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वैश्विक पर्यावरणीय अधिशासन में जलवायु वित्तीयन मुद्दाः आयाम व चुनौतियाँ

Posted By : Mr. Vivek Ojha     Posted Date : Nov 13,14   Hits : 7465    

(Issue of Climate Finance in Global Environmental Governance: Dimensions and Challenges)

"जलवायु परिवर्तन की राजनीति का यह एक कड़वा सच है कि कोई भी देश जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने में अपनी अर्थव्यवस्था का बलिदान नहीं करना चाहता लेकिन सारी अर्थव्यवस्थाएं यह जानती हैं कि अधिक लंबे समय तक विकसित होते रहने के लिए उन्हें वैश्विक पर्यावरण संरक्षण के प्रति अनिच्छुक शुभचिंतक बने रहना पड़ेगा।"

भूतपूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर का यह कथन स्पष्ट करता है कि वैश्विक पर्यावरणीय अधिशासन में जलवायु वित्तीयन के मुद्दे को न्यायोचित स्थान नहीं मिल पाया है। वित्तीयन के जरिये जलवायु परिवर्तन संकटों का प्रबंधन आज उतना ही आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण है, जितने अन्य उपाय हैं। जलवायु वित्तीयन (Climate Finance) स्थानीय, राष्ट्रीय और पारराष्ट्रीय वित्तीयन (Transnational Finance) को दर्शाता है। यह लोक, निजी और अन्य स्त्रोतों से प्राप्त किया जा सकता है। व्यापक स्तर पर निवेशों के जरिये ही उत्सर्जन में कटौती हेतु विभिन्न योजनाएं व कार्यक्रम संचालित किये जा सकते हैं। वर्तमान मानवाधिकार संरक्षण उन्मुखी विश्व में जलवायु वित्तीयन इन्हीं संदर्भों में एक वैध मांग के रूप में उभर रहा है। आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (OECD) की परिषद् द्वारा विकसित धारणा‘प्रदूषणकर्ता भुगतान करे’ (Polluter Pays Principle) ने अप्रत्यक्ष रूप से ही सही जलवायु वित्तीयन की आवश्यकता को रेखांकित किया था। इस सिद्धांत के जरिये अपेक्षा की गयी कि प्रदूषण नियंत्रण उपायों को अबाध रूप से चलाने के लिए प्रदूषणकर्ता जिम्मेदारी ले।

प्रदूषण के नियंत्रण की जिम्मेदारी लेने के पहले ‘प्रदूषक व प्रदूषण’ को परिभाषित किया जाना आवश्यक है। ओईसीडी ने वर्ष 1975 में प्रदूषक को परिभाषित करते हुए कहा कि, "एक प्रदूषक वह व्यक्ति है जो प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से पर्यावरण के अवनति का कारण बनता है अथवा ऐसी अवनति के लिए दशाएं निर्मित करता है। एक औद्योगिक संयंत्र से प्रदूषण की दृष्टि से प्रदूषणकर्ता सामान्यतया संयंत्र प्रचालक होता है।"

परिवहन एवं उपभोग से जुड़े प्रदूषण के मामलों के बारे में निर्णय करना अधिक चुनौतीपूर्ण कार्य है। ओइसीडी का मत है कि ‘आर्थिक कार्यकुशलता’ एवं ‘प्रशासनिक सुविधा’ के आधार पर प्रदूषणकर्ता को प्रदूषण फैलाने वाले एक ‘आर्थिक एजेंट’ के रूप में पहचानना उचित है। इस प्रकार एक वाहन निर्माता को एक प्रदूषणकर्ता के रूप में देखा जा सकता है, यद्यपि प्रदूषण, वाहन के मालिक द्वारा वाहन के प्रयोग के चलते होता है। प्रदूषणकर्ता की पहचान से जुड़े भ्रमों को कुछ और विशेष मामलों का उल्लेख कर स्पष्ट किया जा सकता है। अपशिष्ट पदार्थ के साथ एक अपशिष्ट उत्पादन करने वाला एक प्रदूषणकर्ता माना जाता है, यदि वह अपशिष्ट को किसी तीसरे पक्ष को हस्तांतरित करता है। जोखिम भरे संस्थापनों से उत्पन्न प्रदूषण और उससे जुड़ी दुर्घटना के लिए आपरेटर जिम्मेदार होता है। एयरपोर्ट के संदर्भ में ध्वनि प्रदूषण उत्पन्न करने का जिम्मेदार कैरियर, एयरपोर्ट अथॉरिटी या वह सरकार मानी जाती है, जिसने ऐसी अवसंरचना को अधिकृत किया है।

