अमेरिका-इज़राइल-ईरान संघर्ष में मिसाइल रक्षा
चर्चा में क्यों?
अमेरिका–इज़रायल–ईरान संघर्ष ने मिसाइल रक्षा और इंटरसेप्टर सिस्टम्स को आधुनिक युद्ध में सामने ला दिया है। मिसाइलों और ड्रोन की लहरों ने मल्टी‑लेयर्ड वायु रक्षा नेटवर्क्स को परखा है, जिससे उच्च‑तीव्रता संघर्षों में उनकी रणनीतिक महत्ता उजागर हुई है।
मिसाइल रक्षा प्रणाली क्या है?
- परिचय: मिसाइल रक्षा एक व्यापक सैन्य संरचना को संदर्भित करती है, जो आने वाली शत्रु मिसाइलों का पता लगाने, उन्हें ट्रैक करने और उनके लक्ष्यों तक पहुँचने से पहले उन्हें नष्ट करने के लिये डिज़ाइन की गई है।
- मुख्य भाग:
- सेंसर: पृथ्वी की कक्षा में उपग्रह और ज़मीन आधारित रडार स्टेशन आकाश की निगरानी करते हैं ताकि खतरे का पता लगाया जा सके और उनकी गति तथा दिशा ट्रैक की जा सके।
- कमांड सेंटर्स: सैन्य कर्मी शक्तिशाली कंप्यूटर का उपयोग करके सेंसर डेटा को प्रोसेस करते हैं, संकटग्रस्त लक्ष्यों की गणना करते हैं और सबसे उपयुक्त प्रतिक्रिया निर्धारित करते हैं।
- इंटरसेप्टर्स: वास्तविक मिसाइलें जो आने वाले खतरे की ओर लॉन्च की जाती हैं और उसे नष्ट करती हैं।
- रणनीतिक महत्त्व: केवल जान और बुनियादी ढाँचे की रक्षा करने तक ही सीमित नहीं, ये प्रणालियाँ निवारक का काम भी करती हैं। शत्रु की मिसाइलों को अप्रभावी बनाकर ये संघर्ष शुरू करने से रोकती हैं और राजनीतिक नेताओं को प्रतिक्रिया तय करने के लिये महत्त्वपूर्ण समय प्रदान करती हैं।
मिसाइल इंटरसेप्टर कैसे काम करता है?
- पता लगाना और ट्रैकिंग: एक स्थिर ग्राउंड रडार आकाश में हज़ारों रेडियो बीम को निर्देशित करता है।
- जब कोई बीम किसी वस्तु से परावर्तित होती है, तो कंप्यूटर उस सिग्नल का विश्लेषण करके लक्ष्य की गति, ऊँचाई और उड़ान पथ का आकलन करता है।
- लॉक प्राप्त करना: यदि लक्ष्य को खतरा माना जाता है, तो रडार अपनी ऊर्जा आकाश के उस विशेष बिंदु पर केंद्रित करता है और लक्ष्य की स्थिति को लगातार अपडेट करता है।
- लॉन्च कमांड: एंगेजमेंट कंट्रोल स्टेशन (ECS) अनुगमन पथ का अनुमान करता है और इंटरसेप्टर के रॉकेट मोटर को सक्रिय करने के लिये लॉन्चर तक सिग्नल भेजता है।
- मध्य-उड़ान मार्गदर्शन: जैसे ही इंटरसेप्टर उड़ान भरता है, ग्राउंड रडार दुश्मन लक्ष्य और इंटरसेप्टर दोनों को ट्रैक करता है और इंटरसेप्टर को मार्गदर्शन कमांड भेजता है।
- अंतिम चरण में नष्ट करना: अंतिम क्षणों में, इंटरसेप्टर अपने ऑनबोर्ड "सीकर" (एक सूक्ष्म रडार) का उपयोग करके लक्ष्य का पता लगाता है। यह खतरे को दो तरीकों में से किसी एक से नष्ट करता है:
- प्रॉक्सिमिटी फ़्यूज़: लक्ष्य के पास एक शक्तिशाली वारहेड विस्फोट करता है और शार्पनेल के ज़रिये लक्ष्य को नष्ट कर देता है (पुराने मॉडलों में इस्तेमाल होता है)।
- हिट-टू-किल: इंटरसेप्टर सीधे लक्ष्य से टकराता है और केवल गतिज ऊर्जा (आधुनिक सिस्टम में इस्तेमाल होता है) के बल से उसे पूरी तरह नष्ट कर देता है।
अमेरिका-इज़रायल-ईरान संघर्ष में कौन से मुख्य डिफेंस सिस्टम तैनात हैं?
