प्रिलिम्स फैक्ट्स (24 Mar, 2026)



भारत इलेक्ट्रिसिटी समिट 2026

स्रोत: पीआईबी 

चर्चा में क्यों?

भारत इलेक्ट्रिसिटी समिट 2026 नई दिल्ली में ‘विकास का विद्युतीकरण, स्थिरता को सशक्त बनाना, वैश्विक स्तर पर जोड़ना’ (Electrifying Growth. Empowering Sustainability. Connecting Globally) विषय के तहत आयोजित किया गया।

  • यह भारत के विद्युत संकट से नवीकरणीय ऊर्जा-प्रधान ऊर्जा अधिशेष की ओर होने वाले परिवर्तन को प्रदर्शित करता है, साथ ही वर्ष 2032 तक 50 लाख करोड़ रुपए के अनुमानित निवेश की संभावना को उजागर करता है।

भारत इलेक्ट्रिसिटी समिट 2026

  • परिचय: यह भारत के अनुकूलनशील और कम-कार्बन ऊर्जा ईकोसिस्टम की ओर संक्रमण को गति प्रदान करने हेतु एक वैश्विक मंच के रूप में कार्य करता है।
    • इसमें 25,000 से अधिक प्रतिभागी और 80 से अधिक देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए, जिससे भारत को अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा सहयोग के लिये एक केंद्रीय केंद्र के रूप में स्थापित किया गया।
  • नवाचार ईकोसिस्टम: इसमें 500 से अधिक प्रदर्शकों में से 100 से अधिक स्टार्टअप्स के साथ एक समर्पित प्रौद्योगिकी प्रदर्शनी शामिल थी, जो पावर सेक्टर और उभरते विद्युत समाधान में अनुसंधान एवं विकास (R&D) को उजागर करती है।

भारत के विद्युत क्षेत्र के परिवर्तन से संबंधित प्रमुख तथ्य क्या हैं?

  • नवीकरणीय ऊर्जा में वृद्धि: जनवरी 2026 तक भारत की कुल स्थापित विद्युत क्षमता 520 GW तक पहुँच गई। वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारत ने 52,537 MW की रिकॉर्ड क्षमता जोड़ी, जिसमें नवीकरणीय ऊर्जा का हिस्सा 75% (39,657 MW) था। इस वृद्धि में सौर ऊर्जा ने अग्रणी भूमिका निभाई, जो वर्ष 2014 में 3 GW से बढ़कर जनवरी 2026 में 140 GW तक पहुँच गई।
    • अंतर्राष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसी (IRENA) की नवीकरणीय ऊर्जा सांख्यिकी 2025 के अनुसार, भारत कुल स्थापित नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में वैश्विक स्तर पर चौथे स्थान पर है।
    • भारत ने 29 जुलाई, 2025 को एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि प्राप्त की, जब नवीकरणीय स्रोतों ने देश की कुल विद्युत मांग का 51.5% पूरा किया। इस विद्युत उत्पादन संरचना में सौर ऊर्जा (44.5 GW), पवन ऊर्जा  (29.89 GW) और जल ऊर्जा (30.29 GW) शामिल हैं।
  • घाटे से स्थिरता की ओर: राष्ट्रीय विद्युत कमी वित्तीय वर्ष 2013-14के 4.2% से घटकर दिसंबर 2025 में 0.03% रह गई। भारत ने वित्तीय वर्ष 2025-26 में 242 GW की उत्कृष्ट मांग को सफलतापूर्वक पूर्ण किया।
  • सार्वभौमिक विद्युतीकरण सफलता: सौभाग्य, दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना (DDUGJY) और इंटीग्रेटेड पावर डेवलपमेंट स्कीम (IPDS) जैसी योजनाओं के तहत 1.85 लाख करोड़ रुपए के निवेश से 18,374 गाँवों का विद्युतीकरण किया गया और 2.86 करोड़ घरों को कनेक्शन प्रदान किये गए। ग्रामीण क्षेत्रों में औसत दैनिक विद्युत आपूर्ति वित्तीय वर्ष 2013-14 के 12.5 घंटे से बढ़कर वित्तीय वर्ष 2024-25 में 22.6 घंटे हो गई।
  • राष्ट्रीय ग्रिड की उपलब्धियाँ: भारत अब विश्व का सबसे बड़ा समकालिक राष्ट्रीय ग्रिड संचालित करता है, जिसकी लंबाई 5 लाख सर्किट किमी. (ckm) से अधिक है। राष्ट्रीय विद्युत योजना (2023-32) इसे और बढ़ाकर 6.48 लाख ckm करने का लक्ष्य रखता है, जिसके लिये 9.15 लाख करोड़ रुपए का निवेश प्रस्तावित है।
  • वित्तीय अनुशासन: पुनर्गठित वितरण क्षेत्र योजना (RDSS), लेट पेमेंट सरचार्ज (LPS) नियम, 2022 और 5.62 करोड़ स्मार्ट मीटरों की स्थापना ने क्रांतिकारी परिवर्तन लाए हैं, जिससे शेष राशि जून 2022 के  1.4 लाख करोड़ रुपए से घटकर फरवरी 2026 में केवल 4,109 करोड़ रुपए रह गई।
  • DISCOM की पुनर्प्राप्ति: पहली बार वितरण उपयोगिताओं ने वित्तीय वर्ष 2024-25 में 2,701 करोड़ रुपये का लाभ दर्ज किया, जो वित्तीय वर्ष 2013-14 के 67,962 करोड़ रुपए के नुकसान से एक विशाल सुधार है।
  • प्रमुख सरकारी पहल:
    • PM सूर्य घर योजना: वर्ष 2024 में शुरू की गई यह 75,021 करोड़ रुपए की योजना अब तक 31.04 लाख घरों तक पहुँच चुकी है और वित्तीय वर्ष 2026-27 तक 1 करोड़ आवासीय रूफटॉप सोलर इंस्टॉलेशन का लक्ष्य रखती है।
    • पुनर्गठित वितरण क्षेत्र योजना (RDSS): 3.03 लाख करोड़ रुपए की RDSS के तहत पूरे देश में 5.62 करोड़ से अधिक स्मार्ट मीटर लगाए गए हैं, जिससे बिलिंग दक्षता और उपभोक्ता पारदर्शिता में सुधार हुआ है।
    • राष्ट्रीय विद्युत योजना (2023-32): वर्ष 2032 तक 458 GW की अनुमानित उत्कृष्ट मांग को पूरा करने के लिये 9.15 लाख करोड़ रुपए का निवेश ट्रांसमिशन सिस्टम में करने का लक्ष्य है।
    • इलेक्ट्रिसिटी (संशोधन) विधेयक, 2026: क्रॉस-सबसिडी को समुचित बनाने, लागत-प्रतिबिंबित टैरिफ को बढ़ावा देने और औद्योगिक उपभोक्ताओं को सीधे विद्युत खरीदने की अनुमति देने पर केंद्रित, ताकि विनिर्माण प्रतिस्पर्द्धात्मकता बढ़ सके।
    • POWERGRID में निवेश अधिकरण का विस्तार: सरकार ने POWERGRID (देश की सबसे बड़ी ट्रांसमिशन उपयोगिता) के निवेश अधिकरण को बढ़ाया है, जिससे प्रत्येक सहायक कंपनी के लिये इक्विटी सीमा 5,000 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 7,500 करोड़ रुपए कर दी गई है। 

