डेली न्यूज़ (21 Jan, 2026)



भारत-संयुक्त अरब अमीरात संबंधों की भागीदारी

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

चर्चा में क्यों?

संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के राष्ट्रपति ने क्षेत्रीय उथल‑पुथल के बीच भारत की आधिकारिक यात्रा की, जिसके दौरान दोनों देशों ने रक्षा, अंतरिक्ष सहयोग तथा LNG सहित व्यापक द्विपक्षीय समझौतों और परिणामों पर सहमति व्यक्त की।

संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति द्वारा भारत की यात्रा के मुख्य बिंदु क्या हैं?

  • व्यापार लक्ष्य: CEPA, 2022 के आधार पर वित्तवर्ष 2024-25 में द्विपक्षीय व्यापार 100 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया; नेताओं ने वर्ष 2032 तक द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करके 200 अरब अमेरिकी डॉलर करने का लक्ष्य निर्धारित किया।
  • आर्थिक और निवेश संबंधी पहल: इसके अंतर्गत अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि वे लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) को जोड़ें और भारत मार्ट, वर्चुअल ट्रेड कॉरिडोर तथा भारत-आफ्रीका सेतु पहल को तीव्र गति से लागू करें।
    • भारत ने UAE के सॉवरेन वेल्थ फंड्स को राष्ट्रीय निवेश और अवसंरचना कोष (NIIF) में भाग लेने के लिये आमंत्रित किया।
    • दोनों पक्षों ने गुजरात के धोलेरा विशेष निवेश क्षेत्र में UAE की साझेदारी के लिये चर्चा का स्वागत किया, जिसमें एक हवाई अड्डा, बंदरगाह, टाउनशिप और MRO (मरम्मत, रखरखाव और संचालन) सुविधा जैसी अवसंरचना का विज़न शामिल है।
  • ऊर्जा और परमाणु सहयोग: 10-वर्षीय LNG आपूर्ति समझौते पर हस्ताक्षर किये गए (वर्ष 2028 से प्रारंभ)। भारत के शांति अधिनियम, 2025 के अनुसार, स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) सहित उन्नत परमाणु प्रौद्योगिकियों में साझेदारी तलाशने पर सहमति हुई।
  • प्रौद्योगिकी और नवाचार: सुपरकंप्यूटिंग क्लस्टर और भारत में डेटा सेंटर तलाशने के साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और उभरती प्रौद्योगिकियों में सहयोग को गहरा करने पर सहमति हुई। आपसी संप्रभुता व्यवस्थाओं के तहत 'डेटा एंबैसी' स्थापित करने की संभावना तलाशने के लिये टीमों को निर्देशित किया गया।
  • आतंक-रोधी: सीमा-पार आतंकवाद सहित आतंकवाद के सभी रूपों की स्पष्ट और दोटूक निंदा दोहराई गई तथा आतंक के वित्तपोषण के विरुद्ध FATF के अंतर्गत सहयोग जारी रखने पर सहमति व्यक्त की गई।
  • खाद्य सुरक्षा और संस्कृति: खाद्य सुरक्षा में सहयोग बढ़ाने की प्रतिबद्धता को पुष्ट किया और मैत्री के प्रतीक के रूप में अबू धाबी में 'हाउस ऑफ इंडिया' स्थापित करने का निर्णय लिया।
  • शिक्षा और संपर्क: विश्वविद्यालय संबंधों और छात्र विनिमय को बढ़ावा देने के लिये प्रोत्साहित किया गया; शैक्षणिक दस्तावेज़ प्रमाणीकरण के लिये भारत के डिजिलॉकर को UAE प्लेटफॉर्मों से एकीकृत करने के कार्य का स्वागत किया गया। सीमा-पार भुगतान के लिये नेशनल पेमेंट  प्लेटफॉर्मों को आपस में जोड़ने का लक्ष्य रखा गया।
  • रक्षा और सुरक्षा: रक्षा सहयोग को एक मूल स्तंभ के रूप में स्वीकार किया, हाल के सैन्य विनिमय और अभ्यासों (जैसे– जायद तलवार नौसैनिक अभ्यास) का स्वागत किया, साथ ही एक रणनीतिक रक्षा साझेदारी के लिये एक पत्राशय पर हस्ताक्षर किये गए।

डेटा एंबैसी 

  • परिचय: "डेटा एंबैसी" एक ऑफशोर डेटा सेंटर होता है जहाँ एक राष्ट्र अपना महत्त्वपूर्ण डिजिटल डेटा (जैसे– वित्तीय अभिलेख, सार्वजनिक डेटाबेस) संगृहीत करता है ताकि डिजिटल निरंतरता और संप्रभुता सुनिश्चित की जा सके। 
  • यह घरेलू व्यवधानों, जैसे– साइबर हमलों या प्राकृतिक आपदाओं के दौरान आवश्यक सेवाओं को बनाए रखने के लिये एक बैकअप के रूप में कार्य करता है। संयुक्त अरब अमीरात में भारत का डेटा एंबैसी देश का पहला डेटा एंबैसी होगा।
  • कानूनी स्थिति: यह राजनयिक सिद्धांतों के तहत कार्य करता है:
  • मेज़बान देश के कानून और अधिकार क्षेत्र फिजिकल फैसिलिटी (पारंपरिक एंबैसी की तरह) पर लागू होते हैं।
  • डेटा जिस देश का है, उसी को उस पर पूर्ण और विशिष्ट पहुँच, नियंत्रण तथा विधिक अधिकार क्षेत्र प्राप्त रहता है; यह डेटा अभेद्य होता है और स्थानीय तलाशी या ज़ब्ती की कार्रवाई से संरक्षित रहता है।
  • वैश्विक उदाहरण: वर्ष 2017 में एस्टोनिया ने लक्ज़मबर्ग में विश्व का पहला डेटा एंबैसी स्थापित किया। मोनाको ने इसका अनुसरण करते हुए वर्ष 2021 में लक्ज़मबर्ग में अपना डेटा एंबैसी स्थापित किया।

