प्रिलिम्स फैक्ट्स (20 Jan, 2026)



रोज़गार और सामाजिक रुझान, 2026 रिपोर्ट

स्रोत: द हिंदू

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) ने रोज़गार और सामाजिक रुझान, 2026 रिपोर्ट जारी की है, जिसमें विश्व स्तर पर बेरोज़गारी दर 2025 में 4.9% बनी रहने का अनुमान लगाया गया है।

रोज़गार और सामाजिक रुझान, 2026 रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु क्या हैं?

  • रोज़गार गुणवत्ता में ठहराव: पिछले दो दशकों में सुधार की गति धीमी हुई है। वर्ष 2015-25 के बीच, अत्यधिक कार्य संबंधी गरीबी में केवल 3.1 प्रतिशत अंकों की गिरावट (7.9% या 284 मिलियन श्रमिक तक) देखी गई, जो कि पिछले दशक की 15 अंकों की गिरावट की तुलना में बहुत कम है। कम आय वाले देशों में, 2025 में 68% श्रमिक अत्यधिक या मध्यम गरीबी में जीवन यापन कर रहे थे।
    • अत्यधिक कार्य संबंधी गरीबी उस स्थिति को कहा जाता है, जिसमें कामकाजी व्यक्ति ऐसे घरों में रहते हैं जिनकी प्रति व्यक्ति आय या खपत अंतर्राष्ट्रीय अत्यधिक गरीबी सीमा (दिन के 3 अमेरिकी डॉलर से कम) से कम होती है।
  • बढ़ती अनौपचारिकता: वैश्विक अनौपचारिक रोज़गार दर वर्ष 2015–25 के बीच 0.3 प्रतिशत अंक बढ़ी है और अनुमान है कि वर्ष 2026 तक 2.1 अरब श्रमिक अनौपचारिक रूप से रोज़गार में होंगे।
  • धीमा संरचनात्मक परिवर्तन: पिछले दो दशकों में वैश्विक स्तर पर श्रमिकों का आर्थिक क्षेत्रों में स्थानांतरण आधा हो गया है। औपचारिक और उत्पादक क्षेत्रों में यह धीमी संक्रमण दर कमज़ोर रोज़गार गुणवत्ता तथा उत्पादकता वृद्धि का प्रमुख कारण है।
  • असमान बेरोज़गारी और रोज़गार वृद्धि: वर्ष 2025 में वैश्विक बेरोज़गारी दर 4.9% बनी रही (वर्ष 2026 में 186 मिलियन बेरोज़गारों का अनुमान), जबकि रोज़गार अंतर 408 मिलियन है। रोज़गार वृद्धि भी असमान है—उच्च आय वाले देशों में वर्ष 2026 में गिरावट, ऊपरी-मध्यम आय वाले देशों में धीमी वृद्धि (0.5%), जबकि निम्न आय वाले देशों में अपेक्षाकृत तेज़ वृद्धि (3.1%) दर्ज की गई है।
  • लैंगिक और युवा अंतर में निरंतरता: महिलाएँ विश्व-स्तर पर कुल रोज़गार का केवल लगभग 40 प्रतिशत (2/5 हिस्सा) ही प्रतिनिधित्व करती हैं और उनकी श्रमबल भागीदारी दर पुरुषों की तुलना में 24.2 प्रतिशत कम है। वैश्विक युवा बेरोज़गारी दर 2025 में बढ़कर 12.4% हो गई, जबकि 257 मिलियन युवा NEET (रोज़गार, शिक्षा या प्रशिक्षण में नहीं) की श्रेणी में हैं।
  • अपर्याप्त उत्पादकता और श्रम आय वृद्धि: श्रम उत्पादकता वृद्धि विशेषकर निम्न आय वाले देशों में कमज़ोर बनी हुई है। वैश्विक श्रम आय हिस्सेदारी वर्ष 2025 में 52.6% रही, जो वर्ष 2019 के स्तर से कम है, यह दर्शाता है कि वास्तविक वेतन वृद्धि उत्पादकता वृद्धि से पीछे चल रही है।
  • एआई और व्यापार से उत्पन्न उभरते जोखिम: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) को अपनाने से उच्च-कुशल प्रारंभिक स्तर की नौकरियों में कार्यरत या प्रवेश करने वाले शिक्षित युवाओं के लिये जोखिम बढ़ रहा है। वहीं व्यापार नीतियों में अनिश्चितता वास्तविक वेतन और रोज़गार सृजन हेतु खतरा उत्पन्न कर रही है, विशेष रूप से दक्षिण-पूर्वी एशिया और यूरोप जैसे क्षेत्रों में।
  • व्यापार के लाभों में असमानता: वर्ष 2024 में जहाँ 46.5 करोड़ नौकरियाँ विदेशी मांग पर निर्भर थीं, वहीं निम्न आय वाले देश व्यापार और निवेश के प्रवाह से काफी हद तक वंचित रहे, जिससे उन्हें उच्च गुणवत्ता तथा व्यापार-संबद्ध रोज़गार के अवसर सीमित रूप से ही मिल पाए।

