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आंतकवाद : अवधारणा तथा नयी उभरती वैश्विक प्रवृत्तियां

Posted By : Mr. Vivek Ojha     Posted Date : Mar 17,15   Hits : 7621    



‘रोमैन्टिक्स एैट वारः ग्लोरी एंड गिल्ट इन दि एज ऑफ टेरोरिज्म’
नामक पुस्तक में कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जार्ज पी. फ्लेचर ने आतंकवाद को एक सार्वकालिक घटना के रूप में बताते हुए कहा है कि, प्रत्येक युग का अपना एक शत्रु होता है। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान फाँसीवादियों ने बुरे कृत्य किये, वहीं द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान साम्यवादी सभ्यता के दुश्मन (Nemisis) बने और आज शीतयुद्धोत्तर विश्व में आतंकवादी हिंसा और आतंक के प्राधिकृत स्वामी बन बैठे हैं। वस्तुतः आंतकवाद कोई दार्शनिक सिद्धांत नहीं है, यह एक साधन है, जिसके मूल में किसी सामाजिक या राजनीतिक परिवर्तन की आकांक्षा निहित रहती है। यह एक हिंसक नीति है जिसमें हिंसा के माध्यम से समाज में आतंक फैलाया जाता है। आतंकवाद अपने स्वरूप और प्रकृति में विश्वव्यापी हो गया है। आतंकवादी आज विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय अलगाववादियों, उग्रवादियों, विद्रोही समूहों से गठजोड़ कर अपना दायरा बढ़ा रहे हैं। एशिया से लेकर अफ्रीकी महाद्वीप में इस गठजोड़ के प्रमाण मिल रहें हैं। ताजातरीन उदाहरण अरब प्रायद्वीप के दक्षिण पश्चिम बिंदु पर स्थित देश यमन का लिया जा सकता है जहाँ अल कायदा इन अरेबियन पेनिनसुला उत्तरी यमन में सक्रिय हूती विद्रोहियों के साथ गठजोड़ कर चुका है। ऐसे विद्रोही समूहों को अलकायदा प्रशिक्षित करता है और उन्हें आत्मघाती दस्तों या फिदायीन के रूप में विकसित करने की चालें चलता है। यद्यपि आतंकवाद की कोई सर्वमान्य परिभाषा नहीं है, तथापि विश्व में आतंकवाद का इतिहास बहुत पुराना है। शाब्दिक दृष्टि से आतंकवाद शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम ब्रूसेल्स में दण्ड विधान को समेकित करने के लिए 1931 में बुलाये गये तीसरे सम्मेलन में किया गया था जिसके अनुसार आतंकवाद का अभिप्राय "जीवन, भौतिक अखण्डता अथवा मानव स्वाथ्य को खतरे में डालने से था। ब्रूसेल्स सम्मेलन के निष्कर्षों के अनुसार, आंतकवाद का आशय बड़े पैमाने पर सम्पत्ति को हानि पहुंचाने वाला कार्य करके जानबूझकर भय का वातावरण उत्पन्न करना था। इसके अलावा द इंटरनेशनल एनसाइक्लोपीडिया ऑफ सोशल साइन्सेज के अनुसार, हिंसा के व्यवस्थित प्रयोग करके एक संगठित समूह या दल द्वारा अपने लक्ष्यों की प्राप्ति ही आतंकवाद है।


सामान्यतः आतंकवाद का सरल अर्थ भय उत्पन्न कर अपने उद्देश्य की पूर्ति करना है। यह उद्देश्य राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक एवं व्यक्तिगत हो सकते हैं। अतः आतंकवाद कोई विचारधारा या सिद्धांत नहीं अपितु एक तरीका, एक प्रक्रिया या फिर एक उपकरण है जिसका प्रयोग कर कोई भी राज्य, राजनीतिक संगठन, स्वतंत्रतावादी समूह, अलगाववादी संगठन, जातीय या धार्मिक उन्मादी अपने उद्देश्य को प्राप्त करना चाहते हैं।

