भारत में लोकपाल स्थापना दिवस
चर्चा में क्यों?
भारत में लोकपाल स्थापना दिवस 16 जनवरी को मनाया गया, जो लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 की धारा 3 के लागू होने का प्रतीक है। वर्ष 2014 में भारत में लोकपाल की स्थापना का प्रावधान इसी धारा के माध्यम से किया गया था।
भारत में लोकपाल के संबंध में प्रमुख प्रावधान क्या हैं?
- भारत में लोकपाल की स्थापना: लोकपाल की अवधारणा सबसे पहले वर्ष 1963 में प्रस्तुत की गई थी, जिसका प्रेरणा स्रोत ओम्बड्समैन मॉडल था और इसकी औपचारिक अनुशंसा प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (1966) द्वारा की गई थी।
- भारत ने वर्ष 2011 में भ्रष्टाचार के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र अभिसमय को स्वीकार किया, जिसके परिणामस्वरूप लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 पारित हुआ। यह अधिनियम 16 जनवरी, 2014 को लागू हुआ और अधिनियम की धारा 3 के तहत औपचारिक रूप से भारत में लोकपाल की स्थापना की गई।
- लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 के पारित होने से पहले, कई राज्यों ने अपनी स्वीय विधियों के अंतर्गत लोकायुक्त संस्थाएँ स्थापित कर ली थीं, जिसमें महाराष्ट्र वर्ष 1971 में सबसे पहला राज्य था जिसने लोकायुक्त की स्थापना की।
- लोकपाल की संरचना: लोकपाल में एक अध्यक्ष और अधिकतम आठ सदस्य होते हैं। इसमें कम से कम 50% न्यायिक सदस्य होने चाहिये और SC, ST, OBC, अल्पसंख्यक तथा महिलाओं का अनिवार्य रूप से 50% प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया गया है।
- सदस्य पाँच वर्षों के लिये या 70 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो, पद पर रहते हैं, जिससे संस्था में विशेषज्ञता के साथ-साथ सामाजिक समावेशन सुनिश्चित होता है।
- नियुक्ति प्रक्रिया: इसके अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, जो एक चयन समिति की अनुशंसाओं के आधार पर होती है। इस चयन समिति में शामिल हैं: प्रधानमंत्री, लोकसभा के अध्यक्ष, विपक्ष के नेता, भारत के मुख्य न्यायाधीश या उनके नामित व्यक्ति और राष्ट्रपति द्वारा नामित एक प्रतिष्ठित न्यायविद।
- पात्रता मानदंड: लोकपाल के अध्यक्ष के लिये आवश्यक है कि वे सेवा में या सेवानिवृत्त भारत के मुख्य न्यायाधीश या सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश हों।
- न्यायिक सदस्य सेवा में या सेवानिवृत्त सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश या उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश में से चयनित किये जाते हैं।
- गैर-न्यायिक सदस्य सत्यनिष्ठ और ईमानदार होने चाहिये और अधिनियम के तहत निर्दिष्ट क्षेत्रों में कम से कम 25 वर्षों का अनुभव अनिवार्य है।
- लोकपाल का क्षेत्राधिकार: लोकपाल के क्षेत्राधिकार का विस्तार प्रधानमंत्री (राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश संबंध, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष और लोक व्यवस्था से संबंधित मामलों को छोड़कर), केंद्रीय मंत्री, संसद सदस्य और केंद्रीय सरकार के समूह A से D तक के अधिकारी तक होता है।
- यह उन संस्थाओं को भी शामिल करता है जिन्हें निर्दिष्ट शर्तों के तहत पर्याप्त सरकारी अनुदान या विदेशी योगदान प्राप्त होता है।
- अधिकार और कार्य: लोकपाल को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) द्वारा संदर्भित मामलों में किये जाने वाले जाँच पर पर्यवेक्षण का अधिकार प्राप्त है और प्रारंभिक जाँच के दौरान नागरिक न्यायालय के अधिकारों का प्रयोग करता है।
- यह तलाशी और जब्ती की अनुमति दे सकता है, अभियोजन या अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश कर सकता है, CVC को दिशानिर्देश जारी कर सकता है तथा संस्थागत भ्रष्टाचार के समाधान हेतु प्रणालीगत सुधार सुझा सकता है।
- शिकायत दर्ज करना: कोई भी व्यक्ति, NGO, कंपनी, ट्रस्ट, लिमिटेड लायबिलिटी पार्टनरशिप (LLP), यहाँ तक कि विदेशी नागरिक (पासपोर्ट के साथ) भी शिकायत दर्ज कर सकते हैं।
- शिकायतें केवल भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act), 1988 के तहत अपराधों से संबंधित होनी चाहिये।
- शिकायतें लोकपाल (शिकायत) नियम, 2020 के तहत निर्दिष्ट प्रारूप में ऑनलाइन या ऑफलाइन जमा की जा सकती हैं, और इसकी सीमित अवधि सात वर्ष होती है।
- गोपनीयता और सुरक्षा: लोकपाल जाँच और अन्वेषण के दौरान शिकायतकर्त्ता, गवाह और सरकारी कर्मचारियों की कड़ी गोपनीयता सुनिश्चित करता है।
- शिकायत निपटान तंत्र: शिकायतों को सामान्यतः जाँच के बाद 15 कार्यदिवसों के भीतर लोकपाल बेंच के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है।
- दोषपूर्ण शिकायतों पर भी विचार किया जाता है, सुधार के अवसर दिये जाते हैं और सरकारी कर्मचारियों को अपना बचाव प्रस्तुत करने के लिये कई चरण प्रदान किये जाते हैं, जिससे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन सुनिश्चित होता है।
- लोकपाल का महत्त्व: लोकपाल भारत के भ्रष्टाचार-विरोधी ढाँचे को सुदृढ़ करता है, क्योंकि यह उच्च सरकारी पदाधिकारियों को जवाबदेह ठहराने के लिये एक स्वतंत्र, वैधानिक तंत्र प्रदान करता है।
