वित्तीय अपराध पर FIU-IND और SEBI का समझौता ज्ञापन
हाल ही में वित्तीय खुफिया इकाई-भारत (FIU-IND) और भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) ने धनशोधन और वित्तीय अपराधों से निपटने के प्रयासों को सुदृढ़ करने के क्रम में एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किये हैं।
- उद्देश्य: यह समझौता वित्तीय अपराधों और आतंकवादी वित्तपोषण से निपटने के क्रम में खुफिया जानकारी साझा करने, समन्वय और प्रवर्तन को सुदृढ़ करने पर केंद्रित है।
- विशेषताएँ: यह दोनों एजेंसियों के बीच वित्तीय खुफिया एवं डाटाबेस जानकारी के आदान-प्रदान को सुगम बनाने के साथ विनियमित संस्थाओं हेतु धनशोधन निवारण नियमों के तहत रिपोर्टिंग तंत्र स्थापित करने पर केंद्रित है।
- क्षमता निर्माण: इसमें SEBI-नियंत्रित संस्थाओं में मनी लॉन्ड्रिंग-रोधी (AML) और आतंकवाद के वित्तपोषण-रोधी (CFT) क्षमताओं को सुदृढ़ करने हेतु प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रम शामिल हैं।
- जोखिम निगरानी: इसके तहत मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवाद के वित्तपोषण के जोखिमों के आकलन, रेड फ्लैग संकेतकों की पहचान और अनुपालन निगरानी पर ध्यान केंद्रित करना शामिल है।
- क्रियाप्रणाली एवं वैश्विक सहयोग: नियमित समन्वय और अंतर्राष्ट्रीय मानकों के साथ अनुरूपता सुनिश्चित करने तथा सूचना आदान-प्रदान संबंधी एगमॉन्ट सिद्धांतों के तहत विदेशी FIUs के साथ जानकारी साझा करने में सक्षम बनाता है।
FIU-IND
- FIU-IND संदिग्ध वित्तीय लेनदेन से संबंधित जानकारी को प्राप्त करने, संसाधित करने, विश्लेषण करने और प्रसारित करने के लिये उत्तरदायी केंद्रीय राष्ट्रीय एजेंसी है तथा मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवाद के वित्तपोषण के विरुद्ध प्रयासों का समन्वय करती है।
SEBI
- यह भारत में प्रतिभूति बाज़ारों का वैधानिक नियामक है जिसका गठन SEBI अधिनियम, 1992 के तहत निवेशकों के हितों की रक्षा करने एवं बाजार की सत्यनिष्ठा सुनिश्चित करने के लिये की गई है।
चंबल में रेत खनन को लेकर राज्यों को सर्वोच्च न्यायालय की चेतावनी
हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश को राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य में अवैध रेत खनन पर नियंत्रण करने के लिये चेतावनी दी है; अन्यथा अर्द्धसैनिक बलों की तैनाती की जा सकती है।
- अवैध खनन के कारण आवासीय क्षरण गंभीर रूप ले रहा है, जिससे घड़ियाल जैसी लुप्तप्राय प्रजातियाँ संकट में पड़ रही हैं तथा नदी पारिस्थितिक तंत्र को क्षति पहुँच रही है।
- राज्यों को CCTV निगरानी, खनन वाहनों की GPS ट्रैकिंग, संयुक्त गश्त तथा कठोर प्रवर्तन उपायों को लागू करने के लिये निर्देशित किया गया है।
राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य
- परिचय: राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य, जिसे राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल वन्यजीव अभयारण्य भी कहा जाता है, भारत के सबसे पारिस्थितिक रूप से महत्त्वपूर्ण नदी-आधारित संरक्षित क्षेत्रों में से एक है।
- यह देश का पहला और एकमात्र त्रि-राज्यीय संरक्षित क्षेत्र है (राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश), जो चंबल नदी (960 किमी.) के लगभग 600 किमी. लंबे हिस्से में फैला हुआ है तथा इसका क्षेत्रफल लगभग 5,400 वर्ग किमी. है।
