भारत में FDI प्रवृत्तियाँ
उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्द्धन विभाग (DPIIT) के अनुसार, भारत में वित्त वर्ष 2025-26 की पहली छमाही (अप्रैल–सितंबर 2025) में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में प्रबल वृद्धि हुई, जो मुख्य रूप से IT क्षेत्र में निवेश प्रवाह दोगुना होने के कारण हुई।
- FDI प्रवाह: वित्त वर्ष 2025-26 की पहली छमाही (H1 FY26) में FDI प्रवाह बढ़कर 35.2 अरब डॉलर हो गया, जो H1 FY25 के 29.8 अरब डॉलर की तुलना में 18% की वृद्धि है। अप्रैल 2000 से सितंबर 2025 तक संचयी FDI प्रवाह 1.12 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच गया।
- शीर्ष निवेशक देश: 12 अरब डॉलर के FDI के साथ कुल निवेश में सिंगापुर का 34% योगदान रहा, इसके बाद अमेरिका (6.6 अरब डॉलर) और मॉरीशस (3.5 अरब डॉलर) का स्थान है।
- राज्यवार निवेश प्रवाह: महाराष्ट्र FDI का शीर्ष प्राप्तकर्त्ता बना रहा, जिसकी हिस्सेदारी लगभग 30% है। इसके बाद कर्नाटक (9.4 अरब डॉलर) और तमिलनाडु (3.6 अरब डॉलर) क्रमशः दूसरे और तीसरे सबसे बड़े प्राप्तकर्ता हैं, जबकि गुजरात का हिस्सा 6.4% तक घट गया।
- प्रमुख क्षेत्र: सर्विसेज़ सेक्टर और कंप्यूटर सॉफ्टवेयर एवं हार्डवेयर में से प्रत्येक की संचयी इक्विटी अंतर्वाह में 16% की हिस्सेदारी है। इसके अलावा ट्रेडिंग (6%), टेलीकॉम (5%) और ऑटोमोबाइल्स (5%) ने भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।
- नीतिगत सशक्तीकरण: बीमा में FDI सीमा को 100% तक बढ़ाना, GST का कार्यान्वयन और विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZs) का विकास जैसे सुधारों ने भारत के निवेश पारिस्थितिक तंत्र को मज़बूत किया है।
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असम में शीतकालीन प्रवासी पक्षी
प्रत्येक वर्ष शीतकाल में साइबेरिया, तिब्बत और यूरोप की कठोर शीत जलवायु से बचने के लिये मध्य एशियाई फ्लाईवे के माध्यम से आने वाले विभिन्न प्रवासी पक्षियों के लिये असम की आर्द्रभूमि, नदी तल, बाढ़ मैदान, प्राकृतिक और कृत्रिम जलाशय महत्त्वपूर्ण मौसमी आवास बन जाते हैं।
- मध्य एशियाई फ्लाईवे: असम मध्य एशियाई फ्लाईवे के साथ स्थित है, जो आर्कटिक और समशीतोष्ण क्षेत्रों को दक्षिण एशिया से जोड़ने वाला एक प्रमुख प्रवासी मार्ग है। जिसके चलते यह राज्य को लंबी दूरी के प्रवासी पक्षियों के लिये एक महत्त्वपूर्ण शीतकालीन विश्राम स्थल बनाता है।
- उल्लेखनीय प्रवासी प्रजातियाँ: सिट्रीन वैगटेल असम की आर्द्रभूमि, बाढ़ के मैदानों और दलदलों में आने वाला पहला आगंतुक पक्षी है।
- बार-हेडेड गीज़, व्हाइट-फ्रंटेड गीज़, ग्रेलैग गीज़।
- नॉर्दर्न पिंटेल, कॉमन पोचर्ड्स, फेरुगिनस पोचर्ड्स।
- पाइड एवोकेट्स, फालकेटेड डक्स, ग्रेट क्रेस्टेड ग्रीब्स।
- ग्लॉसी आइबिस, यूरेशियन विगियन्स, पर्पल हेरॉन।
- महत्त्वपूर्ण आर्द्रभूमि और पक्षी अवलोकन स्थल: प्रमुख प्रवासी पक्षी पर्यावासों में शामिल हैं दीपोर बील (रामसर स्थल), मागुरी मोटापुंग बील, पानी दिहिंग बील, सोन बील (असम की सबसे बड़ी आर्द्रभूमि), काज़ीरंगा राष्ट्रीय उद्यान और बाघ अभयारण्य (आर्द्रभूमि झीलें) और पोबितोरा वन्यजीव अभयारण्य।
- राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय संरक्षण ढाँचा: प्रवासी प्रजातियों पर अभिसमय (CMS) के एक पक्षकार के रूप में, भारत ने महत्त्वपूर्ण पर्यावासों और प्रवासी गलियारों की सुरक्षा के उद्देश्य से मध्य एशियाई फ्लाईवे के साथ प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण के लिये राष्ट्रीय कार्ययोजना शुरू की है।
- भारत अन्य प्रमुख प्रवासी प्रजातियों जैसे अमूर फाल्कन, ब्लैक-नेक्ड क्रेन, समुद्री कछुओं और हम्पबैक व्हेल का भी अस्थायी आवास भी है।
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बालकों एवं किशोरों में उच्च रक्तचाप
हाल ही में स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने रेखांकित किया है कि वर्ष 2000 से 2020 के बीच बालकों और किशोरों में उच्च रक्तचाप की व्यापकता वैश्विक स्तर पर लगभग दोगुनी हो गई है, जो बाल्यकालीन सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिये एक बढ़ती हुई चिंता का संकेत देती है।
