भारत-यूरोपीय यूनियन मुक्त व्यापार समझौता
प्रिलिम्स के लिये: यूरोपीय संघ, मुक्त व्यापार समझौता (FTA), TRIPS, G20, G7, ऑपरेशन अटलांटा, इंडो-पैसिफिक महासागर पहल (IPOI), अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन, गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (QCO), गैर-शुल्क बाधाएँ, शेंगेन क्षेत्र
मेन्स के लिये: भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते तथा भारत–EU संबंधों की प्रमुख विशेषताएँ, भारत-EU FTA से जुड़ी अवसर एवं चुनौतियाँ तथा आगे की राह।
चर्चा में क्यों?
भारत एवं यूरोपीय संघ (EU) के मध्य एक व्यापक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के संबंध में वार्ताएँ सफलतापूर्वक संपन्न हो गई हैं, जो इनके आर्थिक संबंधों में एक परिवर्तनकारी कदम है। यूरोपीय संघ भारत का 22वाँ FTA भागीदार है।
- समाप्त किया गया भारत-EU FTA अब भाषा के अंतिम रूप (Language Finalisation) और विधिक परिशोधन (Legal Scrubbing) की प्रक्रिया से गुज़रेगा। इसके बाद अनुवाद तथा सभी 27 यूरोपीय संघ सदस्य देशों और यूरोपीय संसद द्वारा अनुमोदन (Ratification) किया जाएगा, जिसके पश्चात यह प्रभावी होगा।
सारांश
- भारत-EU ने एक ऐसे FTA पर वार्ताएँ पूरी की हैं, जो अभूतपूर्व बाज़ार पहुँच प्रदान करता है तथा श्रम-प्रधान क्षेत्रों और सेवाओं को बढ़ावा देता है।
- इसकी सफलता को EU के कठोर नियामक प्रावधानों (CBAM, EUDR) से चुनौती मिलती है, जो गैर-शुल्क बाधाओं के रूप में कार्य करते हैं।
- दीर्घकालिक स्थिरता के लिये असमानताओं का प्रबंधन, न्यायसंगत अपवाद (Carve-outs) सुनिश्चित करना तथा रणनीतिक सहयोग को और दृढ़ करना आवश्यक होगा।
भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते (India-EU FTA) की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं?
यूरोपीय संघ की प्रतिबद्धताएँ
- व्यापक बाज़ार पहुँच: यूरोपीय संघ ने अपनी 97% टैरिफ लाइनों को उपलब्ध करवाने की प्रतिबद्धता व्यक्त की है, जिससे मूल्य के आधार पर भारत के 99.5% निर्यात को कवर किया जाएगा। यह भारत को प्राप्त अब तक की सबसे दृढ़ वरीयतापूर्ण बाज़ार पहुँच व्यवस्थाओं में से एक होगी।
- श्रम-प्रधान क्षेत्रों को लाभ: वस्त्र, परिधान, चमड़ा, जूते, समुद्री उत्पाद, रत्न एवं आभूषण, खिलौने तथा खेल सामग्री जैसे प्रमुख रोज़गार-सृजन क्षेत्रों जो वर्तमान में EU में 4-26% शुल्क का सामना कर रहे हैं, शून्य शुल्क पर EU बाज़ार में प्रवेश कर सकेंगे। इससे लगभग 33 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य के निर्यात को लाभ होने की संभावना है।
- सेवा बाज़ार का उदारीकरण: यूरोपीय संघ ने IT/ITeS, डिजिटल सेवाएँ, पेशेवर सेवाएँ, शिक्षा तथा व्यापारिक सेवाओं सहित 144 सेवा उप-क्षेत्रों में बाध्यकारी प्रतिबद्धताएँ की हैं, जिससे भारतीय सेवा प्रदाताओं के लिये नियामक निश्चितता तथा गैर-भेदभावपूर्ण व्यवहार सुनिश्चित होगा।
- कृषि निर्यात: यह FTA भारत को प्रमुख कृषि तथा प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों के लिये EU बाज़ार में वरीयतापूर्ण पहुँच प्रदान करता है, जिससे उनकी प्रतिस्पर्द्धात्मकता बढ़ेगी। इससे किसानों की आय में वृद्धि, मूल्य-संवर्द्धित कृषि निर्यात को प्रोत्साहन तथा ग्रामीण और महिला-नेतृत्व वाली आजीविकाओं को सुदृढ़ करने की अपेक्षा है।
- पेशेवर गतिशीलता ढाँचा: यह FTA अंतः-कॉर्पोरेट स्थानांतरणकर्त्ताओं, संविदात्मक सेवा प्रदाताओं तथा स्वतंत्र पेशेवरों के अस्थायी आवागमन के लिये एक स्पष्ट ढाँचा स्थापित करता है। इसके साथ ही आश्रितों, छात्रों तथा भविष्य की सामाजिक सुरक्षा व्यवस्थाओं से संबंधित प्रावधान भी शामिल किये गए हैं।