- जैव विविधता: इसमें दुनिया की शेष जंगली घड़ियालों की लगभग 90% आबादी और संकटग्रस्त गंगा नदी डॉल्फ़िन की एक महत्त्वपूर्ण संख्या पाई जाती है। अन्य प्रमुख प्रजातियों में दलदली मगरमच्छ (मगर), लाल मुकुट वाला कछुआ (रेड-क्राउंड रूफ्ड टर्टल), चिकने बालों वाला ऊदबिलाव (स्मूथ कोटेड ओटर्स), धारीदार लकड़बग्घा और 330 से अधिक पक्षी प्रजातियाँ शामिल हैं, जैसे कि भारतीय स्किमर।
- यह भारत की 'प्रोजेक्ट क्रोकोडाइल’ पहल का हिस्सा है, जिसे मगरमच्छों की संख्या में हुई भारी कमी की समस्या को दूर करने के उद्देश्य से वर्ष 1975 शुरू किया गया था।
- संरक्षण का दर्जा: इस क्षेत्र को एक महत्त्वपूर्ण पक्षी क्षेत्र (IBA) की श्रेणी में रखा गया है। वर्तमान में यह रामसर स्थल के रूप में प्रस्तावित है और यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल की सूची में शामिल होने हेतु एक संभावित स्थल भी है। इसके अतिरिक्त, इसे IUCN द्वारा श्रेणी IV संरक्षित क्षेत्र (पर्यावास/प्रजाति प्रबंधन क्षेत्र) के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
- पारिस्थितिक विशिष्टता: चंबल नदी भारत की सबसे स्वच्छ और सबसे कम प्रदूषित नदियों में से एक है, जो अपने गहरे चैनलों, रेत के टीलों और बीहड़ों (खड्डों) के माध्यम से एक अद्वितीय लोटिक (प्रवाही जल) पारिस्थितिक तंत्र का निर्माण करती है।
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और पढ़ें: राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य |
संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026 का पारित न होना
लोकसभा संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026 को पारित करने में विफल रही, जिसका उद्देश्य वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन को सक्षम बनाकर विधायिकाओं में महिलाओं के लिये 33% आरक्षण (जो 106वें संविधान संशोधन, 2023 द्वारा प्रस्तुत किया गया था) के कार्यान्वयन को शीघ्र करना था।
- संबद्ध विधेयकों का प्रत्याहार: संविधान संशोधन विधेयक के विफल होने के कारण आश्रित वैधानिक विधेयकों, विशेष रूप से केंद्रशासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 तथा परिसीमन विधेयक, 2026 को तत्काल वापस लेना आवश्यक हो गया।
- विशेष बहुमत की विफलता: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 368 के अनुसार, इस विधेयक को पारित करने के लिये विशेष बहुमत आवश्यक था, अर्थात सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले कम-से-कम दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन।
- 528 की कुल सदस्य संख्या वाले सदन में विधेयक को केवल 298 मत प्राप्त हुए, जो आवश्यक 352 के मानक से कम था।
- परिसीमन और जनगणना का संबंध: इस विधेयक का उद्देश्य वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन को सक्षम बनाकर संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं पर लगे स्थगन को समाप्त करना था, जो 42वें संविधान संशोधन (1976) के तहत वर्ष 1971 की जनगणना के आधार पर लागू किया गया था।
- इसका उद्देश्य वर्तमान जनसंख्या प्रतिरूपों के अनुरूप प्रतिनिधित्व को समायोजित कर “एक व्यक्ति, एक मत, एक मूल्य” के लोकतांत्रिक सिद्धांत को पुनर्स्थापित करना था।