अमेरिका
- THAAD अपनी 'हिट-टू-किल' तकनीक का उपयोग करके कम और मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों को उनके अंतिम चरण (Terminal Phase) में अत्यधिक ऊँचाई पर ही नष्ट कर देता है, जिससे सैन्य ठिकानों और शहरों की सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
- पैट्रियट मिसाइल सिस्टम: बैलिस्टिक मिसाइलों, क्रूज़ मिसाइलों और विमान के खिलाफ अंतिम-रेखा रक्षा प्रदान करता है तथा इसे महत्त्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे एवं सैन्य प्रतिष्ठानों की सुरक्षा के लिये व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।
- SM-3 और SM-6 (US नेवी): समुद्र-आधारित इंटरसेप्टर्स। SM-3 मध्य मार्ग उड़ान के दौरान बैलिस्टिक मिसाइलों को नष्ट करता है, जबकि SM-6 टर्मिनल चरण में मिसाइलों, विमानों तथा ड्रोन को निशाना बनाता है।
- इनडायरेक्ट फायर प्रोटेक्शन कैपेबिलिटी (IFPC): बेसों की रक्षा के लिये AIM-9X (एक प्रमुख, शॉर्ट-रेंज, इंफ्रारेड-ट्रैकिंग, एयर-टू-एयर और सतह से लॉन्च की जाने वाली इंटरसेप्टर मिसाइल) का उपयोग करता है, जिससे महंगी पैट्रियट मिसाइलों की बचत होती है।
इज़रायल
- एरो-2 और एरो-3: लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा प्रणाली। एरो-3 वायुमंडल के बाहर मिसाइलों को रोकता है, जबकि एरो-2 वायुमंडल के भीतर कार्य करता है।
- डेविड स्लिंग: इसे मध्यम से लंबी दूरी के रॉकेट, क्रूज़ मिसाइल और सामरिक बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकने के लिये डिज़ाइन किया गया है, जो 'ऐरो' (Arrow) और 'आयरन डोम' के बीच के अंतर को कम करता है।
- आयरन डोम: छोटी दूरी की रक्षा प्रणाली जो रॉकेट, आर्टिलरी गोले और ड्रोन के खिलाफ प्रभावी है, जिसमें कम गति वाले खतरों के खिलाफ उच्च सफलता दर है।
- आयरन बीम: डायरेक्टेड-एनर्जी लेज़र सिस्टम जो कम लागत पर ड्रोन और छोटे प्रोजेक्टाइल को नष्ट करती है, जिससे महंगे इंटरसेप्टर पर निर्भरता कम हो जाती है।
संयुक्त अरब अमीरात (UAE)
- शेओंगुंग II: दक्षिण कोरियाई मध्यम दूरी की वायु रक्षा प्रणाली जिसमें 360° रडार और वर्टिकल लॉन्च (लंबवत् प्रक्षेपण) की क्षमता है। यह फारस की खाड़ी के ऊपर कम ऊँचाई पर उड़ने वाली क्रूज़ मिसाइलों और सामरिक बैलिस्टिक खतरों के खिलाफ प्रभावी है।
ईरान
- बावर-373: लंबी दूरी की वायु रक्षा प्रणाली जिसे विमानों और बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकने के लिये डिज़ाइन किया गया है, जो उन्नत सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणालियों (SAM) के तुलनीय है।
- सेवोम-ए-खोरदाद: मोबाइल एयर डिफेंस सिस्टम, जो विमानों और क्रूज़ मिसाइलों को निशाना बनाने में सक्षम है और तेज़ी से स्थान बदलकर अपनी उत्तरजीविता को बढ़ाती है।
- टोर-M1: छोटी दूरी की प्रणाली, जिसका उपयोग प्रिसीजन-गाइडेड म्युनिशन, ड्रोन और कम ऊँचाई पर उड़ने वाली क्रूज़ मिसाइलों को रोकने के लिये किया जाता है।
- मजीद और अज़राखश: ये सिस्टम ड्रोन और कम ऊँचाई वाले हवाई खतरों का सामना करने के लिये डिज़ाइन किये गए हैं, जो महत्त्वपूर्ण सुविधाओं की रक्षा करती हैं।
| और पढ़ें: बैलिस्टिक और वायु रक्षा प्रणालियों में भारत की प्रगति |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. मिसाइल डिफेंस सिस्टम क्या है?
