डेली न्यूज़ (25 Dec, 2025)



सुशासन दिवस

प्रिलिम्स के लिये: सुशासन दिवस, सुशासन सूचकांक, राष्ट्रीय सुशासन केंद्र, मिशन कर्मयोगी

मेन्स के लिये: सुशासन की अवधारणा एवं सिद्धांत, भारत में सुशासन की चुनौतियाँ, नागरिक सहभागिता: जन आंदोलन बनाम जन भागीदारी

स्रोत: पी.आई.बी.

चर्चा में क्यों? 

सुशासन दिवस, जो 25 दिसंबर को मनाया जाता है, अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती के स्मरणोत्सव के रूप में आयोजित किया जाता है तथा जवाबदेही, पारदर्शिता और समावेशी शासन के उनके आदर्शों को रेखांकित करता है।

सारांश

  • सुशासन दिवस, अटल बिहारी वाजपेयी के जवाबदेह, पारदर्शी और समावेशी शासन के दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित करता है, जो भारत के संस्थागत एवं प्रशासनिक सुधारों का मार्गदर्शन करता रहता है।
  • हालाँकि डिजिटल शासन, प्रदर्शन सूचकांकों और नागरिक-केंद्रित सेवा वितरण के माध्यम से भारत ने प्रगति की है, फिर भी भ्रष्टाचार, न्यायिक विलंब, दुर्बल विकेंद्रीकरण और विश्वास की कमी जैसी स्थायी चुनौतियाँ गहन नागरिक भागीदारी, नैतिक नेतृत्व और सशक्त स्थानीय शासन की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं।

सुशासन क्या है?

  • परिचय: एशिया और प्रशांत के लिये संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक आयोग (UNESCAP) के अनुसार, शासन निर्णय लेने की प्रक्रिया और उस ढंग को संदर्भित करता है जिसमें निर्णयों को कार्यान्वित (या न कार्यान्वित) किया जाता है, जबकि सुशासन विकास के लिये लोकहित में आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक संसाधनों के प्रबंधन हेतु शक्ति के प्रभावी, न्यायसंगत और जवाबदेह प्रयोग से संबंधित है।
    • इसमें केवल सरकार ही नहीं, बल्कि विधायिका, न्यायपालिका, नागरिक समाज, निजी क्षेत्र, मीडिया और अन्य औपचारिक एवं अनौपचारिक कारक भी शामिल हैं।

  • सुशासन की मुख्य विशेषताएँ: संयुक्त राष्ट्र और विश्व बैंक जैसी वैश्विक संस्थाओं के अनुसार, सुशासन की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं::
    • भागीदारी: महिलाओं और वंचित समूहों सहित नागरिकों की सक्रिय सहभागिता
    • कानून का शासन: एक स्वतंत्र न्यायपालिका द्वारा लागू किये गए निष्पक्ष, निरपेक्ष कानून
    • पारदर्शिता: सूचना का मुक्त और सुलभ प्रवाह
    • प्रतिक्रियाशीलता: समयबद्ध एवं प्रभावी सेवा वितरण
    • सर्वसम्मति-उन्मुखता: सामूहिक कल्याण के लिये विविध हितों की मध्यस्थता
    • समानता और समावेशिता: समाज के सभी वर्गों के लिये समान अवसर
    • प्रभावशीलता और दक्षता: वांछित परिणामों के लिये संसाधनों का इष्टतम उपयोग
    • जवाबदेही: सरकार, निजी क्षेत्र और नागरिक समाज की उत्तरदायी प्रकृति

  • महत्त्व: सुशासन भ्रष्टाचार को न्यूनतम करता है, मानवाधिकारों की रक्षा करता है और एक पारदर्शी तथा जवाबदेह प्रशासन सुनिश्चित करता है, जिससे संस्थाओं में जन-विश्वास का निर्माण होता है।
    • यह अवसरों तक विशेष रूप से गरीबों और असुरक्षित वर्गों की समान पहुँच को भी बढ़ावा देता है तथा क्षेत्रीय और सामाजिक विषमताओं को कम करके समावेशी और सतत आर्थिक एवं सामाजिक विकास को गति प्रदान करता है।
    • यह नैतिक प्रशासन के मूल तत्त्वों जैसे सत्यनिष्ठा, शुचिता, करुणा, निष्पक्षता और उत्तरदायित्व जैसे मूल्यों को भी सुदृढ़ करता है।

भारत सुशासन को कैसे बढ़ावा दे रहा है?

