प्रिलिम्स फैक्ट्स (16 Mar, 2026)



बलिराजगढ़ का किला

स्रोत: द हिंदू 

भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (ASI) ने बिहार के मधुबनी ज़िले में स्थित बलिराजगढ़ किले (आधिकारिक तौर पर "प्राचीन किले के अवशेष") में वैज्ञानिक खुदाई के लिये नए सिरे से स्वीकृति प्रदान की है।

बलिराजगढ़ का किला

  • परिचय: यह लगभग 200 ईसा पूर्व का एक संरक्षित राष्ट्रीय स्मारक है, जो मिथिला क्षेत्र की प्रारंभिक सभ्यता और राजा बलि (हिंदू पौराणिक कथाओं के परोपकारी शासक) से इसके पौराणिक संबंधों को अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।
    • ASI के पटना सर्किल का यह भाग बिहार के 71 राष्ट्रीय महत्त्व के संरक्षित स्थलों में से एक है।
  • सांस्कृतिक अनुक्रम: यह किलेबंदी मुख्य रूप से शुंग काल के दौरान लगभग 200 ईसा पूर्व की है, जिसमें पूर्ववर्ती लौह युग के साक्ष्य मिलते हैं।
    • उत्खनन से उत्तरी काले पॉलिशयुक्त मृद्भांड (NBPW) चरण (लगभग 700–200 ईसा पूर्व) से विस्तृत एक 5-गुना सांस्कृतिक अनुक्रम सामने आया है, जिसके बाद शुंग, कुषाण, पाल और गुप्त काल (12वीं शताब्दी ईस्वी तक) आते हैं, जो प्रारंभिक ऐतिहासिक से प्रारंभिक मध्यकाल तक निरंतर निवास का संकेत देता है।
  • पुरातात्त्विक निष्कर्ष: पिछले उत्खनन से संरचनात्मक अवशेष, NBPW मृद्भांड और कलाकृतियाँ मिलीं, जो इस स्थल को विशाल दीवारों, ऊँचे टीलों और रक्षात्मक विशेषताओं वाले एक प्रमुख शहरी केंद्र के रूप में पुष्टि करती हैं।
  • उत्खनन इतिहास: इस स्थल की पहचान सर्वप्रथम वर्ष 1884 में जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन, जो उस समय मधुबनी के उप-मंडल मजिस्ट्रेट थे, ने की थी।
    • व्यवस्थित उत्खनन 1962–63, 1972–73 और 2013–14 में किये गए, हालाँकि अंतिम उत्खनन को पर्यावरणीय बाधाओं और भूजल स्तर अधिक होने के कारण बीच में ही छोड़ दिया गया।

और पढ़ें: सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण


नॉरवेस्टर तथा भारत की स्थानीय पवनें

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

चर्चा में क्यों?

नॉरवेस्टर तूफान ने ओडिशा के मयूरभंज ज़िले में व्यापक क्षति पहुँचाई है, जिसके परिणामस्वरूप अनेक पेड़ उखड़ गए, विद्युत् खंभे गिर गए तथा फूस से बने मकानों को व्यापक क्षति पहुँची है।

नॉरवेस्टर क्या हैं?