मिसाइल डिफेंस सिस्टम एक सैन्य संरचना है, जो लक्ष्यों की रक्षा के लिये सेंसर, कमांड सेंटर और इंटरसेप्टर का उपयोग करके आने वाली मिसाइलों का पता लगाती है, उन्हें ट्रैक करती है और नष्ट कर देती है।
2. हिट-टू-किल और प्रॉक्सिमिटी फ्यूज़ इंटरसेप्शन के बीच क्या अंतर है?
'हिट-टू-किल' तकनीक गतिज ऊर्जा का उपयोग करके सीधे टकराव के माध्यम से लक्ष्यों को नष्ट करती है, जबकि 'प्रॉक्सिमिटी फ्यूज़' इंटरसेप्टर लक्ष्य के पास पहुँचकर विस्फोट करते हैं ताकि छर्रों से उसे नष्ट किया जा सके।
3. आयरन डोम को अत्यधिक प्रभावी क्यों माना जाता है?
आयरन डोम की कम दूरी के रॉकेट और ड्रोन के खिलाफ सफलता दर 80-97% है, जो इसे शहरी और सामरिक रक्षा के लिये अत्यधिक प्रभावी बनाती है।
4. मिसाइल डिफेंस में THAAD की क्या भूमिका है?
बैलिस्टिक मिसाइलों को उनके अंतिम चरण में अधिक ऊँचाई पर रोकता है, जिससे शहरों और सैन्य अड्डों को व्यापक क्षेत्र में सुरक्षा मिलती है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रिलिम्स
प्रश्न. कभी-कभी समाचार में उल्लिखित ‘टर्मिनल हाई ऑल्टिट्यूड एरिया डिफेंस’ (टीएचएएडी) क्या है? (2018)
(a) इज़रायल की एक रडार प्रणाली
(b) भारत का घरेलू मिसाइल-प्रतिरोधी कार्यक्रम
(c) अमेरिकी मिसाइल-प्रतिरोधी प्रणाली
(d) जापान और दक्षिण कोरिया के बीच एक रक्षा सहयोग
उत्तर: C
केंद्र ने लगाई राइस फोर्टिफिकेशन पर अस्थायी रोक
चर्चा में क्यों?
केंद्र सरकार ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) खड़गपुर के अध्ययन के आधार पर किये गए व्यापक समीक्षा के बाद प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) और संबंधित योजनाओं के तहत राइस फोर्टिफिकेशन को "अस्थायी रूप से" बंद करने का निर्णय लिया है।
राइस फोर्टिफिकेशन से संबंधित हाल के विकास क्या हैं?
- पोषक तत्त्वों का क्षय: IIT खड़गपुर के अध्ययन में विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में फोर्टिफाइड राइस कर्नेल (FRK) और फोर्टिफाइड चावल (FR) की शेल्फ लाइफ का मूल्यांकन किया गया।
- अध्ययन में पाया गया कि नमी की मात्रा, भंडारण की परिस्थितियाँ, तापमान, सापेक्ष आर्द्रता और पैकेजिंग सामग्री स्थिरता को महत्त्वपूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं, जिससे समय के साथ सूक्ष्मपोषक तत्त्वों का स्तर घटता है।
- भंडारण चक्र और संचालन संबंधी वास्तविकताएँ: समस्या इस तथ्य से और बढ़ जाती है कि केंद्रीय भंडार में चावल अक्सर 2-3 वर्षों तक रखा जाता है। PMGKAY के तहत वार्षिक आवंटन 3.72 करोड़ टन और कुल अनुमानित उपलब्धता 6.74 करोड़ टन होने के कारण यह अंतर लंबे भंडारण चक्र को दर्शाता है, जिससे पोषक तत्त्वों के क्षय का जोखिम बढ़ जाता है।
- कल्याणकारी योजनाओं और निरंतरता पर प्रभाव: सरकार ने स्पष्ट किया है कि इस अस्थायी बंदी से खाद्यान्न पात्रता में कोई कमी नहीं होगी और न ही सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS), एकीकृत बाल विकास योजना (ICDS) या पीएम पोषण योजना (पूर्व में मिड-डे मील योजना) के अंतर्गत संचालित कार्यों पर कोई प्रभाव पड़ेगा।
- उद्योगगत संकट: इस अचानक लिये गए निर्णय से मिलिंग उद्योग में संकट उत्पन्न हो गया है। हितधारकों ने फोलिक एसिड, टूटा चावल और प्रीमिक्स जैसे कच्चे माल पर भारी नुकसान की सूचना दी है तथा सुझाव दिया है कि इस नीति को अगले फसल सत्र (2026-27) के साथ समन्वित किया जाना चाहिये था।
राइस फोर्टिफिकेशन क्या है?
