दिव्यांगजनों के समावेशन हेतु भारत का पुनर्रचना मॉडल | 09 Feb 2026
यह एडिटोरियल 06/02/2026 को द बिज़नेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित “Budget 2026 makes employment room for disabled, but not in public spaces” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह एडिटोरियल इस बात का विश्लेषण करता है कि बजट 2026 किस प्रकार दिव्यांगजनों को कौशल विकास और रोज़गार के माध्यम से आर्थिक विकास में योगदानकर्त्ता के रूप में प्रस्तुत करता है। इसमें तर्क दिया गया है कि सुलभ सार्वजनिक स्थानों, आवागमन और समावेशी शहरी अवसंरचना के बिना वास्तविक समावेशन अधूरा रहता है।
प्रिलिम्स के लिये: दिव्यांगजनों के अधिकार अधिनियम 2016, मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017, दिव्यांगजन कौशल योजना, NDFDC
मेन्स के लिये: दिव्यांगजनों के लिये संवैधानिक प्रावधान, दिव्यांगजनों के कल्याण के लिये किये गए उपाय, प्रमुख मुद्दे और उपाय।
केंद्रीय बजट 2026 दिव्यांगजनों के संबंध में एक शांत लेकिन महत्त्वपूर्ण परिवर्तन का संकेत देता है। दिव्यांगजनों को अब केवल कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थी के रूप में नहीं, बल्कि आर्थिक विकास में भागीदार के रूप में देखा जाता है। फिर भी, कार्यस्थल पर शुरू और समाप्त होने वाला समावेशन अधूरा ही रहता है। दिव्यांगजनों का वास्तविक सशक्तीकरण केवल कौशल और रोज़गार में ही नहीं, बल्कि सुलभ सार्वजनिक स्थानों, गतिशीलता एवं सामाजिक अधोसंरचना में भी निहित है। इसलिये, मुद्दा केवल दिव्यांगजनों को रोज़गार देने का नहीं है, बल्कि समाज को इस तरह से पुनर्गठित करने का है ताकि उनका उचित रूप से समावेशन किया जा सके।
भारत में दिव्यांगजनों के लिये अधिकार-आधारित ढाँचे का आधार क्या है?
- संवैधानिक ढाँचा: संविधान मानक आधार प्रदान करता है, हालाँकि दिव्यांग को स्पष्ट रूप से इसमें सूचीबद्ध नहीं किया गया है।
- अनुच्छेद 14: विधि के समक्ष समानता और विधियों का समान संरक्षण
- अनुच्छेद 15(1): भेदभाव को प्रतिबंधित करता है, जिसे न्यायिक रूप से दिव्यांगजनों को शामिल करने के लिये विस्तारित किया गया है।
- अनुच्छेद 16(1): सार्वजनिक रोज़गार में अवसर की समानता
- अनुच्छेद 21: गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार (अभिगम्यता, स्वायत्तता और समावेशन का आधार)
- अनुच्छेद 38: यह राज्य को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय तथा जनता के कल्याण को बढ़ावा देने के लिये सामाजिक परिवर्तन में संलग्न होने का निर्देश देता है।
- अनुच्छेद 41 (DPSP): दिव्यांगजनों सहित कुछ कमज़ोर समूहों के लिये काम, शिक्षा और सार्वजनिक सहायता का अधिकार।
- विधिक ढाँचा
- दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016: इसे संयुक्त राष्ट्र दिव्यांगजनों के अधिकारों पर कन्वेंशन (जिसे भारत ने 2007 में अनुमोदित किया था) के अनुरूप बनाने के लिये अधिनियमित किया गया था।
- दिव्यांगता की श्रेणियों का दायरा 7 से बढ़ाकर 21 कर दिया गया है।
- गारंटी: समानता और गैर-भेदभाव, सरकारी रोज़गार में 4% आरक्षण, उच्च शिक्षा में 5% आरक्षण, परिवहन, सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी और भवनों में सुलभता।
- उल्लंघनों के लिये दंड का प्रावधान करता है।
- मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017: मानसिक बीमारी के प्रति अधिकार-आधारित दृष्टिकोण।
- भारतीय पुनर्वास परिषद अधिनियम, 1992: यह अधिनियम प्रशिक्षण पाठ्यक्रम को मानकीकृत करके, संस्थानों को मान्यता देकर, योग्य चिकित्सकों का एक केंद्रीय रजिस्टर बनाए रखकर तथा दिव्यांग पुनर्वास सेवाओं में अयोग्य अभ्यास को रोककर पुनर्वास पेशेवरों को विनियमित करता है।
- राष्ट्रीय न्यास अधिनियम, 1999: ऑटिज़्म, सेरेब्रल पाल्सी, बौद्धिक अक्षमता और बहु-अक्षमताओं से ग्रस्त दिव्यांगजनों का कल्याण है।
- दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 के कार्यान्वयन हेतु योजना (SIPDA): यह दिव्यांगजन सशक्तीकरण विभाग (DEPwD) का एक व्यापक कार्यक्रम है। यह केंद्रीय मंत्रालयों, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को दिव्यांगजन अधिकार सशक्तीकरण अधिनियम को लागू करने के लिये वित्तीय एवं तकनीकी सहायता प्रदान करता है। इसके अंतर्गत परियोजनाओं के माध्यम से दिव्यांगजन अधिकार सशक्तीकरण अधिनियम को कार्यान्वित किया जाता है, जो सुलभता, समावेशन, जागरूकता और कौशल विकास को बढ़ावा देती हैं।
- दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016: इसे संयुक्त राष्ट्र दिव्यांगजनों के अधिकारों पर कन्वेंशन (जिसे भारत ने 2007 में अनुमोदित किया था) के अनुरूप बनाने के लिये अधिनियमित किया गया था।
- संस्थागत ढाँचा
- केंद्रीय संस्थान
- दिव्यांगजन सशक्तीकरण विभाग (DEPwD): दिव्यांगजनों के लिये राष्ट्रीय नीतियाँ, योजनाएँ और कार्यक्रम तैयार करता है और विभिन्न मंत्रालयों में उनके कार्यान्वयन का समन्वय करता है।
- दिव्यांगजनों के लिये मुख्य आयुक्त (CCPD): कानूनों के कार्यान्वयन की निगरानी करके और अर्द्ध-न्यायिक शक्तियों के माध्यम से शिकायतों का समाधान करके दिव्यांगजन अधिकारों को लागू करता है।
- दिव्यांग संबंधी केंद्रीय सलाहकार बोर्ड: दिव्यांग नीति पर सरकार को सलाह देता है, अंतर-मंत्रालयी समन्वय सुनिश्चित करता है तथा समावेशन पर समग्र प्रगति की समीक्षा करता है।
- राज्य स्तरीय संस्थाएँ:
- राज्य स्तर पर दिव्यांगजनों के लिये आयुक्त: राज्य स्तर पर दिव्यांगजनों के अधिकारों की रक्षा करना, शिकायतों का निपटान करना तथा दिव्यांग कानूनों के प्रवर्तन की निगरानी करना।
- राज्य स्तरीय दिव्यांग सलाहकार बोर्ड: दिव्यांग संबंधी कार्यक्रमों की नीति निर्माण, योजना और निगरानी में राज्य सरकारों की सहायता करते हैं।
- ज़िला स्तरीय समितियाँ: ज़मीनी स्तर पर दिव्यांग योजनाओं को लागू करना, दिव्यांग प्रमाण पत्र जारी करना तथा स्थानीय सेवाओं और लाभों तक पहुँच को सुगम बनाना।
- केंद्रीय संस्थान
भारत में दिव्यांगजनों के कल्याण के लिये क्या-क्या उपाय किये गए हैं?
