प्रिलिम्स फैक्ट्स (23 Mar, 2026)



तरलता प्रबंधन के लिये परिवर्तनीय रेपो दर

स्रोत : बिज़नेस लाइन

चर्चा में क्यों?

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने तीन दिवसीय परिवर्तनीय रेपो दर (VRR) नीलामी के माध्यम से बैंकिंग प्रणाली में 25,000 करोड़ रुपये से अधिक की तरलता प्रवाहित की है।

  • भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने जनवरी 2026 से सरकारी प्रतिभूतियों के खुला बाज़ार परिचालन (OMO) क्रय के माध्यम से बैंकिंग प्रणाली में 3.50 लाख करोड़ रुपये की तरलता प्रवाहित की है। 

परिवर्तनीय रेपो दर (VRR) क्या है?

  • परिचय: परिवर्तनीय रेपो दर (VRR) एक बाज़ार-प्रेरित मौद्रिक नीति उपकरण है, जिसका उपयोग भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा बैंकिंग प्रणाली में अल्पकालिक तरलता प्रदान करने के लिये किया जाता है।
    • सामान्य ‘स्थिर रेपो दर’ से भिन्न, जहाँ ब्याज दर आरबीआई द्वारा पूर्वनिर्धारित होती है (वर्तमान में 5.25%), VRR में ब्याज दर नीलामी प्रक्रिया के माध्यम से निर्धारित की जाती है। 
  • नीलामी तंत्र: परिवर्तनीय रेपो दर (VRR) एक तरलता प्रवाह उपकरण है, जो चलनिधि समायोजन सुविधा (LAF) के तहत संचालित होता है। इसमें बैंक प्रतिस्पर्द्धात्मक रूप से धन के लिये बोली लगाते हैं और कट-ऑफ रेट उस उच्चतम स्वीकृत बोली द्वारा निर्धारित होती है, जो वास्तविक समय में बाज़ार की मांग को दर्शाती है।
    • RBI धन आवंटन प्रक्रिया में सबसे उच्च बोली से आरंभ करता है और अधिसूचित राशि समाप्त होने तक आवंटन करता है।
  • अवधि एवं संपार्श्विक: नीलामी आमतौर पर 1 से 14 दिनों के बीच होती है और इसमें बैंकों को उधार ली गई धनराशि के बदले उपयुक्त सरकारी प्रतिभूतियाँ संपार्श्विक के रूप में प्रस्तुत करनी होती हैं।
  • वीआरआर का महत्त्व: जब भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) बैंकिंग प्रणाली में तरलता की कमी देखता है (जैसे- अग्रिम कर भुगतान या त्योहारों के अवसर पर नकदी निकासी के कारण), तब वह VRR नीलामी की घोषणा करता है। यह निम्नलिखित में सहायक होती है:
    • तरलता प्रबंधन: यह सुनिश्चित करने में सहायता करती है कि भारित औसत कॉल दर (WACR), जो मौद्रिक नीति का संचालनात्मक लक्ष्य है, रेपो दर के अनुरूप बनी रहे।
    • बाज़ार खोज (Market Discovery): यह आरबीआई को सही ब्याज दर का अनुमान लगाने से रोकती है, जिससे बैंकों को अपनी तत्काल आवश्यकताओं के आधार पर धन की वास्तविक लागत को संकेतित करने का अवसर प्राप्त होता है।

परिवर्तनीय रेपो दर (VRR) और स्थिर रेपो दर के बीच अंतर:

विशेषता

परिवर्तनीय रेपो दर (VRR)

स्थिर रेपो दर

ब्याज दर

नीलामी के माध्यम से बाज़ार का निर्धारण किया जाता है ।

आरबीआई द्वारा निर्धारित (नीति दर)।

उद्देश्य

अल्पकालिक तरलता को बेहतर बनाना ।

दीर्घकालिक नीतिगत रुख का संकेत देना ।

लचीलापन

अत्यधिक लचीला, वास्तविक समय की मांग को दर्शाता है।

कम लचीला, सभी के लिये एक ही दर।

नोट: जिस प्रकार VRR धन की आपूर्ति करती है, उसी प्रकार VRRR (परिवर्तनीय रिवर्स रेपो रेट) का उपयोग प्रणाली में अतिरिक्त तरलता को अवशोषित करने के लिये किया जाता है।

चलनिधि समायोजन सुविधा क्या है?