- यह स्थगन, जो प्रारंभ में वर्ष 2000 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक जारी रहने के लिये निर्धारित था, बाद में 84वें संविधान संशोधन (2001) द्वारा वर्ष 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक बढ़ा दिया गया।
- संघवाद बहस (उत्तर–दक्षिण विभाजन): मुख्य विधायी बाधा राज्यों के बीच जनसांख्यिकीय असमानता थी।
- विपक्षी दलों का यह तर्क था कि जनसंख्या-आधारित परिसीमन लागू होने पर दक्षिणी राज्यों को उनके सफल जनसंख्या नियंत्रण प्रयासों हेतु नुकसान उठाना पड़ेगा। अतः उन्होंने महिला आरक्षण को परिसीमन की कार्यवाही से पृथक् करने का पुरज़ोर आग्रह किया।
- नारी शक्ति वंदन अधिनियम (106वाँ संविधान संशोधन, 2023): यह अधिनियम 16 अप्रैल, 2026 को प्रभावी हुआ, जो राज्य विधानसभाओं एवं लोकसभा में महिलाओं हेतु 33% आरक्षण का प्रावधान करता है।
- चूँकि अनुच्छेद 334A इस आरक्षण को आगामी जनगणना (2027 के उपरांत) के बाद होने वाले परिसीमन से संबद्ध करता है, इसलिये इसका वास्तविक निष्पादन वर्तमान में निलंबित है, जिससे इसके वर्ष 2034 से पूर्व क्रियान्वित होने की संभावना क्षीण है।
- इसी विलंब को समाप्त कर महिला आरक्षण के लाभ को वर्ष 2029 तक सुनिश्चित करने के ध्येय से लोकसभा में संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026 तथा अन्य संबद्ध कानूनी प्रस्ताव पेश किये गए थे।
निर्यात सहायता के लिये RELIEF योजना का विस्तार
हाल ही में सरकार ने पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव और समुद्री लॉजिस्टिक्स पर इसके निरंतर प्रभाव को देखते हुए, रेज़िलिएंस एंड लॉजिस्टिक्स इंटरवेंशन फॉर एक्सपोर्ट फैसिलिटेशन (RELIEF) योजना का विस्तार किया है।
- परिचय: RELIEF, वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय द्वारा शुरू की गई निर्यात संवर्द्धन मिशन (EPM) के अंतर्गत एक समयबद्ध पहल है, जिसके लिये ₹497 करोड़ का बजट आवंटित किया गया है। इसका उद्देश्य बढ़ते समुद्री जोखिमों का सामना कर रहे भारतीय निर्यातकों को वित्तीय और परिचालन सुरक्षा प्रदान करना है।
- उद्देश्य: इसका उद्देश्य भू-राजनीतिक व्यवधानों के दौरान रसद लागत को कम करना, जोखिम से सुरक्षा प्रदान करना, आपूर्ति शृंखला की मज़बूती सुनिश्चित करना और निर्यात प्रतिस्पर्द्धात्मकता बनाए रखना है।
- यह योजना सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत, ओमान, बहरीन, इराक, ईरान और यमन जैसे खाड़ी देशों एवं पश्चिम एशिया के क्षेत्रों में निर्यात को कवर करती है। इसके साथ ही, हाल ही में इसमें जॉर्डन और मिस्र को भी शामिल किया गया है।
- कार्यान्वयन: इसका कार्यान्वयन भारतीय निर्यात ऋण गारंटी निगम (ECGC) के माध्यम से किया जाता है, जो दावों, संवितरण और निगरानी का प्रबंधन करता है।
- तीन-भागीय ढाँचा:
- घटक 1: यह उन निर्यातकों हेतु सहायता सुनिश्चित करता है जो पहले से ECGC लिमिटेड के अंतर्गत कवर हैं। इसके माध्यम से 14 फरवरी से 15 मार्च, 2026 के मध्य भेजे गए कंसाइनमेंट्स के लिये प्रीमियम दरों को पूर्व-विघटन स्तर पर स्थिर रखा गया है। इसके अतिरिक्त, युद्ध-जनित जोखिमों के संदर्भ में यह नुकसान की शत प्रतिशत भरपाई हेतु उन्नत कवर भी प्रदान करता है।
- घटक 2: 16 मार्च से 15 जून, 2026 के बीच के कंसाइनमेंट्स के लिये अधिकतम 95% तक हानि कवरेज प्रदान करता है, इसमें 16 मार्च, 2026 के बाद नए ECGC होल टर्नओवर पॉलिसी लेने वाले निर्यातक भी शामिल हैं।