- परिचय : बालकों में उच्च रक्तचाप बालकों एवं किशोरों में लगातार उच्च रक्तचाप को संदर्भित करता है, जिसका निदान वयस्कों के लिये निर्धारित की निश्चित सीमा के बजाय बालकों की आयु, लिंग और लंबाई-आधारित प्रतिशतक चार्ट (Percentile Chart) के माध्यम से किया जाता है।
- बाल्यकालीन बनाम वयस्क उच्च रक्तचाप : वयस्कों, जहाँ उच्च रक्तचाप प्रायः प्राथमिक प्रकृति का होता है, के विपरीत बालकों में पाया जाने वाला उच्च रक्तचाप अक्सर द्वितीयक प्रकृति का होता है, जो सामान्यतः गुर्दे, अधिवृक्क ग्रंथियों तथा रक्त वाहिकाओं से संबंधित विकारों से संबंधित होता है।
- कारण एवं जोखिम कारक (Causes and Risk Factors) : तीव्र शहरीकरण ने बालकों की जीवनशैली में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किये हैं, जिसके परिणामस्वरूप प्रसंस्कृत एवं अधिक नमक युक्त खाद्य पदार्थों का बढ़ता सेवन, शारीरिक गतिविधियों/व्यायाम में कमी, अत्यधिक स्क्रीन टाइम तथा पर्यावरणीय तनाव कारकों जैसे- ध्वनि प्रदूषण, वायु प्रदूषण और शैक्षणिक दबाव के प्रति अधिक संपर्क देखने को मिल रहा है।
- बाल्यावस्था में बढ़ता मोटापा, विशेषकर तेज़ी से वज़न बढ़ना और उदर मोटापा (Central Adiposity), बाल उच्च रक्तचाप (Paediatric Hypertension) के लिये सबसे महत्त्वपूर्ण संसोधन-योग्य जोखिम कारक बने हुए हैं।
- नैदानिक विशेषताएँ (Clinical Features) : यह स्थिति आरंभिक चरणों में प्रायः लक्षणहीन होती है और नियमित स्क्रीनिंग के अभाव में अक्सर इसकी पहचान नहीं हो पाती।
- स्वास्थ्य पर प्रभाव : बाल्यावस्था में लगातार बना रहने वाला उच्च रक्तचाप जीवनभर कोरोनरी हृदय रोग, स्ट्रोक, टाइप-2 मधुमेह तथा दीर्घकालिक गुर्दा रोग के जोखिम को बढ़ाता है। इसके अतिरिक्त, इससे रक्त वाहिकाओं को प्रारंभिक क्षति पहुँचती है तथा धमनियों में अपरिवर्तनीय कठोरता (Arterial Stiffness) विकसित होने लगती है।
- रोकथाम एवं प्रबंधन : रोकथाम की शुरुआत प्रारंभिक अवस्था से ही होनी चाहिये और इसका केंद्र जीवनशैली में सुधार होना चाहिये, जिसमें नमक एवं चीनी के सेवन में कमी, अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों से परहेज़, नियमित शारीरिक व्यायाम, पर्याप्त नींद तथा तनाव प्रबंधन शामिल हैं।
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ऑलिव रिडले कछुए
ऑलिव रिडले कछुओं (ORT) के प्रजनन और घोंसले बनाने (नेस्टिंग) के मौसम को मानवीय हस्तक्षेप ने गंभीर रूप से प्रभावित किया है, हाल ही में मत्स्य ग्रहण जालों में फँसकर हुई कछुओं की मृत्यु और तटीय क्षेत्रों में कृत्रिम प्रकाश से उत्पन्न होने वाले व्यवधान, इन लुप्तप्राय जीवों के अस्तित्व के लिये प्रमुख चिंता का विषय बन गए हैं।
- परिचय: ऑलिव रिडले कछुए विश्व के सबसे छोटे समुद्री कछुए होते हैं और इनका कवच (कैरापेस) हृदयाकार, जैतूनी या धूसर-हरे रंग का होता है।
- इनका वितरण मुख्य रूप से प्रशांत, हिंद और अटलांटिक महासागरों के उष्णकटिबंधीय (Tropical) क्षेत्रों तक विस्तृत है। ये जीव खुले महासागरीय परिवेश (Pelagic) और तटीय जल—दोनों ही प्रकार के पर्यावासों में निवास करने के लिये अनुकूलित हैं।
- आहार और व्यवहार: ORT सर्वाहारी जीव हैं, जो जेलीफिश, घोंघे, केकड़े और शैवाल का सेवन करते हैं। यह प्रशांत महासागर से हिंद महासागर तक लंबी दूरी का प्रवास कर नवंबर-दिसंबर माह के मध्य भारतीय तटों पर पहुँचकर अप्रैल-मई माह तक वहीं रहते हैं।
- यह प्रजाति खाड़ियों और संकरे रेतीले समुद्र तटों पर अपने मॉस नेस्टिंग (अरीबादा) के लिये जानी जाती है, जहाँ प्रत्येक मादा एक बार में लगभग 100-140 अंडे देती है।
- भारत में प्रमुख स्थल गहिरमाथा (सबसे बड़ा सामूहिक निडन (मास नेस्टिंग) स्थल), रुशिकुल्या, ओडिशा में देवी नदी का मुहाना, विशाखापत्तनम और काकीनाडा (आंध्र प्रदेश) तथा अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह हैं।
- विधिक संरक्षण: भारत में पाई जाने वाली समुद्री कछुओं की सभी 5 प्रजातियाँ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची I और CITES सम्मेलन के परिशिष्ट I के अंतर्गत कानूनी रूप से संरक्षित हैं। समुद्री कछुए IUCN की रेड लिस्ट में संकटग्रस्त प्रजाति के रूप में सूचीबद्ध हैं।
- संरक्षण उपाय: भारतीय तटरक्षक बल द्वारा संचालित 'ऑपरेशन ओलिविया' के तहत मत्स्य ग्रहण पर प्रतिबंध लागू किया गया है। ओडिशा में टर्टल एक्सक्लूडर डिवाइसेस (TED) अनिवार्य हैं। टैगिंग कार्यक्रम प्रवास पर नज़र रखने में सहायक होते हैं।
