डेली न्यूज़ (19 Jan, 2026)



महानगरों से परे नगरीकरण

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों?

भारत में नगरीकरण का ट्रेंड तेज़ी से छोटे नगरों की ओर हो रहा है। यह तेज़ और अनियोजित वृद्धि संतुलित क्षेत्रीय विकास के लिये चुनौतियाँ और अवसर, दोनों प्रस्तुत करती है।

  • लगभग 9,000 वैधानिक कस्बों/नगरों में से केवल 500 बड़े नगर हैं, शेष नगरों में से अधिकांश ऐसे छोटे नगर हैं जिनकी जनसंख्या 1,00,000 से कम है और जो भारत के नगरी भविष्य को आकार देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

भारत में नगरीकरण का छोटे नगरों की ओर रूपांतरण के पीछे मुख्य कारण क्या हैं?   

  • महानगरों का संकुचन: दिल्ली, मुंबई और बंगलूरू जैसे महानगर आर्थिक रूप से संकुचित हो गए हैं, जहाँ भूमि की कीमतों में वृद्धि, अत्यधिक भीड़भाड़ और कर्मचारियों व मध्यम आकार के उद्योगों के लिये असहनीय जीवन-यापन लागत, लोगों को पूंजी कमाने के विकल्प तलाशने के लिये प्रेरित कर रही है।
  • विकेंद्रीकृत आर्थिक विकास: छोटे नगर ग्रामीण गैर-कृषि विविधीकरण के केंद्र के रूप में कार्य करते हैं, जो कृषि पर निर्भरता को कम करने के लिये कृषि-प्रसंस्करण, रसद और सेवाओं में रोज़गार प्रदान करते हैं।
    • सत्तेनपल्ले (आंध्र प्रदेश), धमतरी (छत्तीसगढ़) और बोगाईगाँव (असम) जैसे नगर इस बदलाव के उदाहरण हैं, जो मुख्य रसद केंद्र और सेवा केंद्रों के रूप में विकसित हुए हैं।
  • अवसंरचना और नीतिगत सुविधाकारक: प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) और राजकीय राजमार्गों जैसी अवसंरचना ने भौतिक पहुँच में सुधार किया है, हालाँकि डिजिटल कनेक्टिविटी (भारतनेट, मोबाइल एक्सेस) नगरों को व्यापक नेटवर्क में एकीकृत करती है। श्यामा प्रसाद मुखर्जी रूर्बन मिशन और राज्य औद्योगिक एवं निवेश नीतियों जैसी नीतिगत पहलें नगरी सुविधाएँ प्रदान करने के साथ-साथ टियर-2 या 3 नगरों में इकाइयों को प्रोत्साहित करके विकास को और प्रोत्साहित करती हैं।
  • जनांकिकीय और सामाजिक कारक: शिक्षा और रोज़गार की तलाश में युवा ग्रामीण आबादी का नज़दीकी छोटे नगरों की ओर प्रवास बढ़ रहा है। साथ ही, बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और मनोरंजन सुविधाओं की बढ़ती मांग बड़े गाँवों को सेवा-केंद्रित नगरी केंद्रों में तेज़ी से रूपांतरित कर रही है।
  • जलवायु संवेदनशीलताओं के प्रति सहनशीलता: उनका छोटा आकार विकेंद्रीकृत प्रणालियों के माध्यम से बेहतर पर्यावरणीय प्रबंधन को संभव बनाता है और हीट आइलैंड प्रभाव को कम करता है, जिससे स्पंज सिटी लक्ष्यों के अनुरूप एक जलवायु-अनुकूल नगरीकरण मॉडल उपलब्ध होता है।
    • महानगरों की तुलना में छोटे नगर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकटों (जैसे– कोविड-19) के प्रति कम संवेदनशील होते हैं और आपदा-सहनीय अवसंरचना के क्रियान्वयन में अधिक प्रभावी सिद्ध होते हैं।
  • सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने का संरक्षण: छोटे नगर महानगरीय संस्कृति के एकरूपीकरण प्रभाव का प्रतिकार करते हुए आधुनिक आर्थिक अवसरों को स्थानीय भाषाओं, शिल्पों और परंपराओं के संरक्षण के साथ एकीकृत करते हैं। उदाहरण के लिये, कर्नाटक का श्रीरंगपट्टन नगरीय केंद्र के रूप में विकसित हुआ है, साथ ही उसने अपनी सांस्कृतिक विरासत और सामुदायिक संरचना को सूक्ष्मता से संरक्षित रखा है।