भारत-UAE बैठक के लिये प्रेरित करने वाला बदलता भू-राजनीतिक परिदृश्य

  • UAE-सऊदी तनाव: यमन (UAE समर्थित सदर्न ट्रांज़िशनल काउंसिल बनाम सऊदी समर्थित सरकार), सूडान और सोमालिया में खुले संघर्षों के बीच यह दौरा महत्त्वपूर्ण बन गया है, जो खाड़ी क्षेत्र में रणनीतिक मतभेद की दृढ़ता को उजागर करता है।
  • सऊदी-पाकिस्तान-तुर्की धुरी: सऊदी अरब ने पाकिस्तान के साथ रक्षा सहयोग को औपचारिक रूप दिया है, कुछ विश्लेषणों में तुर्की की संभावित भागीदारी का भी उल्लेख है, जबकि भारत UAE और इज़रायल के साथ मिनीलैटरल साझेदारी को I2U2, IMEC और व्यापक रणनीतिक संवाद के माध्यम से सुदृढ़ कर रहा है।
  • ईरान संकट: अमेरिका-ईरान संघर्ष के बढ़ते जोखिम ने भारत-UAE साझेदारी के रणनीतिक महत्त्व को और बढ़ा दिया है। यह साझेदारी भारत को ऊर्जा आयात में विविधता लाने और क्षेत्रीय संवाद के चैनलों को बनाए रखने में सहायता करती है, जिससे अस्थिर खाड़ी क्षेत्र पर निर्भरता कम होती है।
  • बोर्ड ऑफ पीस पहल: गाज़ा के लिये अमेरिका के नेतृत्व वाला बोर्ड ऑफ पीस ने भारत-UAE साझेदारी को नया महत्त्व दिया है, क्योंकि दोनों देशों को इसमें शामिल होने के लिये आमंत्रित किया गया है। उनकी भागीदारी संघर्षोत्तर गाज़ा के पुनर्निर्माण और शासन में समन्वित प्रभाव स्थापित करने में सहायक होगी।

भारत-UAE द्विपक्षीय संबंध कैसे हैं?

  • आर्थिक एवं वाणिज्यिक संबंध: द्विपक्षीय व्यापार 1970 के दशक में 180 मिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 2024-25 में 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया है, जिससे UAE भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार (अमेरिका और चीन के बाद) तथा दूसरा सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य बन गया है। भारत में UAE का निवेश 20-21 बिलियन अमेरिकी डॉलर है, साथ ही 75 बिलियन अमेरिकी डॉलर की अवसंरचना निवेश प्रतिबद्धता भी शामिल है।
  • ऊर्जा सुरक्षा: भारत के लिये कच्चे तेल के चौथे सबसे बड़े स्रोत तथा LNG और LPG के प्रमुख आपूर्तिकर्त्ता के रूप में UAE भारत की ऊर्जा सुरक्षा में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह इस तथ्य से भी स्पष्ट होता है कि पेट्रोलियम उत्पाद कुल द्विपक्षीय व्यापार का 41.4% हिस्सा रखते हैं, जिनका मूल्य वित्तवर्ष 2021-22 तक 35.10 बिलियन अमेरिकी डॉलर था।
  • वित्तीय एकीकरण: UAE में भारत के रुपे कार्ड और यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) की शुरुआत बढ़ते वित्तीय सहयोग को रेखांकित करती है। इसे वर्ष 2023 में स्थानीय मुद्रा निपटान प्रणाली (Local Currency Settlement- LCS) पर हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन (MoU) के माध्यम से औपचारिक रूप दिया गया, जिसका उद्देश्य सीमा-पार लेन-देन में भारतीय रुपये और AED (UAE दिरहम) के उपयोग को बढ़ावा देना है। यह व्यवस्था पहले ही सोना, कच्चा तेल और खाद्य उत्पादों के व्यापार में लागू की जा चुकी है।
  • रक्षा और सुरक्षा सहयोग: संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और भारत के बीच रक्षा सहयोग आतंकवाद- रोधी उपायों, खुफिया जानकारी साझा करने एवं संयुक्त सैन्य अभ्यासों, जैसे– अभ्यास डेज़र्ट साइक्लोन के माध्यम से सुदृढ़ हुआ है। इस अवधि में UAE की भारतीय रक्षा उत्पादों में बढ़ती रुचि भी देखने को मिली, जिनमें ब्रह्मोस मिसाइल, आकाश एयर डिफेंस सिस्टम और तेजस फाइटर जेट शामिल हैं।
  • सांस्कृतिक और जनता स्तर पर संपर्क: संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में भारतीय प्रवासी संख्या लगभग 35 लाख है (UAE की कुल जनसंख्या का लगभग 35%), जो भारत को भेजे जाने वाले प्रेषणों (Remittances) के माध्यम से महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं (भारत के कुल प्रेषण का 18%)। अबू धाबी में स्थित BAPS मंदिर UAE का पहला पारंपरिक हिंदू मंदिर है और यह दृढ़ सहयोग और संबंधों के विस्तार का प्रतीक है।
  • क्षेत्रीय स्थिरता: संयुक्त अरब अमीरात (UAE) का क्षेत्रीय स्थिरता में महत्त्व जो अब्राहम संधियों (Abraham Accords) में इसकी भूमिका और इज़रायल के साथ संबंधों के सामान्यीकरण से उजागर होता है, भारत के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि भारत गल्फ ऊर्जा पर अत्यधिक निर्भर है। यह रणनीतिक भूमिका I2U2 समूह और भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) जैसे बहुपक्षीय ढाँचों में भी परिलक्षित होती है।

UAE

भारत-UAE संबंधों में चुनौतियाँ क्या हैं?