भारत से संबंधित निष्कर्ष क्या हैं?

  • आर्थिक वृद्धि: एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भारत के सर्वाधिक तीव्र वृद्धि दर वाली अर्थव्यवस्थाओं में शामिल रहने की संभावना है तथा दक्षिण एशिया में उच्च GDP वृद्धि को बनाए रखने की अपेक्षा है।
  • विनिर्माण में हिस्सेदारी: वैश्विक विनिर्माण में भारत की हिस्सेदारी (वर्तमान अमेरिकी डॉलर के आधार पर) लगभग 3% बताई गई है, जो चीन (27%) और संयुक्त राज्य अमेरिका (17%) की तुलना में काफी कम है।
  • नवीकरणीय ऊर्जा रणनीति एवं रोज़गार: भारत ने बड़े पैमाने पर नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का विकास किया है। जापान और कोरिया गणराज्य के साथ-साथ भारत को नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में रोज़गार सृजन बढ़ाने की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति करता हुआ माना गया है।
  • ग्रीन टैलेंट गैप: भारत तथा व्यापक एशिया-प्रशांत क्षेत्र में हरित कौशल (ग्रीन टैलेंट) की मांग, उपलब्ध आपूर्ति की तुलना में कहीं अधिक तेज़ी से बढ़ रही है।

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO)

  • परिचय: अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) संयुक्त राष्ट्र की एक विशेषीकृत एजेंसी है, जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त मानव एवं श्रम अधिकारों को बढ़ावा देकर सामाजिक और आर्थिक न्याय की स्थापना के लिये कार्य करती है।
  • स्थापना एवं दायित्व: अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की स्थापना वर्ष 1919 में प्रथम विश्वयुद्ध के बाद वर्साय की संधि के अंतर्गत की गई थी। यह 1946 में संयुक्त राष्ट्र की पहली विशेषीकृत एजेंसी बना तथा 1969 में इसे नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
  • उद्देश्य: मूल मानवाधिकार और श्रम अधिकारों को बढ़ावा देने, बेहतर कार्य परिस्थितियों को सुनिश्चित करने तथा रोज़गार के अवसर सृजित करने हेतु अंतर्राष्ट्रीय नीतियों का निर्माण।
  • विशिष्ट त्रिपक्षीय संरचना: ILO एक विशिष्ट त्रिपक्षीय ढाँचा प्रदान करता है, जिसमें 187 सदस्य राज्यों की सरकारों, नियोक्ता संगठनों और श्रमिक संगठनों (व्यापार संघों) के प्रतिनिधि एकत्र होते हैं, ताकि नीतियाँ सभी सामाजिक भागीदारों के दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित कर सकें।
  • प्रमुख शासन निकाय:
    • अंतर्राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन: वार्षिक सर्वोच्च निर्णय-निर्धारण संस्था।
    • शासनिक निकाय: कार्यकारी परिषद जो नीतियाँ और बजट तय करती है।
    • अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय: जेनेवा में स्थायी सचिवालय, जिसका नेतृत्व निदेशक-जनरल करते हैं।
  • मुख्य रिपोर्ट: रोज़गार और सामाजिक रुझान, विश्व रोज़गार और सामाजिक आउटलुक, वैश्विक वेतन रिपोर्ट, विश्व सामाजिक सुरक्षा रिपोर्ट और सोशल डायलॉग रिपोर्ट।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1.  ILO के अनुसार 2025 के लिये वैश्विक बेरोज़गारी दर क्या है?
ILO की रोज़गार और सामाजिक रुझान 2026, रिपोर्ट के अनुसार 2025 में वैश्विक बेरोज़गारी दर 4.9% अनुमानित है।