- सार्वभौमिक भौतिक पहुँच (सुगम्य भारत): भारत में सार्वजनिक अधोसंरचना का उच्च-तीव्रता वाला नवीनीकरण किया जा रहा है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि 'सार्वभौमिक डिज़ाइन' भविष्य की सभी शहरी एवं ग्रामीण विकास परियोजनाओं के लिये मानक बन जाए।
- एक्सेसिबल इंडिया कैंपेन के तहत, केंद्र सरकार की 1,030 से अधिक इमारतों का पूरी तरह से जीर्णोद्धार किया जा चुका है।
- इसे विशेष रूप से रेलवे और विमानन क्षेत्रों में 'एंड-टू-एंड' कनेक्टिविटी पर ध्यान केंद्रित करने के लिये भी पुनर्गठित किया जा रहा है।
- यह परिवर्तन केवल रैंप बनाने से हटकर सुलभ शौचालयों, स्पर्शनीय पथों और चलने-फिरने में सहायक लिफ्टों को सुनिश्चित करने की ओर है, जिससे सहायता प्राप्त आवागमन के बजाय गरिमापूर्ण स्वतंत्र यात्रा सुनिश्चित हो सके।
- एक्सेसिबल इंडिया कैंपेन के तहत, केंद्र सरकार की 1,030 से अधिक इमारतों का पूरी तरह से जीर्णोद्धार किया जा चुका है।
- उच्च-विकास क्षेत्रों के लिये लक्षित कौशल-विकास: सरकार ने सामान्य व्यावसायिक प्रशिक्षण से हटकर AI, AVGC (एनिमेशन, विज़ुअल इफेक्ट्स, गेमिंग और कॉमिक्स) एवं IT में उच्च मूल्य वाले कौशल पर ध्यान केंद्रित किया है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि दिव्यांग व्यक्ति उद्योग 4.0 में पीछे न रह जाएं।
- इस रणनीतिक परिवर्तन का उद्देश्य दिव्यांगजनों को निम्न-आय असंगठित कार्यों से औपचारिक, प्रक्रिया-आधारित गिग अर्थव्यवस्था के कार्यों की ओर स्थानांतरित करना है जहाँ दूरस्थ कार्य एक व्यवहार्य सुविधा हो सकता है।
- बजट 2026-27 में 200 करोड़ रुपये के आवंटन के साथ 'दिव्यांगजन कौशल योजना' शुरू की गई, जिसमें कार्य-उन्मुख और प्रक्रिया-संचालित भूमिकाएँ प्रदान की जाएंगी, जो दिव्यांगजनों के लिये उपयुक्त हैं।
- इससे प्रत्येक दिव्यांग समूह के लिये उद्योग से संबंधित और विशिष्ट रूप से तैयार किये गए प्रशिक्षण के माध्यम से सम्मानजनक आजीविका के अवसर सुनिश्चित होंगे।
- सहायक प्रौद्योगिकी विनिर्माण की दिशा में प्रयास: महंगे आयातित सहायक उपकरणों पर निर्भरता कम करने के लिये, 'मेक इन इंडिया' ढाँचे के तहत उच्च तकनीक वाले सहायक उपकरणों के घरेलू विनिर्माण पर अब ध्यान केंद्रित किया जा रहा है।
- इससे उन्नत कृत्रिम अंगों और श्रवण यंत्रों की लागत संबंधी बाधा कम हो जाती है, जिससे आवश्यक उपकरणों को किफायती बनाकर दिव्यांग जनों की रोज़गार क्षमता एवं गतिशीलता में सीधे तौर पर वृद्धि होती है।
- उदाहरण के लिये, वर्ष 2026-27 के बजट में 'दिव्यांगजन सहारा योजना' प्रारंभ की गयी है जिसके अंतर्गत AI-समेकित कृत्रिम अंग तथा ई-ब्रेल रीडर के उत्पादन का विस्तार किया जायेगा।
- उद्यमशीलता, आत्मनिर्भरता और ऋण तक पहुँच में सुधार: स्वरोज़गार को समर्थन देने के लिये वित्तीय समावेशन उपायों का सक्रिय रूप से विस्तार किया जा रहा है, यह मानते हुए कि औपचारिक कॉर्पोरेट भर्ती प्रायः पिछड़ जाती है।
- विशेष रूप से दिव्यांगजनों के लिये रियायती ऋण एवं सूक्ष्म वित्त प्रदान करके, राज्य 'दिव्यांग' उद्यमियों का एक वर्ग तैयार कर रहा है, जो अपने और दूसरों के लिये आजीविका उत्पन्न कर सकते हैं।
- दिव्यांगजन स्वावलंबन योजना के तहत, राष्ट्रीय दिव्यांगजन वित्त और विकास निगम (NDFDC) ने वर्ष 2024 की शुरुआत तक संचयी रूप से ₹1,330.22 करोड़ के ऋण वितरित किये थे, जो दिव्यांगजनों के बीच उद्यमिता एवं स्वरोज़गार के लिये वित्तीय सहायता के बढ़ते पैमाने को रेखांकित करता है।
- 'उचित समायोजन' का प्रवर्तन: सर्वोच्च न्यायालय ने गैर-भेदभाव से आगे बढ़कर शिक्षा और रोज़गार में सक्रिय 'उचित समायोजन' को मूल अधिकार के रूप में अनिवार्य कर दिया है, न कि दान के रूप में।
- इस न्यायिक परिवर्तन के तहत, यदि संस्थाएँ लेखकों या सुलभ अधोसंरचना जैसी सुविधाएँ देने से इनकार करती हैं, तो उन्हें 'अनुचित कठिनाई' सिद्ध करने का भार दिव्यांग जनों पर पड़ता है, न कि उन्हें इसकी मांग करने का।
