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भारतीय शिल्पकला और शिल्पकारों का सांस्कृतिक इतिहास

Posted By : Mr. Vivek Ojha     Posted Date : Mar 02,15   Hits : 8112    



प्राचीन भारत से लेकर आधुनिक भारत के कालक्रम में शिल्पकार को बहुआयामी भूमिका का निर्वाह करने वाले व्यक्ति के रूप में देखा गया है। शिल्पकार शिल्पवस्तुओं के निर्माता और विक्रेता के अलावा समाज में डिजाइनर, सर्जक, अन्वेषक और समस्याएं हल करने वाले 
व्यक्ति के रूप में भी कई भूमिकाएं निभाता है। अतः शिल्पकार केवल एक वस्तु निर्माता ही नहीं होता और शिल्पवस्तु केवल एक सुंदर वस्तु ही नहीं होती बल्कि इसका सृजन एक विशेष कार्य के लिए, ग्राहक की आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए किया जाता है। वस्तुतः शिल्पकार खासकर ग्रामीण भारत में एक समस्या समाधानकर्ता के रूप में कुशल भूमिका निभाता है। उदाहरण के लिए, उपभोक्ता या ग्राहक शिल्पकार से कह सकते हैं कि वह एक ऐसा प्याला बनाये, जिसे वे आसानी से पकड़ सकें और उससे गर्म पेय पी सकें। इस संबंध में शिल्पकार कुम्हार कप के हैंडल को इस तरह से डिजाइन करेगा कि उसे आसानी से पकड़ा जा सके और कप को इस प्रकार का आकार देगा कि न तो वह बहुत भारी हो और न ही बहुत बड़ा। इस तरह स्पष्ट है कि ग्राहक शिल्पकार को एक समस्या को हल करने के लिए देता है कि वह गर्म पेय के लिए कप बनाये। शिल्पकार जिस जीवंतता (Vividity) के साथ कार्य करता है, वह उसे एक सांस्कृतिक प्राणी और सौन्दर्योपासक (वस्तु की सुंदरता की उपासना एवं आराधना करने वाला) बना देती है। विभिन्न वस्तु एवं उत्पाद का निर्माण उसके लिए एक साधना (Meditation) हो जाती है। अपनी इसी साधना को इन्द्रधनुषी आभा प्रदान करने में वह लगा रहता है। गहराई से देखें तो शिल्पकार द्वारा निर्मित उत्पाद उपयोगिता, सौन्दर्य, अंतसंपर्कों को बढ़ावा देने का उपादान (Tool) होता है। शिल्पकार कुम्हार की विशिष्टता उत्पाद की कलाकारी और सजावट नहीं बल्कि ग्राहक की समस्याओं हेतु उपयुक्त एवं कल्पनाशील हल ढूँढने में शिल्पकार का कौशल है। ऐसे में ग्राहक की जिम्मेदारी भी बनती है कि वह शिल्पकार को प्रोत्साहित करे जिससे वह हर समय नयी और उत्साहजनक वस्तु का सृजन एवं उत्पादन करे। इस दृष्टि से ग्राहक और शिल्पकार के मध्य संबंध और उपयोगी अंतसंपर्क ही शिल्पकला के सर्वोत्तम विकास में सहायक है।

भारतीय शिल्पकला की विशेषताएं

भारतीय शिल्प की लंबी और प्राचीन परंपरा होने का आशय है कि यहां हमेशा रचनात्मक और कल्पनाशील लोग हुए हैं, जिन्होंने समस्याओं के समाधान के बहुत रोचक तरीके खोजे। शिल्पकला कार्यकर्ता (Craft Activist) जया जेटली ने अपनी पुस्तक ‘विश्वकर्मांज चिल्ड्रेन-इंडियाज क्राफ्ट्स पीपुल’ में लिखा है कि, "भारत के शिल्प और शिल्पकार यहां की लोक एवं शास्त्रीय परंपरा का अभिन्न अंग हैं। यह ऐतिहासिक समांगीकरण (Historical Assimilations) कई हजार वर्षों से विद्यमान है। कृषि अर्थव्यवस्था में आम लोगों और शहरी लोगों, दोनों के लिए प्रतिदिन उपयोग के लिए हाथों से बनाई गई वस्तुएं शिल्प की दृष्टि से भारत की सांस्कृतिक परंपरा को दर्शाती हैं। हालांकि शिल्पकार लोगों को जाति प्रथा के ढांचे में बांटा गया, लेकिन उनके कौशल को सांस्कृतिक और धार्मिक आवश्यकताओं द्वारा प्रोत्साहित किया गया एवं स्थानीय, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय  व्यापार द्वारा इसे गति प्रदान की गई।" आज भी भारत में हस्तशिल्प आय का वैकल्पिक स्रोत है और कई समुदायों की अर्थव्यवस्था का आधार भी। 