2. रिपोर्ट के अनुसार भविष्य के रोज़गार के लिये मुख्य जोखिम क्या हैं?
मुख्य उभरते जोखिम हैं कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का अपनाना, जिससे युवाओं के उच्च-कुशल प्रारंभिक रोज़गार संबंधी समस्याएँ उत्पन्न करता है तथा व्यापार नीति में अनिश्चितता, जो वास्तविक वेतन एवं रोज़गार सृजन को प्रभावित करती है।

3. रिपोर्ट के निष्कर्षों में भारत का प्रदर्शन कैसा है?
भारत एक उच्च-वृद्धि अर्थव्यवस्था है, लेकिन वैश्विक विनिर्माण में इसकी हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम (3%) है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न 

प्रश्न. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के 138 एवं 182 अभिसमय किससे संबंधित हैं? (2018)

(a) बाल श्रम

(b)  कृषि के तरीकों का वैश्विक जलवायु परिवर्तन से अनुकूलन

(c) खाद्य कीमतों एवं खाद्य सुरक्षा का विनियमन

(d) कार्यस्थल पर लिंग समानता

उत्तर: (a)


प्रश्न. प्रच्छन्न बेरोज़गारी का सामान्यतः अर्थ है कि:  (2013)

(a) लोग बड़ी संख्या में बेरोज़गार रहते हैं

(b) वैकल्पिक रोज़गार उपलब्ध नहीं है

(c) श्रमिक की सीमांत उत्पादकता शून्य है

(d) श्रमिकों की उत्पादकता नीची है

उत्तर: (c)


चिप्स टू स्टार्ट-अप (C2S) प्रोग्राम

स्रोत: पीआईबी 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में सरकार ने चिप्स टू स्टार्ट-अप (C2S) प्रोग्राम के प्रदर्शन परिणाम जारी किये हैं, जिनमें उच्च नामांकन, साझा वेफर रन, छात्र-निर्मित चिप्स और पेटेंट निर्माण को उजागर किया गया है।

चिप्स टू स्टार्ट-अप (C2S) प्रोग्राम क्या है?