India's_Climate_Action_Targets

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ) 

1. जनवरी 2026 तक भारत की कुल स्थापित विद्युत क्षमता कितनी थी?
जनवरी 2026 तक भारत की कुल स्थापित विद्युत क्षमता 520.51 GW पहुँच गई, जिसमें वित्तीय वर्ष 2025-26 में 52,537 MW की रिकॉर्ड वृद्धि हुई।

2. भारत के ऊर्जा क्षेत्र के लिये 29 जुलाई, 2025 का क्या महत्त्व है?
इस दिन भारत ने अपनी कुल विद्युत मांग का 51.5% केवल नवीकरणीय स्रोतों से पूरा किया, जो हरित ऊर्जा के उच्च-स्तरीय ग्रिड एकीकरण की सफलता का संकेत है।

3. PM सूर्य घर: मुफ्त विद्युत योजना का मुख्य उद्देश्य क्या है?
यह 75,021 करोड़ रुपए की पहल है, जिसका लक्ष्य वित्तीय वर्ष 2026-27 तक 1 करोड़ घरों में रूफटॉप सोलर स्थापित करना है, ताकि उपभोक्ता-निर्माता को बढ़ावा प्राप्त हो और आवासीय विद्युत लागत कम हो सके।

4. राष्ट्रीय विद्युत योजना (2023-32) की विशेषताएँ क्या हैं?
यह योजना 2032 तक 458 GW की उत्कृष्ट मांग को पूरा करने का लक्ष्य रखती है, जिसके लिये ट्रांसमिशन नेटवर्क को 6.48 लाख ckm तक बढ़ाने हेतु 9.15 लाख करोड़ रुपए का निवेश आवश्यक है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

प्रश्न: भारतीय अक्षय ऊर्जा विकास एजेंसी लिमिटेड (IREDA) के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? (2015)

  1. यह एक पब्लिक लिमिटेड सरकारी कंपनी है।  
  2. यह एक गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी है।

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (c)


विश्व जल दिवस, 2026

प्रिलिम्स के लिये: विश्व जल दिवस, चक्रीय जल अर्थव्यवस्था, लघु सिंचाई गणना, जल निकायों की गणना, FICCI, ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF), भुवन, रियो पृथ्वी शिखर सम्मेलन,1992, सतत विकास लक्ष्य, नीति आयोग, जल ऋण, सिंधु नदी तंत्र, सुपोषण, आर्सेनिक, फ्लोराइड, रामसर स्थल, कदन्न         

मेन्स के लिये: विश्व जल दिवस संगोष्ठी, 2026 की प्रमुख बातें, वैश्विक स्तर पर और भारत में जल से संबंधित प्रमुख चिंताएँ और आगे की राह।

स्रोत: पीआईबी

चर्चा में क्यों?

जलशक्ति मंत्रालय ने विश्व जल दिवस, 2026 के अवसर पर "इंडस्ट्री फॉर वाटर" विषय के अंतर्गत विश्व जल दिवस संगोष्ठी, 2026 का आयोजन किया, जो एक चक्रीय जल अर्थव्यवस्था की ओर सामरिक बदलाव का प्रतीक है।

सारांश

  • विश्व जल दिवस संगोष्ठी, 2026 औद्योगिक प्रतिबद्धताओं को सामुदायिक भागीदारी के साथ एकीकृत करके भारत के डेटा-संचालित चक्रीय जल अर्थव्यवस्था में परिवर्तन का प्रतीक है।
  • यह घटती प्रति-व्यक्ति जल उपलब्धता का सामना करने के लिये ग्लेशियर निगरानी और अपशिष्ट जल पुनर्चक्रण को प्राथमिकता देता है।
  • यह समग्र दृष्टिकोण आर्थिक विकास को पर्यावरणीय स्थिरता और लैंगिक-समावेशी जल सुरक्षा के साथ संरेखित करता है।

विश्व जल दिवस संगोष्ठी, 2026 की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?