  • परिचय: LAF (चलनिधि समायोजन सुविधा) एक प्रमुख मौद्रिक नीति का ढाँचा है, जिसका उपयोग भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) बैंकिंग सिस्टम में दिन-प्रतिदिन की तरलता असमानताओं के प्रबंधन के लिये करता है।
    • नरसिम्हम समिति (1998) की सिफारिशों के बाद वर्ष 2000 में शुरू की गई यह सुविधा बैंकों को प्रतिभूति पुनर्खरीद समझौतों (रेपो) के माध्यम से धन उधार लेने या अतिरिक्त निधि RBI के पास जमा करने की अनुमति देती है।
  • LAF के मूल घटक: LAF मुख्यतः दो प्रकार के लेन-देन के माध्यम से संचालित होता है:
    • रेपो दर: वह ब्याज दर, जिस पर RBI सरकारी प्रतिभूतियों (G-सेक) की प्रतिभूति के विरुद्ध वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक धन उधार देता है। 
      • यह नीतिगत दर है और अर्थव्यवस्था में तरलता की आपूर्ति के लिये एक उपकरण के रूप में कार्य करती है।
    • रिवर्स रेपो दर: वह ब्याज दर, जिस पर RBI बैंकों से धन उधार लेता है। यह बाज़ार से अतिरिक्त तरलता को अवशोषित करने का एक उपकरण है।
      • अप्रैल 2022 से, स्थायी जमा सुविधा (SDF) ने LAF कॉरिडोर के निचले सिरे पर तरलता अवशोषण के लिये प्राथमिक उपकरण के रूप में निर्धारित रिवर्स रेपो दर को प्रभावी रूप से बदल दिया है।
  • LAF कॉरिडोर: RBI अल्पकालिक ब्याज दरों को स्थिर रखने के लिये एक ‘कॉरिडोर’ बनाए रखता है। यह कॉरिडोर सुनिश्चित करता है कि भारित औसत कॉल दर (WACR), वह दर जिस पर बैंक एक-दूसरे को शीघतिशीघ्र ऋण देते हैं, पॉलिसी रेपो रेट के करीब बनी रहे।
    • सीमा (ऊपरी सीमा): सीमांत स्थायी सुविधा (MSF)। यह एक ‘पेनल रेट’ (आमतौर पर रेपो से 25 आधार अंक ऊपर) है, जिस पर बैंक अपने वैधानिक तरलता अनुपात (SLR) कोटा में से आपातकालीन निधि ऋण के रूप में ले सकते हैं।
    • केंद्र: पॉलिसी रेपो रेट
    • फ्लोर (निचली सीमा): स्थायी जमा सुविधा (SDF)। यह बैंकों को बिना किसी प्रतिभूति के अतिरिक्त धन RBI के पास जमा करने की अनुमति प्रदान करती है (आमतौर पर रेपो से 25 आधार अंक नीचे)।

खुला बाज़ार परिचालन (OMO)

  • परिचय: OMO मौद्रिक नीति का एक मात्रात्मक उपकरण है, जिसमें सरकारी प्रतिभूतियों (G-सेक), जिसमें दिनांकित प्रतिभूतियाँ और ट्रेजरी बिल शामिल हैं, की खरीद और बिक्री समाहित है।
  • कार्य: प्रतिभूतियों की क्रय बैंकिंग प्रणाली में तरलता की आपूर्ति करता है (विस्तारात्मक प्रभाव), हालाँकि प्रतिभूतियों की बिक्री तरलता को अवशोषित करती है (संकुचनात्मक प्रभाव), जिससे मुद्रा आपूर्ति प्रभावित होती है।
  • भारत में क्रियान्वयन: RBI बैंकों और प्राथमिक डीलरों के साथ या तो नीलामी या प्रत्यक्ष लेन-देन का उपयोग करके खुला बाज़ार परिचालन (OMO) करता है। इन गतिविधियों को RBI के कोर बैंकिंग प्लेटफॉर्म ई-कुबेर सिस्टम के माध्यम से इलेक्ट्रॉनिक रूप से प्रबंधित किया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. स्थिर रेपो दर और परिवर्तनीय रेपो दर (VRR) के बीच मुख्य अंतर क्या है?
स्थिर रेपो दर में पूर्व-निर्धारित नीति दर का उपयोग किया जाता है, ताकि दीर्घकालिक नीति रुख का संकेत दिया जा सके, जबकि परिवर्तनीय रेपो दर (VRR) में बाज़ार-निर्धारित नीलामी दरों का उपयोग करके अल्पकालिक तरलता को सूक्ष्म रूप से समायोजित किया जाता है।

2. स्थायी जमा सुविधा (SDF)  LAF कॉरिडोर में किस प्रकार कार्य करती है?
स्थायी जमा सुविधा (SDF) चलनिधि समायोजन सुविधा (LAF) कॉरिडोर की निचली सीमा (Floor) निर्धारित करती है। इसके माध्यम से बैंक अपनी अतिरिक्त तरलता (Excess Liquidity) को बिना किसी संपार्श्विक (Collateral) के RBI के पास जमा कर सकते हैं, जिस पर उन्हें सामान्यतः रेपो दर से 25 बेसिस पॉइंट (0.25%) कम ब्याज मिलता है।