प्राचीन भारतीय संस्कृति व सभ्यता में शिल्पकला के बीज

शिल्प समुदाय की गतिविधियों व उनकी सक्रियता का प्रमाण हमें सिंधु घाटी सभ्यता (3000-1500 ई.पू.) काल में मिलता है। इस समय तक ‘विकसित शहरी संस्कृति’ (Developed Urban Culture) का उद्भव हो चुका था, जो अफगानिस्तान से गुजरात तक फैली थी। इस स्थल से मिले सूती वस्त्र और विभिन्न, आकृतियों, आकारों और डिजाइनों के मिट्टी के पात्र, कम मूल्यवान पत्थरों से बने मनके, चिकनी मिट्टी से बनी मूर्तियां, मोहरें (सील) एक परिष्कृत शिल्पकार संस्कृति (Refined Crafts Culture) की ओर इशारा करते हैं। इस समय शिल्प समुदाय ने ही घरों से गंदा पानी निकालने के लिए चिकनी मिट्टी से पाइप बनाकर इसका हल ढूढा। 5 हजार वर्ष पूर्व विशिष्ट शिल्प समुदायों ने सामाजिक आवश्यकताओं और अपेक्षाओं की पूर्ति का सरल और व्यावहारिक समाधान खोजा, जिससे कि लोगों के जीवन को सुधारा जा सका। कौटिल्य के अर्थशास्त्र (तीसरे शताब्दी ई. पू.) में दो प्रकार के कारीगरों के मध्य भेद बताया गया है- पहले, वे विशेषज्ञ शिल्पकार, जो मजदूरी पर कार्य करने वाले कई कारीगरों को रोजगार देते थे और दूसरे, वे कारीगर जो स्वयं की पूंजी से अपनी कार्यशालाओं में कार्य करते थे। कारीगरों को पारिश्रमिक या तो सामग्री के रूप में या नकद दिया जाता था, फिर भी उन क्षेत्रों में, जहां रुपये का प्रयोग नहीं किया जाता था, सेवा संबंध और वस्तुओं का आदान-प्रदान ही चलता था। संभवतः यजमानी प्रणाली इन्हीं सेवा संबंधों का परिणाम है। उल्लेखनीय है कि संगम साहित्य 100 ई.पू. -600 इसवी के मध्य लिखा गया, जिसमें ‘सूती और रेशमी कपड़ों की बुनाई’ के बारे में हवाला दिया गया है। बुनकर समाज मान्यता प्राप्त और स्थापित वर्ग था और उनके लिए अलग गलियाँ थीं, जिनके नाम ‘कारुगर वीडी’ और ऑरोवल वीडी था। चोल और विजयनगर साम्राज्यों (9 से 12वीं शताब्दी) दोनों में ही बुनकर, मंदिर परिसर के आस-पास रहते थे। वे मूर्ति के वस्त्रों, परदों और पंड़ितों तथा स्थानीय लोगों के वस्त्रों के लिए कपड़ा बुनने के साथ-साथ समुद्रपारीय व्यापार हेतु भी कपड़ा बुनते थे। 

भारतीय शिल्पकला की सांस्कृतिक यात्रा

भारत कई मायनों में एक समृद्ध देश है। एक तरफ यह अपने परंपरागत ज्ञान (Traditional Wisdom) को संजोये रखता आया है तो दूसरी तरफ नवाचार, खोज तथा अन्वेषण, अनुसंधान और वैज्ञानिक परीक्षण के साथ आगे बढ़ता रहा है। यह एक ऐसा देश है जहाँ एक तरफ ऊँचाई पर उड़ने वाले विमान हैं, वहीं दूसरी तरफ खगोलशास्त्री अंतरिक्ष के अनसुलझे पहलुओं पर से पर्दा उठा रहे हैं। बैलगाड़ी और अन्य पशुओं के जरिये परिवहन और कृषि को मदद मिलना एक विशिष्ट स्वदेशी अथवा घरेलू कार्यप्रणाली का सूचक है। 