- सर्वोच्च न्यायालय ने प्रज्ञा प्रसून बनाम भारत संघ के मामले में यह माना कि दिव्यांगजनों के लिये डिजिटल एक्सेस अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से उत्पन्न होती है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने गुलशन कुमार बनाम इंस्टीट्यूट ऑफ बैंकिंग पर्सनल सिलेक्शन (2025) मामले में घोषित किया कि किसी भी दिव्यांग व्यक्ति (PwD) को लेखक या क्षतिपूर्ति समय देने से इनकार करना दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत भेदभाव है।
- दिव्यांग प्रमाणन का मानकीकरण (UDID): दिव्यांग जनों के डेटा के विखंडन को प्रमाणन के अनिवार्य डिजिटलीकरण के माध्यम से हल किया जा रहा है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि लाभ राज्य की सीमाओं के पार ले जाए जा सकें।
- इससे दिव्यांगजनों को काम के लिये दूसरे राज्यों में जाने पर होने वाली प्रशासनिक प्रक्रिया संबंधी परेशानियों से मुक्ति मिलती है, और यह सुनिश्चित होता है कि उनके कल्याणकारी अधिकार (पेंशन, यात्रा रियायतें) बिना पुन: सत्यापन के राष्ट्रव्यापी स्तर पर मान्य रहें।
- उदाहरण के लिये, 2025 तक 1.25 करोड़ से अधिक UDID कार्ड तैयार किये जाएंगे, जिससे एक राष्ट्रीय डेटाबेस बनेगा।
- दिव्यांगजन कार्ड, जिसे ई-टिकटिंग फोटो पहचान पत्र (EPICS) के नाम से भी जाना जाता है, दिव्यांगजनों के लिये एक रेलवे पहचान पत्र है जो उन्हें ट्रेन यात्रा पर रियायतें प्राप्त करने की अनुमति देता है।
- डिजिटल एक्सेस इकोसिस्टम को बढ़ावा देना: यह मानते हुए कि डिजिटल बाधाएँ भौतिक बाधाओं जितनी ही अपवर्जनकारी होती हैं, सरकार सभी सार्वजनिक डिजिटल प्लेटफॉर्मों के लिये वेब एक्सेस मानकों (WCAG) को लागू कर रही है।
- यह 'डिजिटल फर्स्ट' दृष्टिकोण यह सुनिश्चित करता है कि बैंकिंग, KYC और शिकायत निवारण जैसी आवश्यक सेवाएँ दृष्टिबाधित एवं तंत्रिका संबंधी समस्याओं से ग्रस्त दिव्यांग जनों के लिये स्क्रीन रीडर तथा वॉयस कमांड के माध्यम से सुलभ हों।
- उदाहरण के लिये, डिजिटल रूप से समावेशी भारत के निर्माण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम उठाते हुए, दिव्यांगजन सशक्तीकरण विभाग (DEPwD) ने अंतर्राष्ट्रीय पर्पल फेस्ट- 2025 में सुगम्य भारत ऐप के संशोधित संस्करण को लॉन्च किया है।
- समावेशी शिक्षा संसाधन (ISL और ई-कंटेंट): श्रवण बाधित छात्रों के लिये अधिगम के अंतर को समाप्त करने के लिये, शैक्षणिक पाठ्यक्रम में भारतीय सांकेतिक भाषा (ISL) को मानकीकृत करने के लिये बड़े पैमाने पर प्रयास किये जा रहे हैं।
- ISL में अध्ययन सामग्री का एक डिजिटल स्टोरेज बनाकर, राज्य यह सुनिश्चित कर रहा है कि बधिर छात्रों को प्राथमिक एवं उच्च शिक्षण सामग्री तक समान अभिगम्यता प्राप्त हो, जिससे निरक्षरता का चक्र टूट सके।
- उदाहरण के लिये, ISL डिजिटल रिपॉज़िटरी में अब कक्षा 1-12 के पाठ्यक्रम को कवर करने वाले 3,189 ई-कंटेंट वीडियो उपलब्ध हैं।
- इसके अलावा, PM e-VIDYA DTH चैनल नंबर 31 को आधिकारिक तौर पर भारत के पहले 24/7 टेलीविज़न चैनल के रूप में लॉन्च किया गया, जो विशेष रूप से भारतीय सांकेतिक भाषा (ISL) को समर्पित है।
- सामाजिक सुरक्षा संजाल का विस्तार: यद्यपि रोज़गार सृजन लक्ष्य है, तथापि राज्य उन लोगों के लिये एक सुरक्षा संजाल की आवश्यकता को स्वीकार करता है जो गंभीर रूप से विकलांग हैं और काम करने में असमर्थ हैं।
- हालिया अपडेट में स्वास्थ्य बीमा और भरण-पोषण भत्तों के दायरे को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया गया है ताकि आधुनिक उपचारों और पुनर्वास लागतों को भी इसमें शामिल किया जा सके, जिन्हें पहले इसमें शामिल नहीं किया गया था।
- उदाहरण के लिये, निरामय स्वास्थ्य बीमा के तहत सेरेब्रल पाल्सी/ऑटिज़्म के लिये कवरेज बढ़ाकर ₹1 लाख कर दिया गया है।
- मानसिक स्वास्थ्य और मनो-सामाजिक सहायता: सरकार ने दिव्यांगजनों के बीच आइसोलेशन की 'अदृश्य महामारी' से निपटने के लिये राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य ढाँचे में दिव्यांगता-विशिष्ट इंटरफेस को एकीकृत किया है।
- स्क्रीन-रीडर संगतता और उच्च-कंट्रास्ट UI के साथ टेली-MANAS ऐप के सुलभ संस्करण लॉन्च करके, राज्य यह सुनिश्चित कर रहा है कि मानसिक स्वास्थ्य परामर्श केवल सक्षम लोगों के लिये आरक्षित विशेषाधिकार नहीं बल्कि एक सार्वभौमिक डिजिटल अधिकार है।