भारत में नगरीकरण की स्थिति

  • वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, देश की कुल शहरी जनसंख्या 377 मिलियन से अधिक है, जो कुल जनसंख्या का 31.16% है।
  • संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक मामलों के विभाग (UN DESA) के अनुमान के अनुसार, वर्ष 2025 तक भारत की लगभग 36% जनसंख्या नगरीय क्षेत्रों में निवास करेगी, जो वर्ष 2050 तक बढ़कर 50% तक हो जाने की संभावना है।
    • केवल भारत में ही वर्ष 2025 से 2050 के बीच 20 करोड़ से अधिक नए नगरी निवासी जुड़ेंगे।
  • नीति आयोग के अनुसार, नगरी क्षेत्र भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 63% का योगदान करते हैं, जो वर्ष 2030 तक 75% से अधिक और वर्ष 2050 तक 80% तक पहुँचने का अनुमान है।

नगरीकरण के समर्थन हेतु प्रमुख सरकारी पहल

  • स्मार्ट सिटीज़ मिशन (SCM): सतत एवं समावेशी अवसंरचना, स्वच्छ पर्यावरण और स्मार्ट सिटी मैनेजमेंट के माध्यम से 100 चयनित नगरों का विकास करने का लक्ष्य।
  • अमृत 2.0: सभी वैधानिक नगरों में सार्वभौमिक कार्यात्मक घरेलू नल जल आपूर्ति तथा 500 अमृत नगरों में 100% मल जल प्रबंधन सुनिश्चित करने का लक्ष्य।
  • प्रधानमंत्री आवास योजना–शहरी (PMAY-U): सभी के लिये आवास के लक्ष्य के अंतर्गत बुनियादी सुविधाओं सहित पक्के मकान उपलब्ध कराना। लक्ष्य में मांग के अनुरूप मकानों की स्वीकृति एवं पूर्णता शामिल है (1.22 करोड़ से अधिक मकान स्वीकृत तथा PMAY-U 2.0 के अंतर्गत अतिरिक्त 1 करोड़ नगरीय परिवारों को कवर करने का लक्ष्य)।
  • दीन दयाल अंत्योदय योजना – राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन (DAY-NULM): प्रशिक्षण, स्वरोज़गार सहायता, स्वयं सहायता समूहों की गतिशीलता और औपचारिकीकरण के माध्यम से सभी ज़िला मुख्यालयों और 1 लाख से अधिक जनसंख्या वाले नगरों में नगरीय गरीब परिवारों को कवर करने का लक्ष्य।

भारत में नगरीकरण के छोटे नगरों की ओर स्थानांतरण के साथ क्या चिंताएँ जुड़ी हैं?

  • गरीबी का नगरीकरण: मुख्य चिंता यह है कि छोटे नगर “ग्रामीण गरीबी के नगरीकरण” के स्थल बनते जा रहे हैं। वे गरीब आबादी को तो आत्मसात् कर लेते हैं, परंतु गरीबी से बाहर निकलने का मार्ग प्रदान करने में असफल रहते हैं।
    • रोज़गार मुख्यतः अत्यधिक अनौपचारिक और असुरक्षित कार्यों पर आधारित है। उदाहरण के लिये, बिना अनुबंध और सामाजिक सुरक्षा के निर्माण श्रमिक का कार्य।
  • शोषणकारी स्थानीय पदानुक्रमों का उदय: नई अनियमित अर्थव्यवस्थाएँ स्थानीय अभिजात वर्ग, रियल एस्टेट दलालों, ठेकेदारों, सूक्ष्म-वित्त संस्थाओं और राजनीतिक मध्यस्थों को भूमि, ऋण और श्रम पर नियंत्रण सुदृढ़ करने का अवसर देते हैं, जिससे स्थानीय असमानता और शोषण और गहरा होता जाता है।
  • शासन और संस्थागत कमियाँ: छोटे नगरों में अपनी आय के सीमित साधन तथा म्यूनिसिपल बॉण्ड जैसी संस्थागत वित्तीय सुविधाओं तक अपर्याप्त पहुँच होती है, जिससे वे लगातार राज्य एवं केंद्रीय अनुदानों पर निर्भर रहते हैं और स्वायत्त योजना बनाना मुश्किल हो जाता है। इसके साथ ही अधिकांश नगर मास्टर प्लान या भवन निर्माण नियमों के बिना विकसित होते हैं, जिससे अनियमित निर्माण, पर्यावरणीय संवेदनशील क्षेत्रों पर अतिक्रमण व भूमि के असंगत उपयोग की समस्या उत्पन्न होती है।
  • अवसंरचना और पारिस्थितिक कमी: अमृत (AMRUT) जैसे प्रमुख शहरी मिशनों का केंद्र मुख्य रूप से महानगर (Metropolitan cities) ही रहे हैं जिससे छोटे नगरों में अवसंरचना खंडित तथा अपर्याप्त रहती है। पाइप जलापूर्ति की कमी के कारण ये नगर निजी "टैंकर इकॉनमी" पर निर्भर हो जाते हैं और भूजल का अनियंत्रित दोहन होता है, जिससे गंभीर पारिस्थितिक दबाव उत्पन्न होता है।
  • जनसांख्यिकीय लाभ का अपव्यय: इन शहरों की ओर पलायन करने वाली युवा आबादी के लिये गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल विकास और औपचारिक नौकरियों के अभाव के कारण जनसांख्यिकीय लाभांश के व्यर्थ होने का जोखिम बढ़ गया है। उदाहरण के लिये डिलीवरी और राइड-हेलिंग जैसी गिग नौकरियाँ, जिनमें न तो नौकरी की सुरक्षा है और न ही कोई लाभ।