3. भारित औसत कॉल दर (WACR) को मौद्रिक नीति का परिचालन लक्ष्य क्यों माना जाता है?
भारित औसत कॉल दर (WACR) इंटरबैंक बाज़ार में ओवरनाइट फंड्स की वास्तविक कीमत को दर्शाती है, RBI अपनी चलनिधि समायोजन सुविधा (LAF) के विभिन्न उपकरणों का सक्रिय रूप से उपयोग करता है, ताकि भारित औसत कॉल दर (WACR) को पॉलिसी रेपो दर के यथासंभव समीप बनाए रखा जा सके।

4. वाणिज्यिक बैंकों के लिये सीमांत स्थायी सुविधा (MSF) का क्या महत्त्व है?
यह LAF कॉरिडोर की ऊपरी सीमा (सीलिंग) के रूप में कार्य करती है और एक ‘सेफ्टी वॉल्व’ प्रदान करती  है, जहाँ बैंक अपने वैधानिक तरलता अनुपात (SLR) में से आपातकालीन फंड उधार ले सकते हैं।

        



UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)

प्रश्न. यदि भारतीय रिज़र्व बैंक एक विस्तारवादी मौद्रिक नीति अपनाने का निर्णय लेता है, तो वह निम्नलिखित में से क्या नहीं करेगा? (2020)

1. वैधानिक तरलता अनुपात में कटौती और अनुकूलन

2. सीमांत स्थायी सुविधा दर में बढ़ोतरी

3. बैंक रेट और रेपो रेट में कटौती

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 2

(c) केवल 1 और 3

(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)


प्रश्न. मौद्रिक नीति समिति (MPC) के संबंध में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (2017)

1. यह आरबीआई की बेंचमार्क ब्याज दरों को तय करती है।

2. यह आरबीआई के गवर्नर सहित 12 सदस्यीय निकाय है, जिसका प्रतिवर्ष पुनर्गठन किया जाता है।

3. यह केंद्रीय वित्त मंत्री की अध्यक्षता में कार्य करती है।

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1

(b) केवल 1 और 2

(c) केवल 3

(d) केवल 2 और 3

उत्तर: (a)


एथिल क्लोरोफॉर्मेट की एंटी-डंपिंग जाँच

स्रोत: टाइम्स ऑफ इंडिया

चर्चा में क्यों?

व्यापार उपचार महानिदेशालय (DGTR), जो वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत आता है, ने घरेलू रासायनिक उद्योग की सुरक्षा के लिये चीन से कथित एथिल क्लोरोफॉर्मेट के अवैध आयात (डंपिंग) की जाँच शुरू की है।

  • संबंधित विकास में DGTR ने चीन, रूस तथा संयुक्त अरब अमीरात से आयात होने वाले हेक्सामाइन, जो एक और रासायनिक इंटरमीडिएट है, के खिलाफ एक अलग एंटी-डंपिंग जाँच भी शुरू की है।

एथिल क्लोरोफॉर्मेट क्या है?

  • परिचय: एथिल क्लोरोफॉर्मेट एक अत्यंत प्रतिक्रियाशील कार्बनिक यौगिक है। यह क्लोरोफॉर्मिक अम्ल का एथिल एस्टर है और मुख्य रूप से कार्बनिक संश्लेषण में बहुमुखी अभिकर्मक (Versatile Reagent) के रूप में उपयोग किया जाता है, विशेष रूप से फार्मास्यूटिकल तथा कृषि रसायन उद्योगों में।
    • जब यह पानी के साथ प्रतिक्रिया (हाइड्रोलिसिस) करता है, तो यह इथेनॉल, कार्बन डाइऑक्साइड और हाइड्रोक्लोरिक एसिड में विघटित हो जाता है।
  • मुख्य अनुप्रयोग:
    • फार्मास्यूटिकल्स का संश्लेषण: यह विभिन्न दवाओं के उत्पादन में एक महत्त्वपूर्ण मध्यवर्ती यौगिक है, जिसमें संशोधित पेनिसिलिन और खदानों में अयस्क विभाजन एजेंट शामिल हैं।
    • औद्योगिक उपयोग: यह PVC का स्थिरीकरणकर्त्ता के रूप में कार्य करता है और जैविक रसायन, जैसे- हर्बिसाइड्स तथा कीटनाशक, के संश्लेषण में उपयोग किया जाता है।
    • कार्बोक्सिलिक अम्लों की सक्रियता: यह कार्बोक्सिलिक अम्लों के साथ प्रतिक्रिया करके मिश्रित एनहाइड्राइड्स बनाता है, जो अत्यधिक प्रतिक्रियाशील मध्यवर्ती यौगिक होते हैं और इन्हें एस्टर या एमाइड बनाने के लिये उपयोग किया जाता है।
  • जोखिम: 
    • विषाक्तता: यह सांस के ज़रिये शरीर में जाने पर प्राणघातक हो सकता है और इसके सेवन (गले से नीचे उतरने) से गंभीर स्वास्थ्य संबंधी जटिलताएँ उत्पन्न हो सकती हैं। अल्पकालिक संपर्क से फुफ्फुसीय जलभराव (फेफड़ों में तरल पदार्थ) हो सकता है।
    • संक्षारीयता: यह मज़बूत आँसू-गैस है और त्वचा, आँखों एवं श्लेष्म झिल्लियों पर एसिड जैसी जलन पैदा करता है।
    • ज्वलनशीलता: यह अत्यधिक ज्वलनशील तरल है और हवा के साथ मिलकर विस्फोटक मिश्रण बना सकता है।