  • परिचय: नॉरवेस्टर तीव्र संवहन द्वारा संचालित अल्पकालिक परंतु अत्यंत प्रबल तड़ित-झंझावात हैं, जो पूर्वी तथा पूर्वोत्तर भारत में उत्पन्न होते हैं। ये विनाशकारी स्थानीय पवनें सामान्यतः पूर्व-मानसून अवधि (अप्रैल से जून) के दौरान प्रभावी रहती हैं। 
  • भौगोलिक विस्तार: ये तड़ित-झंझावात मुख्यतः पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार, झारखंड, असम तथा त्रिपुरा के साथ-साथ बांग्लादेश, दक्षिणी नेपाल और भूटान को प्रभावित करते हैं। इनका प्रभाव विशेष रूप से पश्चिम बंगाल में गंगा के मैदानी क्षेत्र तथा गंगा के पूर्वी मैदानी क्षेत्र में अधिक दिखाई देता है।
  • स्थानीय नाम:
    • कालवैशाखी (बांग्ला): इसका अर्थ है “वैशाख माह की आपदा” (मध्य अप्रैल से मध्य मई), जो इन तूफानों की आकस्मिकता और विनाशकारी प्रकृति को दर्शाता है।
    • बारदोली छीड़ा (असमिया): इसका नाम एक “उग्र एवं तीव्र गति वाली देवी” के नाम पर रखा गया है, जो इन तूफानों की अत्यधिक पवन वेग का प्रतीक है।
  • सृजन प्रक्रिया एवं गतिकी: इनका सृजन छोटानागपुर पठार के ऊपर तीव्र दिवाकालीन ऊष्मन के कारण होता है, जिससे निम्न दाब क्षेत्र का विकास होता है।
    • इसके परिणामस्वरूप बंगाल की खाड़ी से आने वाली उष्ण तथा आर्द्र वायु ऊपर की परतों में उत्तर-पश्चिम से आने वाली शुष्क और अपेक्षाकृत शीतल वायु के साथ अंतःक्रिया करती है।
    • यह अंतःक्रिया वायुमंडल में अत्यधिक अस्थिरता, कन्वेक्टिव अवेलेबल पोटेंशियल एनर्जी (CAPE) तथा प्रबल ऊर्ध्वाधर पवन कर्तन उत्पन्न करती है, जिसके परिणामस्वरूप घने कपासी-वर्षी मेघों का तीव्र विकास होता है।
  • प्रमुख विशेषताएँ
    • समय: ये सामान्यतः दोपहर के बाद अथवा सायंकाल के समय उत्पन्न होते हैं।
    • दिशा: ये उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व की ओर गति करते हैं, इसी कारण इन्हें ‘नॉरवेस्टट’ कहा जाता है।
    • तीव्रता: इनकी प्रमुख विशेषताएँ अत्यधिक वेग वाली आँधी (अक्सर 100 किमी./घंटा से अधिक), मूसलाधार वर्षा, आकाशीय बिजली, मेघगर्जन, ओलावृष्टि तथा कभी-कभी बवंडर का उत्पन्न होना हैं।
    • अवधि: ये किसी एक स्थान पर अल्पकालिक होते हैं, सामान्यतः 1–2 घंटे तक बने रहते हैं, किंतु इनका विस्तार लंबी दूरी तक हो सकता है।

महत्त्व और प्रभाव:

महत्त्व

प्रभाव

गर्मी से राहत: यह तापमान में भारी गिरावट लाता है, जिससे मानसून-पूर्व की भीषण गर्मी और उमस से थोड़े समय के लिये लेकिन महत्त्वपूर्ण राहत मिलती है।

संरचनात्मक क्षति: तेज़ तूफानी हवाएँ पेड़ों को उखाड़ देती हैं, बिजली की लाइनों को नुकसान पहुँचाती हैं और कच्चे घरों तथा बुनियादी ढाँचे को नष्ट कर देती हैं।

कृषि और जलस्रोत: भारी मूसलाधार बारिश तालाबों, कुओं तथा जलाशयों को फिर से भर देती है, जिससे शुष्क गर्मी के महीनों और चाय व धान जैसी खड़ी फसलों के लिये महत्त्वपूर्ण पानी उपलब्ध होता है।

जीवन और संपत्ति की हानि: बिजली गिरने, पेड़ों के गिरने तथा ढाँचों के ढहने के कारण अक्सर जनहानि होती है एवं संपत्ति का भारी नुकसान होता है।

सांस्कृतिक महत्त्व: यह क्षेत्रीय संस्कृति में गहराई से समाया हुआ है, विशेष रूप से बंगाली साहित्य और रवींद्र संगीत में, जहाँ यह प्रकृति के उग्र रूप तथा नए वर्ष (पोइला बैसाख) के आगमन का प्रतीक है।

