प्रिलिम्स फैक्ट्स (26 Mar, 2026)



बायोफार्मा SHAKTI योजना

स्रोत: द हिंदू 

चर्चा में क्यों?

केंद्रीय बजट 2026-27 में बायोफार्मा SHAKTI योजना पेश की गई, जिसका उद्देश्य घरेलू बायोलॉजिक्स और बायोसिमिलर उत्पादन में क्रांति लाना है। यह योजना पारंपरिक प्राणी परीक्षणों से बढ़कर उन्नत गैर-पशु आधारित विधियों (NAM) जैसे ऑर्गनॉइड्स का उपयोग करती है।

बायोफार्मा SHAKTI योजना क्या है?

  • परिचय: बायोफार्मा SHAKTI (ज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार के माध्यम से स्वास्थ्य सेवा उन्नति के लिये रणनीति) योजना एक प्रमुख पहल है, जिसे भारत को साधारण जेनेरिक दवाओं के क्षेत्र से उच्च-मूल्य वाले बायोलॉजिक्स और बायोसिमिलर के लिये वैश्विक शक्ति बनने की दिशा में ले जाने के लिये डिज़ाइन किया गया है।
    • यह योजना राष्ट्रीय बायोफार्मा मिशन (NBM), 2017 के अनुरूप है, जिसका उद्देश्य भारत को वर्ष 2025 तक USD 100 बिलियन के अग्रणी वैश्विक बायोटेक उद्योग में बदलना और वैश्विक फार्मास्यूटिकल बाज़ार का 5% हिस्सा प्राप्त करना है।
  • वित्तीय आवंटन: सरकार ने 5 वर्षों के लिये (वित्तीय वर्ष 2026-27 से शुरू) उन्नत बायोफार्मास्यूटिकल्स के लिये एंड-टू-एंड ईकोसिस्टम बनाने हेतु ₹10,000 करोड़ आवंटित किये हैं।
  • रोग पर ध्यान: यह योजना गैर-संचारी रोगों (NCD), जैसे– कैंसर, मधुमेह और ऑटोइम्यून विकारों के लिये किफायती घरेलू थेरैपी उत्पादन को प्राथमिकता देती है।
  • विनिर्माण में बदलाव: यह योजना ऑर्गनॉइड्स, ऑर्गन-ऑन-ए-चिप और 3D बायोप्रिंटिंग जैसी गैर-पशु आधारित विधियों (NAM) को अपनाने को प्रोत्साहित करती है, ताकि लागत कम हो और दवा की सुरक्षा की भविष्यवाणी अधिक सटीक हो (मानव जीवविज्ञान की प्रतिकृति पशु कोशिकाओं की तुलना में अधिक सटीक रूप से)।
  • इन्फ्रास्ट्रक्चर और अकादमिक क्षेत्र: 3 नए राष्ट्रीय फार्मास्यूटिकल शिक्षा और अनुसंधान संस्थान (NIPER) की स्थापना की जाएगी।
    • 7 मौजूदा NIPER को ट्रांसलेशनल अनुसंधान के उत्कृष्ट केंद्रों में उन्नत किया जाएगा।
    • 1,000 से अधिक मान्यता प्राप्त क्लिनिकल ट्रायल साइट्स का राष्ट्रीय नेटवर्क बनाया जाएगा, ताकि दवा विकास को गति प्रदान की जा सके।
  • नियामक सुधार: केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) को एक समर्पित ‘वैज्ञानिक समीक्षा कैडर’ के साथ दृढ़ किया जाएगा, ताकि अनुमोदन समय-सीमाएँ अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हों।
  • महत्त्व: यह पहल मधुमेह, कैंसर और हृदय रोग जैसे गैर-संचारी रोगों (NCD) की बढ़ती संख्या के प्रति प्रतिक्रिया है, जो वर्तमान में भारत में सभी मृत्यु का 63% है। इसके अतिरिक्त, यह पहल ब्रांडेड और पेटेंटेड दवाओं पर 100% (और संभावित 250%) अमेरिकी शुल्क का सामना करने के लिये भी तैयार की गई है।