  • क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विताएँ: भारत को यमन को लेकर सऊदी अरब और UAE के बीच तनाव में तीव्र वृद्धि का ध्यान रखना चाहिये। UAE सदर्न ट्रांज़िशनल काउंसिल का समर्थन करता है, जबकि सऊदी अरब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त प्रेसिडेंशियल लीडरशिप काउंसिल का समर्थन करता है।
    • भारत की कूटनीतिक रणनीति को मौजूदा ईरान-अरब तनाव के बीच ईरान के साथ अपने ऐतिहासिक संबंधों को संतुलित करते हुए UAE के साथ संबंधों का भी सावधानीपूर्वक प्रबंधन करना चाहिये।
  • रणनीतिक प्रतिस्पर्द्धा और बाहरी प्रभाव: चीन के साथ UAE के गहराते रणनीतिक और आर्थिक संबंध, जिनमें चीनी L-15 विमानों की खरीद जैसे रक्षा सहयोग के सौदे शामिल हैं, एक प्रत्यक्ष चुनौती उत्पन्न करते हैं। चीन की “चेकबुक कूटनीति” भारतीय पहलों की प्रभावशीलता को सीमित करती दिखाई देती है।
  • पाकिस्तान नीति को लेकर UAE पर चिंताएँ: पाकिस्तान को UAE द्वारा दी गई महत्त्वपूर्ण वित्तीय सहायता (जैसे– वर्ष 2019 में 3 अरब अमेरिकी डॉलर की प्रतिबद्धता) भारत की चिंताओं को बढ़ाती है, क्योंकि पाकिस्तान का भारत के विरुद्ध सीमा-पार आतंकवाद को प्रायोजित करने का इतिहास रहा है और धन के संभावित दुरुपयोग की आशंका बनी रहती है।
  • संरचनात्मक व्यापार बाधाएँ: CEPA के बावजूद व्यापार अब भी पारंपरिक क्षेत्रों (रत्न एवं आभूषण, पेट्रोलियम, स्मार्टफोन) तक सीमित है, जिससे विविधीकरण की कमी स्पष्ट होती है। साथ ही, अनिवार्य हलाल प्रमाणन, स्वच्छता एवं पादप-स्वास्थ्य (SPS) उपाय तथा तकनीकी व्यापार बाधाएँ (TBT) जैसी प्रमुख गैर-शुल्क बाधाएँ (NTBs) भारतीय निर्यात में अवरोध उत्पन्न करती हैं।
  • आगामी आर्थिक संरेखण: नेट-ज़ीरो लक्ष्यों में अंतर (UAE 2050, भारत 2070) और वर्ष 2030 तक 50% नवीकरणीय ऊर्जा की भारत की पहल पारंपरिक हाइड्रोकार्बन-आधारित संबंधों के लिये चुनौती प्रस्तुत करती है, क्योंकि UAE के तेल निर्यात हित भारत के हरित लक्ष्यों के साथ संभावित संघर्ष में हो सकते हैं।

UAE के साथ सहयोग बढ़ाने हेतु भारत को क्या कदम उठाने चाहिये?

  • संयुक्त हरित ऊर्जा एवं स्थिरता कॉरिडोर: संयुक्त नवीकरणीय ऊर्जा निवेश, ग्रीन हाइड्रोजन प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और विलवणीकरण अनुसंधान के लिये भारत–UAE ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर लागू किया जाना चाहिये। इसके पूरक के रूप में मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तथा सतत शहरी विकास पर केंद्रित एक संयुक्त जलवायु परिवर्तन अनुसंधान केंद्र स्थापित किया जा सकता है, जो भारतीय विशेषज्ञताUAE की वित्तीय सहायता का लाभ उठाए।
  • क्षेत्रीय एकीकरण के प्रवेश-द्वार के रूप में UAE का उपयोग: भारत को खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) और ग्रेटर अरब फ्री ट्रेड एरिया (GAFTA) में UAE की स्थिति का लाभ उठाते हुए अन्य सदस्य देशों के साथ CEPA जैसे समझौतों का समर्थन करना चाहिये।
    • साथ ही री-एक्सपोर्ट हब के रूप में UAE की भूमिका का उपयोग करते हुए हैंडलूम, हस्तशिल्प, वस्त्र और फार्मा जैसे प्रमुख भारतीय उत्पादों को अफ्रीकी तथा व्यापक मध्य-पूर्वी बाज़ारों तक पहुँचने वाली आपूर्ति शृंखलाओं में एकीकृत किया जाना चाहिये।
  • निवेश प्रवाह का विस्तार: भारत की प्राथमिक परियोजनाओं (जैसे– GIFT सिटी) में UAE के निवेश को सुगम बनाया जाए, साथ ही UAE के प्रमुख क्षेत्रों में भारतीय निवेश को प्रोत्साहित किया जाए। इसके लिये उच्च-मूल्य प्रस्तावों की निगरानी और त्वरित क्रियान्वयन हेतु समर्पित द्विपक्षीय निवेश टास्क फोर्स स्थापित की जानी चाहिये।
  • रणनीतिक संवाद और संयुक्त समर्थन: भारत को राजनयिक गतिशीलता बनाए रखने के लिये 'संयुक्त आयोग' के माध्यम से स्पष्ट समयसीमा के साथ उच्च-स्तरीय समीक्षाओं को संस्थागत बनाना चाहिये। साथ ही कतर के उदाहरण (2020 में उन्मूलन) का अनुसरण करते हुए भारतीय प्रवासियों के अधिकारों और कल्याण की रक्षा हेतु 'कफाला सिस्टम' में सुधारों का सशक्त समर्थन करना चाहिये।