- नियामक एवं मानक सहयोग: गैर-शुल्क बाधाओं को कम करने, अनुरूपता मूल्यांकन की मान्यता को सक्षम बनाने तथा बाज़ार की पूर्वानुमेयता बढ़ाने के लिये स्वच्छता एवं पादप-स्वास्थ्य (Sanitary and Phytosanitary- SPS) तथा व्यापार में तकनीकी बाधाओं (Technical Barriers to Trade- TBT) पर सहयोग को सुदृढ़ करने पर सहमति हुई है।
भारत की प्रतिबद्धताएँ
- संतुलित शुल्क उदारीकरण: भारत ने अपनी 92.1% टैरिफ लाइनों पर बाज़ार पहुँच देने की प्रतिबद्धता जताई है, जिससे EU के 97.5% निर्यात को कवर किया जाएगा। दुग्ध उत्पाद, अनाज, कुक्कुट, सोयामील तथा कुछ चयनित कृषि उत्पाद जैसे संवेदनशील क्षेत्र संरक्षित रहेंगे, जबकि ऑटोमोबाइल, वाइन और स्पिरिट्स को MSME और किसानों की सुरक्षा हेतु क्रमिक उदारीकरण के अंतर्गत रखा गया है।
- सेवा क्षेत्र का उदारीकरण: भारत ने दूरसंचार, वित्तीय, समुद्री, पर्यावरणीय, पेशेवर तथा व्यापारिक सेवाओं सहित 102 सेवा उप-क्षेत्रों को खोला है, जिससे EU कंपनियों को एक स्थिर और पूर्वानुमेय परिचालन वातावरण उपलब्ध होगा।
- MSME-अनुकूल उत्पत्ति नियम: वैश्विक मूल्य शृंखलाओं के अनुरूप उत्पाद-विशिष्ट उत्पत्ति नियम अपनाए गए हैं, जिनमें उद्गम विवरण (Statement of Origin) के माध्यम से स्व-प्रमाणन की सुविधा तथा झींगा, प्रॉन और डाउनस्ट्रीम एल्युमिनियम उत्पाद जैसे MSME-प्रधान क्षेत्रों के लिये विशेष लचीलापन शामिल है।
- संतुलित IPR एवं डिजिटल व्यापार ढाँचा: भारत ने जनहित की रक्षा करते हुए TRIPS-संगत बौद्धिक संपदा संरक्षण को पुनः पुष्ट किया है। इसके साथ ही जेनेरिक औषधि उद्योग की सुरक्षा, पारंपरिक ज्ञान डिजिटल लाइब्रेरी की मान्यता तथा सीमा पार डिजिटल व्यापार को डेटा स्थानीयकरण और डिजिटल संप्रभुता के साथ संतुलित करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की गई है।
भारत-यूरोपीय यूनियन FTA का क्या महत्त्व है?
- भू-आर्थिक विविधीकरण: यह FTA चाइना-प्लस-वन रणनीति को मज़बूती देता है और भारत को यूरोपीय संघ के लिये विनिर्माण तथा सेवाओं के एक भरोसेमंद विकल्प के रूप में स्थापित करता है। ऐसे वैश्विक परिदृश्य में, जहाँ व्यापार और प्रौद्योगिकी को प्रतिबंधों तथा निर्यात नियंत्रणों के माध्यम से तेज़ी से हथियार बनाया जा रहा है, यह समझौता दो लोकतांत्रिक समूहों के बीच नियम-आधारित “विश्वास क्षेत्र” का निर्माण करता है, विशेषकर सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), रक्षा विनिर्माण और हरित प्रौद्योगिकियों जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में।
- भारतीय प्रतिस्पर्द्धात्मकता में वृद्धि: यूरोपीय संघ के बाज़ार तक पहुँच के लिये भारतीय विनिर्माण को गुणवत्ता के स्तर (स्वच्छता एवं पादप-स्वच्छता उपाय, तकनीकी मानक) में व्यापक सुधार करना होगा। यह “मानक उन्नयन” (ब्रुसेल्स प्रभाव) भारतीय वस्तुओं को न केवल यूरोप में, बल्कि अमेरिकी और जापानी बाज़ारों में भी वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्द्धी बनाएगा।
- रणनीतिक प्रभावशीलता: यह मुक्त व्यापार समझौता (FTA) विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भारत को दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था यूरोपीय संघ से जोड़ता है। दोनों मिलकर वैश्विक GDP का लगभग 25% और वैश्विक व्यापार का एक-तिहाई हिस्सा प्रतिनिधित्व करते हैं। इससे एक विशाल आर्थिक समूह का निर्माण होता है, जो भारत को रणनीतिक महत्त्व प्रदान करता है तथा एक अग्रणी प्रौद्योगिकी महाशक्ति के साथ गहन एकीकरण संभव बनाता है।
- हरित और डिजिटल आधुनिकीकरण का इंजन: यह FTA डिजिटल व्यापार नियमों तथा हरित संक्रमण पर केंद्रित है, जिसका उद्देश्य सुरक्षित डेटा प्रवाह एवं AI-आधारित हरित औद्योगिक विकास के माध्यम से भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था को गति देना है।
भारत-यूरोपीय यूनियन संबंध