  • डिजिटल और ई-गवर्नेंस पहल: UMANG, DigiLocker, GeM और ई-ऑफिस जैसे प्लेटफॉर्म कागज़ रहित, पारदर्शी और समयबद्ध सेवा वितरण सक्षम करते हैं, साथ ही निर्णयाधिकार और भ्रष्टाचार को कम करते हैं।
  • पारदर्शिता और जवाबदेही ढाँचे: सूचना का अधिकार अधिनियम 2005, नागरिक चार्टर, शिकायत निवारण पोर्टल और सामाजिक ऑडिट सार्वजनिक निगरानी और प्रशासनिक जवाबदेही को सुदृढ़ करते हैं।
  • प्रदर्शन मापन एवं निगरानी: सुशासन सूचकांक (GGI) जैसे उपकरण राज्यों के बीच शासन परिणामों का बेंचमार्क निर्धारण करते हैं, जिससे प्रतिस्पर्द्धी संघवाद को प्रोत्साहन मिलता है और साक्ष्य-आधारित सुधारों को प्रोत्साहन मिलता है।
  • प्रशासनिक क्षमता निर्माण: मिशन कर्मयोगी एवं iGoT प्लेटफाॅर्म सिविल सेवकों के निरंतर कौशल उन्नयन पर केंद्रित हैं, जिससे एक पेशेवर एवं भविष्य-तैयार नौकरशाही का निर्माण हो सके।
  • ग्रामीण विकास: DAY-NRLM ने 10.29 करोड़ से अधिक ग्रामीण परिवारों को स्वयं-सहायता समूहों (SHGs) में संगठित किया है, जिससे उन्हें वित्तीय पहुँच और सतत आजीविका समर्थन प्राप्त हुआ है। वहीं, लखपति दीदी पहल आजीविका को केवल निर्वाह आधारित से विविध और आय-सुरक्षित मॉडल की ओर ले जाने का संकेत देती है।
    • प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण (PMAY-G) और प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना (PMGSY) ने ग्रामीण क्षेत्रों में अलगाव कम किया और बाज़ार तथा सेवाओं तक पहुँच बढ़ाई। वहीं, दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल प्रशिक्षण योजना (DDU-GKY) और राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (NSAP) युवाओं और संवेदनशील समूहों के लिये सुरक्षा जाल (Safety Net) प्रदान करते हैं।
    • डिजिटलीकरण ग्रामीण उत्पादकों को बाज़ार से जोड़ता है और eGramSwaraj तथा BharatNet के माध्यम से पंचायत पारदर्शिता में सुधार करता है।
  • स्वतंत्र संवैधानिक संस्थाएँ: भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG), भारत निर्वाचन आयोग, संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और वित्त आयोग जैसी संस्थाएँ वित्तीय जवाबदेही, स्वतंत्र चुनाव, योग्यता-आधारित भर्ती और राजकोषीय संघवाद सुनिश्चित करती हैं।
  • नागरिक-केंद्रित सेवा वितरण: राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT), एकल-खिड़की मंज़ूरी प्रणाली और मोबाइल आधारित प्लेटफॉर्म अंतिम स्तर पर सेवा वितरण में सुधार करते हैं और संसाधन हानि को कम करते हैं।
    • MyGov प्लेटफॉर्म नीति निर्माण और प्रतिक्रिया में नागरिक भागीदारी को प्रोत्साहित करता है।
    • सेवोत्‍तम मॉडल को अपनाकर सेवा मानक स्थापित किये गए और समयबद्ध, जवाबदेह सार्वजनिक सेवा वितरण को संस्थागत किया गया।
  • न्यायिक और विधिक सुधार: ई-कोर्ट्स और फास्ट-ट्रैक कोर्ट का विस्तार न्याय तक पहुँच में सुधार करता है और लंबित मामलों को कम करता है।
  • विकेंद्रीकरण और स्थानीय शासन: ग्राम पंचायतों, स्वयं सहायता समूहों और सामुदायिक संस्थाओं को सशक्त बनाकर शासन नागरिकों के निकट लाया जाता है, जिससे सहभागिता आधारित योजना और अधिक प्रतिक्रियाशील परिणाम सुनिश्चित होते हैं।

सुशासन सूचकांक (GGI)

  • परिचय: प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग (DARPG ) ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में शासन प्रदर्शन का मूल्यांकन करने और सुधारों को प्रोत्साहित करने के लिए 25 दिसंबर, 2019 को सुशासन सूचकांक (जीजीआई) प्रस्तुत किया।
  • कवरेज: GGI वर्ष 2020–21, 10 क्षेत्रों और 58 संकेतकों के माध्यम से शासन का आकलन करता है।
  • GGI के अंतर्गत श्रेणियाँ: निष्पक्ष तुलना सुनिश्चित करने के लिये, राज्यों को चार श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है (समूह 'A' राज्य, समूह 'B' राज्य, उत्तर-पूर्व और पहाड़ी राज्य, तथा केंद्रशासित प्रदेश)।
  • GGI 2020–21 में शीर्ष प्रदर्शनकर्त्ता:
    • समूह 'A' राज्य: गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा
    • समूह 'B' राज्य: मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़
    • उत्तर-पूर्व एवं पहाड़ी राज्य: हिमाचल प्रदेश, मिज़ोरम
    • केंद्रशासित प्रदेश: दिल्ली

भारत में सुशासन के समक्ष मुख्य चुनौतियाँ क्या हैं?