- जाँच अधिकार को प्रक्रिया संबंधी निष्पक्षता और गोपनीयता के साथ जोड़कर, लोकपाल लोकतांत्रिक प्रणाली में लोक विश्वास तथा नैतिक शासन को सुदृढ़ करता है।
लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013
- लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 निर्दिष्ट लोक पदाधिकारियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार संबंधी शिकायतों की जाँच के लिये केंद्र स्तर पर लोकपाल और राज्य स्तर पर लोकायुक्त की स्थापना का प्रावधान करता है।
- यह अधिनियम एक स्वतंत्र और वैधानिक भ्रष्टाचार-रोधी ढाँचे के माध्यम से लोक प्रशासन में पारदर्शिता, जवाबदेही और सत्यनिष्ठा को सुदृढ़ करने का उद्देश्य रखता है।
- इस अधिनियम में वर्ष 2016 में संशोधन किया गया ताकि लोकसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता को औपचारिक रूप से मान्यता प्राप्त नेता प्रतिपक्ष की अनुपस्थिति में लोकपाल चयन समिति का सदस्य बनाया जा सके।
- लोकायुक्त एक राज्य-स्तरीय भ्रष्टाचार-विरोधी प्राधिकारी है, जिसे लोक सेवकों के विरुद्ध शिकायतों और आरोपों की जाँच के लिये नियुक्त किया गया है।
- लोकायुक्त और उपलोकायुक्त की नियुक्ति राज्य के राज्यपाल द्वारा राज्य उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और राज्य विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष से परामर्श के बाद की जाती है।
- अधिकांश राज्यों में, लोकायुक्त पाँच वर्ष की अवधि के लिये या 70 वर्ष की आयु प्राप्त करने तक, जो भी पहले हो, पद धारण करता है और उसे कार्यकाल की सुरक्षा प्राप्त होती है, क्योंकि उसे हटाना केवल राज्य विधानमंडल द्वारा पारित महाभियोग प्रस्ताव के माध्यम से ही संभव है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. भारत का लोकपाल क्या है?
लोकपाल एक स्वतंत्र वैधानिक निकाय है, जिसकी स्थापना लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 के तहत निर्दिष्ट लोक पदाधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायतों की जाँच करने के लिये की गई है।
2. लोकपाल के अधिकार क्षेत्र में कौन-कौन आते हैं?
लोकपाल के अधिकार क्षेत्र में प्रधानमंत्री (कुछ अपवादों के साथ), केंद्रीय मंत्री, सांसद और समूह A–D के केंद्रीय सरकारी अधिकारी, साथ ही कुछ वित्त पोषित निकाय शामिल हैं।
3. लोकपाल के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति कैसे होती है?
इनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा एक चयन समिति की सिफारिशों के आधार पर की जाती है, जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, नेता प्रतिपक्ष, मुख्य न्यायाधीश या उनके द्वारा नामित व्यक्ति और एक प्रख्यात न्यायविद शामिल होते हैं।
4. भ्रष्टाचार के मामलों में लोकपाल के पास क्या-क्या अधिकार होते हैं?
लोकपाल CBI जैसी एजेंसियों के माध्यम से पूछताछ और जाँच का आदेश दे सकता है, दीवानी न्यायालयों की शक्तियों का प्रयोग कर सकता है और अभियोजन या अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा कर सकता है।
5. वर्ष 2016 में लोकपाल अधिनियम में किये गए संशोधन का क्या महत्त्व था?
इसने लोकसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता को मान्यता प्राप्त नेता प्रतिपक्ष की अनुपस्थिति में चयन समिति का हिस्सा बनने की अनुमति दी।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रिलिम्स
प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2019)
- भ्रष्टाचार के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन [यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन अगेंस्ट करप्शन (UNCAC)] का 'भूमि, समुद्र और वायुमार्ग से प्रवासियों की तस्करी के विरुद्ध एक प्रोटोकॉल' होता है।
- UNCAC अब तक का सबसे पहला विधितः बाध्यकारी सार्वभौम भ्रष्टाचार निरोधी लिखत है।
- राष्ट्र-पार संगठित अपराध के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन अर्गेस्ट ट्रांसनैशनल ऑर्गेनाइज्ड क्राइम (UNTOC)] की एक विशिष्टता ऐसे एक विशिष्ट अध्याय का समावेशन है, जिसका लक्ष्य उन संपत्तियों को उनके वैध स्वामियों को लौटाना है जिनसे वे अवैध तरीके से ले ली गई थीं।
- मादक द्रव्य और अपराध विषयक संयुक्त राष्ट्र कार्यालय [यूनाइटेड नेशंस ऑफिस ऑन ड्रग्स ऐंड क्राइम (UNODC)] संयुक्त राष्ट्र के सदस्य राज्यों द्वारा UNCAC और UNTOC दोनों के कार्यान्वयन में सहयोग करने के लिए अधिदेशित है।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
(a) केवल 1 और 3
(b) केवल 2, 3 और 4
(c) केवल 2 और 4
(d) 1, 2, 3 और 4
उत्तर: (c)
मेन्स
प्रश्न. 'राष्ट्रीय लोकपाल कितना भी प्रबल क्यों न हो, सार्वजनिक मामलों में अनैतिकता की समस्याओं का समाधान नहीं कर सकता।' विवेचना कीजिये। (2013)
वर्चुअल डिजिटल एसेट्स हेतु दिशा-निर्देश
फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट-इंडिया (FIU-IND) ने भारत के क्रिप्टोकरेंसी ईकोसिस्टम में वित्तीय अपराधों को रोकने के लिये आभासी डिजिटल परिसंपत्ति (VDAs) सेवा प्रदाताओं हेतु नवीन एंटी-मनी लॉन्डरिंग (AML) और अपने ग्राहक को जानो (KYC) दिशा-निर्देश जारी किये हैं।
आभासी डिजिटल परिसंपत्ति के लिये नए FIU-IND दिशा-निर्देश क्या हैं?