भारत एक ऐसा देश है जहाँ यूनेस्को एवं इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर दि आर्ट्स के मुताबिक, लगभग 1 करोड़ 69 लाख शिल्पी (Craftsmen) विभिन्न रूपों व प्रकारों के उपयोगितावादी और रचनात्मक कलाओं में अभी भी संलग्न हैं। इस रूप में भारतीय शिल्पकला की रचनात्मकता और उत्पादकता बची रही है। भारत एक ऐसा देश हैं जहां एक कलाकार को सम्मान मिलता है। साहित्य, वेद, मेटाफिजिक्स, दर्शन और विज्ञान के क्षेत्र में ज्ञानी विद्वानों की उपलब्धियों को सराहा जाता है और उनकी विभिन्न कलाओं को संरक्षण प्रदान किया जाता है। उदाहण के लिए पूर्वी भारत के कई भागों में परंपरागत कुम्हारों (Potters) को पंडित  कहा जाता है। वे पंडित को अपनी उपाधि (Title) के रूप में इस्तेमाल करते हैं और उनकी रचनात्मकता को अनुष्ठानों (Rituals) और अन्य अवसरों पर पहचान मिलती है। इन महत्त्वपूर्ण अवसर, त्योहार पर्व और अनुष्ठानों के दौरान उनकी कलात्मकता और रचनात्मकता को उतना ही महत्त्व तथा पहचान दिया जाता है जितना कि ब्राम्हणों को जो विवाह, उपनयन संस्कार (Sacred Thred Ceremony) विवाह संस्कार (Nuptial Ceremony) मुंडन संस्कार और शिक्षा के प्रारंभ से संबंधित संस्कारों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 

कुम्हारों की पहचान व उनकी मान्यता यहीं पर समाप्त नहीं हो जाती, यह जारी रहती है। भारत के अधिकांश सांस्कृतिक व भौगोलिक खंडों में शिल्पी समुदाय जैसे कुम्हार, नाई और अन्य को मेहनताने और पहचान के संदर्भ में ब्राम्हणों के साथ 40 प्रतिशत तक सांझेदारी दी जाती है। यह लोगों और उनकी कलात्मकता के मध्य सद्भावना का एक अद्भुत उदाहरण है जो भारत के सांस्कृतिक वैभव की विनिमयशीलता व गतिशीलता को दर्शाता है। 

मिथिला (बिहार) की महिलांए जो आज विश्व भर में अपने शानदार ‘मिथिला अथवा मधुबनी पेंटिंग्स’ के लिए प्रसिद्ध हैं, ब्रश के माध्यम से अपनी चित्रकारी की कला और डिजाइनों के निर्माण को लिखने की कला (Art of Writing) के रूप में देखती हैं। जब कभी भी एक मिथिला चित्रकार को लोक चित्रकारी (Folk Painting) के बारे में कुछ कहने के लिए कहा जाता है तो वह कहती है कि वह कोहबर घर (Kohabar Ghar or Bridal Chamber) को लिख रही है। 

लाक्षणिक रूप से (Metaphorically) शास्त्रीय संस्कृत परंपरा में एक शिल्पकार (Craftsman) अथवा कलाकार की सदैव भगवान के साथ तुलना की जाती है। या यूं कहें कि उन्हें भगवान के रूप में देखा जाता है। किसी भी उचित चीज के सृजनकर्ता को भारत में सद्भाव के नजरिये से देखने की यह अनूठी परंपरा सदियों से विद्यमान रही है। 

हिन्दूवाद में, ईश्वर विष्णु के हजारों नाम हैं, जिनमें से कई कला की गतिविधि की तरफ इशारा करते हैं। इस्लाम में, अल्लाह के सैकड़ों नामों में से एक ‘मुसव्वर’ (Musawwer) है जिसका अर्थ ‘कलाकार’ के रूप में लिया जाता है। संस्कृत शब्द कला (Art) का मतलब दैवीय गुणों (Divine Attributes) से है। परंपरागत रूप से भारत एक ऐसा देश रहा है जहां कला को संपूर्णता, व समग्रता में देखा जाता रहा है। विभिन्न कलाओं में भेद नहीं किया गया है। 

यहां 18 या अधिक पेशेवर कलाओं (Silpa) और 64 वोकेशनल आर्ट्स कुशल गतिविधियों का प्रतिनिधित्व करती हैं। एक चित्रकार और मूर्तिकार में भेद नहीं किया गया है। दोनों को ही शिल्पी अथवा कारीगर के रूप में जाना जाता है। शिल्प शब्द को अश्वलायन श्रौतसूत्र (Asvalayana Srautasutra) में एक ‘उत्सव संबंधी अथवा आनुष्ठानिक कृत्य’ माना गया है और इस अर्थ में यह करु (Karu) के निकट है जिसे वैदिक संदर्भ में ईश्वर की रचना ‘विश्वकर्मा’ के रूप में देखा गया है। इसे धातु करमार के रूप में भी उल्लिखित किया गया है जबकि ऋगवेद, अथर्ववेद और मनु के अनुसार केवल करमार (Karmara) से आशय है दस्तकार, शिल्पकार एवं कारीगर। धातु अथवा कच्चे पदार्थों से चीजों को बनाने वाले को विश्वकर्मा कहा गया है। ऋगवेद में सृजन के इस कृत्य को संघमान (Sanghaman) के रूप में जाना गया है।