भारत का दवा क्षेत्र

  • वैश्विक बाज़ार में स्थिति: मात्रा के हिसाब से भारत तीसरा सबसे बड़ा दवा उत्पादक (मूल्य के हिसाब से 11वाँ) बना हुआ है, जो वैश्विक जेनेरिक दवाओं का 20% और विश्व के अधिकांश डिफ्थीरिया, टेटनस और पर्टुसिस (DPT), बैसिलस कैलमेट-गुएरिन (BCG) और खसरा के टीकों की आपूर्ति करता है।
  • आर्थिक पैमाना: आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, वित्त वर्ष 2025 में इस क्षेत्र का वार्षिक व्यापार 4.72 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच गया, जिसमें 10,500 से अधिक विनिर्माण इकाइयाँ शामिल हैं तथा पिछले दशक में निर्यात में 7% की CAGR वृद्धि हुई है।
  • चिकित्सा प्रौद्योगिकी क्षेत्र में विस्तार: भारत चिकित्सा उपकरणों के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी बन गया है और MRI स्कैनर, सीटी स्कैनर और कार्डियक स्टेंट जैसे उच्च स्तरीय उपकरणों का निर्यात 187 देशों को करता है।

बायोलॉजिक्स और बायोसिमिलर्स

  • बायोलॉजिक्स (इनोवेटर ड्रग्स): बायोलॉजिक्स को रासायनिक संश्लेषण द्वारा बनने वाली पारंपरिक ‘स्मॉल मॉलिक्यूल’ दवाओं (जैसे– एस्पिरिन) से अलग समझा जाता है। बायोलॉजिक्स जीवित प्रणालियों (जैसे– बैक्टीरिया, खमीर या पशु कोशिकाओं) का उपयोग करके उत्पादित किये जाते हैं, इसलिये इन्हें इनोवेटर ड्रग्स भी कहा जाता है।
    • ये (बायोलॉजिक्स) विशालकाय होते हैं, जिनकी जटिल त्रिविमीय संरचना होती है। ये अक्सर रासायनिक दवाओं की तुलना में 200 से 1000 गुना बड़े होते हैं। इनके उदाहरणों में इंसुलिन, कैंसर के लिये मोनोक्लोनल एंटीबॉडी (एमएबी), टीके और जीन थेरैपी शामिल हैं।
  • बायोसिमिलर (बायोलॉजिक्स के जेनेरिक): बायोसिमिलर वे बायोलॉजिक उत्पाद हैं जो पहले से स्वीकृत 'रेफरेंस' बायोलॉजिक उत्पाद के समान होते हैं। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इनकी सुरक्षा या प्रभावकारिता में मूल उत्पाद से चिकित्सकीय रूप से कोई खास अंतर नहीं होता है। एक बड़ा फायदा यह है कि ये आमतौर पर मूल बायोलॉजिक की तुलना में 30% से 70% तक सस्ते होते हैं।
    • क्योंकि ये जीवित कोशिकाओं में बनते हैं, इसलिये इनकी हूबहू नकल बनाना असंभव है। अतः ये ‘समान’ (सिमिलर) हैं, ‘जेनेरिक’ नहीं।

गैर-पशु पद्धतियाँ (NAMs) क्या हैं?