किसी व्यक्ति अथवा संगठन द्वारा व्यापक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेक देशों में से किसी एक समानता या उद्देश्यों को ध्यान में रखकर जब आतंकवादी कार्यवाहियों को कार्यान्वित किया जाता है तो उसे अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद कहा जाता है। जब आतंकवादी संगठन परस्पर संबंध स्थापित कर एक दूसरे के साथ सहयोग कर लाभ प्राप्ति में सहायक होते हैं तब यह कहा जाता है कि आतंकवाद का वैश्वीकरण हो गया है। अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद के प्रमुख अध्येता ब्रिया कोजर का मानना है कि 20वीं शताब्दी का आतंकवाद अपने स्वरूप में विश्वपरक है।
 

आतंकवाद की नयी उभरती वैश्विक प्रवृत्तियां

 9/11 और 26/11 की क्रमशः अमेरिका व भारत में घटित आतंकी घटनाओं ने वैश्विक आतंकवाद की भयावहता की समूची तस्वीर को विश्व समुदाय के समक्ष पेश किया। अमेरिका व नाटो के माध्यम से अफगानिस्तान में तालिबानी (अलकायदा आतंकवादियों) लड़ाकों को हर संभव सबक सिखाने का प्रयास किया गया। वैचारिक व धर्मशास्त्रीय (Theological) पूर्वाग्रहों के आधार पर आतंकी हमलों को उत्प्रेरित करने में आतंक के सौदागरों ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी और आज भी इस्लाम व धार्मिक संदर्भों की भ्रामक, अवैध और स्वार्थपूर्ण व्याख्या कर हिंसक आतंकी कृत्य के लिए युवाओं को प्रेरित किया जाता है। पाकिस्तान के उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत, स्वात घाटी और उससे जुड़े जनजातीय क्षेत्रों में बेरोजगार, निर्धन जनजातीय को थोड़े-बहुत प्रलोभनों के साथ आतंकवादी कृत्य को अंजाम देने के लिए तैयार कर लिया जाता है। 

वैश्विक आतंकवाद की एक नयी प्रवृत्ति यह है कि आज पाकिस्तान व अफगानिस्तान के अलावा खाड़ी देश, अफ्रीकी देश व मध्य एशियाई देशों में आतंकवाद ने अपनी पैठ बना ली है। इस संदर्भ में विश्व के कुछ प्रमुख क्षेत्रों में सक्रिय आतंकी संगठन व उनकी कार्यप्रणाली से संबंधित विवरण निम्नवत् हैः 

(1) इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एण्ड सीरीया 

इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एण्ड सीरिया (ISIS) वर्तमान में सीरिया व ईराक में आतंक पैदा करने वाला हिंसक आतंकवादी समूह है। इसे  ‘इस्लामिक स्टेट’ अथवा इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एण्ड लेवांत (ISIL) के नाम से भी जाना जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य इराक व सीरिया के बड़े भू-भाग पर कब्जा कर खलीफा राज्य यानी शरिया पर आधारित शासन प्रणाली की स्थापना करना हैं। अबू बकर अल बगदादी नामक एक ईराकी के नेतृत्व वाला आईएसआईएस मूल रूप में इराक में एक अल-कायदा समूह था। जैसे ही सीरिया में गृहयुद्ध ने गति पकड़ी, इसने सीरिया के संघर्ष में अपने को संलग्न कर लिया। उल्लेखनीय है कि अबु मुहम्मद अल जौलानी जो कि इस्लामी स्टेट ऑफ ईराक (ISI) का सदस्य था, ने वर्ष 2011 के मध्य में जबात अल जबात अल नुसरा (Jabhat al-Jabhat al-Nusra) का गठन किया था जो सीरियाई युद्ध में प्रमुख जिहादी समूह बना। जौलानी ने आईएसआई और अबू बकर बगदादी दोनों से ही धन और समर्थन प्राप्त किया। यह ध्यान देने योग्य है कि अबू बकर बगदादी जो कि तेजी से शक्तिशाली और प्रभावी होते जा रहे जबात अल नुसरा से भी अधिक प्रभाव और ख्याति प्राप्त करना चाहता था, ने 2013 में आईएसआईएस का गठन किया। यह अपेक्षाकृत अधिक हिंसक और क्रूर कार्य प्रणाली के साथ सामने आया। इसके पीछे अलकायदा का हाथ था, जिसके प्रमुख जवाहिरी ने आईएसआईएस को सीरिया छोड़कर ईराक में सक्रिय होने के निर्देश दिये थे। इस समय तक आईएसआईएस सीरिया में जबात अल नुसरा और उसके सहयोगियों के चलते अपना आधार खो चुका था। इस आतंकी संगठन ने ईराक और सीरिया में प्रमुखतया कुर्दों, याजिदी अल्पसंख्यक समूहों, तुर्कों, शिया मुसलमानों और इसाईयों की हत्या की। इराक के दूसरे सबसे बड़े शहर मोसुल पर कब्जा कर लिया। सीरिया में अलेप्पो के पूर्वी किनारे (Aleppo) से लेकर पश्चिमी ईराक में फल्लुजा (Falluja) और उत्तरी शहर मोसुल पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। 