- तमिलनाडु में ऑलिव रिडले कछुओं के आवागमन, नेस्टिंग तथा मत्स्य गतिविधियों के साथ उनकी अंतःक्रिया की निगरानी हेतु उपग्रह एवं फ्लिपर टैग के माध्यम से वर्ष 2025–2027 के दौरान एक द्विवर्षीय टेलीमेट्री अध्ययन किया जाएगा।
- प्रमुख खतरे: अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर प्रतिबंध के बावजूद ऑलिव रिडले कछुए अवैध शिकार और अंडों के व्यापार के कारण गंभीर रूप से प्रभावित हैं। इनमें सर्वाधिक मृत्यु दर निडन (नेस्टिंग) के मौसम में ट्रॉल और गिल जालों में फँसने के कारण होती है
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डब्ल्यू उर्से मेजोरिस और स्टेलर इवोल्यूशन
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के अंतर्गत आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (ARIES) और भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (PRL) के खगोलविदों द्वारा किये गए एक अध्ययन से डब्ल्यू उर्से मेजोरिस-प्रकार के कांटेक्ट बाइनरी स्टार के संदर्भ में नई अंतर्दृष्टि मिली है।
- डब्ल्यू उर्से मेजोरिस (W UMa) स्टार: ये लघु अवधि वाले, डंबल आकार के कांटेक्ट बाइनरी स्टार हैं, जिनमें दो तारे एक-दूसरे की परिक्रमा करते हुए एक सामान्य बाह्य वातावरण साझा करते हैं जिससे वे तारकीय विकास सिद्धांतों के परीक्षण के लिये तारकीय द्रव्यमान, त्रिज्या और तापमान के सटीक मापन के क्रम में प्राकृतिक प्रयोगशाला बन जाते हैं।
- बाइनरी स्टार: यह दो तारों की एक प्रणाली है जो गुरुत्वीय रूप से जुड़े होते हैं और एक सामान्य द्रव्यमान केंद्र (बैरीसेंटर) की परिक्रमा करते हैं।
- दोनों तारे द्रव्यमान, आकार और चमक में भिन्न हो सकते हैं जिसमें बड़े तारे को प्राइमरी स्टार और छोटे तारे को द्वितीयक या सहचारी तारा कहा जाता है।
एक तारे का जीवन-चक्र
- उत्पत्ति: स्टार आणविक मेघों (शीतल, विशाल गैस एवं धूम्र मेघ जिनका द्रव्यमान 1,000 से 10 मिलियन सौर द्रव्यमान तक होता है और सैकड़ों प्रकाश वर्ष तक विस्तारित होते हैं) में निर्मित होते हैं।
- आणविक मेघ शीतल होते हैं जिससे गैस उच्च घनत्व वाले क्षेत्रों में संकेंद्रित हो जाती है, जिसमें टकराव और संचयन के माध्यम से वृद्धि होती है। जैसे-जैसे गुरुत्वाकर्षण तीव्र होता है ये समूह कोलैप्स हो जाते हैं और गर्म हो जाते हैं, जिससे एक प्रोटोस्टार का निर्माण होता है।
- नवगठित तारों के समूहों को तारकीय समूह (स्टेलर क्लस्टर) कहा जाता है और ऐसे क्षेत्रों को तारकीय नर्सरी (स्टेलर नर्सरी) के रूप में जाना जाता है।
- आणविक मेघ शीतल होते हैं जिससे गैस उच्च घनत्व वाले क्षेत्रों में संकेंद्रित हो जाती है, जिसमें टकराव और संचयन के माध्यम से वृद्धि होती है। जैसे-जैसे गुरुत्वाकर्षण तीव्र होता है ये समूह कोलैप्स हो जाते हैं और गर्म हो जाते हैं, जिससे एक प्रोटोस्टार का निर्माण होता है।
- मुख्य अनुक्रम चरण: एक प्रोटोस्टार प्रारंभ में गुरुत्वीय पतन (Gravitational Collapse) से मुक्त हुई ऊष्मा से चमकता है। लाखों वर्षों बाद इसके कोर में अत्यधिक दाब और तापमान नाभिकीय संलयन को प्रेरित करता है, जो हाइड्रोजन को हीलियम में बदलता है और ऊर्जा को विमुक्त करता है जिससे गुरुत्वाकर्षण संतुलित होता है।
- इस प्रक्रिया से स्थिर रूप से गमन करने वाले तारों को मेन सीक्वेंस स्टार कहा जाता है, जो तारकीय चक्र का सबसे लंबा चरण है जिसके दौरान चमक, आकार और तापमान में धीरे-धीरे बदलाव होते हैं।
- तारे का द्रव्यमान उसकी अवधि को नियंत्रित करता है- कम द्रव्यमान वाले तारे बहुत लंबे समय तक बने रहते हैं, जबकि विशाल तारे तेज़ी से जलते हैं और उनका कम अवधि में ही विघटन हो जाता है।
- विघटन: जब किसी तारे के केंद्र में हाइड्रोजन समाप्त हो जाती है तो संलयन दाब कम हो जाता है और केंद्र का क्षय प्रारंभ हो जाता है, जिससे तारा विस्तारित होता है और गर्म होता है।
- कम द्रव्यमान वाले तारों में जब तारा विशालकाय आकार ले लेता है तो हीलियम, कार्बन में संलयित होती है और अंततः यह अपनी बाहरी परतों को हटाकर एक ग्रहीय नीहारिका का निर्माण करता है।
- अपनी बाहरी परतों को हटाने के बाद, कम द्रव्यमान वाला तारा एक सघन श्वेत वामन (व्हाइट ड्वार्फ) उत्सर्जित करता है जिसे शीत होने में अरबों वर्ष लग जाते हैं।
