATO) का अस्तित्व बना हुआ है। यूरोपीय संघ सदस्य देशों के बीच संबंधों को और गहरा बनाने में लगा हुआ है। इन संस्थाओं ने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में स्थिरता प्रदान करने वाले तत्व की भूमिका निभायी है, जिसका कि द्वितीय विश्व युद्ध के पहले अभाव था। इनके अलावा आसियान (ASEAN), अफ्रीकी संघ, पश्चिमी अफ्रीकी देशों का समुदाय (The Economic Community of West African States-ECOWAS), खाड़ी सहयोग परिषद् (GCC) तथा प्रशांत गठबंधन (Pacific Alliance) जैसे संगठन यूरोपीय संघ का मुकाबला तो नहीं कर सकते लेकिन इन्होंने छोटे देशों को सुरक्षित महसूस कराया है तथा इन क्षेत्रीय समूहों के अंदर एवं बाहर बड़े देशों की मनमानियों पर रोक लगाई है। 

विश्व बैंक एवं अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के साथ ब्रिक्स बैंक (BRICS Bank) तथा एशियाई बुनियादी ढ़ाँचा निवेश बैंक (Asian Infrastructure Investment Bank) की स्थापना से साफ पता चलता है कि बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के अंतर्गत शक्ति संरचना में बदलाव आ रहा है। जी-20 के सृजन से वैश्विक संस्थाओं का क्रमिक पुनर्संतुलन (Gradual rebalancing) स्पष्ट होता है। यह जी-7 वाले पश्चिमी प्रभुत्व से अलग है। इसने जी-7 को वैश्विक स्तर पर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करने के लिए एक नया विकल्प भी उपलब्ध कराया है। 

गैर-राज्य कर्ताओं (Non-state Actors) के उभार ने भी संप्रभु देशों के बीच होने वाले प्रतिस्पर्द्धा की तीव्रता को कम किया है। वैसी कंपनियाँ एवं लोग जिनकी संपदा वैश्विक आपूर्तिशृंखला से जुड़ी हैं वे लगातार राष्ट्रीय हित (National Interest) की भावना से दूर होती जा रही हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर के सिविल सोसाइटी समूह राष्ट्रीय सरकार के हितों को चुनौती देते हैं या मानवीय संकट, इंटरनेट शासन, स्वास्थ्य देखभाल या पर्यावरण सुधार जैसे जनकल्याणकारी कार्यों में भागीदारी करते हैं। 

आलोचना एवं समस्याएँ (Criticism and Problems)

वर्तमान विश्व व्यवस्था में एक सवाल यह भी पैदा होता है कि 1945 के पश्चात अस्तित्व में आई बहुपक्षीय विश्व व्यवस्था मजबूत हो रही है या कमजोर हो रही है। क्या अबाधित प्रतिस्पर्द्धा के कारण विश्व अव्यवस्था वाले दौर में लौट रहा है या किसी तरह का नया अभिविन्यास (Reconfiguration) सहयोग का कोई प्रभावी ढाँचा उपलब्ध कराएगा। 20वीं शताब्दी के कुछ प्रमुख स्तंभ जैसे संयुक्त राष्ट्र, ब्रेटेनवुडस वित्तीय संस्थाएँ तथा विश्व व्यापार संगठन 21वीं शताब्दी की चुनौतियों का सामना करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इन संस्थाओं के आलोचक संगठनात्मक अक्षमता तथा नीतिगत असफलता की शिकायत करते हैं। वे इन अक्षमताओं एवं असफलताओं में निम्नलिखित को शामिल करते हैं-

  • संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्य संयुक्त कार्रवाईयों में अवरोध उत्पन्न करते हैं, वे अधिदेश (Mandate) से बाहर निकल जाते हैं तथा सुरक्षा परिषद् के निर्णय अपने हितों के अनुकूल न होने पर इसे बाईपास करते हैं। 

  • मृतप्राय अंतर्राष्ट्रीय शस्त्र नियंत्रण व्यवस्था शस्त्रों के प्रसार रोकने तथा निरस्त्रीकरण में असफल रहे हैं। 

  • अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संबंधित वार्ता व्यापक स्वरूप धारण नहीं कर पाते हैं और वे कुछ ही समान समझ वाले देशों के बीच समझौते बनकर रह जाते हैं। 

  • जलवायु परिवर्तन को सीमित करने वाले वैश्विक वार्ता विश्वसनीय मार्ग अपना नहीं पा रहा है। 

  • नाटो (NATO) तथा यूरोपीय संघ (EU) जैसे संगठनों में सामूहिक प्रतिबद्धता का अभाव है क्योंकि सदस्य देश संगठन के लक्ष्यों पर अलग-अलग राय रखते हैं तथा इनके गतिविधियों में भिन्न-भिन्न स्तर की प्रतिबद्धता दिखा रहे हैं। 

  • तीव्र गति से बढ़ते विकास की तुलना में अंतर्राष्ट्रीय नियमन एवं नीति पीछे छूटते जा रहे हैं जिसके कारण वित्त एवं सूचना तकनीकी सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहा है। 

लेकिन इस तरह की सारी आलोचनाएँ सही नहीं हैं। उपरोक्त संगठनों से मिले-जुले परिणाम प्राप्त होते रहे हैं। स्थापित संस्थाओं के बाहर निर्णय होने से यह भी नहीं कहा जा सकता कि बड़े संगठन अप्रभावी होते जा रहे हैं। बड़े संगठनों का अंतर्राष्ट्रीय नीतियों पर कभी भी एकाधिकार नहीं रहा है। वे राष्ट्रीय एवं बहुपक्षीय प्रयासों से मिलकर कार्य करते रहे हैं। इस तरह के निकाय जो वर्तमान चुनौतियों का सामना कर रहे हैं वे उनके पूर्व के सफलताओं का प्रत्यक्ष उत्पाद (Direct Product) हैं। इन संगठनों में संयुक्त राष्ट्र (UN), नाटो (NATO) तथा विश्व व्यापार संगठन (WTO) जैसे संगठनों को शामिल किया जा सकता है। इन्होंने सुरक्षित विश्व एवं मुक्त व्यापार क्षेत्र बनाने में अहम् योगदान किया है। कुछ संगठन अभी भी राष्ट्रीय विकल्पों से बेहतर हैं। विशेषकर वे अंतर्राष्ट्रीय वैधता के स्रोत तथा निष्पक्ष एवं अधिकारिक तकनीकी विशेषज्ञता के संग्राहक समझे जाते हैं। इसके बावजूद कई स्थापित अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ स्पष्ट रूप से संरचनात्मक समस्याओं का सामना कर रही हैं। इनके मिश्रित निष्पादन को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि कुछ कमियाँ जरूर हैं। जैसे- 

  • सहायता एवं संस्थात्मक शक्ति से वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक शक्ति का प्रदर्शन नहीं होता है। इसमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् की सदस्यता सबसे महत्त्वपूर्ण मुद्दा है। 

  • संयुक्त राष्ट्र, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक तथा नाटो का गठन विशेष उद्देश्य के लिए किया गया था लेकिन अब ये संगठन नए चुनौतियों के अनुकूल अपनी संरचनाओं एवं प्रक्रियाओं (Structures and processes) में बदलाव लाने में सक्षम नहीं हो पा रहे हैं। 

  • जो संगठन राष्ट्रीय सरकारों द्वारा बनाए गए हैं वे गैर-राज्य कर्ताओं के साथ बड़े निगमों, वित्तीय संस्थाओं, तकनीकी दक्ष व्यक्तियों तथा नेटवर्क द्वारा पैदा किए जा रहे वैश्विक चुनौतियों का सामना करने में सक्षम नही हो पा रहे हैं। 

प्रमुख कारणों की पहचान (Identifying the main causes)

