सोमनाथ स्वाभिमान पर्व
प्रधानमंत्री के अनुसार, सोमनाथ मंदिर का एक हज़ार वर्षों का अस्तित्व भारत की अदम्य भावना का प्रतीक है।
- वर्तमान में राष्ट्र अपनी अटूट श्रद्धा और सांस्कृतिक संकल्प के 1000 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर 'सोमनाथ स्वाभिमान पर्व' (1026–2026) मना रहा है।
सोमनाथ मंदिर से संबंधित प्रमुख तथ्य क्या हैं?
- परिचय: गुजरात तट पर प्रभास पाटन में स्थित सोमनाथ मंदिर 12 पवित्र शिव ज्योतिर्लिंगों में से पहला ज्योतिर्लिंग है, जैसा कि शिव पुराण और द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम् में वर्णित है।
- मंदिर का उल्लेख स्कंदपुराण, श्रीमद्भागवत, शिवपुराण तथा ऋग्वेद जैसे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है।
- यह वह निजधाम प्रस्थान लीला-स्थल भी है, जहाँ से भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी अंतिम यात्रा प्रारंभ की थी।
- इसे अत्यंत प्राचीन तीर्थधाम के रूप में पहचाना गया है, जिसकी महिमा वैदिक साहित्य में गंगा, यमुना और सरस्वती के समान बताई गई है।
- निर्माण: परंपरा के अनुसार, इसे अलग-अलग चरणों में बनाया गया था - पहले सोमराज (चंद्र देव) द्वारा सोने से, फिर रावण द्वारा चांदी से और बाद में भगवान कृष्ण द्वारा लकड़ी से।
- सोलंकी वंश के राजा भीमदेव प्रथम (या भीम प्रथम) ने 1026 ईस्वी में महमूद गज़नवी द्वारा मंदिर के विध्वंस के बाद इसका पत्थर से पुनर्निर्माण कराया।
- भौगोलिक महत्त्व: यह मंदिर उस स्थान पर निर्मित है जहाँ कपिला, हिरण और सरस्वती नदियाँ अरब सागर से मिलती हैं।
- अबाधित समुद्र मार्ग (तीर्थस्तंभ) दक्षिणी ध्रुव के लिये एक अविच्छिन्न समुद्री मार्ग को दर्शाता है, यहाँ से निकटतम भूभाग लगभग 9,936 किमी. दूर स्थित है, जो प्राचीन भारतीय भौगोलिक ज्ञान को प्रतिबिंबित करता है।
- स्थापत्य की विशेषताएँ: इसे कैलास महामेरु प्रसाद शैली में निर्मित किया गया है। संरचना में गर्भगृह, सभामंडप और नृत्यमंडप शामिल हैं। इसका शिखर 155 फीट ऊँचा है।
- विनाश एवं पुनर्निर्माण चक्र: 1026 ई. में महमूद गज़नवी द्वारा पहला आक्रमण किया गया, जिसका उल्लेख फारसी विद्वान अल-बरूनी ने किया है।
- मंदिर को 1026, 1297, 1394 और 1706 ई. (औरंगज़ेब के शासनकाल में) सहित कई बार लूटा गया और नष्ट किया गया। वर्ष 2026 पहले आक्रमण के 1,000 वर्ष पूर्ण होने का प्रतीक है, जो एक महत्त्वपूर्ण सभ्यतागत पड़ाव को चिह्नित करता है।
- वर्तमान (7वाँ) मंदिर स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रीय पुनरुत्थान के प्रतीक के रूप में पुनर्निर्मित किया गया। सरदार वल्लभभाई पटेल ने वर्ष 1947 में पुनर्निर्माण की पहल की। प्राण-प्रतिष्ठा राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा 11 मई, 1951 को संपन्न हुई। पुनर्निर्माण को के.एम. मुंशी ("सोमनाथ: द श्राइन इटरनल" के लेखक) ने समर्थन दिया।
- सांस्कृतिक एवं बौद्धिक महत्त्व: 1890 के दशक में स्वामी विवेकानंद ने सोमनाथ का दर्शन किया और इसे भारत की राष्ट्रीय जीवनधारा का प्रतीक बताया, जो बार-बार नष्ट होकर भी पुनः जन्म लेती रही है।
- विभिन्न परंपराओं के संतों द्वारा पूज्य, जिनमें जैन आचार्य हेमचंद्राचार्य भी शामिल हैं।
- महारानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा प्रतिकूल राजनीतिक परिस्थितियों में भी आनुष्ठानिक निरंतरता बनाए रखी गई।
- सोमनाथ कट्टरता पर आस्था, विनाश पर सृजन और भारतीय सभ्यता की शाश्वतता का प्रतीक है। यह संदेश भगवद्गीता के उस विचार को प्रतिध्वनित करता है कि आत्मा अविनाशी है — न उसे नष्ट किया जा सकता है, न उसका अंत होता है।
कैलास महामेरु प्रसाद शैली
- परिचय: यह हिंदू मंदिर स्थापत्य की एक विशिष्ट शैली को संदर्भित करता है, जो मुख्यतः चालुक्य (या सोलंकी) परंपरा से संबद्ध है। यह शैली विशेष रूप से पश्चिमी भारत में, खासकर गुजरात में प्रमुख रूप से विकसित हुई।
- आदर्श और प्रतीकात्मकता: कैलास महामेरु प्रसाद शब्द मंदिर की उस भव्य संरचना का आह्वान करता है, जो कैलास पर्वत (शिव का निवास) और मेरु पर्वत (हिंदू ब्रह्मांडीय कल्पना का ब्रह्मांडीय पर्वत) का प्रतीक है तथा ऊँचे, भव्य शिखर (Spire) और सूक्ष्म व जटिल शिल्पकला पर विशेष बल देता है।
- प्रमुख स्थापत्य विशेषताएँ: यह उत्तर भारतीय मंदिर वास्तुकला का नागर शैली
- उत्तर भारतीय मंदिर वास्तुकला की नागर शैली के अंतर्गत आता है किंतु इसमें चालुक्य/सोलंकी काल के क्षेत्रीय तत्त्वों का समावेश भी है, जिसे प्रायः मारू-गुर्जर स्थापत्य के अंतर्गत वर्गीकृत किया जाता है।
- विशेषताएँ: इसमें ऊँचा शिखर (सोमनाथ में लगभग 50 मीटर), सुस्पष्ट एवं अलंकृत नक्काशी, गर्भगृह (Sanctum), सभामंडप तथा नृत्यमंडप शामिल हैं।
- यह शैली गुजरात के पारंपरिक शिल्पकारों, जिन्हें सोमपुरा सालाट कहा जाता है, के उच्च स्तरीय स्थापत्य एवं शिल्प-कौशल का प्रदर्शन करती है।
12 ज्योतिर्लिंग और उनका स्थान
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ज्योतिर्लिंग का नाम |
नगर/स्थान |
राज्य |
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सोमनाथ |
प्रभास पाटन |
गुजरात |
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मल्लिकार्जुन |
श्रीशैलम |
आंध्र प्रदेश |
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महाकालेश्वर |
उज्जैन |
मध्य प्रदेश |
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ओंकारेश्वर |
मांधाता द्वीप |
मध्य प्रदेश |
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केदारनाथ |
केदारनाथ |
उत्तराखंड |
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भीमाशंकर |
पुणे (खेड़) |
महाराष्ट्र |
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काशी विश्वनाथ |
वाराणसी |
उत्तर प्रदेश |
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त्र्यंबकेश्वर |
त्र्यंबक |
महाराष्ट्र |
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बैद्यनाथ |
देवघर |
झारखंड |
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नागेश्वर |
द्वारका |
गुजरात |
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रामेश्वरम |
रामेश्वरम |
तमिलनाडु |
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घृष्णेश्वर |
एलोरा |
महाराष्ट्र |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. सोमनाथ के लिये वर्ष 1026 ई. का ऐतिहासिक महत्त्व क्या है?