हेक्सामाइन एक सफेद क्रिस्टलीय, अत्यधिक घुलनशील हेटरोसायक्लिक कार्बनिक यौगिक है। इसे फॉर्मल्डिहाइड और अमोनिया से उत्पादित किया जाता है तथा यह रेजिन, प्लास्टिक, फार्मास्यूटिकल्स एवं रबर एडिटिव्स बनाने में व्यापक रूप से उपयोग होता है।

  • यह फ्यूल टैबलेट (स्वच्छ दहन) के रूप में भी काम करता है और दवा तथा कार्बनिक रसायन विज्ञान में भी इसके उपयोग हैं, हालाँकि यह विषैला और जलन पैदा करने वाला हो सकता है।

एंटी-डंपिंग ड्यूटी क्या है?

  • परिचय: एंटी-डंपिंग ड्यूटी (ADD) एक सुरक्षात्मक शुल्क है, जिसे सरकार उन विदेशी आयातों पर लगाती है, जिन्हें वह न्यायसंगत बाज़ार मूल्य से कम मूल्य (इस प्रथा को ‘डंपिंग’ कहा जाता है) पर बेचा जा रहा मानती है।
    • इसके अलावा काउंटरवेलिंग ड्यूटी भी होती है, जो उन सब्सिडियों के प्रभाव को समाप्त करने के लिये लगाई जाती है, जो निर्यातक देशों द्वारा दी जाती हैं। ये उपाय मिलकर अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में समान प्रतिस्पर्द्धा का स्तर सुनिश्चित करते हैं।
  • कानूनी आधार: इसे WTO के एंटी-डंपिंग समझौते द्वारा नियंत्रित किया जाता है। भारत में इसे वाणिज्य मंत्रालय के अंतर्गत व्यापार उपचार महानिदेशालय (DGTR) द्वारा प्रबंधित किया जाता है, हालाँकि DGTR द्वारा अनुशंसित शुल्क लगाने का अंतिम निर्णय वित्त मंत्रालय द्वारा लिया जाता है।
    • WTO समझौते के तहत, निर्यात मूल्य का 2% तक डी मिनिमिस (न्यूनतम स्तर) डंपिंग मार्जिन सीमा निर्धारित की गई है और यदि डंपिंग मार्जिन इस सीमा से नीचे है तो कोई एंटी-डंपिंग शुल्क नहीं लगाया जा सकता है।
    • यह डी मिनिमिस सीमा विकासशील और साथ ही विकसित देशों से निर्यात के लिये समान है।

Anti_Dumping_Duty

एंटी-डंपिंग ड्यूटी और काउंटरवेलिंग ड्यूटी में क्या अंतर है? 

विशेषता

एंटी-डंपिंग ड्यूटी (ADD)

काउंटरवेलिंग ड्यूटी (CVD)

लक्ष्य

निज़ी कंपनियों द्वारा अनुचित मूल्य निर्धारण।

विदेशी सरकारों द्वारा प्रदान की गई अनुचित सब्सिडी।

उद्देश्य

मूल्य अंतर को कम करना और ‘प्रिडेटरी प्राइसिंग’ को रोकना, जो स्थानीय उद्योग को नुकसान पहुँचाता है।

सरकारी वित्तीय सहायता के माध्यम से प्राप्त अनुचित लाभ को निष्प्रभावी करना।

WTO समझौता

एंटी-डंपिंग समझौते द्वारा शासित।

सब्सिडी और प्रतिकारी उपायों पर समझौते (SCM) द्वारा शासित।

ड्यूटी कैलकुलेशन

डंपिंग मार्जिन के बराबर (सामान्य मूल्य और निर्यात मूल्य के बीच का अंतर, तुलनीयता के लिये समायोजित)। शुल्क को इसी मार्जिन पर सीमित रखा जाता है।