अंतर्राष्ट्रीय संगठनों में सुधार एवं प्रतिस्थापन से जुड़े वाद-विवाद के केन्द्र में संरचना (Structure) है। यह जायज प्रतीत होता है कि अप्रतिनिधिक सदस्यता (Unrepresentative membership) जैसी कमियों को दूर किया जाए। इसके अलावा इनकी प्रक्रिया, वित्त तथा आंतरिक प्रबंधन में भी सुधार करने की आवश्यकता है। हालाँकि इस तरह के सुधार आवश्यक हैं लेकिन ये सफलता सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। वास्तविक सफलता की कुंजी उनकी संरचना में नहीं बल्कि उनके उद्देश्यों में निहित है। स्पष्ट है कि केवल हार्डवेयर बदलने से कुछ नहीं होगा बल्कि इनके सॉफ्टवेयर बदलने की भी आवश्यकता है। 

वैश्विक शासन से जुड़ी संस्थाएँ राज्य से अलग स्वतंत्र संरचनाएँ नही हैं तथा वैश्वीकरण से जुड़ी समस्याओं का समाधान या प्रबंधन अकेले नहीं कर सकती हैं। अलग नौकरशाही, सम्मान, पहचान एवं नेतृत्व होने के बावजूद वे राष्ट्रीय राज्यों के समूह ही होते हैं। वर्तमान विश्व व्यवस्था की प्रमुख समस्या यह नहीं है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् जैसे संगठनों में सुधार होगा या नहीं बल्कि प्रमुख समस्या पर्याप्त अंतर्राष्ट्रीय सहमति की है कि आखिर समस्याएँ क्या हैं, क्या किया जाना चाहिए और किसी अंतर्राष्ट्रीय संगठन को क्या भूमिका निभानी चाहिए। अनेक मामलों से पता चलता है कि इन पर पर्याप्त सहमति नहीं है। 

समस्याओं का समाधान (Solutions of problems)

भविष्य की वैश्विक शासन नई सर्वसम्मति तथा इसकी भागीदारी पर निर्भर करेगा। यह बहुत हद तक राष्ट्रीय प्रवृत्तियों एवं राजनीति का मामला है। किसी प्रकार का समाधान राज्यों के अंदर एवं उनके बीच होने वाली घटनाक्रमों पर निर्भर करेगा। इसके लिए यह आवश्यक होगा कि आखिर राज्य अंतर्राष्ट्रीय संगठनों में सहयोग के लिए सैद्धान्तिक तत्वों की पहचान एवं समर्थन के लिए घरेलू स्तर पर कितने तैयार हैं। जैसे-

  • क्या अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं से निपटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता या सामूहिक कार्रवाई आवश्यक है। 

  • क्या अंतर्राष्ट्रीय समझौतों से राष्ट्रीय कार्रवाई की स्वतंत्रता सीमित हो सकती है। 

  • क्या विनिमय के आधार पर प्रत्यक्ष लाभ की प्राप्ति तथा अंतर्राष्ट्रीय प्रक्रिया को जीवित रखने के लिए सुलह (Compromise) आवश्यक है। 

  • क्या सदस्य राज्यों को केवल अपने संकीर्ण राष्ट्रीय हितों की ही रक्षा करनी चाहिए या सामूहिक हितों की प्राप्ति के लिए संगठन के एजेंडा में सक्रिय हिस्सेदारी करनी चाहिए। 