निष्कर्ष

UAE के राष्ट्रपति की यात्रा भारत–UAE रणनीतिक साझेदारी के गहराने को रेखांकित करती है, जिसमें व्यापार, रक्षा, ऊर्जा, प्रौद्योगिकी तथा जन संपर्क के क्षेत्रों में सहयोग का विस्तार हो रहा है। जहाँ CEPA-प्रेरित व्यापार, हरित ऊर्जा एवं डिजिटल एकीकरण में अवसर महत्त्वपूर्ण हैं, वहीं दीर्घकालिक सहयोग बनाए रखने के लिये भारत को क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विताओं, चीन के प्रभावसंरचनात्मक व्यापार बाधाओं के बीच संतुलन साधना होगा।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. “भारत-UAE साझेदारी भारत की विस्तारित पड़ोस नीति की एक आधारशिला है।" विस्तृत वर्णन कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. द्विपक्षीय संबंधों में भारत-UAE CEPA का क्या महत्त्व है?
CEPA ने भारत–UAE के आर्थिक संबंधों को मज़बूत किया है, जिससे वित्तवर्ष 2024–25 में द्विपक्षीय व्यापार बढ़कर 100 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया है और वर्ष 2032 तक 200 अरब अमेरिकी डॉलर का लक्ष्य रखा गया है।

2. भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिये UAE क्यों महत्त्वपूर्ण है?
UAE भारत के लिये कच्चे तेल का चौथा सबसे बड़ा स्रोत और LNG का दूसरा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्त्ता है, जिससे यह भारत की ऊर्जा स्थिरता के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण बन जाता है।

3. डेटा एंबैसी क्या है?
डेटा एंबैसी एक ऑफशोर डेटा सेंटर होती है, जो आपसी संप्रभुता के अंतर्गत संचालित होती है और डिजिटल निरंतरता तथा डिजिटल संप्रभुता सुनिश्चित करती है।

 

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs) 

प्रिलिम्स

प्रश्न. निम्नलिखित में से कौन 'खाड़ी सहयोग परिषद' का सदस्य नहीं है? ( 2016)

(a) ईरान

(b) ओमान

(c) सऊदी अरब

(d) कुवैत

उत्तर: (a)


प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2008)

  1. अजमान UAE के सात अमीरातों में से एक है। 
  2. रास अल-खैमाह UAE में शामिल होने वाला अंतिम शेख-राज्य था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (c)

मेन्स 

प्रश्न. भारत की ऊर्जा सुरक्षा का प्रश्न भारत की आर्थिक प्रगति का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भाग है। पश्चिम एशियाई देशों के साथ भारत के ऊर्जा नीति सहयोग का विश्लेषण कीजिये। (2017)

प्रश्न. परियोजना ‘मौसम’ को भारत सरकार की अपने पड़ोसियों के साथ संबंधों की सुदृढ़ करने की एक अद्वितीय विदेश नीति पहल माना जाता है। क्या इस परियोजना का एक रणनीतिक आयाम है? चर्चा कीजिये। (2015)


PSLV विफलताएँ एवं निहितार्थ

प्रिलिम्स के लिये: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, PSLV, लो अर्थ ऑर्बिट (LEO), EOS-09

मेन्स के लिये: भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम और राष्ट्रीय सुरक्षा में PSLV की भूमिका, प्रक्षेपण यान की बार-बार होने वाली विफलताओं के कारण और उनके निहितार्थ, भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र का वाणिज्यीकरण तथा उससे जुड़ी चुनौतियाँ।

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों?

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) जाँच के दायरे में है, क्योंकि दो लगातार PSLV मिशन विफल हुए हैं– PSLV-C61 (मई 2025) और PSLV-C62 (जनवरी 2026)  जो दोनों तृतीय चरण की असामान्यताओं (Third-Stage Anomalies) से संबंधित हैं।

  • लगभग समान समस्याएँ PSLV में गुणवत्ता नियंत्रण को लेकर चिंताएँ बढ़ाती हैं, जो ISRO का सबसे विश्वसनीय यान माना जाता है। हालाँकि ISRO का समग्र प्रक्षेपण रिकॉर्ड दृढ़ है, ये विफलताएँ रणनीतिक निगरानी मिशनों को प्रभावित कर सकती हैं और वाणिज्यिक प्रक्षेपण विश्वसनीयता को कमज़ोर कर सकती हैं।

सारांश

  • दो लगातार PSLV विफलताओं (C61 और C62), जो तृतीय चरण की असामान्यताओं से जुड़ी हैं, ने ISRO के गुणवत्ता नियंत्रण, रणनीतिक निगरानी क्षमता और वैश्विक प्रक्षेपण बाज़ार में घटती वाणिज्यिक विश्वसनीयता को लेकर चिंता बढ़ा दी हैं।
  • विश्वास को पुनर्स्थापित करने के लिये विश्वसनीयता-प्रथम इंजीनियरिंग, पारदर्शी विफलता विश्लेषण, विविध लॉन्च अवसंरचना, त्वरित स्वदेशीकरण तथा सुदृढ़ सैन्य-क्षेत्र एकीकरण की आवश्यकता होती है।

पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (PSLV) क्या है?