- टेली-मानस 2.0 में अब 'अस्मी' चैटबॉट शामिल है, जो उपयोगकर्त्ताओं को ऐप के साथ जुड़ने एवं मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित जानकारी या सहायता प्राप्त करने की अनुमति देता है।
- राजनीतिक भागीदारी और चुनावी सुधार: भारत के चुनाव आयोग (ECI) ने 'घर से मतदान' (VfH) को न केवल एक विकल्प के रूप में बल्कि 40% से अधिक दिव्यांग जनों के लिये एक मानक प्रोटोकॉल के रूप में संस्थागत रूप दिया है, जिससे मतदान का प्रतिमान मौलिक रूप से 'मतदान बूथ तक पहुँच' से 'घर के दरवाज़े पर मताधिकार' में बदल गया है।
- इससे यह सुनिश्चित होता है कि आवागमन संबंधी बाधाओं और सुलभ परिवहन की कमी के कारण दिव्यांग मतदाताओं को मताधिकार से वंचित न किया जाए।
- विकसित होते पैरा-एथलीट पारिस्थितिकी तंत्र: दिखावे से आगे बढ़ते हुए, 'खेलो भारत नीति 2025' पैरा-खेलों को एक उच्च-प्रदर्शन वाले कॅरियर मार्ग के रूप में देखती है।
- इसका मुख्य उद्देश्य एक 'प्रतिभा प्रवाह प्रणाली' का निर्माण करना है जहाँ पैरा-एथलीटों को वित्तपोषण, प्रशिक्षण सुविधाओं और नकद पुरस्कारों में समानता मिले, जिससे खेल आर्थिक गतिशीलता एवं सामाजिक प्रतिष्ठा का एक व्यवहार्य मार्ग बन सके।
- पेरिस पैरालंपिक में उत्कृष्ट प्रदर्शन के पश्चात लॉस एंजेलिस- 2028 साइकल के लिये टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (TOPS) कोर ग्रुप में 52 पैरा-एथलीट सम्मिलित किये गये हैं।
भारत में दिव्यांगजनों के कल्याण से जुड़े प्रमुख मुद्दे क्या हैं?
- 'सांख्यिकीय अदृश्यता' और प्रमाणीकरण जाल: जनगणना के आँकड़ों और विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुमानों के बीच अत्यधिक अंतर एक 'नीतिगत अंधकार' उत्पन्न करता है, जिससे बजट आवंटन कृत्रिम रूप से बाधित होता है।
- इसके अतिरिक्त, UDID कार्ड प्रणाली की नौकरशाही कठोरता उन व्यक्तियों को बहिष्कृत करती है जिनकी विकलांगता गतिशील या अदृश्य है (जैसे रक्त संबंधी विकार), जिससे वे प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) तक पहुँच नहीं पा रहे हैं।
- वर्ष 2025 तक, EnAble India जैसी संस्थाओं की रिपोर्ट के अनुसार, दिव्यांगजनों की जनसंख्या 300 मिलियन तक हो सकती है।
- राष्ट्रीय विकलांग रोज़गार संवर्द्धन केंद्र (NCPEDP) द्वारा वर्ष 2025 में किये गए एक राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण में पाया गया कि दिव्यांग आवेदकों में से 53% लाभ के लिये अस्वीकृत हो जाते हैं, प्रायः कठोर चिकित्सीय सत्यापन के कारण।
- अवसंरचना में 'रेट्रोफिट टोकनिज़्म': एक्सेसिबल इंडिया कैंपेन (AIC) काफी हद तक 'अनुपालन टोकनिज़्म' से ग्रस्त है, जहाँ रैंप खतरनाक कोणों पर या बिना हैंडरेल के केवल औपचारिकता पूरी करने के लिये बनाए जाते हैं।
- यह आंशिक पहुँच न्यायालयों द्वारा अनिवार्य 'एंड-टू-एंड' उपयोगिता परीक्षण में विफल हो जाती है, जिससे अंतिम-मील कनेक्टिविटी (फुटपाथ/शौचालय) पूरी तरह से अनुपयुक्त हो जाती है।
- उदाहरण के लिये हाल ही में CAG रिपोर्ट ने सुलभ भारत अभियान के कार्यान्वयन में केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (CPWD) की गंभीर कमियों को उजागर किया है, जिसमें यह बताया गया है कि दिव्यांगजनों के लिये पुनर्निर्मित 170 पुरानी सरकारी इमारतों में से केवल 34 में ही पूर्व-पहुँच ऑडिट किये गए थे।
- ई-गवर्नेंस में 'डिजिटल रंगभेद': जैसे-जैसे कल्याणकारी योजनाओं का वितरण 'डिजिटल-फर्स्ट' की ओर बढ़ रहा है, एक नई अपवर्जन बाधा उभर कर सामने आई है, जहाँ महत्त्वपूर्ण ऐप्स (फिनटेक, स्वास्थ्य) WCAG मानकों का उल्लंघन करते हैं।
- विज़ुअल कैप्चा, स्क्रीन-रीडर संगतता की कमी और जटिल यूआई प्रभावी रूप से दिव्यांग जनों को आवश्यक डिजिटल सार्वजनिक वस्तुओं के स्वायत्त उपयोग से वंचित कर देते हैं।
- उदाहरण के लिये, दिसंबर 2024 तक, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा सामग्री प्रबंधन ढाँचे के तहत केवल 95 केंद्रीय सरकारी वेबसाइटों को ही सुलभ बनाया गया है, जिससे सार्वजनिक डिजिटल प्लेटफार्मों का एक विशाल बहुमत दिव्यांगजनों के लिये दुर्गम रह गया है।