फरवरी, 2015 में इस्लामिक स्टेट आफ इराक के आतंकियों ने सीरिया के एक गांव पर हमला कर लगभग 90 इसाईयों का अपहरण कर लिया। उत्तर-पूर्वी प्रांत हसाका के पश्चिम में स्थित प्राचीन अल्पसंख्यकों के गांव पर आतंकियों ने हमला कर इस घटना को अंजाम दिया। यह संगठन अमेरिका, ब्रिटेन व लेबनान के पत्रकारों व सैनिकों का गला काट चुका है। आईएसआईएस के सुन्नी लड़ाकों ने कई लेबनानी सैनिकों को अभी बंदी बनाकर रखा है। हाल ही में (फरवरी, 2015) आईएसआईएस ने इराक के अल बगदादी शहर में 45 लोगों को जिंदा जला दिया। ध्याताव्य है अल-बगदादी शहर अति संवेदनशील अन-अल-असद एयर बेस के पास पड़ता है जहां 300 से अधिक अमेरिकी इराकी सैनिकों को ट्रेनिंग दे रहे हैं। 



जर्मन अखबार फ्रेंकफर्टर अल्गेमिन के अनुसार इस्लामिक स्टेट कुर्दिश लड़कों के हर एक शव के बदले 20 हजार डॉलर (तकरीबन 12 लाख रु.) की मांग कर रहा है। इसके अलावा यह भी बताया जा रहा है कि यह संगठन मानव अंगों की तस्करी कर रहा है। मुनाफा कमाने की कला में यह संगठन जिन तौर तरीकों पर काम कर रहा है, यही बात इसे दूसरे संगठनों से अलग करती है। यह संगठन दुनिया का सबसे अमीर आतंकी संगठन है। इसने इराक में सरकार के समानान्तर खुद की सरकार खड़ी कर ली है। पिछले वर्ष ही इस संगठन के पास 2 अरब डॉलर से ज्यादा की संपत्ति थी। इस संगठन ने अगस्त 2014 में ही लगभग एक दर्जन आयल फील्ड पर कब्जा कर लिया था। सीरिया में भी संगठन ने काफी बड़े हिस्से की ऑयल फील्ड पर कब्जा किया है। तेल तस्करी (Oil Smuggling) मानवों की तस्करी, दूकानों में लूट, फिरौती और जबरन वसूली आदि इसकी कमाई का मुख्य जरिया हैं। जब जून, 2014 में इसने मोसुल पर कब्जा किया था, तभी एक साथ करोड़ों रुपये की लूट हुई थी। उल्लेखनीय है कि आईएसआईएस हर दिन तेल बेचकर एक दो मिलियन डॉलर कमाता है।



