रिमोट सेंसिंग और भारत का IRS कार्यक्रम | 09 Jan 2026

प्रिलिम्स के लिये: रिमोट सेंसिंग, सिंथेटिक एपर्चर रडार, सामान्य अंतर-वनस्पति सूचकांक, हाइपरस्पेक्ट्रल सेंसर, युक्तधारा जियोपोर्टल

मेन्स के लिये: स्थायी प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन में रिमोट सेंसिंग की भूमिका, भारतीय रिमोट सेंसिंग (IRS) कार्यक्रम, कृषि, जल और वानिकी में उपग्रह प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग

स्रोत: द हिंदू 

चर्चा में क्यों? 

रिमोट सेंसिंग महत्त्वपूर्ण हो रही है क्योंकि यह वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं को अंतरिक्ष से पृथ्वी के मूल्यवान प्राकृतिक संसाधनों का मानचित्रण, निगरानी और प्रबंधन करने में सक्षम बनाती है, जो वनों, जल, खनिजों और ऊर्जा संसाधनों में तीव्र, लागत-प्रभावी और पर्यावरणीय रूप से स्थायी अंतर्दृष्टि प्रदान करती है।

रिमोट सेंसिंग क्या है?

  • परिचय: रिमोट सेंसिंग उपग्रहों और ड्रोन का उपयोग करके अंतरिक्ष या वायु से पृथ्वी का अवलोकन और विश्लेषण करने का विज्ञान है, जो परावर्तित या उत्सर्जित विद्युत चुंबकीय विकिरण का पता लगाते हैं।
    • चूँकि विभिन्न पदार्थ ऊर्जा को अलग-अलग तरह से परावर्तित करते हैं, प्रत्येक वस्तु का एक अद्वितीय वर्णक्रम होता है, जो वैज्ञानिकों को बगैर प्रत्यक्ष रूप से भौतिक संपर्क के वनस्पति, जल, खनिज, चट्टानों और मृदा को पहचानने की अनुमति देता है।