संधारणीय नगरीकरण हेतु किन उपायों की आवश्यकता है?

  • अनौपचारिक नगरीय क्षेत्रों का औपचारिकीकरण: छोटे कस्बों को सशक्त बनाने के लिये, पात्रता रखने वाले 'जनगणना वाले कस्बों' को अनिवार्य रूप से 'वैधानिक कस्बों' के रूप में अधिसूचित किया जाना चाहिये। इसके बाद नवगठित शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) के लिये योजना और वित्त के क्षेत्र में व्यापक क्षमता निर्माण किया जाए। तत्पश्चात मौजूदा बस्तियों और प्राकृतिक संपदाओं (जल निकायों, वनों) को एकीकृत करने हेतु GIS-आधारित सहभागी मानचित्रण (जैसे– स्वामित्व योजना) का उपयोग करते हुए सरल, लचीली एवं लागू करने योग्य मास्टर प्लान व स्थानीय क्षेत्र योजनाएँ विकसित की जाएँ।
  • आधारभूत अवसंरचना का निर्माण: AMRUT 2.0, स्वच्छ भारत मिशन–शहरी 2.0 और वित्त आयोग अनुदानों के अभिसरण के माध्यम से जल आपूर्ति, विकेंद्रीकृत सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) तथा ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (SWM) जैसी सतत बुनियादी सेवाओं की 100% कवरेज सुनिश्चित की जाए। योजना निर्माण में गैर-मोटर चालित परिवहन नेटवर्क (पैदल पथ, साइकिल ट्रैक) को प्राथमिकता दी जाए एवं कार-केंद्रित मॉडल से बचा जाए।
  • स्थान-आधारित अर्थव्यवस्थाओं का उपयोग: स्थानीय तुलनात्मक लाभ के आधार पर अर्थव्यवस्थाओं का रणनीतिक विकास किया जाए, जैसे– एग्रो-प्रोसेसिंग क्लस्टर, हथकरघा व हस्तशिल्प हब, लॉजिस्टिक्स केंद्र या ईको-टूरिज़्म जैसा कि सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यमों के औपचारिकीकरण की योजना (PMFME) में परिकल्पित है।
  • “रूर्बन” क्लस्टर दृष्टिकोण अपनाना: श्यामा प्रसाद मुखर्जी रूर्बन मिशन को उसकी मूल भावना में लागू करते हुए ऐसे रूर्बन क्लस्टर विकसित किये जाएँ, जहाँ छोटे शहर सेवा प्रदायगी में पैमाने की अर्थव्यवस्थाओं तथा आसपास के गाँवों के लिये केंद्र (एंकर) की भूमिका निभाएँ। एकीकृत विकास सुनिश्चित करने हेतु PMGSY, VB-GRAM सहित सभी केंद्रीय व राज्य योजनाओं का अभिसरण छोटे शहरों के शहरी स्थानीय निकाय (ULB) स्तर पर अनिवार्य किया जाए।

