पश्चिमी हिमालय में कम हिमपात
प्रिलिम्स के लिये: हिमालय, पश्चिमी जेट स्ट्रीम, पश्चिमी विक्षोभ, भूमध्य सागर, नेशनल मिशन ऑन सस्टेनिंग हिमालयन ईकोसिस्टम
मेन्स के लिये: पश्चिमी विक्षोभ और भारतीय शीतकालीन जलवायु, हिमालयी क्रायोस्फीयर पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव, भारत में हिमपात की परिवर्तनशीलता और जल सुरक्षा
चर्चा में क्यों?
इस वर्ष पश्चिमी हिमालय के व्यापक क्षेत्र असामान्य रूप से शुष्क तथा हिमरहित शीत ऋतु का सामना कर रहे हैं। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश एवं जम्मू-कश्मीर में दिसंबर–जनवरी अवधि के दौरान वर्षा में गंभीर कमी दर्ज की गई है, जिससे जलवायु परिवर्तनशीलता, जल सुरक्षा, कृषि तथा वनाग्नि से संबंधित गंभीर चिंताएँ उत्पन्न हो रही हैं।
सारांश
- यह कमज़ोर और आर्द्रता की कमी वाले पश्चिमी विक्षोभों, परिवर्तित जेट स्ट्रीम पैटर्न और बढ़ते शीतकालीन तापमान के कारण होता है, इससे हिम के टिके रहने की अवधि घटती है हालाँकि कई बार वर्षण हिमपात के बजाय वर्षा के रूप में देखने को मिलती है।
- यह जल सुरक्षा, रबी फसल, ग्लेशियर स्वास्थ्य, वन स्थिरता और हिमालयी आजीविकाओं के लिये खतरा उत्पन्न करता है, जो जलवायु-अनुकूल नीतियों और क्षेत्र-विशिष्ट हस्तक्षेपों की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
पश्चिमी हिमालय में हिमपात की कमी के कारण क्या हैं?
- कमज़ोर और आर्द्रता की कमी वाले पश्चिमी विक्षोभ (WD): पश्चिमी हिमालय में शीतकाल के हिमपात का प्राथमिक स्रोत पश्चिमी विक्षोभ हैं।
- हाल की सर्दियों में, वर्ष 2025–26 भी इसमें शामिल है, अधिकांश विक्षोभ कमज़ोर रहे हैं, जिनमें सीमित आर्द्रता देखने को मिली। उथले निम्न दाब तंत्रों के कारण इन विक्षोभों का ऊर्ध्वाधर उत्थान कम हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप अल्पकालिक वर्षण परिघटनाएँ और खराब हिमसंचय हुआ है।
- पश्चिमी विक्षोभों में कमज़ोर परिसंचरण ने विक्षोभ के ठहरने के समय को कम कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप मेघ निर्माण और संघनन सीमित हो गया और इस प्रकार पश्चिमी हिमालय पर हिमपात और वर्षा कम हुई।
- पश्चिमी विक्षोभों के प्रक्षेपवक्र में परिवर्तन: विभिन्न पश्चिमी विक्षोभ उच्च अक्षांशों पर उत्तर की ओर बढ़े हैं।
- इस विचलन के परिणामस्वरूप कश्मीर के कुछ भागों में सीमित हिमपात हुआ, जबकि हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड काफी हद तक शुष्क रहे, जिससे शीतकालीन वर्षा का समग्र प्रसार कम हो गया।
- आर्द्रतायुक्त पवनों के साथ कमज़ोर अंतःक्रिया: सामान्य रूप से पश्चिमी विक्षोभ बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से आने वाली आर्द्रतायुक्त पवनों के साथ अंतःक्रिया करते हैं।
- हाल के वर्षों में पवनों का यह सम्मिलन कमज़ोर हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप हिमालयी क्षेत्र में मेघ निर्माण कम होने के साथ हिमपात में उल्लेखनीय कमी देखी गई है।
- उपोष्णकटिबंधीय पश्चिमी जेट स्ट्रीम में परिवर्तन: उपोष्णकटिबंधीय पश्चिमी जेट स्ट्रीम पश्चिमी विक्षोभों को भारतीय उपमहाद्वीप की ओर निर्देशित करती है।
- हाल ही में इसके कमज़ोर होने और स्थिति में परिवर्तन के कारण मौसमी तंत्र भारत से पृथक् हो गए या स्थल पर पहुँचने से पूर्व उनकी तीव्रता कमज़ोर हुई, जिससे हिमपात में विलंब और कमी देखने को मिली।
- दीर्घकालिक जलवायु परिवर्तनशीलता: वैश्विक तापन के कारण पर्वतीय क्षेत्रों में शीतकालीन तापमान में वृद्धि हुई है, जिससे हिमसीमा की तुंगता में भी वृद्धि देखने को मिली है।
- परिणामस्वरूप, वह वर्षा जो पहले हिम के रूप में गिरती थी, अब विशेष रूप से निम्न और मध्य ऊँचाई वाले क्षेत्रों में वर्षा के रूप में होने लगी है।
- पिछले एक दशक में बार-बार शुष्क शीत का होना एक व्यापक जलवायु परिवर्तन का संकेत है। अध्ययनों से पता चलता है कि उत्तर भारत के कुछ भागों में शीतकालीन वर्षा में सीमांत लेकिन निरंतर कमी आ रही है, जो एक बार की विसंगति के बजाय बढ़ती जलवायु परिवर्तनशीलता को दर्शाता है।