- उच्च द्रव्यमान वाले तारों में संलयन से आयरन जैसे भारी तत्त्व का निर्माण जारी रहता है। एक बार आयरन बन जाने पर ऊर्जा उत्पादन रुक जाता है।
- जब किसी तारे का आयरन कोर कोलैप्स और रीबाउंड होता है, तो यह एक विशाल सुपरनोवा विस्फोट को कारण बनता है। कोर एक न्यूट्रॉन स्टार या ब्लैक होल के रूप में होता है जबकि निष्कासित पदार्थ भविष्य के आणविक मेघों को समृद्ध करता है, जिससे नए स्टार के निर्माण में सहायता मिलती है।
माधव गाडगिल और WGEEP
प्रतिष्ठित पारिस्थितिकीविज्ञानी माधव गाडगिल का अल्पकालिक बीमारी के बाद निधन हो गया। उन्हें पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल (WGEEP), 2011 के अध्यक्ष के रूप में याद किया जाता है, उनकी महत्त्वपूर्ण रिपोर्ट, जिसे अस्वीकार कर दिया गया था, आज भी इस क्षेत्र में पारिस्थितिकी संकट और भूस्खलनों के दौरान संदर्भ के रूप में प्रयोग की जाती है।
पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल (WGEEP) क्या था?
- परिचय: WGEEP, जिसे आमतौर पर गाडगिल आयोग के नाम से जाना जाता है, पर्यावरण अनुसंधान आयोग था, जिसे 2010 (रिपोर्ट 2011 में प्रस्तुत की गई) में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा गठित किया गया था।
- जनादेश: इसे प्रो. माधव गाडगील की अध्यक्षता में बनाया गया था, जिसका उद्देश्य पश्चिमी घाट (जो UNESCO विश्व धरोहर स्थल और वैश्विक जैव विविधता हॉटस्पॉट हैं) की पारिस्थितिक स्थिति का मूल्यांकन, उसके पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों (ESAs) के सीमा निर्धारण और संरक्षण, पुनरुत्थान तथा सतत विकास के लिये उपायों की सिफारिश करना था।
- मुख्य सिफारिशें:
- ESA के रूप में नामांकन: संपूर्ण पश्चिमी घाट (1,29,037 वर्ग किमी.) को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) के रूप में नामित किया गया और संवेदनशीलता के स्तर के आधार पर संपूर्ण पश्चिमी घाट को 3 पारिस्थितिक संवेदनशील क्षेत्रों (ESZ) में वर्गीकृत किया गया, अर्थात ESZ1 (उच्चतम संवेदनशीलता), ESZ2 (उच्च संवेदनशीलता) और ESZ3 (मध्यम संवेदनशीलता)।
- मुख्य क्षेत्रीय दिशा-निर्देश: जीन संपादित फसलों, नए विशेष आर्थिक क्षेत्रों (SEZs) और नए हिल स्टेशन पर प्रतिबंध।
- कोई नया खनन लाइसेंस नहीं, सबसे संवेदनशील क्षेत्रों (ESZ 1 और ESZ 2) में मौजूदा खानों को पाँच वर्षों के भीतर समाप्त किया जाएगा।
- ESZ 1 और ESZ 2 में नए प्रमुख बुनियादी ढाँचे, जैसे– रेलवे लाइन और बड़ी सड़क के निर्माण पर प्रतिबंध, सिवाय उन स्थानों के जहाँ आवश्यक हो।
- संस्थागत सिफारिश: पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत एक वैधानिक पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी प्राधिकरण (WGEA) के गठन का प्रस्ताव।
- यह सर्वोच्च, बहु-राज्यीय निकाय पश्चिमी घाट में स्थित छह राज्यों (गुजरात, गोवा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु) में सभी गतिविधियों को नियंत्रित, प्रबंधित और नियोजित करेगा।
- इसमें विशेषज्ञ क्षेत्र विशेषज्ञ, संसाधन विशेषज्ञ और सरकारी प्रतिनिधि शामिल होंगे।
- समावेशी विकास: रिपोर्ट ने समावेशी विकास के पक्ष में सिफारिश की, जिसमें निर्णय सभी ग्राम सभाओं तक पहुँचाए जाए, ताकि विकास और संरक्षण के बहिष्कारी मॉडलों को बदला जा सके।
- विवाद और अस्वीकृति: इसे राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ा, विशेषकर केरल और महाराष्ट्र से, क्योंकि इसे आर्थिक गतिविधियों, जैसे– नकदी फसलें (उदाहरण: इडुक्की तथा वायनाड), खनन एवं जलविद्युत परियोजनाओं के लिये खतरा माना गया।
- मुख्य आपत्तियों में प्रस्तावित WGEA के साथ संस्थागत टकराव और यह डर शामिल था कि कड़े नियमों के कारण कृषि तथा आवासीय गतिविधियाँ असंभव हो जाएँगी।
- आखिरकार, उस समय केंद्र सरकार ने इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया।
- के. कस्तूरीरंगन समिति: गाडगिल रिपोर्ट के विरोध के बाद पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने अंतरिक्ष वैज्ञानिक के. कस्तूरीरंगन के अधीन एक उच्च स्तरीय कार्यदल का गठन किया ताकि WGEEP रिपोर्ट की एक समग्र और बहु-विषयक तरीके से जाँच की जा सके।