निर्यातित उत्पाद के लिये उत्तरदायी सब्सिडी की राशि (सब्सिडी मार्जिन) के बराबर। शुल्क इस राशि पर सीमित होता है।

जाँच की आवश्यकता

इसकी आवश्यकता है: (1) डंपिंग, (2) घरेलू उद्योग को भौतिक क्षति (या इसका खतरा), और (3) दोनों के बीच कारण संबंध।

इसकी आवश्यकता है: (1) एक विशिष्ट सब्सिडी का अस्तित्व, (2) भौतिक क्षति (या इसका खतरा), और (3) कारण संबंध।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. एंटी-डंपिंग जाँच में ‘डी मिनिमिस’ सीमा क्या है?
यह WTO द्वारा अनिवार्य 2% की सीमा है; यदि डंपिंग मार्जिन निर्यात मूल्य के इस प्रतिशत से कम है, तो कानूनी तौर पर कोई एंटी-डंपिंग शुल्क (ADD) नहीं लगाया जा सकता है।

2. ADD का प्राथमिक कारण CVD से किस प्रकार भिन्न है?
ADD फर्म-स्तरीय प्रिडेटरी प्राइसिंग (घरेलू लागत से कम पर बिक्री) को लक्षित करती  है, जबकि CVD सरकार-स्तरीय सब्सिडी को लक्षित करती है, जो अनुचित प्रतिस्पर्द्धात्मक लाभ प्रदान करती हैं।

3. भारत में व्यापार उपचारात्मक शुल्कों को अधिसूचित करने में कौन-सी नोडल एजेंसियाँ शामिल हैं?
DGTR (वाणिज्य मंत्रालय) जाँच करता है और शुल्क की सिफारिश करता है, जबकि वित्त मंत्रालय अंतिम प्राधिकार है, जो इसे लागू करता है।

4. एथिल क्लोरोफॉर्मेट भारतीय अर्थव्यवस्था के लिये क्यों महत्त्वपूर्ण है?
यह फार्मास्यूटिकल और कृषि-रसायन उद्योगों के लिये एक महत्त्वपूर्ण कार्बनिक मध्यवर्ती के रूप में कार्य करता है, जिससे दवा और कीटनाशक विनिर्माण लागत के लिये इसका मूल्य निर्धारण महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न 

प्रश्न. 'एग्रीमेंट ऑन एग्रीकल्चर', 'एग्रीमेंट ऑन दि एप्लीकेशन ऑफ सैनिटरी एंड फाइटोसैनिटरी मेजर्स' और 'पीस क्लॉज़' शब्द प्रायः समाचारों में किसके मामलों के संदर्भ में आते हैं? (2015) 

(a) खाद्य और कृषि संगठन

(b) जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र का रूपरेखा सम्मेलन

(c) विश्व व्यापार संगठन

(d) संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम

उत्तर: (c)


प्रश्न. निम्नलिखित में से किसके संदर्भ में कभी-कभी समाचारों में 'एम्बर बॉक्स, ब्लू बॉक्स और ग्रीन बॉक्स' शब्द देखने को मिलते हैं? (2016) 

(a) WTO मामला

(b) SAARC मामला

(c) UNFCCC मामला

(d) FTA पर भारत-EU वार्ता 

उत्तर: (a) 


RELIEF योजना और P&I क्लब

स्रोत: द हिंदू 

केंद्र सरकार ने भारतीय निर्यातकों, विशेषरूप से MSME, के लिये संघर्ष-पूर्व दरों पर ऋण बीमा कवर प्रदान करने हेतु 497 करोड़ रुपये की रेसिलिएंस एंड लॉजिस्टिक्स इंटरवेंशन फॉर एक्सपोर्ट फैसिलिटेशन (रिलीफ) योजना शुरू की है। यह योजना उन निर्यातकों के लिये शुरू की गई है, जिनका माल चल रहे पश्चिम एशिया संकट के कारण फँस गया है या जोखिम में है।

  • इसके अतिरिक्त भारत होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते जोखिमों के बीच अपने शिपिंग परिचालनों की सुरक्षा के लिये एक घरेलू संरक्षण एवं क्षतिपूर्ति (P&I) क्लब बनाने की संभावना भी तलाश रहा है।