- परिचय: राइस फोर्टिफिकेशन वह प्रक्रिया है जिसमें कटाई के बाद की प्रसंस्करण प्रक्रिया के दौरान चावल में आवश्यक विटामिन और खनिजों को उद्देश्यपूर्ण रूप से मिलाया जाता है, ताकि उसकी पोषण गुणवत्ता को बढ़ाया जा सके।
- यह हिडन हंगर (सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी) की समस्या को दूर करता है, बिना चावल के स्वाद, रूप-रंग या पकाने के गुणों में परिवर्तन किये।
- फोर्टिफिकेशन का औचित्य: सबसे अधिक उपभोग किया जाने वाला पॉलिश किया हुआ सफेद चावल मिलिंग प्रक्रिया के दौरान अपने प्राकृतिक विटामिनों (जैसे- थायमिन, नियासिन, विटामिन B6 और विटामिन E) का लगभग 75-90% खो देता है। फोर्टिफिकेशन इन खोए हुए पोषक तत्त्वों की पूर्ति करता है और उन अन्य पोषक तत्त्वों को भी जोड़ता है जो चावल में स्वाभाविक रूप से नहीं होते।
- सामान्यतः शामिल किये जाने वाले सूक्ष्म पोषक तत्त्व: आमतौर पर शामिल किये जाने वाले प्रमुख पोषक तत्त्वों में आयरन (एनीमिया से लड़ने के लिये), फोलिक एसिड (विटामिन B9) (न्यूरल ट्यूब दोषों की रोकथाम के लिये), विटामिन B12, ज़िंक, विटामिन A तथा अन्य विटामिन B-कॉम्प्लेक्स (B1, B3, B6) शामिल होते हैं।
- भारत में नीतिगत क्रियान्वयन: कुपोषण से निपटने के उद्देश्य से इसकी घोषणा प्रधानमंत्री द्वारा स्वतंत्रता दिवस (75वाँ) के अवसर पर की गई थी। इसका पहला चरण अक्तूबर 2021 में प्रारंभ हुआ, जिसके अंतर्गत समेकित बाल विकास सेवा (ICDS) तथा प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण (पीएम पोषण) योजना (पूर्व में मिड-डे मील योजना) के माध्यम से फोर्टिफाइड चावल की आपूर्ति की गई।
- नियामक मानक: भारत में फोर्टिफाइड चावल का उत्पादन सामान्य चावल को फोर्टिफाइड राइस कर्नेल्स (FRK) के साथ मिलाकर किया जाता है। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) द्वारा निर्धारित मानकों के अनुसार चावल में तीन सूक्ष्म पोषक तत्त्व लौह (Iron), फोलिक एसिड (Folic Acid) और विटामिन B12 मिलाने का प्रावधान किया गया है।
राइस फोर्टिफिकेशन के घटक
- आयरन: यह एक सूक्ष्म खनिज है, जो ऑक्सीजन परिवहन के लिये हीमोग्लोबिन के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। आयरन की कमी से एनीमिया (रक्तल्पता) जैसे रोग देखने को मिलते हैं, जो महिलाओं, बच्चों और गर्भवती महिलाओं में अधिक प्रचलित है।
- विटामिन B12 (कोबालमिन): DNA संश्लेषण तथा मायलिन आवरण (तंत्रिका तंतुओं के चारों ओर लिपटी वसायुक्त, इंसुलेटिंग लेयर) के अनुरक्षण के लिये आवश्यक। इस विटामिन की कमी से मेगालोब्लास्टिक एनीमिया तथा तंत्रिका संबंधी लक्षण (जैसे– सुन्नता, स्मृति संबंधी समस्याएँ) देखने को मिलती हैं। यह विटामिन मुख्यतः पशु-उत्पादों में पाई जाती है, जिससे शाकाहारियों के लिये जोखिम उत्पन्न होता है।
- फोलिक एसिड (विटामिन B9): यह कोशिका वृद्धि और भ्रूण में 'न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट' को रोकने के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इसकी कमी से भी मेगालोब्लास्टिक एनीमिया होता है। प्राकृतिक रूप से यह हरी पत्तेदार सब्ज़ियों में पाया जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. राइस फोर्टिफिकेशन क्या है?