पश्चिमी विक्षोभ (WD)
- पश्चिमी विक्षोभ (WD) बड़े पैमाने पर पूर्व की ओर बढ़ने वाली वर्षा-वाहक पवन प्रणालियाँ अथवा अतिरिक्त-उष्णकटिबंधीय मौसम प्रणालियाँ हैं, जिनका उद्गम भूमध्य सागर, काला सागर और कैस्पियन सागर के क्षेत्र में होता है।
- ये पश्चिमी जेट स्ट्रीम में अंतर्निहित निम्न-दाब प्रणालियाँ होती हैं। शीतऋतु के दौरान जेट स्ट्रीम इन्हें पूर्व दिशा में भारतीय उपमहाद्वीप की ओर निर्देशित करती है। पश्चिम एशिया, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान से होकर गुज़रते समय ये प्रणालियाँ नमी का संचय करती हैं।
- अंततः जब ये हिमालयी अवरोध से टकराती हैं, तो वायु ऊर्ध्वगामी होने के लिये बाध्य होती है, शीतलन एवं संघनन की प्रक्रिया से गुज़रती है, जिसके परिणामस्वरूप मैदानी क्षेत्रों में वर्षा तथा ऊँचे क्षेत्रों में हिमपात होता है।
- इस पश्चिम से पूर्व दिशा में होने वाली गति के कारण सामान्यतः सबसे पहले कश्मीर में हिमपात होता है, इसके बाद हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में तथा कभी-कभी नेपाल व पूर्वोत्तर भारत के कुछ हिस्सों में भी इसका प्रभाव देखा जाता है।
हिमालयी क्षेत्रों में विलंबित या हिमरहित शीतऋतु के निहितार्थ क्या हैं?
- जल संरक्षण हेतु जोखिम: हिमालय में होने वाला हिमपात एक प्राकृतिक जल भंडार के रूप में कार्य करता है, जो हिमगलन (Snowmelt) के माध्यम से धीरे-धीरे जल का निर्वहन करता है; हिमपात में कमी या विलंब से दीर्घकालिक जल उपलब्धता और नदी प्रवाह पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
- हिमनद के निवर्तन (ग्लेशियल रिट्रीट) से हिमनदों का द्रव्यमान संतुलन प्रतिकूल रूप से प्रभावित होता है तथा हिमनदों के तीव्र पिघलाव को बढ़ावा मिलता है। इससे गंगा, यमुना और सिंधु जैसी हिमालयी नदियों की दीर्घकालिक स्थिरता को जोखिम उत्पन्न होता है, जिसके परिणामस्वरूप ग्रीष्मऋतु के दौरान जल उपलब्धता पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। इसका दुष्प्रभाव न केवल पर्वतीय क्षेत्रों पर, बल्कि निचले मैदानी इलाकों पर भी पड़ता है।
- कृषि पर प्रतिकूल प्रभाव: शीतकालीन वर्षा और प्रारंभिक हिमपात गेहूँ एवं सरसों जैसी रबी फसलों के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण होते हैं।
- प्रारंभिक हिमपात से नमी धीरे-धीरे मृदा में समाहित होती है, जिससे फसलों की वृद्धि को समर्थन मिलता है।
- विलंबित हिमपात उच्च दिनकालीन तापमान के कारण शीघ्र पिघल जाता है, जिसके परिणामस्वरूप कृषि को सीमित लाभ ही प्राप्त होता है।
- वनाग्नि के जोखिम में वृद्धि: हिमपात की अनुपस्थिति से वन भूमि में नमी कम हो जाती है, जिससे वन आग के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो जाते हैं।
- शुष्क शीतऋतु ने हिमालय में वनाग्नि के प्रति संवेदनशीलता बढ़ा दी है, जो पहले से ही वैली ऑफ फ्लावर्स रेंज और नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान जैसे क्षेत्रों में स्पष्ट दिखाई दे रही है; इसके परिणामस्वरूप पारिस्थितिक क्षति होती है और आपदा प्रबंधन प्रणाली पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
- पारिस्थितिक और जैव विविधता पर तनाव: हिमालयी पारिस्थितिक तंत्र पौधों की निष्क्रिय अवस्था और वन्यजीवों के जीवन के लिये पूर्वानुमानित हिमपात चक्रों पर निर्भर करता है।
- हिमरहित शीतऋतु इन चक्रों को बाधित करती है, जिससे अल्पाइन जैव विविधता को जोखिम होता है और संवेदनशील पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्र अस्थिर हो जाते हैं।
- सामाजिक-आर्थिक परिणाम: हिमपात की कमी हिमालयी राज्यों में शीतकालीन पर्यटन, बागवानी और स्थानीय आजीविका को प्रभावित करती है।
- हिमनद और बर्फ की कमी से सेब की खेती और पर्यटन आधारित आय प्रभावित होती है, जिससे स्थानीय समुदायों के लिये आर्थिक अनिश्चितता बढ़ जाती है।
हिमालय में हिमपात की कमी को दूर करने हेतु भारत क्या कदम उठा सकता है?