ओइसीडी का ‘प्रदूषणकर्ता स्वयं भुगतान करे’ का सिद्धांत 1990 के दशक से स्वीकृत अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरणीय प्रतिमान बन चुका है। इसे 1987 के एकल यूरोपियन अधिनियम, यूरोपीय आयोग के पर्यावरणीय नीतियों, मैस्ट्रिच की संधि, 1992 और एम्सटर्डम संधि, 1999 में स्पष्ट रूप से अंगीकृत किया गया है। इन सबके बावजूद जलवायु वित्तीयन का प्रश्न तब तक अधूरा रहा जब तक कि 1994 में गठित यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज के तहत् इसे औपचारिक व संस्थागत स्तर पर उठाया नहीं गया।

यूएनएफसीसीसी के तत्वावधान में जलवायु वित्तीयन का मुद्दा

जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र रूपरेखा अभिसमय के तत्वावधान में जलवायु वित्तीयन के प्रश्न को ‘अनुकूलन’ (Adaptation) और ‘कटौती’ (Mitigation) से जोड़कर देखा गया है। यूएनएफसीसी ने ‘अनुकूलन’ को परिभाषित करते हुए कहा है कि यह किसी वास्तविक अथवा संभावित जलवायविक उद्दीपन (Climatc Stimuli) और उसके प्रभावों के प्रत्युत्तर में पारिस्थितिक, सामाजिक और आर्थिक प्रणालियों में किया गया समायोजन है। यह जलवायु परिवर्तन के संभावित आघातों के शमन अथवा जलवायु परिवर्तन से जुड़े अवसरों से लाभ उठाने के लिए प्रक्रियाओं, व्यवहारों व संरचनाओं में बदलाव करने की तरफ इशारा करता है।" उल्लेखनीय है कि जलवायु परिवर्तन के विपरीत प्रभावों से बचने के लिए (अनुकूलन हेतु) भारी मात्रा में वित्त व निवेशों की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए बाढ़ से बचने के लिए सुरक्षा उपाय, चक्रवातों की जानकारी के लिए ‘पूर्व अनुमान प्रणालियों’ का गठन, ऐसी फसलों की तरफ रुख करना जो सूखे की स्थितियों से अनुकूलन करने में सक्षम हो, संचार प्रणालियों का गठन आदि जलवायु वित्तीयन के औचित्य को स्पष्ट करते हैं।

यूएनएफसीसीसी कटौती (Mitigation) को ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को रोकने के प्रयास के रूप में परिभाषित करता है। नयी प्रौद्योगिकियों का इस्तेमाल (पर्यावरण मिस्र तकनीकी) नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों के उत्पादन व उपयोग पर बल, पुराने उपकरणों को अधिक ऊर्जा कार्यकुशल (Energy Efficient) बनाना, प्रबंधन कार्यप्रणाली व उपभोक्ता व्यवहार में बदलाव कटौती उपायों (Mitigation Efforts) की उपादेयता सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं।



यूएनएफसीसी के अंतर्गत वर्तमान में जो वित्तीय तंत्र कार्यशील हैं, उनके बारे में संक्षिप्त विवरण यहां अपेक्षित है-

  • ग्लोबल एनवायरमेंट फेसिलिटी (GEF)- इसका गठन वर्ष 1991 में किया गया था। यह विकासशील व संक्रमणशील अर्थव्यवस्थाओं को जैवविविधता, जलवायु परिवर्तन, अंतर्राष्ट्रीय जल, भूमि अवमूल्यन, ओजोन क्षरण, पर्सिसटेन्ट आर्गेनिक प्रदूषकों के संदर्भ में परियोजनाएं चलाने के लिए वित्त पोषित करता है। इससे प्राप्त धन अनुदान व रियायती फंडिंग के रूप में आता है। यह फेसिलिटी यू.एन. अभिसमय के तहत् दो अन्य कोषों- लीस्ट डेवलप्ड कंट्रीज फंड (LDCF) और स्पेशल क्लाइमेट चेंज फंड (SCCF) को प्रशासित करता है।