राइस फोर्टिफिकेशन के प्रसंस्करण के दौरान चावल में आयरन, फोलिक एसिड और विटामिन B12 जैसे आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्त्वों को जोड़ने की एक प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य चावल के स्वाद या गुणों को बदले बगैर उसके पोषण मूल्य को बढ़ाना और "हिडन हंगर" से लड़ना है।
2. सरकार ने चावल सुदृढ़ीकरण को अस्थायी रूप से क्यों बंद कर दिया है?
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) खड़गपुर के निष्कर्षों के कारण, जिसमें यह दिखाया गया है कि विभिन्न कृषि-जलवायु परिस्थितियों में लंबे समय तक भंडारण के दौरान सूक्ष्म पोषक तत्त्वों का क्षरण होता है।
3. FSSAI द्वारा फोर्टिफाइड राइस में कौन-से प्रमुख सूक्ष्म पोषक तत्त्व अनिवार्य किये गए हैं?
भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) संबंधी मानकों के अनुसार, चावल में आयरन, फोलिक एसिड (विटामिन B9) और विटामिन B12 का मिश्रण होना अनिवार्य है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रश्न. निम्नलिखित में से कौन-से 'राष्ट्रीय पोषण मिशन' (नेशनल न्यूट्रिशन मिशन) के उद्देश्य हैं? (2017)
- गर्भवती महिलाओं तथा स्तनपान कराने वाली माताओं में कुपोषण से संबंधी जागरूकता उत्पन्न करना।
- छोटे बच्चों, किशोरियों तथा महिलाओं में रक्ताल्पता की घटना को कम करना।
- बाजरा, मोटा अनाज तथा अपरिष्कृत चावल के उपभोग को बढ़ाना।
- मुर्गी के अंडों के उपभोग को बढ़ाना।
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 1, 2 और 3
(c) केवल 1, 2 और 4
(d) केवल 3 और 4
उत्तर: (a)
प्रश्न. निम्नलिखित में से कौन-सा/से वह/वे सूचक है/हैं, जिसका/जिनका IFPRI द्वारा वैश्विक भुखमरी सूचकांक (ग्लोबल हंगर इंडेक्स) रिपोर्ट बनाने में उपयोग किया गया है? (2016)
- अल्प-पोषण
- शिशु वृद्धिरोधन
- शिशु मृत्यु-दर
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1
(b) केवल 2 और 3
(c) 1, 2 और 3
(d) केवल 1 और 3
उत्तर: (c)
भारत में बोत्सवाना से चीता स्थानांतरण
नौ चीते बोत्सवाना से कुनो राष्ट्रीय उद्यान, मध्य प्रदेश में स्थानांतरित किये गए जो भारत की महत्त्वाकांक्षी चीता पुर्नवास परियोजना में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।
- वर्तमान संख्या स्थिति: इस जोड़ के साथ भारत में चीते की संख्या अब 48 हो गई है, जिसमें कुनो राष्ट्रीय उद्यान में जन्मे 29 शावक शामिल हैं।
- पूर्व में किये गए पुर्नवास के प्रयास: सितंबर 2022 में नामीबिया से आठ चीते का पहला बैच पुर्नवासित किया गया था, इसके बाद फरवरी 2023 में दक्षिण अफ्रीका से 12 चीते लाए गए थे।
- बोत्सवाना में चीतों का महत्त्व: लगभग 7,100 की वैश्विक चीता आबादी का लगभग 24% हिस्सा बोत्सवाना में निवास करता है। विशेष रूप से, बोत्सवाना के 76.9% चीते संरक्षित क्षेत्रों के बजाय सामुदायिक और वाणिज्यिक फार्म क्षेत्रों में पाए जाते हैं, जिससे वे मानव गतिविधि और पशुधन के साथ परिदृश्य साझा करने के लिये विशिष्ट रूप से अनुकूलित हैं।
प्रोजेक्ट चीता