RELIEF योजना

  • परिचय: इसे वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा भारतीय निर्यातकों को वित्तीय सुरक्षा प्रदान करने और खाड़ी क्षेत्र तथा व्यापक पश्चिम एशिया समुद्री गलियारे में भू-राजनीतिक अस्थिरता के कारण बढ़ते समुद्री जोखिमों का सामना कर रहे निर्यातकों की कठिनाइयों को कम करने के लिये शुरू किया गया है।
  • त्रि-भाग ढाँचा:
    • घटक 1: पहले से ECGC लिमिटेड (निर्यात ऋण गारंटी निगम) कवर रखने वाले निर्यातकों को 14 फरवरी से 15 मार्च, 2026 के बीच जारी खेपों के लिये संकट-पूर्व प्रीमियम दरों को बनाए रखकर सहायता प्रदान करता है। यह युद्ध-संबंधी जोखिमों के लिये 100% तक बढ़ा हुआ कवर प्रदान करेगा।
    • घटक 2: नए निर्यातकों (ऊर्जा माल को छोड़कर) को अगले तीन महीनों (16 मार्च से 15 जून, 2026) के लिये निर्यात ऋण गारंटी निगम (ECGC) बीमा लेने हेतु प्रोत्साहित करता है, जो अधिकतम 95% हानि कवरेज प्रदान करता है।
    • घटक 3: विशेषरूप से उन MSME निर्यातकों को लक्षित करता है, जिनके पास पहले कोई बीमा नहीं था और प्रभावित शिपमेंट्स के लिये प्रति निर्यातक अधिकतम 50 लाख रुपये का कवरेज प्रदान करता है।
  • भू‑भौगोलिक विस्तार: यह प्रावधान पश्चिम एशिया के निर्दिष्ट बाज़ारों—संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सऊदी अरब, कुवैत, कतर, ओमान, बहरीन, इराक, ईरान, इज़रायल और यमन—को होने वाले सभी निर्यातों पर प्रभावी रूप से लागू होता है।

P&I क्लब पहल

  • प्रोटेक्शन और इंडेम्निटी (P&I) क्लब ऐसे सहकारी, गैर-लाभकारी संगठन हैं, जिन्हें जहाज़ मालिकों द्वारा तीसरे पक्ष की समुद्री ज़िम्मेदारियों से बीमा के लिये स्थापित किया जाता है।
    • सामान्य समुद्री बीमा से अलग, ये क्रू मेंबर्स की चोट, प्रदूषण, माल की हानि, टक्कर और कानूनी दायित्व जैसे जोखिमों को भी सुरक्षा प्रदान करते हैं।
    • विश्व के अधिकांश समुद्री जोखिमों को P&I क्लबों के अंतर्राष्ट्रीय समूह द्वारा कवर किया जाता है, जिसमें विश्व के लगभग 90% समुद्री जहाज़ों को बीमा प्रदान किया जाता है।

और पढ़ें: अमेरिका-इज़रायल-ईरान संघर्ष का भारत पर भू-आर्थिक प्रभाव


INS तारागिरि

स्रोत: टाइम्स ऑफ इंडिया

भारतीय नौसेना, INS तारागिरि को कमीशन करने जा रही है, जो प्रोजेक्ट 17A का एक स्टील्थ फ्रिगेट है और यह समुद्री निवारक क्षमता एवं स्वदेशी पोत निर्माण को सशक्त करेगा। यह प्रोजेक्ट 17A के तहत चौथा स्टील्थ फ्रिगेट है, जिसमें उन्नत स्टील्थ विशेषताएँ, हथियार और सेंसर शामिल हैं।

INS तारागिरि  

  • स्वदेशी सामर्थ्य: 75% से अधिक स्वदेशी सामग्री वाले इस पोत का निर्माण मझगाँव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) द्वारा किया गया है तथा इसमें 200 से अधिक सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) की आपूर्ति शृंखला शामिल है, जो रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता (Aatmanirbharta in Defence) पहल के अनुरूप है।
  • स्टील्थ एवं डिज़ाइन: इसमें कम राडार क्रॉस-सेक्शन (RCS) और अधिक चिकनी आकृति है, जो बहुआयामी समुद्री अभियानों के दौरान पहचान से बचने के लिये ‘लीथल स्टील्थ’ प्रदान करती है।
  • हथियार एवं लड़ाकू क्षमता: यह सुपरसोनिक सतह-से-सतह मिसाइलों, मध्यम दूरी की सतह-से-हवा मिसाइलों और विशेषीकृत पनडुब्बीरोधी युद्ध (ASW) उपकरणों से लैस है, जो सभी आधुनिक कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम (CMS) के माध्यम से एकीकृत हैं।
  • प्रेरक प्रणाली: इसमें कंबाइंड डीज़ल या गैस (CODOG) प्रेरक संयंत्र है, जो उच्च गति और दीर्घकालिक क्षमता के साथ बहुउद्देशीय संचालन के लिये डिज़ाइन किया गया है।
  • रणनीतिक भूमिका: लड़ाकू अभियानों के अतिरिक्त, इसका लचीला मिशन प्रोफाइल मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (HADR) और नौसैनिक कूटनीति को भी शामिल करता है तथा यह बढ़ती चीनी नौसैनिक उपस्थिति एवं क्षेत्रीय अस्थिरताओं के प्रति एक सशक्त विकल्प के रूप में कार्य करता है।

