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इस्लामिक स्टेट, मध्य पूर्व संकट और भारत (Islamic State, Middle East Crisis and India)

Posted By : Dr. Santosh Kumar Singh     Posted Date : Nov 07,14   Hits : 17350    



इस्लामिक स्टेट का पूरा नाम इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एण्ड सीरिया (Islamic State of Iraq and Syria: ISIS) है। इसे इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एण्ड लेवांत (Islamic State of Iraq and Levant: ISIL) भी कहा जाता है। लेवांत दक्षिणी तुर्की से लेकर मिस्र तक के क्षेत्र का पारंपरिक नाम है। आईएसआईएस ने अपने को संप्रभु राज्य के रूप में स्वघोषित किया है। पहले यह संगठन जमात अल तौहिद वाल-जिहाद के नाम से अलकायदा के सहयोगी संगठन के रूप में इराक में सक्रिय था। 2003 में इराक पर अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप के कारण यह निष्क्रिय था लेकिन सीरिया में जातीय संघर्ष बढ़ने के दौरान यह सबसे ज्यादा मजबूत हुआ। इस दौरान इस संगठन को विश्व भर से लाखों डॉलर की धनराशि प्राप्त हुई तथा हजारों की संख्या में नए लड़ाकू भर्ती हुए। यह एक आतंकवादी संगठन है जो अपने मिलिशिया सेना की बदौलत मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन कर रहा है। नागरिकों पर प्रत्यक्ष हमले करना, बुनियादी ढाँचे को नष्ट करना, नागरिकों की हत्या करना, फिरौती, अपहरण, बलात्कार, महिलाओं एवं बच्चों के विरुद्ध अन्य प्रकार लैंगिक एवं शारीरिक हिंसा करना, बच्चों को बलपूर्वक भर्ती करना तथा धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व के अन्य महत्त्वपूर्ण स्थलों को अपवित्र एवं नष्ट करना इसके दैनिक कार्यों में शामिल है। पश्चिमी देशों के नागरिकों विशेषकर पत्रकारों का सर कलम करना, अंधाधुंध बर्बादी एवं लूट, बंधक बनाए गए महिलाओं एवं लड़कियों को सेक्स दास (Sex Slaves) के रूप में उपयोग करना इस संगठन के चर्चित कृत्य रहे हैं। यह संगठन अबू बकर अल-बगदादी जिसे अबू दुआ (Abu Dua) भी कहते हैं, के नेतृत्व में 2010 से इराक एवं सीरिया के एक बड़े भू-भाग पर कब्जा करने में सफल रहा है। इस क्षेत्र पर संगठन ने खलीफा राज्य यानी शरिया पर आधारित शासन प्रणाली की स्थापना की घोषणा की है। कुछ मामलों में इसे अलकायदा से भी ज्यादा क्रूर, हिंसक, कट्टरपंथी एवं सांप्रदायिक माना जा रहा है। यह ज्यादात्तर कुर्दों, याजिदी, तुर्कों, शिया मुसलमानों एवं ईसाईयों की हत्या कर रहा है। अपने अधिकार क्षेत्रों में यह व्यवस्था स्थापित करता है तथा इस्लामिक कानून का उल्लंघन करने वालों को कठोर दंड देता है। यह मध्यपूर्व के क्षेत्रों में ‘सुन्नी गर्व’ की भावना जगाने का प्रयास कर रहा है।

इस्लामिक स्टेट का वित्तीय स्रोत
(Financial Sources of Islamic State)