यह वर्ष महमूद गज़नवी द्वारा मंदिर पर किये गए पहले बड़े आक्रमण और विध्वंस को दर्शाता है, जिसकी सहस्राब्दी बाद सोमनाथ स्वाभिमान पर्व (1026–2026) के रूप में स्मृति की जाती है।
2. स्वतंत्रता के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का नेतृत्व किसने किया?
सरदार वल्लभभाई पटेल ने 1947 में पुनर्निर्माण की पहल की; 1951 में डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा प्राण-प्रतिष्ठा संपन्न की गई।
3. सोमनाथ में अबाधित समुद्र मार्ग क्या है?
यह समुद्र की ओर उन्मुख एक अक्ष (तीर्थस्तंभ) है, जो दक्षिणी ध्रुव तक निर्बाध समुद्री मार्ग (~9,936 किमी.) को दर्शाता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रश्न: हाल ही में प्रधानमंत्री ने वेरावल में सोमनाथ मंदिर के निकट नए सर्किट हाउस का उद्घाटन किया। सोमनाथ मंदिर के बारे में निम्नलिखित कथनों में कौन-से सही हैं? (2022)
- सोमनाथ मंदिर ज्योतिर्लिंग देव-मंदिरों में से एक है।
- अल-बरूनी ने सोमनाथ मंदिर का वर्णन किया है।
- सोमनाथ मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा (आज के मंदिर की स्थापना) राष्ट्रपति एस. राधाकृष्णन द्वारा की गई थी।
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (a)
अधिसूचित रोग के रूप में रेबीज़
दिल्ली सरकार ने महामारी रोग अधिनियम, 1897 के तहत मानव रेबीज़ को अधिसूचित रोग (नोटिफायबल डिजीज़) घोषित करने का निर्णय लिया है, जिसका उद्देश्य कुत्तों के काटने से फैलने वाले रेबीज़ के कारण होने वाली मानव मौतों को शून्य करना है।
अधिसूचित रोग (Notifiable Disease)
- परिचय: अधिसूचित रोग वे होते हैं, जिन्हें महामारी रोग अधिनियम, 1897 जैसे कानूनों के तहत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्राधिकरणों को रिपोर्ट करना कानूनी रूप से अनिवार्य होता है। रोग निगरानी का प्रमुख ढाँचा एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम (IDSP) है, जिसका संचालन राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) द्वारा किया जाता है।
- अधिसूचना के प्रभाव: किसी रोग के अधिसूचित होते ही सभी स्वास्थ्य सेवा प्रदाता (सार्वजनिक एवं निजी) अस्पताल और चिकित्सक कानूनी रूप से संदिग्ध, संभावित तथा पुष्ट मामलों की जानकारी निर्धारित प्राधिकरणों को देने के लिये बाध्य हो जाते हैं, जिससे व्यापक और सटीक डेटा संग्रह सुनिश्चित होता है।
- सामान्यतः अधिसूचित रोग: यद्यपि राज्यों के अनुसार सूचियाँ भिन्न हो सकती हैं, फिर भी कई राज्यों में सामान्यतः जिन रोगों को अधिसूचित किया गया है, उनमें तपेदिक, डेंगू, मलेरिया, हैज़ा, हेपेटाइटिस, खसरा, लेप्टोस्पायरोसिस और पोलियो शामिल हैं। कोविड-19 को महामारी के दौरान देश भर में अधिसूचित रोग घोषित किया गया था।
- हाल के वर्षों में नए अधिसूचित रोगों के उदाहरणों में वर्ष 2024 में सर्पदंश और वर्ष 2025 में मानव रेबीज़ को शामिल किया गया है।