वर्तमान विश्व व्यवस्था तथा अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के सफल कार्य संचालन में अमेरिकी की घरेलू राजनीति, चीन का राजनीतिक शब्दाडम्बर एवं राष्ट्रवादी स्वर, विश्व की प्रमुख उभरती शक्तियों की ओर से निरंतर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का अभाव, प्रमुख क्षेत्रीय शक्तियों के बीच अनसुलझे तनाव तथा फ्राँस, जर्मनी तथा ब्रिटेन जैसी मध्यस्तरीय शक्तियों के अंतर्राष्ट्रीय मामलों से जुड़ाव जैसे विषय महत्त्वपूर्ण प्रश्न होंगे। अब अंतर्राष्ट्रीय संगठनों तथा उनके सदस्य राज्यों के बीच का संबंध ही महत्त्वपूर्ण नहीं है बल्कि पार-राष्ट्रीय हित रखने वाले व्यक्ति एवं समूह भी महत्त्वपूर्ण हैं। इनके अलावा धार्मिक, सांस्कृतिक, नृजातीय, आर्थिक तथा नैतिक चिंताएँ भी हैं। मानवाधिकारों, पर्यावरण तथा शस्त्र नियंत्रण से जुड़े अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर सिविल सोसाइटी संगठनों की भागीदारी पहले से ही हो रही है। लेकिन नई संचार तकनीकें व्यक्तियों को बिना औपचारिक या भौतिक संरचना के अपने को संगठित एवं अभिव्यक्त करने का अवसर उपलब्ध करा रहे हैं। मानवाधिकार, पर्यावरण संरक्षण तथा शस्त्र नियंत्रण जैसे क्षेत्रों में सिविल सोसाइटी संगठनों की ज्यादा सक्रिय भागीदारी हो रही है। 

समस्याओं के समाधान हेतु कुछ संभावित कदम (Some possible steps to solve the problems)

स्वयं में सुधार लाने हेतु अंतर्राष्ट्रीय संगठन सक्षम नही हैं। अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की सत्ता एवं समर्थन सदस्य राज्यों पर निर्भर करता है जो स्वयं ही कुछ प्रमुख समस्याओं का कारण बने हुए हैं। किसी भी सुधार प्रक्रिया में सदस्य राज्यों की प्रमुख भूमिका महत्त्वपूर्ण होगी। हालाँकि अंतर्राष्ट्रीय संरचना को आकार प्रदान करने में राष्ट्र-राज्य प्रमुख हैं लेकिन किसी तरह के आमूलचूल (Radical) बदलाव के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हैं। अभी एवं आनेवाले समय में प्रमुख चुनौतियाँ गैर-राज्य कर्ताओं (Non-state Actors) द्वारा पेश की जाएगी। इसमें अविनियमन (Deregulation) तथा राज्य असफलता (State Failure) के कारण राज्य की शक्तियों में आ रही कमी का भी योगदान होगा। राष्ट्रीय सरकारें इस शक्ति ह्रास को रोकने के प्रति अनिच्छूक हैं या जिस तेजी से तकनीक या वाणिज्य का विकास हो रहा है, उसका प्रत्युत्तर (Respond) देने में सक्षम नहीं हैं। जिन देशों पर ये अंतर्राष्ट्रीय संगठन निर्भर हैं, वे इस तरह के संरचनात्मक कमजोरियों (Structural Weaknesses) में निरंतर भागीदारी करते रहेंगे। यह भी संभावना है कि भविष्य में राज्य हस्तक्षेप से मुक्त परस्पर मेलजोल या संपर्क आधारित समुदाय आधारित वैश्विक सहयोग का अलग स्वरूप विकसित हो। इन संदर्भ में सरकारें एवं राज्य संचालित संस्थाएँ नियमन तथा सुरक्षा जैसे आवश्यक कार्य करेंगे। 

दीर्घकालिक रूप से वैश्विक समस्याओं के संयुक्त समाधान देश के अंदर एवं बाहर गैर-औपचारिक नेटवर्क (Informal Networks) पर आधारित तथा सरकारी की तुलना में मुद्दा केंद्रित, वाणिज्यिक, सांस्कृतिक तथा धार्मिक चरित्र के हो सकते हैं। वैश्वीकरण से सशक्त तथा लाचार बने करोड़ों लोगों के व्यवहार को प्रभावी ढंग से प्रभावित करने में अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक, सांस्कृतिक तथा खेल संगठन ज्यादा सक्षम होंगे। कई विवादों से घिरे होने के बावजूद अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक समिति जैसे संगठन जो सरकारी, वाणिज्यिक तथा लोगों की सहभागिता आधारित संरचना है, संभवतः ज्यादा उपयोगी मॉडल प्रस्तुत करते हैं। 