  • अल्पविकसित देश कोष (LDCF)- इस कोष का गठन अल्पविकसित देशों को‘नेशनल एडैप्टेशन प्रोग्राम्स ऑफ एक्शन’ (NAPAs) के निर्माण व क्रियान्वयन में सहायता करने के लिए गठित किया गया था। एनएपीए के जरिये अल्पविकसित राष्ट्रों के एडैप्टेशन एक्शन की वरीयता की पहचान की जाती है। इस कोष के तहत् अल्प विकसित देशों को कृषि, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, जलवायु सूचना सेवाएं, जल संसाधन प्रबंधन, तटीय क्षेत्र प्रबंधन, आपदा प्रबंधन आदि नजरिये से मूल्यांकित किया जाता है। वर्तमान में 51 अल्प विकसित देशों को अपने एनएपीए के गठन में सहायता करने के लिए 12.20 मिलियन डॉलर दिया जा चुका है। दिसंबर 2012 में दक्षिण सूडान को आधिकारिक तौर पर अल्प विकसित राष्ट्र का दर्जा मिला।

  • विशेष जलवायु परिवर्तन कोष (SCCF)- इस कोष का गठन यूएनएफसीसीसी के तहत् वर्ष 2001 में किया गया था। इसे एडैप्टेशन, तकनीकी हस्तांतरण, क्षमता निर्माण, ऊर्जा, परिवहन, उद्योग, कृषि, वानिकी और अपशिष्ट प्रबंधन एवं आर्थिक विविधीकरण से संबंधित परियोजनाओं के वित्तीयन के लिए गठित किया गया था। यह जीवाश्म ईंधन से प्राप्त आय पर अत्यधिक निर्भर देशों में आर्थिक विविधीकरण (Economic Diversification) व जलवायु परिवर्तन राहत हेतु अनुदान देता है।



  • एडैप्टेशन फंड- इस कोष का गठन भी वर्ष 2001 में किया गया था। इसका उद्देश्य 1997 के क्योटो प्रोटोकॉल के सांझेदार विकासशील देशों में ठोस एडैप्टेशन परियोजनाओं व कार्यक्रमों का वित्त पोषण करना था। ऐसे राष्ट्रों पर विशेष ध्यान दिया जाता है जो जलवायु परिवर्तन के सर्वाधिक गंभीर खतरों का सामना कर रहे हैं। इस कोष को राशि क्लीन डेवलपमेंट मेकेनिज्म (CDM) से प्राप्त होती है। एक सीडीएम प्रोजेक्ट गतिविधि के लिए जारी ‘सर्टीफाइड एमीशन रिडक्शन (CERs) का 2 प्रतिशत इस कोष में जाता है।

  • हरित जलवायु कोष (GCF)- यह यूएनएफसीसीसी के तहत् एक अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्था है। वर्ष 2009 में कोपेनहेगन में हुए संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में हरित जलवायु कोष के गठन का प्रस्ताव किया गया था जिसे 2011 में डरबन में हुए सम्मेलन में स्वीकार कर लिया गया। यह कोष विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए सहायता राशि उपलब्ध कराता है। कोपेनहेगेन व कॉनकून समझौते में विकसित देश इस बात पर सहमत हुए थे कि वर्ष 2020 तक लोक व निजी वित्त के रूप में हरित जलवायु कोष के तहत् विकासशील देशों को 100 बिलियन डॉलर उपलब्ध कराया जायेगा। वहीं 19वें संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (वारसा में) में 2016 तक 70 बिलियन डॉलर देने का लक्ष्य तय किया गया जिसे विकासशील राष्ट्रों ने अस्वीकार किया था। उल्लेखनीय है कि नवंबर 2010 में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन के 16वें सत्र (Cop-16) में स्टैडिंग कमिटी ऑन फिनान्स के गठन का निर्णय किया गया था ताकि विकासशील देशों की जरूरतों का ध्यान रखा जा सके।


जलवायु वित्तीयन के संदर्भ में हालिया प्रगति

जलवायु वित्तीयन पिछले 1 दशक से विकसित व विकासशील देशों के मध्य मतभेद का विषय रहा है। एक तरफ जहाँ विकसित देश पृथ्वी की धारणीय शक्ति की सीमा को नजरअंदाज कर प्राकृतिक संसाधनों को उपभोग, विलास, संवृद्धि का माध्यम मानते हैं, वहीं कृषि प्रधान विकासशील देशों में पृथ्वी व प्राकृतिक संसाधनों को जीवन-समर्थनकारी प्रणाली (Life-supporting System) के रूप में देखा जाता है। विकसित देश विकासशील देशों के लिए वित्तीय दायित्व का बोझ उठाने के प्रति अनिच्छुक रहे हैं। इस क्रम में यूएनएफसीसीसी के तहत् पिछले कुछ वर्षों में निम्नांकित प्रगति हुई है-