- विकेंद्रीकृत एवं असमान प्रणाली: भारत में अधिसूचित रोगों की कोई एकल, समान राष्ट्रीय सूची नहीं है। किसी रोग को अधिसूचित करने का अधिकार मुख्यतः राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों (जहाँ विधानसभा है) की सरकारों के पास है, जिसके कारण विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में अधिसूचित रोगों की सूचियों में भिन्नता देखने को मिलती है।
- वैश्विक प्रतिबद्धता: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अंतर्गत अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य विनियम (2005) (IHR) एक कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतर्राष्ट्रीय कानून है, जिसके तहत सदस्य देशों को ऐसे सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिमों या घटनाओं की जानकारी WHO को देना अनिवार्य है, जिनके अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रभाव हो सकते हैं, चाहे उनका उद्गम या स्रोत कुछ भी हो।
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और पढ़ें: भारत में रेबीज़ |
सरकार ने मेटालर्जिकल कोक के आयात पर प्रतिबंध हटाए
भारत सरकार ने कम राख वाले मेटालर्जिकल कोक (18% से कम राख सामग्री) पर लगाए गए आयात प्रतिबंधों को हटाने का निर्णय लिया है। यह कदम अस्थायी एंटी-डंपिंग ड्यूटी लागू करने के बाद उठाया गया, जिसका उद्देश्य व्यापार संरक्षण बनाए रखते हुए इस्पात उद्योग के लिये कच्चे माल की निर्बाध उपलब्धता सुनिश्चित करना है।
- इसके पहले, दिसंबर 2025 में, विदेशी व्यापार महानिदेशालय (DGFT) ने कम राख वाले मेटालर्जिकल कोक पर आयात प्रतिबंधों को 1 जनवरी से 30 जून, 2026 तक बढ़ा दिया था, क्योंकि उस समय एंटी-डंपिंग ड्यूटी नहीं था।
- हालाँकि वित्त मंत्रालय द्वारा एंटी-डंपिंग ड्यूटी लगाए जाने को मंज़ूरी देने के बाद प्रतिबंध लगाने का तर्क समाप्त हो गया, जिसके परिणामस्वरूप DGFT ने आयात पर मात्रात्मक प्रतिबंध हटा दिये।
- भारत ने कम राख वाले मेटालर्जिकल कोक के आयात पर प्रति टन 60 अमेरिकी डॉलर से 130 अमेरिकी डॉलर तक का अस्थायी एंटी-डंपिंग ड्यूटी लगाया है।
- एंटी-डंपिंग ड्यूटी: यह एक व्यापार सुधारात्मक उपाय है, जो उन आयातों पर लगाया जाता है जिन्हें सामान्य मूल्य से कम पर बेचा जाता है और जिससे घरेलू उत्पादकों को वास्तविक नुकसान पहुँचता है। इसका उद्देश्य आयात की मात्रा को प्रतिबंधित करना नहीं, बल्कि निष्पक्ष प्रतिस्पर्द्धा बहाल करना है।
- मेटालर्जिकल कोक: यह कोकिंग कोल से प्राप्त उच्च-कार्बन और कम अशुद्धता वाला ईंधन है, जिसका उपयोग ब्लास्ट फर्नेस इस्पात निर्माण में एक प्रमुख इनपुट के रूप में किया जाता है। इसका उत्पादन कोक ओवन में हवा की अनुपस्थिति में कोयले को गर्म करके किया जाता है।(भंजक आसवन )
- यह ब्लास्ट फर्नेस में ईंधन और अपचायक (Reducing Agent) दोनों का काम करता है, जिससे लौह अयस्क को द्रवित लोहा में परिवर्तित किया जा सके।
- कम राख (Low Ash) और अति-निम्न फॉस्फोरस वाली किस्में उच्च-श्रेणी के इस्पात निर्माण के लिये विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं।