इस्लामिक स्टेट माफियाओं की तरह वाणिज्यिक उद्यमों का संचालन करता है। इसे विश्व एवं विशेषकर खाड़ी के देशों से भारी मात्रा में दान प्राप्त होता है। यह सैन्य गतिविधियों के वाणिज्यीकरण का कोई भी अवसर नहीं छोड़ता है। 2012 में इसने सीरिया के तेल क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया तथा तेल बेचकर अपनी वित्तीय स्थिति सुदृढ़ की। अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों में मौजूद प्राकृतिक संसाधनों, खनिज पदार्थों एवं अन्य मूल्यवान चीजों का भी यह व्यापार कर रहा है। यह बैंकों एवं संपत्तियों को लूटने का भी कार्य करता है। वित्तीय नेटवर्क तथा धनवान संरक्षकों पर निर्भर रहने के अन्य आतंकवादी समूहों के विपरीत यह संगठन आत्मनिर्भरता पर बल देता है। राजस्व सृजन के लिए यह कर एवं शुल्क भी अधिरोपित करता है। यह इन संसाधनों का प्रयोग स्थानीय समूहों एवं जनजातियों की निष्ठा एवं समर्थन प्राप्त करने के लिए करता है।

इस्लामिक स्टेट-सुन्नी सहयोग
(Islamic State-Sunni Collaboration)


विश्लेषकों का अनुमान है कि इस संगठन के पास 30-32 हजार लड़ाके हैं जो सीरिया और इराक में लड़ रहे हैं। इराक के मलिकी सरकार से नाराजगी ने धर्मनिरपेक्ष एवं धार्मिक सुन्नी समूहों को एक कर दिया। इस्लामिक स्टेट की पहुँच इराक के सरकारी मंत्रालयों तक है। सद्दाम हुसैन की बाथ पार्टी (Baath Party) तथा सुन्नियों के अन्य छोटे-छोटे आतंकवादी समूहों से इसे समर्थन मिलता रहा है। 2005 में स्थानीय जनजातियों ने अमेरिका की वित्तीय सहायता से सुन्नी जनजागरूकता आंदोलन (Sunni Awakening Movement) चलाया था। ये अपने को इराकी पुत्र (Sons of Iraq) कहते थे। इन्होंने अलकायदा एवं अतिवादी समूहों को नियंत्रित कर जातीय एवं सांप्रदायिक हिंसा रोकने तथा शांति स्थापित करने का प्रयास किया था। इनके इस प्रयास में कुछ सफलता भी मिली थी। इनके बदौलत 2007-08 में सांप्रदायिक हिंसा में 90 प्रतिशत तक गिरावट आई थी लेकिन इराक से अमेरिकी सेना के वापस जाने के बाद सब कुछ बदल गया। नूरी अल-मलिकी ने इराकी सरकार में जनजातियों को भागीदारी देने से इंकार कर दिया। सरकार द्वारा किनारा किए जाने से सुन्नी उपेक्षित तथा वंचित महसूस करने लगे। जबकि शिया और कुर्द क्रमशः बगदाद सहित दक्षिण तथा उत्तर के क्षेत्रों पर नियंत्रण किए हुए थे। वंचना एवं उपेक्षा से त्रस्त आकर सुन्नियों ने अंबार प्रांत की राजधानी रामादी के बाहर एक महीने तक धरना-प्रदर्शन भी किया था। इस धरना-प्रदर्शन के दौरान सुन्नियों ने शिया सरकार की ज्यादतियों तथा अपने साथ दोयम दर्जे की नागरिकता वाली बर्ताव जैसी शिकायतें की थी। लेकिन इस धरना-प्रदर्शन के विरुद्ध सरकार द्वारा कड़ी कार्रवाई किए जाने के बाद सुन्नियों तथा इस्लामिक स्टेट के बीच सहयोग अवश्यंभावी हो गया। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि सुन्नी सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाए जाने तथा उन्हें फांसी दिए जाने से नाराज चल रहे थे। सद्दाम हुसैन की सत्ता के दौरान सुन्नियों को आर्थिक-राजनीतिक रूप से काफी साधन संपन्न होने का मौका मिला था। बहरहाल इस्लामिक स्टेट तथा सुन्नी गठबंधन ने फालूजाह, रामादी, इराक के सबसे बड़े प्रांत अनबार तथा मोसुल को अपने नियंत्रण में कर लिया। उन्होंने सीरिया एवं इराक के बड़े क्षेत्र पर नियंत्रण कर लिया है और उनकी मंशा ग्रेटर सीरिया या लेवांत की स्थापना करना है जिसमें इराक एवं सीरिया के अलावा अन्य पड़ोसी देशों के क्षेत्र भी आते हैं। फिलहाल यह संगठन इराक एवं सीरिया में ही अपनी पकड़ बनाने का प्रयास कर रहा है। हमें यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि सुन्नी जनजातियों एवं बाथ पार्टी के बीच सहयोग विचारधारात्मक न होकर एक समान हित मलिकी सरकार को सत्ता से हटाना एवं शिया प्रभुत्व को समाप्त करने से प्रेरित है। इसी समान हित के कारण इराकी सेना के सुन्नी फौजियों ने सरकार का आदेश मानने से इंकार कर दिया। उन्होंने बड़ी आसानी से अपने तैनाती स्थलों (Posts) को छोड़ दिया। इससे इस्लामिक स्टेट के जिहादियों को बिना कोई बड़ा संघर्ष किए ही आगे बढ़ने का मौका मिलता चला गया। इराक एवं सीरिया शासन के विरुद्ध इनकी बढ़ती सफलता से विदेशी दानदाताओं को प्रोत्साहन मिला और उन्होंने भारी मात्रा में धन इस संगठन को उपलब्ध कराए जिससे इस संगठन की वित्तीय स्थिति भी लगातार सुदृढ़ होती गई।

