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MP PCS - अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989
May 06, 2015

[The Scheduled Castes and the Scheduled tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989]

यह अधिनियम अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के विरुद्ध किए गए अपराधों के निवारण के लिए है, अधिनियम ऐसे अपराधों के संबंध में मुकदमा चलाने तथा ऐसे अपराधों से पीड़ित व्यक्तियों के लिए राहत एवं पुनर्वास का प्रावधान करता है। सामान्य बोलचाल की भाषा में यह अधिनियम अत्याचार निवारण (Prevention of Atrocities) या अनुसूचित जाति/जनजाति अधिनियम कहलाता है। यह अधिनियम 11 सितंबर, 1989 को अधिनियमित किया गया था जबकि 30 जनवरी, 1990 से जम्मू-कश्मीर को छोड़कर संपूर्ण भारत में लागू है। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत किए गए अपराध गैर-जमानती (Non Bailable), संज्ञेय (cognizable) तथा अशमनीय (Non-Compoundable) हैं।

पृष्ठभूमि (Background)

भारतीय समाज को परंपरागत विश्वासों के अंधानुकरण तथा अतार्किक लगाव से मुक्त करना आवश्यक है। इसके लिए 1955 में अस्पृश्यता (अपराध निवारण) अधिनियम लाया गया था, लेकिन इसकी कमियों एवं कमजोरियों के कारण सरकार को इस कानूनी तंत्र में व्यापक सुधार करना पड़ा। 1976 से इस अधिनियम का नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम के रूप में पुनर्गठन किया गया। अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार के अनेक उपाय करने के बावजूद उनकी स्थिति दयनीय बनी रही। उन्हें अपमानित एवं उत्पीड़ित किया जाता रहा। उन्होंने जब भी अस्पृश्यता के विरुद्ध अपने अधिकारों का प्रयोग करना चाहा, उन्हें दबाने एवं आतंकित करने का कार्य किया गया। अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के उत्पीड़न रोकने तथा दोषियों पर कार्रवाई करने के लिए विशेष अदालतों के गठन को आवश्यक समझा गया। उत्पीड़न के शिकार लोगों को राहत, पुनर्वास उपलब्ध कराना एक बड़ी चुनौती थी। इसी पृष्ठभूमि में अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 बनाया गया था। इस अधिनियम का स्पष्ट उद्देश्य अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति समुदाय को सक्रिय प्रयासों से न्याय दिलाना था ताकि समाज में वे गरिमा के साथ रह सकें। उन्हें हिंसा या उत्पीड़न का भय न सताए। प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से अस्पृश्यता के व्यवहार को संज्ञेय अपराध घोषित किया गया तथा ऐसे किसी भी अपराध के लिए अधिनियम में कठोर सछाा का प्रावधान किया गया। हालाँकि अधिनियम समाज को समावेशी बनाने के उद्देश्य से लाया गया था। यह संरक्षात्मक भेदभाव (protective discrimination) के सिद्धांत पर आधारित है, लेकिन यह अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर सका और 2010 में स्वयं केंद्रीय गृहमंत्री ने इस बात को स्वीकार किया था। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 से संबंधित बिल को लोकसभा में पेश करते समय इसके उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुए कहा गया था कि अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार के अनेक प्रयास करने के बावजूद वे असुरक्षित बने हुए हैं। कई बर्बर घटनाओं में उन्हें अपने जीवन एवं संपत्ति से वंचित होना पड़ता है। शिक्षा के प्रसार से जागरूकता बढ़ी है। लेकिन जब भी वे अपने अधिकारों का प्रयोग करना चाहते हैं या अपने विरुद्ध अस्पृश्यता से जुड़े व्यवहारों का विरोध करते हैं या सांविधिक न्यूनतम मजदूरी की मांग करते हैं या बंधुआ या बलात् श्रम करने से इंकार करते हैं तो निहित स्वार्थी तत्व उन्हें नीचा दिखाने एवं आतंकित करने का प्रयास करते हैं। जब भी अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लोग अपने आत्मसम्मान एवं अपने महिलाओं के सम्मान की रक्षा करने का प्रयास करते हैं, वे शक्तिशाली एवं प्रभुत्वशाली लोगों की आँखों में खटकने लगते हैं।

इन परिस्थितियों में नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 तथा भारतीय दंड संहिता के सामान्य प्रावधान अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के व्यक्तियों के विरुद्ध होने वाले अपराधों के निवारण में अपर्याप्त सिद्ध हुए हैं। यह आवश्यक समझा गया कि न केवल अत्याचार (Atrocities) शब्द को परिभाषित किया जाए बल्कि ऐसे अत्याचार करने वालों को कठोर सछाा भी दी जाए। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के सदस्यों का उत्पीड़न रोकने के लिए राज्यों एवं संघ शासित क्षेत्रों को कुछ विशिष्ट निवारक एवं दंडात्मक उपाय अपनाने की बात कही गई। जहाँ इस तरह का अत्याचार होता है वहाँ पर्याप्त राहत तथा पुनर्वास के लिए सहायता देने की बात कही गई। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की प्रभाविता सुनिश्चित करने, इसकी कमियों को दूर करने तथा समय अनुकूल बनाने के उद्देश्य से 2014 में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन अध्यादेश लाया गया था। 4 मार्च, 2014 को राष्ट्रपति ने इस पर हस्ताक्षर किये। इसके अध्यादेश होने एवं अगले 6 महीने में संसद द्वारा स्वीकृति प्राप्त नहीं करने के कारण यह समाप्त हो गया। यह पुनः मंत्रिमंडल के पास वापस पहुँच गया है। इसमें अत्याचार की परिभाषा में कई नए कृत्यों को शामिल किया गया था। कुछ शब्दों को स्पष्ट किया गया था। इसके अलावा पहले के प्रावधानों में आंशिक परिवर्तन किया गया था।

अत्याचार निवारण अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ (Salient features of Atrocities Act)

अत्याचार निवारण अधिनियम को मुख्यतः तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है। यह अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति समुदाय की समाज में स्थिति तथा उनके विरुद्ध विभिन्न प्रकार के किए जाने वाले अपराधों के संदर्भ में हैं-

 


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