NPS सुधारों के लिये MS साहू समिति
पेंशन फंड नियामक और विकास प्राधिकरण (PFRDA) ने राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) के तहत सुनिश्चित भुगतान के लिये एक नियामक ढाँचा तैयार करने हेतु उच्च स्तरीय समिति का गठन किया है, जिसका उद्देश्य सेवानिवृत्ति के बाद आय की निश्चितता सुनिश्चित करना है।
- एक अलग विकास में PFRDA ने NPS वत्सल्य योजना 2025 दिशा-निर्देश जारी किये हैं, जो NPS वत्सल्य के संबंध में व्यापक जानकारी प्रदान करते हैं।
NPS पर नवगठित समिति के प्रमुख तथ्य क्या हैं?
- परिचय: यह 15-सदस्यीय पैनल है, जिसका नेतृत्व एम. एस. साहू, भारत के भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (IBBI) के पूर्व अध्यक्ष, कर रहे हैं। इसे संरचित पेंशन भुगतान पर स्थायी सलाहकार समिति के रूप में गठित किया गया है और यह परामर्श के लिये बाहरी विशेषज्ञों को आमंत्रित कर सकती है।
- उद्देश्य: मुख्य उद्देश्य NPS के तहत कानूनी रूप से लागू होने वाली, बाज़ार-आधारित गारंटी के लिये दिशा-निर्देश तैयार करना है।
- इसमें मुख्य पैरामीटरों को परिभाषित करना शामिल है, जैसे लॉक-इन अवधि और मूल्य निर्धारण, पूंजी आवश्यकताओं के साथ जोखिम प्रबंधन मानदंड स्थापित करना एवं सिस्टम में होने वाले भुगतान पर कर के प्रभावों की जाँच करना।
- महत्त्व: यह तंत्र 'एग्जिट फ्लेक्सिबिलिटी' के बजाय 'रिटायरमेंट इनकम सर्टेंटी' (सेवानिवृत्ति आय की निश्चितता) की ओर एक बड़ा बदलाव है, जो भारत की पेंशन प्रणाली में एक महत्त्वपूर्ण कमी को दूर करता है। इसका उद्देश्य दीर्घकालिक अवधि की बचत में विश्वास बढ़ाना और वित्तीय सुरक्षा को मज़बूत करना है, जिससे वृद्धावस्था में वित्तीय स्वतंत्रता की “विकसित भारत 2047” की दृष्टि साकार हो सके।
नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS)
- परिचय: 1 जनवरी, 2004 को लागू की गई नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) एक बाज़ार-आधारित, योगदान आधारित पेंशन योजना है, जिसे व्यक्तियों को सेवानिवृत्ति के समय नियमित आय प्रदान करने के उद्देश्य से डिज़ाइन किया गया है। यह योजना पूर्ववर्ती पेंशन प्रणाली (OPS) की जगह लेती है।
- NPS का संचालन: नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) को PFRDA द्वारा PFRDA अधिनियम, 2013 के अंतर्गत प्रबंधित किया जाता है। यह योजना कर्मचारी और सरकार द्वारा संयुक्त रूप से वित्तपोषित होती है। कर्मचारी अपनी मूल वेतन और डियरनेस अलाउंस (DA) का 10% योगदान करते हैं, जिसे सरकार 14% की समान योगदान राशि से मिलाती है।
- अभिदाता (सब्सक्राइबर) अपनी अंशदान राशि के निवेश के लिये विभिन्न योजनाओं, पेंशन फंड प्रबंधकों तथा निजी कंपनियों में से चयन कर सकते हैं। OPS के विपरीत, NPS में सुनिश्चित पेंशन की गारंटी नहीं होती है।
- NPS की आवश्यकता: पूर्ववर्ती OPS एक अनिधारित (Unfunded) प्रणाली थी, जिसमें कोई समर्पित कोष (Dedicated Corpus) नहीं था। इसके परिणामस्वरूप सरकार की पेंशन देनदारियाँ वर्ष 1990-91 में ₹3,272 करोड़ से बढ़कर वर्ष 2020-21 में ₹1.9 लाख करोड़ से अधिक हो गईं, जिससे राजकोष पर अस्थिर एवं असहनीय वित्तीय बोझ उत्पन्न हुआ।
- UPS की ओर संक्रमण: OPS की तुलना में कम सुनिश्चित प्रतिफल तथा कर्मचारियों के अंशदान की अनिवार्यता के कारण उत्पन्न विरोध को देखते हुए सरकार ने वर्ष 2023 में सोमनाथन समिति का गठन किया। समिति की अनुशंसाओं के आधार पर नई एकीकृत पेंशन योजना (Unified Pension Scheme- UPS) लाई गई है, जिसका उद्देश्य सेवानिवृत्ति के पश्चात आय की अधिक सुनिश्चितता पर केंद्रित होना है।
NPS वात्सल्य क्या है?