नई शक्तियों विशेषकर चीन का उदय तथा विश्व की प्रमुख महाशक्ति अमेरिका के प्रभाव में आ रही गिरावट 20वीं शताब्दी की शुरुआत में भू-राजनीतिक संक्रमण (The Geopolitical Transition) की याद दिलाता है। तब ब्रिटेन की शक्ति में सापेक्षिक गिरावट आ रही थी। चीन, जर्मनी, जापान तथा अमेरिका की शक्ति का विस्तार हो रहा था। जहाँ यूरोप प्रथम विश्व युद्ध के केंद्र में था जबकि पूर्व-एशिया गौण भूमिका निभा रहा था। अब, अंतर-राज्य संघर्ष छिड़ने को लेकर पूर्व-एशिया एवं मध्य-पूर्व चिंता के केंद्र में हैं वहीं यूरोप अब भी अपने कल (Past) से बाहर नहीं निकल पाया है। रूस पश्चिम की ओर अपने प्रभाव को फिर से विस्तृत करना चाह रहा है। यदि दूर-दृष्टि से देखें तो कहा जा सकता है कि विश्व एक बार फिर असुरक्षा के दौर में प्रवेश कर रहा है लेकिन आज के निर्णयकर्ता भी 20वीं शताब्दी के अपने समकक्षों के समान ही कदम उठायेंगे, यह कहना उचित नहीं होगा क्योंकि 2014 का विश्व 1914 के काफी भिन्न है। 

सारांश (Conclusion)

21वीं शताब्दी में विश्व व्यवस्था का निर्धारण इस बात से होगा कि क्या सरकारें एवं समाज क्रमशः एक साथ बढ़ती राज्य प्रतिस्पर्द्धा (State competition) तथा पार राष्ट्रीय अंतर्निभरता (Transnational Interdependence) के बीच फलदायक संतुलन स्थापित कर पाते हैं। उन्हें ऐसा वैश्विक शासन की औपचारिक संरचना या प्रभुत्वकारी नेतृत्व (hegemonic leadership) के बिना ही करना होगा। जैसा कि 20वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में संपूर्ण पश्चिमी विश्व में अमेरिका द्वारा नेतृत्व उपलब्ध कराया गया था। यह भी महत्त्वपूर्ण होगा कि वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं में उभरती शक्तियों के साथ बराबर की भागीदारी स्थापित की जाए। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् (UN Security Council) तथा अप्रसार संधि (Non-proliferation treaty) संभवतः उनके सदस्यों के निहित स्वार्थ के कारण फिलहाल सुधार योग्य नहीं हैं। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी, विश्व बैंक तथा अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाएँ सुधार योग्य हैं। इसमें जी-20 समर्थकारी भूमिका निभा सकता है। इसके अतिरिक्त जो देश हितों की भागीदारी करते हैं तथा एक साथ मिलकर काम करने के इच्छुक हों वे अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक नीतियों तथा अंततः राजनीतिक व्यवस्था को अपने हित के अनुरूप बनाने हेतु योगदान कर सकते हैं। 

वैश्विक स्तर पर बदलती राजनीतिक शक्ति संतुलन तथा इससे जुड़े अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के लिए जोखिम कम करने के लिए पश्चिमी देशों को विशेषकर आक्रमण रोकने तथा सुरक्षा प्रबंधन के लिए आवश्यक निवेश करना होगा। जैसा कि अभी उभरते देश कर रहे हैं। अपनी क्षमता के प्रति विश्वास को बनाए रखते हुए पश्चिमी एवं उभरते देशों को मिलकर वैश्विक सुरक्षा के खतरों को रोकना होगा। इससे सभी देशों की सुरक्षा एवं संपन्नता सुनिश्चित हो सकेगी। समुद्री डकैती के विरुद्ध अभियानों तथा प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए की गई संयुक्त कार्रवाई जैसे कुछ सकारात्मक उदाहरण सबके सामने हैं लेकिन आगे इससे भी ज्यादा व्यापक अंतर्राष्ट्रीय सहयोग स्थापित करना आवश्यक होगा।

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