  • परिचय: C2S प्रोग्राम इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) द्वारा वर्ष 2022 में शुरू की गई एक व्यापक क्षमता-विकास पहल है। यह भारत भर के शैक्षणिक संस्थानों को कवर करती है और इसका कुल बजट पाँच वर्षों में ₹250 करोड़ निर्धारित किया गया है।
  • लक्ष्य: C2S प्रोग्राम का उद्देश्य स्नातक, स्नातकोत्तर और डॉक्टरेट स्तर के 85,000 उद्योग-तैयार पेशेवरों का विकास करना है।
  • विस्तार: कौशल विकास के अतिरिक्त, यह कार्यक्रम 25 स्टार्ट-अप्स को इनक्यूबेट करने, 10 तकनीकी हस्तांतरण को सक्षम करने, SMART लैब सुविधाओं तक पहुँच प्रदान करने, एक लाख छात्रों को प्रशिक्षित करने, 50 पेटेंट उत्पन्न करने और कम-से-कम 2,000 लक्षित शोध प्रकाशनों का समर्थन करने का प्रयास करता है।
  • प्रभाव: इस समग्र दृष्टिकोण के माध्यम से यह कार्यक्रम नवाचार को प्रोत्साहित करता है, रोज़गार योग्यताओं को बढ़ाता है, भारत के सेमीकंडक्टर मूल्य शृंखला में शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका को सुदृढ़ करता है और सेमीकंडक्टर क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता के लिये दृढ़ आधार तैयार करता है।
  • प्रोग्राम एप्रोच: C2S प्रोग्राम एक कॉम्प्रिहेंसिव, हैंड्स-ऑन मॉडल को फॉलो करता है, जो एकेडमिक इंस्ट्रक्शन को उद्योग-आधारित ट्रेनिंग, मेंटरशिप और कई वर्षों के R&D प्रोजेक्ट्स के साथ इंटीग्रेट करता है।
    • एक समन्वित संस्थागत पारिस्थितिक तंत्र के माध्यम से, जिसमें शैक्षणिक संस्थान, C-DAC बंगलूरू में चिप-इन सेंटर और NIELIT SMART लैब शामिल हैं, यह कार्यक्रम साझा बुनियादी ढाँचा, केंद्रीकृत प्रशिक्षण और चिप डिज़ाइन, निर्माण और परीक्षण के लिये उन्नत EDA उपकरणों और वास्तविक दुनिया के सेमीकंडक्टर वर्कफ्लो का उपयोग करते हुए एंड-टू-एंड संपर्क प्रदान करता है, जिसमें ASIC, SoC और IP कोर डेवलपमेंट शामिल है।
  • निर्माण: C2S कार्यक्रम के तहत केंद्र प्रतिभागी संस्थानों से प्रत्येक तिमाही में छात्रों द्वारा डिज़ाइन किये गए चिप्स को एकत्र करता है, डिज़ाइन अनुपालन की जाँच करता है, और अनुमोदित लेआउट्स को साझा वेफर्स पर संकलित करता है। इन वेफर्स को सेमीकंडक्टर लैब (SCL), मोहाली में 180 nm तकनीक का उपयोग कर निर्मित किया जाता है, जिसके बाद चिप्स की पैकेजिंग कर छात्रों को वितरित किया जाता है।
  • सहायता: चिप-इन सेंटर भाग लेने वाले संस्थानों को केंद्रीकृत तकनीकी सहायता की सुविधा भी प्रदान करता है, 4,855 से अधिक सहायता अनुरोधों का समाधान करता है और निरंतर डिज़ाइन सुधार और सेमीकंडक्टर निर्माण एवं परीक्षण के लिये बड़े पैमाने पर प्रयोगात्मक अनुभव को सक्षम बनाता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. चिप्स टू स्टार्ट-अप (C2S) कार्यक्रम क्या है?
C2S कार्यक्रम भारतीय शिक्षा मंत्रालय (MeitY) की एक पहल है जिसे वर्ष 2022 में भारतीय शैक्षणिक संस्थानों और स्टार्ट-अप्स में सेमीकंडक्टर डिज़ाइन क्षमता विकसित करने के लिये शुरू किया गया था।

2. C2S के मुख्य उद्देश्य क्या हैं?
इस कार्यक्रम का उद्देश्य कुशल सेमीकंडक्टर पेशेवरों को प्रशिक्षित करना, स्टार्टअप और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को समर्थन देना और चिप डिज़ाइन में पेटेंट और अनुसंधान को बढ़ावा देना है।

3. चिपइन सेंटर क्या है?
C-DAC बंगलूरू में स्थित चिप-इन सेंटर एक राष्ट्रीय साझा डिज़ाइन सुविधा है जो उपकरण, IP लाइब्रेरी, मेंटरिंग और फैब्रिकेशन एग्रीगेशन प्रदान करती है ।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न

प्रिलिम्स: 

प्रश्न. निम्नलिखित में से किस प्रकार के लेज़र का उपयोग लेज़र प्रिंटर में किया जाता है? (2008) 

(a) डाई लेज़र

(b) गैस लेज़र

(c) सेमीकंडक्टर लेज़र

(d) एक्साइमर लेज़र

उत्तर: (c) 


प्रश्न. भारत में सौर ऊर्जा उत्पादन के संदर्भ में, नीचे दिये गए कथनों पर विचार कीजिये: (2018)

  1. भारत प्रकाश-वोल्टीय इकाइयों में प्रयोग में आने वाले सिलिकॉन वेफर्स का दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है।
  2. सौर ऊर्जा शुल्क का निर्धारण भारतीय सौर ऊर्जा निगम के द्वारा किया जाता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं ?