रिमोट सेंसिंग के अनुप्रयोग

  • वनस्पति, फसलें और वन: स्वस्थ पौधे क्लोरोफिल के कारण लाल प्रकाश को अवशोषित करते हैं और निकट-अवरक्त (near-infrared) प्रकाश को परावर्तित करते हैं।
    • इस गुण का उपयोग करते हुए उपग्रह फसल स्वास्थ्य, तनाव और रोग का आकलन करने के लिये सामान्य अंतर-वनस्पति सूचकांक (NDVI) की गणना करते हैं।
      • NDVI परावर्तित निकट-अवरक्त प्रकाश और अवशोषित लाल प्रकाश की तुलना करके वनस्पति स्वास्थ्य को मापता है। उच्च मूल्य स्वस्थ वनस्पति का संकेत देते हैं, जबकि तनाव या विरल आवरण दर्शाते हैं।
    • वर्णक्रम विश्लेषण वनों में वृक्ष प्रजातियों और पादप समुदायों को अलग करने में मदद करता है।
    • वन मानचित्रण जैव द्रव्यमान और कार्बन भंडारण के अनुमान को सक्षम बनाता है, जो जलवायु परिवर्तन शमन के लिये महत्त्वपूर्ण है।
  • सतही जल मानचित्रण और बाढ़ निगरानी: अंतरिक्ष से जल निकायों का मानचित्रण करने के लिये वैज्ञानिक प्रकाशिक सूचकांक और सिंथेटिक एपर्चर रडार (SAR) का उपयोग करते हैं।
    • प्रकाशिक संवेदक सामान्य अंतर-जल सूचकांक (NDWI) का उपयोग करके जल का पता लगाते हैं, जो परावर्तित सूर्य के प्रकाश पर आधारित है।  
      • यह विधि इस तथ्य पर निर्भर करती है कि जल दृश्यमान हरित प्रकाश को परावर्तित करता है लेकिन निकट-अवरक्त और लघु-तरंग अवरक्त विकिरण को दृढ़ता से अवशोषित करता है, जो NDWI से जल निकायों को भूपृष्ठ से अलग करने की अनुमति देता है।
      • संशोधित NDWI (MNDWI) इमारतों की छाया से जल को अलग करके शहरी क्षेत्रों में जल का पता लगाने में सुधार करता है।
    • चूँकि प्रकाशिक संवेदक रात में या बादलों के माध्यम से कार्य नहीं कर सकते, SAR, जो सक्रिय रेडियो तरंगों का उपयोग करता है, का उपयोग चक्रवातों और भारी वर्षा के दौरान बाढ़ का मानचित्रण करने के लिये किया जाता है, जिसमें शांत जल रडार की छवियों में गहराई में दिखाई देता है।
      • SAR-आधारित बाढ़ संबंधी मानचित्र बाढ़, सूखा, चक्रवात और भूस्खलन के लिये प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों का समर्थन करते हैं और सरकारों को निकासी, राहत रसद और बीमा भुगतान की योजना बनाने में मदद करते हैं।
      • उपग्रह तलछट, प्रदूषण और शैवाल प्रस्फुटन के कारण परावर्तन में अंतर का पता लगाकर जल की गुणवत्ता का भी आकलन करते हैं।
  • खनिज अन्वेषण: हाइपरस्पेक्ट्रल सेंसर सूर्य के प्रकाश को सैकड़ों संकीर्ण तरंगदैर्घ्य में विभाजित करते हैं, जिससे प्रत्येक पिक्सेल के लिये एक वर्णक्रम उत्पन्न होता है।
    • यह तांबा, सोना, लिथियम, चूना पत्थर और ग्रेनाइट जैसे विशिष्ट खनिजों की पहचान की अनुमति देता है।
    • उपग्रह परिवर्तन क्षेत्रों का मानचित्रण करते हैं, जहाँ भूमिगत ऊष्मा और तरल पदार्थ सतही चट्टानों को संशोधित करते हैं, जिससे खनिज अन्वेषण में सहायता मिलती है।
  • तेल और गैस अन्वेषण: हाइड्रोकार्बन सूक्ष्म-स्रोत के माध्यम से ऊपर की ओर लीक हो सकते हैं, जहाँ छोटे हाइड्रोकार्बनों का रिसाव मृदा संबंधी रसायन विज्ञान और वनस्पति स्वास्थ्य को सूक्ष्मता से परिवर्तित करते हैं, जिससे संभावित भूमिगत भंडार वाले क्षेत्रों की पहचान करने में मदद मिलती है, जिनका पता उपग्रह लगा सकते हैं।
    • जब सूक्ष्म-स्रोत अनुपस्थित होता है, तो उपग्रह सीधे तेल का पता नहीं लगा सकते, इसलिये वे उन भूवैज्ञानिक संरचनाओं की पहचान पर ध्यान केंद्रित करते हैं जहाँ तेल के अधिक होने की संभावना होती हैं, जैसे– एंटीक्लाइन और तलछटी बेसिन
      • पृष्ठीय चट्टान गुरुत्वीय और चुंबकीय आँकड़ों का उपयोग करके उपग्रह मोटी अवसादी परतों तथा भूमिगत संरचनाओं का मानचित्रण करते हैं, जो तेल और गैस के भंडारण में सक्षम क्षेत्रों का संकेत देती हैं, न कि उनकी उपस्थिति का।
      • इसका उपयोग प्रवाल विरंजन, मैंग्रोव, तटरेखा क्षरण और तेल रिसाव की निगरानी के लिये किया जाता है, जो बड़े पैमाने पर पर्यावरणीय निगरानी के माध्यम से नीली अर्थव्यवस्था और तटीय क्षेत्र विनियमन का समर्थन करता है।
  • भूजल निगरानी: बड़े भूमिगत जलभृत गुरुत्वीय रूप से आकर्षित करते हैं।
    • गुरुत्वाकर्षण-मापने वाले उपग्रह पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में छोटे परिवर्तनों का पता लगाकर भूजल भंडारण का अनुमान लगा सकते हैं।
    • रिमोट सेंसिंग से अत्यधिक सिंचाई के कारण विशेष रूप से उत्तर भारत में गंभीर भूजल की कमी का पता चला है।
    • यह स्थल-विशिष्ट सिंचाई, उर्वरक उपयोग और कीट नियंत्रण को सक्षम बनाता है, जिससे जल उपयोग और रासायनिक अपवाह को कम करते हुए फसल उपज में सुधार होता है।
  • स्थायी संसाधन प्रबंधन: रिमोट सेंसिंग रैंडम ड्रिलिंग और खुदाई को कम करके अन्वेषण को तीव्र, सस्ता और पर्यावरणीय रूप से सुरक्षित बनाती है।
    • यह अति-दोहन को रोकने के लिये वनों, जल और जलभृतों की निरंतर निगरानी को सक्षम बनाती है।
    • यह शहरी ऊष्मा द्वीपों, भूमि-उपयोग परिवर्तन और अनौपचारिक बस्तियों के विकास पर नज़र रखकर सतत विकास का समर्थन करती है, जिससे जलवायु-अनुकूल शहरी नियोजन, आपदा प्रबंधन, जलवायु कार्रवाई और साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण में सहायता मिलती है।