- हिम और मौसम निगरानी को सुदृढ़ करना: उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और लद्दाख में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा उच्च-ऊँचाई वाले स्वचालित मौसम स्टेशनों का विस्तार करना।
- उपग्रह आधारित बर्फ निगरानी (INSAT, Cartosat) को एकीकृत करना ताकि पश्चिमी विक्षोभ की भविष्यवाणी और बर्फबारी की भविष्यवाणी में सुधार हो सके।
- कृत्रिम हिमनद और हिम संचयन: लद्दाख में वर्ष 2025 अंतर्राष्ट्रीय हिमनद संरक्षण वर्ष के तहत शुरू किये गए कृत्रिम हिमनद और आइस-स्टूपा परियोजनाओं का विस्तार करना, ताकि शीतकालीन जल को संगृहीत किया जा सके तथा वसंत ऋतु में इसका मुक्त प्रवाह सुनिश्चित किया जा सके, जिससे प्राकृतिक हिमपात की कमी को संतुलित किया जा सके।
- जलागम और झरना/कैचमेंट और स्प्रिंग पुनरुद्धार: हिमालयी राज्यों में NITI आयोग द्वारा समर्थित कार्यक्रमों के तहत स्प्रिंगशेड प्रबंधन को सुदृढ़ करना, ताकि भूजल को पुनःभरा जा सके, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ हिमगलन में कमी से पेयजल स्रोत प्रभावित हो रहे हैं।
- सिक्किम में सफलतापूर्वक लागू किये गए ‘धारा विकास’ मॉडल का प्रयोग उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में झरना पुनरुद्धार के लिये उदाहरण के तौर पर किया जा सकता है।
- नेशनल मिशन ऑन सस्टेनिंग हिमालयन ईकोसिस्टम (NMSHE) के तहत हिमनदों की निगरानी को सुदृढ़ करना और इसके निष्कर्षों को गंगा और यमुना जैसी नदियों के बेसिन स्तर के नियोजन में समेकित करना।
- जलवायु-सहिष्णु रबी कृषि: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के माध्यम से अल्पकालिक और सूखा-सहिष्णु गेहूँ एवं सरसों की किस्मों को बढ़ावा देना तथा सूक्ष्म सिंचाई का विस्तार करना, ताकि अनिश्चित शीतकालीन वर्षा पर निर्भरता कम की जा सके।
- वनाग्नि रोकथाम: राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के दिशा-निर्देशों के तहत नंदा देवी बायोस्फीयर रिज़र्व जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में पूर्व-चेतावनी प्रणाली, आग रोकने वाली लाइनें और सामुदायिक फायर ब्रिगेड को सुदृढ़ करना।
- सतत शीतकालीन पर्यटन: उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों को बर्फ-आधारित गतिविधियों से आगे बढ़कर पर्यटन का विविधीकरण करना चाहिये। इसके तहत शीतकालीन सांस्कृतिक पर्यटन, वेलनेस पर्यटन तथा नियंत्रित ईको-ट्रेक्स को बढ़ावा दिया जा सकता है, जिससे विलंबित हिमपात के कारण होने वाले आर्थिक झटकों को कम किया जा सके।
- नीति में हिमपात परिवर्तनशीलता को मुख्यधारा में लाना: हिमालयी राज्यों की जलवायु परिवर्तन पर राज्य कार्ययोजनाओं (SAPCCs) और आपदा प्रबंधन योजनाओं में हिमपात में देरी तथा बर्फ के टिकाव में कमी जैसे कारकों को स्पष्ट रूप से शामिल किया जाना चाहिये।
निष्कर्ष
पश्चिमी हिमालय में हिमपात की कमी क्षेत्रीय जलवायु व्यवहार में संरचनात्मक बदलावों को दर्शाती है, विशेष रूप से पश्चिमी विक्षोभों (WDs) की प्रभावशीलता में कमी को। इसके प्रभाव जल सुरक्षा, कृषि, आपदा जोखिम और पारिस्थितिक स्थिरता तक फैले हुए हैं, जिससे यह भारत के लिये एक प्रभावी शासन तथा जलवायु अनुकूलन चुनौती बन जाता है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. पश्चिमी हिमालय में हिमपात की कमी अब केवल एक अल्पकालिक असामान्यता नहीं रही, बल्कि यह जलवायु परिवर्तन का एक स्पष्ट संकेत बन चुकी है। विश्लेषण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. पश्चिमी विक्षोभ क्या हैं और वे भारत के लिये क्यों महत्त्वपूर्ण हैं?