  • चक्रीय जल अर्थव्यवस्था पर केंद्रित: संगोष्ठी ने चक्रीय जल अर्थव्यवस्था के महत्त्व पर बल दिया, जो "टेक-यूज़-डिस्कार्ड" सिस्टम का स्थान लेने वाला एक रेस्टोरेटिव मॉडल है।
    • यह अपशिष्ट जल को एक बहुमूल्य सीमित संसाधन के रूप में मानता है, जो रिड्यूज़, रियूज़ और रिसायकल पर बल देता है। यह सुनिश्चित करता है कि जल खपत की तुलना में अलग हो, जिससे दीर्घकालिक जलवायु लचीलापन को बढ़ावा मिले।
  • ऐतिहासिक डेटा संसाधनों का शुभारंभ: संगोष्ठी में 7वीं लघु सिंचाई गणना, दूसरे जल निकायों की गणना और प्रमुख एवं मध्यम सिंचाई परियोजनाओं की गणना, साथ ही राष्ट्रीय जल डेटा नीति, 2026 को जारी किया गया।
  • संयुक्त उद्योग घोषणा: प्रमुख उद्योग संघों (FICCI, एसोचैम, CII) ने वर्ष 2027 तक नियमित जल का ऑडिट करने, वर्ष 2030 तक शून्य तरल निर्वहन (ZLD) प्राप्त करने और वर्ष 2030 तक कॉर्पोरेट वाटर फुटप्रिंट को 50% तक कम करने की प्रतिबद्धता जताई।
  • क्रायोस्फीयर और ग्लेशियल निगरानी: राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (NRSC)-ISRO के सहयोग से कार्यक्रम में हिमालयी सुरक्षा के लिये भुवन जैसे प्लेटफॉर्मों का उपयोग करते हुए एक ग्लेशियल निगरानी ढाँचे और ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) जोखिम न्यूनीकरण पर बल दिया गया।
  • प्रौद्योगिकी एकीकरण: पारंपरिक प्रबंधन से सटीक जल शासन में बदलाव के लिये AI और IoT का लाभ उठाने पर ज़ोर दिया गया।

विश्व जल दिवस

  • परिचय: संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिवर्ष 22 मार्च को विश्व जल दिवस (World Water Day) मनाया जाता है। इसका उद्देश्य ताज़े पानी (Freshwater) के संसाधनों के महत्त्व को उजागर करना और उनके सतत प्रबंधन के लिये जागरूकता बढ़ाना है।
    • यह UN-Water द्वारा समन्वित किया जाता है, जो जल और स्वच्छता पर संयुक्त राष्ट्र की अंतर-एजेंसी समन्वय प्रणाली है।
  • 2026 का थीम: 2026 के लिये थीम है ‘वाटर एंड जेंडर’ और इसके अभियान का नारा है “जहाँ जल बहता है, वहाँ समानता बढ़ती है” (Where water flows, equality grows)।
    • यह जल पहुँच, महिलाएँ और लैंगिक समानता के बीच संबंधों को उजागर करता है और यह स्वीकार करता है कि वैश्विक जल संकट महिलाओं तथा लड़कियों को असमान रूप से प्रभावित करता है
  • उत्पत्ति: विश्व जल दिवस का प्रस्ताव सर्वप्रथम वर्ष 1992 के रियो अर्थ समिट (पर्यावरण एवं विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन) में प्रस्तुत किया गया था। इसके पश्चात 22 मार्च, 1993 को वैश्विक स्तर पर प्रथम बार इस दिवस का आयोजन किया गया।
  • SDG से संरेखण: यह सतत विकास लक्ष्य 6 (SDG 6) को सीधे समर्थन देता है, जिसका उद्देश्य 2030 तक सभी के लिये स्वच्छ जल और स्वच्छता सुनिश्चित करना है।

भारत में जल संरक्षण की पहल

वैश्विक स्तर पर और भारत में जल से संबंधित प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?

  • सुरक्षित जल और स्वच्छता की कमी: संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, लगभग 2.2 अरब लोग सुरक्षित तरीके से प्रबंधित पेयजल तक पहुँच से वंचित हैं।
    • इसके परिणामस्वरूप स्वास्थ्य पर अत्यधिक बोझ पड़ता है, जिसमें प्रतिवर्ष निवारण योग्य जल-जनित कारणों से होने वाली अनुमानित 14 लाख मौतें और बार-बार होने वाले प्रकोप जैसे कि हैज़ा जैसी महामारियाँ शामिल हैं।
  • जलवायु परिवर्तन और जलवायु अस्थिरता: ग्लोबल वार्मिंग प्राकृतिक जल-चक्र की लय को बाधित कर रहा है, जिसके परिणामस्वरूप चरम मौसमी घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता में अभूतपूर्व वृद्धि देखी जा रही है। यह व्यवधान वैश्विक जल सुरक्षा के लिये एक गंभीर चुनौती है। इसका परिणाम ‘बहुत अधिक या बहुत कम’ स्थिति में निकलता है—लंबे सूखे के बाद विनाशकारी बाढ़ आती है।
    • केवल सूखे से होने वाली वार्षिक आर्थिक लागत हाल के वर्षों में 300 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक हो गई है।
  • सांप्रभौमिक जल संघर्ष: वैश्विक ताज़े पानी के प्रवाह का 60% से अधिक भाग ऐसे बेसिनों से होता है जो दो या दो से अधिक देशों द्वारा साझा किये जाते हैं। सहयोगात्मक संधियों की कमी अक्सर भू-राजनीतिक तनावों (जैसे– भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी प्रणाली का विवाद) को जन्म देती है।
    • उदाहरणतः खाड़ी क्षेत्र (मध्य पूर्व) में बड़ी नदियाँ नहीं हैं और पानी के लिये यह डिसेलिनेशन पर निर्भर है, जिससे यह अत्यधिक संवेदनशील बन जाता है, हाल ही में ईरान संघर्ष की धमकियों ने महत्त्वपूर्ण जल अवसंरचना के जोखिम को उजागर किया है।
  • जल गुणवत्ता और प्रदूषण: उद्योगों का अपशिष्ट, बिना उपचारित सीवेज तथा कृषि अपवाह (कीटनाशक/नाइट्रेट) ताज़े पानी के स्रोतों को प्रदूषित कर रहे हैं, जिससे पोषक तत्त्वों की अत्यधिक वृद्धि (यूट्रोफिकेशन) एवं जलजनित रोगों का प्रसार हो रहा है।
  • भूजल क्षय और पारिस्थितिक तंत्र में गिरावट: 1990 के दशक की शुरुआत से विश्व की आधे से अधिक बड़ी झीलों का स्तर घटा है, 1970 के बाद से लगभग 35% प्राकृतिक आर्द्रभूमियाँ नष्ट हो चुकी हैं तथा लगभग 70% प्रमुख जलभृतों में दीर्घकालिक गिरावट देखी जा रही है। इससे भूमि धँसाव की समस्या उत्पन्न हुई है, जो 2 अरब से अधिक लोगों को प्रभावित कर रही है एवं खाद्य उत्पादन पर भी खतरा बढ़ गया है, क्योंकि वैश्विक सिंचित कृषि भूमि का आधे से अधिक हिस्सा उच्च जल तनाव का सामना कर रहा है।
  • लैंगिक और सामाजिक असमानताएँ: महिलाएँ और लड़कियाँ इस समस्या का सबसे अधिक बोझ उठाती हैं, जो रोज़ाना लगभग 250 मिलियन घंटे पानी लाने में खर्च करती हैं। इससे उनकी शिक्षा, आर्थिक अवसरों और सुरक्षा प्रभावित होते हैं, जबकि जल शासन में उनकी भागीदारी अभी भी सीमित बनी हुई है।