- भारत के पास विशाल प्रमाणित कोकिंग कोयला भंडार हैं (16.5 अरब टन मध्यम गुणवत्ता वाला और 5.13 अरब टन प्रमुख गुणवत्ता वाला कोयला), फिर भी यह लगभग 85% कोकिंग कोयले का आयात करता है। इसका कारण यह है कि घरेलू कोयले का बड़ा हिस्सा धातुकर्म उपयोग के लिये उपयुक्त नहीं है, जिससे इस्पात क्षेत्र और समग्र आर्थिक स्थिरता बाहरी आपूर्ति संकट के प्रति संवेदनशील बन जाती है।
शहरी हरियाली में हरित विरोधाभास
भारत सहित 105 देशों के 761 शहरों पर आधारित एक वैश्विक अध्ययन से पता चला है कि शहरी हरितकरण सदैव शहरों को ठंडा नहीं करता। यदि पेड़ों और वनस्पति का रोपण सही योजना के बगैर किया जाए, तो विशेषतः शुष्क और जल की कमी वाले क्षेत्रों में इससे गर्मी में और वृद्धि की संभावना होती है।
- शहरी ऊष्मा के प्रेरक कारक: वैश्विक जलवायु परिवर्तन और नगरीय ऊष्मा द्वीप प्रभाव के कारण शहर निरंतर अधिक गर्म हो रहे हैं। इस प्रभाव में कंक्रीट और डामर जैसी सतहें आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक ऊष्मा को अवशोषित कर उसे लंबे समय तक संचित रखती हैं।
- तापमान विनियमन क्षमता: अध्ययन ने तापमान विनियमन क्षमता नामक एक मापदंड का उपयोग किया, जिसे वनस्पति-आच्छादित सतहों और कंक्रीट व डामर जैसी विनिर्मित सतहों के बीच तापांतर के रूप में परिभाषित किया गया है।
- एक नकारात्मक मान इंगित करता है कि वनस्पति विनिर्मित क्षेत्रों की तुलना में ठंडी है (शीतलन प्रभाव) और सकारात्मक मान इंगित करता है कि वनस्पति गर्म है (तापन प्रभाव)। यह मापदंड अध्ययन को यह आकलन करने में मदद करता है कि शहरी हरियाली कब और कहाँ नगरीय ऊष्मा को कम करती है या उसमें वृद्धि करती है।
- अध्ययन के निष्कर्ष: समग्र रूप से, वनस्पति ने अधिकांश शहरों को ठंडा किया, जबकि लगभग एक-चौथाई शहरों, मुख्यतः कम वर्षा (<1,000 मिमी.) वाले, ने शुद्ध तापन का अनुभव किया।
- शुष्क क्षेत्रों में हरित विरोधाभास: शुष्क और अर्द्ध-शुष्क शहरों में सीमित जल उपलब्धता वाष्पोत्सर्जन को कमज़ोर करती है, जिससे वनस्पति के शीतलन प्रभाव में कमी आती है।
- साथ ही, वनस्पति विनिर्मित क्षेत्रों की तुलना में अधिक सौर विकिरण अवशोषित कर सकती है, जिससे सतही तापमान में वृद्धि हो सकती है।
- उष्णता के तीव्र दबाव और कम आर्द्रता की स्थिति में पौधे जल की हानि को और अधिक सीमित कर देते हैं, जिससे वाष्पीकरणीय शीतलन में तीव्र कमी आ जाती है तथा नगरीय ऊष्मा और अधिक बढ़ जाती है।
- यह भारत के लिये महत्त्वपूर्ण है, जहाँ विभिन्न शहरों को जलवायु-अनुकूल वनस्पति और समेकित ऊष्मा-शमन (heat-mitigation) योजना की आवश्यकता है।
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और पढ़ें: नगरीय ऊष्मा द्वीप प्रभाव |
चीन की जन-केंद्रित वैश्विक शासन पहलें
25वें शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइज़ेशन तियानजिन समिट, 2025 में चीन ने अपने पहले के वैश्विक विकास पहल (2021), वैश्विक सुरक्षा पहल (2022) और वैश्विक सभ्यता पहल (2023) पर आधारित वैश्विक शासन पहल (GGI) का प्रस्ताव रखा।