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1, न ही 2

उत्तर: (d)


BBNJ समझौता लागू

स्रोत: यूनाइटेड नेशन

बायोडायवर्सिटी बियॉन्ड नेशनल ज्यूरिस्डिक्शन (BBNJ) समझौता, अंतर्राष्ट्रीय जल में समुद्री जैव विविधता की रक्षा के लिये विश्व का पहला विधिक रूप से बाध्यकारी समझौता, 17 जनवरी, 2026 को लागू हुआ और समावेशी समुद्री शासन सुनिश्चित करने वाला पहला समुद्री समझौता है, जिसमें स्वदेशी लोगों और स्थानीय समुदायों एवं लैंगिक संतुलन के प्रावधान हैं।

  • BBNJ समझौता: बायोडायवर्सिटी बियॉन्ड नेशनल ज्यूरिस्डिक्शन एग्रीमेंट (BBNJ समझौता), संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून अभिसमय (UNCLOS), 1982 के तहत अपनाया गया।
    • यह हाई सी और अंतर्राष्ट्रीय समुद्र तल पर लागू होता है अर्थात् राष्ट्रीय अनन्य आर्थिक क्षेत्रों (EEZ) से परे और किसी एक देश के नियंत्रण से बाहर स्थित समुद्री क्षेत्र।
    • समझौता एक वित्तपोषण तंत्र की स्थापना भी करता है और महत्त्वपूर्ण संस्थागत संरचनाओं का निर्माण करता है, जिसमें पक्षकारों का सम्मेलन (COP), सहायक निकाय, क्लियरिंग-हाउस मेकैनिज्म और एक सचिवालय शामिल हैं।
  • अंगीकरण और कानूनी स्थिति: इस समझौते को वर्ष 2023 में संयुक्त राष्ट्र के न्यूयॉर्क स्थित मुख्यालय में अंगीकार किया गया था। कम-से-कम 60 देशों द्वारा अनुमोदन के 120 दिन बाद इसके प्रभावी होने का प्रावधान था, इसकी आवश्यक सीमा पूर्ण हो चुकी है। अब तक 80 से अधिक देशों ने इस समझौते का अनुमोदन किया है।
    • चीन, जर्मनी, जापान, फ्राँस और ब्राज़ील जैसी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं ने इस समझौते का अनुसमर्थन किया है। हालाँकि अमेरिका के समान भारत ने भी वर्ष 2024 में इस समझौते पर हस्ताक्षर कर दिये हैं, तथापि इसकी घरेलू अनुसमर्थन प्रक्रिया अभी लंबित है।
  • BBNJ समझौते के चार स्तंभ: 
    • समुद्री आनुवंशिक संसाधन (MGR): इसमें लाभों का न्यायसंगत और समान वितरण शामिल है।
    • क्षेत्र-आधारित प्रबंधन उपकरण (ABMT): जैसे समुद्री संरक्षित क्षेत्र (MPA)
    • पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA): हाई सी में गतिविधियों के लिये पर्यावरणीय प्रभाव का मूल्यांकन
    • क्षमता निर्माण और समुद्री प्रौद्योगिकी का स्थानांतरण: विकासशील देशों को समुद्री प्रौद्योगिकी में प्रशिक्षण और संसाधन हस्तांतरण।
  • महत्त्व: BBNJ समझौता लंबे समय से चले आ रहे समुद्री शासन की कमी को पूरा करता है, जो महासागर की सतह के दो-तिहाई से अधिक हिस्से पर कानूनी रूप से बाध्यकारी नियम लागू करता है। यह पृथ्वी के जीवित स्थान का 90% से अधिक कवरेज प्रदान करता है और UNCLOS (जिसे महासागरों का संविधान भी कहा जाता है) के तहत वैश्विक महासागर संरक्षण को मज़बूत बनाता है।
    • यह समझौता SDG-14 (जलीय जीवों की सुरक्षा) को समर्थन देता है और जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता ह्रास तथा प्रदूषण की त्रि-ग्रहीय संकट से निपटने में योगदान करता है, क्योंकि यह पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील अंतर्राष्ट्रीय जल क्षेत्रों में मानव गतिविधियों को विनियमित करता है।
    • BBNJ समझौता UNCLOS के तहत तीसरा कार्यान्वयन समझौता है। इससे पहले के दो समझौते हैं: अंतर्राष्ट्रीय समुद्री तल खनन पर 1994 का 'भाग XI कार्यान्वयन समझौता' और ‘फैले हुए तथा अत्यधिक प्रवासी मछली स्टॉक पर 1995 का 'संयुक्त राष्ट्र मछली स्टॉक समझौता'।