भारत में विशिष्ट चिंताएँ

  • भूजल क्षय: भारत विश्व में भूजल का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। कृषि के लिये अत्यधिक दोहन (बिजली सब्सिडी से बढ़ावा मिला) के कारण जल स्तर में गंभीर गिरावट आई है, विशेषकर पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में।
    • उदाहरण के लिये भारत में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 1950 में 5,200 घन मीटर (जल-समृद्ध) से घटकर 2024 में 1,400–1,500 घन मीटर (जल-संकटग्रस्त) रह गई है और 2050 तक इसके 1,191 घन मीटर तक पहुँचने का अनुमान है, जो 1,000 घन मीटर की जल-अभाव सीमा के खतरनाक रूप से करीब है।
  • अंतर-राज्यीय विवाद: नदियों के जल बँटवारे को लेकर संवैधानिक चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं। कावेरी (कर्नाटक-तमिलनाडु) और कृष्णा जल बँटवारे जैसे लंबे समय से चले आ रहे विवाद अक्सर विकास परियोजनाओं को बाधित करते हैं।
  • जल की गुणवत्ता और संदूषण
    • भू-जनित प्रदूषण: भूजल में आर्सेनिक और फ्लोराइड के उच्च स्तर इंडो-गंगा मैदान तथा मध्य भारत में लाखों लोगों को प्रभावित कर रहे हैं। उदाहरण के लिये भारत में लगभग 90 मिलियन लोग आर्सेनिक के उच्च स्तर के संपर्क में हैं।
      • बठिंडा-बीकानेर एक्सप्रेस, जिसे ‘कैंसर ट्रेन’ कहा जाता है, पंजाब के कॉटन बेल्ट से कई कैंसर मरीज़ों को इलाज के लिये राजस्थान ले जाती है। कैंसर के मामले मुख्य रूप से भूजल में यूरेनियम, आर्सेनिक, फ्लोराइड और प्रतिबंधित कीटनाशकों, जैसे– DDT (डाइक्लोरो-डाइफिनाइल-ट्राइक्लोरोएथेन) के अवशेषों से होने वाले प्रदूषण के कारण बढ़ रहे हैं।
    • जीवाणुजनित प्रदूषण: अनुमान है कि भारत के लगभग 70% सतही जलस्रोत बिना उपचारित शहरी सीवेज से प्रदूषित हैं।
  • ‘हिमालयी संकट’ ‘तीसरे ध्रुव’ के रूप में हिमालयी ग्लेशियरों का पिघलना गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र नदियों की सदानीरा प्रकृति को खतरे में डाल रहा है, जो उत्तर भारत की जीवनरेखा हैं।
  • शहरी जल संकट: तीव्र और अनियोजित शहरीकरण के कारण बंगलुरु और चेन्नई जैसे शहरों में ‘ज़ीरो डे’ जैसी स्थिति का खतरा पैदा हो गया है, जहाँ मांग आपूर्ति से कहीं अधिक है और स्थानीय जलस्रोत (आर्द्रभूमि/झीलें) अतिक्रमण का शिकार हो गए हैं।

सतत जल संरक्षण हेतु किन कदमों की आवश्यकता है?

