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गांधी के सपनों के भारत में सांसद आदर्श ग्राम योजना के तर्ज पर ‘विधायक आदर्श ग्राम योजना’ का शुभारंभ और इसके मायने

Posted By : Mr. Vivek Ojha     Posted Date : Apr 02,15   Hits : 7915    



पृष्ठभूमिः

आदर्श ग्रामों का विकास महात्मा गांधी के ग्रामीण विकास की संकल्पना ‘स्वराज’ को ‘सुराज’ (good governance) में बदलने की नीति पर आधारित है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि ग्रामीण भारत का विकास भारत के धारणीय विकास के  लिए अत्यंत आवश्यक है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कृषि सहित प्राथमिक क्षेत्र के विकास की आधारशिला गाँवों में ही रखी जाती है। लार्ड रिपन द्वारा 1882 में स्थानीय स्वशासन की शुरूआत से लेकर 73वें और 74वें संविधान संशोधन विधेयक (1992) को पारित करने तक गाँवों सहित स्थानीय स्वशासन की इकाईयों को भारतीय प्रगति का वाहक माना गया। गाँवों को विकेन्द्रीकरण, सहभागिता, लोकप्रिय संप्रभुता और देश के संतुलित विकास को गति देने वाला उपकरण माना गया। 6 लाख से अधिक गाँव भारत में ग्रामीण जन आकांक्षाओं को साकार करते हैं। इसके लिए उन्हें शक्ति, क्षमता व अधिकार भारतीय संविधान की ग्यारहवीं अनुसूची से प्राप्त होती है जिसमें 29 विषयों पर विधायन का अधिकार ग्राम पंचायतों को दिया गया है। यहाँ यह विचारणीय है कि भारत के लाखों गाँव जो भारतीय उद्योगों व अर्थव्यवस्था को मंदी के झटकों से बचाते हैं, अपने विकास, प्रगति और पहचान के लिए आज भी जूझ रहे हैं। उनके पास संसाधन सृजन के अतिरिक्त साधन नहीं है, उनकी आय के स्त्रोत सीमित है और वे राष्ट्रीय विकास की मुख्य धारा से नहीं जुड़ पाये हैं। ऐसे में ग्रामीण भारत का रूपांतरण करना केन्द्र व राज्य सरकारों की सामूहिक जिम्मेदारी है। गाँवों की तकदीर केन्द्र और राज्य दोनों के प्रयासों के बाद ही बदलेगी। इसी क्रम में 11 अक्टूबर 2014 को केन्द्र सरकार द्वारा ‘सांसद आदर्श ग्राम योजना’ का शुभारंभ किया गया। इस योजना की सबसे विशिष्ट और फलदायी बात जिस पर कम ही चर्चा होती है, वह यह है कि इस योजना ने देश के सांसदों (विधि निर्माताओं) पर ग्रामीण विकास हेतु नैतिक दबाव और जिम्मेदारी डाल दी है क्योंकि योजना के तहत सांसदों को महात्मा गांधी के सपनों का भारत (ग्रामीण भारत) बनाना है। यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य बिन्दु है कि सांसदों को ही इस काम के लिए क्यों चुना गया, क्यों नहीं यह काम जिलाधिकारियों के प्रत्यक्ष क्षेत्रात्रिकार के तहत शामिल किया गया। यद्यपि इस योजना के क्रियान्वयन हेतु नोडल अधिकारी जिला कलेक्टर को बनाया गया है लेकिन सांसदों की भूमिका इस कार्य में कहीं अधिक है। देश के लगभग 800 सांसदों द्वारा यदि 3 गाँवों के पुनरूद्धार का कार्य किया जाता है तो 2019 तक 2400 गाँवों का कायाकल्प किया जा सकता है।



सांसद आदर्श ग्राम योजना के तर्ज पर ही नवंबर, 2014 में गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल ने ‘विधायक आदर्श ग्राम योजना (MLA Adarsh Gram Yojana)’ का शुभारंभ किया। मुख्यमंत्री ने स्वयं अहमदाबाद जिले के लीलापुर गाँव को गोद लेते हुए इस योजना की शुरूआत की। उन्होंने गुजरात के 182 विधायकों से कहा कि वे अपने निर्वाचन क्षेत्र में एक गाँव को गोद लें और उसके विकास के लिए कार्य करें। इसके अलावा गुजरात की मुख्यमंत्री ने लोगों से कहा कि वे 5 वृक्ष लगायें और गाँवों में कन्या के जन्म की खुशी मनायें। गाँवों में साफ-सफाई रखने और ग्रामीण सड़कों को गंदा न करने का आहवान भी उन्होंने गुजरात के नागरिकों से किया। इस प्रकार एक साथ विधायकों और जनता दोनों पर ही गाँवों के विकास में अहम भूमिका निभाने की नैतिक जिम्मेदारी डाली गयी है।