  • आर्थिक एवं सामाजिक असुरक्षा: उच्च बेरोज़गारी (अक्तूबर 2025 में 5.2%) और असमानता नागरिक भागीदारी को कम करती है तथा सार्वजनिक संस्थानों में विश्वास को दुर्बल करती है।
  • अप्रभावी नीति निर्माण: ऊपर से नीचे की ओर नीति डिज़ाइन अक्सर स्थानीय वास्तविकताओं की उपेक्षा करता है, जिससे खराब कार्यान्वयन और असमान परिणाम सामने आते हैं।
  • अपराधीकरण एवं गठजोड़: लोकतांत्रिक सुधार संघ (ADR) के आँकड़े दर्शाते हैं कि राज्यों में लगभग 45% विधायकों ने स्वयं के विरुद्ध आपराधिक मामले घोषित किये हैं।
    • लंबित आपराधिक मामलों वाले विधायकों की बढ़ती संख्या से हितों के टकराव उत्पन्न होते हैं, जबकि राजनेता-नौकरशाही-व्यापार गठजोड़ नीतिगत प्राथमिकताओं को विकृत करता है, संस्थाओं को कमज़ोर करता है और लोकतांत्रिक शासन को क्षरण करता है।
  • संस्थागत भ्रष्टाचार: भ्रष्टाचार और कमज़ोर संस्थागत क्षमता शासन की दक्षता को कम करती हैं।
    • भारत की लगभग 20% GDP सार्वजनिक खरीद पर खर्च होती है, जिसे केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) ने भ्रष्टाचार के प्रति अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्र बताया है।
    • भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक (CPI) वर्ष 2024 में भारत 180 देशों में 96वें स्थान पर रहा, जिससे जनता का विश्वास कमज़ोर हुआ है।
  • न्यायिक देरी: 4 करोड़ से अधिक लंबित न्यायालयी मामले, विधि के शासन और समयबद्ध न्याय वितरण को प्रभावित करते हैं।
  • कमज़ोर जवाबदेही तंत्र: निगरानी और शिकायत निवारण की कमज़ोर व्यवस्था MGNREGA तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) जैसी योजनाओं की प्रभावशीलता को प्रभावित करती है।
    • CAG ने प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY) के कार्यान्वयन में गंभीर अनियमितताओं को उजागर किया है, जिनमें नकली बैंक विवरण, डुप्लीकेट फोटो, कार्य नहीं करने वाले प्रशिक्षण केंद्र और 34 लाख से अधिक उम्मीदवारों के बकाया भुगतान शामिल हैं।
    • इन सभी चूकों से कमज़ोर निगरानी और भ्रष्टाचार की समस्या उजागर होती है, जो जवाबदेही, परिणाम तथा सार्वजनिक धन के मूल्य को कमज़ोर करती है।
  • सुधारों के प्रति राजनीतिक प्रतिरोध: सत्ता को विकेंद्रीकृत करने और स्थानीय शासन को सशक्त बनाने में अनिच्छा प्रणालीगत सुधारों को धीमा करती है।
  • विश्वास की कमी: कल्याण वितरण में देरी और पारदर्शिता की कमी नागरिकों के शासन प्रणाली में विश्वास को कम करती है।
  • जनप्रियता बनाम संरचनात्मक सुधार: राजनीतिक दल प्राय: चुनाव जीतने के लिये मुफ्त लाभ (रेवड़ी) संस्कृति को प्राथमिकता देते हैं, जिससे सीमित सार्वजनिक संसाधनों की दीर्घकालिक अवसंरचना, स्वास्थ्य और शिक्षा में निवेश कम हो जाता है।

भारत में सुशासन मज़बूत करने हेतु आवश्यक उपाय क्या हैं?

  • नागरिक भागीदारी को गहरा करना: जन आंदोलन (लोगों की पहल) से जन भागीदारी (सक्रिय नागरिक सहभागिता) की दिशा में कदम बढ़ाना और जन चेतना (सार्वजनिक जागरूकता) को मज़बूत करना, इसके लिये सभी प्रमुख योजनाओं में सामाजिक ऑडिट को संस्थागत रूप देना आवश्यक है।
    • यह नियमित सार्वजनिक परामर्श, खुले फीडबैक प्लेटफॉर्म और स्थानीय स्तर पर गहन सहभागी शासन के माध्यम से किया जा सकता है।
  • हाशिये पर रहने वालों पर ध्यान केंद्रित करना: सबसे कमज़ोर वर्गों को पहले सशक्त बनाकर अंत्योदय के माध्यम से सर्वोदय को साकार करना।
    • महिलाओं, अनुसूचित जाति/जनजाति (SC/ST), अल्पसंख्यक, बुजुर्ग, किसान और आकांक्षी ज़िलों को प्राथमिकता देने से समावेशी सामाजिक तथा आर्थिक न्याय सभी के कल्याण की आधारशिला बनता है।
  • स्थानीय सरकार को सशक्त बनाना: पंचायती और शहरी स्थानीय निकायों को पर्याप्त धन (Funds), कार्य (Functions) और कर्मचारियों (Functionaries) (3Fs) के साथ सशक्त करके लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण को बढ़ावा देना।
  • शासन प्रक्रियाओं को सरल बनाना: केरल के FRIENDS (फास्ट रिलायबल इंस्टेंट एफिशिएंट नेटवर्क फॉर डिसबर्समेंट ऑफ सर्विसेज़) जैसे सिंगल-विंडो सिस्टम, समयबद्ध सेवा वितरण कानून तथा मज़बूत फीडबैक तंत्र के माध्यम से प्रक्रियाओं को पुन: डिज़ाइन करना, ताकि नागरिकों के लिये इंटरफेस लागत कम हो और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण पाया जा सके।
    • सेवोत्तम मॉडल को मज़बूत करना और ई-गवर्नेंस का विस्तार दक्षता, पारदर्शिता तथा सार्वजनिक सेवा वितरण की गुणवत्ता को और सुधार सकता है।