  • कृषि परिवर्तन: कृषि (लगभग 80% जल उपयोग) को ड्रिप/स्प्रिंकलर सिंचाई, फसल विविधीकरण (जल-संकट वाले क्षेत्रों में धान-गेहूँ की बजाय श्रीअन्न/अनाज आदि) और सूक्ष्म-सिंचाई के माध्यम से लक्षित करना। ऐसी तकनीकों को अपनाना जो धान की जल-गहन रोपाई प्रक्रिया को छोड़ने में सक्षम हों।
  • औद्योगिक और शहरी परिसंचरण: बड़े और अक्सर असफल केंद्रीय संयंत्रों तक प्रदूषित जल को ले जाने के बजाय, छोटे पैमाने के सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) का उपयोग करके स्रोत पर ही प्रदूषित जल स्वच्छ किया जाए।
    • शहरी अपार्टमेंट्स में द्वि-नली प्रणाली (dual-piping system) लागू करना, ताकि शुद्ध किये गए रसोई और स्नान के जल का उपयोग फ्लशिंग और बागवानी हेतु किया जा सके।
  • पारिस्थितिक एवं धरोहर पुनर्स्थापन: भारत की प्राचीन जल-प्रज्ञा को पुनरुज्जीवित करना, जैसे– आहर-पाइन (बिहार), जोहड़ (राजस्थान) और बावड़ियाँ (बाओली), जो स्थानीय स्थलाकृति के अनुरूप स्वाभाविक रूप से उपयुक्त हैं। अधिक रामसर स्थलों को नामित किया जाए और शहरी स्पंज(बाढ़भूमि और झीलें) को अतिक्रमण से सुरक्षित रखना, ताकि प्राकृतिक भूजल पुनर्भरण बना रहे।
  • शासन सुधार: ‘जन भागीदारी से जल संचय संभव है’ अभियान को सक्रियता से लागू करना, ताकि जल संरक्षण को एक जन आंदोलन में परिवर्तित किया जा सके। अत्यधिक दोहन को रोकने के लिये मुफ्त बिजली को असीमित भूजल दोहन से क्रमशः अलग किया जाए।
  • मूल्य निर्धारण एवं आर्थिक साधन: स्तरीय (टियर आधारित) जल मूल्य निर्धारण मॉडल लागू करना, जो अपव्यय को हतोत्साहित करते हुए संवेदनशील वर्गों के लिये बुनियादी पहुँच सुनिश्चित करती है। कार्बन क्रेडिट की तरह वाटर क्रेडिट की शुरुआत करना, ताकि उद्योगों और डेवलपर्स को अपने संरक्षण लक्ष्यों से अधिक प्रदर्शन करने के लिये प्रोत्साहित किया जा सके और वे अपनी अतिरिक्त ‘बचत’ का अन्य लोगों के साथ व्यापार कर सकें।

निष्कर्ष

विश्व जल दिवस सम्मेलन, 2026 भारत की जल रणनीति को साधारण दोहन से एक परिपत्र (सर्कुलर) जल अर्थव्यवस्था की ओर परिवर्तित करता है। औद्योगिक जवाबदेही (ZLD/जल ऑडिट), उन्नत डेटा शासन तथा पारंपरिक ज्ञान (आहर-पाइन) के एकीकरण के माध्यम से, यह पहल आर्थिक विकास को जल क्षय से अलग करने का प्रयास करती है, जिससे दीर्घकालिक जलवायु लचीलापन और लैंगिक-सम्मिलित जल सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. भारत के समक्ष उपस्थित प्रमुख जल-संबंधी चुनौतियों का परीक्षण कीजिये। जलवायु परिवर्तन के परिप्रेक्ष्य में इन समस्याओं के समाधान हेतु किन नीतिगत उपायों की आवश्यकता है?

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1.  विश्व जल दिवस, 2026 की थीम क्या है?
विश्व जल दिवस, 2026 की थीम  ‘वाटर एंड जेंडर’ (Water and Gender) ” है, जिसका अभियान नारा है- ‘जहाँ जल बहता है, वहाँ समानता बढ़ती है।’

2. SDG 6 के लिये ‘वाटर एंड जेंडर’ विषय का क्या महत्त्व है?
यह स्वीकार करता है कि जल संकट का बोझ महिलाओं पर असमान रूप से अधिक पड़ता है और पहुँच में लैंगिक असमानता को दूर करना सार्वभौमिक स्वच्छता और स्वास्थ्य प्राप्त करने के लिये आवश्यक है।

3. भारत में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता उसके जल तनाव की स्थिति को कैसे दर्शाती है?
भारत में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 1950 के 5,200 घन मीटर से घटकर 2024 में 1,400-1,500 घन मीटर रह गई है, जो वर्ष 2050 तक अनुमानित 1,000 घन मीटर के जल-अभाव की सीमा के जोखिमपूर्ण रूप से निकट है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

प्रिलिम्स:

प्रश्न. ‘वाटरक्रेडिट’ के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2021) 

  1. यह जल एवं स्वच्छता क्षेत्र में कार्य के लिये सूक्ष्म वित्त साधनों (माइक्रोफाइनेंस टूल्स) को लागू करता है।  
  2. यह एक वैश्विक पहल है जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन और विश्व बैंक के तत्त्वावधान में प्रारंभ किया गया है।  
  3. इसका उद्देश्य निर्धन व्यक्तियों को सहायिकी के बिना अपनी जल-संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये समर्थ बनाना है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?

(a) केवल 1 और 2

(b)  केवल 2 और 3

(c) केवल 1 और 3  

(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (c)


प्रश्न. निम्नलिखित में से कौन-सा प्राचीन नगर अपने उन्नत जल संचयन और प्रबंधन प्रणाली के लिये सुप्रसिद्ध है, जहाँ बांधों की शृंखला का निर्माण किया गया था और संबद्ध जलाशयों में नहर के माध्यम से जल को प्रवाहित किया जाता था? (2021)

(a) धौलावीरा

(b) कालीबंगा

(c) राखीगढ़ी

(d) रोपड़

उत्तर: (a)


मेन्स 

प्रश्न. भारत में घटते भूजल के लिये उत्तरदायी कारकों का परीक्षण कीजिये। भूजल में ऐसी क्षीणता को कम करने के लिये सरकार ने क्या कदम उठाए हैं? (2025)

प्रश्न. भारत में नदी के जल का औद्योगिक प्रदूषण एक महत्त्वपूर्ण पर्यावरणीय मुद्दा है। इस समस्या से निपटने के लिये विभिन्न शमन उपायों और इस संबंध में सरकारी पहल की भी चर्चा कीजिये। (2024)

प्रश्न. जल संरक्षण एवं जल सुरक्षा हेतु भारत सरकार द्वारा प्रवर्तित जलशक्ति अभियान की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं? (2020) 

प्रश्न. रिक्तीकरण परिदृश्य में विवेकी जल उपयोग के लिये जल भंडारण और सिंचाई प्रणाली में सुधार के उपायों को सुझाइये। (2020)


शहीद दिवस

स्रोत: पीआईबी

चर्चा में क्यों? 