कॉनकून सम्मेलन कोप-16- वर्ष 2010 में कॉनकून सम्मेलन में जलवायु वित्तीयन से संबंधित कुछ प्रावधान किये गये थे-

  • विकासशील देशों की पर्यावरणीय चुनौतियों के चलते उभरे वित्तीय बोझ को कम करने के लिए विकसित देशों द्वारा 2010-12 की कालावधि में 30 बिलियन डॉलर प्रदान करने पर सहमति बनी। सम्मेलन में त्वरित वित्तीयन पर बल दिया गया।

  • विकसित देश ‘2020 वचनबद्धता’ के तहत् 2020 तक हरित जलवायु कोष के तहत् विकासशील देशों को 100 बिलियन डॉलर की सहायता करेगें।

डरबन प्लेटफार्म, 2011- संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (कोप-17) में हरित जलवायु कोष को पक्षकार विकासशील देशों में परियोजनाओं, कार्यक्रमों, नीतियों व अन्य गतिविधियों के समर्थन के लिए यूएनएफसीसीसी के कान्फ्रेन्स ऑफ पार्टीज के तहत् जिम्मेदार बनाया गया। डरबन प्लेटफार्म ने इस बात की पुष्टि की कि यूएन अभिसमय के तहत् हरित जलवायु कोष वित्तीय तंत्र की प्रचालक इकाई होगी।

दोहा गेटवे और हरित जलवायु कोष- वर्ष 2012 में कतर की राजधानी दोहा में आयोजित कोप-18 में दीर्घकालिक जलवायु वित्तीयन के मुद्दे पर विचार विमर्श हुआ। विकसित देशों ने इस बात के प्रति अपनी वचनबद्धता पुनः व्यक्त की कि वे 2020 तक एडैप्टेशन व मीटीगेशन के मुद्दों के प्रबंधन हेतु विकासशील देशों को 100 बिलियन डॉलर की सहायता प्रदान करेगें। सम्मेलन में कहा गया कि 2013 व 2015 में हरित जलवायु कोष के तहत् प्रदान की जाने वाली राशि 2010-12 के लिए निर्धारित राशि (30 बिलियन डॉलर) के बराबर होनी चाहिए।

वारसा सम्मेलन, 2013- पोलैण्ड की राजधानी वारसा में कोप-19 का आयोजन किया गया जिसमें जलवायु वित्तीयन का मुद्दा प्रमुखता से उभर कर सामने आया। सम्मेलन में 2020 तक 100 बिलियन डॉलर खर्च करने की वचनबद्धता पुनः दुहरायी गयी। यह निर्णय किया गया कि वर्ष 2014-20 के लिए प्रत्येक 2 वर्ष में दीर्घकालिक वित्तीयन (Long-term Finance) के लिए मंत्रिस्तरीय बैठक का आयोजन किया जायेगा। सम्मेलन में इस बात की भी घोषणा हुई कि हरित जलवायु कोष व्यवसाय के लिए खोल दिया गया है और यह 2014 के मध्य से अपनी शुरुआती संसाधन गतिशीलता प्रक्रिया को प्रारंभ करेगा। वारसा सम्मेलन में विकसित देशों ने 2016 तक 70 बिलियन डॉलर देने का लक्ष्य तय किया जिसे विकासशील देशों ने अस्वीकार कर दिया।

वारसा इंटरनेशनल मैकेनिज्म फॉर लॉस एण्ड डैमेज’ के गठन का महत्त्वपूर्ण निर्णय इस सम्मेलन में किया गया। इसका उद्देश्य जलवायु परिवर्तन की दृष्टि से सर्वाधिक सुभेद्य (Vulnerable) देशों, विकासशील देशों और लघु द्वीपीय देशों को गंभीर जलवायविक दशाओं जैसे बाढ़, सूखा, चक्रवात, समुद्री जल स्तर में वृद्धि से सुरक्षा प्रदान करना है। उल्लेखनीय है कि प्राकृतिक आपदाओं से होने वाला नुकसान एक दशक पहले प्रति वर्ष 200 बिलियन डॉलर से बढ़कर वर्तमान समय में 300-400 बिलियन डॉलर प्रति वर्ष हो गया है। सम्मेलन में अमेरिका, नार्वे व यूनाइटेड किंगडम द्वारा वारसा फ्रेमवर्क फॉर REDD+ के लिए 280 मिलियन डॉलर के वित्तीयन की घोषणा की गयी।