Geospatial_Technology

भारतीय रिमोट सेंसिंग (IRS) कार्यक्रम

  • परिचय (About): भारतीय रिमोट सेंसिंग (Indian Remote Sensing- IRS) कार्यक्रम भारत का राष्ट्रीय पृथ्वी अवलोकन कार्यक्रम है, जिसकी शुरुआत वर्ष 1988 में भारतीय रिमोट सेंसिंग उपग्रह- 1A (IRS-1A) के प्रक्षेपण के साथ हुई। इसका उद्देश्य संसाधन प्रबंधन एवं राष्ट्रीय विकास के लिये उपग्रह चित्रण (Satellite Imagery) उपलब्ध कराना है।
    • ISRO द्वारा संचालित, यह कार्यक्रम रिमोट सेंसिंग उपग्रहों के विश्व के सबसे बड़े समूहों (Constellations) में शामिल है, जो विभिन्न स्थानिक (Spatial), वर्णक्रमीय (Spectral) तथा कालिक (Temporal) विभेदन पर आँकड़े उपलब्ध कराता है।
    • IRS आँकड़े कृषि, जल संसाधन प्रबंधन, शहरी नियोजन, वानिकी, खनिज अन्वेषण, आपदा प्रबंधन, महासागर अध्ययन तथा पर्यावरणीय निगरानी जैसे क्षेत्रों में उपयोगी हैं और भारत के भू-स्थानिक (Geospatial) एवं GIS पारितंत्र के विकास में एक आधारभूत भूमिका निभाई है।
  • प्रमुख भारतीय रिमोट सेंसिंग (IRS) मिशन:

भारत में सामाजिक विकास में रिमोट सेंसिंग टेक्नोलॉजी ने कैसे योगदान दिया?