- सुधारित सत्यापन: उपयोगकर्त्ता पंजीकरण के दौरान लाइवनेस डिटेक्शन (आँख झपकना/सिर हिलाना) के साथ अनिवार्य लाइव सेल्फी और भौगोलिक ट्रैकिंग (अक्षांश, देशांतर, समय-टैंप, IP) लागू की गई है ताकि स्थिर फोटो या डीपफेक धोखाधड़ी को रोका जा सके।
- बहु-स्तरीय KYC: इसमें PAN के साथ द्वितीयक पहचान-पत्र (आधार/पासपोर्ट/मतदाता पहचान- पत्र), ईमेल/मोबाइल के लिये OTP सत्यापन और रु. 1 के लेनदेन के माध्यम से “पैनी-ड्रॉप” बैंक खाता पुष्टीकरण आवश्यक है।
- जोखिम-आधारित निगरानी: उच्च-जोखिम वाले ग्राहकों के लिये KYC हर 6 महीने में और अन्य ग्राहकों हेतु वार्षिक रूप से अपडेट किया जाएगा, उन संस्थाओं के लिये उन्नत सत्यापन (Enhanced Due Diligence) आवश्यक है, जो टैक्स हैवन, FATF ग्रे/ब्लैक लिस्ट, राजनीतिक रूप से प्रभावित व्यक्ति (PEPs) या गैर-लाभकारी संगठन (NPOs) से जुड़ी हों।
- अस्पष्ट वित्तीय उपकरणों पर सख्त नियंत्रण: इनिशियल कॉइन ऑफरिंग (ICOs) और इनिशियल टोकन ऑफरिंग (ITOs) को पूरी तरह हतोत्साहित किया गया है और अनोनिमिटी (पहचानरहित स्थिति) बढ़ाने वाले क्रिप्टो टंबतंबलर्स और मिक्सर्स की सुविधा प्रदान करना निषिद्ध किया गया है।
- क्रिप्टो टंबलर्स और मिक्सर्स ऐसी सेवाएँ हैं जो कई उपयोगकर्त्ताओं की धनराशि को एक साथ मिलाकर और उसे अव्यवस्थित (स्क्रैंबल) करके पुनः वितरित करती हैं, जिससे सार्वजनिक ब्लॉकचेन लेज़र पर लेनदेन की पहचान और उसका पता लगाना कठिन हो जाता है।
- नियामक अनुपालन: क्रिप्टो एक्सचेंजों को PMLA रिपोर्टिंग एंटिटी के रूप में पंजीकरण करना, ग्राहक और लेनदेन के रिकॉर्ड 5 वर्षों तक बनाए रखना और संदिग्ध लेनदेन की जानकारी FIU को रिपोर्ट करना अनिवार्य है।
- क्रिप्टोकरेंसी एक्सचेंज एक डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जो उपयोगकर्त्ताओं को क्रिप्टोकरेंसी को अन्य डिजिटल एसेट्स या पारंपरिक फिएट मुद्रा के साथ खरीदने, बेचने और ट्रेड करने की अनुमति देता है। उदाहरण: कॉइनबेस।
आभासी डिजिटल परिसंपत्ति (VDA) क्या हैं?
- परिचय: आभासी डिजिटल परिसंपत्ति (VDA) क्रिप्टोग्राफिक तकनीक द्वारा डिजिटल रूप में प्रदर्शित मूल्य हैं, जिन्हें भारत में तेज़ वृद्धि के संदर्भ में कराधान, वित्तीय सत्यनिष्ठा और मनी‑लॉन्ड्रिंग जोखिमों को नियंत्रित करने के लिये औपचारिक रूप से परिभाषित तथा विनियमित किया गया है।
- VDA के मुख्य प्रकार:
- क्रिप्टोकरेंसी: एक आदान-प्रदान के साधन के रूप में प्रयुक्त डिजिटल मुद्राएँ।
- नॉन-फंजिबल टोकन (NFTs): ऐसे अद्वितीय डिजिटल एसेट्स जो कला, संग्रहणीय वस्तुओं या वर्चुअल सामान के स्वामित्व का प्रतिनिधित्व करते हैं।
- यूटिलिटी टोकन (Utility Tokens): ब्लॉकचेन ईकोसिस्टम के भीतर विशिष्ट सेवाओं या प्लेटफॉर्म तक पहुँच प्रदान करते हैं।
- एसेट/सिक्योरिटी टोकन (Asset/Security Tokens): वास्तविक दुनिया की संपत्ति में स्वामित्व या हिस्सेदारी का प्रतिनिधित्व करते हैं।
- भारत में कानूनी परिभाषा: आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 2(47A) के तहत वैधानिक रूप से परिभाषित, जिसे वित्त अधिनियम, 2022 के माध्यम से शामिल किया गया।
- इसमें कोई भी जानकारी, कोड, संख्या या टोकन शामिल है (भारतीय और विदेशी मुद्रा को छोड़कर) जो क्रिप्टोग्राफिक माध्यम से उत्पन्न किया गया हो तथा डिजिटल मूल्य का प्रतिनिधित्व करता हो।
- यह स्पष्ट रूप से नॉन-फंजिबल टोकन (NFTs) और केंद्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित किसी भी अन्य डिजिटल एसेट को कवर करता है। इसका मुख्य रूप से क्रिप्टोकरेंसी (जैसे– बिटकॉइन, इथेरियम), NFTs तथा इसी तरह के टोकन पर विस्तार होता है।
- भारत में नियामक और कराधान संबंधी ढाँचा:
- कराधान: VDA (वर्चुअल डिजिटल एसेट) के हस्तांतरण से प्राप्त आय पर 30% के एकसमान दर से कर (1 अप्रैल, 2022 से प्रभावी)। अधिग्रहण लागत के अलावा कोई कटौती अनुमत नहीं; नुकसान की भरपाई अथवा आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।
- आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 194S के तहत निर्दिष्ट ट्रांजेक्शन पर 1% TDS लागू।
- आतंकरोधी वित्तपोषण/मनी लॉन्ड्रिंग पर्यवेक्षण: मार्च 2023 से VDA गतिविधियाँ धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (PMLA) के अंतर्गत आती हैं। क्रिप्टो एक्सचेंज और वॉलेट प्रदाताओं को रिपोर्टिंग इकाई माना जाता है, उन्हें FIU-IND के साथ पंजीकरण करना अनिवार्य है।
- कराधान: VDA (वर्चुअल डिजिटल एसेट) के हस्तांतरण से प्राप्त आय पर 30% के एकसमान दर से कर (1 अप्रैल, 2022 से प्रभावी)। अधिग्रहण लागत के अलावा कोई कटौती अनुमत नहीं; नुकसान की भरपाई अथवा आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।
वित्तीय आसूचना इकाई – भारत (FIU-IND)
- परिचय: FIU-IND भारत की केंद्रीय एजेंसी है, जो भारत में मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवादी वित्तपोषण का सामना करने के लिये वित्तीय खुफिया जानकारी प्राप्त करने, विश्लेषण करने और प्रसारित करने के लिये ज़िम्मेदार है।
- संस्थागत स्थिति: यह वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग के अधीन कार्य करती है और अपनी शक्तियाँ धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (PMLA) से प्राप्त करती है। यह प्रत्यक्ष रूप से वित्तमंत्री की अध्यक्षता वाली आर्थिक आसूचना परिषद (EIC) को रिपोर्ट करती है।
- क्रिप्टो क्षेत्र में नियामक भूमिका: FIU-IND PMLA के तहत क्रिप्टोकरेंसी एक्सचेंजों के लिये एकल-बिंदु नियामक है, जो अनिवार्य पंजीकरण, KYC अनुपालन और संदिग्ध ट्रांजेक्शन की रिपोर्टिंग की आवश्यकता को दर्शाती है।
- भारत में क्रिप्टोकरेंसी कानूनी निविदा नहीं है, लेकिन यह आय-कर कानून के अंतर्गत कर योग्य है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रश्न. "ब्लॉकचेन तकनीकी" के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2020)
- यह एक सार्वजनिक खाता है जिसका हर कोई निरीक्षण कर सकता है, परंतु जिसे कोई भी एक उपभोक्ता नियंत्रित नहीं करता।
- ब्लॉकचेन की संरचना और अभिकल्प ऐसा है कि इसका समूचा डेटा केवल क्रिप्टोकरेंसी के विषय में है।
- ब्लॉकचेन के आधारभूत वैशिष्ट्यों पर आधारित अनुप्रयोगों को बिना किसी व्यक्ति की अनुमति के विकसित किया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 1 और 2
(c) केवल 2
(d) केवल 1 और 3
उत्तर: (d)
प्रश्न. निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिये: (2018)
कभी-कभी समाचारों में आने वाले शब्द संदर्भ/विषय
- बेल II प्रयोग — कृत्रिम बुद्धि
- ब्लॉकचेन प्रौद्योगिकी —डिजिटल/क्रिप्टो मुद्रा
- CRISPR – Cas9 — कण भौतिकी
उपर्युक्त युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?
(a) केवल 1 और 3
(b) केवल 2
(c) केवल 2 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (b)
राष्ट्रमंडल के अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों का सम्मेलन
प्रधानमंत्री ने पुराने संसद भवन के ऐतिहासिक सेंट्रल हॉल (पूर्व में चैंबर ऑफ प्रिंसेज़) में राष्ट्रमंडल के अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों (CSPOC) के 28वें सम्मेलन का उद्घाटन किया।
- भारत ने 16 वर्षों के अंतराल के पश्चात CSPOC की मेज़बानी की है। इससे पूर्व इस सम्मेलन का आयोजन भारत में वर्ष 1971, 1986 तथा 2010 में किया गया था, जो संसदीय कूटनीति के क्षेत्र में भारत की बढ़ती भूमिका को प्रतिबिंबित करता है।
- CSPOC का मुख्य सम्मेलन द्विवार्षिक (प्रत्येक दो वर्ष में एक बार) आयोजित किया जाता है, जबकि मध्यवर्ती वर्ष में स्थायी समिति की बैठक होती है। इसके प्रमुख उद्देश्य हैं- पीठासीन अधिकारियों की निष्पक्षता सुनिश्चित करना, संसदीय लोकतंत्र से संबंधित ज्ञान का संवर्द्धन करना, संसदीय संस्थाओं को सुदृढ़ बनाना।
राष्ट्रमंडल (कॉमनवेल्थ) क्या है?