निष्कर्ष

भारत में छोटे शहरों की तेज़ी से बढ़ती संख्या आर्थिक दबाव, जनसांख्यिकीय बदलाव और नीतिगत प्रोत्साहनों द्वारा प्रेरित संरचनात्मक शहरी परिवर्तन को दर्शाती है। ये शहर स्थानीयकृत विकास तथा जलवायु-सहनीय शहरीकरण के अवसर प्रदान करते हैं, लेकिन अनौपचारिकता, शासन संबंधी कमज़ोरियाँ, अवसंरचना की खामियाँ एवं शहरीकृत गरीबी जैसी चुनौतियाँ सतत शहरीकरण के लिये तत्काल नीतिगत हस्तक्षेप की मांग करती हैं।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. "भारत में छोटे शहरों का बढ़ना समावेशी विकास के बजाय 'ग्रामीण गरीबी का शहरीकरण' का प्रतिनिधित्व करता है।" भारत के हालिया शहरी बदलाव के संदर्भ में इस कथन का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. भारत में छोटे शहरों (Small Towns) की वृद्धि के पीछे मुख्य कारण क्या हैं?
विकास को मेगासिटीज़ (महानगरों) की संतृप्ति, विकेंद्रीकृत आर्थिक अवसर, अवसंरचना कनेक्टिविटी, जनसांख्यिकीय दबाव और नीति प्रोत्साहनों जैसे रूर्बन मिशन (Rurban Mission) द्वारा संचालित किया जाता है।

2. छोटे शहरों के शहरीकरण में 74वें संवैधानिक संशोधन की क्या भूमिका है?
यह नगरपालिका को योजना बनाने, सेवाएँ प्रदान करने और संसाधन जुटाने का अधिकार देती है, जिससे स्थायी शहरी शासन के लिये संस्थागत तथा वित्तीय क्षमता का निर्माण संभव होता है।

3. छोटे शहरों को जलवायु और सार्वजनिक स्वास्थ्य संकटों के खिलाफ मज़बूत क्यों माना जाता है?
उनका छोटा आकार, विकेंद्रीकृत सिस्टम और कम जनसंख्या घनत्व उन्हें मेगासिटीज़ (महानगरों) की तुलना में हीट आइलैंड, महामारी और आपदाओं के प्रति कम संवेदनशील बनाता है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

प्रिलिम्स

प्रश्न. 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजियेः (2020)

  1. शहरी क्षेत्रों में श्रमिक उत्पादकता (2004-05 की कीमतों पर प्रति कार्यकर्त्ता रुपए) में वृद्धि हुई, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह घट गई।   
  2. कार्यबल में ग्रामीण क्षेत्रों की प्रतिशत हिस्सेदारी में लगातार वृद्धि हुई।  
  3. ग्रामीण क्षेत्रों में गैर-कृषि अर्थव्यवस्था में वृद्धि हुई।  
  4. ग्रामीण रोज़गार में वृद्धि दर में कमी आई है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 3 और 4

(c) केवल 3

(d) केवल 1, 2 और 4

उत्तर: (b)


मेन्स

प्रश्न. क्या भारतीय महानगरों में शहरीकरण गरीबों को और भी अधिक पृथक्करण और/या हाशिये पर ले जाता है?  (2023)

प्रश्न. कई वर्षों से उच्च तीव्रता की वर्षा के कारण शहरों में बाढ़ की बारंबारता बढ़ रही है। शहरी क्षेत्रों में बाढ़ के कारणों पर चर्चा करते हुए इस प्रकार की घटनाओं के दौरान जोखिम कम करने की तैयारियों की क्रियाविधि पर प्रकाश डालिये। (2016)


भारत में इच्छामृत्यु पर बहस

प्रिलिम्स के लिये: भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023, सर्वोच्च न्यायालय, अनुच्छेद 21, विधि आयोग, उच्च न्यायालय, आयुष्मान भारत, आशा

मेन्स के लिये: इच्छामृत्यु का अवलोकन, जिसमें इसकी प्रमुख परिभाषाएँ, इसके वैधानिकीकरण के पक्ष और विपक्ष के मुख्य तर्क तथा संभावित आगे की राह शामिल है।

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों?

सर्वोच्च न्यायालय हरीश राणा बनाम भारत संघ (2025) मामले की सुनवाई कर रहा है जिसमें जीवन-रक्षक उपचार को वापस लेने के माध्यम से निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति देने की याचिका दायर की गई है।

  • याचिकाकर्त्ता पिछले 13 वर्षों से बिस्तर पर हैं और चौथी मंज़िल से गिरने के कारण  सिर की गंभीर चोटों के बाद 100% क्वाड्रिप्लेजिक विकलांगता (quadriplegic disability) से पीड़ित हैं।

सारांश

  • सर्वोच्च न्यायालय ने हरीश राणा बनाम भारत संघ (2025) मामले में अपना निर्णय सुरक्षित रखा है, जो निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति देने से संबंधित एक महत्त्वपूर्ण मामला है।
  • सक्रिय इच्छामृत्यु अवैध है, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के तहत ‘गरिमा के साथ मरने के अधिकार’ को बनाए रखने के लिये सख्त दिशा-निर्देशों के अंतर्गत निष्क्रिय इच्छामृत्यु (उपचार वापस लेना) को वैध कर दिया है।
  • यह मामला उस नैतिक संघर्ष को फिर से उजागर करता है, जिसमें गरिमापूर्ण मृत्यु के लिये व्यक्तिगत स्वायत्तता बनाए रखने और संवेदनशील जनसंख्या के खिलाफ संभावित दुरुपयोग को रोकने के बीच संतुलन स्थापित करना शामिल है।

इच्छामृत्यु क्या है?