न्यूनतम सरकार + अधिकतम शासन → नागरिक सशक्तीकरण → सुशासन

  • नैतिक शासन को बढ़ावा देना: भ्रष्टाचार के लिये शून्य सहनशीलता लागू करना, ईमानदारी के मानदंडों को बनाए रखना, व्हिसलब्लोअर्स की सुरक्षा करना और सार्वजनिक विश्वास को पुनर्निर्मित करने के लिये सतर्कता संस्थाओं को मज़बूत करना।  
    • दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) के ‘शासन में नैतिकता’ पर फोकस को लागू करना और ’गोपनीयता की संस्कृति’ से ‘सेवा की संस्कृति’ की ओर कदम बढ़ाना।
  • न्यायिक क्षमता का विस्तार: ई-कोर्ट्स फेज III के तहत AI-आधारित केस प्रबंधन और स्वचालित शेड्यूलिंग को बढ़ाना।
    • छोटे अपराधों के लिये वर्चुअल कोर्ट बैकलॉग कम करने में सहायता कर सकते हैं और न्यायाधीशों को जटिल मामलों पर ध्यान केंद्रित करने की अनुमति देते हैं।
  • नौकरशाही के लिये गति शक्ति: प्रशासनिक कार्यप्रवाह में ‘गति शक्ति’ (संपूर्ण योजना) दृष्टिकोण लागू करना ताकि मंत्रालयों के बीच विभागीय बाधाएँ समाप्त हों और समन्वय, दक्षता तथा नीति परिणामों में सुधार हो।
    • नियम आधारित से भूमिका आधारित (बाबू संस्कृति से सेवा संस्कृति) दृष्टिकोण की ओर बढ़ें (मिशन कर्मयोगी)।  
    • 360-डिग्री मूल्यांकन लागू करें (जैसा कि 2nd ARC ने सुझाया है) और मध्य से वरिष्ठ स्तर पर लेटरल एंट्री को प्रोत्साहित करें ताकि विशेष डोमेन विशेषज्ञता लाई जा सके।


अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में मुख्य तथ्य

  • प्रारंभिक जीवन: अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म 25 दिसंबर, 1924 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में हुआ था।
  • उन्होंने अपने छात्र जीवन के दौरान भारत छोड़ो आंदोलन (1942) में भाग लिया था।
  • पत्रकारिता और राजनीतिक यात्रा: अटल बिहारी वाजपेयी ने वर्ष 1951 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पूर्ववर्ती संगठन, भारतीय जनसंघ में शामिल होने से पहले अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत एक पत्रकार के रूप में की और बाद में भाजपा और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (NDA) की राजनीति को आकार देने में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
    • वे एक वरिष्ठ सांसद थे। उन्होंने तीन बार भारत के प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया- 13 दिन (1996), 11 महीने (1998–99) और पूर्ण कार्यकाल (1999–2004)। इसके अलावा उन्होंने विदेश मामलों के मंत्री और विपक्ष के नेता जैसे महत्त्वपूर्ण पद भी संभाले।
  • पुरस्कार और सम्मान: उन्हें देश के लिये आजीवन सेवा हेतु पद्म विभूषण (1992) तथा भारत रत्न (2015) से सम्मानित किया गया। वर्ष 1994 में उन्हें भारत का 'सर्वश्रेष्ठ सांसद' चुना गया।

राष्ट्र निर्माण में भूमिका

  • परिवर्तनकारी शासन: उन्होंने दूरसंचार में महत्त्वपूर्ण सुधार किये (नई दूरसंचार नीति, 1999), ऊर्जा क्षेत्र में सुधार (विद्युत अधिनियम, 2003) और वित्तीय अनुशासन (FRBM अधिनियम, 2003) सुनिश्चित किया।
  • कनेक्टिविटी के नेतृत्व में विकास: उन्होंने कनेक्टिविटी को विकास का एक ज़रिया माना और बाज़ारों, गाँवों और शहरों को जोड़ने के लिये राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना (NHDP) और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) शुरू की।
  • मानव संसाधन और सामाजिक उत्थान: सर्व शिक्षा अभियान जैसे पहलों ने प्राथमिक शिक्षा को व्यापक रूप से पहुँचाया।
  • विज्ञान, प्रौद्योगिकी और रणनीतिक स्वायत्तता: वाजपेयी ने पोखरण-II (1998) के माध्यम से भारत की वैश्विक स्थिति को मज़बूत किया और चंद्रयान-I की घोषणा की, जिसने भारत की अंतरिक्ष और परमाणु महत्त्वाकांक्षाओं की नींव रखी।
  • विदेश नीति और वैश्विक प्रभाव: उन्होंने संतुलित आत्मविश्वास के साथ भारत की कूटनीति को मज़बूती दी, भारत की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की महत्त्वाकांक्षाओं का समर्थन किया और भारत की सभ्यतागत पहचान को वैश्विक स्तर पर प्रस्तुत किया—जिसमें उन्होंने UN जनरल असेंबली में हिंदी में भाषण दिया।