- विज़ुअल कैप्चा, स्क्रीन-रीडर संगतता की कमी और जटिल यूआई प्रभावी रूप से दिव्यांग जनों को आवश्यक डिजिटल सार्वजनिक वस्तुओं के स्वायत्त उपयोग से वंचित कर देते हैं।
- आर्थिक बहिष्कार और 'आरक्षण का भ्रम': 4% वैधानिक आरक्षण के बावजूद, एक अनुपालन का भ्रम विद्यमान है, जहाँ आधुनिक सहायक तकनीक की अनदेखी करने वाले कठोर रोज़गार पहचान मानदंड रिक्तियों को निष्प्रभावी कर देते हैं।
- निजी क्षेत्र की भर्ती अधिकतर कम महत्त्व वाली CSR भूमिकाओं तक सीमित रहती है, जिससे दिव्यांग जनों का वास्तविक करियर विकास प्रभावित होता है और वे गरीबी चक्र में फँस जाते हैं।
- मार्चिंग शीप PWD इन्क्लूजन इंडेक्स 2025 के अनुसार, सर्वेक्षण किये गए 876 संगठनों में दिव्यांगजनों का कार्यबल में प्रतिनिधित्व 1% से भी कम है। 37.9% संगठनों में कोई स्थायी दिव्यांग कर्मचारी नहीं है।
- शैक्षिक अलगाव और संसाधन की कमी: 'समावेशी शिक्षा' काफी हद तक सैद्धांतिक बनी हुई है क्योंकि स्कूल बिना शिक्षण अनुकूलन के दिव्यांगों को दाखिला देते हैं, जिससे कक्षाओं में अलगाव उत्पन्न होता है।
- ग्रामीण क्षेत्रों में RCI-पंजीकृत विशेष शिक्षक और ISL प्रशिक्षित शिक्षक की कमी के कारण न्यूरोडाइवर्जेंट बच्चों में उच्च ड्रॉपआउट दर देखी जाती है।
- अंतर्संबंधीयता और महिलाओं पर 'दोहरा बोझ': नीतिगत ढाँचे लिंग भेदभाव प्रदर्शित करते हैं, जो दोहरे भेदभाव झेलने वाली दिव्यांग महिलाओं की विशिष्ट प्रजनन और सुरक्षा आवश्यकताओं को संबोधित नहीं करते।
- राज्य आश्रय गृहों में आंतरिक निगरानी की कमी के कारण दुर्व्यवहार और जबरन चिकित्सा हस्तक्षेप (जैसे गर्भाशय निष्कासन) की घटनाएँ अधिक होती हैं।
- भारत में 11.8 मिलियन विकलांग महिलाएँ और लड़कियाँ कई कमज़ोरियों का सामना करती हैं। UNFPA के अनुसार, उनके साथ हिंसा की संभावना गैर-दिव्यांग समकक्षों की तुलना में 10 गुना अधिक है।
- राज्य आश्रय गृहों में आंतरिक निगरानी की कमी के कारण दुर्व्यवहार और जबरन चिकित्सा हस्तक्षेप (जैसे गर्भाशय निष्कासन) की घटनाएँ अधिक होती हैं।
- राजकोषीय संसाधनों का कम उपयोग और प्रशासनिक सुस्ती: दिव्यांगजनों के कल्याण के लिये आवंटित धनराशि जटिल वितरण तंत्र और राज्य स्तर पर सक्रियता की कमी के कारण बिना खर्च किये ही समाप्त हो जाती है, जिससे 'उपयोग घाटा' की समस्या बनी रहती है।
- छात्रवृत्ति और सहायता (ADIP) योजनाओं में प्रक्रियात्मक अड़चनें होती हैं, जिसका अर्थ है कि वित्तीय सहायता प्रायः प्रभावी होने के लिये बहुत देर से पहुँचती है।
- सामाजिक न्याय और सशक्तीकरण पर स्थायी समिति की छठी रिपोर्ट ( जो 2025 में प्रस्तुत की गई थी) में यह उल्लेख किया गया था कि DEPWD के लिये व्यय लगातार 'कमी' की स्थिति में रहा है।
- 'देखभालकर्त्ता संकट” और संरक्षकता का अभाव: भारतीय कानून में बौद्धिक अक्षमता वाले व्यक्तियों के लिये सहज समर्थित निर्णय लेने का ढाँचा अनुपस्थित है, जिससे परिवारों को महंगे और पुरातन संरक्षकता मुकदमों में उलझना पड़ता है और दिव्यांग व्यक्ति की कानूनी स्वायत्तता छिन जाती है।
- राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य आयोग (NHRC) की रिपोर्ट में पाया गया कि ठीक होने के बावजूद कई मरीजों को सरकारी मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों में अवैध रूप से रखा गया।
- जलवायु संबंधी भेद्यता और आपदा असमानता: भारत में बढ़ते जलवायु संकट (गर्मी की लहर, बाढ़) से दिव्यांगजन असमान रूप से प्रभावित होते हैं। वर्तमान आपदा प्रबंधन प्रोटोकॉल दिव्यांगता-अनुकूल नहीं हैं, जिनमें सुलभ प्रारंभिक चेतावनी और निकासी सहायता का अभाव है।
- चरम घटनाओं के दौरान, दिव्यांगजन 'जीवन रक्षा दंड' झेलते हैं क्योंकि राहत केंद्रों में अक्सर स्पर्शनीय मार्ग, सुलभ शौचालय या पुरानी बीमारियों के लिये चिकित्सा सहायता उपलब्ध नहीं होती, जिससे वे सबसे पीछे रह जाते हैं।