- परिचय: NPS वात्सल्य राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) के अंतर्गत विशेष रूप से नाबालिगों की वित्तीय सुरक्षा हेतु तैयार की गई एक समर्पित, दीर्घकालिक अंशदायी बचत योजना है। इसका उद्देश्य कम आयु से ही बचत की संस्कृति एवं वित्तीय साक्षरता को प्रोत्साहित करना है, ताकि भविष्य के लिये एक सुदृढ़ वित्तीय आधार तैयार किया जा सके।
- पात्रता एवं परिचालन विशेषताएँ: यह योजना 18 वर्ष से कम आयु के सभी भारतीय नागरिकों के लिये, जिनमें NRI/OCI भी शामिल हैं, उपलब्ध है। इसमें नाबालिग ही एकमात्र लाभार्थी होता है।
- यह अकाउंट नाबालिग के नाम पर खोला जाता है, लेकिन इसे माता-पिता/कानूनी अभिभावक ऑपरेट करते हैं।
- न्यूनतम प्रारंभिक तथा वार्षिक अंशदान ₹250 निर्धारित है, जबकि अधिकतम अंशदान की कोई सीमा नहीं है; अंशदान उपहार के रूप में भी किया जा सकता है।
- निकासी संबंधी प्रावधान: इसके अंतर्गत तीन वर्ष पूरे होने के बाद शिक्षा और चिकित्सा जैसे निर्धारित उद्देश्यों के लिये आंशिक निकासी की अनुमति दी जाती है, जो नाबालिग द्वारा किये गए स्वयं के अंशदान के अधिकतम 25% तक सीमित होती है।
- बालिग होने पर परिवर्तन: 18 से 21 वर्ष की आयु के बीच, अभिदाता NPS वात्सल्य जारी रख सकता है, NPS टियर-I में स्थानांतरण कर सकता है, या योजना से बाहर निकलने का विकल्प चुन सकता है।
- निकासी संबंधी नियम यह निर्धारित करते हैं कि मूल/आधारभूत निधि का न्यूनतम 20% वार्षिकी खरीदने के लिये उपयोग किया जाए और यदि कुल मूल/आधारभूत निधि 8 लाख रुपये या उससे कम है तो पूर्ण निकासी की अनुमति है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. MS साहू समिति का उद्देश्य क्या है?
इस समिति को सेवानिवृत्ति के बाद आय की निश्चितता बढ़ाने के लिये NPS के तहत विधिक रूप से लागू करने योग्य, बाज़ार-आधारित गारंटित भुगतान के लिये दिशा-निर्देश तैयार करने का कार्य सौंपा गया है।
2. NPS, ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS) से किस प्रकार भिन्न है?
OPS के विपरीत, NPS बाज़ार से जुड़ा हुआ है, अंशदायी है और एक सुनिश्चित पेंशन प्रदान नहीं करता है, जिसमें कर्मचारी (10%) एवं सरकार (14%) दोनों का योगदान होता है।
3. NPS वात्सल्य योजना के लिये कौन पात्र है?
18 वर्ष से कम आयु के सभी भारतीय नागरिक, जिनमें गैर-निवासी/स्थानीय भारतीय नागरिक भी शामिल हैं, जिनके लिये नाबालिग एकमात्र लाभार्थी हैं और जिसका संचालन माता-पिता या कानूनी अभिभावक द्वारा किया जाता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रश्न. निम्नलिखित में से कौन राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) में सम्मिलित हो सकता है? (2017)
(a) केवल निवासी भारतीय नागरिक
(b) केवल 21 से 55 तक की आयु के व्यक्ति
(c) राज्य सरकारों के सभी कर्मचारी, जो संबंधित राज्य सरकारों द्वारा अधिसूचना किये जाने की तारीख के पश्चात सेवा में आए हैं
(d) सशस्त्र बलों समेत केंद्र सरकार के सभी कर्मचारी, जो 1 अप्रैल, 2004 को या उसके बाद सेवाओं में आए हैं
उत्तर: (c)
प्रश्न. 'अटल पेंशन योजना' के संबंध में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (2016)
- यह एक न्यूनतम गारंटित पेंशन योजना है, जो मुख्य रूप से असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों को लक्ष्य बनाती है।
- परिवार का केवल एक ही व्यक्ति इस योजना में शामिल हो सकता है।
- अभिदाता (सब्स्क्राइबर) की मृत्यु के पश्चात जीवनसाथी को आजीवन पेंशन की समान राशि गारंटित रहती है।
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये।
(a) केवल 1
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (c)
श्रीलंका के गृहयुद्ध पर संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट
चर्चा में क्यों?
मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार) ने "वी लॉस्ट एवरीथिंग - इवेन होप फॉर जस्टिस" शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें श्रीलंका में दशकों तक चले गृहयुद्ध के दौरान तमिल नागरिकों के साथ मुख्य रूप से सुरक्षा बलों द्वारा की गई यौन हिंसा को उजागर किया गया है।
श्रीलंका में हिंसा पर UN मानवाधिकार रिपोर्ट के मुख्य बिंदु क्या हैं?
- गृहयुद्ध के दौरान हिंसा: श्रीलंका में गृहयुद्ध के दौरान यौन हिंसा का सुनियोजित रूप देखा गया, मुख्य रूप से राज्य सुरक्षा बलों द्वारा डराने-धमकाने, दंड देने और नियंत्रण बनाए रखने के साधन के रूप में।
- इस हिंसा में मुख्यतः तमिल नागरिकों को निशाना बनाया गया, जिनके बारे में यह माना जाता था कि वे लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (LTTE) के समर्थक थे या उनसे संबंध रखते थे।
- जवाबदेही और न्याय का अभाव: वर्ष 2009 में गृहयुद्ध की समाप्ति के कई वर्षों बाद भी पीड़ित लोग न्याय से वंचित हैं।
- जाँच, अभियोजन और मुआवज़े (क्षतिपूर्ति) के अभाव ने दंडहीनता को स्थायी रूप से बढ़ावा दिया है।
- पीड़ितों पर प्रभाव: पीड़ित आज भी दीर्घकालिक शारीरिक चोटों, बांझपन, मनोवैज्ञानिक आघात और आत्मघाती प्रवृत्तियों से ग्रसित हैं। निरंतर निगरानी, सामाजिक दुराग्रह और धमकियों के कारण ऐसे मामलों की रिपोर्टिंग बहुत कम हुई है।
- संयुक्त राष्ट्र की सिफारिशें: संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि संघर्ष से जुड़ी यौन हिंसा युद्ध अपराधों या मानवता के विरुद्ध अपराधों की श्रेणी में आती है।
- इस रिपोर्ट में श्रीलंका सरकार से आग्रह किया गया है कि वह अतीत के अत्याचारों को स्वीकार करे, औपचारिक रूप से माफी मांगे, पीड़ित-केंद्रित सुधार लागू करे, एक स्वतंत्र अभियोजन तंत्र स्थापित करे और पीड़ितों के लिये मनोवैज्ञानिक व सामाजिक सहायता सुनिश्चित करे।
श्रीलंकाई गृहयुद्ध (1983–2009) से संबंधित प्रमुख तथ्य क्या हैं?