निष्कर्ष

सुशासन समावेशी विकास और लोकतांत्रिक वैधता की आधारशिला है। भारत में शासन सुधार और डिजिटल पहल प्रगति को दर्शाती हैं, लेकिन न्यायसंगत तथा जवाबदेह शासन को हासिल करने के लिये निरंतर नागरिक भागीदारी, संस्थागत सुदृढ़ता एवं नैतिक नेतृत्व अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. सुशासन जितना संस्थानों के बारे में है, उतना ही नागरिकों की भागीदारी के बारे में भी है। भारतीय संदर्भ में इस कथन का परीक्षण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1UNESCAP के अनुसार सुशासन का क्या अर्थ है?
 यह विकास के लिये सार्वजनिक संसाधनों के प्रबंधन में शक्ति के प्रभावी, जवाबदेह, पारदर्शी और समावेशी उपयोग को दर्शाता है।

2. 25 दिसंबर को सुशासन दिवस क्यों मनाया जाता है?
यह अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती के अवसर पर मनाया जाता है और नागरिक-केंद्रित, जवाबदेह शासन को बढ़ावा देता है।

3. गुड गवर्नेंस इंडेक्स (GGI) क्या है?
वर्ष 2019 में DARPG द्वारा पेश किया गया, यह सूचकांक विभिन्न क्षेत्रों और संकेतकों के आधार पर राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के शासन प्रदर्शन का मूल्यांकन करता है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

मेन्स

प्रश्न. ई-शासन केवल नवीन प्रौद्योगिकी की शक्ति के उपयोग के बारे में नहीं है, अपितु इससे अधिक सूचना के 'उपयोग मूल्य' के क्रांतिक महत्त्व के बारे में है। स्पष्ट कीजिये। (2018)

प्रश्न. नागरिक चार्टर संगठनात्मक पारदर्शिता एवं उत्तरदायित्व का एक आदर्श उपकरण है, परंतु इसकी अपनी परिसीमाएँ हैं। परिसीमाओं की पहचान कीजिये तथा नागरिक चार्टर की अधिक प्रभाविता के लिये उपायों का सुझाव दीजिये। (2018)


मानव-वन्यजीव संघर्ष

प्रिलिम्स के लिये: हाथी, हाथी गलियारा, अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN), ज़ूनोटिक रोग, बाघ, तेंदुए, मौलिक कर्त्तव्य, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972, राष्ट्रीय उद्यान, जैविक विविधता अधिनियम, 2002, प्रोजेक्ट एलिफेंट, प्रोजेक्ट टाइगर, टाइगर रिज़र्व, राष्ट्रीय वन्यजीव कार्य योजना, NDMA

मेन्स के लिये: मानव-वन्यजीव संघर्ष की स्थिति, कारण और परिणाम। मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिये मुख्य पहल और इस संघर्ष को प्रभावी ढंग से कम करने के लिये आवश्यक उपाय।

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों?

असम में हुई एक ट्रेन–हाथी टक्कर की घटना ने मानव–वन्यजीव संघर्ष (HWC) के मुद्दे को गंभीर रूप से उजागर कर दिया है। यह घटना किसी हाथी गलियारे के बाहर हुई, जिससे वन्यजीवों की आवाजाही की पहचान (मैपिंग) और रोकथाम से जुड़ी अवसंरचना में मौजूद कमियों पर चिंता बढ़ गई है।

सारांश

  • आवास ह्रास और जलवायु परिवर्तन के कारण मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ता जा रहा है, जिससे जान-माल की हानि तथा आर्थिक नुकसान हो रहा है।
  • इस समस्या के समाधान के लिये सक्रिय और समेकित रणनीतियों की आवश्यकता है, जिनमें वन्यजीव गलियारों का संरक्षण, प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों की तैनाती, समुदाय-आधारित सह-अस्तित्व को बढ़ावा देना तथा कानूनी-नीतिगत ढाँचों को सुदृढ़ कर प्रतिपूरक प्रतिक्रिया से आगे बढ़ते हुए सतत परिदृश्य प्रबंधन की ओर संक्रमण शामिल है।

मानव-वन्यजीव संघर्ष क्या है?

  • परिचय: HWC से तात्पर्य मनुष्यों और वन्यजीवों के बीच होने वाली ऐसी किसी भी अंतःक्रिया से है, जिसके परिणामस्वरूप मानव के सामाजिक, आर्थिक या सांस्कृतिक जीवन पर वन्यजीव आबादी के संरक्षण पर अथवा पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यह केवल शारीरिक हमलों तक सीमित नहीं है, बल्कि स्थान और संसाधनों के लिये होने वाली जटिल प्रतिस्पर्द्धा का परिणाम भी है।
  • भारत में HWC: वर्ष 2019-2024 के बीच भारत में हाथियों के हमलों से 2,700 से अधिक व्यक्तियों की मृत्यु हुई, जबकि बाघों ने 349 व्यक्तियों की जान ली।
    • इसी अवधि में सैकड़ों हाथियों की मृत्यु करंट लगने, ट्रेन दुर्घटनाओं और विषाक्तता के कारण हुई। अनुमान है कि वर्ष 2070 तक भारत मानव-वन्यजीव संघर्ष का एक वैश्विक हॉटस्पॉट बन सकता है।

मानव-वन्यजीव संघर्ष में वृद्धि के लिये कौन-से कारक ज़िम्मेदार हैं?