- घटक 3: विशेष रूप से उन MSME निर्यातकों को लक्षित करता है जिनके पास पहले कोई बीमा नहीं था तथा प्रभावित शिपमेंट्स के लिये प्रति निर्यातक 50 लाख रुपये तक की सीमा प्रदान करता है।
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और पढ़ें: निर्यात संवर्द्धन मिशन |
राज्यसभा के उपसभापति
ऐतिहासिक रूप से पहली बार, एक नामित सांसद, हरिवंश नारायण सिंह को राज्यसभा का उपसभापति बनाया गया है। वे लगातार तीसरे कार्यकाल के लिये निर्विरोध पुनः निर्वाचित हुए हैं।
- निर्वाचन एवं पद: भारत के संविधान के अनुच्छेद 89(2) के अनुसार, राज्यसभा (राज्यों की परिषद) अपने सदस्यों में से एक को उपसभापति के रूप में निर्वाचित करती है।
- जब भी यह पद रिक्त होता है, सदन को अपने कार्यों की निरंतरता सुनिश्चित करने हेतु एक नए उपसभापति का निर्वाचन करना होता है।
- उपसभापति के निर्वाचन के लिये राज्यसभा का कोई भी सदस्य किसी अन्य सदस्य के नाम का प्रस्ताव रख सकता है।
- प्रस्तावित उम्मीदवार को निर्वाचित होने की स्थिति में पद ग्रहण करने की सहमति का घोषणा-पत्र प्रस्तुत करना होता है तथा इस प्रस्ताव का समर्थन सदन के किसी अन्य सदस्य द्वारा किया जाना आवश्यक है।
- उपसभापति तब तक पद धारण करता है जब तक वह राज्यसभा का सदस्य बना रहता है, त्यागपत्र नहीं दे देता है या सदन द्वारा उसे हटा नहीं दिया जाता है।
- भूमिका और कार्य: वह सभापति (उपराष्ट्रपति) की अनुपस्थिति में सदन की अध्यक्षता करता है और उस अवधि के दौरान सभापति की सभी शक्तियों का प्रयोग करता है।
- मतदान शक्ति: सभापति की भाँति उपसभापति भी अध्यक्षता करते समय प्रथमदृष्टया मतदान नहीं करता है। वह केवल मतों की समानता की स्थिति में निर्णायक मत का प्रयोग कर सकता है।
- पद की स्वतंत्रता: वह सभापति के अधीन नहीं होता, बल्कि सीधे राज्यसभा के प्रति उत्तरदायी होता है।
- सदस्य के रूप में स्थिति: जब सभापति सदन की अध्यक्षता करता है, तब उपसभापति एक सामान्य सदस्य की तरह कार्य करता है तथा वाद-विवाद में भाग लेता है और मतदान करता है।
- हटाने की प्रक्रिया: उसे राज्यसभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित प्रस्ताव द्वारा, 14 दिन की पूर्व सूचना के साथ, पद से हटाया जा सकता है।
- उसके पद से हटाने से संबंधित प्रस्ताव पर विचार के दौरान वह सदन की अध्यक्षता नहीं कर सकता।
- वेतन एवं भत्ते: उसका वेतन और भत्ते संसद द्वारा निर्धारित किये जाते हैं तथा ये भारत की संचित निधि पर भारित होते हैं।
- रिक्ति: यह पद तब रिक्त हो जाता है जब वह सदस्य नहीं रहता, सभापति को त्यागपत्र देकर पद छोड़ देता है या सदन द्वारा पद से हटाया जाता है, जिसके पश्चात् एक नए उपसभापति का निर्वाचन किया जाता है।
- उपसभापतियों का पैनल: राज्यसभा के नियमों के अनुसार, सभापति सदस्यों में से उपसभापतियों का एक पैनल नामित करता है, जिनमें से कोई भी सभापति और उपसभापति की अनुपस्थिति में सदन की अध्यक्षता कर सकता है।
- हालाँकि, जब इन दोनों में से किसी भी पद पर रिक्ति हो, तब वे सदन की अध्यक्षता नहीं कर सकते।
नदी बेसिन प्रबंधन योजना
चर्चा में क्यों?
नदी बेसिन प्रबंधन योजना को 16वें वित्त आयोग की अवधि (2026–27 से 2030–31) तक बढ़ा दिया गया है, जो भारत के जल संसाधनों के एकीकृत और सतत प्रबंधन (विशेष रूप से बेसिन स्तर पर) पर बल को दर्शाता है।
नदी बेसिन प्रबंधन (RBM) योजना क्या है?