- परिचय: इसका आरंभ वर्ष 2022 में प्रोजेक्ट टाइगर के तहत किया गया था। प्रोजेक्ट चीता का उद्देश्य उन चीताओं को भारत में पुनः लाना है जो 1952 में विलुप्त हो गए थे। यह विश्व की पहली ऐसी अंतरमहाद्वीपीय पुनर्स्थापन परियोजना है जिसके अंतर्गत जंगली माँसाहारी जीवों का पुनःपरिचय किया जा रहा है।
- संचालन ढाँचा: राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) कार्यान्वयन एजेंसी के रूप में कार्य करती है, जो मध्य प्रदेश वन विभाग और भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के साथ मिलकर कार्य करती है। वर्ष 2023 में परियोजना के कार्यान्वयन की निगरानी और मार्गदर्शन के लिये एक स्टियरिंग कमेटी का गठन किया गया।
- चीता आवास निर्धारण: वर्तमान में कुनो राष्ट्रीय उद्यान और गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य (मध्य प्रदेश) पुर्नवासित चीतों के मुख्य आवास हैं, जबकि नौरादेही वन्यजीव अभयारण्य (मध्य प्रदेश) को भविष्य में चीता परिदृश्य के विस्तार के लिये चिह्नित किया गया है।
- सामुदायिक सहभागिता: परियोजना को 350 से अधिक 'चीता मित्रों' का समर्थन प्राप्त है, जो स्थानीय स्तर पर जागरूकता बढ़ाने और संभावित मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिये कार्य कर रहे हैं।
| और पढ़ें: प्रोजेक्ट चीता और गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य |
FRA सेल्स का प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग यूनिट्स में परिवर्तन
जनजातीय कार्य मंत्रालय ने मौज़ूदा वन अधिकार अधिनियम (FRA) सेल के अधिदेश का विस्तार करने का निर्णय लिया है। इन्हें अब एकीकृत 'वन-स्टॉप' प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग यूनिट्स (PMU) के रूप में पुनर्गठित किया जा रहा है ताकि सभी जनजातीय नीतियों के समन्वय और कार्यान्वयन को सुव्यवस्थित किया जा सके।
- FRA सेल: वन अधिकार अधिनियम (FRA) सेल को अक्तूबर 2024 में शुरू किये गए मंत्रालय के 'धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान' (DAJGUA) के तहत राज्यों को अतिरिक्त मानव संसाधन प्रदान करने के लिये स्वीकृत किया गया था। इनका प्राथमिक उद्देश्य वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत वन अधिकार दावों के प्रसंस्करण में तेज़ी लाना और रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण करना था।
- ये सेल वन अधिकारों की मान्यता में सहायता करते हैं, दावा संबंधी दस्तावेज़ों और साक्ष्य संग्रह का समर्थन करते हैं, भूमि अभिलेखों का डिजिटलीकरण करते हैं, लाभार्थियों को सरकारी योजनाओं तक पहुँचने में मदद करते हैं और वन गाँवों को राजस्व गाँवों में परिवर्तित करने को बढ़ावा देते हैं।
- नवीन PMU ढाँचा: मंत्रालय इन सेलों को व्यापक प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग यूनिट्स (PMU) में बदल रहा है।
- प्रत्येक राज्य/केंद्रशासित प्रदेश के PMU में अब चार अधिकारी शामिल होंगे, जो FRA सपोर्ट, आजीविका सहायता, IT/प्रबंधन सूचना प्रणाली (MIS) की विशेषज्ञता और समग्र टीम के नेतृत्व में विशेषज्ञ होंगे।
- ज़िला स्तर: ज़िला स्तर पर दो विशेषज्ञ होंगे (एक FRA सपोर्ट के लिये और एक MIS विशेषज्ञ)।