प्रोजेक्ट 17A

  • यह भारतीय नौसेना की एक पहल है, जिसके तहत सात उन्नत स्टील्थ गाइडेड-मिसाइल फ्रिगेट्स का निर्माण किया जाएगा।
    • इसमें फ्रिगेट पोत शामिल हैं, जिनमें से प्रत्येक का नाम भारत की प्रमुख पर्वत शृंखलाओं के नाम पर रखा गया है, जैसे कि INS नीलगिरि, INS हिमगिरि, INS उदयगिरि, INS तारागिरि, INS दूनगिरि, INS विंध्यगिरि और INS महेन्द्रगिरि
    • फ्रिगेट एक बहुमुखी, मध्यम आकार का युद्धपोत होता है, जिसे उच्च गति और उत्कृष्ट संचालन क्षमता के लिये डिज़ाइन किया गया है।
  • यह मुख्य रूप से बड़े जहाज़ों (जैसे- विमान वाहक या वाणिज्यिक जहाज़ों) को सुरक्षा प्रदान करने के साथ-साथ पनडुब्बीरोधी युद्ध (ASW), वायुरोधी युद्ध (AAW) और सतह-रोधी युद्ध (ASuW) अभियानों को संचालित करने के लिये प्रयुक्त होता है।

और पढ़ें: प्रोजेक्ट 17A: INS हिमगिरि और INS उदयगिरि


तुगलकाबाद का किला

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस 

दिल्ली उच्च न्यायालय ने तुगलकाबाद किले में होने वाले अतिक्रमणों पर न्यायालय द्वारा आदेशित सर्वेक्षण को करने में देरी के लिये भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (ASI) की आलोचना की। 

तुगलकाबाद का किला

  • परिचय: नई दिल्ली के दक्षिणी भाग में स्थित, यह किला सामरिक दृष्टिकोण से अरावली पहाड़ियों के साथ  बनाया गया था, जिसने प्राकृतिक रक्षात्मक ऊँचाई और निर्माण के लिये प्रचुर मात्रा में ग्रेनाइट प्रदान किया।
    • तुगलकाबाद का किला तुगलक वंश के संस्थापक गयासुद्दीन तुगलक द्वारा वर्ष 1321 में बनवाया गया था।
    • ऐतिहासिक रूप से इसे लाल कोट (तोमर वंश के अनंगपाल द्वितीय द्वारा निर्मित) और सीरी (अलाउद्दीन खिलजी द्वारा निर्मित) के बाद दिल्ली का तीसरा मौजूदा शहर माना जाता है।
      • इस विशाल सैन्य किले का प्राथमिक उद्देश्य शाही सत्ता को मज़बूत करना और दिल्ली सल्तनत पर होने वाले बार-बार मंगोल आक्रमणों के खिलाफ एक अभेद्य रक्षा कवच का निर्माण करना था।
  • प्रमुख स्थापत्य विशेषताएँ: यह किला प्रारंभिक इंडो-इस्लामिक सैन्य स्थापत्य का एक स्मारकीय उदाहरण है, जो कमज़ोर अलंकरण की तुलना में कठोर मज़बूती और ज्यामिति को प्राथमिकता देता है।
    • तुगलक स्थापत्य की एक परिभाषित विशेषता अपशिष्टयुक्त, ढाल वाली मोटी दीवारों का उपयोग है।
  • त्रि-भाग शहरी लेआउट: लगभग अर्द्ध-षट्कोणीय शहर को व्यवस्थित रूप से विभाजित किया गया था:
    • किला 
    • भूमिगत कक्षों और पलायन मार्गों वाला महल परिसर
    • आवासीय शहरी क्षेत्र: वर्षा जल संचयन प्रणालियों, टैंकों और बावलियों के साथ।
  • गयासुद्दीन तुगलक का मकबरा: किले के बाहर स्थित यह मकबरा एक 600 फीट लंबे पुल द्वारा जुड़ा हुआ है। मकबरे की बाहरी दीवारों पर लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर का उपयोग किया गया है तथा इसके ऊपर एक अत्यंत सुंदर एवं भव्य गुंबद बना हुआ है।
  • त्वरित परित्याग: अपनी भव्यता के बावजूद इस किले का उपयोग बहुत ही अल्पकालिक रहा।
    • गयासुद्दीन की मृत्यु (1325 ई.) के कुछ समय बाद इसे अधिकांश रूप से परित्यक्त कर दिया गया था, जब उसके उत्तराधिकारी मुहम्मद बिन तुगलक ने राजधानी को दक्षिण में दौलताबाद (देवगिरि) स्थानांतरित कर दिया और बाद में अपना निकटवर्ती किला, आदिलाबाद बनाने पर ध्यान केंद्रित किया।
    • एक प्रसिद्ध लोकप्रिय कथा निज़ामुद्दीन औलिया से भी जुड़ी है, जिनके बारे में माना जाता है कि उन्होंने शहर को श्राप (शाप)  दिया था—“या रहे उज्जड़, या बसे गुज्जर” (अर्थात यह स्थान या तो उजाड़ रहे या फिर पशुपालकों द्वारा बसाया जाए)। कई लोग इस श्राप (शाप) को किले के शीघ्र पतन और परित्याग से जोड़ते हैं।