फसल क्षति: ओलावृष्टि और तेज़ हवाएँ बागों (खासकर आम के बागों) तथा कटाई के लिये तैयार खड़ी फसलों को भारी नुकसान पहुँचाती हैं।

मानसून का अग्रदूत: इनका आगमन संक्रमण काल और निकट आते दक्षिण-पश्चिम मानसून का संकेत देता है, जो कृषि कैलेंडर के एक महत्त्वपूर्ण चरण को दर्शाता है।

व्यवधान: इनके कारण जनजीवन व्यापक रूप से प्रभावित होता है। हवाई उड़ानें, रेल और सड़क परिवहन बाधित हो जाते हैं, बिजली आपूर्ति प्रभावित होती है तथा शहरों में जलभराव की स्थिति पैदा हो जाती है।

भारत की विभिन्न स्थानीय पवनें कौन-सी हैं और उनका सामाजिक-आर्थिक प्रभाव क्या है?

स्थानीय पवनें

विशेषताएँ

प्रभावित क्षेत्र

मौसम/अवधि

सामाजिक-आर्थिक प्रभाव

लू

गर्म, शुष्क, धूल भरी और दोपहर के समय चलने वाली तेज़ हवा।

उत्तरी भारत (इंडो-गंगा के मैदान, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश)।

गर्मी (अप्रैल–जून)

दुष्प्रभाव और लाभ: इसके कारण हीटस्ट्रोक (लू लगना), निर्जलीकरण और अन्य स्वास्थ्य जोखिम उत्पन्न होती हैं यह श्रम उत्पादकता को कम करती है, इससे फसलों (जैसे गेहूँ) की पैदावार में 10-15% तक की गिरावट आती है; कभी-कभी नष्ट भी होती हैं, हालाँकि यह अनाज की ओसाई  में मदद करता है और मच्छरों की आबादी को कम करती है।

आम्र वर्षा

मानसून-पूर्व वर्षा, अक्सर गरज-चमक के साथ

दक्षिण भारत (केरल, तटीय कर्नाटक, तमिलनाडु)

अप्रैल के अंत से जून तक

आम के पकने में सहायता करती है, बागवानी को बढ़ावा देती है, मानसून के आगमन का संकेत देती है और कृषि के लिये मिट्टी की नमी में सुधार करती है।

फूलों की बौछार (कॉफी / चेरी ब्लॉसम की बौछार)

हल्की से मध्यम मानसून-पूर्व वर्षा, कभी-कभी गरज के साथ बौछारें

दक्षिणी भारत (केरल और आसपास के क्षेत्र)।

मार्च–मई (मानसून-पूर्व)

कॉफी के फूलों के खिलने की प्रक्रिया को शुरू करती है, जो कॉफी बागानों के लिये अत्यंत आवश्यक है, प्रारंभिक कृषि गतिविधियों को सहारा देती है तथा मिट्टी की नमी और बागवानी उत्पादकता में सुधार करती है।

आंधी

हिंसक धूल भरी आंधियाँ/झंझावात

उत्तर-पश्चिमी और मध्य भारत (राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश)

मानसून-पूर्व (मई–जून)

दृश्यता को कम करती है, परिवहन और दैनिक गतिविधियों में बाधा डालती है, खड़ी फसलों तथा संपत्ति को नुकसान पहुँचाती है एवं शुष्क क्षेत्रों में मृदा अपरदन को बढ़ावा देती है।

समुद्री हवा

समुद्र से ज़मीन की ओर बहने वाली ठंडी, नम हवा

तटीय क्षेत्र (मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, गोवा)।

दिन के समय, पूरे वर्ष (गर्मियों में अधिक तीव्र)।

तटीय शहरों में अत्यधिक गर्मी को कम करती है, तापीय आराम बढ़ाती है और पर्यटन को बढ़ावा देती है; नकारात्मक प्रभाव बहुत कम होती है।