  • परिचय: NAMs, जिसे न्यू अप्रोच मेथोडोलॉजी के नाम से भी जाना जाता है, नवीन वैज्ञानिक प्रौद्योगिकियों का एक समूह है जिसका उपयोग पारंपरिक पशु परीक्षण पर निर्भर किये बिना दवाओं, रसायनों और जैविक पदार्थों की सुरक्षा व प्रभावकारिता का आकलन करने के लिये किया जाता है।
    • NAMs मानव-प्रासंगिक डेटा को प्राथमिकता देते हैं, जिसके लिये मानव कोशिकाओं, ऊतकों और उन्नत कंप्यूटर मॉडल का उपयोग किया जाता है। इनका मुख्य उद्देश्य अनुसंधान में जानवरों के उपयोग को प्रतिस्थापित (Replace) करना, कम (Reduce) करना या परिष्कृत (Refine) करना (3R) है।
  • NAMs की मुख्य प्रौद्योगिकियाँ:
    • ऑर्गन-ऑन-ए-चिप (OoC): यह जीवित मानव कोशिकाओं से निर्मित एक सूक्ष्म द्रव उपकरण है। यह उपकरण विशिष्ट अंगों के भौतिक वातावरण और यांत्रिक प्रभावों (जैसे– रक्त के प्रवाह या श्वास) की सफलतापूर्वक नकल करता है।
    • ऑर्गनॉइड्स: मानव स्टेम कोशिकाओं से विकसित त्रि-आयामी, स्व-संगठित ‘मिनी ऑर्गन’ जो रोगी के वास्तविक अंग की जटिल संरचना और आनुवंशिक प्रोफाइल की प्रतिकृति बनाते हैं।
    • 3D बायोप्रिंटिंग: इसमें ‘बायो-इंक’ (जीवित कोशिकाओं और पोषक तत्त्वों का मिश्रण) का उपयोग करके मानव ऊतक संरचनाओं को परत-दर-परत प्रिंट किया जाता है। यह शोधकर्त्ताओं को यह अध्ययन करने की अनुमति देता है कि दवाएँ ठोस ट्यूमर या त्वचा में कितनी गहराई तक किस प्रकार प्रवेश करती हैं।
    • इन सिलिको मॉडल्स: ये उन्नत AI और कंप्यूटर सिमुलेशन पर आधारित मॉडल होते हैं, जो ज्ञात रासायनिक अभिक्रियाओं के विशाल डेटा के आधार पर यह अनुमान लगाते हैं कि कोई नया अणु मानव शरीर के साथ कैसे अंतःक्रिया करेगा।
    • एक्स विवो सिस्टम्स: इसमें मानव ऊतकों या अंगों (अक्सर सर्जरी से बचे हिस्सों या दाताओं से प्राप्त) का उपयोग किया जाता है, जिन्हें शरीर के बाहर सीमित समय के लिये जीवित रखकर परीक्षण किया जाता है।
  • दवा विकास के लिये लाभ: गैर-पशु पद्धतियाँ (NAM) मानव जीवविज्ञान का उपयोग करके अधिक सटीक पूर्वानुमान प्रदान करती हैं। ये वर्ष 2006 के नॉर्थविक पार्क परीक्षण जैसी घटनाओं से बचने में मदद कर सकती हैं, जहाँ बंदरों पर सुरक्षित पाई गई दवा मनुष्यों के लिये विषैली साबित हुई और कई अंगों के विफल होने का कारण बनी।
    • लागत और समय दक्षता: ये दवा विकास में लागत और समय—दोनों की बचत करते हैं। NAMs दवा विकास की लागत को लगभग 10–26% तक घटा सकते हैं तथा संभावित दवा उम्मीदवारों की पहचान की प्रक्रिया को करीब 20% तक तेज़ कर देते हैं।
    • यह रोगी-व्युत्पन्न ऑर्गनॉइड्स के माध्यम से व्यक्तिगत उपचार के लिये प्रिसिजन मेडिसिन को संभव बनाता है।
    • नियामकीय समर्थन भी मज़बूत हुआ है, जैसे– भारत के नई दवाएँ और नैदानिक  परीक्षण (संशोधन) नियम, 2023 में NAMs को पशु-आधारित डेटा के वैध विकल्प के रूप में औपचारिक मान्यता दी गई है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. बायोफार्मा SHAKTI योजना क्या है?
यह 10,000 करोड़ रुपये की एक प्रमुख पहल (केंद्रीय बजट 2026-27) है, जिसका उद्देश्य NAM के उपयोग से बायोलॉजिक्स और बायोसिमिलर्स के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना है।

2. गैर-पशु पद्धतियाँ (NAMs) क्या हैं?
ऑर्गेनॉइड्स और ऑर्गन-ऑन-ए-चिप जैसी नवीन तकनीकें मानव कोशिकाओं का उपयोग करके मानव जीवविज्ञान की नकल करती हैं, जो पशु परीक्षण की तुलना में अधिक सटीक पूर्वानुमान प्रदान करती हैं।

3. यह योजना भारत के रोगों के बोझ का समाधान कैसे करती है?
यह गैर-संचारी रोगों (NCDs) के लिये किफायती उपचारों को प्राथमिकता देती है, जो भारत में होने वाली कुल मौतों का 63% हिस्सा है।