  • परिचय: PSLV भारत का तीसरी पीढ़ी का प्रक्षेपण यान है, जिसे ISRO ने तैयार किया है। अक्तूबर 1994 में अपने पहले सफल प्रक्षेपण के बाद से, PSLV भारत के अंतरिक्ष प्रक्षेपण कार्यक्रम की मुख्य आधार बन गया है।
    • PSLV भारत का पहला ऐसा रॉकेट था जिसने तरल प्रणोदन चरण का उपयोग किया, जो भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में एक महत्त्वपूर्ण तकनीकी छलाँग थी।
    • PSLV को ISRO का ‘वर्कहॉर्स’ कहा जाता है, क्योंकि इसका दीर्घ रिकॉर्ड सतत, सटीक और लागत-कुशल प्रक्षेपणों का है, विशेष रूप से निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) और सूर्य-समकालिक ध्रुवीय कक्षा (SSPO) में।
  • PSLV संरचना: तकनीकी रूप से PSLV एक चार-चरणीय रॉकेट है, जो ठोस और तरल प्रणोदन का इष्टतम मिश्रण उपयोग करता है:
    • PS1 (पहला चरण): इसमें एक ठोस रॉकेट मोटर होता है, जो HTPB को ईंधन के रूप में उपयोग करता है और उच्च लिफ्ट-ऑफ थ्रस्ट उत्पन्न करता है, जिससे प्रारंभिक प्रक्षेपण बल प्रदान होता है।
      • PSLV-XL कॉन्फिगरेशन में इस चरण को छह ठोस स्ट्रैप-ऑन बूस्टर द्वारा बढ़ाया जाता है, जिससे प्रक्षेपण के समय थ्रस्ट में महत्त्वपूर्ण वृद्धि होती है और वाहन को भारी पेलोड ले जाने में सक्षम बनाया जाता है।
    • PS2 (दूसरा चरण): इस चरण को विकास तरल इंजन द्वारा संचालित किया जाता है, जो प्रक्षेपण के बाद नियंत्रित और स्थिर आरोहण सुनिश्चित करता है।
      • यह चरण ईंधन के रूप में UDMH (असममित डाईमिथाइलहाइड्राज़ीन) और ऑक्सीडाइज़र के रूप में N₂O₄ (नाइट्रोजन टेट्राक्साइड) का उपयोग करता है, जिससे आवश्यक थ्रस्ट उत्पन्न होता है और वेग व प्रक्षेपवक्र का सटीक नियंत्रण संभव होता है।
    • PS3 (तीसरा चरण): यह एक ठोस रॉकेट मोटर है, जो पुनः HTPB प्रणोदक का उपयोग करता है।
      • यह चरण उड़ान के लगभग निर्वात चरण के दौरान संचालित होता है और वाहन को आवश्यक कक्षीय वेग तक पहुँचाने के लिये उच्च थ्रस्ट प्रदान करता है, जिससे यह मिशन की सफलता हेतु एक महत्त्वपूर्ण चरण बन जाता है।
    • PS4 (चौथा चरण): यह एक तरल प्रणोदक चरण है, जिसमें दो इंजन होते हैं और इसमें MMH (मोनोमेथिलहाइड्राजीन) तथा MON (नाइट्रोजन के मिश्रित ऑक्साइड) का उपयोग किया जाता है।
      • यह चरण अत्यंत सटीक कक्षीय स्थापना को संभव बनाता है, जिससे PSLV उपग्रहों को सटीक रूप से स्थापित कर पाता है, जिसमें मल्टी-ऑर्बिट और मल्टी-सैटेलाइट मिशन भी शामिल हैं।
  • PSLV की पेलोड क्षमता: यह 600 किमी. सूर्य-समकालिक ध्रुवीय कक्षा (Sun-Synchronous Polar Orbit- SSPO) में 1,750 किग्रा. तक और उप-भूस्थैतिक स्थानांतरण कक्षा (GTO) में लगभग 1,425 किग्रा. तक पेलोड स्थापित में सक्षम है, जो इसकी व्यापक मिशन अनुकूलनशीलता और परिचालन दक्षता को प्रतिबिंबित करता है।
  • उपलब्धियाँ: PSLV की विश्वसनीयता को महत्त्वपूर्ण अंतरग्रहीय मिशनों, जैसे– चंद्रयान‑1 और मार्स ऑर्बिटर मिशन (MOM) ने पुष्ट किया, जो क्रमशः चंद्रमा और मंगल तक सफलतापूर्वक पहुँचे।
    • PSLV ने कई विदेशी वाणिज्यिक उपग्रहों को भी प्रक्षेपित किया है, जिससे वैश्विक प्रक्षेपण बाज़ार में भारत की स्थिति सुदृढ़ हुई है।

ISRO_Launch_Vehicle

PSLV-C61 और PSLV-C62 की विफलता के क्या कारण हैं?