- वर्ष 2013 की HLWG रिपोर्ट ने पश्चिमी घाट के 56,825 वर्ग किमी. को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील के रूप में सीमांकित करने का प्रस्ताव दिया, जिसमें प्रदूषणकारी उद्योगों, खनन, नए तापीय ऊर्जा संयंत्रों और बड़े टाउनशिप पर प्रतिबंध होंगे। गाडगिल समिति के विपरीत, इसने विशिष्ट गाँवों को ESA के रूप में पहचाना।
माधव गाडगिल
- परिचय: माधव गाडगिल एक अग्रणी भारतीय पारिस्थितिकीविद् थे, जो भारत में पारिस्थितिकी और पर्यावरण संरक्षण की मुखर आवाज़ों में से एक के रूप में प्रसिद्ध थे। उनके पिता, धनंजय गाडगिल, भारत के अग्रणी अर्थशास्त्रियों में से एक थे और क्लासिक "द इंडस्ट्रियल इवोल्यूशन ऑफ इंडिया इन रिसेंट टाइम्स" के लेखक थे, जो सर्वप्रथम वर्ष 1924 में प्रकाशित हुई थी।
- संस्था निर्माता: उन्होंने वर्ष 1982 में भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बंगलुरु में केंद्रीय पारिस्थितिकी विज्ञान (CES) की स्थापना की, जो पारिस्थितिकी अध्ययन के लिये एक प्रमुख केंद्र बन गया। उनके शोध ने नीलगिरि बायोस्फीयर रिज़र्व (1986) की स्थापना में योगदान दिया और जैव विविधता अधिनियम, 2002 और वन अधिकार अधिनियम, 2006 के लिये महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
- पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ समिति (WGEEP): उनकी सबसे प्रमुख भूमिका पश्चिमी घाट के संरक्षण के लिये गठित WGEEP (गाडगिल समिति) के अध्यक्ष के रूप में थी।
- साहित्यिक योगदान: उन्होंने इतिहासकार रामचंद्र गुहा के साथ "दिस फिशर्ड लैंड: एन ईकोलॉजिकल हिस्ट्री ऑफ इंडिया" और "ईकोलॉजी एंड इक्विटी" जैसी कृतियों का सह-लेखन किया।
- सम्मान: उन्होंने प्रतिष्ठित शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार, पद्म श्री और पद्म भूषण जैसे पुरस्कारों को प्राप्त किया।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल (WGEEP) क्या है?
पश्चिमी घाट की पारिस्थितिकी का मूल्यांकन करने और संरक्षण एवं सतत विकास के लिये उपायों की सिफारिश करने के लिये माधव गाडगिल की अध्यक्षता में MoEFCC के अंतर्गत वर्ष 2010 में WGEEP या गाडगिल आयोग की स्थापना की गई थी।
2. गाडगिल पैनल की प्रमुख सिफारिशें क्या हैं?
प्रमुख सिफारिशों में संवेदनशील क्षेत्रों में खनन, आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों, विशेष आर्थिक क्षेत्रों (SEZ), नए हिल स्टेशनों और प्रमुख बुनियादी ढाँचे पर प्रतिबंध लगाने के साथ-साथ शासन के लिये एक पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी प्राधिकरण (WGEA) का गठन शामिल हैं।
3. कस्तूरीरंगन पैनल क्या है, यह WGEEP से किस प्रकार भिन्न है?
वर्ष 2013 में गठित कस्तूरीरंगन पैनल ने एक छोटे ESA (56,825 वर्ग किमी.) का प्रस्ताव रखा, जिसमें विनियमन के लिये विशिष्ट गाँवों की पहचान की गई और व्यापक WGEEP दृष्टिकोण के विपरीत, उद्योगों, खनन और बड़े कस्बों पर प्रतिबंधों पर ध्यान केंद्रित किया गया।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2017)
- भारत में हिमालय केवल पाँच राज्यों में फैला हुआ है।
- पश्चिमी घाट केवल पाँच राज्यों में फैले हुए हैं।
- पुलीकट झील केवल दो राज्यों में फैली हुई है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 3
(c) केवल 2 और 3
(d) केवल 1 और 3
उत्तर: (b)
प्रश्न. कभी-कभी समाचारों में आने वाली 'गाडगिल समिति रिपोर्ट' और 'कस्तूरीरंगन समिति रिपोर्ट' संबंधित हैं: (2016)
(a) सांविधानिक सुधारों से
(b) गंगा कार्य-योजना (गंगा ऐक्शन प्लान) से
(c) नदियों को जोड़ने से
(d) पश्चिमी घाटों के संरक्षण से
उत्तर: (d)
प्रश्न. भारत के निम्नलिखित में से किस वर्ग के आरक्षित क्षेत्रों में स्थानीय लोगों को जीवभार एकत्रित करने और उसके उपयोग की अनुमति नहीं है? (2012)
(a) जैव मंडलीय आरक्षित क्षेत्रों में
(b) राष्ट्रीय उद्यानों में
(c) रामसर सम्मेलन में घोषित आर्द्रभूमियों में
(d) वन्यजीव अभयारण्यों में
उत्तर: (b)
विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1967
प्रिलिम्स के लिये: भारत के सर्वोच्च न्यायालय, 16वें संवैधानिक संशोधन (1963), राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण, आतंकवाद के वित्तपोषण को रोकने के लिये अंतर्राष्ट्रीय अभिसमय
मेन्स के लिये: UAPA का विकास और इसके संवैधानिक निहितार्थ, राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन
चर्चा में क्यों?