4.बायोलॉजिक्स के परीक्षण के लिये ऑर्गनॉइड्स पशु मॉडलों की तुलना में बेहतर क्यों हैं?
ऑर्गनॉइड्स मानव स्टेम कोशिकाओं से विकसित किये जाते हैं, जिससे वे मानव कोशिकाओं की तुलना में रिसेप्टर बाइंडिंग और प्रतिरक्षा प्रतिक्रियाओं की अधिक सटीक नकल कर सकते हैं।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

प्रश्न. निम्नलिखित में से कौन-से, भारत में सूक्ष्मजैविक रोगजनकों में बहु-औषध प्रतिरोध के होने के कारण हैं? (2019)

  1. कुछ व्यक्तियों में आनुवंशिक पूर्ववृत्ति (जेनेटिक प्रीडिस्पोज़ीशन) का होना।  
  2. रोगों के उपचार के लिये वैज्ञानिकों (एंटीबॉयोटिक्स) की गलत खुराक लेना।  
  3. पशुधन फार्मिंग प्रतिजैविकों का इस्तेमाल करना।  
  4. कुछ व्यक्तियों में चिरकालिक रोगों की बहुलता होना।

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये: 

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 2 और 3

(c) केवल 1, 3 और 4

(d) केवल 2, 3 और 4 

उत्तर: (b)


AssamSAT मिशन

स्रोत: द हिंदू 

असम AssamSAT नाम के पृथ्वी-अवलोकन उपग्रहों के समूह के लिये निविदा जारी करने वाला पहला भारतीय राज्य बन गया है, जिसका उद्देश्य आपदा प्रतिक्रिया को बेहतर बनाना और राज्य की अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं को सुरक्षित करना है।

  • तकनीकी विशिष्टताएँ: असम ने निजी कंपनियों से कम-से-कम 5 उपग्रहों को लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) यानी पृथ्वी की निचली कक्षा में डिज़ाइन करने, बनाने, लॉन्च करने और संचालित करने के लिये कहा है।
    • चूँकि असम में वर्ष के लगभग छह महीने बादलों का भारी जमाव रहता है, इसलिये इन उपग्रहों में सिंथेटिक अपर्चर रडार (SAR) लगे होने की उम्मीद है, जो बादलों और अँधेरे को चीरकर साफ तस्वीरें ले सकते हैं।
  • वर्तमान व्यवस्था: वर्तमान में राज्य आपदा प्रबंधन एजेंसियाँ जब उपग्रह डेटा की आवश्यकता होती है, तो वे राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (NRSC) को अनुरोध भेजती हैं, जो उन अनुरोधों को संसाधित कर आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराता है।

लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO)

  • परिचय: लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) पृथ्वी की सतह के अपेक्षाकृत निकट का अंतरिक्ष क्षेत्र है, जो आमतौर पर 160 किमी. से 2,000 किमी. की ऊँचाई के बीच होता है। पृथ्वी से निकटता और लॉन्च के लिये कम ऊर्जा की आवश्यकता के कारण यह उपग्रहों के लिये सबसे सामान्य और लोकप्रिय कक्षा है।
  • मुख्य विशेषताएँ:
    • उच्च गति: कक्षा में बने रहने और पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का मुकाबला करने के लिये LEO में स्थित उपग्रहों को लगभग 7.8 किमी./सेकंड (लगभग 28,000 किमी./घंटा) की गति से चलना आवश्यक होता है।
    • शॉर्ट ऑर्बिटल पीरियड: एक सामान्य लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) उपग्रह पृथ्वी के चारों ओर लगभग 90 से 120 मिनट में एक पूरा चक्कर लगाता है, यानी यह दिन में करीब 14–16 बार पृथ्वी की परिक्रमा करता है।
  • लाभ: पृथ्वी की सतह के निकट होने के कारण उच्च-रिज़ॉल्यूशन वाली इमेजिंग (जो आपदा प्रबंधन और निगरानी हेतु महत्त्वपूर्ण है) और कम विलंबता (जो वास्तविक समय के संचार और हाई-स्पीड इंटरनेट के लिये अनिवार्य है) संभव हो पाती है।

मुख्य उपयोग और उदाहरण:

उपयोग के मामले 

उदाहरण

मानव अंतरिक्ष उड़ान

अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) और चीन का तियांगोंग अंतरिक्ष स्टेशन लगभग 400–420 किलोमीटर की ऊँचाई पर परिक्रमा करते हैं।

रिमोट सेंसिंग

उच्च-रिज़ॉल्यूशन इमेजिंग उपग्रह (जैसे– AssamSAT) बाढ़, सीमाओं और वनों की निगरानी के लिये LEO का उपयोग करते हैं।

संचार

स्टारलिंक (SpaceX) जैसे बड़े उपग्रह समूह बहुत कम अंतराल के साथ वैश्विक इंटरनेट और फोन कवरेज प्रदान करते हैं।

वैज्ञानिक अनुसंधान

हबल स्पेस टेलीस्कोप लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में परिक्रमा करता है और ब्रह्मांड की स्पष्ट व उच्च गुणवत्ता वाली तस्वीरें कैप्चर करता है।

Orbits

और पढ़ें: भू प्रेक्षण उपग्रह EOS-04


हडसोनियन गॉडविट

स्रोत: द हिंदू 

हडसोनियन गॉडविट उन 42 प्रजातियों में से एक है, जिन्हें ब्राज़ील के कैंपो ग्रांडे (Campo Grande) में आयोजित संयुक्त राष्ट्र वन्य पशुओं की प्रवासी प्रजाति संरक्षण कन्वेंशन (CMS COP15) में अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा के लिये प्रस्तावित किया गया है।

  • हडसोनियन गॉडविट की आबादी में 95% की गिरावट ने वैश्विक संरक्षण प्रयासों की तत्काल आवश्यकता को उजागर कर दिया है।

हडसोनियन गॉडविट

  • परिचय: हडसोनियन गॉडविट (लिमोसा हेमेस्टिका) एक प्रवासी तटीय पक्षी है, जो अपनी वार्षिक 30,000 किमी. की यात्रा के दौरान आर्कटिक में प्रजनन स्थलों से लेकर दक्षिण अमेरिका के पैटागोनिया में अपने ग्रीष्मकालीन आवास तक बिना रुके 11,000 किमी. तक उड़ान भरने में सक्षम है।
  • संरक्षण संकट: हडसोनियन गॉडविट को IUCN रेड लिस्ट में ‘असुरक्षित’ श्रेणी में रखा गया है। इसका अस्तित्व एक अत्यंत सटीक ‘जियोलॉजिकल क्लॉक’ और प्रवास के दौरान ठहराव स्थलों पर प्रचुर भोजन संसाधनों पर निर्भर करता है, जो वर्तमान में तेज़ी से प्रभावित हो रहे हैं।
  • मुख्य खतरे:
    • जलवायु परिवर्तन (आर्कटिक): वसंत ऋतु के समय में बदलाव से एक पारिस्थितिक असंतुलन उत्पन्न हो गया है, जिसके कारण गॉडविट के चूज़ों के जन्म का समय और उनके मुख्य भोजन (कीटों) की अधिकतम उपलब्धता का समय अब एक-दूसरे से असंगत रहता है।
    • आवास परिवर्तन (दक्षिण अमेरिका): दक्षिणी चिली में सैल्मन और ऑयस्टर पालन के तेज़ी से बढ़ने के कारण महत्त्वपूर्ण ज्वारीय (इंटरटाइडल) भोजन स्थलों पर बड़े पैमाने पर ढाँचागत विकास हो रहा है।
    • आर्द्रभूमि का क्षरण (उत्तरी अमेरिका): संयुक्त राज्य अमेरिका में बदलती कृषि पद्धतियों के चलते वे उथले जल वाले आर्द्रभूमि क्षेत्र, जिन पर ये पक्षी विश्राम और पुनः ऊर्जा प्राप्त करने के लिये निर्भर करते हैं, लगातार कम होते जा रहे हैं।