- पुनर्गठन के पीछे का तर्क: मंत्रालय के अनुसार, विशेष रूप से FRA कार्यान्वयन के लिये अलग-अलग सेल बनाए रखने से "प्रशासनिक लागत बढ़ रही थी" और संचार में बाधाएँ उत्पन्न हो रही थीं।
- एक एकीकृत PMU से नीतियों का कार्यान्वयन सरल, तेज़ और बेहतर समन्वित होने की उम्मीद है।
| और पढ़ें: वन अधिकार अधिनियम को सुगम बनाने हेतु FRA सेल्स की स्थापना |
दुर्लभ रोग दिवस 2026
दुर्लभ रोग दिवस (Rare Disease Day) वैश्विक स्तर पर 28 फरवरी (या लीप वर्ष में 29 फरवरी, जो प्रतीकात्मक रूप से सबसे दुर्लभ दिन है) को मनाया जाता है, ताकि पीड़ित समुदाय द्वारा सामना की जाने वाली विशिष्ट चुनौतियों को रेखांकित किया जा सके।
- उद्देश्य: इसका उद्देश्य दुर्लभ रोगियों के लिये सामाजिक अवसरों, स्वास्थ्य सेवाओं तथा निदान और उपचार तक पहुँच में समानता सुनिश्चित करना है।
- उत्पत्ति और समन्वय: वर्ष 2008 में स्थापित, इसका समन्वय EURORDIS (दुर्लभ रोगों के लिये यूरोपीय संगठन) द्वारा 70 से अधिक नेशनल एलायंस पेशेंट ऑर्गेनाइज़ेशन्स के साथ साझेदारी में किया जाता है।
दुर्लभ रोग
- परिचय: दुर्लभ रोगों/बीमारियों की कोई एक सर्वमान्य परिभाषा नहीं है। इसे मुख्य रूप से इसके प्रसार के आधार पर परिभाषित किया जाता है। एक उभरती वैश्विक सहमति के अनुसार, दुर्लभ रोग को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा परिभाषित क्षेत्र में प्रति 2,000 व्यक्तियों में से ≤ 1 व्यक्ति को प्रभावित करने वाली बीमारी के रूप में माना जाता है।
- आनुवंशिकी: दुर्लभ रोगों का एक बड़ा हिस्सा (लगभग 50-75%) बचपन में या जन्म के तुरंत बाद ही दिखाई देने लगता है। इनमें से लगभग 80% रोग आनुवंशिक कारणों से उत्पन्न होते हैं (उदाहरण के लिये, लाइसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर)। शेष मामलों में दुर्लभ स्थितियाँ अन्य कारणों से विकसित होती हैं, जिनमें दुर्लभ कैंसर, ऑटोइम्यून रोग और संक्रामक रोग शामिल हैं:
- दुर्लभ/बीमारियों की वैश्विक स्थिति और उपचार: विश्व स्तर पर, लगभग 6,000 से 10,000 दुर्लभ बीमारियों की पहचान की गई है, जिनसे अनुमानित 300 से 450 मिलियन लोग प्रभावित हैं। यह एक महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है क्योंकि वर्तमान में लगभग 95% दुर्लभ बीमारियों के लिये कोई स्वीकृत उपचार उपलब्ध नहीं है।
- भारत की स्थिति: भारत में दुर्लभ रोगों/बीमारियों की कोई औपचारिक प्रसार-आधारित परिभाषा नहीं है, क्योंकि सीमित महामारी विज्ञान संबंधी आँकड़े उपलब्ध हैं। इसके बजाय, राष्ट्रीय दुर्लभ रोग नीति (NPRD) 2021 विकारों को नैदानिक अनुभव और उपचार योग्यता के आधार पर वर्गीकृत करती है (अर्थात् समूह 1, समूह 2, और समूह 3), न कि सख्त संख्यात्मक सीमाओं के आधार पर।
- परिभाषा के अभाव के बावजूद, भारत में अनुमानित 72-96 मिलियन लोग दुर्लभ बीमारियों से प्रभावित हैं।
- भारत में नीतिगत सहायता: राष्ट्रीय दुर्लभ रोग नीति (NPRD) 2021 के अंतर्गत, नामित उत्कृष्टता केंद्रों में इलाज करा रहे 63 दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित मरीज़ों को 50 लाख रुपये तक की वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।