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2020 में हुए दिल्ली दंगों के मामले में ज़मानत से इनकार कर दिया, जिसमें विधि विरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1967 की धारा 15 के तहत "आतंकवादी कार्य" की व्यापक परिभाषा पर भरोसा किया गया।
- इस निर्णय से इस बात पर नए सिरे विमर्श शुरू हो गया है कि आतंकवाद-रोधी कानून आतंकवाद की पूर्ववर्ती अवधारणा की तुलना में कहीं अधिक व्यापक हो गया है।
सारांश
- UAPA एक सीमित स्वातंत्र्योत्तर कानून से एक व्यापक आतंकवाद विरोधी ढाँचे में विकसित हुआ है, जिसकी धारा 15 के अंतर्गत आतंकवाद की दी गई व्यापक परिभाषा और सख्त ज़मानत प्रावधान इसे आतंकवाद की पूर्व अवधारणाओं से बहुत आगे ले जाते हैं।
- हालाँकि UAPA राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक आतंकवाद रोधी प्रतिबद्धताओं के लिये महत्त्वपूर्ण बना हुआ है, सुरक्षा को लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ संतुलित करने के लिये स्पष्ट परिभाषाएँ, निष्पक्ष ज़मानत प्रावधान, त्वरित मुकदमे, गलत नज़रबंदी के लिये मुआवज़ा और मज़बूत निगरानी जैसे लक्षित सुधार आवश्यक हैं।
विधि विरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1967 क्या है?
- यह आतंकवाद-विरोधी और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून है जो भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को संकट में डालने वाली गतिविधियों पर अंकुश लगाता है।
- UAPA की उत्पत्ति जवाहरलाल नेहरू के अधीन गठित राष्ट्रीय एकता परिषद से हुई है, जिसका उद्देश्य सांप्रदायिकता, क्षेत्रवाद और भाषायी अंधराष्ट्रवाद का समाधान करना था।
- इसकी सिफारिशों के कारण 16वाँ संवैधानिक संशोधन (1963) हुआ, जिसने राष्ट्रीय अखंडता के हित में भाषण, सभा और संघ की स्वतंत्रता पर उचित प्रतिबंध लगाए, और इन संवैधानिक परिवर्तनों को लागू करने के लिये UAPA अधिनियमित किया गया।
- वर्ष 1967 में अधिनियमित यह कानून प्रारंभ में स्वतंत्रता के बाद भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को खतरे में डालने वाली विधि विरुद्ध गतिविधियों को लक्षित करता था, जो अलगाववादी और राष्ट्र विरोधी आंदोलनों से चिह्नित था और इसने अपने मूल रूप में आतंकवाद को संबोधित नहीं किया था।
- UAPA की उत्पत्ति जवाहरलाल नेहरू के अधीन गठित राष्ट्रीय एकता परिषद से हुई है, जिसका उद्देश्य सांप्रदायिकता, क्षेत्रवाद और भाषायी अंधराष्ट्रवाद का समाधान करना था।
- UAPA का विकास:
- वर्ष 2004 का संशोधन: आतंकवादी गतिविधियों और उनसे संबंधित दंड पर अध्याय IV (धारा 15–23) जोड़कर UAPA में आतंकवाद को पेश किया।
- इसने आतंकवाद को हिंसक कार्यों के रूप में परिभाषित किया, जिनका उद्देश्य भारत की सुरक्षा को खतरे में डालना या लोगों के बीच आतंक का विस्तार करना था और "विधि विरुद्ध क्रियाकलाप" के दायरे को भारत के खिलाफ असंतोष उत्पन्न करने वाले कार्यों को शामिल करने के लिये विस्तारित किया।
- वर्ष 2008 का संशोधन: 26/11 मुंबई आतंकवादी हमलों के बाद संसद ने "बाय एनी अदर मींस" वाक्यांश जोड़कर धारा 15 को व्यापक बनाया, जिससे आतंकवाद की परिभाषा को व्यापक गतिविधियों तक बढ़ा दिया।
- इस संशोधन ने ज़मानत पर रोक लगाकर इससे संबंधित मानदंडों को कठोर कर दिया, नियमित ज़मानत को अत्यंत कठिन बना दिया, हिरासत अवधि बढ़ा दी और विनिर्दिष्ट मामलों में दोष की धारणा शुरू की।
- वर्ष 2012 का संशोधन: आतंकवाद की परिभाषा को आर्थिक सुरक्षा के खतरों को शामिल करने के लिये विस्तारित किया, जिसमें वित्तीय, खाद्य, ऊर्जा, आजीविका और पर्यावरणीय सुरक्षा शामिल हैं।
- वर्ष 2019 का संशोधन: इससे न केवल संगठनों को बल्कि व्यक्तियों को भी आतंकवादी घोषित करने की अनुमति दी गई तथा राज्य की सहमति के बिना संपत्ति ज़ब्त करने सहित राष्ट्रीय अन्वेषण अधिकरण (NIA) की शक्तियों को बढ़ाया गया।
- आतंकवाद की परिभाषा: भारतीय विधि विरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1967 की धारा 15 के तहत ‘आतंकवादी कृत्य’ को किसी ऐसे कृत्य के रूप में परिभाषित किया गया है, जो भारत की एकता, अखंडता, संप्रभुता, सुरक्षा या आर्थिक सुरक्षा को खतरे में डालने या भारत या किसी बाह्य देश में लोगों के बीच आतंक फैलाने के उद्देश्य से किया गया हो।
- कानून में विस्फोटक पदार्थ, आग्नेयास्त्र, विष, रसायन, खतरनाक पदार्थों या “किसी भी अन्य साधन” के माध्यम से किये गए कृत्यों को भी अपने दायरे में सम्मिलित करता है।
- UAPA के तहत आतंकवादी कृत्यों के लिये न्यूनतम 5 वर्ष के कारावास के दंड का प्रावधान है, जिसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है और यदि ऐसे कृत्यों के परिणामस्वरूप मृत्यु होती है, तो सज़ा मृत्युदंड या आजीवन कारावास हो सकती है, इस प्रकार यह गंभीर एवं हिंसक अपराधों को भी समाहित करता है।
- इस व्यापक शब्दावली के तहत भय या व्यवधान उत्पन्न करने की संभावना वाले कृत्यों को आतंकवाद के रूप में अभियोजित किया जा सकता है।
- वर्ष 2004 का संशोधन: आतंकवादी गतिविधियों और उनसे संबंधित दंड पर अध्याय IV (धारा 15–23) जोड़कर UAPA में आतंकवाद को पेश किया।
UAPA के पक्ष और विपक्ष में क्या तर्क हैं?