पश्चिमी विक्षोभ भूमध्यसागर क्षेत्र से उत्पन्न होने वाले अतिरिक्त-उष्णकटिबंधीय मौसम तंत्र हैं, जो उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत को महत्त्वपूर्ण शीतकालीन वर्षा तथा हिमपात प्रदान करते हैं।
2. पश्चिमी हिमालय में बर्फबारी की कमी क्यों बढ़ रही है?
कमज़ोर और नमी में कमी वाले पश्चिमी विक्षोभ, जेट स्ट्रीम के पैटर्न में बदलाव, बढ़ता हुआ तापमान और जलवायु परिवर्तन के कारण हिमपात का कम समय तक बने रहना इसके मुख्य कारण हैं।
3. कम बर्फबारी भारत की जल सुरक्षा को कैसे प्रभावित करती है?
कम हिमपात हिमनदों के पुनर्भरण और हिम पिघलने की प्रक्रिया को प्रभावित करता है, जिससे गंगा, यमुना तथा सिंधु जैसी नदियों के दीर्घकालिक प्रवाह को खतरा उत्पन्न होता है।
4. हिमालय में बर्फबारी की कमी का संबंध वनाग्नि से क्यों है?
हिमपात में कमी से वन तल की नमी कम हो जाती है, जिससे वनाग्नि की संवेदनशीलता बढ़ती है, जैसा कि वैली ऑफ फ्लावर्स और नंदा देवी नेशनल पार्क जैसे क्षेत्रों में देखा गया है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)
प्रिलिम्स:
प्रश्न. निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिये: (2020)
शिखर पर्वत
- नामचा बरवा - गढ़वाल हिमालय
- नंदा देवी - कुमाऊँ हिमालय
- नोकरेक - सिक्किम हिमालय
उपर्युक्त युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2
(c) केवल 1 और 3
(d) केवल 3
उत्तर: (B)
प्रश्न 2. यदि आप हिमालय से होकर यात्रा करते हैं, तो आपको वहाँ निम्नलिखित में से किस पादप/किन पादपों को प्राकृतिक रूप में उगते हुए दिखने की संभावना है? (2014)
- ओक
- रोडोडेंड्रोन
- चंदन
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (a)
प्रश्न 3. जब आप हिमालय की यात्रा करेंगे, तो आप निम्नलिखित को देखेंगे: (2012)
- गहरे खड्ड
- U धुमाव वाले नदी-मार्ग
- समानांतर पर्वत श्रेणियाँ
- भूस्खलन के लिये उत्तरदायी तीव्र ढाल प्रवणता
उपर्युक्त में से कौन-से हिमालय के तरुण वलित पर्वत (नवीन मोड़दार पर्वत) के साक्ष्य कहे जा सकते हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 1, 2 और 4
(c) केवल 3 और 4
(d) 1, 2, 3 और 4
उत्तर: (d)
मेन्स
प्रश्न 1. हिमालयी क्षेत्र तथा पश्चिमी घाटों में भूस्खलन के विभिन्न कारणों का अंतर स्पष्ट कीजिये। (2021)
प्रश्न 2. हिमालय के हिमनदों के पिघलने का भारत के जल-संसाधनों पर किस प्रकार दूरगामी प्रभाव होगा? (2020)
प्रश्न 3. “हिमालय भूस्खलनों के प्रति अत्यधिक प्रवण है।” कारणों की विवेचना कीजिये तथा अल्पीकरण के उपयुक्त उपाय सुझाइये। (2016)
भारत में सहकारिता की उपलब्धियाँ
प्रिलिम्स के लिये: सहकारी क्षेत्र, संयुक्त राष्ट्र, नेशनल को-ऑपरेटिव एक्सपोर्ट्स लिमिटेड (NCEL), नेशनल को-ऑपरेटिव ऑर्गेनिक्स लिमिटेड (NCOL), नेशनल को-ऑपरेटिव डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (NCDC), राष्ट्रीय सहकारी नीति (NCP) 2025, श्वेत क्रांति 2.0, किसान उत्पादक संगठन (FPO), किसान क्रेडिट कार्ड (KCC), MAT, सहकार टैक्सी, GeM पोर्टल, 97वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2011, पूंजी पर्याप्तता, MUDRA, CGTMSE, NABARD, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME)।
मेन्स के लिये: भारत में सहकारिताओं की वर्तमान स्थिति एवं सहकारिताओं से संबंधित प्रावधान। सहकारी समितियों की प्रमुख उपलब्धियाँ, संबंधित चुनौतियाँ तथा आगे की राह।
चर्चा में क्यों?