मध्य-पूर्व समीकरण और अमेरिका
(Middle-East Equation and America)


मध्य-पूर्व जिसे भारत में पश्चिम एशिया (West Asia) कहा जाता है, में 30 जून 2014 को अबू-बकर अल बगदादी द्वारा इस्लामी राज्य की स्थापना तथा 90 वर्ष पूर्व भंग किए गए इस्लामी खलीफा संस्था की पुनर्स्थापना की घोषणा कर दी गई है। इराकी सेना इस्लामिक स्टेट को पीछे धकेलने में अब तक अक्षम सिद्ध हुई है। अमेरिका ने हाल ही में कुर्द सेना को शस्त्र उपलब्ध कराने की घोषणा की है। वह उत्तरी इनक्लेव से इस्लामिक स्टेट को पीछे धकेलने की स्थिति में है लेकिन वह अकेला ऐसा कर नहीं पाएगी तथा इराक के सुन्नी क्षेत्रों में तैनात किए जाने के प्रति अनिच्छुक है। यही सैन्य एवं राजनीतिक सीमाएँ सीरिया के मामले में भी सही है। सीरिया के पश्चिम क्षेत्रों में राष्ट्रपति बसर अल-असद की हाल की बढ़त के बावजूद सीरिया के मध्य एवं पूर्व के इलाकों, जहाँ सीरिया सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा है, में सैन्य संचालन की क्षमता सीमित है तथा ऐसा करने के प्रति अनिच्छा भी है। जेनेवा शांति समझौते के दौरान सीरियाई राष्ट्रपति बसर अल-असद के कड़े रुख तथा जून-2013 में उनके पुननिर्वाचन से यह लगभग असंभव है कि वे सुधारवादी सुन्नियों को अपने पक्ष में लेंगे। कुछ विश्लेषकों का यह भी मानना है कि इस्लामिक स्टेट की समस्या से निपटने की जिम्मेदारी ईरान को मिलनी चाहिए। इसके बदले अमेरिका द्वारा ईरान के परमाणु कार्यक्रम संबंधी समझौते में रियायत मिलनी चाहिए लेकिन ऐसी संभावना भी नहीं दिख रही है। ऐसा समझौता होने के बावजूद भी तकनीकी एवं राजनीतिक कारणों से ईरान का परमाणु मुद्दा तथा क्षेत्रीय आकांक्षाएँ जीवित रहेंगी। अरब देश के सुन्नी समूहों ने कुछ हद तक जिहादियों को आर्थिक एवं मानवीय संसाधन उपलब्ध कराए हैं। इन देशों के बीच उद्देश्य या लक्ष्य की स्पष्टता न होने के कारण इराकी एवं सीरियाई सुन्नियों के बीच विभाजन गहरा हुआ है। सीरिया के पड़ोसी भी इस्लामिक स्टेट को समाप्त करने की स्थिति में नहीं हैं इसलिए वे केवल उसे रोकने को वरीयता दे रहे हैं। इस मामले में जार्डन अब तक सबसे ज्यादा सफल रहा है जिसने लड़ाई की शुरुआत से ही सीरिया से लगती अपनी सीमा पर सेना तैनात कर दी है और अमेरिका से मिलकर गुप्त रूप से सीरियाई विद्रोहियों की मदद कर रहा है। हालाँकि लगभग 10 लाख सीरियाई शरणार्थी जार्डन की कैम्पों में रह रहे हैं लेकिन असद सरकार या सुन्नी अतिवादियों की ओर से संभावित आतंकवादी घटनाओं के डर से जार्डन अब तक अमेरिका द्वारा प्रस्तावित, सीरियाई विपक्ष को खुलकर सैन्य यंत्र एवं प्रशिक्षण उपलब्ध कराने संबंधी कार्यक्रम से दूर भागता रहा है। तुर्की जिसकी सीरिया से लगी सबसे लम्बी तथा खुली सीमा है, ने अभी केवल कुछ दिनों पहले से ही अपनी धरती से सीरिया में कार्य करने वाले जिहादी समूहों पर कार्रवाई करनी शुरू की है। जार्डन की तरह तुर्की भी अपनी भूमि पर आतंकवादी हमले के डर से सीरिया में हस्तक्षेप नहीं करना चाहता है। वह अपने ऐतिहासिक प्रतिद्वन्दी कुर्दों को ही इस्लामिक स्टेट को रोकने का सबसे अच्छा साधन समझता है। आंतरिक विभाजन एवं अक्षमता के कारण लेबनान और इराक हिजबुल्लाह (Hezbollah) जैसे गैर-राज्यकर्ताओं के अलावा अन्य माध्यम से सीरिया में हस्तक्षेप करने में सक्षम नहीं हैं। हिजबुल्लाह लेबनानी सरकार के साथ मिलकर सीरिया घटनाक्रम के प्रभावों को कम करने के लिए समन्वित प्रयास करता रहा है। इजरायल ने भी विभिन्न समूहों को अप्रत्यक्ष सहायता तथा घायलों का इलाज करने के अलावा सीरिया से बाहर रहने को ही प्राथमिकता दी है।

इस्लामिक स्टेट की सफलता के संभावित प्रभाव
(Possible Repercussions of Islamic State Success)