- ग्रामीण-शहरी 'पुनर्वास विभाजन': जहाँ शहरी केंद्रों में उच्च तकनीक वाले कृत्रिम कृत्रिम अंगों की संख्या में वृद्धि देखी जा रही है, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में दिव्यांग व्यक्ति 'थेरैप्यूटिक डेजर्ट' में फँसे हुए हैं, जहाँ बुनियादी फिजियोथेरेपी या वाक् चिकित्सा के लिये भी सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है।
- यह भौगोलिक असमानता एक दोहरे स्तर की नागरिकता का निर्माण करती है जहाँ दिव्यांगजनों के जीवन की गुणवत्ता उनकी क्षमता के बजाय उनके पिन कोड द्वारा निर्धारित होती है, जिससे स्थायी, रोकी जा सकने वाली द्वितीयक दिव्यांगताएँ उत्पन्न होती हैं।
- कई ग्रामीण ज़िलों में, दिव्यांगजनों को बुनियादी फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी या सहायक उपकरण फिटिंग के लिये ज़िला या राज्य मुख्यालय की यात्रा करनी पड़ती है, क्योंकि महानगरों के विपरीत जहाँ उन्नत पुनर्वास केंद्र केंद्रित हैं, ब्लॉक या प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल स्तर पर ऐसी सेवाएँ बड़े पैमाने पर अनुपलब्ध हैं।
- यह भौगोलिक असमानता एक दोहरे स्तर की नागरिकता का निर्माण करती है जहाँ दिव्यांगजनों के जीवन की गुणवत्ता उनकी क्षमता के बजाय उनके पिन कोड द्वारा निर्धारित होती है, जिससे स्थायी, रोकी जा सकने वाली द्वितीयक दिव्यांगताएँ उत्पन्न होती हैं।
भारत में दिव्यांगजनों को सशक्त बनाने हेतु किन उपायों की आवश्यकता है?
- स्मार्ट गवर्नेंस के माध्यम से ‘एक्सेसिबिलिटी ऑडिट’ अनुपालन का संस्थानीकरण: RPWD अधिनियम, 2016 के प्रावधानों और ज़मीनी वास्तविकताओं के मध्य विद्यमान अंतर को कम करने के लिये भारत को स्वैच्छिक अनुपालन से आगे बढ़कर एल्गोरिथ्मिक प्रवर्तन की दिशा में अग्रसर होना होगा।
- नगर निकायों को डिजिटल भवन योजना अनुमोदन प्रणालियों (OBPS) में अनिवार्य पहुँच-संबंधी ऑडिट को समेकित करना चाहिये, ताकि AI-आधारित परीक्षण स्वचालित रूप से उन योजनाओं को निरस्त कर दे जिनमें रैंप, स्पर्शनीय पथ अथवा सुलभ शौचालय का प्रावधान नहीं है, इससे पूर्व कि वे मानवीय परीक्षण के चरण में पहुँचें।
- निर्माण के बाद जियोटैग्ड मोबाइल ऐप आधारित क्राउडसोर्स ऑडिट व्यवस्था नागरिकों को गैर-अनुपालन की सूचना देने में सक्षम बना सकती है, जिसके आधार पर संपत्ति स्वामियों को स्वचालित नोटिस निर्गत किये जा सकें।
- इस प्रक्रिया से एक पारदर्शी डिजिटल अभिलेख निर्मित होगा, जो नौकरशाही विवेकाधिकार को सीमित करेगा और यह सुनिश्चित करेगा कि सार्वभौमिक डिज़ाइन शहरी विकास की अनिवार्य शर्त बने, न कि पश्चवर्ती औपचारिकता।
- ग्रामीण स्वास्थ्य में विकेंद्रीकृत ‘चिकित्सीय समुदाय’ मॉडल: भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में दिव्यांगजनों के लिये स्वास्थ्य सेवाएँ प्रायः केंद्रीकृत तथा दुर्गम बनी हुई हैं।
- इसका समाधान CBR 2.0 (सामुदायिक आधारित पुनर्वास) की अवधारणा में निहित है। इसके अंतर्गत विद्यमान आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्त्ताओं के नेटवर्क को ‘दिव्यांग मित्र’ कैडर के रूप में उन्नत किया जाना चाहिये, जिन्हें प्रारंभिक पहचान, मूलभूत उपचार (फिजियोथेरेपी/वाक् चिकित्सा) तथा UDID (अद्वितीय दिव्यांग ID) प्रणाली के उपयोग में विशेष प्रशिक्षण प्रदान किया जाए।
- ग्राम पंचायत स्तर पर ज़िला अस्पतालों से संबद्ध टेली-पुनर्वास केंद्रों की स्थापना कर देखभाल को संस्थागत परिसरों से बाहर लाया जा सकता है, जिससे यह सुलभ, वहनीय और सांस्कृतिक रूप से समन्वित हो सके।
- इस प्रकार, हस्तक्षेप का केंद्र चिकित्सीय मॉडल से स्थानांतरित होकर लाभार्थी के सामाजिक परिवेश में दैनिक जीवन को सक्षम बनाने के सामाजिक मॉडल की ओर उन्मुख होगा।
- न्यूरोडायवर्सिटी के अनुकूल निजी क्षेत्र में रोज़गार को प्रोत्साहन: भारत की कॉर्पोरेट कंपनियों को प्रतीकात्मक भर्तियों से आगे बढ़कर एक न्यूरो-समावेशी पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना होगा।
- इसके लिये सरकार को कार्बन क्रेडिट की भाँति एक ‘डाइवर्सिटी क्रेडिट’ व्यवस्था लागू करनी चाहिये, जिसके अंतर्गत केवल भर्ती संख्या ही नहीं, बल्कि दिव्यांगजनों की प्रतिधारण दर तथा करियर उन्नयन का भी ऑडिट किया जाए।