  • परिचय: इच्छामृत्यु का अर्थ है किसी अपरिहार्य या घातक रोग के कारण उत्पन्न असहनीय कष्ट को कम करने के लिये मृत्यु को जानबूझकर शीघ्र करना। इसका उद्देश्य जानबूझकर और बिना दर्द के हस्तक्षेप के माध्यम से शारीरिक दर्द, मानसिक पीड़ा और आध्यात्मिक कष्ट को कम करना है।
    • इच्छामृत्यु पर बहस केवल चिकित्सकीय नहीं है, यह नैतिक मूल्यों, मानवाधिकारों और सामाजिक विश्वासों में गहराई से निहित है।
  • इच्छामृत्यु के रूप और वर्गीकरण: इसे मुख्यतः दो प्रकारों में बांटा गया है: सक्रिय इच्छामृत्यु (जानबूझकर की जाने वाली क्रिया, जैसे– घातक इंजेक्शन) और निष्क्रिय इच्छामृत्यु (जीवन-रक्षक उपचार को रोकना या वापस लेना)।
    • इन्हें आगे स्वैच्छिक (रोगी की सहमति के साथ), अस्वैच्छिक (असमर्थ रोगी के लिये निर्णय) और अनैच्छिक (बिना सहमति के, व्यापक रूप से अवैध) रूपों में विभाजित किया गया है।
  • भारत में कानूनी ढाँचा:
    • भारतीय कानून सक्रिय इच्छामृत्यु को स्पष्ट रूप से निषेध करता है। भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 के तहत किसी भी जानबूझकर की गई मृत्यु को धारा 100 (दोषपूर्ण हत्या) या धारा 101 (हत्या) के अंतर्गत अपराध माना गया है।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने सख्त नियामक ढाँचे के अंतर्गत निष्क्रिय इच्छामृत्यु को वैध कर दिया है, और अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के अंतर्गत गरिमा के साथ मरने के अधिकार को मान्यता दी है।
    • विधि आयोग की 241वीं रिपोर्ट (2012) में स्पष्ट किया गया कि किसी सक्षम रोगी द्वारा जीवन-रक्षक उपचार को अस्वीकार करना कानूनी रूप से मान्य है और ऐसी सूचित इच्छाओं का पालन करने वाले चिकित्सकों पर प्रोत्साहन या दोषपूर्ण हत्या का आरोप नहीं लगाया जा सकता।
  • भारत में इच्छामृत्यु से संबंधित निर्णय:
    • मारुति श्रीपति दुबाल बनाम महाराष्ट्र राज्य (1987): बॉम्बे उच्च न्यायालय ने यह माना कि मरने का अधिकार अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का हिस्सा है, जिससे असाध्य रोग से पीड़ित या अत्यधिक पीड़ा में जीवन समाप्त करने की अनुमति दी गई।
    • गियान कौर बनाम पंजाब राज्य (1996): सर्वोच्च न्यायालय ने इस दृष्टिकोण को पलटते हुए कहा कि जीवन का अधिकार मरने के अधिकार को शामिल नहीं करता है और जीवन के संरक्षण पर बल दिया।
    • अरुणा शानबाग बनाम भारत संघ (2011): सर्वोच्च न्यायालय ने सख्त कानूनी और चिकित्सकीय सुरक्षा उपायों के अंतर्गत निष्क्रिय इच्छामृत्यु (जीवन-सहायता रोकना) की अनुमति दी, यहाँ तक कि उन रोगियों के लिये भी जो सहमति देने में असमर्थ हैं। 