- केंद्रीय बजट 2026-27 के अंतर्गत, विशिष्ट चिकित्सा आवश्यकताओं हेतु दवाओं, औषधियों तथा खाद्य पदार्थों के व्यक्तिगत आयात को शुल्क मुक्त करने के लिये, आयात शुल्क से छूट प्राप्त दुर्लभ बीमारियों की सूची में 7 अतिरिक्त बीमारियों को शामिल किया गया है।
- दुर्लभ बीमारियों को फार्मास्युटिकल्स के लिये उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना के तहत एक फोकस क्षेत्र के रूप में शामिल किया गया था।
| और पढ़ें… राष्ट्रीय दुर्लभ रोग नीति (NPRD) |
सालार डे पजोनालेस में मंगल ग्रह जैसा वातावरण
वैज्ञानिकों ने पाया कि अटाकामा रेगिस्तान में स्थित सालार डे पजोनालेस (Salar de Pajonales) एक नमक का मैदान है, यहाँ जिप्सम एक सूक्ष्म ढाल (microscopic shield) के रूप में कार्य करता है। यह न केवल जीवित सूक्ष्मजीवों की रक्षा करता है, बल्कि उनके प्राचीन जीवाश्मों को भी संरक्षित करता है।
सालार डे पजोनालेस
- सलार डे पजोनालेस: यह उत्तरी चिली में स्थित एक विशाल प्लाया (नमक का मैदान) है, जो अल्टीप्लानो-पुना पठार के पश्चिमी किनारे पर समुद्र तल से लगभग 3,500 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है।
- यह अटाकामा क्षेत्र का तीसरा सबसे बड़ा मैदान है (सालार डे अटाकामा और सालार डे पुंटा नेग्रा के बाद)।
- पर्यावरणीय परिस्थितियाँ: यह अटाकामा रेगिस्तान का एक अत्यधिक शुष्क क्षेत्र है जहाँ की पर्यावरणीय परिस्थितियाँ, जैसे कि अत्यधिक शुष्कता, ऊँचाई, तीव्र सौर और पराबैंगनी विकिरण, तापमान में भारी उतार-चढ़ाव और सल्फेट से भरपूर खनिज संरचना, मंगल ग्रह पर पाई जाने वाली चरम स्थितियों के काफी समान हैं।
- जलवैज्ञानिक और भूवैज्ञानिक विशेषताएँ: यह बेसिन भूजल द्वारा पोषित एक अंतर्ग्रही बेसिन है, जिसका अर्थ है कि इसमें कोई बहिर्वाह नहीं है। इसकी सतह पर मुख्य रूप से वाष्पीकरण निक्षेप पाए जाते हैं, जिसमें जिप्सम (कैल्सियम सल्फेट डाइहाइड्रेट) की परतें और स्ट्रोमेटोलाइट्स (स्तरित सूक्ष्मजीवी संरचनाएँ) शामिल हैं।
- मंगल ग्रह पर खगोल जीवविज्ञान का महत्त्व: हाल के शोध में इस बात पर ध्यान केंद्रित किया गया है कि जिप्सम के निक्षेप किस प्रकार जीव-चिह्नों (बायोसिग्नेचर) को संरक्षित करते हैं। अध्ययनों में पाया गया है:
- खनिज के भीतर सुरक्षित सूक्ष्म-आवासों (Microhabitats) में एक्सट्रीमफाइल (extremophile) सूक्ष्मजीवी समुदाय (हेलोफिलिक बैक्टीरिया और आर्किया) सक्रिय रूप से जीवित रहते हैं।
- जिप्सम के अंदर फँसे जीवाश्म सूक्ष्मजीव और मॉलिक्यूलर बायोसिग्नेचर (अणु जैव-हस्ताक्षर) हज़ारों साल पुराने हैं।
- मंगल ग्रह पर जीवन की खोज के लिये नए लक्ष्य: जिप्सम, जो पृथ्वी और मंगल दोनों पर बहुतायत में पाया जाता है, जैविक पदार्थों के लिये एक सुरक्षात्मक भंडार का काम करता है, उन्हें शुष्कता और विकिरण से बचाता है। अध्ययन से पता चलता है कि मंगल ग्रह के प्राचीन जीवन के रहस्यों को सँजोए रखने की प्रबल संभावना को देखते हुए, ऑर्बिटर और रोवर को अपने अन्वेषण के लिये इन जिप्सम भंडारों को प्राथमिकता से लक्षित करना चाहिये।
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