पक्ष में तर्क:
- राष्ट्रीय सुरक्षा का संरक्षण: यह आतंकवाद, उग्रवाद और भारत की संप्रभुता, अखंडता और आर्थिक सुरक्षा को खतरे में डालने वाली गतिविधियों के खिलाफ निवारक कार्रवाई के लिये विधिक आधार प्रदान करता है, जिससे हिंसा बढ़ने से पहले राज्य को कार्रवाई करने में सक्षम बनाया जा सके।
- सुरक्षा उपाय के रूप में निवारक निरोध: यह संदिग्धों को आसन्न खतरों को रोकने के लिये हिरासत में लेने की अनुमति देता है, विशेष रूप से दंगों, कट्टरता या संगठित चरमपंथी नेटवर्क से जुड़े मामलों में, जहाँ हमलों की प्रतीक्षा करने से बड़े पैमाने पर नुकसान हो सकता है।
- अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों के साथ संरेखण: यह भारतीय विधि को वैश्विक आतंकवाद-विरोधी मानदंडों के अनुरूप लाता है, जिसमें संयुक्त राष्ट्र के उपाय जैसे कि इंटरनेशनल कन्वेंशन फॉर द सप्रेशन ऑफ टेररिस्ट बॉम्बिंग्स (1997) और इंटरनेशनल कन्वेंशन फॉर द सप्रेशन ऑफ द फाइनेंसिंग टेररिज़्म (1999) शामिल हैं, जिससे अंतर्राष्ट्रीय सहयोग एवं संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों का अनुपालन संभव हो पाता है।
- आतंकी गतिविधियों के विरुद्ध निवारक प्रभाव: कठोर दंड और लंबी सज़ाएँ आतंकवाद में भागीदारी या समर्थन के खिलाफ एक निवारक के रूप में काम करती हैं, जो राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालने वाले कृत्यों के प्रति शून्य सहिष्णुता का संकेत देती हैं।
- आतंकवादी वित्तपोषण पर रोक: आतंकवाद के वित्तपोषण, धनशोधन और नकली मुद्रा प्रवाह को अपराध घोषित करता है, जिससे आतंकवाद के वित्तीय स्रोत का उन्मूलन किया जा सके।
विपक्ष में तर्क:
- अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन: UAPA लंबे समय तक हिरासत में रखने, ज़मानत से इनकार करने और निर्दोषता की धारणा को परिवर्तित करने में सक्षम बनाता है, जिससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता संवैधानिक सुरक्षा उपायों के विपरीत, नियम के बजाय अपवाद बन जाती है।
- भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा NIA बनाम जहूर अहमद शाह वटाली (2020) मामले में दिये गए निर्णय के बाद, न्यायालयों को ज़मानत का निर्णय करते समय साक्ष्यों की विस्तार से जाँच करने से हतोत्साहित किया जा रहा है, जिससे न्यायिक निगरानी कम हो रही है।
- व्यक्तियों को मनमाने ढंग से आतंकवादी घोषित करना: राज्य बिना किसी पूर्व दोषसिद्धि के व्यक्तियों को ‘आतंकवादी’ करार दे सकता है, जिससे निर्दोषता की धारणा कमज़ोर होती है तथा प्रतिष्ठा एवं निजता के अधिकार प्रभावित होते हैं।
- आतंकवाद की अति व्यापक परिभाषा: ‘धमकी देने की संभावना’ या ‘आतंक फैलाने की संभावना’ जैसे शब्द संभावित या प्रत्याशित कृत्यों के लिये दंड की अनुमति देते हैं, जो कानूनी निश्चितता और आनुपातिकता के सिद्धांत का उल्लंघन करते हैं।
- संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिवेदकों (2020) ने UAPA को नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय संधि (ICCPR) और मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (UDHR) जैसे वैश्विक मानवाधिकार मानकों के साथ असंगत बताया तथा आतंकवाद की स्पष्ट, संकीर्ण परिभाषा के अभाव को रेखांकित किया।
- पुलिस की विवेकाधीन शक्तियाँ: पुलिस अधिकारियों के व्यक्तिगत ज्ञान के आधार पर तलाशी, ज़ब्ती और गिरफ्तारियाँ की जा सकती हैं, जिसमें न्यायिक निगरानी सीमित होती है, जिससे मनमानी सरकारी कार्रवाई का खतरा बढ़ जाता है।
- असहमति और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अपराधीकरण: शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन, राजनीतिक भाषण तथा राज्य नीतियों पर प्रश्न उठाना अक्सर राष्ट्रीय सुरक्षा के लिये खतरा बताकर अपराध माना जाता है, जिससे अनुच्छेद 19 द्वारा सुरक्षित स्वतंत्र अभिव्यक्ति एवं संघ बनाने का अधिकार कमज़ोर होता है।
- गिरफ्तारी का डर, लंबी अवधि तक कारावास और सामाजिक पूर्वाग्रह सक्रियता, पत्रकारिता तथा राजनीतिक भागीदारी को प्रभावित हैं, जिससे लोकतांत्रिक मूल्य तथा संस्कृति कमज़ोर होते हैं।
UAPA को मज़बूत बनाने के लिये किन सुधारों की आवश्यकता है?