    • कॉमन कॉज बनाम भारत संघ (2018): सर्वोच्च न्यायालय ने सक्रिय इच्छामृत्यु (अनुमति नहीं) को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (दुर्लभ मामलों में अनुमति प्राप्त) से अलग किया और गरिमा के साथ मरने के अधिकार को मान्यता दी, जिसमें लिविंग विल (अग्रिम चिकित्सा निर्देश) के माध्यम से उपचार से इनकार शामिल है।
  • भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की प्रक्रिया:
    • सर्वोच्च न्यायालय के वर्ष 2018 के निर्देशों ने एक प्राथमिक और एक द्वितीयक चिकित्सा बोर्ड द्वारा दो-चरणीय चिकित्सा समीक्षा अनिवार्य की।
      • प्राथमिक चिकित्सा बोर्ड: अस्पताल द्वारा गठित, जिसमें उपचार विभाग के प्रमुख और सामान्य चिकित्सा, हृदय रोग विज्ञान, तंत्रिका विज्ञान, नेफ्रोलॉजी, मनोचिकित्सा या ऑन्कोलॉजी जैसे क्षेत्रों के कम-से-कम तीन वरिष्ठ विशेषज्ञ शामिल होते हैं, प्रत्येक के पास 20 वर्षों का अनुभव होता है।
      • द्वितीयक चिकित्सा बोर्ड: ज़िला कलेक्टर द्वारा गठित, जिसकी अध्यक्षता मुख्य ज़िला चिकित्सा अधिकारी करते हैं, साथ ही समान चिकित्सा विशेषज्ञों के तीन विशेषज्ञ डॉक्टर भी इसमें शामिल हैं।
    • वर्ष 2023 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने प्रक्रिया को सरल बनाते हुए दोनों बोर्डों को बनाए रखा, जबकि विशेषज्ञ अनुभव की अनिवार्य अवधि को 20 वर्ष से घटाकर 5 वर्ष कर दिया। साथ ही, उनकी राय देने के लिये 48 घंटे की सख्त समय-सीमा भी निर्धारित की गई।
      • द्वितीयक बोर्ड में भी संशोधन किया गया, जिसमें मुख्य ज़िला चिकित्सा अधिकारी के स्थान पर ज़िला चिकित्सा अधिकारी के द्वारा नामित व्यक्ति को अध्यक्ष बनाया गया और अब दोनों बोर्डों में प्रत्येक में तीन-तीन सदस्य शामिल हैं।
  • इच्छामृत्यु पर वैश्विक कानूनी परिदृश्य: नीदरलैंड, बेल्जियम, लक्ज़मबर्ग, स्पेन, क्यूबेक (कनाडा) और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के कुछ भागों में सख्त शर्तों के तहत इच्छामृत्यु और चिकित्सक-सहायक आत्महत्या दोनों की अनुमति है।
    • स्विट्ज़रलैंड ऐसा देश है, जो गैर-चिकित्सकों द्वारा सहायक आत्महत्या की अनुमति देता है लेकिन सक्रिय इच्छामृत्यु पर प्रतिबंध लगाता है।
    • स्वीडन और फ्राँस निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति देते हैं, जबकि इटली उपचार से इनकार करने के अधिकार को मान्यता देता है।
  • नैतिक और व्यावहारिक विवाद: इच्छामृत्यु पर बहस मूल रूप से दो तर्कों में विभाजित है — एक तरफ व्यक्तिगत स्वायत्तता और "सम्मानजनक मृत्यु" के पक्ष में तर्क हैं, जबकि दूसरी ओर जीवन की पवित्रता और हिप्पोक्रेटिक शपथ के "किसी को नुकसान न पहुँचाने" के सिद्धांत पर आधारित विरोधी तर्क मौजूद हैं।
    • यह उस परिप्रेक्ष्य को और जटिल बनाता है कि किसी रोगी की मानसिक क्षमता का सही मूल्यांकन कैसे किया जाए, साथ ही इसमें चिकित्सा निर्णय में संभावित दुरुपयोग या “स्लिपरी स्लोप” जैसे नैतिक जोखिम भी शामिल हैं।