भारत के सहकारी क्षेत्र में हुए उल्लेखनीय कार्यों और उपलब्धियों को वैश्विक मान्यता प्राप्त हुई है। इसी क्रम में संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2025 को ‘अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता वर्ष’ (International Year of Cooperatives- IYC) घोषित किया है, जिसका विषय है ‘Cooperatives Build a Better World’ अर्थात सहकारिताएँ एक बेहतर विश्व का निर्माण करती हैं।
- भारत का सहकारी आंदोलन ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ अर्थात संपूर्ण विश्व एक परिवार है की भावना से प्रेरित है तथा ‘सहकार से समृद्धि’ (Prosperity Through Cooperation) के विज़न द्वारा संचालित है। इसका मुख्य उद्देश्य सामूहिक कल्याण, समावेशी विकास एवं समुदाय-केंद्रित विकास मॉडल के माध्यम से व्यापक सामाजिक-आर्थिक समृद्धि सुनिश्चित करना है।
सारांश
- भारत का व्यापक सहकारी नेटवर्क डिजिटल PACS, नई राष्ट्रीय सहकारी संस्थाओं (NCEL, NCOL) तथा एक समर्पित सहकारिता मंत्रालय के माध्यम से सुव्यवस्थित और आधुनिक बनाया जा रहा है।
- यह क्षेत्र शासन, विनियामक तथा वित्तीय ढाँचे से संबंधित गहरी संरचनात्मक चुनौतियों का सामना कर रहा है, जो समावेशी विकास में बाधा उत्पन्न करती हैं।
- ‘सहकार से समृद्धि’ के लक्ष्य की प्राप्ति तकनीकी एकीकरण, वित्तीय नवाचार तथा विनियामक विखंडन के समाधान पर निर्भर करती है।
भारत में सहकारिताओं की वर्तमान स्थिति क्या है?
- व्यापक विस्तार और व्यापक पहुँच: भारत में 8.5 लाख से अधिक सहकारी संस्थाएँ कार्यरत हैं, जो 30 से अधिक क्षेत्रों में लगभग 32 करोड़ सदस्यों को सेवाएँ प्रदान करती हैं तथा देश के लगभग 98% ग्रामीण क्षेत्रों को कवर करती हैं।
- लगभग 10 करोड़ महिलाएँ स्वयं सहायता समूहों (SHG) के माध्यम से सहकारिताओं से जुड़ी हुई हैं, जो महिला-नेतृत्व वाले विकास में इस क्षेत्र की महत्त्वपूर्ण भूमिका को दर्शाता है।
- नए क्षेत्रों में रणनीतिक विस्तार: 32,000 से अधिक नई बहु-उद्देशीय दुग्ध एवं मत्स्य सहकारी संस्थाओं का पंजीकरण पारंपरिक ऋण से आगे बढ़कर सहकारी क्षेत्र के विस्तार हेतु किये जा रहे सशक्त प्रयासों को दर्शाता है।
- यह विस्तार राष्ट्रीय स्तर की सहकारी संस्थाओं, जैसे– नेशनल को-ऑपरेटिव एक्सपोर्ट्स लिमिटेड (NCEL), नेशनल को-ऑपरेटिव ऑर्गेनिक्स लिमिटेड (NCOL) तथा भारतीय बीज सहकारी समिति लिमिटेड (BBSSL) की स्थापना के माध्यम से रणनीतिक रूप से सुदृढ़ किया गया है, ताकि भारतीय सहकारिताओं को उच्च-मूल्य आपूर्ति शृंखलाओं से एकीकृत किया जा सके।
- सुदृढ़ वित्तीय एवं संस्थागत समर्थन: नेशनल को-ऑपरेटिव डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (NCDC) द्वारा वार्षिक ₹95,000 करोड़ से अधिक का वितरण किया जा रहा है, जो सहकारी क्षेत्र के विस्तार हेतु आवश्यक पूंजी उपलब्ध कराता है।
- नीतिगत फोकस को नए सहकारिता मंत्रालय की स्थापना तथा सहकारिताओं को विश्व की सबसे बड़ी विकेंद्रीकृत अनाज भंडारण योजना जैसे बड़े राष्ट्रीय प्रोजेक्ट्स में सम्मिलित कर और अधिक सुदृढ़ किया गया है।
भारत के सहकारी क्षेत्र में प्रमुख पहलें एवं उपलब्धियाँ क्या हैं?