सीएनएन ने कई स्रोतों से सूचना दी है कि- ज्यादातर तेल उत्तर इराक और सीरिया में आईएस के कब्जे वाले रिफायनरीज और कुओं से आता है। ये आतंकी दक्षिणी तुर्की से भी तेल की तस्करी करते हैं। वे ऐसे लोगों को ऊँचे दामों में तेल बेचते हैं, जिन्हें इसकी सख्त जरूरत होती है। उल्लेखनीय है कि बीते समय में अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने इस्लामिक स्टेट के कब्जे वाले तेल संपत्ति पर हवाई हमले किये है जिससे इन्हें काफी नुकसान पहुंचा है। फॉरेन पालिसी मैगजीन के मुताबिक, यह संगठन सीरिया से हर दिन 44 हजार बैरल और इराक से 4 हजार बैरल तेल निकालता है। इस तेल के धंधे से ही आईएस ने खुद पश्चिम और उत्तर इराक में सुन्नी सत्ता यानी इस्लामिक स्टेट खड़ा किया है। वस्तुतः इस संगठन के कब्जे मे इराक और सीरिया के 60 लाख लोग हैं। इतने सारे लोगों को तेल की जरूरत पड़ती है। इससे आई.एस की फंडिंग में किसी तरह की कमी नहीं आने पाती। इसी बल पर आईएसआईएस ने खुद को संप्रभु राज्य के रूप में घोषित किया है। गंभीर बात यह है कि जिस तरीके से चीन, काकेशस, लीबिया, मिस्त्र, दक्षिण पूर्व एशिया या अन्य क्षेत्रों से इस्लामिक स्टेट को समर्थन मिल रहा है, उससे वह विश्व समुदाय के लिए अगला अफगानिस्तान या पाकिस्तान का ‘फाटा’ साबित हो सकता है। 
 

(2) आतंकी संगठन बोको हराम

नाइजीरियाई आतंकी संगठन बोको हराम अफ्रीकी महाद्वीप में प्रमुख आतंकवादी संगठन के रूप में सक्रिय है। अफ्रीका की सर्वाधिक घनी आबादी वाले देश में युवा लोकतंत्र को झटके देने वाला यह आतंकवादी संगठन विशेष रूप से नाईजीरियाई इसाईयों को शिकार बनाकर उनकी हत्याएं करता है। बोको हराम नाइजीरिया, नाइजर व बेनिन में बोली जाने वाली हौसा भाषा (Hausa Language) के समूह के रूप में जाना जाता है जिसे अरबी भाषा में ‘जमातू अहलिस सुन्ना लिद्दा अवाती वल जिहाद’ (यानि ऐसे लोग जो  पैगम्बर मुहम्मद की शिक्षाओं और जिहाद के प्रति प्रतिबद्ध और समर्पित हैं) के नाम से जानते हैं। उत्तरी नाइजीरिया के मुस्लिमों ने इस नाम को गढ़ा जो कालांतर में मीडिया द्वारा बोको हराम (यानि पश्चिमी शिक्षा निषिद्ध है) के नाम से जाना गया। बोको हराम के शुरूआती नेता मुहम्मद युसूफ की मुख्य सीख व शिक्षाओं के अनुसार हौसा भाषा में ‘बोको’ जिसका मतलब पश्चिमी शैली की शिक्षा है इस्लाम के तहत हराम (निषिद्ध) है। मुहम्मद युसूफ के अनुसार सरकारी पद धारण करना धार्मिक रूप से निषिद्ध (Forbidden) है। 1990 के दशक के मध्य में कई युवा नाइजीरियाई पादरी (Clerics) जिन्होंने सउदी अरब के इस्लाम की बहाबी (Wahhabi) अथवा सलाफी (Salafi) शाखा को अपना लिया था, को मुहम्मद युसूफ द्वारा नाइजीरिया के मुस्लिमों से बलपूर्वक समाप्त करने को कहा गया। बोको हराम आज जिस सक्रियता की स्थिति में है उसके बीज मूलतः वर्ष 2009 में पड़े। इस वर्ष मोहम्मद युसूफ के समर्थक, अनुसरणकर्ताओं के एक समूह को मैदुगुरी नामक शहर में पुलिस द्वारा रोक लिया गया जो कि बोको हराम का पारंपरिक घर (Traditional Home) था। ये समर्थक एक कामरेड को दफनाने जा रहे थे। पुलिस अधिकारियों ने एक विशेष अभियान के तहत उत्तरपूर्वी बोर्नो राज्य में बढ़ते हिंसा व अपराध को रोकने का लक्ष्य बनाया और नवयुवकों से हेलमेट लगाकर ही मोटरसाइकल चलाने वाले कानून का पालन करने की बात कही। बोको हराम अथवा युसूफ के समर्थकों ने इस कानून को मानने से इंकार कर दिया। इससे उपजे संघर्ष में कई नागरिक मारे गये और कई घायल हुए। अब युसूफ के नेतृत्व में सशस्त्र संघर्ष जारी हुआ। जेलों, सरकारी भवनों और पुलिस स्टेशनों पर हमले किये गये। शीघ्र ही उत्तरी नाइजीरिया के 5 राज्यों में यह संघर्ष फैल गया। संघीय सरकार ने इसके खिलाफ कड़ा रुख अपनाया। इसी बीच मुहम्मद युसूफ की पुलिस हिरासत में हत्या हो गयी। संघर्ष में मौतें होती रहीं और नाइजीरियाई सरकार ने बोको हराम पर प्रतिबंध लगा दिया, इसकी मस्जिदें गिरा दी गयी और जीवित बचे सदस्य छितर-बितर गये और कुछ सरकारी कठोरता के चलते भूमिगत हो गये। 