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और पढ़ें: हाई सीज़ ट्रीटी


गाज़ा के लिये शांति बोर्ड

स्रोत: द हिंदू

भारत को गाज़ा के लिये शांति बोर्ड (Board of Peace for Gaza) में शामिल होने के लिये संयुक्त राज्य अमेरिका की ओर से आमंत्रण प्राप्त हुआ है, लेकिन भारत ने अभी तक इसमें भागीदारी पर अपना अंतिम निर्णय नहीं दिया है।

गाज़ा के लिये शांति बोर्ड

  • परिचय: यह संयुक्त राज्य अमेरिका के नेतृत्व वाला एक अंतर-सरकारी निकाय है, जिसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के प्रस्ताव 2803 (2025) के तहत स्थापित किया गया है, ताकि गाज़ा के पुनर्निर्माण के लिये अमेरिकी शांति योजना को लागू किया जा सके।
    • यह पहल संयुक्त राष्ट्र के नियंत्रण में नहीं है, लेकिन यह “गाज़ा संघर्ष समाप्त करने की समग्र योजना” का समर्थन करती है। इसे UNSC की मंज़ूरी प्राप्त है, जिससे इसे अंतर्राष्ट्रीय वैधता मिलती है।
  • नेतृत्व और संरचना: इसे संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड जे. ट्रंप की अध्यक्षता में प्रस्तावित किया गया है।
    • संस्थापक कार्यकारी बोर्ड: इसमें कूटनीति, विकास तथा अर्थव्यवस्था के विशेषज्ञ सदस्य शामिल हैं, जिनमें पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर, अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो और अन्य शामिल हैं।
    • गाज़ा कार्यकारी बोर्ड: यह एक सहायक संचालनात्मक निकाय है, जो स्थानीय स्तर पर गतिविधियों का समन्वय करता है।
    • गाज़ा के लिये उच्च प्रतिनिधि: बुल्गारियाई कूटनीतिज्ञ निकोलाय म्लादेनोव स्थानीय स्तर पर मुख्य संपर्क अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं।
    • गाज़ा प्रशासन के लिये राष्ट्रीय समिति (NCAG): यह 15-सदस्यीय समिति है, जिसमें राजनीतिक रूप से स्वतंत्र फिलिस्तीनी तकनीशियन शामिल हैं। इसकी अध्यक्षता अली शाथ (पूर्व फिलिस्तीनी प्राधिकरण के उप-मंत्री) करते हैं और यह दैनिक नागरिक प्रशासन के लिये ज़िम्मेदार है।
  • मुख्य कार्य: गाज़ा के विसैन्यीकरण, पुनर्निर्माण, आर्थिक सुधार और अंतरिम शासन के लिये रणनीतिक निगरानी तथा संसाधनों की सक्रियता सुनिश्चित करना, जब तक कि एक स्थिर प्रशासन स्थापित नहीं हो जाता। इसकी प्रारंभिक अनुमति 31 दिसंबर, 2027 तक है।
  • सदस्यता और वित्तपोषण तंत्र: कई देशों को आमंत्रण भेजा गया है, जिनमें ग्रीस, पाकिस्तान तथा भारत शामिल हैं। एक विशिष्ट वित्तीय मॉडल के तहत बिना योगदान वाले तीन वर्ष की सदस्यता (नवीनीकरण योग्य) संभव है, जबकि 1 बिलियन अमेरिकी डॉलर का भुगतान स्थायी सदस्यता प्रदान करता है एवं यह निधि गाज़ा के पुनर्निर्माण के लिये आवंटित की जाती है।