  • PSLV-C61:
    • मिशन उद्देश्य: उच्च-रिज़ॉल्यूशन पृथ्वी अवलोकन उपग्रह EOS-09 को कक्षा में स्थापित करना।
    • विसंगति: पहले दो चरणों के सामान्य प्रदर्शन के बाद तीसरे चरण (PS3) के दहन कक्ष के दबाव में अचानक गिरावट दर्ज की गई।
    • परिणाम: प्रक्षेपण यान आवश्यक वेग प्राप्त नहीं कर सका, जिसके कारण मिशन विफल हो गया और उपग्रह का नुकसान हुआ।
  • PSLV-C62:
    • मिशन का उद्देश्य: रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के लिये EOS-N1 (अन्वेषा) उपग्रह का प्रक्षेपण करना, साथ ही 15 वाणिज्यिक सह-यात्री (को-पैसेंजर) उपग्रहों को कक्षा में स्थापित करना।
    • विसंगति: तीसरे चरण (PS3) के दहन के समय रोल-रेट में असामान्यता आई, जिससे प्रक्षेपण यान का नियंत्रण खो गया
      • रोल-रेट गड़बड़ी रॉकेट का उसकी लंबी धुरी के चारों ओर अनियंत्रित घूर्णन (स्पिन) है। यह खतरनाक है क्योंकि अत्यधिक रोल नेविगेशन सेंसर और मार्गदर्शन प्रणालियों को भ्रमित कर सकता है, जिससे यान का नियंत्रण बनाए रखना असंभव हो जाता है। 
    • परिणाम: रॉकेट अपने निर्धारित प्रक्षेप पथ से भटक गया, जिससे सभी 16 उपग्रहों का नुकसान हुआ, जिनमें रणनीतिक और वाणिज्यिक पेलोड शामिल थे।
  • तकनीकी समस्या: PS3 चरण एक ठोस ईंधन रॉकेट मोटर है, जिसका अर्थ है कि एक बार प्रज्वलन होने के बाद इसे नियंत्रित (थ्रॉटल) या बंद नहीं किया जा सकता जिसके कारण यह निर्माण तथा सामग्री दोषों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होता है।
    • PS3 सॉलिड मोटर (ठोस मोटर) में मामूली दोष भी असमान दहन का कारण बन सकते हैं, जिससे दबाव में कमी या उत्सर्जन गैसों का रिसाव (साइड-वेंटिंग) हो सकता है।
    • PSLV-C62 के मामले में ऐसे साइड-वेंटिंग के कारण संभवतः असमान थ्रस्ट उत्पन्न हुआ, जिसने अत्यधिक घुमाव (टॉर्क) हुआ और यान की दिशा-नियंत्रण प्रणाली को अभिभूत कर दिया।
    • PSLV-C62 के मामले में, इस तरह के साइड-वेंटिंग (बगल से गैसों का रिसाव) ने संभवतः असममित थ्रस्ट (asymmetric thrust) उत्पन्न किया, जिससे अत्यधिक टॉर्क पैदा हुआ जिसने वाहन की 'एटीट्यूड-कंट्रोल सिस्टम' (दिशा-नियंत्रण प्रणाली) को पूरी तरह से विवश या विफल कर दिया।
    • परिणामस्वरूप यान अनियंत्रित घूर्णन (रोल गड़बड़ी) करने लगा, नियोजित पथ से विचलित हुआ और अंततः मिशन विफल हो गया।
    • दोनों असफलताएँ PS3-विशिष्ट समस्याओं की ओर इशारा करती हैं, जो एक समान विफलता मोड को दर्शाती हैं।

बार-बार PSLV असफलताओं को लेकर प्रमुख चिंताएँ क्या हैं?