- परिचय: राष्ट्रमंडल 56 स्वतंत्र एवं समान देशों का एक स्वैच्छिक संघ है, जिसमें मुख्यतः ब्रिटिश साम्राज्य के पूर्व उपनिवेश शामिल हैं।
- जनवरी 2026 तक राष्ट्रमंडल के 15 देश ब्रिटेन के सम्राट किंग चार्ल्स तृतीय (जिन्होंने वर्ष 2022 में महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय के पश्चात पद सँभाला) को अपना राष्ट्राध्यक्ष मानते हैं; उदाहरणस्वरूप— कनाडा एवं न्यूज़ीलैंड।
- वर्ष 2021 में बारबाडोस ने आधिकारिक तौर पर महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय को अपने राज्य प्रमुख के पद से हटा दिया और डेम सैंड्रा के साथ बारबाडोस गणराज्य के पहले राज्य प्रमुख (राष्ट्रपति) के रूप में विश्व का नवीनतम गणराज्य बना।
- उद्भव: यह वर्ष 1926 के इंपीरियल सम्मेलन (लंदन) के समानता सिद्धांतों से विकसित होकर वर्ष 1949 के लंदन घोषणा-पत्र तक पहुँचा, जिसने गणराज्यों और गैर-ब्रिटिश राजतंत्रों को शामिल करके आधुनिक राष्ट्रमंडल की स्थापना की। गैबॉन और टोगो वर्ष 2022 में शामिल हुए।
- भारत की भूमिका: भारत जनसंख्या के हिसाब से सबसे बड़ा सदस्य देश है, चौथा सबसे बड़ा वित्तीय योगदानकर्त्ता है, इसने वर्ष 1983 का राष्ट्रमंडल शिखर सम्मेलन और वर्ष 2010 के राष्ट्रमंडल खेल (नई दिल्ली) जैसे प्रमुख आयोजनों की मेज़बानी की है। भारत वर्ष 2030 के राष्ट्रमंडल खेलों की मेज़बानी करेगा।
- मूल्य और शासन: यह राष्ट्रमंडल चार्टर द्वारा निर्देशित है, जो विकास, लोकतंत्र और शांति को बढ़ावा देता है, जिसमें लंदन स्थित राष्ट्रमंडल सचिवालय इन लक्ष्यों को प्राप्त करने में सदस्य देशों का समर्थन करता है।
चैंबर ऑफ प्रिंसेस
- अवस्थिति: यह पुराने संसद भवन (संविधान सदन) में स्थित है। इसे नरेंद्र मंडल के नाम से भी जाना जाता है और बाद में इसे लाइब्रेरी हॉल में पुनर्निर्मित किया गया।
- स्थापना और कार्य: इसकी स्थापना वर्ष 1919 के भारत शासन अधिनियम के तहत वर्ष 1920 में एक ब्रिटिश-निर्मित सलाहकार निकाय के रूप में की गई थी। यह 1921 से 1947 तक कार्यरत रहा, जिसमें भारत की रियासतों को वायसरॉय की अध्यक्षता में बैठकों के माध्यम से ब्रिटिश राजशाही के समक्ष मुद्दे उठाने की अनुमति थी।
- स्वतंत्रता के बाद की भूमिका: यहाँ 28 जनवरी, 1950 को अपनी स्थापना से लेकर अगस्त 1958 तक भारत का सर्वोच्च न्यायालय स्थित था। उससे पहले वर्ष 1937 से 1950 तक यहाँ भारत का फेडरल कोर्ट लगता था।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. कॉमनवेल्थ स्पीकर्स और प्रेसाइडिंग ऑफिसर्स सम्मेलन (CSPOC) क्या है?
CSPOC द्विवार्षिक सम्मेलन है, जिसमें संसदीय नेताओं की भागीदारी होती है। इसका उद्देश्य पीठासीन अधिकारी/प्रेसाइडिंग ऑफिसर्स में निष्पक्षता बनाए रखना और संसदीय लोकतंत्र को सुदृढ़ करना है।
2. 'चैंबर ऑफ प्रिंसेस' का ऐतिहासिक महत्त्व क्या था?
यह भारत सरकार अधिनियम, 1919 के तहत स्थापित और वर्ष 1921 से 1947 तक रियासतों के लिये ब्रिटिश क्राउन के समक्ष परामर्शात्मक निकाय के रूप में कार्य करता था। स्वतंत्रता के बाद इसमें फेडरल कोर्ट (1937-50) और भारतीय सर्वोच्च न्यायालय (1950-58) स्थित रहा।
3. आधुनिक कॉमनवेल्थ ऑफ नेशंस की शुरुआत के संबंध में बताइये।
आधुनिक कॉमनवेल्थ 1926 के इंपीरियल कॉन्फ्रेंस से लेकर 1949 के लंदन डिक्लेरेशन तक विकसित हुआ, जिसमें रिपब्लिक और गैर-ब्रिटिश राजशाही देशों को शामिल किया गया, जिससे यह स्वतंत्र राज्यों का एक स्वैच्छिक संगठन बन गया।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2010)
- राष्ट्रमंडल का कोई चार्टर, संधि या संविधान नहीं है।
- एक बार ब्रिटिश साम्राज्य (क्षेत्राधिकार/नियम/जनादेश) के अधीन सभी क्षेत्र/देश स्वतः ही इसके सदस्य के रूप में राष्ट्रमंडल में शामिल हो गए।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (a)
साइबर फाइनेंशियल फ्रॉड पर नई SOP
चर्चा में क्यों?
भारत की साइबर अपराध के उन्मूलन की क्षमता को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण पहल के तहत गृह मंत्रालय ने राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) के अंतर्गत साइबर वित्तीय धोखाधड़ी संबंधी मामलों के निपटारे हेतु एक नई मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) को स्वीकृति प्रदान की है।
- इस कदम का उद्देश्य, विशेष रूप से छोटी राशि के मामलों में, धोखाधड़ी से गई धनराशि की त्वरित वापसी सुनिश्चित करना और पीड़ित-केंद्रित शिकायत निवारण में सुधार करना है।
साइबर वित्तीय धोखाधड़ी पर नई मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) क्या है?