- अस्पष्ट परिभाषाओं को स्पष्ट करना: आतंकवादी कृत्य, अवैध गतिविधि और साज़िश जैसे शब्दों को संकुचित रूप से परिभाषित किया जाना चाहिये ताकि दुरुपयोग से बचा जा सके।
- सख्त ज़मानत प्रावधानों में सुधार: UAPA के तहत सख्त ज़मानत प्रावधानों में संशोधन किया जाना चाहिये ताकि निर्दोषता की पूर्वधारणा को पुनः स्थापित किया जा सके, जो अनुच्छेद 21 और स्थापित आपराधिक विधिशास्त्र का मूल सिद्धांत है, जबकि अनुच्छेद 20(3) न्यायसंगत सुनवाई की सुरक्षा को मज़बूत करता है।
UAPA के तहत कठोर जमानत प्रावधानों में संशोधन किया जाना चाहिए ताकि निर्दोषता की पूर्वधारणा को पुनः स्थापित किया जा सके, जो अनुच्छेद 21 और स्थापित आपराधिक न्यायशास्त्र का मूल सिद्धांत है; साथ ही अनुच्छेद 20(3) निष्पक्ष सुनवाई और आत्म-अभियोग से संरक्षण के अधिकार को और सुदृढ़ करता है।
- त्वरित सुनवाई सुनिश्चित करना: लंबित मामलों की लंबी सुनवाई न्याय को कमज़ोर करती है और सार्वजनिक संसाधनों का अपव्यय करती है।
- PUCL की एक रिपोर्ट (2022) में उल्लेख किया गया कि वर्ष 2015–20 के बीच UAPA मामलों में 3% से कम मामलों में ही दोषसिद्धि हुई, जो फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट्स और सख्त समय-सीमाओं की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
- मुआवज़ा ढाँचा लागू करना: गलत गिरफ्तारी और लंबी हिरासत के पीड़ितों को पर्याप्त मुआवज़ा दिया जाना चाहिये।
- रूदुल साह बनाम बिहार राज्य (1983) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अवैध हिरासत के लिये मुआवज़ा को एक उपाय के रूप में मान्यता दी थी, जिसे UAPA के तहत भी कानूनी रूप से संहिताबद्ध किया जाना चाहिये।
- निगरानी और पारदर्शिता को मज़बूत करना: नियमित संसदीय समीक्षा, UAPA डेटा का सार्वजनिक खुलासा और एजेंसियों के लिये स्पष्ट संचालनात्मक दिशानिर्देश जवाबदेही सुनिश्चित कर सकते हैं तथा मनमाने तौर पर कानून के लागू होने को रोक सकते हैं।
निष्कर्ष
UAPA राष्ट्रीय सुरक्षा हेतु महत्त्वपूर्ण है, लेकिन इसका विस्तृत दायरा और कठोर प्रक्रियाएँ संवैधानिक स्वतंत्रताओं के लिये खतरा हैं। सुरक्षा उपायों के बिना यह हिरासत को सामान्य बनाने तथा असहमति दबाने का जोखिम उत्पन्न करता है। सुरक्षा एवं लोकतंत्र के बीच संतुलन बनाए रखने के लिये लक्षित सुधार आवश्यक हैं।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. आतंकवाद विरोधी कानूनों को प्रभावी बनाने के साथ-साथ लोकतांत्रिक मूल्यों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित करने हेतु आवश्यक सुधारों का विश्लेषण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. UAPA का मुख्य उद्देश्य क्या है?
भारत की संप्रभुता, अखंडता, एकता और राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालने वाली गतिविधियों को रोकना।
2. UAPA की धारा 15 विवादित क्यों है?
यह आतंकवाद को व्यापक शब्दों में परिभाषित करती है, जिसमें "किसी भी अन्य तरीके" से किये गए कार्य शामिल हैं, जिससे व्यापक व्याख्या संभव हो पाती है।
3. UAPA से सबसे अधिक कौन-सी संवैधानिक चिंता जुड़ी हुई है?
लंबे समय तक हिरासत में रखने, ज़मानत न देने और निर्दोष माने जाने के अधिकार को कमज़ोर करने के कारण अनुच्छेद 21 का उल्लंघन हुआ।
4. UAPA को बेहतर बनाने के लिये क्या सुधार सुझाए गए हैं?
अधिक सटीक परिभाषा, निष्पक्ष ज़मानत के प्रावधान, त्वरित सुनवाई, गलत हिरासत के लिये मुआवज़ा, और मज़बूत निगरानी तंत्र।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
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प्रश्न. भारत सरकार ने हाल ही में विधि विरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम (यूएपीए), 1967 और एनआईए अधिनियम के संशोधन के द्वारा आतंकवाद-रोधी कानूनों को मज़बूत कर दिया है। मानवाधिकार संगठनों द्वारा विधि विरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम का विरोध करने के विस्तार और कारणों पर चर्चा करते समय वर्तमान सुरक्षा परिवेश के संदर्भ में परिवर्तनों का विश्लेषण कीजिये। (2019)

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