  • भुवन जियोपोर्टल (Bhuvan Geoportal): विकास परियोजनाओं के दृश्यांकन, निगरानी और योजना निर्माण हेतु ISRO द्वारा विकसित एक राष्ट्रीय भू-स्थानिक मंच
  • जियो-MGNREGA (Geo-MGNREGA): MGNREGA के अंतर्गत सृजित परिसंपत्तियों की  उपग्रह-आधारित जियो-टैगिंग एवं निगरानी, जिससे पारदर्शिता और योजना निर्माण में सुधार हुआ।
    • Geo-MGNREGA पोर्टल पर 6.24 करोड़ से अधिक परिसंपत्तियाँ/गतिविधियाँ जियो-टैग की गई हैं।
    • युक्तधारा भू-स्थानिक योजना पोर्टल एक भू-स्थानिक नियोजन पोर्टल है जिसका उद्देश्य पूरे भारत में ग्राम पंचायत स्तर पर मनरेगा गतिविधियों की योजना बनाना आसान बनाना है। यह पोर्टल विभिन्न प्रकार की स्थानिक सूचना सामग्री को एकीकृत करता है ताकि ओपन-सोर्स जीआईएस उपकरणों का उपयोग करके नियोजन के लिए एक समग्र दृष्टिकोण को सक्षम किया जा सके।
  • SIS-DP (विकेंद्रीकृत योजना के लिये अंतरिक्ष-आधारित सूचना समर्थन): पंचायत एवं ग्राम-स्तरीय योजना निर्माण को समर्थन देने हेतु उच्च रिज़ॉल्यूशन उपग्रह आँकड़ों का उपयोग।
  • प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना 2.0- जलग्रहण विकास घटक (PMKSY-WDC 2.0):
    सूक्ष्म जलग्रहण क्षेत्रों तथा मृदा-जल संरक्षण कार्यों की निगरानी के लिये रिमोट सेंसिंग टेक्नोलॉजी का प्रयोग।
    • PMKSY-WDC 2.0 के अंतर्गत भुवन (Bhuvan) टूल्स के माध्यम से कार्टोसैट-2S एवं कार्टोसैट-3 से प्राप्त उच्च रिज़ॉल्यूशन उपग्रह आँकड़ों का उपयोग करते हुए लगभग 1,150 परियोजनाओं का मूल्यांकन किया गया।
  • ग्रामीण सड़क मानचित्रण: भारत भर में ग्रामीण सड़कों का उपग्रह-आधारित मानचित्रण एवं निगरानी
  • प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY-शहरी एवं ग्रामीण): भू-स्थानिक निगरानी (जियो-टैगिंग) को एक मुख्य तंत्र के रूप में अपनाया गया है, जिससे पारदर्शिता सुनिश्चित करने, निर्माण की भौतिक प्रगति पर निगरानी रखने तथा चरणबद्ध रूप से धनराशि के निर्गमन को सुगम बनाया जा सके।
  • आपदा प्रबंधन सहायता कार्यक्रम (Disaster Management Support Programme- DMSP):
    DMSP को ISRO/अंतरिक्ष विभाग द्वारा लागू किया जाता है, ताकि राष्ट्रीय और राज्य आपदा प्रबंधन एजेंसियों का समर्थन किया जा सके।
    • यह कार्यक्रम सुदूर संवेदन (Space-Based) डेटा का उपयोग करता है, जिसमें शामिल हैं- जोखिम, संवेदनशीलता और खतरे (Hazard, Vulnerability, Risk- HVR) का मूल्यांकन, आपदा निगरानी, क्षति आकलन और पूर्व-सूचना प्रणाली
    • यह कार्यक्रम मुख्य आपदाओं, जैसे– बाढ़, चक्रवात, भूस्खलन, भूकंप और वन अग्निकांड को कवर करता है तथा इसमें भारतीय उपग्रहों– रिसोर्ससैट, कार्टोसैट शृंखला, RISAT, ओशनसैट-3, INSAT-3DR/3DS के डेटा के साथ-साथ वैश्विक उपग्रह मिशनों के डेटा का उपयोग किया जाता है।

भारत में रिमोट सेंसिंग से जुड़ी चुनौतियाँ क्या हैं?