- परिचय: साइबर वित्तीय अपराध रिपोर्टिंग एवं प्रबंधन प्रणाली (CFCFRMS) के तहत साइबर वित्तीय धोखाधड़ी संबंधी मामलों के लिये नई SOP को राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल के माध्यम से लागू किया गया है और इसका समन्वय भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र द्वारा किया जाता है।
- यह ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों से निपटने के लिये संपूर्ण देश में लागू होने वाला एक समान और एकीकृत ढाँचा प्रदान करता है।
- मुख्य उद्देश्य: SOP का लक्ष्य धोखाधड़ी वाले ट्रांजेक्शन को तुरंत फ्रीज़ करना, पीड़ितों को उनका धन शीघ्र वापस दिलाना और वित्तीय मध्यस्थों की जवाबदेही सुनिश्चित करना है। साथ ही, यह साइबर अपराध प्रतिक्रिया को पीड़ित-केंद्रित और समयबद्ध मॉडल की ओर उन्मुख है।
- SOP में राहत: 50,000 रुपये से कम की धोखाधड़ी के मामलों में, न्यायालयी आदेश के बगैर ही धनवापसी की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है।
- यदि कोई न्यायालयी या बहाली आदेश मौज़ूद नहीं है, तो बैंकों को 90 दिनों के भीतर फ्रीज़ हटा लेना चाहिये, जिससे धन को अनिश्चित काल तक ब्लॉक होने से रोका जा सके।
- आवश्यकता: भारत ने छह वर्षों में साइबर धोखाधड़ी से 52,000 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान उठाया। पीड़ितों को प्रायः विलंब, लंबे समय तक खातों के फ्रीज़ होने और स्पष्टता की कमी का सामना करना पड़ता था।
- यह SOP प्रणालीगत कमियों को दूर करते हुए डिजिटल भुगतान ईकोसिस्टम में विश्वास को और अधिक सुदृढ़ बनाती है।
- संस्थानों के बीच प्रक्रियाओं का मानकीकरण: यह SOP बैंकों, गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC), भुगतान एग्रीगेटर्स, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म, स्टॉक-ट्रेडिंग ऐप्स और म्यूचुअल फंड हाउसों के लिये एक समान प्रक्रिया निर्धारित करती है, जिससे साइबर धोखाधड़ी से संबंधित शिकायतों के निपटारे में एकरूपता, तेज़ समन्वय तथा अस्पष्टता में कमी सुनिश्चित होती है।
- डिजिटल प्रणालियाँ: NCRP के अंतर्गत दो नए मॉड्यूल विकसित किये जाएंगे, जो वित्तीय संस्थानों, कानून प्रवर्तन एजेंसियों और पीड़ितों के बीच समन्वय को बेहतर बनाएंगे।
- शिकायत निवारण मॉड्यूल: शिकायतों की निगरानी और समाधान के लिये।
- धन पुनर्स्थापन मॉड्यूल: धोखाधड़ी से निकासी की गई राशि की त्वरित वापसी सुनिश्चित करने के लिये।
राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP)
- भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र के अंतर्गत राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) को वर्ष 2020 में राष्ट्र को समर्पित किया गया था। पूर्ववर्ती CCPWC पोर्ट को, जो केवल बाल यौन शोषण और बलात्कार से संबंधित मामलों तक सीमित था, नया रूप दिया गया। NCRP अब एक ही प्लेटफॉर्म के माध्यम से पूरे भारत में सभी प्रकार के साइबर अपराधों की रिपोर्टिंग की सुविधा प्रदान करता है।
- इसके प्रमुख फीचर्स में देश भर में साइबर अपराध की रिपोर्टिंग, ऑनलाइन बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) पर विशेष ध्यान, मामलों की स्थिति की ट्रैकिंग, बहु-स्तरीय निगरानी डैशबोर्ड तथा साइबर वालंटियर्स और वाणी–साइबरदोस्त (Vani–CyberDost) चैटबॉट के माध्यम से सहायता शामिल है।
- NCRP नागरिक वित्तीय साइबर धोखाधड़ी रिपोर्टिंग एवं प्रबंधन प्रणाली (CFCFRMS) को एकीकृत करता है, जो 85 से अधिक बैंकों और भुगतान मध्यस्थों को जोड़ती है। यह 1930 राष्ट्रीय हेल्पलाइन के माध्यम से वित्तीय धोखाधड़ी की रिपोर्टिंग की सुविधा देती है, जिससे कानून प्रवर्तन एजेंसियों, बैंकों, RBI, NPCI और अन्य हितधारकों के बीच त्वरित समन्वय संभव होता है, ताकि धन की अवैध निकासी को रोका जा सके तथा नुकसान की क्षतिपूर्ति की जा सके।
नोट: एक अन्य घटनाक्रम में, केंद्र सरकार ने “डिजिटल अरेस्ट” स्कैम के बढ़ते खतरे से निपटने के लिये गृह मंत्रालय के अंतर्गत एक उच्च-स्तरीय अंतर-विभागीय समिति का गठन किया है। रिपोर्ट की गई शिकायतों के आधार पर ही इन घोटालों से अब तक लगभग 3,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है और इससे बुज़ुर्ग और कमज़ोर वर्ग के लोग सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं।
- यह समिति भारतीय रिज़र्व बैंक और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो जैसी प्रमुख संस्थाओं के बीच समन्वय स्थापित करती है और रियल-टाइम प्रवर्तन की कमियों को दूर करने, पुलिस व न्यायालय की पहचान का दुरुपयोग रोकने तथा बड़े पैमाने पर होने वाली धोखाधड़ी के विरुद्ध सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिये Google एवं WhatsApp जैसे प्लेटफॅार्मों के साथ सहयोग कर रही है।
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और पढ़ें: ‘डिजिटल अरेस्ट’ स्कैम पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. साइबर वित्तीय धोखाधड़ी पर नया SOP क्या है?
यह गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा अनुमोदित एक समान पैन-इंडिया प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य NCRP और CFCFRMS के माध्यम से साइबर वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों का निपटारा करना है।
2. यह SOP पीड़ितों को कौन-सी प्रमुख राहत प्रदान करता है?
₹50,000 से कम की धोखाधड़ी के मामलों में न्यायालय के आदेश के बिना ही रिफंड की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है तथा यदि कोई आदेश मौजूद नहीं है तो बैंकों को 90 दिनों के भीतर धनराशि पर लगाया गया फ्रीज़ हटाना होगा।
3. इस SOP के अंतर्गत कौन-कौन से संस्थान शामिल हैं?
बैंक, NBFC, पेमेंट एग्रीगेटर्स, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म, स्टॉक-ट्रेडिंग ऐप्स तथा म्यूचुअल फंड हाउस।
4. भारत की साइबर अपराध रूपरेखा में NCRP क्यों महत्त्वपूर्ण है?