  • आवास हानि और विखंडन: प्राकृतिक आवासों को खेतों, सड़कों और बस्तियों में बदलने से वन्यजीवों के रहने के स्थान सीधे नष्ट तथा खंडित हो जाते हैं। जैसे-जैसे मानव आबादी इन क्षेत्रों और प्रवासन गलियारों में फैलती है, वनों तथा संरक्षित क्षेत्रों की साझा सीमाओं पर मनुष्यों व वन्यजीवों के बीच आमने-सामने की घटनाएँ बढ़ जाती हैं।
    • राजमार्गों, रेलवे लाइनों और नहरों जैसी रेखीय अवसंरचनाएँ आवासों को काटकर परिदृश्य को खंडित कर देती हैं, प्राचीन प्रवासन मार्गों को बाधित करती हैं तथा वाहन टक्करों और विद्युत करंट से वन्यजीवों की मृत्यु के जोखिम को बढ़ा देती हैं।
      • उदाहरण, हाल ही में असम में ट्रेन की टक्कर से 8 हाथियों की मृत्यु हो गई।
      • इसी तरह कर्नाटक के कोडागु में कॉफी और अदरक की कृषि के विस्तार ने हाथियों के प्रवासन मार्गों को बाधित किया है, जिससे फसलों को भारी नुकसान तथा संपत्ति क्षति की घटनाएँ बढ़ी हैं।
  • मानव-प्रधान परिदृश्यों के प्रति अनुकूलन: बंदर, हाथी और तेंदुए जैसी बुद्धिमान व अनुकूलनशील प्रजातियाँ मानव उपस्थिति की आदी हो जाती हैं। वे बस्तियों और खेतों को भोजन के विश्वसनीय स्रोत के रूप में पहचानने लगती हैं, जिससे उनमें मनुष्यों का प्राकृतिक भय कम हो जाता है।
    • घने गन्ने के खेत मांसाहारी जीवों को आदर्श आवरण प्रदान करते हैं। इसका उदाहरण महाराष्ट्र में देखा गया है, जहाँ तेंदुए पूरी तरह गन्ने के खेतों के भीतर रहने के अनुकूल हो गए हैं, पशुधन का शिकार करते हैं और इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएँ बार-बार होती हैं।
    • इन तेंदुओं को ‘शुगर बेबीज़’ कहा जाता है और ये मानव-आवासीय क्षेत्रों के इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि स्थानांतरण के बाद भी वनों में वापस नहीं लौटते।
  • जलवायु परिवर्तन एवं जल संकट: लंबे समय तक चलने वाले सूखे और अनियमित मानसून सहित बदलते मौसम प्रतिरूप, प्राकृतिक वन जलाशयों को सुखा देते हैं, जिससे वन्यजीव ग्रामीण तालाबों और सिंचाई टैंकों की ओर प्रवृत्त हो जाते हैं।
    • वृक्षों के फलन काल में व्यवधान, भालुओं और बंदरों को भोजन की खोज में अन्य क्षेत्रों की ओर जाने के लिये विवश करता है।
    • उदाहरण के लिये, जम्मू और कश्मीर में हिमालयी भूरे भालू अपने प्राकृतिक आवास में खाद्य उपलब्धता में परिवर्तन के कारण बढ़ती हुई संख्या में निचली ऊँचाइयों की ओर उतर रहे हैं।
  • आवासीय क्षमता से अधिक जनसंख्या पुनरुद्धार: कुछ क्षेत्रों में प्रभावी संरक्षण कानूनों और संरक्षण कार्यक्रमों के परिणामस्वरूप बाघ, हाथी और तेंदुए जैसी प्रमुख प्रजातियों की जनसंख्या में वृद्धि हुई है, जिससे सीमित संरक्षित क्षेत्रों की परिधि पर पशु घनत्व में उल्लेखनीय वृद्धि हो गई है।

मानव-वन्यजीव संघर्ष को न्यूनतम करने के लिये सरकार द्वारा की गई प्रमुख पहलें कौन-सी हैं?