इस्लामिक स्टेट यदि इसी तरह आगे बढ़ता रहा तो न केवल साइक्स-पिकॉट (Sykes-Picot) सीमाओं का पुनर्निधारण होगा बल्कि इस्लामिक स्टेट के जिहादी तत्व मध्य-पूर्व के सुन्नियों के आधिकारिक आवाज (Authoritative Voice) भी बन जाएंगे। उसने पहले ही कहा है कि 1916 के जिस साइक्स-पिकॉट समझौते से उपनिवेशी शासकों ने मध्य-पूर्व में इस्लामी खलीफा को बाँटकर वर्तमान राज्य व्यवस्था की उत्पत्ति की थी उसे बदल दिया जाएगा। जिहादी तत्वों के निरंतर सफलता से अरब राजतंत्रों विशेषकर सऊदी अरब को भी खतरा है। सऊदी अरब पवित्र स्थानों के संरक्षक के रूप में 1924 में ऑटोमन खलीफा की समाप्ति के बाद से इस्लामी मामलों में सर्वोच्च राजनीतिक भूमिका निभाता रहा है। यदि सीरिया एवं इराक द्वारा इस्लामिक स्टेट को हरा भी दिया जाता है तो खाड़ी के राजतंत्रों के विरुद्ध घरेलू विद्रोह के खतरे बने रहेंगे। फिलहाल इस्लामिक स्टेट ने सऊदी अरब तथा जार्डन से लगी सीमा की ओर अपने लड़ाकों को भेजा है तथा सीरिया से लगती सीमा पर लेबनानी सेना पर भी सफलतापूर्वक हमले किए हैं। इस्लामिक स्टेट एवं इससे जुड़े संगठन विश्व के कई देशों में हमले की योजना बना रहे हैं। जिस तरीके से चीन, काकेशस (Caucasus), लीबिया, मिस्र, दक्षिण या दक्षिण-पूर्व एशिया या अन्य क्षेत्रों से इस्लामिक स्टेट को समर्थन मिल रहा है, उससे वह विश्व समुदाय के लिए अगला अफगानिस्तान या पाकिस्तान का जनजातीय इलाका (Federally Administred Tribal Area: FATA) साबित हो सकता है। कुछ दिनों पहले तक इस्लामिक स्टेट से निपटने के लिए जिस मुखर एवं ठोस अमेरिकी नीति की आवश्यकता थी उसका पूर्णतया अभाव दिख रहा था। 

हाल के दिनों में अमेरिका ने इस आतंकवादी संगठन को बदनाम एवं समाप्त करने के लिए राजनीतिक एवं सैन्य संचालन प्रारंभ किया है लेकिन ईरान एवं सीरिया संबंधी उसकी पहले की विदेश नीति, उसकी राह में रोड़ा बने हुए है। जिसकी वजह से इस्लामिक स्टेट से निपटने के लिए जिस ठोस गठबंधन एवं जमीनी सैन्य संचालन की आवश्यकता है वह संभव नहीं हो पा रहा है। इस्लामिक स्टेट की समस्या से तब तक निजात नहीं पाया जा सकता है जब तक कि सुन्नियों की