अमीर खुसरो जो कि 13वीं शतब्दी का एक सूफी दार्शनिक और भारत का कवि था, एक बार ईरान गया। ईरान में उसे अपना परिचय देने को कहा गया। इस पर खुसरो का जवाब था कि, "आप लोग मुझे खुद का परिचय देने को क्यों कह रहे हो? "मैं भारत का एक तोता हूँ।" खुसरो का यह जवाब भारतीय कला, संस्कृति और सर्जनात्मक सभ्यता की इंद्रधनुषी आभा का प्रतिनिधित्व करता है। इसी तरह एक बार भारतीयों की अद्वितीय शिल्पकलाकारी को मान्यता देते हुए मुहम्मद गोरी ने कहा था कि "मैने सुना है कि लोगों का एक ऐसा देश हैं जहाँ पहाड़ स्वर्ण से बने हुए हैं, कृषि योग्य भूमियों को मखमल बना दिया गया है और इस भूमि के बच्चे जिस गेंद के खिलौने खेलते हैं, वे हीरों से बने हुए हैं।" 

इसी प्रकार काशी की बुनाई (Weaving) भारत के प्राचीन और पवित्र ग्रंथों में अभिलेखित की गयी है। वेदों में काशी वस्त्र का उल्लेख है। यह कहा जाता है कि गौतम बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद, उनके मृत शरीर को ‘काशी वस्त्र’ में लपेटा गया था। \

भारतीय शिल्पकला को वैश्विक पहचान

भारतीय शिल्पकला और शिल्पकारों की अनूठी मेहनत का सम्मान और उसकी पहचान समय-समय पर क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और वैश्विक स्तरों पर होती रही है। नवंबर, 2014 में इसी क्रम में पंजाब की पीतल शिल्पकला (Bronze Sculpture Art) को यूनेस्को की सूची में शामिल किया गया है। पंजाब के अमृतसर जिले के जंडियाला गुरु के ठठेरा समुदाय (Thatheras Community) की "पंरपरागत पीतल और तांबे के बर्तनों को बनाने की परंपरागत तकनीक" को यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत, 2014 की सूची (List of Intangible Cultural Heritge, 2014) में शामिल किया गया है।

ध्यातव्य है कि जंडियाला गुरु में शिल्पियों (ठठेरों) की इस बस्ती की स्थापना सिख शासक महाराजा रणजीत सिंह ने की थी। उन्होंने कश्मीर के शिल्पकारों को पंजाब में बसने के लिए प्रेरित किया था। 

केन्द्रीय संस्कृति मंत्रालय की ओर से जारी सूचना के अनुसार शिल्पकार (ठठेरा) बर्तन बनाने की इस परंपरागत तकनीक का उपयोगितावादी (Utilitarian) और कर्मकांडीय दोनों दृष्टियों से महत्त्व है। ठठेरों द्वारा बर्तन बनाने के लिए अपनायी जाने वाली इस तकनीक की विशिष्टता यह है कि इनके द्वारा आयुर्वेद पद्धति के अनुरूप धातुओं, तांबा, जस्ता, टिन के मिश्रण का प्रयोग किया जाता है। यूनेस्को ने पंजाब की इस विशिष्ट शिल्पकला के बारे में किये गये वर्णन में कहा है कि पंजाब में ठठेरा समुदाय में ऐसा विश्वास है कि पीतल, तांबा व कुछ निश्चित मिश्रधातुओं (Alloy) का बर्तन बनाने में प्रयोग करना स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है। इन बर्तनों को बनाने की प्रक्रिया की शुरूआत धातुओं के ठंडे टुकड़े (Cooled Cakes of Metal) जिन्हें पतले प्लेटों में चपटा किया जाता है और फिर हथौड़े से पीटकर आकार दिया जाता है के साथ होती है, और इसके साथ ही छोटी कटोरियाँ (Small Bowls), तश्तरियाँ, जल और दुध के लिए बड़े पात्र, बड़ी खाना पकाने की सीटी और अन्य शिल्पकृति (Artefact) बनाया जाता है। इस सबके लिए बहुत सावधानी से तापमान पर नियंत्रण रखना पड़ता है। कालीन बुनाई एक महत्त्वपूर्ण शिल्प कार्य है जो भारत में श्रीनगर, जयपुर, अमृतसर, मिर्जापुर, आगरा, वारंगल और एलुरु में महत्त्वपूर्ण रूप में संपन्न किये जाते हैं। भारत की बनारसी साड़ियां विश्व भर में प्रसिद्ध हैं और कुलीन महिलाओं की खासी पसंद हैं। इसी प्रकार से दक्षिण भारत में निर्मित कांजीवरम अथवा कांचीपुरम साड़ी का अपना अलग महत्त्व और आकर्षण है। कांच के बने सामान, चूड़ियां आदि भारतीय शिल्प कार्य को काफी विशिष्ट बना देते हैं।

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