- जातीय और सामाजिक पृष्ठभूमि: श्रीलंका की जनसंख्या में लगभग 75% आबादी सिंहली नागरिकों की (मुख्यतः बौद्ध) और लगभग 11% आबादी श्रीलंकाई तमिल नागरिकों (मुख्यतः हिंदू) की है। देश में भाषायी, धार्मिक और राजनीतिक विभाजन गहराई से विद्यमान हैं।
- तमिलों का ऐतिहासिक संबंध दक्षिण भारत के चोल साम्राज्य से बताया जाता है, जहाँ से वे व्यापारी के रूप में श्रीलंका पहुँचे और स्थायी रूप से वहीं बस गए।
- आरंभिक तनाव सांस्कृतिक कारणों से कम लेकिन सत्ता, प्रतिनिधित्व व राज्य पर नियंत्रण को लेकर अधिक था।
- तनाव की औपनिवेशिक जड़ें: ब्रिटिश शासन के दौरान “फूट डालो और राज करो” की नीति तथा तमिलों (विशेषकर जाफना क्षेत्र में) को अंग्रेज़ी शिक्षा और सरकारी नौकरियों में दी गई प्राथमिकता ने बहुसंख्यक सिंहली समुदाय में असंतोष उत्पन्न किया।
- इस अवधि में बौद्ध धर्म और सिंहली भाषा की स्थिति कमज़ोर हुई, जिसने स्वतंत्रता के बाद जातीय प्रतिघात की नींव रखी।
- स्वतंत्रता के बाद भेदभाव: वर्ष 1948 में स्वतंत्रता के बाद विभिन्न सरकारों ने तमिलों के अधिकारों को सीमित करने वाली नीतियाँ लागू कीं। इसमें सीलोन सिटिज़नशिप एक्ट (1948), सिंहली ओनली एक्ट (1956) और विश्वविद्यालय में प्रवेश हेतु मानकीकरण नीतियाँ शामिल थीं।
- तमिल क्षेत्रों में राज्य-प्रायोजित सिंहली उपनिवेशन ने असंतोष व शिकायतों को और अधिक बढ़ा कर दिया।
- बढ़ते सिंहली राष्ट्रवाद के कारण भारतीय मूल के तमिलों को और अधिक वंचनाओं का सामना करना पड़ा, उन्हें नागरिकता के अधिकार से वंचित कर दिया गया और राज्यविहीन कर दिया गया (ऐसी स्थिति जिसमें एक व्यक्ति को किसी भी देश द्वारा नागरिक के रूप में मान्यता नहीं दी जाती)।
- तमिल उग्रवाद का उदय: व्यवस्थित भेदभाव के परिणामस्वरूप तमिल युवाओं में कट्टरपंथ की प्रवृत्ति बढ़ी और उग्रवादी समूहों का गठन हुआ।
- लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (LTTE), जिसकी स्थापना वर्ष 1976 में वेलुपिल्लई प्रभाकरण के नेतृत्व में हुई, ने पृथक तमिल राज्य की मांग की, जबकि तमिल यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट (TULF) जैसे राजनीतिक संगठन पृथक तमिल ईलम की मांग कर रहे थे।
- गृहयुद्ध का आरंभ (1983): वर्ष 1983 के 'ब्लैक जुलाई' दंगों के बाद इस संघर्ष ने एक पूर्ण गृहयुद्ध का रूप लिया, जब सैनिकों पर लिट्टे (LTTE) के हमले के बाद तमिल विरोधी दंगे शुरू हो गए थे।
- हज़ारों तमिलों की हत्या कर दी गई, जिसके परिणामस्वरूप यह द्वीप लगभग तीन दशकों तक निरंतर सशस्त्र संघर्ष की सामना करता रहा।
- भारत की भागीदारी: सिरिमावो–शास्त्री (1964) और सिरिमावो–इंदिरा गांधी (1974) संधियों में छह लाख भारतीय मूल के तमिलों को भारतीय नागरिकता प्रदान करने का आश्वासन दिया गया था, लेकिन अपर्याप्त कार्यान्वयन तथा श्रीलंका में जारी गृहयुद्ध के कारण यह प्रक्रिया रुक गई, परिणामस्वरूप कई लोग राज्यविहीन हो गए।
- प्रारंभ में भारत ने क्षेत्रीय सुरक्षा कारणों से तमिल उग्रवादियों का समर्थन किया, लेकिन बाद में भारत-श्रीलंका समझौता, 1987 के तहत दिशा बदल दी, जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और राष्ट्रपति जे.आर. जयवर्धने ने हस्ताक्षरित किया। इसके तहत भारतीय शांति रक्षा बल (IPKF) को तैनात किया गया।
- ऑपरेशन पवन भारत का IPKF मिशन था, जिसे भारत-श्रीलंका समझौता, 1987 के तहत श्रीलंका में लागू किया गया और यह भारत का पहला प्रमुख विदेश शांति-रक्षा अभियान था।