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CMS पर कन्वेंशन

  • वन्य जीवों की प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण पर कन्वेंशन (CMS), जिसे बॉन कन्वेंशन के रूप में भी जाना जाता है, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के तहत एक कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतर्राष्ट्रीय संधि है। यह राष्ट्रीय सीमाओं के पार प्रवासी प्रजातियों और उनके आवासों की सुरक्षा के लिये  एक वैश्विक ढाँचा प्रदान करता है।
    • CMS के तहत, रेंज स्टेट्स (वे देश जहाँ से ये पक्षी गुज़रते हैं) कानूनी रूप से उन प्रजातियों की रक्षा करने के लिये बाध्य हैं जिन्हें विलुप्त होने के खतरे में सूचीबद्ध किया गया है। इन देशों को उनके आवासों का संरक्षण और पुनर्स्थापन करना होगा, साथ ही उनके प्रवास के मार्ग में आने वाली बाधाओं को भी रोकना होगा।
  • वर्ष 1979 में बॉन, जर्मनी में अपनाया गया और वर्ष 1983 में लागू हुआ यह समझौता, उन प्रजातियों की अनूठी चुनौती का समाधान करता है जो प्रजनन, भोजन और प्रवास हेतु चक्र के रूप में सीमाओं को पार करती हैं, जिसके लिये समन्वित अंतर्राष्ट्रीय कार्रवाई की आवश्यकता होती है।
  • CMS दो परिशिष्टों के माध्यम से कार्य करता है:
    • परिशिष्ट I में उन लुप्तप्राय प्रवासी प्रजातियों को शामिल किया गया है जिन्हें सख्त सुरक्षा की आवश्यकता है, जैसे कि उनके शिकार पर प्रतिबंध और उनके आवासों का पुनर्स्थापन, इसमें 188 प्रजातियाँ सूचीबद्ध हैं, जिनमें भारत के ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (सोन चिरैया), साइबेरियन क्रेन (सफेद सारस), ओलिव रिडले कछुआ तथा लेदरबैक कछुआ शामिल हैं।
    • परिशिष्ट II उन प्रजातियों पर केंद्रित है जिनकी संरक्षण स्थिति प्रतिकूल है और यह समझौतों तथा समझौता ज्ञापनों (MoUs) के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देता है।
  • पक्षकारों का सम्मेलन (COP) निर्णय लेने वाली संस्था के रूप में कार्य करता है, जो इसके कार्यान्वयन की समीक्षा करता है और संरक्षण के उपायों को अद्यतन करता है।

और पढ़ें: विश्व की प्रवासी प्रजातियों की स्थिति


IVFRT योजना

स्रोत: टीएच

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने आप्रवासन वीज़ा विदेशी पंजीकरण ट्रैकिंग (IVFRT) योजना को 1 अप्रैल, 2026 से 31 मार्च, 2031 तक पाँच साल की अवधि के लिये 1,800 करोड़ रुपये के वित्तीय परिव्यय के साथ विस्तारित करने की मंज़ूरी दे दी है, इसे नए आप्रवास और विदेशियों विषयक अधिनियम, 2025 के अनुरूप बनाया गया है।