आकांक्षाओं को ध्यान में नहीं रखा जाएगा। ईरान एवं अरब देशों की भूराजनीतिक समीकरण (Geopolitical Equilibrium) को भी ध्यान में रखना होगा। अमेरिका को ईरान तथा खाड़ी के अपने सहयोगियों के साथ मिलकर तनाव खत्म करना होगा तथा सीरिया एवं इराक के सुन्नियों पर होने वाले बर्बरता को रोकने के साथ उन्हें सुधारवादी दिशा की ओर मोड़ना होगा। यह एक कठिन कार्य होगा क्योंकि विश्व भर के सुन्नियों में एक सामान्य बात घर कर गई है कि अमेरिका ने 9/11 आतंकवादी घटना के बाद सुन्नी देशों के विरुद्ध युद्ध छेड़ रखा है। सऊदी अरब अमेरिका के इराक मामलों में शामिल होने को लेकर चिंतित है। सऊदी अरब को यह समझाने की जरूरत है कि अमेरिका सीरिया एवं इराक के गैर-जिहादी सुन्नियों को सैन्य एवं राजनीतिक समर्थन देगा। फिलहाल सीरिया एवं इराक के सुन्नी यह समझते हैं कि इस्लामिक स्टेट के विरुद्ध कार्य करने से उनके तथा उनके परिवार के जीवन को खतरा है। सौभाग्यवश इस्लामिक स्टेट नियंत्रित क्षेत्रों के जनजातियों से खाड़ी देशों के दीर्घकालिक संबंध रहे हैं। अमेरिका को अरब देशों के आसूचना एजेंसियों (Intelligence Agencies) के साथ मिलकर एक सक्षम सुधारवादी सुन्नी विकल्प तैयार करना होगा ताकि इस्लामिक स्टेट की हार की स्थिति में उत्पन्न खाली जगह (Vacuum) को भरा जा सके। इन प्रयासों से अमेरिका अत्यंत कमजोर एवं सांप्रदायिक रूप से विभाजित देशों को स्थिरता प्रदान कर सकेगा तथा खाड़ी देश सुधारवादी ताकतों को मजबूत बनाकर सुन्नी अतिवाद एवं आतंकवाद को नियंत्रित कर सकेंगे तथा इराक एवं सीरिया सरकार पर से ईरान के प्रभुत्व में कमी ला सकेंगे। उपरोक्त उपायों से विश्व के किसी भाग में बड़े आतंकवादी घटना की संभावना को कम किया जा सकेगा। फिलहाल इस्लामिक स्टेट की सफलता से इस क्षेत्र के सुन्नियों में यह विश्वास पैदा हुआ है कि वे प्रभुत्व वाली स्थिति में आ सकते हैं। ईरान में 1979 में शियाओं के नेतृत्व में इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद से क्षेत्र के सुन्नियों में उसकी बराबरी का सुन्नी क्रांति करने की प्रबल आकांक्षा रही है। उनके लिए इस्लामिक स्टेट आशा जगाता है।