- IPKF का उद्देश्य LTTE को निरस्त्रीकृत करना और जाफना प्रायद्वीप की सुरक्षा सुनिश्चित करना था। इसने वर्ष 1987 से 1990 तक विद्रोह-रोधी अभियान संचालित किये, जिसके परिणामस्वरुप LTTE को जाफना पर पुनः नियंत्रण स्थापित करने से रोका जा सका।
- वर्ष 1991 में LTTE के आत्मघाती हमलावर द्वारा प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या श्रीलंका में भारत के हस्तक्षेप का प्रत्यक्ष परिणाम थी।
- श्रीलंका के संविधान में 13वाँ संशोधन: इसे भारत-श्रीलंका समझौता, 1987 के बाद लागू किया गया था और इसका उद्देश्य प्रांतीय परिषदों को शक्तियाँ हस्तांतरित करके जातीय संघर्ष का समाधान करना था।
- इसने प्रांतों को शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और परिवहन जैसे विषयों पर कानून बनाने की अनुमति दी, जबकि भूमि तथा पुलिस संबंधी अधिकार केंद्र के पास बने रहे।
- हालाँकि सत्ता हस्तांतरण आंशिक ही रहा और तमिल-बहुल उत्तर और पूर्वी प्रांतों में लंबे समय तक केंद्र का शासन रहा, जिसके चलते संशोधन के उद्देश्य की पूर्ण प्रभावशीलता सीमित ही रही।
- सिंहली राष्ट्रवादियों के विरोध और प्रांतीय चुनावों में देरी ने इसके कार्यान्वयन को और कमज़ोर कर दिया है।
- संघर्ष में वृद्धि और ईलम युद्ध: भारत की वापसी के पश्चात युद्ध कई चरणों में बढ़ा, जिसमें आत्मघाती हमले, बड़े पैमाने पर हत्याएँ और सैन्य अभियान शामिल थे।
- जाफना, एलीफेंट पास (जाफना प्रायद्वीप को मुख्य भूमि से जोड़ने वाला रणनीतिक स्थल) एवं मुल्लैटीवु की प्रमुख लड़ाइयों में दोनों पक्षों का भारी नुकसान हुआ और सामान्य जनमानस को व्यापक परेशानियों का सामना करना पड़ा।
- युद्ध का समापन (2009): मई 2009 में श्रीलंकाई सेना ने LTTE को हराया और इसके नेता वेलुपिल्लई प्रभाकरण की हत्या कर दी, जिससे राज्य को निर्णायक सैन्य सफलता मिली।
- युद्धोत्तर वास्तविकता: युद्ध के समाप्त होने के बावजूद बहुत से तमिल विस्थापित हैं और मानवाधिकार उल्लंघनों, निगरानी तथा भेदभाव के आरोप बने हुए हैं, सांस्कृतिक सिंहलीकरण सामंजस्य प्रक्रिया को प्रभावित करता रहा है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. श्रीलंकाई गृहयुद्ध क्या था?
यह लगभग तीन दशकों तक चला सशस्त्र संघर्ष (1983–2009) था, जो श्रीलंका सरकार और लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (LTTE) के बीच तमिलों के लिये एक पृथक राज्य की मांग को लेकर हुआ।
2. श्रीलंकाई गृहयुद्ध के प्रमुख कारण क्या थे?
जातीय भेदभाव, सिंहली ओनली एक्ट (1956) जैसी भाषा नीतियों, शिक्षा और रोज़गार तक असमान पहुँच तथा तमिल क्षेत्रों में राज्य-प्रायोजित उपनिवेशन ने तमिलों में अलगाव की भावना और उग्रवाद को जन्म दिया।
3. लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (LTTE) क्या था?
LTTE एक तमिल पृथकतावादी उग्रवादी संगठन था, जिसकी स्थापना वर्ष 1976 में वेलुपिल्लई प्रभाकरण के नेतृत्व में हुई। इसका उद्देश्य श्रीलंका के उत्तर और पूर्वी भागों में एक स्वतंत्र तमिल ईलम की स्थापना करना था।
4. 1983 में किस घटना ने गृहयुद्ध की शुरुआत को चिह्नित किया?
ब्लैक जुलाई दंगे (1983) के बाद संघर्ष में वृद्धि हुई। इन दंगों की शुरुआत LTTE के एक हमले में 13 सैनिकों की हत्या के बाद हुई और इसके परिणामस्वरूप व्यापक तमिल-विरोधी हिंसा हुई।
5. श्रीलंकाई गृहयुद्ध में भारत की क्या भूमिका रही?