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रणनीतिक क्षेत्र |
प्रमुख पहल |
प्रमुख उपलब्धि / वर्तमान स्थिति |
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नीति एवं शासन |
राष्ट्रीय सहकारी नीति (NCP), 2025 की शुरुआत |
सहकारिताओं को पुनरुज्जीवित और आधुनिक बनाने के लिये दशकीय रणनीतिक रोडमैप प्रदान करती है। |
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विस्तार और विविधीकरण |
श्वेत क्रांति 2.0 (दुग्ध विस्तार) |
31 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में 20,070 नई दुग्ध सहकारी संस्थाएँ पंजीकृत। |
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मत्स्य उत्पादक किसान संगठन (FFPO) का गठन |
NCDC द्वारा 1,070 किसान उत्पादक संगठन (FFPO) का गठन सुनिश्चित किया गया। |
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वित्तीय सुदृढ़ता एवं समावेशन |
RuPay किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) पायलट गुजरात में |
22 लाख से अधिक KCC जारी, किसानों को ₹10,000 करोड़ से अधिक का ऋण वितरित। |
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बाज़ार कनेक्शन एवं निर्यात |
नेशनल को-ऑपरेटिव ऑर्गेनिक्स लिमिटेड (NCOL) |
‘भारत ऑर्गेनिक्स’ ब्रांड के तहत 28 उत्पादों का विपणन। |
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भारतीय बीज सहकारी समिति लिमिटेड (BBSSL) |
31,605 सदस्य सहकारी समितियाँ; ‘भारत बीज’ बीज वितरित करती है। |
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बुनियादी ढाँचा विकास |
विकेंद्रीकृत अनाज भंडारण योजना (विश्व की सबसे बड़ी) |
112 PACS में गोदाम बनाए गए; 68,702 मीट्रिक टन क्षमता बनाई गई; सभी सहकारी समितियों तक विस्तार किया गया। |
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कृषि में आत्मनिर्भरता |
दलहन और मक्का के लिये आत्मनिर्भर अभियान |
54.74 लाख किसान और 56,673 PACS/FPO पंजीकृत; 9.08 लाख मीट्रिक टन दालें और 45,105 मीट्रिक टन मक्का की खरीद की गई। |
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संस्थागत विकास |
भारत का पहला राष्ट्रीय सहकारी विश्वविद्यालय स्थापित हुआ; शैक्षणिक कार्यक्रम शुरू किये गए। |
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अभिनव परियोजनाएँ |
सहकारी समितियों के नेतृत्व वाला पहला मोबिलिटी प्लेटफॉर्म; परीक्षण के दौरान 1.5 लाख ड्राइवर और 2 लाख ग्राहक पंजीकृत हुए। |
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GeM पोर्टल पर सहकारी समितियाँ |
721 सहकारी समितियों को खरीदार के रूप में शामिल किया गया; 396.77 करोड़ रुपये के ट्रांजेक्शन पूरे हुए। |
सहकारी समितियाँ
- परिचय: सहकारी समिति एक स्वैच्छिक और लोकतांत्रिक संगठन है, जो सदस्यों की साझी आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आवश्यकताओं को संयुक्त रूप से स्वामित्व वाले उद्यम के माध्यम से पूरा करता है, जो "एक सदस्य, एक वोट" के सिद्धांत पर कार्य करता है।
- संवैधानिक मान्यता: 97वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2011 ने सहकारी समितियों को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया, जिसमें प्रमुख प्रावधान शामिल हैं:
- अनुच्छेद 19(1)(c): नागरिकों को सहकारी समितियाँ बनाने का अधिकार प्रदान करता है।
- अनुच्छेद 43B: राज्य को राज्य की नीति के निदेशक तत्व (DPSP) के एक भाग के रूप में सहकारी समितियों को बढ़ावा देने का निर्देश देता है।
- भाग IXB (अनुच्छेद 243ZH–243ZT): सहकारी समितियों के लिये एक प्रशासनिक ढाँचा स्थापित करता है।
- विधिक ढाँचा और नियामक निगरानी: भारत में सहकारी समितियाँ एक दोहरी संवैधानिक और प्रशासनिक ढाँचे के अंतर्गत विनियमित होती हैं।
- राज्य-स्तरीय सहकारी समितियाँ राज्य सूची के अंतर्गत आती हैं और राज्य पंजीयकों की निगरानी में अलग-अलग राज्य के कानूनों द्वारा शासित होती हैं।
- बहु-राज्य सहकारी समितियाँ संघ सूची के अंतर्गत आती हैं और केंद्रीय पंजीयक की निगरानी में केंद्रीय बहु-राज्य सहकारी समिति (MSCS) अधिनियम, 2002 द्वारा विनियमित होती हैं।
- भौगोलिक वितरण: इसका भौगोलिक विस्तार केंद्रित है। महाराष्ट्र एकमात्र ऐसा राज्य है जहाँ सभी सहकारी समितियाँ एक-चौथाई से अधिक हैं। कुल मिलाकर, शीर्ष पाँच राज्य– महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, मध्य प्रदेश और कर्नाटक– कुल राष्ट्रीय भाग का 57% भाग हैं।
- राष्ट्रीय सहकारिता नीति, 2025: इसने वर्ष 2002 की नीति का स्थान लिया है, जो वर्ष 2025 से 2045 तक सहकारी विकास के लिये एक दीर्घकालिक रोडमैप प्रदान करती है। प्रमुख उद्देश्यों में शामिल हैं:
- 2 लाख नई बहु-उद्देशीय प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (M-PACS) की स्थापना।
- डेयरी अवसंरचना विकास कोष (DIDF), PM मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) और राष्ट्रीय डेयरी विकास कार्यक्रम (NPDD) जैसी योजनाओं का लाभ उठाना।
- त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय (आणंद, गुजरात) के माध्यम से सहकारी शिक्षा को बढ़ावा देना।
- भारत में उल्लेखनीय सहकारी समितियाँ: अमूल (आणंद मिल्क यूनियन लिमिटेड), इफको (इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइज़र कोऑपरेटिव), लिज्जत पापड़ (श्री महिला गृह उद्योग लिज्जत पापड़), आदि।
भारत में को-ऑपरेटिव सेक्टर के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?