- चार पहलों में लोगों को वैश्विक शासन (ग्लोबल गवर्नेंस) के केंद्र में रखा गया है, जिनका ध्यान व्यापक कल्याण लाभ और गरिमा पर है। ये साझा विकास, सामूहिक सुरक्षा और समावेशी सहयोग के माध्यम से वैश्विक शासन में सुधार करने का लक्ष्य रखती हैं।
- वैश्विक शासन पहल (Global Governance Initiative- GGI): यह एक अधिक न्यायपूर्ण और समान वैश्विक शासन प्रणाली की मांग करती है जिसमें समावेशी सुधार शामिल हों, जो लोगों के कल्याण में ठोस सुधार सुनिश्चित करें।
- वैश्विक विकास पहल (Global Development Initiative- GDI): यह जन-केंद्रित विकास पर केंद्रित है जिसमें आजीविका की सुरक्षा और विकास के लाभों का समान वितरण सुनिश्चित किया जाता है, जो सतत विकास हेतु 2030 एजेंडा और विकास सहयोग के साथ संरेखित है।
- वैश्विक सुरक्षा पहल (Global Security Initiative- GSI): यह संवाद और परामर्श के माध्यम से शांति को महत्त्व देती है, साथ ही संप्रभु विकास मार्गों का सम्मान करती है।
- वैश्विक सभ्यता पहल (Global Civilization Initiative- GCI): यह सभ्यताओं के बीच परस्पर सम्मान और साझा मानवीय मूल्यों को प्रोत्साहित करती है।
- रणनीतिक निहितार्थ: ये चारों पहलें संयुक्त रूप से बहुपक्षीयता हेतु चीन के वैकल्पिक दृष्टिकोण को प्रस्तुत करती हैं, मौजूदा वैश्विक शासन संरचनाओं को चुनौती देती हैं और साथ ही ग्लोबल साउथ के लिये आकर्षक भी हैं।
भारत की जन-केंद्रित वैश्विक पहलें
- अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (International Solar Alliance- ISA): यह जलवायु न्याय, किफायती ऊर्जा सुलभता और विकासशील देशों के लिये सतत विकास पर केंद्रित है।
- आपदा-प्रतिरोधी अवसंरचना गठबंधन (Coalition for Disaster Resilient Infrastructure- CDRI): यह दृढ़ अवसंरचना को बढ़ावा देता है ताकि आजीविका की सुरक्षा हो और आपदा जोखिम, विशेष रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में, कम किया जा सके।
- मिशन LiFE (लाइफस्टाइल फॉर एनवायरनमेंट): यह एक वैश्विक पहल है, जिसमें जन नेतृत्व के माध्यम से जलवायु कार्रवाई के अंतर्गत व्यवहार परिवर्तन और सतत उपभोग को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
- डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) मॉडल: यह भारत के पारदर्शी और समावेशी डिजिटल सार्वजनिक साधनों (भुगतान, पहचान, सेवा प्रदायगी) का समर्थन करता है, जिसका उद्देश्य वैश्विक स्तर पर शासन और समावेशन में सुधार लाना है।
- वैक्सीन मैत्री: यह स्वास्थ्य को एक वैश्विक सार्वजनिक वस्तु मानता है और संकट के समय समान सुलभता का समर्थन करता है।
- वसुधैव कुटुम्बकम् (G20, 2023): भारत का G20 विषय जन-केंद्रित, समावेशी और सतत विकास पर ज़ोर देता है, विशेष रूप से ग्लोबल साउथ के लिये।
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और पढ़ें: सुशासन |


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