बोको हराम की पुनः वापसी अथवा उसके सक्रियता का दौर एक बार फिर 2010 के मध्य में शुरू हुआ जब नाइजीरिया के मुस्लिम बाहुल्य उत्तरी क्षेत्र में हिंसा का तूफान सा उठ खड़ा हुआ। कई चर्चों को क्रिसमस डे के दिन बम से उड़ा दिया गया   और इसाईयों व मुस्लिमों के मध्य संघर्ष शुरू हुआ। बोको हराम के लड़ाकों ने पार्टी कार्यालयों पर बम विस्फोट किये और कई सरकारी अधिकारियों को मार डाला। इसके बाद बोको हराम द्वारा राष्ट्रीय पुलिस मुख्यालयों, अबुजा में संयुक्त राष्ट्र संघ के कार्यालय के पास बम धमाकों की झड़ी लगा दी गयी। अगले वर्ष फिर क्रिसमस दिवस पर नाइजीरियाई आतंकी संगठन बोको हराम ने चर्चों को अपना निशाना बनाया। 2011 में संघीय सरकार की सेनाओं ने उत्तरपूर्वी नाइजीरिया में बोको हराम की गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए प्रयास किये। अगस्त 2011 में अमेरिकी सेना के अफ्रीकी कमांड के प्रमुख जनरल कार्टर हैम ने स्पष्ट किया कि बोको हराम अल्जीरिया स्थित "अल कायदा इन इस्लामिक माघरेब" से गठजोड़ कर रहा है। अमेरिका के आसूचना  संगठनों ने इस बात की भी आशंका जाहिर की कि बोको हराम सोमालिया के अल-शबाब से भी गठजोड़ कर सकता है। कुल मिलाकार देखें तो बोको हराम का मूल और अंतिम उद्देश्य संपूर्ण नाइजीरिया में इस्लामिक राज्य की स्थापना करना है। ध्यातव्य है कि उत्तरी नाइजीरिया में मुस्लिमों का प्रभुत्व है तो दक्षिणी में इसाईयों का। 

पश्चिमी समाज से सम्बद्ध किसी भी राजनीतिक व सामाजिक गतिविधि में भाग न लेने, पश्चिमी शिक्षा न ग्रहण करने पर जोर देने वाले बोको हराम ने 14 अप्रैल, 2014 को बंदूक की नोंक पर उत्तरी पूर्वी नाइजीरिया में चिबोक में गवर्नमेंट सेकेण्ड्री स्कूल से कम से कम 300 स्कूली लड़कियों का अपहरण कर लिया। यह लड़कियों को पश्चिमी शिक्षा न देने के विरोध में और उनके अनुसार इस्लामी मान्यताओं व परंपराओं के अनुकूल था। 
 