- नियामक विखंडन: एक प्रमुख संघर्ष उस स्थिति में मौजूद है जहाँ सहकारी समितियों का पंजीयक (राज्य प्राधिकारी) समामेलन, प्रशासन और परिसमापन का प्रबंधन करता है, जबकि भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) बैंकिंग लाइसेंस और पूंजी पर्याप्तता जैसे विवेकपूर्ण मानदंडों को नियंत्रित करता है। इससे अधिकार क्षेत्र के विवाद, असंगत पर्यवेक्षण और नियामक अंतर उत्पन्न होते हैं।
- शासन संबंधी कमियाँ: विभिन्न सहकारी समितियों में पारदर्शिता और वास्तविक लोकतांत्रिक प्रथा की कमी के कारण अभिजात वर्ग का नियंत्रण, खराब जवाबदेही और सदस्यों के आवागमन को कम होता है। उदाहरण के लिये, वर्ष 2019 में पंजाब और महाराष्ट्र सहकारी (PMC) बैंक का पतन सीधे तौर पर वित्तीय अनियमितताओं और आंतरिक नियंत्रण की विफलताओं से जुड़ा था।
- वित्तीय बाधाएँ और अविकसित अवसंरचना: कई संस्थान पर्याप्त पूंजी बफर बनाए रखने में विफल रहते हैं, जिससे नुकसान को कम करने, आर्थिक तनाव का सामना करने या विस्तार को निधि देने की उनकी क्षमता प्रभावित होती है। भंडारण सुविधाओं, प्रसंस्करण इकाइयों और बाज़ार संबंधों की गंभीर कमी कृषि और ग्रामीण सहकारी समितियों के विकास और प्रतिस्पर्द्धात्मकता में बाधा डालती हैं।
- परिचालनात्मक और तकनीकी बाधाएँ: एक महत्त्वपूर्ण डिजिटल विभाजन मौज़ूद है, जहाँ कई ग्रामीण सहकारी समितियों के पास आधुनिक डिजिटल अकाउंटिंग, ERP सिस्टम और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म नहीं हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में खराब फिजिकल कनेक्टिविटी और कमज़ोर रसद सहकारी नेटवर्क की दक्षता और भौगोलिक विस्तार को सीमित करती हैं।
- सामाजिक-सांस्कृतिक बाधाएँ: पूर्व-मौजूद सामाजिक पदानुक्रम, जाति-आधारित विभाजन और संरचनात्मक असमानताएँ सहकारी समितियों के भीतर समान भागीदारी और प्रतिनिधित्व में बाधाएँ उत्पन्न करती हैं, जो उनके समावेशी आदर्शों के विपरीत है।
- तीव्र बाज़ार की प्रतिस्पर्द्धा: सहकारी समितियाँ वाणिज्यिक बैंकों, लघु वित्त बैंकों और फिनटेक कंपनियों के खिलाफ ग्राहकों को बनाए रखने के लिये संघर्ष करती हैं, जो अधिक परिष्कृत उत्पाद और सेवाएँ प्रदान करते हैं।
भारत में सहकारी समितियों को मज़बूत करने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?