  • संवैधानिक अधिदेश: संविधान का अनुच्छेद 51A(g) प्रत्येक नागरिक का यह मौलिक कर्त्तव्य निर्धारित करता है कि वह वन्यजीवों सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा एवं संवर्द्धन करे। यह सभी अन्य उपायों के लिये नैतिक एवं संवैधानिक आधार प्रदान करता है।
    • न्यायिक मान्यता: भारतीय पशु कल्याण बोर्ड बनाम ए. नागराज और अन्य (2014) तथा गुजरात राज्य बनाम मीरज़ापुर मोती कुरैशी कसाब जमात (2005) मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने मान्यता दी कि पशुओं को भी मनुष्यों के समान अधिकार प्राप्त होने चाहिये तथा उन्हें कानूनी दर्जा प्रदान करके उनके कल्याण पर बल दिया।
  • वैधानिक ढाँचा: वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 (WPA) राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों की स्थापना के माध्यम से संरक्षण हेतु प्राथमिक विधिक ढाँचा प्रदान करता है।
    • वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 में 2006 का संशोधन पशुओं की आवाजाही को सुगम बनाने तथा मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के उद्देश्य से वन्यजीव गलियारों की अवधारणा को मान्यता देता है।
    • जैव विविधता अधिनियम, 2002 पारिस्थितिकी तंत्र, प्रजातियों एवं आनुवंशिक विविधता के समग्र संरक्षण का लक्ष्य रखता है तथा विद्यमान वन्यजीव कानूनों के रूप में कार्य करता है।
    • वन्यजीव गलियारा विधेयक, 2019 नामक एक निजी सदस्य विधेयक भी वर्ष 2019 में लोकसभा में प्रस्तुत किया गया, जिसका उद्देश्य मानव-वन्यजीव संघर्ष की समस्या का समाधान करना था।
  • नीतिगत एवं नियोजन उपकरण: राष्ट्रीय वन्यजीव कार्ययोजना (NWAP) (2017–31) लुप्तप्राय प्रजातियों एवं उनके आवासों के संरक्षण पर बल देती है तथा सह-अस्तित्व को प्रोत्साहित करने हेतु अनुसंधान और शिक्षा को बढ़ावा देती है।
    • NDMA के दिशा-निर्देश मानव-वन्यजीव संघर्ष को एक आपदा जोखिम के रूप में मान्यता देते हैं तथा विकास परियोजनाओं में प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों और आवास प्रबंधन जैसे शमन उपायों के एकीकरण की सलाह देते हैं।
  • प्रौद्योगिकीय हस्तक्षेप: गजराज प्रणाली भारतीय रेल की एक AI-आधारित निगरानी व्यवस्था है, जो फाइबर-ऑप्टिक सेंसरों के माध्यम से रेल पटरियों पर हाथियों की उपस्थिति का पता लगाकर टकराव की घटनाओं को रोकने में सहायक है।
    • ट्रेलगार्ड AI एक कॉम्पैक्ट, रियल-टाइम कैमरा प्रणाली है, जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सहायता से संरक्षित क्षेत्रों में मनुष्यों, शिकारियों तथा वाहनों की पहचान करती है, जिससे त्वरित प्रतिक्रिया संभव हो पाती है।
  • प्रजाति-विशिष्ट संरक्षण: प्रोजेक्ट टाइगर (1973) आवास ह्रास की समस्या से निपटने हेतु कोर और बफर क्षेत्रों के साथ टाइगर रिज़र्व की स्थापना करता है।
    • टाइगर्स आउटसाइड टाइगर रिज़र्व (TOTR) परियोजना उन्नत प्रौद्योगिकी जैसे AI, GPS और कैमरों का उपयोग कर मानव-बाघ संघर्ष को कम करने का प्रयास करती है, क्योंकि भारत के लगभग 30 प्रतिशत बाघ अधिसूचित टाइगर रिज़र्व के बाहर विचरण करते हैं।
    • प्रोजेक्ट एलीफेंट (1992) हाथियों के आवासों और गलियारों का संरक्षण करता है, ताकि प्रवासी मार्ग सुरक्षित रहें और फसल क्षति तथा दुर्घटनाओं को रोका जा सके।

हाथी गलियारे

  • परिचय: हाथी गलियारे प्राकृतिक आवास की संकीर्ण पट्टियाँ होते हैं, जो सामान्यतः वनाच्छादित या वनस्पतियुक्त भूमि के रूप में होती हैं। ये खंडित वन्यजीव क्षेत्रों को आपस में जोड़ते हैं, जिससे हाथियों को संरक्षित आवासों या मौसमी विचरण क्षेत्रों के बीच सुरक्षित आवागमन संभव हो पाता है।
  • समग्र स्थिति: भारत में हाथी गलियारे रिपोर्ट, 2023 के अनुसार, भारत में 15 हाथी-आवास राज्यों में कुल 150 हाथी गलियारों की पहचान की गई है। पश्चिम बंगाल में सर्वाधिक 26 हाथी गलियारे हैं, जो भारत के कुल हाथी गलियारों का 17 प्रतिशत से अधिक हैं।
    • क्षेत्रीय वितरण: पूर्व-मध्य क्षेत्र में हाथी गलियारों की सर्वाधिक हिस्सेदारी है, लगभग 35 प्रतिशत अर्थात 52 गलियारे, इसके बाद उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में 32 प्रतिशत, दक्षिणी क्षेत्र में 21 प्रतिशत तथा उत्तरी क्षेत्र में 12 प्रतिशत गलियारे स्थित हैं।
    • गलियारे का प्रकार: अधिकांश हाथी गलियारे, लगभग 84 प्रतिशत, अंतर-राज्यीय न होकर एक ही राज्य के भीतर स्थित हैं, जबकि 13 प्रतिशत अंतर-राज्यीय तथा 6 प्रतिशत नेपाल के साथ अंतर्राष्ट्रीय गलियारे हैं।

मानव-वन्यजीव संघर्ष को प्रभावी ढंग से कम करने हेतु आगे कौन-कौन से कदम उठाने की आवश्यकता है?