(3) सोमालियाई आतंकवादी संगठन अल शबाब

 पूर्वी अफ्रीका में स्थित हार्न ऑफ अफ्रीका के भाग के रूप में सोमालिया का राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक भविष्य लंबे समय से अधर में लटका रहा है। इसका कारण यहां की राजनीतिक अस्थिरता और हिंसक आतंकी घटनाएं हैं। इस इस्लामी उग्रवादी, लड़ाका समूह ने सोमालिया में संयुक्त राष्ट्र समर्थित सरकार से संघर्ष किया है। केन्या में भी इसने आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया है। अल-कायदा से इस संगठन का भी जुड़ाव है। 

अरबी में अल शबाब का मतलब होता है ‘युवा’ (The Youth)। यह सोमालिया के वर्तमान में निष्क्रिय यूनियन ऑफ इस्लामिक कोर्ट के कट्टर युवा शाखा (Radical Youth Wing) के रूप में उभरा। इथोपिया की सेनाओं द्वारा बलपूर्वक हटाये जाने से पूर्व 2006 में इसने मोगाडिसू पर नियंत्रण स्थापित कर लिया था। अमेरिका व ब्रिटेन दोनों के ही द्वारा एक आतंकवादी  समूह के रूप में इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। ऐसा माना जाता है अल शबाब में कमोबेश 10 हजार इस्लामिक लड़ाके सक्रिय रूप से अपना योगदान देते हैं। इन लड़ाकों के ऊपर आरोप है कि 1998 में केन्या में अमरीकी दूतावास और 2002 में मोम्बासा में इजरायलियों को निशाना बनाया, केन्या में ग्रेनेड हमले किये। वर्ष 2011 में केन्या की सीमा के चारों ओर अल शबाब ने अपहरणों व कई आतंकी हमलों को अंजाम दिया। केन्या ने भी सोमाली भूक्षेत्र में इन लड़ाकों से निपटने के लिए सेनाएं भेजीं। अल शबाब ने सोमालिया में कठोर इस्लामी कानून को अधिरोपित (Impose) कर रखा है। इस्लाम के सउदी वहाबी संप्रदाय पर आधारित शरिया अथवा इस्लामी कानूनों को अल शबाब ने अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों में लागू कर रखा है। कुछ महिलाओं को इसने व्यभिचार अथवा जारकर्म (Adultery) के दोष के चलते पत्थर बरसा के मार डाला और चोरों व ड्रग डीलरों का अंगविच्छेद (Amputation) कर डालने में कोई हिचक नहीं दिखाई। कुछ क्षेत्रों में तो अल शबाब ने फुटबाल खेलने व पश्चिमी फिल्मों को देखने पर भी रोक लगा दी। वे इस्लामी परंपराओं से कोई छेड़छाड़ भी नहीं चाहते। यहां विभिन्न संस्थाओं का आधुनिकीकरण नहीं हो पाया है, लोकतांत्रिक मूल्यों, मानवाधिकारों, मीडिया, सिविल सोसाइटी के पक्ष में कार्य कर पाने की गुंजाइशें काफी कम है। इथोपिया, सोमालिया व केन्या में अल शबाब की बर्बरता ने पूर्वी अफ्रीका को अस्थिर एवं अशांत बनाये रखा है। सोमालियाई समुद्री दस्युओं ने सागरों में लूटपाट कर इस स्थिति को समय-समय पर गंभीर बनाने में भूमिका निभाई है। खाद्यान्न संकटों, अकाल, आपदा, विस्थापन जैसी तमाम समस्याआं से हार्न ऑफ अफ्रीकन देश पहले से ही जूझ रहे है, इस पर अल शबाब का समय-समय पर कहर आम जनजीवन के लिए काफी घातक हो जाता है। 