उल्लेखनीय है कि गुजरात के अलावा हरियाणा ऐसा राज्य है जहाँ ‘विधायक आदर्श ग्राम योजना’ और ‘अधिकारी आदर्श ग्राम योजना’ शुरू की जा रही है। सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत हरियाणा के सभी 15 सांसदों ने गाँवों को गोद लिया है। देश के विधायकों व जिलाधिकारियों द्वारा आदर्श ग्राम बनाने के कार्य में लगने से सांसद आदर्श ग्राम योजना को एक बड़ी सफलता मिल जायेगी। ये विकसित गाँव भारत के विकास की धुरी बनेंगे। यहाँ अवसंरचना के विकास, पर्यटन की दृष्टि से आये देशी-विदेशी नागरिकों के ठहरने के इंतजाम, स्वच्छता पर जोर दिये जाने से गाँव स्वावलंबी बनेंगे। ग्रामीण इकाईयों को भी उचित तरीके से कार्य करने की प्रेरणा मिलेगी। गाँवों में भ्रष्टाचार (मनरेगा मजदूरी से संबंधित) पर अंकुश लगेगा। अंर्तग्रामीण और अंतराग्रामीण विषमताओं (Interrural and intrarural disparities) को समाप्त किया जाना आसान होगा। गाँवों के समुचित विकास से वहाँ रोजगार का सृजन होगा जिससे प्रवासन (migration) की समस्या से काफी हद तक निजात मिलेगी। इन विविध स्तरों पर संचालित किये जाने वाले आदर्श ग्राम योजनाओं से ग्रामीण विकास के लिए आबंटित धन अथवा ‘लोक उपयोगिता वित्त’ (public utility finance) का समुचित, निष्पक्ष व उद्देश्यमूलक उपयोग सुनिश्चित हो पायेगा। उल्लेखनीय है कि सांसद आदर्श ग्राम योजना के दिशा-निर्देश में कहा गया है कि नामित संसद सदस्य देश के किसी जिले के ग्रामीण क्षेत्र की ग्राम पंचायत का चयन करेंगे। शहरी निर्वाचन क्षेत्र के ऐसे संसद सदस्य जिनके निर्वाचन क्षेत्र में ग्रामीण क्षेत्र नही है, अपने आस-पास के ग्रामीण निर्वाचन क्षेत्र की किसी ग्राम पंचायत का चयन करेंगे। योजना की एक महत्त्वपूर्ण खासियत यह है कि कोई भी सांसद अपने या अपने पत्नी के गाँव का चयन नहीं कर सकता। 

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत ‘जयापुर’ गाँव को गोद लिया है जो कि वाराणसी के सेवापुरी विधान सभा क्षेत्र में स्थित है। सांसदों के तर्ज पर ही विधायकों द्वारा बिना किसी पूर्वाग्रह और भेदभाव के गाँवों को गोद लेने से एक स्वस्थ परंपरा को विकसित होने में मदद मिलेगी। वे क्षेत्रीयता, जातीयता, भाई-भतीजावाद की भावना से कुछ हद तक बाहर आ सकेंगे। वस्तुतः सुशासन और विकास ही वो सबसे बड़े हथियार है जो आज विधायकों व सांसदों को उचित कार्यप्रणाली, कार्य संस्कृति (work culture) कार्य नैतिकता (work ethics) से जुड़ने के लिए बाध्य कर सकते हैं। इस मामले में सूचना का अधिकार और मतदाताओं के सशक्तीकरण के प्रयास ऐसे बारूद रहे हैं जिन्होंने आपराधिक पृष्ठभूमि वाले सांसदों, विधायकों नेताओं को पारदर्शिता और जवाबदेहिता की भाषा बोलना काफी हद तक सिखा दिया है। विधायकों व सांसदों को भी समझ में आ गया है कि विकास और विकास के लिए कार्य करना ही सबसे प्राथमिक कार्य है। आशा है कि राष्ट्र व राज्य स्तरों पर इन विधि निर्माताओं में ऐसी बेहतर समझ विकसित कर राजनीतिक संस्कृति को स्वस्थ रूप देने में सांसद आदर्श ग्राम, विधायक आदर्श ग्राम और अधिकारी आदर्श ग्राम जैसी योजनाएँ महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा पायेंगी।

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