और पढ़ें: गाज़ा संघर्ष को समाप्त करने के लिये अमेरिका की व्यापक योजना


पोलर सिल्क रोड

स्रोत: डीसी

ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका की हालिया टिप्पणियों ने आर्कटिक क्षेत्र में चीन की महत्त्वाकांक्षाओं पर चर्चा को पुनरुज्जीवित कर दिया है; हालाँकि, विशेषज्ञ आकलनों के अनुसार इस क्षेत्र में चीन की प्रत्यक्ष सैन्य उपस्थिति अभी भी सीमित बनी हुई है।

पोलर सिल्क रोड पहल

  • परिचय: यह चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) का आर्कटिक क्षेत्र में विस्तार है, जिसका उद्देश्य आर्कटिक में उभरते समुद्री मार्गों का विकास करना, प्राकृतिक संसाधनों तक पहुँच सुनिश्चित करना तथा जलवायु परिवर्तन के कारण पिघलती आर्कटिक बर्फ का लाभ प्राप्त करते हुए अपने भू-राजनीतिक प्रभाव को सुदृढ़ करना है।
    • बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) एक वैश्विक अवसंरचना और कनेक्टिविटी कार्यक्रम है जिसे चीन ने वर्ष 2013 में शुरू किया था, जिसका उद्देश्य एशिया, यूरोप और अफ्रीका में व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने के लिये सड़कों, रेलवे, बंदरगाहों, ऊर्जा पाइपलाइनों और डिजिटल लिंक का निर्माण करना है।
  • उद्भव एवं उद्देश्य: इसे वर्ष 2017 में चीन और रूस द्वारा संयुक्त रूप से घोषित किया गया था। चीन की 2018 की आर्कटिक नीति में चीन को एक ‘निकट-आर्कटिक राज्य’ (near-Arctic state) के रूप में परिभाषित किया गया तथा आर्कटिक क्षेत्र में नौवहन, संसाधनों और वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्र में सहयोग को प्रोत्साहन प्रदान करने पर बल दिया गया।
    • चीन का वर्ष 2030 तक स्वयं को एक ‘ध्रुवीय महाशक्ति’ (Polar Great Power) के रूप में स्थापित करने का लक्ष्य है, जो आर्कटिक क्षेत्र के बढ़ते रणनीतिक और आर्थिक महत्त्व को दर्शाता है।
  • मार्ग: PSR मुख्य रूप से रूस के आर्कटिक तट के साथ उत्तरी समुद्री मार्ग पर केंद्रित है, जो एशिया-यूरोप की दूरी को काफी कम (लगभग 40%) करता है, जबकि उत्तर-पश्चिम मार्ग (कनाडा के तट के साथ) एक वैकल्पिक विकल्प के रूप में है।    
  • रणनीतिक औचित्य (Strategic Rationale): चीन का उद्देश्य ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करना, स्वेज़ नहर जैसे पारंपरिक सामरिक अवरोध बिंदुओं (चोकपॉइंट) पर निर्भरता कम करना, विशेष रूप से रूस के साथ साझेदारियों के माध्यम से अपने भू-राजनीतिक प्रभाव का विस्तार करना है।

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और पढ़ें: भारत और आर्कटिक क्षेत्र की बदलती गतिशीलता


भारत-जर्मनी आशय की संयुक्त घोषणा (JDI)

स्रोत: पीआईबी 

हाल ही में जर्मनी की चांसलर के भारत दौरे के दौरान, भारत और जर्मनी ने दूरसंचार सहयोग पर संयुक्त आशय घोषणा-पत्र (JDI) पर हस्ताक्षर किये, जिससे डिजिटल प्रौद्योगिकी और IT क्षेत्रों में सहयोग को मज़बूत किया गया।