- व्यावहारिक स्तर पर, उचित आवास (Reasonable Accommodation) हेतु किये गए निवेश—जैसे स्क्रीन रीडर, सांकेतिक भाषा दुभाषिये और एर्गोनोमिक वर्कस्टेशन पर कर प्रोत्साहन प्रदान किया जा सकता है।
- साथ ही, दिव्यांग जनों के विशिष्ट कौशल (उदाहरणतः डेटा एनालिटिक्स में ऑटिज़्म से जुड़ी पैटर्न पहचान क्षमता) को उद्योग की आवश्यकताओं से जोड़ने वाले जॉब-मैचिंग कंसोर्टिया की स्थापना से दान-आधारित दृष्टिकोण के स्थान पर मूल्य-संचालित व्यवसाय मॉडल को बल मिलेगा।
- सहायक प्रौद्योगिकी (AT) प्रयोगशालाओं के साथ ‘फिजीटल’ शिक्षा: समावेशी शिक्षा की प्रभावशीलता तब घट जाती है जब शिक्षक अत्यधिक कार्यभार से दबे होते हैं; इसका समाधान एक 'फिजीटल' (भौतिक + डिजिटल) हाइब्रिड सहायता प्रणाली में निहित है।
- प्रत्येक स्कूल समूह (जिसमें 10-15 स्कूल शामिल हैं) को CSR तथा सरकारी अनुदानों से वित्तपोषित एक साझा AT प्रयोगशाला से सुसज्जित किया जाना चाहिये, जिसमें रिफ्रेशेबल ब्रेल डिस्प्ले, संवर्धित संचार उपकरण और संवेदी कॉर्नर उपलब्ध हों।
- साथ ही, राज्यों को B.Ed. पाठ्यक्रम में एक अनिवार्य ‘सह-शिक्षण मॉड्यूल’ सम्मिलित करना चाहिये, जिसके माध्यम से सामान्य शिक्षक विशेष शिक्षकों के साथ मिलकर कक्षा संचालन का प्रशिक्षण प्राप्त करें।
- इस व्यवस्था से समावेशन को न केवल अवसंरचना बल्कि शिक्षण-पद्धतियों का भी समर्थन मिलेगा और यह सुनिश्चित होगा कि दिव्यांग विद्यार्थी मुख्यधारा की कक्षाओं में ‘अदृश्य’ न रह जाएँ।
- प्रत्येक स्कूल समूह (जिसमें 10-15 स्कूल शामिल हैं) को CSR तथा सरकारी अनुदानों से वित्तपोषित एक साझा AT प्रयोगशाला से सुसज्जित किया जाना चाहिये, जिसमें रिफ्रेशेबल ब्रेल डिस्प्ले, संवर्धित संचार उपकरण और संवेदी कॉर्नर उपलब्ध हों।
- अनुकूलित खेलों' को मुख्यधारा में लाना: खेल मनोवैज्ञानिक सशक्तीकरण और सामाजिक सामंजस्य का एक प्रभावी किंतु अब तक अल्प-उपयोगित साधन है।
- अतः सभी खेलो इंडिया केंद्रों तथा सार्वजनिक उद्यानों में अनुकूलित खेल अवसंरचना (जैसे, व्हीलचेयर बास्केटबॉल कोर्ट और संवेदी-अनुकूल स्विमिंग पूल) को अनिवार्य रूप से सम्मिलित किया जाना चाहिये।
- ‘समानांतर आयोजन’ नीति के कठोर अनुपालन के माध्यम से, जिसके अंतर्गत ज़िला एवं राज्य स्तरीय खेल प्रतियोगिताओं में दिव्यांगजनों के लिये समवर्ती स्पर्द्धाएँ आयोजित हों, दिव्यांग जनों की सार्वजनिक दृश्यता और स्वीकृति को सुदृढ़ किया जा सकता है।
- इस प्रक्रिया से दृष्टिकोण ‘सहानुभूति’ से हटकर ‘खेल उत्कृष्टता’ की ओर उन्मुख होगा, जिससे सामुदायिक गौरव को प्रोत्साहन मिलेगा तथा दिव्यांग आबादी के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में उल्लेखनीय सुधार संभव होगा।
- 'दिव्यांग-समावेशी आपदा जोखिम न्यूनीकरण' (DiDRR) को अनिवार्य बनाना: जलवायु संबंधी घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति के साथ, भारत को राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ढाँचे के भीतर विशेष रूप से दिव्यांगजनों के लिये एक 'सुरक्षा शृंखला' प्रोटोकॉल को एकीकृत करना चाहिये।
- इसमें वार्ड स्तर पर दिव्यांग जनों की भौगोलिक रूप से टैग की गई रजिस्ट्रियाँ बनाना शामिल है ताकि उनकी निकासी को प्राथमिकता दी जा सके और यह सुनिश्चित किया जा सके कि राहत शिविरों की पहुँच और स्वच्छता के लिये पूर्व-ऑडिट किया जाए।
- इसके अलावा, संकट के दौरान किसी भी वर्ग के लोगों को अनभिज्ञ न रहने देने के लिये, प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को 'मल्टी-मोडल कम्युनिकेशन' मानकों के अनुरूप उन्नत किया जाना चाहिये, जो कंपन, सांकेतिक भाषा प्रसारण और सरलीकृत ऑडियो के माध्यम से अलर्ट प्रदान करें। इससे आपदा प्रतिक्रिया सामान्य प्रणाली से हटकर लक्षित, जीवनरक्षक तंत्र में परिवर्तित होती है।
- इसमें वार्ड स्तर पर दिव्यांग जनों की भौगोलिक रूप से टैग की गई रजिस्ट्रियाँ बनाना शामिल है ताकि उनकी निकासी को प्राथमिकता दी जा सके और यह सुनिश्चित किया जा सके कि राहत शिविरों की पहुँच और स्वच्छता के लिये पूर्व-ऑडिट किया जाए।