- परिचय: RBM योजना एक केंद्रीय क्षेत्रक पहल है, जिसका संचालन जलशक्ति मंत्रालय (जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण विभाग) द्वारा किया जाता है।
- इसका मुख्य लक्ष्य नदी बेसिन स्तर पर सतही जल और भूजल के एकीकृत नियोजन, सतत उपयोग और संरक्षण को सुनिश्चित करना है।
- इस योजना के तहत जल संसाधनों को अलग-अलग देखने के बजाय, पूरे नदी बेसिन (जिसमें नदियाँ, उनकी सहायक नदियाँ, झीलें और भूजल शामिल हैं) को एकीकृत एवं परस्पर प्रणाली के रूप में संदर्भित किया गया है।
- संस्थागत ढाँचा: नदी बेसिन प्रबंधन (RBM) योजना के दो प्रमुख घटक हैं— ब्रह्मपुत्र बोर्ड, जल संसाधन विकास अन्वेषण योजना (IWRDS), जो केंद्रीय जल आयोग (CWC) एवं राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी (NWDA) के माध्यम से क्रियान्वित है।
- ब्रह्मपुत्र बोर्ड: यह उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में नदी बेसिन योजना, बाढ़ नियंत्रण, अपरदन प्रबंधन, जल निकासी के विकास और जल संसाधनों के सतत प्रबंधन पर केंद्रित है।
- केंद्रीय जल आयोग (CWC): यह दूरस्थ क्षेत्रों में जल संसाधन परियोजनाओं के लिये सर्वेक्षण एवं जाँच के साथ विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करता है।
- राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण (NWDA): यह राष्ट्रीय स्तर पर जल नियोजन का कार्य करता है, विशेष रूप से नदियों को परस्पर जोड़ने के कार्यक्रम (ILR) हेतु व्यवहार्यता प्रतिवेदनों की तैयारी करता है।
- भौगोलिक प्राथमिकता: यह सामरिक रूप से जल-समृद्ध किंतु अल्पविकसित क्षेत्रों को लक्षित करती है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा, जल सुरक्षा, सीमापार प्रबंधन, बाढ़ नियंत्रण तथा पारिस्थितिक स्थिरता की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
- प्रमुख लक्षित क्षेत्रों में ब्रह्मपुत्र, बराक, तीस्ता और सिंधु बेसिन शामिल हैं, जिनमें उत्तर-पूर्वी राज्यों, जम्मू और कश्मीर और लद्दाख को अत्यधिक प्राथमिकता दी गई है।
- मुख्य उद्देश्य::
- बाढ़ एवं अपरदन प्रबंधन: भौतिक संरक्षण उपायों का कार्यान्वयन, जैसे असम के माजुली द्वीप को तीव्र नदी धाराओं से सुरक्षित करना।
- परियोजना विकास: सिंचाई क्षमता के विस्तार तथा हिमालयी नदियों में जलविद्युत उत्पादन क्षमता के दोहन हेतु विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन (DPRs) तैयार करना।
- प्रौद्योगिकी एकीकरण: स्थलाकृतिक एवं जलवैज्ञानिक नियोजन में सूक्ष्म सटीकता सुनिश्चित करने हेतु भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS), LiDAR तथा ड्रोन सर्वेक्षण जैसे आधुनिक मानचित्रण एवं सर्वेक्षण उपकरणों का उपयोग करना।
- सामुदायिक एकीकरण: पर्वतीय क्षेत्रों में जनजातीय एवं ग्रामीण समुदायों के मध्य स्प्रिंगशेड प्रबंधन जैसी स्थानीय पद्धतियों को प्रोत्साहन देना।
नदी बेसिन
- परिचय: नदी बेसिन वह स्थलीय क्षेत्र है, जिसका अपवाह किसी नदी तथा उसकी सहायक नदियों द्वारा किया जाता है। इसके प्रमुख घटकों में सहायक नदियाँ (वे छोटी धाराएँ जो मुख्य नदी में मिलती हैं), संगम (वह स्थान जहाँ नदियाँ परस्पर मिलती हैं), जल-विभाजक (उच्च भू-भागीय सीमा जो विभिन्न बेसिनों को पृथक् करती है), उद्गम (नदी का प्रारंभिक स्रोत) तथा मुहाना (वह स्थान जहाँ नदी समुद्र, झील अथवा महासागर में जाकर मिलती है) सम्मिलित हैं।
- भारत में जल संसाधनों के नियोजन एवं विकास हेतु नदी बेसिन को मूलभूत जलवैज्ञानिक इकाई माना जाता है।