प्रतिवर्ष 23 मार्च को पूरे भारत में शहीद दिवस मनाया जाता है, ताकि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के तीन असाधारण युवा क्रांतिकारियों- भगत सिंह, शिवराम राजगुरु और सुखदेव ठाकुर – द्वारा किये गए सर्वोच्च बलिदान को सम्मानित किया जा सके।

  • उन्हें 1931 में इसी दिन लाहौर सेंट्रल जेल में ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार द्वारा फाँसी दे दी गई थी।

नोट: भारत 30 जनवरी को महात्मा गांधी की हत्या की याद में भी  'शहीद दिवस' मनाता है।

शहीद दिवस के पीछे का इतिहास क्या है?

  • शहीद दिवस: वर्ष 1928 में लाला लाजपत राय ने साइमन कमीशन के विरोध में एक आंदोलन का नेतृत्व किया। इस दौरान पुलिस द्वारा बर्बर लाठीचार्ज में उन्हें गंभीर रूप से घायल किया गया, जिससे उनकी मृत्यु हो गई और पूरे देश में गुस्से और आक्रोश की लहर फैल गई।
    • इसके जवाब में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के क्रांतिकारियों भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने का निर्णय लिया और उसके लिये ज़िम्मेदार पुलिस अधिकारी जेम्स ए. स्कॉट की हत्या की योजना बनाई।
    • हालाँकि पहचान में हुई गलती के कारण उन्होंने जे.पी. सॉन्डर्स की हत्या कर दी। इस घटना को बाद में लाहौर षड्यंत्र केस 1929 के नाम से जाना गया।
    • इसके बाद हुए मुकदमे में उन्हें मृत्युदंड सुनाया गया और 23 मार्च, 1931 को भगत सिंह, राजगुरु तथा सुखदेव को फाँसी दी गई। इसके बाद उनका अंतिम संस्कार पंजाब के हुसैनीवाला राष्ट्रीय शहीद स्मारक में किया गया। यह घटना भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सबसे महत्त्वपूर्ण क्षणों में से एक के रूप में दर्ज है।

भगत सिंह (1907-31)

  • भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर, 1907 को बंगा, पंजाब (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। वे एक क्रांतिकारी सिख परिवार से ताल्लुक रखते थे, जहाँ उनके पिता किशन सिंह और चाचा अजीत सिंह स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से शामिल थे।
    • भगत सिंह पर जलियाँवाला बाग हत्याकांड का गहरा प्रभाव पड़ा, जिसे उन्होंने कम उम्र में देखा था। इसके साथ ही लाहौर के नेशनल कॉलेज (जिसकी स्थापना लाला लाजपत राय ने की थी) में उनकी शिक्षा ने उन्हें मज़बूत राष्ट्रवादी और क्रांतिकारी आदर्श विकसित करने में मदद की।
    • वे 1924 में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) में शामिल हुए, जिसे बाद में 1928 में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के रूप में पुनर्गठित किया गया। इसके अलावा, उन्होंने 1926 में नौजवान भारत सभा की स्थापना की ताकि युवाओं को स्वतंत्रता आंदोलन के लिये संगठित किया जा सके।
    • वर्ष 1929 में भगत सिंह ने बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में कम तीव्रता वाले बम फेंके, ताकि पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट बिल के विरोध में आवाज़ उठाई जा सके। उनका उद्देश्य था कि “बहरों को सुनने योग्य बनाया जाए।”
    • उनकी रचनाएँ, जैसे– ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’, उनके तार्किकता, समानता और सामाजिक न्याय के विश्वास को दर्शाती हैं।
      • भगत सिंह ने बलवंत, रणजीत और विद्रोही जैसे छद्म नामों का उपयोग करके कीर्ति  जैसी पत्रिकाओं में लेख लिखे और स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी विचारधारा को फैलाया।
    • उन्हें “शहीद-ए-आज़म” के रूप में सम्मानित किया गया और उन्होंने नारा “इंकलाब ज़िंदाबाद” को लोकप्रिय बनाया।

सुखदेव थापर (1907-1931)

  • हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के एक मुख्य सदस्य के रूप में उन्होंने क्रांतिकारी नेटवर्क को संगठित करने और पंजाब क्षेत्र में युवाओं को लामबंद करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे लाहौर षड्यंत्र केस के प्रमुख रणनीतिकार और प्रतिभागी थे।

शिवराम राजगुरु (1908-31)

  • राजगुरु, जो महाराष्ट्र से थे, सशस्त्र संघर्ष के कट्टर समर्थक और HSRA के प्रमुख सदस्य थे। उन्हें क्रांतिकारियों के बीच एक कुशल बंदूकधारी के रूप में बहुत सम्मान मिला और उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

Shaheed_Diwas Bhagat_Singh

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. शहीद दिवस क्या है?
यह 23 मार्च को मनाया जाता है ताकि भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के सर्वोच्च बलिदान को नमन किया जा सके

2. लाहौर षड्यंत्र केस क्या था?
यह मुकदमा जॉन पी. सांडर्स (1928) की हत्या से संबंधित था, जिसे HSRA (हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन) के क्रांतिकारियों ने लाला लाजपत राय पर हुए दमनकारी लाठीचार्ज और उनकी दुखद मृत्यु का प्रतिशोध लेने हेतु अंजाम दिया था।

3. सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में बम फेंकने (1929) का उद्देश्य क्या था?
इसका उद्देश्य दमनकारी कानूनों (पब्लिक सेफ्टी बिल, ट्रेड डिस्प्यूट बिल) का विरोध करना और प्रतीकात्मक रूप से ‘बहरों को सुनने योग्य बनाना’ था।

4. हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन क्या थी?
हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) एक प्रमुख क्रांतिकारी संगठन था, जिसका ध्येय सशस्त्र क्रांति के माध्यम से न केवल औपनिवेशिक शासन का अंत करना था, बल्कि एक न्यायसंगत समाजवादी व्यवस्था की स्थापना करना भी था।

5. भगत सिंह के मुख्य वैचारिक प्रभाव क्या थे?
वे मार्क्सवाद, समाजवाद और तार्किकता से प्रभावित थे, जो उनकी रचनाओं, जैसे– ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’ में झलकते हैं।


श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी

स्रोत: पीआईबी 

केंद्रीय गृहमंत्री ने छठे सिख गुरु, गुरु हरगोबिंद साहिब जी को उनके ज्योति-ज्योत दिवस पर श्रद्धांजलि अर्पित की। यह दिवस 22 मार्च, 2026 को मनाया गया, जो उनके दिव्य ज्योति में विलीन होने का दिन है। इस अवसर पर उन्होंने संत-सिपाही परंपरा की स्थापना और मानवता की रक्षा में उनकी स्थायी विरासत को रेखांकित किया।

  • गुरु हरगोबिंद साहिब जी: उनका जन्म 1595 में पंजाब के अमृतसर ज़िले में हुआ था। अपने पिता गुरु अर्जुन देव जी की शहादत के बाद उन्होंने 1606 ई. में गुरुगद्दी सँभाली।
  • मीरी-पीरी की अवधारणा: उन्होंने क्रांतिकारी सिद्धांत मीरी (लौकिक/राजनीतिक शक्ति) और पीरी (आध्यात्मिक अधिकार) की शुरुआत की, जिसे उन्होंने दो अलग-अलग तलवारें धारण करके प्रतीकात्मक रूप से प्रदर्शित किया।
  • 'संत-सिपाही' परंपरा: अत्याचार के खिलाफ न्याय और आस्था की रक्षा की आवश्यकता को समझते हुए उन्होंने सिख समुदाय को एक योद्धा और आध्यात्मिक शक्ति में बदल दिया, जिससे संत-सिपाही के आदर्श की नींव रखी गई।
  • अकाल तख्त की स्थापना: धर्मनिरपेक्ष और राजनीतिक मामलों के संचालन के लिये उन्होंने 1609 में अकाल तख्त का निर्माण करवाया।
    • अमृतसर में हरमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) के ठीक सामने बना यह स्थान सिख धर्म में लौकिक अधिकार के रूप में सर्वोच्च बना हुआ है।
  • बंदी छोड़ दिवस: गुरु हरगोबिंद साहिब जी को जहाँगीर ने ग्वालियर के किले में कुछ समय के लिये कैद कर लिया था। जब उन्हें रिहा करने की पेशकश की गई, तो उन्होंने 52 कैदी राजाओं को अपने साथ रिहा किये बिना जाने से इनकार कर दिया।
    • इस ऐतिहासिक मुक्ति को प्रतिवर्ष बंदी छोड़ दिवस (मुक्ति दिवस) के रूप में मनाया जाता है।
  • सैन्य संघर्ष: वह पहले सिख गुरु थे, जिन्होंने एक स्थायी सेना रखी और अपने लोगों की रक्षा के लिये युद्ध किया। उन्होंने मुगल सम्राट शाहजहाँ की सेनाओं के खिलाफ चार प्रमुख लड़ाइयों में सफलतापूर्वक नेतृत्व किया।
  • नगर की स्थापना: उन्होंने शिवालिक पहाड़ियों की तलहटी में कीरतपुर साहिब नामक शहर की स्थापना की, जहाँ उन्होंने अपने अंतिम वर्ष बिताए और अंततः 1644 में ज्योति-ज्योत प्राप्त की।

और पढ़ें:  अकाल तख्त


लिपुलेख दर्रे से भारत-चीन सीमा व्यापार

स्रोत: टाइम्स ऑफ इंडिया 

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ ज़िले में लिपुलेख दर्रे से भारत और चीन के बीच सीमा व्यापार छह वर्ष के अंतराल के बाद जून 2026 में फिर से शुरू होने जा रहा है। यह व्यापार वर्ष 2019-20 में कोविड-19 महामारी और उसके बाद सीमा पर बढ़े तनाव के कारण बंद कर दिया गया था।