Euthanasia

इच्छामृत्यु की वैधता के पक्ष में प्रमुख तर्क क्या हैं?

  • व्यक्तिगत स्वायत्तता को बनाए रखना: तर्क का केंद्रीय सिद्धांत रोगी की स्वायत्तता और स्व-निर्णय है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के तहत "गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार" को मान्यता देते हुए अग्रिम चिकित्सा निर्देशों को वैध बनाकर कॉमन कॉज बनाम भारत संघ (2018) में बरकरार रखा।
  • लाइलाज पीड़ा को कम करना: इच्छामृत्यु को उस असहनीय पीड़ा को कम करने के लिये समर्थित किया जाता है जो अंत समय की गंभीर बीमारियों में होती है। इस दृष्टिकोण का समर्थन उन देशों के डेटा से मिलता है, जहाँ इसे मुख्यतः गंभीर स्थितियों, जैसे– उन्नत कैंसर में अपनाया जाता है।
  • निरर्थक चिकित्सा हस्तक्षेप को रोकना: यह निरर्थक, पीड़ा बढ़ाने वाले उपचार को रोकता है, परिवारों और स्वास्थ्य सेवा प्रणालियों पर भावनात्मक और वित्तीय बोझ को कम करता है, जैसा कि भारत में अरुणा शानबाग मामला, 2011 के बाद से अनुमति प्राप्त निष्क्रिय इच्छामृत्यु द्वारा दर्शाया गया है, जो गैर-लाभकारी हस्तक्षेपों को वापस लेने के लिये है।
  • दार्शनिक और व्यावहारिक आधार: उदारवादी सिद्धांत (जॉन स्टुअर्ट मिल) शारीरिक स्वायत्तता के आधार पर इच्छामृत्यु चुनने के अधिकार का विरोध करते हैं, जबकि उपयोगितावादी नैतिकता (जेरेमी बेंथम) पीड़ा को कम करने के लिये इसका समर्थन करती है। यह दर्द से राहत देने के चिकित्सा कर्त्तव्य के साथ संरेखित है और स्वास्थ्य सेवा संसाधनों के न्यायसंगत आवंटन की अनुमति देता है।

इच्छामृत्यु के वैधीकरण के विरुद्ध प्रमुख तर्क क्या हैं?

  • नैतिक और नैतिकता संबंधी संघर्ष: कई लोग इच्छामृत्यु को जीवन की पवित्रता के उल्लंघन के रूप में देखते हैं। यह दृष्टिकोण धार्मिक, सांस्कृतिक तथा कर्त्तव्यवादी नैतिकता (इमैनुएल कांट) पर आधारित है, जो जीवन को अपने आपमें एक अस्पृश्य और अंतिम लक्ष्य मानता है।
  • दुरुपयोग और दबाव का उच्च जोखिम: कमज़ोर आबादी, वृद्ध, विकलांग और आर्थिक रूप से निर्भर लोग इच्छामृत्यु के लिये दबाव में आने के उच्च जोखिम में होते हैं, विशेषकर ऐसे देश में जहाँ सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ और असमान स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच उपलब्ध हो।
  • वास्तविक सहमति का आकलन करने में चुनौतियाँ: कई भारतीय मनोचिकित्सक असाध्य रोग के रोगियों में अवसाद या सूक्ष्म दबाव का सही पता लगाने में आश्वस्त नहीं हो पाते हैं, जिससे अनुचित अनुमति देने का जोखिम बढ़ जाता है।
  • कठोर कानूनी प्रतिबंध और अस्पष्टता: BNS, 2023 के तहत ऐसे कार्यों को धारा 100 (दोषपूर्ण हत्या), 101 (हत्या) और 108 (आत्महत्या के लिये प्रोत्साहित करना) के अंतर्गत दंडनीय माना गया है, जिससे स्पष्ट नियामक कानून न होने पर चिकित्सकों और पेशेवरों हेतु गंभीर कानूनी जोखिम उत्पन्न होता है।
  • जटिल और पहुँच से बाहर प्रक्रियाएँ: सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के तहत निष्क्रिय इच्छामृत्यु में एक धीमी, अदालती प्रक्रिया शामिल है जिसमें कई मेडिकल बोर्डों की भागीदारी होती है। इससे यह प्रक्रिया कई लोगों के लिये पहुँच से बाहर हो जाती है और न्यायिक बोझ बढ़ जाता है।

भारत अपने एंड-ऑफ-लाइफ केयर फ्रेमवर्क को किस प्रकार सुदृढ़ कर सकता है?