हाल ही में अल शबाब एक बार फिर चर्चा में आ गया है। फरवरी 2015 में अल शबाब ने एक वीडियो जारी किया है जिसमें अमेरिका, ब्रिटेन व कनाडा में रहने वाले मुस्लिमों से हाई प्रोफाइल शापिंग मॉलों में आतंकवादी हमले करने का आग्रह किया है। अमेरिका के मिनेसोटा में स्थित हाई प्रोफाइल शांपिग मॉल को उड़ाने का आग्रह मुस्लिमों से विशेष रूप में किया गया है। अल शबाब विश्व समुदाय का ध्यान एक बाद फिर अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए ऐसा कर रहा है। चूंकि आईएसआईएस के उत्थान के बाद से जिस तरह से उसे अंतर्राष्ट्रीय मीडिया का कवरेज मिला है, उससे अल शबाब की गतिविधियों की सूचना गुमनामी में चली गयी थी। मीडिया का ध्यान आकर्षित करने के उद्देश्य से भी अल शबाब ने शापिंग मॉलों को उड़ाने की अपील करने वाले वीडियो को हाल में जारी किया था। अमेरिका के कांउसिल ऑन फॉरेन अफेयर्स के मुताबिक अल शबाब का मुख्य उद्देश्य सोमालिया को कट्टरतावादी इस्लामी राज्य (Fundamentalist Islamic State) के रूप में परिवर्तित करना है। यह फिरौती, अवैध करारोपण व शुल्क के जरिये अपनी वित्तीय आवश्यकताएं पूरी करता है। 
 

अबू सयाफ ग्रुप

 अबू सयाफ ग्रुप (Abu Sayyaf Group) दक्षिणी फिलीपीन्स में सक्रिय सर्वाधिक हिंसक इस्लामी अलगाववादी समूह है जो आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देता रहता है। यह आतंकी संगठन फिलीपीन्स में पश्चिमी मिन्डानाओ और सूलु आर्किपिलागो (Sulu Archipelago) में स्वतंत्र इस्लामी राज्य को बढ़ावा देने का दावा करता है। 1990 के दशक के शुरू में ही यह मोरो नेशनल लिबरेशन फ्रंट से अलग होकर अबू सयाफ ग्रुप के नाम से सक्रिय हुआ। वर्तमान में यह लूटमार, फिरौती, अपहरण, बम विस्फोट और राजनीतिक हत्याओं (Assassinations) में संलग्न हैं। इसका जेम्माह इस्लामिया नामक समूह से गठजोड़ भी है। यह अपने जिहादी एजेंडे को आगे बढ़ाने के मौके की तलाश में सदैव रहता है।  

अल कायदा इन दि लैंड्स ऑफ दि इस्लामिक माघरेब (AQIM)

 यह अल्जीरिया में स्थित एक सुन्नी मुस्लिमों का जिहादी समूह है। मूलरूप से यह 1998 में अल्जीरिया में सर्वाधिक सक्रिय और सबसे बड़े आतंकवादी समूह ‘आर्म्ड इस्लामिक ग्रुप’ के एक धड़े ‘सलाफिस्ट ग्रुप फार प्रीचिंग एण्ड काम्बैट’ के रूप में गठित हुआ था। सितंबर 2006 में यह अलकायदा से मिल गया। वर्ष 2013 के शुरूआत में फ्रांस के नेतृत्व वाले सैन्य हस्तक्षेप के बाद इस आतंकवादी समूह ने उत्तरी माली में अपनी उपस्थिति में कटौती कर अपना दायरा लीबिया और ट्यूनीशिया तक फैलाया। 

कुछ अन्य सक्रिय आतंकवादी समूह और उनकी कार्यप्रणाली का संक्षिप्त बिन्दुवार विवरण निम्नवत् हैः 

  • हक्कानी नेटवर्क एक सुन्नी इस्लामिक लड़ाका (Militant) संगठन है। यह उत्तरी वजीरिस्तान में मुख्य रूप से पैर जमाये हुए हैं। पूर्वी अफगानिस्तान व काबुल में यह सीमा पारीय अभियान को अंजाम देता रहता है। हक्कानी नेटवर्क मूलतः जदरान जनजातियों (Zadran Tribes) के सदस्यों से मिलकर बना है। यह अमेरिका के खिलाफ आतंकी अभियानों को भी अंजाम देने के प्रयास में लगा रहा है। वर्ष 2012 में अमेरिकी सरकार ने इसे विदेशी आतंकवादी संगठन का दर्जा दिया था। 