भारत के लिए आर्थिक एवं भूराजनीतिक चुनौती
(The Economic and Geopolitical Challenges for India)


इस्लामिक स्टेट की समस्या शिया-सुन्नी विवाद से जुड़ी है। भारत में भी बड़ी संख्या में शिया, सुन्नी रहते हैं जिसके कारण स्वाभाविक रूप से भारत की चिंता बढ़ जाती है। पाकिस्तान, अफगानिस्तान से हजारों की संख्या में जबकि भारत में मुम्बई के कल्याण क्षेत्र से चार सुन्नी लड़ाकों के इस्लामिक स्टेट की मदद के लिए देश से बाहर जाने की खबरें मिली हैं। जम्मू-कश्मीर में भी इस्लामिक स्टेट के झण्डे फहराए गए हैं। भारत में शिया-सुन्नी विवाद अब तक कोई बड़ा विषय नहीं रहा है। लेकिन पूर्व-एशिया के वर्तमान शिया-सुन्नी विवाद से भारत सहित विश्व के अन्य भागों में रक्तपात एवं हिंसक घटनाएँ देखने को मिल सकती हैं। इराक के पवित्र स्थलों की रक्षा के लिए भारत से हजारों शियाओं के वहाँ जाने हेतु आवश्यक वीजा की मांग की जा रही है। इसे शिया-सुन्नी विवाद उभरने के संकेत के रूप में समझा जा सकता है। अब तक भारत पर प्रत्यक्ष रूप से पड़े प्रभावों में हरियाणा एवं पंजाब के मजदूरों के अलावा केरल के नर्सों का इस संकट में फँसना शामिल रहा है। इस समस्या ने थोड़ी देर के लिए ही सही भारत के समक्ष संकट की स्थिति पैदा कर दी थी।

मध्य-पूर्व में अस्थिरता से भारत के आर्थिक एवं ऊर्जा हितों पर भी प्रभाव पड़ने की आशंका है। इस क्षेत्र में लगभग 70 लाख भारतीय कार्य करते हैं। ये भारतीय प्रतिवर्ष लगभग 35-40 बिलियन डॉलर की धनराशि वापस देश भेजते हैं। इससे हमारी अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है। भारत इस क्षेत्र से बड़ी मात्रा में हाइड्रोकार्बन एवं कच्चे तेल का भी आयात करता है। मध्य-पूर्व की अस्थिरता से इनके मूल्यों पर प्रभाव पड़ सकता है। इसके अलावा भारतीय मुद्रा रुपया, विकास दर तथा सरकार के प्रस्तावित सुधार कार्यक्रमों पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। भारत में तेल मूल्यों में बढ़ोत्तरी से महँगाई एवं मुद्रास्फीति की समस्या बढ़ जाती है। गरीबों एवं आम लोगों के लिए आवश्यक कई वस्तुएँ एवं सेवाएँ महँगी हो जाती हैं लेकिन फिलहाल भारत के लिए चिंता की बात नहीं है। अब तक इराक से होने वाला तेल आयात प्रभावित नहीं हुआ है क्योंकि इराक के ज्यादात्तर तेल कुएँ शिया प्रभावी दक्षिण क्षेत्र में है जिसे इस्लामिक स्टेट अब तक अपने नियंत्रण में नहीं ले सका है। भारत ने अपनी तेल आयात को विविधता भी प्रदान की है जिसके अंतर्गत वह ओपेक के अन्य सदस्य देशों सऊदी अरब, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात तथा कतर से कच्चा तेल आयात करता है।