स्थलीय समीर

सतह से समुद्र की ओर शीतल पवन

तटवर्ती क्षेत्र

रात्रि के समय, संपूर्ण वर्ष

तटीय क्षेत्रों में शीतलता आती है और सागरीय परिस्थिति को प्रभावित करके मत्स्यग्रहण तथा समुद्री गतिविधियों में सहायता करती हैं।

पर्वतीय/घाटी समीर

ऊर्ध्वप्रवाही पवनें (दिन) और अधोप्रवाही पवनें (रात्रि)

हिमालय एवं अन्य पहाड़ी क्षेत्र (उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, पूर्वोत्तर की पहाड़ियाँ)

दैनिक चक्र

स्थानीय कृषि और अधिवास पैटर्न को प्रभावित करता है; घाटियों में पाले का कारण बन सकता है जिससे फसलें प्रभावित होती हैं; घाटियों में प्रदूषण फैलाने में मदद करता है।

एलीफेंटा

सागर से सतह की ओर आर्द्र पवनों का प्रवाह

मालाबार तट (केरल/महाराष्ट्र)

मानसून का अंत

खरीफ फसल चक्र के अंतिम चरणों में मदद करती हैं और मानसूनी आर्द्रता के बाद शीतलता प्रदान करती हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. नॉरवेस्टर क्या हैं?
नॉरवेस्टर गंभीर पूर्व-मानसून संवहनीय झंझावात के साथ आने वाले वे तूफान हैं, जो मुख्य रूप से पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में आते हैं, जिनके साथ तेज़ हवाएँ, बिजली, ओलावृष्टि और भारी वर्षा देखने को मिलती है।

2. नॉरवेस्टर को कालवैशाखी क्यों कहा जाता है?
बंगाली में कालवैशाखी का अर्थ है "वैशाख महीने (मध्य अप्रैल–मध्य मई) की आपदा", जो इन तूफानों की आकस्मिक और विनाशकारी प्रकृति को दर्शाती है।

3. नॉरवेस्टर के निर्माण के लिये कौन-सी वायुमंडलीय स्थितियाँ ज़िम्मेदार हैं?
छोटानागपुर पठार पर तीव्र भूमि तापन, बंगाल की खाड़ी से आर्द्रता का प्रवाह और शीतल, शुष्क उत्तर-पश्चिमी पवनों के साथ अंतःक्रिया अस्थिरता (कन्वेक्टिव अवेलेबल पोटेंशियल एनर्जी) उत्पन्न करती है, जिससे कपासी वर्षी झंझावात के साथ तूफान देखने को मिलते हैं।

4. लू और नॉरवेस्टर में क्या अंतर है?
लू उत्तरी भारत में चलने वाली एक उष्ण, शुष्क ग्रीष्मकालीन पवन है, जबकि नॉरवेस्टर पूर्वी भारत में वर्षा, बिजली और तेज़ झोंकेदार पवनों के साथ आने वाले भीषण पूर्व-मानसून झंझावात वाले तूफान हैं।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2020)

  1. जेट प्रवाह केवल उत्तरी गोलार्द्ध में होते हैं।
  2. केवल कुछ चक्रवात ही केंद्र में वाताक्षि उत्पन्न करते हैं।
  3. चक्रवाती की वाताक्षि के अंदर का तापमान आसपास के तापमान से लगभग 10º C कम होता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1 

(b) केवल 2 और 3

(c) केवल 2 

(d) केवल 1 और 3

उत्तर: C


प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2015)

  1. पूरे वर्ष 30° N और 60° S अक्षांशों के बीच बहने वाली हवाएँ पछुआँ हवाएँ (वेस्टरलीज़) कहलाती हैं।
  2. भारत के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में शीतकालीन वर्षा लाने वाली आर्द्र वायु संहतियाँ (मॉइस्ट एयर मासेज़) पछुआँ हवाओं का भाग हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: B


राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य

स्रोत: द हिंदू 

उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य के फ्रेजाइल लोटिक (बहते जल) ईकोसिस्टम को "रेत माफिया" द्वारा व्यापक और सुव्यवस्थित अवैध रेत खनन से बचाने के लिये स्वतः संज्ञान लिया है।

राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य

  • परिचय: राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य, जिसे राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल वन्यजीव अभयारण्य के रूप में भी जाना जाता है, भारत के पारिस्थितिक रूप से महत्त्वपूर्ण नदी तटीय संरक्षित क्षेत्रों में से एक है। यह देश का पहला और एकमात्र त्रि-राज्य संरक्षित क्षेत्र (राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश) है, जो चंबल नदी (960 किमी.) के 600 किमी. लंबे हिस्से के साथ लगभग 5,400 वर्ग किमी. में विस्तृत है।
  • जैव विविधता: यह विश्व की लगभग 90% शेष वन्य घड़ियाल आबादी और लुप्तप्राय गंगा नदी डॉल्फिन की एक महत्त्वपूर्ण संख्या को आश्रय प्रदान करता है। अन्य प्रमुख प्रजातियों में मगर (मार्श क्रोकोडाइल), रेड-क्राउन रूफ टर्टल, स्मूथ कोटेड ओटर, धारीदार लकड़बग्घा और 330 से अधिक पक्षी प्रजातियाँ जैसे भारतीय स्किमर शामिल हैं।
    • यह मगर प्रजातियों की गंभीर कमी को दूर करने के लिये वर्ष 1975 में शुरू की गई भारतीय परियोजना प्रोजेक्ट क्रोकोडाइल पहल का हिस्सा बना।
  • संरक्षण स्थिति: इसे एक महत्त्वपूर्ण पक्षी क्षेत्र (IBA) के रूप में मान्यता प्राप्त है। यह एक प्रस्तावित रामसर स्थल है, यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा पाने के लिये एक उम्मीदवार है, इसे IUCN श्रेणी IV संरक्षित क्षेत्र (आवास/प्रजाति प्रबंधन क्षेत्र) के रूप में वर्गीकृत किया गया है। 
  • पारिस्थितिक विशिष्टता: चंबल नदी भारत की सबसे स्वच्छ और सबसे अप्रदूषित नदियों में से एक है, जो गहरे चैनलों, रेतीले तटों और रवाइन (बीहड़) का एक अद्वितीय लोटिक (बहते जल) ईकोसिस्टम बनाती है।
  • खतरे और चुनौतियाँ: गंभीर खतरों में अवैध रेत खनन शामिल है, जो घड़ियाल और कछुओं जैसी रेत में घोंसला बनाने वाली प्रजातियों के नेस्टिंग साइट्स को नष्ट करता है, साथ ही जल निष्कर्षण और अवैध मत्स्यग्रहण जो जल में शिकार को कम करता है।

और पढ़ें: राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में अवैध रेत खनन


असम के जोहा चावल का पहला निर्यात

स्रोत: पीआईबी

कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA), जो वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करता है, ने असम के भौगोलिक उपदर्शन प्रमाणन (GI टैग) वाले जोहा चावल की पहली निर्यात खेप यूनाइटेड किंगडम और इटली भेजी गई।