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स्मोग-ईटिंग फोटोकैटेलिटिक कोटिंग

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

दिल्ली के बढ़ते वायु प्रदूषण से निपटने की दिशा में एक कदम के रूप में, दिल्ली सरकार ने IIT मद्रास के साथ साझेदारी की है, जिसके तहत शहरी सतहों पर ‘स्मोग-ईटिंग’ फोटोकैटलिटिक कोटिंग्स का परीक्षण किया जा रहा है, ताकि शहर के बुनियादी ढाँचे में मौजूद गंभीर वायु प्रदूषकों को निष्क्रिय किया जा सके।

  • ‘स्मोग-ईटिंग’ फोटोकैटलिटिक कोटिंग्स: इस परियोजना का मुख्य आधार $TiO_2$ (टाइटेनियम डाइऑक्साइड) से निर्मित कोटिंग्स हैं। यह पदार्थ न केवल रासायनिक रूप से स्थिर और सस्ता है, बल्कि बाजार में आसानी से उपलब्ध भी है, जो इसे शहरी प्रदूषण नियंत्रण के लिए एक व्यावहारिक समाधान बनाता है।
    • जब टाइटेनियम डाइऑक्साइड (TiO₂) सूर्य के प्रकाश के संपर्क में आता है, तो यह एक उत्प्रेरक के रूप में कार्य करता है और सतह पर इलेक्ट्रॉनों का निर्माण करता है, जो नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO₂) और वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों (VOCs) जैसे प्रमुख वायु प्रदूषकों के साथ अभिक्रिया कर उन्हें विघटित कर देते हैं।
    • सड़कों, इमारतों और फुटपाथों जैसी सतहों पर लगाए जाने पर ये कोटिंग्स एक निष्क्रिय वायु-शुद्धीकरण प्रणाली के रूप में लगातार कार्य करती हैं।
  • द्वितीयक प्रदूषकों पर प्रभाव: यद्यपि यह तकनीक सीधे तौर पर प्राथमिक कणीय पदार्थ (जैसे– PM2.5/PM10) को फिल्टर नहीं करती, लेकिन यह उनके रासायनिक पूर्वगामी तत्त्वों को सक्रिय रूप से नष्ट करके द्वितीयक कणीय पदार्थ और अत्यधिक विषैले ज़मीनी स्तर पर ओज़ोन के निर्माण को रोकने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
  • पर्यावरणीय चुनौतियाँ: यद्यपि यह तकनीक किफायती, स्थिर और विस्तार योग्य है, इसकी वास्तविक प्रभावशीलता कई बाधाओं से प्रभावित होती है, जैसे– घने स्मॉग के दौरान सूर्य के प्रकाश की कम तीव्रता, बदलते पवन पैटर्न तथा भारी धूल जमाव, जो सूर्य के प्रकाश को अवरुद्ध कर सकता है और नियमित सफाई की आवश्यकता पैदा करता है।
    • यह यूट्रोफिकेशन (शैवाल वृद्धि/एल्गल ब्लूम) को बढ़ावा दे सकता है, जिससे पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों और सावधानीपूर्वक क्रियान्वयन की आवश्यकता को बल मिलता है।
    • ‘स्मोग-ईटिंग’ वाली कोटिंग्स का बड़े पैमाने पर उपयोग शहरी जल-निकासी प्रणालियों में नाइट्रेट के बहाव का कारण बन सकता है, जिससे यमुना नदी जैसे जल निकायों में पोषक तत्त्वों का स्तर बढ़ सकता है।
  • तुलनात्मक विश्लेषण: स्मोग टावर या मौसम पर निर्भर क्लाउड सीडिंग जैसी केंद्रीकृत, ऊर्जा-गहन और काफी हद तक अप्रभावी तकनीकी हस्तक्षेपों के विपरीत, फोटोकैटलिटिक कोटिंग्स एक विकेंद्रीकृत, शून्य-ऊर्जा तथा निष्क्रिय शमन रणनीति प्रस्तुत करती है।
    • यह तकनीक एक स्वतंत्र समाधान नहीं है, बल्कि एक निरंतर पृष्ठभूमि प्रक्रिया के रूप में कार्य करती है और ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) जैसे उपायों के पूरक के रूप में उपयोगी होती है।

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