खलीफा राज्य की घोषणा करते समय नए खलीफा अबू बकर अल-बगदादी ने विश्व भर के जिहादियों को संबोधित करते हुए चीन, भारत, फिलीस्तीन, सोमालिया, अरब प्रायद्वीप, काकेशस, सीरिया, इराक, इंडोनेशिया, अफगानिस्तान, फिलीपींस, ईरान, पाकिस्तान, ट्यूनीशिया, लीबिया, मोरक्को तथा अल्जीरिया के मुसलमानों के अधिकार हनन की बात कही है। इस संबोधन में विशेष रूप से भारत को इस्लामिक स्टेट का प्राथमिक लक्ष्य बनाया गया है। इस्लामिक स्टेट की खुरासन (Khorasan) खलीफा राज्य की अवधारणा में गुजरात के कुछ हिस्सों को शामिल किया गया है।

फिलहाल भारत को खतरा मध्य-पूर्व के जिहादियों से न होकर दक्षिण एशिया में सबसे ज्यादा सक्रिय लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकवादी संगठनों से है जिसकी विचारधारा इस्लामिक स्टेट की इस्लामी राज्य की स्थापना संबंधी विचारधारा से मेल खाती है। इस्लामिक स्टेट द्वारा विश्वभर के जिहादी संगठनों को उनसे जुड़ने संबंधी आह्वान भी भारत के लिए अच्छी खबर नहीं है। भारत को खतरा उन भारतीय जिहादियों से हो सकती है जो इस्लामिक स्टेट के साथ मिलकर लड़ रहे हैं या लड़ने की आकांक्षा रखते हैं। भारत के खिलाफ आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देने के लिए पाकिस्तान की खूफिया एजेंसी ऐसे आतंकवादी संगठनों की तलाश में रहती है। हाल ही में अलकायदा ने भारतीय उपमहाद्वीप में अपनी एक शाखा खोलने की घोषणा की ताकि इस क्षेत्र में आतंकवादी घटनाओं में बढ़ोत्तरी की जा सके सके। फिलहाल भारत में कोई बड़ा आतंकवादी संगठन नहीं है और यहाँ ज्यादात्तर आतंकवादी घटनाएँ बाहरी देशों से प्रायोजित होती हैं फिर भी भारत को आतंरिक सुरक्षा एवं विदेश नीति के मोर्चे पर तैयार रहना होगा। भारत को यह बात ध्यान में रखना होगा कि वह शिया-सुन्नी में से किसी एक पक्ष का समर्थन करता हुआ दिखाई न दे। साथ ही उसे समझना होगा कि पश्चिमी शक्तियों की क्रमशः अदूरदर्शी नीतियों के कारण मध्य-पूर्व के देशों और विशेषकर इराक को कई बार उथल-पुथल का सामना करना पड़ा है। ऐसा नहीं लगता मध्य-पूर्व की अस्थिरता बहुत जल्द समाप्त होने वाली है। इस कारण भारत को तेजी से बदलते घटनाक्रम से निपटने के लिए तैयार रहना होगा। फिलहाल भारतीय एजेंसियों ने मुस्लिम नेताओं से लोगों को साम्प्रदायिकता के विरुद्ध संवेदनशील बनाने का आग्रह किया है।