  • हिजबुल्लाह (Hizballah) को भी एक अत्यंत सक्रिय आंतकवादी संगठन के रूप में मान्यता मिली हैं। लेबनान पर इजरायली हमले के प्रत्युत्तर में वर्ष 1982 में इस संगठन का निर्माण हुआ। शाब्दिक रूप से हिजबुल्लाह का मतलब ‘पार्टी ऑफ गॉड होता है। यह लेबनान स्थित शिया आतंकवादी समूह है और शिया संप्रदाय के वैश्विक सशक्तीकरण की बात करता है। इसने 1980 के दशक में ही अमेरिकी दूतावासों और समुद्री बैरकों में आतंकी हमले करने शुरु कर दिये थे। मूलतः इजरायल के खिलाफ आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने में यह संगठन सक्रिय रूप से लगा हुआ है। 

  • जैश ए मोहम्मद पाकिस्तान में स्थित सक्रिय आतंकवादी संगठन है जिसका मूल उद्देश्य काश्मीर को पाकिस्तान के साथ मिलाना और अफगानिस्तान से विदेशी सेनाओं को हटाना है। इसने खुले तौर पर अमेरिका के खिलाफ जंग छेड़ रखी है। वर्ष 2002 में पाकिस्तान ने इसे गैर कानूनी करार दिया था। 2003 में इसे पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ की हत्या का षड्यंत्र रचने के आरोप में प्रतिबंधित घोषित किया गया था। 

  • लार्ड रेसिसटेन्स आर्मी एक आतंकवादी समूह है जो डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो, दि सेन्ट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक और दक्षिणी सूडान में सक्रिय है। यूगांडा ने इसके खिलाफ 2002 में ऑपरेशन आयरन फीस्ट चलाया था। 

  • अल कायदा इन द अरेबियन पेनिनसुला (AQAP) यह यमन में स्थित एक सुन्नी उग्रवादी समूह है। वर्ष 2008 से इसने विदेशी पर्यटकों और साना में अमेरिकी व इटैलियन दूतावासों पर आतंकी हमले करने शुरू कर दिये। 



वन्य जीव उत्पादों की अवैध तस्करी आतंकवादियों के द्वारा धन प्राप्त करने के प्रमुख साधन के रूप में अपनाया जाने लगा है। दक्षिण सूडान में सक्रिय आतंकी संगठन लार्ड रेसिसटेन्स आर्मी की आय का स्रोत विभिन्न संकटापन्न और अंतर्राष्ट्रीय बाजार में उच्च मांग वाले पशुओं व उनके उत्पादों की तस्करी है। डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगों और सेन्ट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक जैसे देशों में सक्रिय हिंसक मिलिशिया समूह की आय का स्रोत भी यूनेप के अनुसार वन्य जीव उत्पादों की तस्करी ही है। उल्लेखनीय है कि सुडनीज जंजावीड (Sudanese JanJaweed) और सूडान, चाड तथा नाइजर में सक्रिय अन्य संगठित आपराधिक समूह की आय का स्रोत हाथी दांत की तस्करी है। यूनेप की रिपोर्ट के मुताबिक सोमालिया के छोटे बड़े आतंकी समूह ‘चारकोल की तस्करी’ से अपने अभियानों का वित्तीयन (Funding) कर रहे हैं। अल शबाब इनमें सबसे आगे है। यूनेप और इंटरपोल की हालिया रिपोर्ट में आतंकवादी कृत्यों के वित्तीयन के लिए अवैध वन्यजीव उत्पाद व्यापारों को साधन बनाये जाने पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा गया है कि प्रति वर्ष अवैध वन्यजीव व्यापार से 213 बिलियन डॉलर प्राप्त हो रहा है जो वैश्विक आतंकी समूहों और मिलिशिया को फंडिंग कर रहा है। अफ्रीकी देश युगांडा में लार्ड्स रेसिसटेन्स आर्मी’ जैसे आतंकी संगठन आइवोरी (Ivory) की तस्करी से वित्तीय रूप से सुदृढ़ हो रहे हैं। इस प्रकार वित्तीयन के नये-नये तरीके आतंकवाद के नये चेहरों को सामने ला रहे है जिससे निपटने के लिए राष्ट्रों के मध्य वैश्विक स्तर पर सहयोग होना जरूरी है। 

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