  • रणनीतिक निहितार्थ:
    • निगरानी अंतराल: इन मिशनों में खोए गए मुख्य पेलोड पृथ्वी अवलोकन उपग्रह (EOS-09 और EOS-N1/अन्वेषा) थे।
      • ये उपकरण सीमा निगरानी, सैन्य गतिविधियों की निगरानी और आपदा मोचन के लिये महत्त्वपूर्ण हैं। इनके स्थानापन्न उपग्रहों की तैनाती में देरी भारत की अंतरिक्ष-आधारित खुफिया क्षमताओं में "ब्लाइंड स्पॉट" उत्पन्न कर देती है।
    • रक्षा पर निर्भरता: चूँकि सेना विशेष अंतरिक्ष उपकरणों पर तेज़ी से निर्भर हो रही है, इसलिये लॉन्चर की विश्वसनीयता राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला बन जाती है।
  • वाणिज्यिक विश्वसनीयता का नुकसान:
    • वैश्विक बाज़ार हिस्सेदारी पर जोखिम: न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) के माध्यम से भारत अंतर्राष्ट्रीय छोटे उपग्रहों के लिये एक लागत प्रभावी तथा विश्वसनीय लॉन्चर के रूप में PSLV का सक्रिय रूप रूप से विपणन कर रहा है।
      • निजी कंपनियाँ: SpaceX (फाल्कन 9 राइडशेयर) और उभरते हुए छोटे उपग्रह लॉन्चर (जैसे– रॉकेट लैब) पहले से ही प्रबल प्रतिस्पर्द्धी हैं।
        • भारत की वैश्विक छोटे उपग्रह लॉन्च बाज़ार हिस्सेदारी वर्ष 2017 में लगभग 35% से घटकर वर्ष 2024 तक लगभग शून्य हो गई।
      • बार-बार मिशन असफलताओं से यह गिरावट और तेज़ हो सकती है, जिससे प्रतिस्पर्द्धियों को स्पष्ट बढ़त मिलती है, क्योंकि वैश्विक ग्राहक अब कम लागत की अपेक्षा मिशन की विश्वसनीयता तथा सुनिश्चितता को प्राथमिकता देने लगे हैं।
    • बीमा लागत में वृद्धि: अंतरिक्ष बीमा बाज़ार में प्रिमियम की दरें लॉन्च वाहन की विश्वसनीयता पर निर्भर करती हैं।
      • लगातार दो असफलताएँ भविष्य के PSLV प्रक्षेपणों के बीमा प्रीमियम को बढ़ा सकती हैं, जिससे वह लागत-कुशलता प्रभावित हो सकती है, जो ISRO को विदेशी ग्राहकों के लिये आकर्षक बनाती है।
  • गुणवत्ता नियंत्रण और आपूर्ति शृंखला की कमज़ोरियाँ:
    • प्रणालीगत विनिर्माण दोष: दोनों असफलताओं का तीसरे चरण (ठोस ईंधन मोटर) से जुड़ा होना यह संकेत देता है कि यह कोई यादृच्छिक त्रुटि नहीं, बल्कि प्रणालीगत समस्या है।
      • इसमें प्रोपेल्लेंट में दरारें, बांडिंग दोष या नोज़ल सामग्री की विफलता जैसी समस्याएँ अक्सर निर्माण या भंडारण चरण से उत्पन्न होती हैं।
    • घटक निर्भरता: आत्मनिर्भर भारत होने के बावजूद भारत अभी भी स्पेस-ग्रेड इलेक्ट्रॉनिक्स, कार्बन फाइबर और सेमीकंडक्टर्स के लिये आयात पर निर्भर है।
      • भारत की अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी आयात का लागत उसके निर्यात के आय (2021–22) से लगभग 12 गुना अधिक है।
      • यह स्थिति भारत को निर्यात नियंत्रण और ताइवान-केंद्रित चिप आपूर्ति में व्यवधान के प्रति संवेदनशील बना देती है।
    • निजीकरण की चुनौतियाँ: जब ISRO PSLV विकास का 50% हिस्सा HAL-L&T उद्योग संघ को स्थानांतरित कर रहा है, तो इन असफलताओं से प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की क्षमता और यह कि सख्त गुणवत्ता आश्वासन (QA) मानक पूरी सप्लाई चेन में सही तरीके से लागू हो रहे हैं या नहीं, इस पर प्रश्न खड़े कर दिये हैं

ISRO को तकनीकी विश्वसनीयता और वाणिज्यिक विश्वसनीयता बहाल करने हेतु कौन-से कदम उठाने चाहिये?

  • प्रक्षेपण विश्वसनीयता की बहाली: भारत को मिशन-केंद्रित परीक्षण के स्थान पर बेड़ा-स्तर की विश्वसनीयता इंजीनियरिंग की ओर बढ़ना चाहिये, जिसमें ब्लॉक अपग्रेड, तीव्र फीडबैक लूप और क्रमिक सत्यापन का उपयोग किया जाए।
    • इसरो (ISRO) को खुले तौर पर 'विश्वसनीयता-प्रथम चरण' के प्रति प्रतिबद्धता जतानी चाहिये, जिसमें कम प्रक्षेपणों के बावजूद गहन जाँच और पूर्ण प्रकटीकरण को प्राथमिकता दी जाए। दीर्घकालिक प्रतिष्ठित क्षति की तुलना में अल्पकालिक वाणिज्यिक नुकसान सहनीय है।
  • असफलताओं के पश्चात पारदर्शिता को संस्थागत बनाना: फेल्योर एनालिसिस कमेटी (FAC) की निष्कर्ष रिपोर्ट को समयबद्ध रूप से सार्वजनिक करना अनिवार्य किया जाना चाहिये, जिसमें आवश्यकता होने पर संवेदनशील डिटेल्स को हटाया जा सके। 
    • मौन या अस्पष्ट बयानों की तुलना में पारदर्शिता बीमाकर्त्ताओं, व्यावसायिक ग्राहकों और रणनीतिक साझेदारों को कहीं अधिक आश्वस्त करती है।
  • प्रक्षेपण अवसंरचना में विविधता लाना: श्रीहरिकोटा पर भारत की लगभग पूर्ण निर्भरता को द्वितीय कक्षीय प्रक्षेपण स्थल को गति देकर और वैकल्पिक लॉन्च पैड को पूर्णतः क्रियाशील बनाकर कम किया जाना चाहिये। इससे अतिरेकता, मौसमी परिवर्तन और संकटकालीन प्रतिक्रिया क्षमता में सुधार होगा।
    • इसके साथ ही भारत को परिचालन अधिकारों और समर्पित वित्तपोषण से युक्त एक पूर्ण सशक्त अंतरिक्ष कमान की स्थापना करनी चाहिये, नक्षत्र-आधारित ISR (खुफिया, निगरानी और टोही) तथा SSA (अंतरिक्ष स्थितिपरक जागरूकता) को अपनाना चाहिये और अंतरिक्ष डेटा का वास्तविक समय में संयुक्त सैन्य संचालन के चित्र में समन्वय बनाए रखना चाहिये।
    • इससे पुनरावृत्ति क्षमता, मौसमी परिवर्तन तथा संकटकालीन प्रतिक्रिया क्षमता में सुधार होगा।
  • महत्त्वपूर्ण घटकों के स्वदेशीकरण में तीव्रता: स्पेस-ग्रेड इलेक्ट्रॉनिक्स, TWT, कंपोज़िट्स तथा सेमीकंडक्टरों के लिये मिशन-आधारित स्वदेशीकरण आवश्यक है।
    • सरकारी मांग की सुनिश्चितता का उपयोग निजी विनिर्माण के जोखिम को कम करने तथा निर्यात संबंधी नियंत्रणों और आपूर्ति-आघातों के प्रति निर्भरता कम करने के लिये किया जाना चाहिये।