भारत ने भारत-श्रीलंका समझौते (1987) के माध्यम से हस्तक्षेप किया और ऑपरेशन पवन के तहत भारतीय शांति सेना (IPKF) तैनात की, ताकि LTTE को निरस्त्र किया जा सके और शांति बहाल हो।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2020)
- पिछले दशक में भारत-श्रीलंका व्यापार के मूल्य में सतत् वृद्धि हुई है।
- भारत और बांग्लादेश के बीच होने वाले व्यापार में ‘कपड़े और कपड़े से बनी चीज़ों’ का व्यापार प्रमुख है।
- पिछले पाँच वर्षों में, दक्षिण एशिया में भारत के व्यापार का सबसे बड़ा भागीदार नेपाल रहा है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2
(c) केवल 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (b)
प्रश्न. कभी-कभी समाचारों में देखे जाने वाले एलीफेंट पास का उल्लेख निम्नलिखित में से किसके संदर्भ में किया जाता है? (2009)
(a) बांग्लादेश
(b) भारत
(c) नेपाल
(d) श्रीलंका
उत्तर: (d)
मेन्स
प्रश्न. भारत-श्रीलंका संबंधों के संदर्भ में, विवेचना कीजिये कि किस प्रकार आंतरिक (देशीय) कारक विदेश नीति को प्रभावित करते हैं? (2013)
78वाँ सेना दिवस
भारतीय सेना ने 15 जनवरी, 2026 को राजस्थान के जयपुर में एक ऐतिहासिक परेड के साथ अपना 78वाँ सेना दिवस मनाया, जिसमें बल के आधुनिक, चुस्त और तकनीक-संचालित युद्ध क्षमता की ओर बदलाव पर बल दिया गया।
- ऐतिहासिक स्थल: यह दिल्ली के बाहर आयोजित चौथा सेना दिवस परेड था, इससे पहले बंगलूरू (2023), लखनऊ (2024) और पुणे (2025) में कार्यक्रम आयोजित किये गए थे तथा यह पहली बार था जब इसे किसी छावनी के बाहर आयोजित किया गया।
- ऐतिहासिक महत्त्व: 15 जनवरी, 1949 को फील्ड मार्शल KM करियप्पा प्रथम भारतीय कमांडर-इन-चीफ बने, जो पूर्ण सैन्य संप्रभुता का प्रतीक था, इसी दिन की स्मृति में यह दिवस मनाया जाता है।
- थीम और फोकस: वर्ष 2026 के लिये इस दिवस की थीम ‘नेटवर्किंग और डेटा केंद्रितता का वर्ष' (Year of Networking and Data Centricity) है, जिसमें सेना के डिजिटल परिवर्तन, AI-संचालित युद्ध, साइबर समुत्थानशीलता एवं एकीकृत युद्ध प्रबंधन प्रणालियों की दिशा में किये जा रहे प्रयासों पर बल दिया गया।
- रणनीतिक प्रदर्शन: परेड में भैरव बटालियन की टुकड़ियों ने अपनी पहली प्रस्तुति दी, जो त्वरित कार्रवाई के लिये आधुनिक, चुस्त और घातक युद्ध क्षमताओं की ओर रणनीतिक संक्रमण का प्रतीक हैं।
- स्वदेशी तकनीक प्रदर्शन: परेड में भारत में निर्मित विभिन्न प्रणालियों का प्रदर्शन किया गया, जिनमें T-90 और अर्जुन टैंक, K-9 वज्र, धनुष, ATAGS, ब्रह्मोस, पिनाका एवं कई प्रकार के ड्रोन (प्रबल, स्विच, बाज़) शामिल थे।
- लगभग 1.4 मिलियन सक्रिय कर्मियों के साथ, भारतीय सेना विश्व की सबसे बड़ी सेना है, जो चीन की सेना से भी बड़ी है।
- सांस्कृतिक विशेषताएँ: भारत की विविध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाते हुए परेड में राजस्थानी लोक नृत्यों जैसे- कालबेलिया और गैर, चेंदा (केरल का पारंपरिक तालवाद्य) तथा पारंपरिक मार्शल आर्ट्स जैसे कलरीपयट्टु एवं मलखंब का प्रदर्शन किया गया।
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IMD का 151वाँ स्थापना दिवस और ऑटोमेटिक वेदर स्टेशन