  • डेटा की पहुँच और लागत: उच्च रिज़ॉल्यूशन वाली इमेजरी अक्सर महंगी या सीमित होती है, जिससे राज्यों और स्थानीय निकायों द्वारा इसका उपयोग सीमित हो जाता है।
    • उदाहरणतः कई नगरपालिकाएँ शहरी नियोजन के लिये मोटा/स्थूल उपग्रह डेटा पर निर्भर करती हैं, जिससे झुग्गी-झोपड़ियों के मानचित्रण और भूमि-उपयोग (land-use) ज़ोनिंग की सटीकता कम हो जाती है।
  • बादल और मौसम संबंधी सीमाएँ: ऑप्टिकल सैटेलाइट्स मानसून के मौसम में काम करने में कठिनाई महसूस करते हैं, जिससे फसल आकलन और बाढ़ मानचित्रण प्रभावित होते हैं।
    • उदाहरण के लिये लगातार बादलों की मौजूदगी के कारण खरीफ फसल की क्षति का आकलन अक्सर विलंबित हो जाता है।
  • सीमित अंतिम-स्तरीय अनुप्रयोग: सैटेलाइट से प्राप्त जानकारियाँ हमेशा ज़मीनी स्तर पर कार्रवाई में नहीं बदलतीं। उदाहरणतः पंजाब और हरियाणा में भूमिगत जल संकट के नक्शों के बावजूद कमज़ोर नीतिगत प्रवर्तन के कारण अत्यधिक सिंचाई जारी है।
  • कौशल और क्षमता की कमी: कई ज़िला प्रशासनों में प्रशिक्षित भौगोलिक सूचना कर्मी नहीं हैं। परिणामस्वरूप बाढ़ और चक्रवात के दौरान आपदा पूर्व चेतावनी मानचित्रों का पर्याप्त उपयोग नहीं हो पाता।
  • डेटा का विखंडन और कमज़ोर एकीकरण: ISRO, राज्य सरकारों और मंत्रालयों के डेटासेट अक्सर अलग-अलग कार्य करते हैं। उदाहरण के लिये, सैटेलाइट वर्षा डेटा और स्थानीय जल निकासी डेटा का एकीकृत न होना शहरी बाढ़ मॉडलिंग को प्रभावित करता है।
  • गोपनीयता और सुरक्षा संबंधी चिंताएँ: सीमा क्षेत्रों और शहरों का उच्च रिज़ॉल्यूशन मानचित्रण राष्ट्रीय सुरक्षा और व्यक्तिगत गोपनीयता के लिये चिंताएँ उत्पन्न करता है, विशेषकर निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ने के साथ।

भारत में रिमोट सेंसिंग को मज़बूत बनाने हेतु क्या कदम उठाए जा सकते हैं?

  • सैटेलाइट डेटा को ज़मीनी प्रणालियों से एकीकृत करना: डिजिटल इंडिया और स्मार्ट सिटीज़ मिशन जैसे कार्यक्रमों के तहत रिमोट सेंसिंग को IoT सेंसर, ड्रोन तथा GIS डैशबोर्ड से संबद्ध कर इसका विस्तार किया जाए, ताकि परिशुद्ध सिंचाई, शहरी बाढ़ नियंत्रण और हीटवेव प्रबंधन आदि क्षेत्रों में इसका समुचित प्रयोग किया जा सके।
  • ओपन-एक्सेस भू-स्थानिक डेटा का विस्तार: राष्ट्रीय भू-स्थानिक नीति, 2022 का पूर्ण कार्यान्वयन किया जाए, ताकि उच्च रिज़ॉल्यूशन डेटा सस्ता और सभी के लिये सुलभ हो सके।
    • PM गति शक्ति और भुवन (ISRO) जैसे प्लेटफॅार्म पहले से ही यह दिखाते हैं कि ओपन भू-स्थानिक लेयर्स किस प्रकार अवसंरचना नियोजन, लॉजिस्टिक्स और क्षेत्रीय विकास में सहायक हो सकती हैं।
  • SAR के माध्यम से सभी मौसमों में निगरानी को बढ़ावा देना: RISAT जैसे SAR मिशनों का विस्तार किया जाए, ताकि दिन-रात और हर मौसम में निगरानी सुनिश्चित की जाए।      
    • SAR आधारित बाढ़ मानचित्रण ने भारत के पूर्वी तट पर चक्रवातों के दौरान NDMA के नेतृत्व वाली आपदा प्रतिक्रिया और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को सुदृढ़ किया है।
  • स्थानीय स्तर पर क्षमता निर्माण को सुदृढ़ करना: ISRO के IIRS प्रशिक्षण और आउटरीच जैसे क्षमता-विकास कार्यक्रमों का विस्तार कर राज्य एवं ज़िला स्तर के अधिकारियों को सशक्त बनाया जाए।
    • इससे यह सुनिश्चित होगा कि सैटेलाइट से प्राप्त जानकारियाँ सीधे कृषि परामर्श, सूखा आकलन और आपदा प्रबंधन में ज़मीनी स्तर पर मार्गदर्शन कर सकें।