- तकनीकी एकीकरण: मोबाइल बैंकिंग, ऑनलाइन खाता खोलना और डिजिटल भुगतान प्रणाली लागू करें ताकि टेक-प्रेमी सदस्यों को आकर्षित किया जा सके और संचालन की दक्षता बढ़ाई जा सके। सामान्य ERP सॉफ्टवेयर, डिजिटल वित्तीय रिपोर्टिंग सिस्टम और ई-कॉमर्स एकीकरण (जैसे– ONDC और GeM प्लेटफॅार्म) लागू करना ताकि संचालन सरल हो और बाज़ार में पहुँच का विस्तार हो सके।
- वित्तीय गहनता: सहकारी वित्तीय संस्थाओं को मूलभूत बचत/ऋण से आगे बढ़कर निवेश उत्पाद, बीमा और वित्तीय साक्षरता कार्यक्रम प्रदान करने चाहिये, ताकि सदस्य समग्र वित्तीय स्वास्थ्य प्राप्त कर सकें।
- संस्थागत सशक्तीकरण: सहकारी संस्थाओं के लिये संगठित प्रशिक्षण, कौशल विकास कार्यशालाएँ, और क्लीयर कैरियर पाथवे लागू किये जाएँ ताकि पेशेवर प्रबंधकों की एक मज़बूत टीम तैयार की जा सके।
- मूल्य शृंखला विकास: गोदाम, शीत भंडारण और सामान्य सुविधा केंद्र जैसी अवसंरचना में सार्वजनिक तथा सहकारी निवेश को प्राथमिकता दी जाए, ताकि व्यर्थता कम हो एवं बाज़ार तक पहुँच बेहतर हो सके। इसके अलावा सदस्य-स्वामित्व वाली लॉजिस्टिक सहकारी संस्थाएँ स्थापित करने से सप्लाई चेन लागत कम होगी व दक्षता बढ़ेगी।
- ब्रांडिंग और विविधीकरण: प्रीमियम कीमतें प्राप्त करने तथा गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिये प्रमाणन के साथ मज़बूत 'अंब्रेला ब्रांड' (जैसे– "CoopMade" या "भारत ऑर्गेनिक्स") विकसित एवं प्रचारित करना। ईको-टूरिज़्म, नवीकरणीय ऊर्जा, आधुनिक कृषि (जैसे– हाइड्रोपोनिक्स) व डिजिटल सेवाओं में सहकारी मॉडलों को सक्रिय रूप से बढ़ावा देना, ताकि उन्हें नवाचार केंद्रों के रूप में पुन: स्थापित किया जा सके।
निष्कर्ष
भारत का सहकारी क्षेत्र वर्तमान में डिजिटल और रणनीतिक विस्तार के दौर से गुज़र रहा है। समावेशी समृद्धि के पूर्ण लाभ को प्राप्त करने के लिये इसे शासन, वित्त तथा प्रतिस्पर्द्धा में मौजूद लगातार चुनौतियों को तत्काल संबोधित करना चाहिये, साथ ही नीति, तकनीक एवं सदस्यों की भागीदारी का प्रभावी रूप से उपयोग करना चाहिये।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न प्रश्न. भारत में सहकारी आंदोलन के सामने आने वाली मुख्य चुनौतियों का परीक्षण कीजिये और संस्थागत सुधारों का सुझाव दीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता वर्ष 2025 क्या है?
संयुक्त राष्ट्र ने 2025 को अंतर्राष्ट्रीय सहकारी वर्ष के रूप में घोषित किया है, ताकि सतत विकास में सहकारी संस्थाओं की भूमिका को रेखांकित किया जा सके और इसका विषय रखा गया है: “सहकारी संस्थाएँ एक बेहतर दुनिया का निर्माण करती हैं”।
2. भारत में सहकारी समितियों का संवैधानिक दर्जा क्या है?
97वें संविधान संशोधन (2011) ने सहकारी संस्थाओं को संवैधानिक पहचान दी, जिसमें अनुच्छेद 19(1)(c) और अनुच्छेद 43B जोड़े गए और Part IXB (अनुच्छेद 243ZH–243ZT) को शासन के लिये शामिल किया गया।
3. राष्ट्रीय सहयोग नीति, 2025 क्या है?
राष्ट्रीय सहकारी नीति, 2025 सहकारी विकास के लिये 2045 तक की रूपरेखा प्रदान करती है, जिसका उद्देश्य 2 लाख नए M-PACS की स्थापना और सहकारी शिक्षा एवं अवसंरचना को मज़बूत करना है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. भारत में ‘शहरी सहकारी बैंकों’ के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2021)
- राज्य सरकारों द्वारा स्थापित स्थानीय मंडलों द्वारा उनका पर्यवेक्षण एवं विनियमन किया जाता है।
- वे इक्विटी शेयर और अधिमान शेयर जारी कर सकते हैं।
- उन्हें वर्ष 1966 में एक संशोधन द्वारा बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 के कार्यक्षेत्र में लाया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर:(b)
प्रश्न. भारत में निम्नलिखित में से किसकी कृषि तथा सहबद्ध गतिविधियों में ऋण के वितरण में सबसे अधिक हिस्सेदारी है? (2011)
(a) वाणिज्यिक बैंकों की
(b) सहकारी बैंकों की
(c) क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की
(d) सूक्ष्म-वित्त (माइक्रोफाइनेंस) संस्थाओं की
उत्तर: (a)
मेन्स
प्रश्न."भारतीय शासकीय तंत्र में गैर-राजकीय कर्त्ताओं की भूमिका सीमित ही रही है।" इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिये। (2016)
प्रश्न . "गाँवों में सहकारी समिति को छोड़कर ऋण संगठन का कोई भी ढाँचा उपयुक्त नहीं होगा।" - अखिल भारतीय ग्रामीण ऋण सर्वेक्षण। भारत में कृषि वित्त की पृष्ठभूमि में इस कथन पर चर्चा कीजिये। कृषि वित्त प्रदान करने वाली वित्त संस्थाओं को किन बाधाओं और कसौटियों का सामना करना पड़ता है? ग्रामीण सेवार्थियों तक बेहतर पहुँच और सेवा के लिये प्रौद्योगिकी का किस प्रकार उपयोग किया जा सकता है?” (2014)