  • विधायी स्पष्टता: सर्वोच्च न्यायालय के वर्ष 2018 के दिशा-निर्देशों को निष्क्रिय इच्छामृत्यु और एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव्स (लिविंग विल) पर संसद में स्पष्ट कानून बनाकर विधिक सुरक्षा प्रदान करनी चाहिये, ताकि चिकित्सक एवं स्वास्थ्य पेशेवर सुरक्षित रूप से निर्णय ले सकें।
  • प्रक्रियाओं का सरलीकरण: प्रक्रियाओं को आसान बनाने के लिये निगरानी को ज़िला स्तरीय समितियों या बहुविषयक अस्पताल नैतिकता समितियों तक स्थानांतरित किया जाना चाहिये। इसके साथ ही लिविंग विल्स को राष्ट्रीय स्वास्थ्य डिजिटल रिकॉर्ड में शामिल किया जाना चाहिये, जिससे उनकी आसान अभिगम्यता सुनिश्चित हो, जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय के वर्ष 2023 में सरलीकरण के दिशा-निर्देशों में शुरू किया गया है।
  • सार्वभौमिक उपशामक देखभाल अभिगम्यता: होम-बेस्ड, सामुदायिक और अस्पताल आधारित सेवाओं का नेटवर्क स्थापित करके उपशामक देखभाल को प्राथमिकता एवं संस्थागत स्वरूप दिया जाना चाहिये। आयुष्मान भारत का उपयोग कवरेज के लिये किया जाना चाहिये तथा ASHA कार्यकर्त्ताओं को सामान्य चिकत्सकीय प्रबंधन में प्रशिक्षित किया जाना चाहिये।
  • कठोर सुरक्षा उपाय: कमज़ोर समूहों (वृद्ध, दिव्यांग जनों) पर दबाव का अभिनिर्धारण करने तथा रोगी की वास्तविक स्वायत्तता सुनिश्चित करने के लिये अनिवार्य स्वतंत्र मनोचिकित्सकीय मूल्यांकन, सामाजिक कार्यकर्त्ता आकलन और कूलिंग-ऑफ अवधि लागू की जानी चाहिये।
  • सार्वजनिक जागरूकता और सहमति: पूरे देश में जनता व पेशेवरों को लिविंग विल्स और एंड-ऑफ-लाइफ विकल्पों के बारे में शिक्षित करने के लिये अभियान चलाए जाने चाहिये, साथ ही चिकित्सकीय निकायों, कानूनी विशेषज्ञों, नैतिकता विशेषज्ञों तथा धार्मिक नेताओं को शामिल कर नैतिक सहमति बनाने हेतु सार्वजनिक संवाद को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये।

निष्कर्ष

हरीश राणा मामला निष्क्रिय इच्छामृत्यु और एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव्स पर स्पष्ट विधायी ढाँचे की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करता है। जहाँ मरीज़ की स्वायत्तता तथा पीड़ा से राहत महत्त्वपूर्ण हैं, वहीं दुरुपयोग, दबाव एवं विधिक अस्पष्टता का जोखिम सुदृढ़ सुरक्षा उपायों, उपशामक देखभाल के विस्तार व प्रक्रियाओं के सरलीकरण की मांग करता है, ताकि कमज़ोर नागरिकों की रक्षा सुनिश्चित हो सके।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. “गरिमा के साथ मरने का अधिकार, गरिमा के साथ जीने के अधिकार का विस्तार है” — भारत में इच्छामृत्यु के न्यायिक उत्कर्ष के संदर्भ में समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिये।

प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु क्या है?
निष्क्रिय इच्छामृत्यु में जीवन-रक्षक उपचार को बंद करना या रोकना शामिल है। इसे सर्वोच्च न्यायालय ने अरुणा शानबॉग (2011) और कॉमन कॉज़ (2018) मामले के फैसलों के बाद कठोर सुरक्षा उपायों के तहत अनुमति दी है।

2. क्या भारत में सक्रिय इच्छामृत्यु वैध है?
सक्रिय इच्छामृत्यु अवैध है तथा BNS- 2023 की धारा 100 और 101 के तहत इसे ‘दोषपूर्ण हत्या’ या हत्या माना जाता है, जबकि धारा 108 के तहत इसे ‘आत्महत्या के उकसावे के रूप में दंडनीय’ ठहराया गया है।

3. एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव (लिविंग विल) क्या है?
यह एक कानूनी दस्तावेज़ है, जो सक्षम वयस्क को जीवन-रक्षक उपचार से पहले ही इनकार करने की अनुमति देता है। इसे सर्वोच्च न्यायालय ने कॉमन कॉज़ (2018) में मान्यता दी है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs) 

प्रिलिम्स

प्रश्न. निजता के अधिकार को जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्गत भाग के रूप में संरक्षित किया जाता है। भारत के संविधान में निम्नलिखित में से किससे उपर्युक्त कथन सही एवं समुचित ढंग से अर्थित होता है? (2018)

(a) अनुच्छेद 14 एवं संविधान के 42वें संशोधन के अधीन उपबंध 

(b) अनुच्छेद 17 एवं भाग IV में दिये गए राज्य के नीति निदेशक तत्त्व 

(c) अनुच्छेद 21 एवं भाग III में गारंटी की स्वतंत्रताएँ 

(d) अनुच्छेद 24 एवं संविधान के 44वें संशोधन के अधीन उपबंध

उत्तर: C


मेन्स

प्रश्न. सामाजिक विकास की संभावनाओं को बढ़ाने के क्रम में, विशेषकर जराचिकित्सा एवं मातृ स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में सुदृढ़ और पर्याप्त स्वास्थ्य देखभाल संबंधी नीतियों की आवश्यकता है। विवेचन कीजिये। (2020)