इराक में अपने अधीन क्षेत्रों का और विस्तार करने की इस्लामिक स्टेट की क्षमता सीमित है। इसी कारण इसके नेता विश्व भर के मुसलमानों से खलीफा राज्य का समर्थन तथा वर्तमान सरकारों के विरुद्ध विद्रोह की अपील कर रहे हैं। इस्लामिक स्टेट द्वारा घोषित खलीफा अबू बकर अल-बगदादी ने तो यहाँ तक कहा है कि वह केवल एक क्षेत्र को नियंत्रित नहीं करना चाहता बल्कि वह एक धर्म को नियंत्रित करना चाहता है। उसकी इस अभिलाषा में दक्षिण-एशिया उसे एक बड़ी संभावना दिखाई देती है। विश्व के 62 प्रतिशत मुसलमान दक्षिण एवं दक्षिण पूर्व एशिया में रहते हैं। प्रत्येक तीन में से एक मुसलमान दक्षिण एशिया में रहता है। इस्लामिक स्टेट की सांप्रदायिक प्रवृतियों को देखते हुए यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि वह दक्षिण एशिया विशेषकर पाकिस्तान, अफगानिस्तान सहित भारत को संभावित सुन्नी जिहाद वाले देश के रूप देख रहा हो। अभी तक वह ऑस्ट्रेलिया, यूरोपीय देशों के अलावा म्यांमार, थाइलैंड, फिलीपींस जैसे देशों से सुन्नी जिहादियों की भर्ती करने में सफल रहा है।

इस्लामिक स्टेट को नियंत्रित करने हेतु अंतर्राष्ट्रीय प्रयास
(International Effort to Contain Islamic State)


2010 से शुरू हुए मध्य-पूर्व संकट के कारण लगभग 2 लाख लोग मारे गए हैं, 30 लाख शरणार्थी हुए एवं लगभग 60 लाख लोग अपना घर छोड़ने को बाध्य हुए हैं। इसके बावजूद अमेरिका ने घोषणा की है कि वह हवाई बमबारी के माध्यम से शिया एवं कुर्दों को इस्लामिक स्टेट की बढ़त रोकने के लिए मदद करेगा लेकिन वह अपनी सेनाओं को जमीन पर तब तक नहीं उतारेगा जब तक कि वहाँ विभिन्न विरोधी धड़ों के बीच राजनीतिक समझौता के लिए रूपरेखा तैयार नहीं होती है। यूरोप के कुछ अन्य देशों ने किसी न किसी प्रकार की सैन्य सहायता देने हेतु सहमति दी है लेकिन एक सैन्य गठबंधन के रूप में नाटो इस मामले में फिलहाल शामिल होने नहीं जा रहा है। नाटो के कई सदस्य देश इराक, अफगानिस्तान या लीबिया जैसे देशों में हस्तक्षेप करने से डरे हुए हैं। अफगानिस्तान का पिछले 12-13 वर्षों का अनुभव उनके समक्ष है फिर भी ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी जैसे देश इस संकट में अमेरिका का साथ देने के लिए राजी हैं। तुर्की जैसे नाटो सदस्य पर ज्यादा सक्रियता से सैन्य भूमिका निभाने का दबाव है लेकिन सीरिया के राष्ट्रपति बसर अल-असद के विरुद्ध अविश्वास की भावना के कारण वह सक्रिय भूमिका नहीं निभा पा रहा है। सुरक्षा विश्लेषकों की नजर में केवल हवाई हमले से इस्लामिक स्टेट को रोकना एवं उन्हें खत्म करना काफी मुश्किल होगा। खाड़ी देश भी अमेरिका की मदद करने के लिए तैयार हैं लेकिन वे आंतरिक सुरक्षा तथा अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा को ध्यान में रखते हुए सहायता करने पर राजी हैं न कि सामूहिक एकता की भावना से ऐसा करने को राजी हुए हैं।

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