निष्कर्ष

भारत की अंतरिक्ष चुनौती अब केवल क्षमता से संबंधित नहीं रह गई है, बल्कि विश्वसनीयता, लचीलापन और प्रभावी क्रियान्वयन से संबंधित है। विश्वास की पुनर्स्थापना के लिये पृथक्-पृथक् सुधारों से आगे बढ़कर संपूर्ण प्रणालीगत रूपांतरण की आवश्यकता है, जिसमें तकनीकी विश्वसनीयता, रणनीतिक स्वायत्तता और वाणिज्यिक विकास सुदृढ़ करना शामिल है। अंतरिक्ष क्षेत्र में विश्वास धीरे-धीरे निर्मित होता है, किंतु क्षण भर में समाप्त हो सकता है; अतः भारत की प्रतिक्रिया निर्णायक, पारदर्शी और दूरदर्शी होनी चाहिये।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (PSLV) को लंबे समय से भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की रीढ़ माना जाता रहा है। हाल के PSLV प्रक्षेपणों में हुई विफलताओं के संदर्भ में, उनसे उत्पन्न चुनौतियों तथा भारत की वैश्विक प्रक्षेपण विश्वसनीयता पर उनके प्रभावों का परीक्षण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. PSLV-C61 और PSLV-C62 अभियानों की विफलता के कारण क्या थे?
दोनों अभियानों में विफलता का कारण तीसरे चरण (PS3) में उत्पन्न असामान्यताएँ थीं। इनमें PSLV-C61 में दहन कक्ष दाब में कमी तथा PSLV-C62 में रोल-रेट में विक्षोभ शामिल था।

2. PSLV में तीसरे चरण की विफलता विशेष रूप से गंभीर क्यों मानी जाती है? 
PS3 लगभग निर्वात की स्थिति में काम करता है। और अंतिम वेग प्रदान करता है। ठोस रॉकेट मोटरों को न तो थ्रॉटल किया जा सकता है और न ही बंद किया जा सकता है, जिससे वे निर्माण संबंधी दोषों के प्रति अत्यंत संवेदनशील होते हैं।

3. PSLV की बार-बार होने वाली विफलताएँ भारत के रणनीतिक हितों को कैसे प्रभावित करती हैं?
इन विफलताओं से भू-अवलोकन और निगरानी उपग्रहों की तैनाती में विलंब होता है, जिससे गुप्त सूचनाओं में अंतर उत्पन्न होता है तथा सीमा सुरक्षा, आपदा प्रबंधन और रक्षा तैयारी प्रभावित होती है।

4. ISRO में विश्वास बहाल करने के लिये कौन-से प्रमुख सुधार आवश्यक हैं?
इसके लिये फ्लीट-लेवल रेलायबिलिटी इंजीनियरिंग, FAC रिपोर्टों की पारदर्शी लौकिकता, प्रक्षेपण अवसंरचना का विविधीकरण, स्वदेशीकरण में तीव्रता तथा पूर्ण अधिकारों और संसाधनों से युक्त एक सशक्त अंतरिक्ष कमान की स्थापना जैसे कदम आवश्यक हैं।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न  

प्रिलिम्स

प्रश्न. भारत के उपग्रह प्रमोचित करने वाले वाहनों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2018)

  1. PSLV से वे उपग्रह प्रमोचित किये जाते हैं जो पृथ्वी के संसाधनों के मॉनीटरन में उपयोगी हैं, जबकि GSLV को मुख्यतः संचार उपग्रहों को प्रमोचित करने के लिये अभिकल्पित किया गया है।
  2. PSLV द्वारा प्रमोचित उपग्रह आकाश में एक ही स्थिति में स्थायी रूप में स्थिर रहते प्रतीत होते हैं जैसा कि पृथ्वी के एक विशिष्ट स्थान से देखा जाता है।
  3. GSLV Mk III एक चार-चरण वाला प्रमोचन वाहन है, जिसमें प्रथम और तृतीय चरणों में ठोस रॉकेट मोटरों का तथा द्वितीय और चतुर्थ चरणों में द्रव रॉकेट इंजनों का प्रयोग होता है। 

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1

(b) 2 और 3

(c) 1 और 2

(d) केवल 3

उत्तर: (a)  


मेन्स

प्रश्न. भारत के तीसरे चंद्रमा मिशन का मुख्य कार्य क्या है जिसे इसके पहले के मिशन में हासिल नहीं किया जा सका? जिन देशों ने इस कार्य को हासिल कर लिया है उनकी सूची दीजिये। प्रक्षेपित अंतरिक्ष यान की उपप्रणालियों को प्रस्तुत कीजिये और विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र के 'आभासी प्रक्षेपण नियंत्रण केंद्र' की उस भूमिका का वर्णन कीजिये जिसने श्रीहरिकोटा से सफल प्रक्षेपण में योगदान दिया है। (2023) 

प्रश्न. भारत की अपना स्वयं का अंतरिक्ष केंद्र प्राप्त करने की क्या योजना है और हमारे अंतरिक्ष कार्यक्रम को यह किस प्रकार लाभ पहुँचाएगी? (2019)  

प्रश्न. अंतरिक्ष विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियों की चर्चा कीजिये। इस प्रौद्योगिकी का प्रयोग भारत के सामाजिक-आर्थिक विकास में किस प्रकार सहायक हुआ है? (2016)