जोहा चावल

  • परिचय: असम और पूर्वोत्तर भारत की विशिष्टता, जोहा चावल एक सुगंधित और छोटे दानों वाली शीतकालीन धान की प्रजाति है। यह अपने विशिष्ट खुशबू, बारीक दाने की बनावट तथा समृद्ध स्वाद के लिये प्रसिद्ध है।
  • प्रकार: लगभग 22 पारंपरिक जोहा चावल की किस्में पाई जाती हैं, जिनमें कोला जोहा, कुङ्कुनी जोहा और केतेकी जोहा सबसे लोकप्रिय हैं।
  • प्रमुख विशेषताएँ:
    • इसमें मधुमेहरोधी गुण हैं, क्योंकि यह रक्त शर्करा के स्तर को कम करने में मदद करता है और मधुमेह के शुरुआती चरण को रोक सकता है।
    • इसमें आवश्यक असंतृप्त वसा अम्ल, जैसे– लिनोलेइक अम्ल (ओमेगा-6) और लिनोलेनिक अम्ल (ओमेगा-3) होते हैं, जो चयापचय और हृदय स्वास्थ्य का समर्थन करते हैं।
    • इसमें ओमेगा-6 और ओमेगा-3 वसा अम्ल का संतुलित अनुपात होता है, जिससे अपनी अनूठी पोषक संरचना के कारण, यह पारंपरिक चावल की अन्य किस्मों के मुकाबले स्वास्थ्य की दृष्टि से कहीं अधिक लाभकारी और श्रेष्ठ सिद्ध होता है।
    • एंटीऑक्सीडेंट, फ्लेवोनोइड्स और ओरिज़ानॉल, फेरुलिक एसिड और टोकोट्रिएनॉल जैसे फेनोलिक यौगिकों से भरपूर, जो एंटीऑक्सीडेंट, हाइपोग्लाइसेमिक और कार्डियो-सुरक्षात्मक लाभ प्रदान करते हैं।
  • चुनौतियाँ: अपनी गुणवत्ता के बावज़ूद जोहा चावल की उत्पादकता और उपज कम है, जिसके कारण इसकी कृषि में कमी आ रही है और कुछ पारंपरिक किस्मों के विलुप्त होने का खतरा है।

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प्रोजेक्ट ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (GIB)

स्रोत: पीआईबी

राजस्थान के संरक्षण प्रजनन केंद्र में दो नए चूज़ों के जन्म के साथ प्रोजेक्ट ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (GIB) ने अपने कैप्टिव ब्रीडिंग प्रोग्राम के चौथे वर्ष में प्रवेश कर लिया है, जिससे कैप्टिव अवस्था में कुल पक्षियों की संख्या 70 हो गई है।

ग्रेट इंडियन बस्टर्ड

  • परिचय: यह भारत का सबसे गंभीर रूप से संकटग्रस्त पक्षी है और राजस्थान का राजकीय पक्षी है, जिसे घास के मैदानों के पारिस्थितिक तंत्र के स्वास्थ्य का प्रतिनिधित्व करने वाली एक प्रमुख प्रजाति माना जाता है।
    • GIB भारत में पाई जाने वाली चार बस्टर्ड प्रजातियों में से एक है, अन्य प्रजातियों में लेसर फ्लोरिकन, बंगाल फ्लोरिकन और मैक्वीन बस्टर्ड शामिल हैं।
    • यह सर्वाहारी है और सामने की दृष्टि की कमी के कारण बिजली के तारों से टकराने का खतरा रहता है।

वितरण: यह विश्व के सबसे भारी उड़ने वाले पक्षियों में से एक है, जो मुख्य रूप से राजस्थान के थार रेगिस्तान में पाया जाता है, इसके अतिरिक्त गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में भी देखने को मिलते हैं।

  • संरक्षण स्थिति: IUCN रेड लिस्ट (गंभीर रूप से संकटग्रस्त), CITES (परिशिष्ट I), प्रवासी प्रजातियों पर अभिसमय (CMS) (परिशिष्ट I) और वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 (अनुसूची I)।
  • संरक्षण प्रयास: प्रोजेक्ट GIB (वर्ष 2018 में शुरू किया गया) पर्यावरण मंत्रालय, भारतीय वन्यजीव संस्थान और राजस्थान वन विभाग की एक संयुक्त पहल है।
    • इस प्रजाति को वन्यजीव संरक्षण और पुनर्स्थापन उपायों का समर्थन करने के लिये MoEFCC की एकीकृत वन्यजीव आवास विकास योजना के अंतर्गत शामिल किया गया है।
    • वन्यजीव संरक्षण और विकास आयोग (MoEFCC), राजस्थान सरकार और भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) द्वारा जैसलमेर के डेज़र्ट नेशनल पार्क में वर्ष 2019 में एक प्रजनन केंद्र स्थापित किया गया था, ताकि एक 'कैप्टिव' (बंधक) आबादी तैयार की जा सके और पक्षियों को वापस जंगलों में छोड़ा जा सके।

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