- भारत के नदी बेसिन : भारत की अपवाह प्रणाली को 20 नदी बेसिन समूहों में वर्गीकृत किया गया है, जिनमें 12 प्रमुख तथा 8 संयुक्त नदी बेसिन सम्मिलित हैं।
- 20,000 वर्ग किमी. से अधिक अपवाह क्षेत्र वाले प्रमुख नदी बेसिनों में सिंधु, गंगा–ब्रह्मपुत्र–मेघना, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, महानदी, पेन्नार, ब्राह्मणी–वैतरणी, साबरमती, माही, नर्मदा तथा ताप्ती सम्मिलित हैं।
- गंगा–ब्रह्मपुत्र–मेघना बेसिन सर्वाधिक विशाल है, जिसका जलग्रहण क्षेत्र लगभग 11.0 लाख वर्ग किमी. है, जो प्रमुख नदियों के कुल जलग्रहण क्षेत्रफल का 43% से अधिक है।
- मध्यम नदी बेसिनों का जलग्रहण क्षेत्र 2,000 से 20,000 वर्ग किमी. के बीच होता है, जबकि लघु बेसिन 2,000 वर्ग किमी. से कम क्षेत्रफल वाले होते हैं।
- 8 समेकित (कॉम्पोज़िट) बेसिन छोटे-छोटे नदी समूहों को मिलाकर बनाए गए हैं, जैसे—सुवर्णरेखा समूह, प्रमुख बेसिनों के बीच पूर्व की ओर बहने वाली नदियाँ, कच्छ और सौराष्ट्र की पश्चिम की ओर बहने वाली नदियाँ (जिसमें लूनी शामिल है), तापी से कन्याकुमारी तक की तटीय नदियाँ तथा राजस्थान के अंतर्देशीय जल निकासी क्षेत्र।
- विशेष रूप से, सभी प्रमुख नदी बेसिन और कई मध्यम बेसिन अंतर-राज्यीय प्रकृति के हैं, जो मिलकर भारत के लगभग 81% भौगोलिक क्षेत्र में फैले हुए हैं।
- 20,000 वर्ग किमी. से अधिक अपवाह क्षेत्र वाले प्रमुख नदी बेसिनों में सिंधु, गंगा–ब्रह्मपुत्र–मेघना, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, महानदी, पेन्नार, ब्राह्मणी–वैतरणी, साबरमती, माही, नर्मदा तथा ताप्ती सम्मिलित हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. नदी बेसिन प्रबंधन (RBM) योजना क्या है?
यह एक केंद्रीय क्षेत्र की योजना है जिसका उद्देश्य नदी बेसिन स्तर पर सतही और भूजल संसाधनों की एकीकृत योजना और सतत प्रबंधन करना है।
2. RBM योजना को कौन-सी संस्थाएँ लागू करती हैं?
इसे ब्रह्मपुत्र बोर्ड, केंद्रीय जल आयोग (CWC) और राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी (NWDA) के माध्यम से लागू किया जाता है।
3. RBM के तहत प्राथमिकता वाले नदी बेसिन कौन-से हैं?
मुख्य बेसिनों में ब्रह्मपुत्र, बराक, तीस्ता और सिंधु शामिल हैं, जिनमें विशेष रूप से पूर्वोत्तर और हिमालयी क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
4. RBM योजना के तहत NWDA की क्या भूमिका है?
NWDA नदियों को आपस में जोड़ने (ILR), व्यवहार्यता अध्ययन और अंतर-बेसिन जल हस्तांतरण की योजना बनाने का कार्य सँभालता है।
5. RBM योजना का क्या महत्त्व है?
यह जल सुरक्षा, बाढ़ नियंत्रण, पारिस्थितिक स्थिरता और क्षेत्रीय विकास को सुदृढ़ करती है, विशेष रूप से संवेदनशील और सीमावर्ती क्षेत्रों में।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रारंभिक परीक्षा:
प्रश्न. सिंधु नदी प्रणाली के संदर्भ में निम्नलिखित चार नदियों में से तीन उनमें से एक में मिलती हैं, जो अंततः सीधे सिंधु में मिलती हैं। निम्नलिखित में से कौन-सी ऐसी नदी है जो सीधे सिंधु से मिलती है?
(a) चिनाब
(b) झेलम
(c) रावी
(d) सतलज
उत्तर: (d)
मेन्स:
प्रश्न: नमामि गंगे और राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) कार्यक्रमों पर और इससे पूर्व की योजनाओं से मिश्रित परिणामों के कारणों पर चर्चा कीजिये। गंगा नदी के परिरक्षण में कौन-सी प्रमात्रा छलांगे, क्रमिक योगदानों की अपेक्षा ज़्यादा सहायक हो सकती हैं? (2015)