  • परिदृश्य-स्तरीय योजना: ऐसे पारिस्थितिकी तंत्र-आधारित दृष्टिकोण को अपनाएँ जो केवल अलग-अलग संरक्षित क्षेत्रों तक सीमित न रहे, बल्कि पूरे परिदृश्य का प्रबंधन करे और वैज्ञानिक रूप से मानचित्रित वन्यजीव मार्गों के माध्यम से जंगलों के बीच कनेक्टिविटी सुनिश्चित करना।
    • भूमि-उपयोग योजना, अवसंरचना विकास और ज़ोनिंग नियमों में वन्यजीवों के पहलुओं को शामिल करें ताकि आवास के विखंडन को रोका जा सके।
    • राज्यों और एजेंसियों के बीच तालमेल को बढ़ावा दें, क्योंकि जानवरों की आवाजाही अक्सर प्रशासनिक सीमाओं को पार कर जाती है।
  • स्थल पर रोकथाम और निरोध: सौर ऊर्जा वाली बाड़, खाइयाँ, पत्थर की दीवार जैसी बाधाएँ लगाएँ, साथ ही चौकियाँ और मोबाइल ऐप्स का इस्तेमाल करके जानवरों की गतिविधियों पर नजर रखें।
  • आर्थिक और आजीविका समर्थन: मुआवज़ा योजनाओं को समय पर पारदर्शी और नुकसान हुई फसलों या पशुधन के वास्तविक बाज़ार मूल्य के अनुसार पुनर्गठित करें और सीधे बैंक हस्तांतरण का उपयोग करके लोगों में सहनशीलता बढ़ाएँ।
  • कानूनी, संस्थागत और नीति सुधार: समन्वित कार्रवाई और त्वरित प्रतिक्रिया के लिये वन, राजस्व, कृषि, पुलिस और स्थानीय सरकारों के प्रतिनिधियों के साथ स्थायी ज़िला/राज्य स्तरीय टास्क फोर्स स्थापित करके एजेंसियों के बीच समन्वय को मज़बूत करना।
    • सभी विकास परियोजनाओं हेतु मानव-वन्यजीव संघर्ष प्रभाव आकलन को अनिवार्य करना और बाड़ लगाने तथा वन्यजीव क्रॉसिंग जैसी निवारक उपायों के लिये समर्पित बजट आवंटित करें।
  • सामुदायिक सहभागिता: ग्राम स्तरीय समितियों के माध्यम से स्थानीय समुदायों को शामिल करके सहभागी प्रबंधन को बढ़ावा देना, साथ ही सुरक्षित व्यवहार, गैर-संघर्षकारी आचरण और वन्यजीव संरक्षण के महत्त्व के बारे में लक्षित जागरूकता अभियान चलाएँ।

निष्कर्ष

असम में हुई दुःखद हाथी की मृत्यु इस बात को उजागर करती है कि मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिये प्रतिक्रियात्मक उपायों से हटकर सक्रिय, समग्र परिदृश्य प्रबंधन की आवश्यकता है। इसके लिये वन्यजीव मार्गों को कानूनी रूप से सुरक्षित करना, विज्ञान-आधारित रोकथाम उपाय लागू करना तथा मज़बूत कानूनी-नीति ढाँचे के भीतर समुदाय-संचालित सहअस्तित्व को बढ़ावा देना आवश्यक है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. मानव-वन्यजीव संघर्ष केवल संरक्षण का मुद्दा नहीं है, बल्कि एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक और मानवीय चुनौती भी है। इसे विश्लेषित करें और सतत सहअस्तित्व के लिये बहु-आयामी रणनीति सुझाइये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. मानव-वन्यजीव संघर्ष (Human-Animal Conflict: HWC) क्या है?
मानव-वन्यजीव संघर्ष (HWC) से आशय मनुष्यों और वन्यजीवों के बीच होने वाली उन अंतःक्रियाओं से है, जिनके परिणामस्वरूप मानव जीवन आजीविका, संपत्ति या पारिस्थितिक तंत्र को क्षति पहुँचती है। यह संघर्ष मुख्यतः स्थान और संसाधनों पर प्रतिस्पर्द्धा के कारण उत्पन्न होता है।

2. रेलवे और राजमार्ग मानव-वन्यजीव संघर्ष (HWC) में कैसे योगदान करते हैं?
रेलवे और राजमार्ग जैसी रेखीय अवसंरचना वन्यजीव आवासों एवं गलियारों को काटती हुई गुजरती हैं, जिससे पशु मृत्यु, प्रवासन में बाधा तथा मानव-वन्यजीव मुठभेड़ों में वृद्धि होती है।

3. मानव-वन्यजीव संघर्ष से निपटने हेतु कौन-से कानूनी उपाय मौजूद हैं?
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (जिसमें 2006 का गलियारों से संबंधित संशोधन शामिल है), जैव विविधता अधिनियम, 2002 तथा पशु अधिकारों पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय मानव-वन्यजीव संघर्ष से निपटने के लिये कानूनी ढाँचा प्रदान करते हैं।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न   

प्रिलिम्स

प्रश्न: 'वाणिज्य में प्राणिजात और वनस्पति-जात के व्यापार-संबंधी विश्लेषण (ट्रेड रिलेटेड एनालिसिस ऑफ फौना एंड फ्लोरा इन कॉमर्स / TRAFFIC)' के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2017)

  1. TRAFFIC, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के अंतर्गत एक ब्यूरो है। 
  2. TRAFFIC का मिशन यह सुनिश्चित करना है कि वन्य पादपों और जंतुओं के व्यापार से प्रकृति के संरक्षण को खतरा न हो।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं ?

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (b)


मेन्स

प्रश्न. बड़ी परियोजनाओं के नियोजन के समय मानव बस्तियों का पुनर्वास एक महत्त्वपूर्ण पारिस्थितिक संघात है, जिस पर सदैव विवाद होता है। विकास की बड़ी परियोजनाओं के प्रस्ताव के समय इस संघात को कम करने के लिये सुझाए गए उपायों पर चर्चा कीजिये। (2016)