भारत ने शहरी मौसम पूर्वानुमान में बड़े सुधार की घोषणा की है, जिसके तहत भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के 151वें स्थापना दिवस (15 जनवरी 1875–2026) के अवसर पर दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और पुणे में 200 ऑटोमेटिक वेदर स्टेशन (AWS) स्थापित किये जाएंगे, ताकि आपदा तैयारी मज़बूत हो एवं स्थानीय स्तर पर सटीक पूर्वानुमान सुनिश्चित किया जा सके।
- ऑटोमेटिक वेदर स्टेशन (AWS): यह मौसम संबंधी स्टेशन है, जो मौसम के आँकड़ों को स्वचालित रूप से रिकॉर्ड और प्रसारित करता है।
- AWS सतही मौसम के अवलोकनों का घनत्व, विश्वसनीयता और आवृत्ति को बढ़ाता है, विशेषतः दूरस्थ या दुर्गम क्षेत्रों में।
- ये उन्नत डिजिटल सेंसर और स्वचालित रिपोर्टिंग के माध्यम से निरंतर, हाई-रिज़ॉल्यूशन डेटा प्रदान करते हैं, मानवीय त्रुटि एवं परिचालन लागत को कम करते हैं तथा नेटवर्क से परे मापन को मानकीकृत करते हैं।
- AWS कृषि, विमानन, शहरी नियोजन, सार्वजनिक सुरक्षा और आपदा प्रबंधन में सहायता करता है।
- IMD: यह मौसम विज्ञान संबंधी अवलोकनों, मौसम के पूर्वानुमान और भूकंप विज्ञान के लिये भारत की प्रमुख एजेंसी है, जो पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत कार्य करती है।
- नई दिल्ली स्थित मुख्यालय में यह विभाग कृषि, विमानन, शिपिंग और आपदा प्रबंधन के लिये महत्त्वपूर्ण पूर्वानुमान एवं मौसम संबंधी चेतावनियाँ प्रदान करता है।
- IMD की उपलब्धियाँ: पिछले एक दशक में IMD ने उल्लेखनीय तकनीकी प्रगति की है – मौसम पूर्वानुमानों की सटीकता में 40–50% की वृद्धि हुई है, चक्रवात पथ के पूर्वानुमान की परिशुद्धता 35–40% तक बढ़ी है और मौसमी पूर्वानुमान की त्रुटि लगभग 7.5% से घटकर करीब 2.5% रह गई है।
- इसका मौसम रडार नेटवर्क अब भारत के भौगोलिक क्षेत्र के लगभग 87% को कवर करता है।
- IMD ने डॉप्लर वेदर रडार, एरोसोल मॉनिटरिंग सिस्टम और अति-अल्पकालिक पूर्वानुमानों (3 घंटे तक) का विस्तार किया है, साथ ही एक मॉडल वेधशाला, 3D-प्रिंटेड AWS तथा कृषि-स्वचालित मौसम केंद्र का उद्घाटन किया है, जो स्वदेशी, लागत-प्रभावी मौसम विज्ञान प्रौद्योगिकियों को प्रदर्शित करता है।
- IMD के नेतृत्व में मिशन मौसम, उन्नत मौसम विज्ञान, जलवायु अनुकूल और सार्वजनिक कल्याण पर दीर्घकालिक दृष्टिकोण को दर्शाता है।
- भारत अब बांग्लादेश, नेपाल, भूटान और श्रीलंका को मौसम तथा आपदा संबंधी उपग्रह सहायता प्रदान करता है, जिससे दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग मज़बूत हो रहा है।
- इसका मौसम रडार नेटवर्क अब भारत के भौगोलिक क्षेत्र के लगभग 87% को कवर करता है।
जापान की गहन-समुद्री दुर्लभ मृदा खनन पहल
जापान ने लगभग 6,000 मीटर की गहराई पर गहन समुद्र (डीप सी) से दुर्लभ मृदा तत्त्वों के निष्कर्षण का विश्व का पहला प्रायोगिक प्रयास शुरू किया है। इसके लिये वह अपने गहन-समुद्री वैज्ञानिक ड्रिलिंग पोत ‘चिक्यू (Chikyu)’ का उपयोग कर रहा है।
- इस पहल का उद्देश्य जापान की चीन पर भारी निर्भरता को कम करना है, जो विश्व के लगभग दो-तिहाई दुर्लभ मृदा खनन और 90% से अधिक परिष्कृत उत्पादन के लिये ज़िम्मेदार है।
- मिनामी तोरिशिमा के बारे में: यह परीक्षण मिशन मिनामी तोरिशिमा के पास संचालित किया जा रहा है, जो प्रशांत महासागर में जापान के विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) में स्थित एक दूरस्थ द्वीप है।