  • हालाँकि इसकी बहाली ने राजनयिक तनाव को फिर से गरमा दिया है; नेपाल ने इस कदम का कड़ा विरोध करते हुए अपने इस दावे को दोहराया है कि कालापानी-लिपुलेख-लिंपियाधुरा क्षेत्र नेपाल का संप्रभु क्षेत्र है।
  • द्विपक्षीय समझौता: यह निर्णय अगस्त 2025 में भारत और चीन के बीच हिमालयी क्षेत्र के तीन निर्धारित व्यापार मार्गों (लिपुलेख, शिपकी ला और नाथू ला) को फिर से खोलने के लिये हुए कूटनीतिक समझौते के बाद लिया गया है।
  • बेहतर बुनियादी ढाँचा: वर्ष 2020 से पूर्व के व्यापार के विपरीत, जो खच्चरों और भेड़ों पर निर्भर था, आगामी व्यापार लिपुलेख तक पहुँचने वाली वाहन योग्य सड़क (2020 में पूरी हुई) से लाभान्वित होगा, जिससे रसद लागत और यात्रा समय में भारी कमी आएगी।
  • लिपुलेख दर्रा: यह उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र में स्थित एक उच्च ऊँचाई वाला पर्वतीय दर्रा है, जो भारत, नेपाल और चीन की त्रिसीमा के निकट स्थित है और उत्तराखंड को तिब्बत से जोड़ता है। 
    • यह उच्च हिमालय की ओर जाने वाला प्रवेश द्वार है और ऐतिहासिक रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह भारतीय उपमहाद्वीप को तिब्बती पठार से जोड़ने वाले प्राचीन व्यापार मार्ग के रूप में जाना जाता है।
    • लिपुलेख 1992 में चीन के साथ व्यापार के लिये खोला गया पहला भारतीय सीमा बॉर्डर था, इसके बाद हिमाचल प्रदेश में शिपकी ला (1994) और सिक्किम में नाथू ला (2006) का उद्घाटन हुआ।
    • सुगौली संधि (1816): आंग्ल-नेपाल युद्ध के बाद नेपाल राज्य और ब्रिटिश भारत के बीच सुगौली संधि पर हस्ताक्षर हुए। इस संधि ने काली नदी (जिसे महाकाली या शारदा नदी भी कहा जाता है) को नेपाल की पश्चिमी सीमा के रूप में निर्धारित किया।
  • पुराना लिपुलेख दर्रा: उत्तराखंड के पिथौरागढ़ ज़िले की व्यास घाटी में स्थित यह दर्रा कैलाश मानसरोवर यात्रा के हिस्से के रूप में अत्यधिक धार्मिक महत्त्व रखता है।
  • नेपाल के साथ क्षेत्रीय विवाद:
    • नदी के स्रोत को लेकर विवाद:
      • नेपाल का दावा: काठमांडू का तर्क है कि नदी का स्रोत लिंपियाधुरा में है, जो लिपुलेख के उत्तर-पश्चिम में स्थित है। इसके आधार पर, इस बिंदु के पूर्व में स्थित त्रिभुजाकार क्षेत्र लिंपियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी संपूर्ण रूप से नेपाल का है।
      • भारत का दृष्टिकोण: भारत का मानना है कि नदी का स्रोत कालापानी गाँव के पास स्थित जल-स्रोतों से है, जिससे विवादित क्षेत्र स्पष्ट रूप से उत्तराखंड के पिथौरागढ़ ज़िले में आता है।

Lipulekh_Pass

और पढ़ें: लिपुलेख दर्रा


भारत-म्याँमार सीमा

स्रोत: द हिंदू 

मिज़ोरम होते हुए म्याँमार में प्रवेश करने वाले सात विदेशी नागरिकों की गिरफ्तारी ने भारत-म्याँमार सीमा की सुभेद्यता को उजागर किया है और सीमा सुरक्षा तथा बाड़ लगाने में देरी पर चिंताओं को पुनः बढ़ा दिया है।

  • भारत-म्याँमार सीमा: म्याँमार के साथ भारत की 1,643 किमी. लंबी सीमा अरुणाचल प्रदेश (520 किमी.), नगालैंड (215 किमी.), मणिपुर (398 किमी.) और मिज़ोरम (510 किमी.) से होकर गुज़रती है।
    • इस सीमा की रक्षा असम राइफल्स (भारत का सबसे पुराना अर्द्धसैनिक बल) द्वारा की जाती है, जो विशिष्ट रूप से गृह मंत्रालय (MHA) के प्रशासनिक नियंत्रण और भारतीय सेना के परिचालन नियंत्रण के तहत कार्य करता है।
  • मुक्त आवाजाही व्यवस्था (FMR): गहरे जातीय और सांस्कृतिक संबंधों के कारण भारत और म्याँमार एक FMR साझा करते हैं। 
    • दिसंबर 2024 में चार सीमावर्ती राज्यों में वीज़ा-मुक्त आवाजाही को 16 किमी. से घटाकर 10 किमी. तक सीमित करने के लिये इसे विनियमित किया गया था।
  • बाड़ लगाने में देरी: वर्ष 2024 में सुरक्षा संबंधी कैबिनेट समिति (CCS) ने भारत-म्याँमार सीमा पर बाड़ लगाने और सहायक बुनियादी ढाँचे के निर्माण के लिये ₹31,000 करोड़ की परियोजना को स्वीकृति प्रदान की।
    • हालाँकि, अनुमोदित 1,643 किमी. में से केवल 390.39 किमी. को स्वीकृति मिली है और मात्र 43.75 किमी. का कार्य पूरा हुआ है।
    • सीमावर्ती सड़कों की प्रगति भी उतनी ही चिंताजनक है; 3,194.8 किमी. स्वीकृत सड़क बुनियादी ढाँचे में से केवल 11.5 किमी. का निर्माण पूरा हो पाया है।
    • इसके अतिरिक्त बायोमेट्रिक-सक्षम प्रवेश/निकास द्वारों के माध्यम से आवाजाही को विनियमित करने के प्रयासों को कड़े स्थानीय विरोध का सामना करना पड़ा है, जिससे नियोजित 43 द्वारों की संख्या घटकर केवल 20 कार्यात्मक रह गई है।
  • सुरक्षा संबंधी चुनौतियाँ: असुरक्षित भारत-म्याँमार सीमा विद्रोहियों के लिये सुरक्षित ठिकाने, हथियारों की तस्करी, मादक पदार्थों ('गोल्डन ट्रायंगल' से निकटता), मानव तस्करी और म्याँमार के वर्ष 2021 के तख्तापलट के बाद शरणार्थियों की आमद की सुविधा प्रदान करती है, जिससे बड़ी सुरक्षा चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं।
    • भारत को उन्नत निगरानी प्रणालियों के साथ एक व्यापक एकीकृत सीमा प्रबंधन प्रणाली (CIBMS) स्थापित करनी चाहिये, एकीकृत कमान के लिये असम राइफल्स के दोहरे नियंत्रण के मुद्दे को हल करना चाहिये और सुरक्षा एवं स्थानीय संवेदनशीलता के बीच संतुलन बनाने के लिये सीमावर्ती आबादी के साथ सामुदायिक जुड़ाव सुनिश्चित करना चाहिये।

Borders_India

और पढ़ें: भारत-म्याँमार सीमा पर FMR