NCRP देश भर में सभी साइबर अपराधों की रिपोर्टिंग को सक्षम बनाता है, CFCFRMS को एकीकृत करता है तथा 1930 हेल्पलाइन के माध्यम से 85 से अधिक बैंकों और मध्यस्थों को जोड़कर त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न 1. भारत में व्यक्तियों के लिये साइबर बीमा के तहत धन की हानि और अन्य लाभों के भुगतान के अलावा, निम्नलिखित में से कौन-से लाभ आमतौर पर कवर किये जाते हैं? (वर्ष 2020)
- किसी के कंप्यूटर तक पहुँच को बाधित करने वाले मैलवेयर के मामले में कंप्यूटर सिस्टम की बहाली की लागत।
- एक नए कंप्यूटर की लागत अगर ऐसा साबित हो जाता है कि कुछ असामाजिक तत्त्वों ने जानबूझकर इसे नुकसान पहुँचाया है।
- साइबर जबरन वसूली के मामले में नुकसान को कम करने के लिये एक विशेष सलाहकार को काम पर रखने की लागत।
- यदि कोई तीसरा पक्ष मुकदमा दायर करता है तो न्यायालय में बचाव की लागत।
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1, 2 और 4
(b) केवल 1, 3 और 4
(c) केवल 2 और 3
(d) 1, 2, 3 और 4
उत्तर: (b)
प्रश्न 2. भारत में निम्नलिखित में से किसके लिये साइबर सुरक्षा घटनाओं पर रिपोर्ट करना कानूनी रूप से अनिवार्य है? (वर्ष 2017)
- सेवा प्रदाता
- डेटा केंद्र
- निगमित निकाय
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1
(b) केवल 1 और 2
(c) केवल 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (d)
मेन्स
प्रश्न. साइबर सुरक्षा के विभिन्न घटक क्या हैं? साइबर सुरक्षा में चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए जाँच करें कि भारत ने व्यापक राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा रणनीति को किस हद तक सफलतापूर्वक विकसित किया है? (वर्ष 2022)
रानी अहिल्याबाई होल्कर
उत्तर प्रदेश के वाराणसी में मणिकर्णिका घाट के नवीनीकरण कार्य के दौरान देवी अहिल्याबाई होल्कर की प्रतिमा वाले एक ढाँचे को ध्वस्त करने के आरोपों की जाँच का आदेश दिया गया है।
- मणिकर्णिका घाट नवीनीकरण परियोजना एक निजी कंपनी की कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व (CSR) पहल के तहत संचालित की जा रही है, जिसका उद्देश्य सुविधाओं का आधुनिकीकरण करना और पर्यावरण संबंधी समस्याओं का समाधान करना है।
रानी अहिल्याबाई होल्कर
- जन्म एवं पृष्ठभूमि: अहिल्याबाई का जन्म 31 मई, 1725 को चोंडी, अहमदनगर (महाराष्ट्र) में हुआ था। उनके पिता, मनकोजी राव शिंदे, ग्राम प्रधान थे।
- विवाह एवं प्रारंभिक जीवन: उनका विवाह वर्ष 1733 में मालवा के शासक और होल्कर वंश के संस्थापक मल्हार राव होल्कर के पुत्र खंडेराव होल्कर से हुआ था।
- वर्ष 1745 में खंडेराव होल्कर की कुम्हेर दुर्ग की घेराबंदी के दौरान मृत्यु हो जाने के बाद अहिल्याबाई विधवा हो गईं।
- मल्हार राव होल्कर ने अहिल्याबाई को सती होने से रोका और उन्हें सैन्य एवं प्रशासनिक मामलों में प्रशिक्षित किया।
- सत्ता में आरोहण: वर्ष 1766 में मल्हार राव होल्कर और वर्ष 1767 में उनके बेटे माले राव होल्कर की मृत्यु के बाद अहिल्याबाई होल्कर ने मालवा का कार्यभार सँभाला और 1767 में इंदौर की शासक बनीं।
- उन्होंने तुकोजी राव होल्कर को सेनापति नियुक्त किया और मध्य प्रदेश के महेश्वर को होल्कर राजवंश की राजधानी बनाया।
- योगदान: अहिल्याबाई होल्कर ने 18वीं शताब्दी में काशी विश्वनाथ और सोमनाथ मंदिरों का पुनर्निर्माण किया, भगवान शिव के प्रमुख ज्योतिर्लिंगों को पुनर्स्थापित किया और खुशाली राम, मराठी कवि मोरोपंत एवं शाहिर अनंतफंडी जैसे विद्वानों को संरक्षण प्रदान किया।
- वाराणसी में उनका सांस्कृतिक महत्त्व गहराई से समाहित है और पाल (गड़रिया) समुदाय उन्हें अपना पूर्वजरूपी आदर्श मानकर सम्मान देता है, जहाँ उनकी जयंती उत्साहपूर्वक मनाई जाती है।
- उन्होंने महिलाओं की शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह को भी बढ़ावा दिया और सती जैसी प्रथाओं का विरोध किया, साथ ही भील और गोंड जनजातियों तथा निचली जातियों के उत्थान में योगदान दिया।
- उन्होंने महेश्वर और इंदौर को प्रमुख व्यापारिक केंद्र बनाया, महेश्वरी बुनाई उद्योग को बढ़ावा दिया और महेश्वरी साड़ियों को संपूर्ण भारत में पहचान दिलाई, जो अब भौगोलिक संकेत (GI) टैग के साथ पंजीकृत हैं।
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और पढ़ें: अहिल्याबाई होल्कर की 300वीं जयंती |
मसाला बाज़ार में चीन का प्रवेश