दूरसंचार पर संयुक्त घोषणा

  • यह दूरसंचार और सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकियों (ICTs) में दोतरफा सहयोग के लिये एक संरचित ढाँचा स्थापित करता है।
  • इस घोषणा में उभरती और भविष्य की डिजिटल प्रौद्योगिकियों में सहयोग, नीति और नियामक ढाँचों पर सर्वोत्तम प्रथाओं का आदान-प्रदान, निर्माण तथा व्यापार सुगमता को बढ़ावा तथा सरकार, उद्योग, अकादमिक और अनुसंधान संस्थानों की भागीदारी के माध्यम से नवाचार को प्रोत्साहित करने पर ज़ोर दिया गया है।
  • प्रभावी और परिणाम-केंद्रित सहयोग सुनिश्चित करने के लिये इस घोषणा में नियमित परामर्श, वार्षिक उच्च-स्तरीय बैठकें और समर्पित कार्य समूहों का निर्माण शामिल है, जिसे साझा प्राथमिकताओं को समन्वित करने हेतु संयुक्त कार्ययोजना के विकास द्वारा समर्थन प्रदान किया जाएगा।
  • इंडो-जर्मन डिजिटल डायलॉग कार्ययोजना (2026–27) को अंतिम रूप दिया जा चुका है, जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), डेटा शासन, दूरसंचार और उद्योग 4.0 में सहयोग को शामिल करती है।
  • दोनों पक्षों ने यह भी सहमति व्यक्त की है कि वे संबंधित अंतर्राष्ट्रीय मंचों में समन्वय करेंगे ताकि दूरसंचार शासन और डिजिटल विकास पर साझा समझ तथा दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया जा सके एवं इस प्रकार बहुपक्षीय सहयोग को मज़बूत किया जा सके।

और पढ़ें: भारत-जर्मनी संबंध


फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान

स्रोत: द हिंदू

उत्तराखंड ने फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान (UNESCO विश्व धरोहर स्थल) की वनाग्नि को बुझाने के लिये भारतीय वायु सेना (IAF) से सहायता मांगी है।

फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान

  • परिचय: यह पश्चिमी हिमालय, चमोली, उत्तराखंड में स्थित है। यह एक राष्ट्रीय उद्यान (1982 में घोषित) है और UNESCO विश्व धरोहर स्थल (वर्ष 2005 में शामिल किया गया) है। यह नंदा देवी बायोस्फीयर रिज़र्व के दो मुख्य क्षेत्रों में से एक है। इसमें पुष्पावती नदी बहती है।
  • खोज और मान्यता: इसे 1931 में ब्रिटिश पर्वतारोही फ्रैंक एस. स्माइथ ने खोजा और विश्व स्तर पर प्रस्तुत किया। इसकी प्रसिद्धि और बढ़ी जब उन्होंने 1938 में अपनी पुस्तक फूलों की घाटी  में इसका विस्तृत विवरण दिया।
  • पारिस्थितिक विशेषता: यह 3000 से 5000 मीटर ऊँचाई वाले पश्चिमी हिमालय में स्थित एक अप्रयुक्त अल्पाइन पारिस्थितिक तंत्र प्रस्तुत करता है, जिसे प्राकृतिक ग्लेशियल बाधाओं द्वारा संरक्षित किया गया है। यह ज़ंस्कार और महान हिमालयी शृंखलाओं के बीच एक संक्रमण क्षेत्र में स्थित है। यह अपने अल्पाइन चरागाहों, दुर्लभ वनस्पति और विविध जीव-जंतुओं के लिये प्रसिद्ध है।
  • जैव विविधता:
    • वनस्पति (Flora): यह 500 से अधिक स्थानीय और अल्पाइन फूलों की प्रजातियों के लिये प्रसिद्ध है। प्रमुख प्रजातियों में ब्रह्म कमल (उत्तराखंड का राज्य फूल), नीला हिमालयी पोपी, और कई औषधीय पौधे शामिल हैं।
    • जीव-जंतु: इसमें दुर्लभ और संकटग्रस्त जीव-जंतु पाए जाते हैं, जैसे– हिम तेंदुआ, एशियाई काला भालू, कस्तूरी मृग, ब्राउन बियर और हिमालयन मोनाल पक्षी
  • सांस्कृतिक महत्त्व: यह भोटिया जनजाति से संबंधित है। वे ऋतुप्रवास (Transhumance) का अभ्यास करते हैं, जो उच्च ऊँचाई वाले ग्रीष्मकालीन चरागाहों (जिन्हें स्थानीय स्तर पर 'बुग्याल' कहा जाता है) और कम ऊँचाई वाली सर्दियों की बस्तियों के बीच मौसमी प्रवास का एक रूप है

Valley_of_Flowers_National Park

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