संयुक्त राष्ट्र जलवायु शिखर सम्मेलन, 2014 और जलवायु वित्तीयन का मुद्दा- वर्ष 2014 के संयुक्त राष्ट्र जलवायु शिखर सम्मेलन का आयोजन न्यूयार्क में हुआ। 23 सितंबर को संपन्न इस सम्मेलन में जलवायु वित्तीयन की दिशा में कुछ महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आये जो निम्नवत् हैं-

  • वैश्विक तापमान को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने के लक्ष्य पर ध्यान देकर इस सम्मेलन में सरकारों, व्यवसाय, बहुपक्षीय विकास बैकों, सिविल सोसाइटी नेताओं के नये संघ ने लो-कार्बन और जलवायु-सह्य विकास (Climate-resilient Development) की दिशा में 200 बिलियन डॉलर की व्यवस्था करने की घोषणा की। 2020 तक 100 बिलियन डॉलर प्रदान करने में अपेक्षित सहयोग की भी राष्ट्रों ने घोषणा की। सम्मेलन में कहा गया कि हरित विकास कोष की प्रारंभिक पूंजी 10 बिलियन डॉलर से कम नहीं होगी। अभी तक 6 देशों द्वारा इस कोष की प्रारंभिक पूंजीधारिता में कुल 2.3 बिलियन डॉलर का योगदान करने का वचन दिया गया है। 6 अन्य देश नवंबर 2014 तक अपनी भूमिकाओं का आवंटन करने के लिए वचनबद्ध हैं।

  • यूरोपीय संघ ने वर्ष 2014 से 2020 के मध्य विकासशील देशों में मिटीगेशन उपायों के लिए 3 बिलियन डॉलर देने का वायदा किया है।

  • इंटरनेशनल डेवलपमेंट फिनान्स क्लब (IDFC) ने सम्मेलन में घोषणा की कि वह 2015 के अंत तक नयी जलवायु वित्तीयन गतिविधियों के लिए 100 बिलियन डॉलर के जलवायु वित्तीयन के लिए सुदृढ़ मार्ग पर है।

  • प्रमुख वाणिज्यिक बैंकों ने घोषणा की कि 2015 तक उनकी 30 बिलियन डॉलर मूल्य वाले ग्रीन बांड जारी करने की मंशा है और 2020 तक इसमें 10 गुना वृद्धि की जायेगी।

  • बीमा उद्योग ने वर्ष 2015 के अंत तक अपने हरित निवेश को दुगुना करने (84 बिलियन डॉलर) पर बल दिया।

  • बीमा उद्योग के प्रतिनिधियों ने सम्मेलन में 2015 तक एक क्लाइमेट रिस्क इनवेस्टमेन्ट फ्रेमवर्क निर्मित करने का आह्वान किया।


इस प्रकार इस सम्मेलन में जलवायु वित्तीयन के विविध आयामों पर सकारात्मक कार्यवाही करने की मंशा व्यक्त की गयी है, लेकिन विकसित व विकासशील देशों में एक सुस्पष्ट सांझी समझ का विकसित होना किसी भी सफलता की प्राप्ति के लिए आवश्यक है। समस्या की पहचान, आंकलन, बेहतर समन्वयन व प्रबंधन आदि से जुड़ी चुनौतियों की निगरानी आवश्यक है। विचारणीय है कि वर्ष 2007 में जलवायु वित्तीयन समीक्षा रिपोर्ट में यूएनएफसीसीसी के तत्वावधान में स्पष्ट किया गया था कि जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों, अनुकूलन व कटौती उपायों के लिए आवश्यक धनराशि व निवेश 2030 तक वैश्विक सकल उत्पाद के 0.3 से 0.5 प्रतिशत के बराबर होगा जबकि वैश्विक निवेश के 1.1 से 1.7 प्रतिशत की आवश्यकता होगी। इस परिप्रेक्ष्य में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से जलवायु वित्तीयन पर एक सद्भावपूर्ण पहल किये जाने की अपेक्षा एक वैध मांग है।

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