- वित्तीय समावेशन में "समान आँकिक निष्पक्षता" लागू करना: जहाँ बीमा कंपनियाँ कवरेज से वंचित करती हैं या अत्यधिक प्रीमियम वसूलती हैं, उस वित्तीय बहिष्कार से निपटने के लिये IRDAI को प्रीमियम की सीमा निर्धारित करते हुए "मानकीकृत दिव्यांग बीमा उत्पाद" अनिवार्य करना चाहिये, जैसा कि मानक आरोग्य संजीवनी पॉलिसियों में होता है।
- साथ ही, बैंकों को "बायोमेट्रिक छूट प्रोटोकॉल" लागू करना चाहिये, विशेष रूप से उन व्यक्तियों के लिये जिनकी ऊपरी अंग में विकलांगता है या जिनकी उंगलियों के निशान क्षतिग्रस्त हैं, ताकि कठोर प्रमाणीकरण की बजाय वॉइस या आइरिस पहचान के विकल्प उपलब्ध हों।
- इससे “विकलांगता की लागत” एक सहायक वित्तीय पारिस्थितिकी तंत्र द्वारा कम की जाती है, जो आर्थिक गरिमा और तरलता सुनिश्चित करता है, निर्भरता नहीं।
- साथ ही, बैंकों को "बायोमेट्रिक छूट प्रोटोकॉल" लागू करना चाहिये, विशेष रूप से उन व्यक्तियों के लिये जिनकी ऊपरी अंग में विकलांगता है या जिनकी उंगलियों के निशान क्षतिग्रस्त हैं, ताकि कठोर प्रमाणीकरण की बजाय वॉइस या आइरिस पहचान के विकल्प उपलब्ध हों।
- सार्वजनिक क्रय शक्ति' का लाभ उठाना: वस्तुओं और सेवाओं का सबसे बड़ा उपभोक्ता होने के नाते, सरकार को सभी सार्वजनिक निविदाओं, विशेषकर IT, परिवहन और अधोसंरचना के लिये सुलभ खरीद दिशानिर्देश लागू करने चाहिये।
- यदि राज्य ऐसे सॉफ्टवेयर, वेबसाइटों या कार्यालय उपकरणों को खरीदने से इनकार करता है जो यूनिवर्सल डिज़ाइन के अनुरूप नहीं हैं, तो यह निर्माताओं को अपनी उत्पादन लाइनों में बदलाव करने के लिये मजबूर करता है, जिससे सभी के लिये सुलभ प्रौद्योगिकी की लागत कम हो जाती है।
- यह रणनीति सुलभ वस्तुओं के लिये एक मुख्यधारा का बाज़ार बनाने के लिये 'राज्य क्रय क्षमता' का उपयोग करती है, जिससे वे विशिष्ट, महंगी विलासिता की वस्तुओं से वहनीय, मानक वस्तुओं में परिवर्तित हो जाती हैं।
निष्कर्ष:
भारत की दिव्यांगता नीति अब एक निर्णायक मोड़ पर है, जो पारंपरिक कल्याणकारी दृष्टिकोण से कार्यबल समावेशन की ओर संक्रमण दर्शाती है। तथापि, यदि रोज़गार सुलभ सार्वजनिक अवसंरचना और समावेशी परिवेश के बिना प्रदान किया जाए, तो यह केवल सीमित आर्थिक सशक्तीकरण तक ही संकुचित रह सकता है। वास्तविक समावेशन सुनिश्चित करने के लिये सार्वभौमिक संरचना के अनुरूप अधोसंरचना, शासन तंत्र और सामाजिक दृष्टिकोणों को पुनर्परिभाषित करना आवश्यक है। सार्वजनिक स्थान, डिजिटल प्रणालियाँ और संस्थान दिव्यांगता के अनुकूल होने पर ही विकास गरिमापूर्ण परिणाम दे पाएगा।
|
दृष्टि मेन्स प्रश्न बजट 2026 किस प्रकार दिव्यांग जनों के प्रति कल्याण-आधारित दृष्टिकोण से अधिकार-आधारित दृष्टिकोण की ओर परिवर्तन को दर्शाता है, इसका आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिये औत उन संरचनात्मक तथा नीतिगत कमियाँ की पहचान कीजिये, जो अभी भी विद्यमान हैं। |
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1. बजट 2026 में दिव्यांगजनों के संबंध में प्रमुख परिवर्तन क्या है?
कल्याण-आधारित दृष्टिकोण से आर्थिक सहभागिता-आधारित दृष्टिकोण की ओर संक्रमण।
प्रश्न 2. भारत में दिव्यांग अधिकारों को नियंत्रित करने वाला अधिनियम कौन-सा है?
दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016
प्रश्न 3. 'उचित समायोजन' क्या है?
दिव्यांगजनों की समान भागीदारी सुनिश्चित करने के लिये आवश्यक समायोजन।
प्रश्न 4. UDID का उपयोग किस लिये किया जाता है?
अखिल भारतीय डिजिटल दिव्यांग प्रमाणन के लिये।
प्रश्न 5. वर्तमान नीति की सबसे बड़ी कमी क्या है?
सार्वजनिक स्थलों और अवसंरचना में अपर्याप्त सुगम्यता।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ)
प्रिलिम्स:
प्रश्न. भारत लाखों दिव्यांग जनों का घर है। कानून के अंतर्गत उन्हें क्या लाभ उपलब्ध हैं? (2011)
- सरकारी स्कूलों में 18 साल की उम्र तक मुफ्त स्कूली शिक्षा।
- व्यवसाय स्थापित करने के लिये भूमि का अधिमान्य आवंटन।
- सार्वजनिक भवनों में रैंप।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (d)