- मिनामी तोरिशिमा के आस-पास क्षेत्र में 1,60,00,000 टन से अधिक दुर्लभ मृदा भंडार होने का अनुमान है, जिसमें डिस्प्रोसियम के लिये 730 वर्ष और इट्रियम के लिये 780 वर्ष पर्याप्त भंडार शामिल हैं, जो दोनों इलेक्ट्रिक वाहन, इलेक्ट्रॉनिक्स, पवन टरबाइन एवं रक्षा प्रणालियों हेतु महत्त्वपूर्ण हैं।
- गहन-समुद्री खनन (Deep Sea Mining): इसमें 200 मीटर से अधिक गहराई वाले समुद्र तल से खनिज भंडार निकालने की प्रक्रिया शामिल है, जो विश्व के समुद्र तल के लगभग दो-तिहाई क्षेत्र को कवर करता है और इसका उपयोग औद्योगिक उद्देश्यों के लिये किया जाता है।
- यह तीन तरीकों से संचालित होता है- पॉलीमेटैलिक नोड्यूल्स एकत्रित करना, समुद्र तल के सल्फाइड भंडार का खनन करना और कोबाल्ट-समृद्ध परतों को हटाना।
- पर्यावरण समूह चेतावनी देते हैं कि गहन-समुद्री खनन समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र और जैव विविधता के लिये खतरा है, जबकि अंतर्राष्ट्रीय समुद्रतल प्राधिकरण (ISA) अंतर्राष्ट्रीय जलक्षेत्रों में खनन के लिये वैश्विक नियामक ढाँचे पर काम कर रहा है।
- दुर्लभ मृदा तत्त्व (Rare Earth Elements- REE): दुर्लभ मृदा तत्त्व 17 धातुओं का समूह हैं, जिन्हें निकालना और परिष्कृत करना कठिन होता है, लेकिन ये इलेक्ट्रिक वाहन की बैटरियाँ, पवन टरबाइन, इलेक्ट्रॉनिक्स, स्मार्टफोन, कंप्यूटर और मिसाइल प्रणालियों के लिये अत्यंत आवश्यक हैं।
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मत्स्य पालन और जलीय कृषि पर भारत-इज़रायल संयुक्त मंत्रिस्तरीय घोषणा
द्वितीय वैश्विक शिखर सम्मेलन "ब्लू फूड सिक्योरिटी: सी द फ्यूचर 2026" में, भारत और इज़रायल ने मत्स्य पालन और जलीय कृषि के क्षेत्र में सहयोग को गहन करने हेतु एक संयुक्त मंत्रिस्तरीय आशय घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर किये।
- मत्स्य पालन और जलीय कृषि पर घोषणा: यह मत्स्य पालन और जलीय कृषि के क्षेत्र में द्विपक्षीय सहयोग को गहन करने के लिये एक व्यापक रूपरेखा प्रदान करती है।
- इस घोषणा-पत्र में उत्पादकता और दृढ़ता बढ़ाने के लिये रीसर्कुलेटिंग एक्वाकल्चर सिस्टम (RAS), बायोफ्लॉक, केज कल्चर, एक्वापोनिक्स, मैरीकल्चर और समुद्री शैवाल कृषि जैसी उन्नत एक्वाकल्चर प्रणालियाँ, साथ ही आनुवंशिक सुधार, ब्रूडस्टॉक विकास और रोगमुक्त बीज उत्पादन में संयुक्त अनुसंधान एवं नवाचार को प्राथमिकता दी गई है।
- इसमें सतत मत्स्य पालन, क्षमता निर्माण, व्यापार सुविधा और भारत-इज़रायल उत्कृष्टता केंद्रों के सृजन पर बल दिया गया है, जिससे दोनों देशों की ब्लू इकॉनमी एवं खाद्य सुरक्षा मज़बूत होगी।
- मत्स्य पालन और जलीय कृषि: भारत चीन के बाद विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मत्स्य उत्पादक देश है, जो वैश्विक मत्स्य उत्पादन में लगभग 8% का योगदान देता है।
- मुख्य रूप से अंतर्देशीय मत्स्यन और जलीय कृषि के कारण मत्स्य उत्पादन वर्ष 2013-14 में 95.79 लाख टन से बढ़कर वर्ष 2023-24 में 184.02 लाख टन हो गया, जो लगभग दोगुने आँकड़े को दर्शाता है।
- नीली क्रांति (वर्ष 2015-16) ने क्षेत्रीय विकास की नींव रखी, जबकि वर्ष 2020 में आरंभ हुई प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) का उद्देश्य मूल्य शृंखला में सुधार, उत्पादन में वृद्धि और मछुआरों व मत्स्य कृषकों की सामाजिक-आर्थिक कल्याण में सुधार करना है।
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