निष्कर्ष

रिमोट सेंसिंग भारत के विकासोन्मुख और डेटा-संचालित शासन तंत्र का एक केंद्रीय आधार बन चुकी है, जो कृषि, आपदा प्रबंधन, शहरी नियोजन और जलवायु कार्रवाई में निर्णायक सहयोग प्रदान करती है। राष्ट्रीय भू-स्थानिक नीति के क्रियान्वयन के साथ रिमोट सेंसिंग भारत की आर्थिक प्रगति एवं पर्यावरणीय सुरक्षा को सुदृढ़ करने में भी अहम भूमिका निभाती रहेगी।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. सतत विकास और शासन को समर्थन देने में भारतीय रिमोट सेंसिंग (IRS) कार्यक्रम की भूमिका का परीक्षण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. रिमोट सेंसिंग क्या है?
रिमोट सेंसिंग वह विज्ञान है जिसके अंतर्गत अंतरिक्ष या वायु से पृथ्वी का अवलोकन किया जाता है, जिसमें ऐसे सेंसरों का उपयोग होता है जो पृथ्वी से परावर्तित या उत्सर्जित विद्युत चुंबकीय विकिरण का पता लगाते हैं।

2. भारत के लिये रिमोट सेंसिंग क्यों महत्त्वपूर्ण है?
यह कृषि, जल, वन, खनिज, आपदाओं और विकास कार्यक्रमों की राष्ट्रीय स्तर पर लागत-कुशल निगरानी में सक्षम बनाती है।

3. इंडियन रिमोट सेंसिंग (IRS) प्रोग्राम क्या है?
IRS भारत का राष्ट्रीय पृथ्वी अवलोकन कार्यक्रम है, जिसे वर्ष 1988 में लॉन्च किया गया था, जो संसाधन प्रबंधन और शासन के लिये बहु-रिज़ॉल्यूशन सैटेलाइट डेटा प्रदान करता है।

4. रिमोट सेंसिंग आपदा प्रबंधन में कैसे मदद करती है?
यह सैटेलाइट डेटा का उपयोग करके जोखिम, संवेदनशीलता और खतरे के आकलन, रियल-टाइम आपदा निगरानी, क्षति आकलन तथा पूर्व चेतावनी को समर्थन देती है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

प्रिलिम्स

प्रश्न.1 अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के संदर्भ में, हाल ही में खबरों में रहा ‘भुवन’ क्या है?  (वर्ष 2010)

 (A) भारत में दूरस्थ शिक्षा को बढ़ावा देने के लिये इसरो द्वारा लॉन्च किया गया एक छोटा उपग्रह

 (B) चंद्रयान-द्वितीय के लिये अगले चंद्रमा प्रभाव जाँच को दिया गया नाम

 (C) भारत की 3डी इमेजिंग क्षमताओं के साथ इसरो का एक जियोपोर्टल

 (D) भारत द्वारा विकसित अंतरिक्ष दूरदर्शी

 उत्तर: (C)


मेन्स

प्रश्न.1 भारत का अपना अंतरिक्ष स्टेशन बनाने की क्या योजना है और यह हमारे अंतरिक्ष कार्यक्रम को कैसे लाभान्वित करेगा? (2019)

प्रश्न.2 अंतरिक्ष विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियों पर चर्चा करें। इस प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग ने भारत के सामाजिक-आर्थिक विकास में किस प्रकार मदद की?  (2016)