  • परिचय: IVFRT योजना, जिसे शुरू में वर्ष 2010 में अनुमोदित किया गया था, गृह मंत्रालय की एक प्रमुख ई-गवर्नेंस पहल है जिसका उद्देश्य भारत में आप्रवास, वीज़ा जारी करने एवं विदेशी पंजीकरण प्रक्रियाओं का आधुनिकीकरण और एकीकरण करना है।
    • यह बेहतर ट्रैकिंग और डेटा एकीकरण के माध्यम से राष्ट्रीय सुरक्षा को मज़बूत करते हुए वैध यात्रा को सुगम बनाता है। 
    • यह प्रणाली विदेशों में स्थित भारतीय मिशनों, इमिग्रेशन चेक पोस्ट (ICPs), विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण कार्यालयों (FRROs) और सुरक्षा एजेंसियों जैसे प्रमुख हितधारकों को एक एकीकृत ढाँचे में जोड़ती है।
  • तकनीकी आधुनिकीकरण: योजना बायोमेट्रिक्स, सेल्फ-सर्विस कियोस्क और मोबाइल-आधारित सेवाओं जैसी उभरती तकनीकों के उपयोग के माध्यम से संपर्करहित और फेसलेस (चेहरेरहित) वीज़ा प्रक्रिया सुनिश्चित करती है।
  • सुरक्षा एवं निगरानी: अवैध प्रवासन को नियंत्रित करने और वीज़ा मानदंडों के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिये देश के भीतर विदेशियों पर नज़र रखना एक महत्त्वपूर्ण उपाय है।
  • परिचालनात्मक सुधार: इस प्रणाली ने अपनी वीज़ा प्रक्रिया को 100% संपर्करहित और आमने-सामने की मुलाकात के बिना करके उल्लेखनीय दक्षता हासिल की है। इससे ई-वीज़ा मंज़ूरी का समय काफी कम हुआ है, जिसमें 91.24% मंज़ूरियाँ 72 घंटों के भीतर मिल जाती हैं। इसके अतिरिक्त, डाकघरों में औसत मैनुअल मंज़ूरी का समय घटकर केवल 2.5-3 मिनट रह गया है।
    • फास्ट ट्रैक इमिग्रेशन-ट्रस्टेड ट्रैवलर प्रोग्राम (FTI-TTP) 13 प्रमुख हवाई अड्डों पर स्वचालित ई-गेट का उपयोग करता है, जिससे भारतीय नागरिकों और प्रवासी नागरिकता कार्डधारकों के लिये क्लियरेंस का समय घटकर 30 सेकंड हो जाता है।
  • आर्थिक प्रभाव: प्रवेश प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने वाली यह योजना पर्यटन, चिकित्सा यात्रा और व्यावसायिक क्षेत्रों को महत्त्वपूर्ण रूप से प्रोत्साहित करती है। इससे भारत में व्यापार करने की सुगमता बढ़ती है, जिससे देश पर सकारात्मक आर्थिक प्रभाव पड़ता है।

और पढ़ें.. आप्रवास और विदेशियों विषयक अधिनियम, 2025


HALEU-थोरियम ईंधन

स्रोत: टीएच

भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) द्वारा किये गए एक अध्ययन के अनुसार भारत के रिएक्टरों हेतु HALEU-थोरियम ईंधन (HALEU-Th) की उपयुक्तता के बारे में चिंताएँ व्यक्त की हैं, जबकि देश त्रिस्तरीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के तहत अपने विशाल थोरियम भंडार का उपयोग करके परमाणु ऊर्जा को बढ़ावा देने की संभावनाओं का पता लगा रहा है।

  • परिचय: HALEU-थोरियम ईंधन समृद्ध यूरेनियम (U-235) और थोरियम का एक संयोजन है। इसमें थोरियम एक उर्वर सामग्री के रूप में कार्य करता है, जो विखंडनीय U-233 उत्पन्न कर सकता है। यह प्रक्रिया ईंधन की दीर्घकालिक स्थिरता और निरंतरता बनाए रखने में मदद करती है।
  • लाभ: सिमुलेशन परिणामों से यह दर्शाया गया कि HALEU-थोरियम ईंधन पारंपरिक ईंधनों की तुलना में दो मुख्य लाभ प्रदान करता है: उच्च ऊर्जा उत्पादन (बर्न-अप) प्रदान करता है तथा काफी निम्न रेडियोधर्मी अपशिष्ट उत्पन्न करता है।
  • चिंता का विषय: अध्ययन के अनुसार, HALEU-थोरियम ईंधन रिएक्टर की सुरक्षा प्रणालियों (जैसे– शटडाउन रॉड्स) की प्रभावशीलता को कम कर सकता है। इसके लिये महत्त्वपूर्ण डिज़ाइन परिवर्तनों की आवश्यकता होगी, जो इसे तत्काल उपयोग के लिये अनुपयुक्त बनाते हैं।
  • वैश्विक विकास: उन्नत रिएक्टरों और लघु मॉड्यूलर रिएक्टरों (SMR) के लिये विकसित ANEEL (एडवांस्ड न्यूक्लियर एनर्जी फॉर एनरिच्ड लाइफ) ईंधन का उपयोग किया जा रहा है। इसका परीक्षण अमेरिका में किया गया है और भारत में शांति अधिनियम जैसी नीतिगत पहलों के बाद प्रेशराइज़्ड हेवी वाटर रिएक्टरों (PHWRs) में भी इसके संभावित उपयोग पर विचार किया जा रहा है।

और पढ़ें: FBR के विकल्प के रूप में HALEU ईंधन चक्र