चीन भारत के दो प्रमुख मसाला निर्यात, मिर्च एवं जीरा, की खेती और निर्यात को कम तथा अधिक प्रतिस्पर्द्धात्मक कीमतों पर उपलब्ध करा रहा है, यह बदलता परिदृश्य विश्व के सबसे बड़े मसाला आपूर्तिकर्त्ता के रूप में भारत के लंबे समय से स्थापित प्रभुत्व को चुनौती दे सकता है।
- मिर्च भारत के मसाला निर्यात की रीढ़ है, जो कुल निर्यात मात्रा और मूल्य का 25% से अधिक हिस्सा रखती है। वहीं जीरा उच्च मूल्य एवं सर्वाधिक मांग वाले मसालों में शामिल है, जिसकी पश्चिम एशिया, यूरोप और अमेरिका में विशेष रूप से अधिक मांग है, जहाँ इसका व्यापक उपयोग खाद्य प्रसंस्करण और पाक अनुप्रयोगों में किया जाता है।
- निर्यात प्रदर्शन: वर्ष 2024-25 में भारत ने मसाला निर्यात में मात्रात्मक रूप से उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की है। मिर्च पाउडर का निर्यात 35% बढ़कर 80.6 मिलियन कि.ग्रा. हो गया, जबकि कुल मिर्च निर्यात 19% बढ़कर 7 लाख टन से अधिक रहा। इसकी तुलना में वर्ष 2023-24 में वृद्धि दर 15% थी।
- मूल्य दबाव: अधिक निर्यात मात्रा के बावजूद वैश्विक स्तर पर अत्यधिक मूल्य दबाव के कारण मिर्च निर्यात से होने वाली आय में 11% की गिरावट दर्ज की गई। इसके विपरीत, जीरा निर्यात वर्ष 2023-24 के 1.65 लाख टन से बढ़कर वर्ष 2024-25 में 39% की वृद्धि के साथ 2.29 लाख टन तक पहुँच गया।
- चीन की रणनीति: चीन उच्च मांग वाली मिर्च प्रकारों जैसे कि पेपरिका (जो कि अपने रंग और हल्के स्वाद के लिये प्रसिद्ध है) और तेजा मिर्च (यह अधिक तीखेपन और औषधीय उपयोग के लिये प्रसिद्ध है) पर ध्यान केंद्रित करके वैश्विक मसाला बाज़ार में अपनी उपस्थिति मज़बूत कर रहा है। साथ ही, यह कच्ची भारतीय मिर्च का आयात कर उसे देश में प्रसंस्कृत करता है और तैयार उत्पादों को प्रतिस्पर्द्धी कीमतों पर तीसरे देशों के बाज़ारों में पुनः निर्यात करता है।
- भारतीय कृषि पर प्रभाव: भारत एक ही समय में कई प्रकार की चुनौतियों का सामना कर रहा है:
- आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक जैसे प्रमुख मिर्च उत्पादक राज्यों में मिर्च की बुआई का क्षेत्रफल लगभग 35% घट गया है। जीरा की खेती का क्षेत्रफल 7-8% कम हो गया है।
- ये गिरावटें मौसम संबंधी फसल हानि और लगातार कम निर्यात कीमतों के कारण हुई हैं, जिससे किसानों में विशेषकर खरीफ मौसम में मिर्च और जीरा बोने की रुचि कम हो गई है।
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और पढ़ें: भारत में मसालों का इतिहास |
पर्वतीय हिम-कोर संरक्षण हेतु विश्व की पहली रिपॉज़िटरी
हाल ही में वैज्ञानिकों ने अंटार्कटिक पठार पर स्थित कॉनकॉर्डिया अनुसंधान स्टेशन में पर्वतीय आइस/हिम-कोरों का विश्व का पहला वैश्विक भंडार उद्घाटित किया है, जिसका उद्देश्य ग्लोबल वार्मिंग के कारण तीव्र ग्लेशियर क्षय से जोखिम में पड़े महत्त्वपूर्ण जलवायु रिकॉर्ड को संरक्षित करना है।
- आइस मेमोरी सैंक्चुअरी नामक यह सुविधा आइस मेमोरी फाउंडेशन द्वारा विकसित की गई है, जो फ्राँस, इटली और स्विट्ज़रलैंड के यूरोपीय अनुसंधान संस्थानों का एक संघ है।
- यह आइस वॉल्ट सघनित हिम में निर्मित की गई एक गुफा है, जिसे लगभग -52°C के स्थिर तापमान पर बनाए रखा जाता है, ताकि भविष्य के वैज्ञानिक अनुसंधान के लिये हिम-कोरों का दीर्घकालिक संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके।
- पहले हिम-कोर जो अभयारण्य में संगृहीत किये गए थे, वे फ्राँस के मोंट ब्लांक और स्विट्ज़रलैंड के ग्रैंड कॉम्बिन पर्वत समूह से ड्रिल किये गए थे और उन्हें रेफ्रिजरेटेड जहाज़ों और विमानों का उपयोग करते हुए 50 दिनों की यात्रा के दौरान अंटार्कटिका ले जाया गया।
- हिम-कोर वायुमंडलीय टाइम कैप्सूल के रूप में कार्य करते हैं, जो हिम के दीर्घकालिक संपीडन से निर्मित होते हैं और इनमें गैसों, एयरोसोल, धूल, प्रदूषकों तथा अतीत की जलवायु परिस्थितियों के अन्य संकेतकों के अंश संरक्षित रहते हैं।
- ये प्रतिदर्श वैज्ञानिकों को सदियों के दौरान जलवायु में हुए ऐतिहासिक परिवर्तनों, जैसे– वायुमंडलीय संरचना, पर्यावरणीय प्रदूषण तथा जलवायु परिवर्तन की गति और कारणों का पुनर्निर्माण करने में सक्षम बनाते हैं।
- आइस मेमोरी परियोजना, जिसे वर्ष 2015 में शुरू किया गया था, अब तक विश्व भर के 10 ग्लेशियर स्थलों से हिम-कोर की पहचान कर उनकी ड्रिलिंग कर चुकी है। साथ ही, अगले एक दशक में इन प्रतिदर्शों को भविष्य की पीढ़ियों के लिये सुरक्षित रखने हेतु भंडारण के विस्तार और एक अंतर्राष्ट्रीय अभिसमय की स्थापना स्थापित किये जाने की योजना भी है।
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