- ऐतिहासिक आधार: द्विपक्षीय संबंधों की शुरुआत वर्ष 1962 से होती है। वर्ष 1993 के संयुक्त राजनीतिक वक्तव्य और वर्ष 1994 के समझौते के माध्यम से इस संबंध को संस्थागत रूप दिया गया, जिसे वर्ष 2004 में ‘रणनीतिक साझेदारी’ के स्तर तक उन्नत किया गया।
- संस्थागत ढाँचा: द्विपक्षीय संबंधों का मार्गदर्शन ‘भारत–EU रणनीतिक साझेदारी: 2025 के लिये रोडमैप’ द्वारा किया जाता है। बहु-स्तरीय संस्थागत ढाँचे की अध्यक्षता उनकी वार्षिक शिखर बैठकों द्वारा की जाती है, जिसकी शुरुआत जून 2000 में लिस्बन में आयोजित प्रथम बैठक से हुई थी।
- उच्च-स्तरीय संवाद: इसे G20 और G7 शिखर बैठकों के दौरान नेताओं की नियमित बैठकों द्वारा परिभाषित किया जाता है। दोनों पक्षों ने वर्ष 2022 में भारत-यूरोपीय संघ व्यापार और प्रौद्योगिकी परिषद (TTC) की स्थापना की, जो एक प्रमुख रणनीतिक तंत्र के रूप में कार्य करता है।
- आर्थिक और व्यापारिक संबंध: यूरोपीय संघ भारत का सबसे बड़ा वस्तु व्यापारिक साझेदार (वित्तीय वर्ष 2023–24 में 135 अरब अमेरिकी डॉलर) है। वर्ष 2023 में द्विपक्षीय सेवा व्यापार रिकॉर्ड 53 अरब अमेरिकी डॉलर रहा है। यूरोपीय संघ का भारत में निवेश 117 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक है।
- रणनीतिक और सुरक्षा सहयोग: भारत और यूरोपीय संघ ने EUNAVFOR अटलांटा (ऑपरेशन अटलांटा) के साथ संयुक्त अभ्यास, जैसे– समुद्री साझेदारी अभ्यास के माध्यम से नौसैनिक सहयोग को मज़बूत किया है। यूरोपीय संघ 2023 में इंडो-पैसिफिक ओशंस इनिशिएटिव (IPOI) में शामिल हुआ और यह इंडियन ओशन रिम एसोसिएशन (IORA) का संवाद साझेदार भी है।
- जलवायु और कनेक्टिविटी पहल: भारत–EU स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु भागीदारी (CECP), जिसकी स्थापना वर्ष 2016 में हुई थी, स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु-अनुकूल तकनीकों पर केंद्रित है। यूरोपीय संघ अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन का भागीदार है और आपदा-रोधी बुनियादी ढाँचे के लिये गठबंधन (CDRI) का सदस्य भी है।
- दोनों पक्षों ने वर्ष 2021 में भारत–EU कनेक्टिविटी पार्टनरशिप की शुरुआत की और भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) में सह-भागीदार हैं।
- बहु-आयामी क्षेत्रीय सहयोग: विज्ञान और प्रौद्योगिकी में व्यापक साझेदारी (भारत CERN का सहयोगी सदस्य है), अंतरिक्ष क्षेत्र में (ISRO ने 2024 में ESA का प्रोबा-3 मिशन लॉन्च किया), डिजिटल परिवर्तन, जल संसाधन (भारत–ईयू वॉटर पार्टनरशिप) और प्रवास (प्रवासन और गतिशीलता पर सामान्य एजेंडा) जैसे क्षेत्रों में सहयोग शामिल है।
यूरोपीय यूनियन
- परिचय: द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद शांति तथा आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देने के लिये स्थापित एक अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक एवं आर्थिक संघ, विशेष रूप से फ्राँस और जर्मनी के बीच।
- ऐतिहासिक विकास: इसकी शुरुआत वर्ष 1951 के यूरोपीय कोयला और इस्पात समुदाय (ECSC) से हुई। प्रमुख संधियाँ शामिल हैं:
- 1951: यूरोपीय कोयला और इस्पात समुदाय (ECSC) की स्थापना।
- 1957: रोम संधियाँ द्वारा यूरोपीय आर्थिक समुदाय (EEC) और यूरोपीय परमाणु ऊर्जा समुदाय का निर्माण।
- 1992: मास्ट्रिच संधि के तहत औपचारिक रूप से यूरोपीय यूनियन (EU) की स्थापना।
- 2020: संयुक्त राज्य ब्रिटेन ने संघ से वापसी की (ब्रेक्ज़िट), जिससे सदस्य संख्या 28 से घटकर 27 हो गई।
- उद्देश्य: प्रमुख उद्देश्यों में चार स्वतंत्रताओं (वस्तुएँ, सेवाएँ, पूंजी, लोग) के साथ एक एकल आंतरिक बाज़ार स्थापित करना और सतत विकास को बढ़ावा देना शामिल है।
- मुख्य विशेषताएँ: यह एकल बाज़ार और कस्टम्स यूनियन के रूप में कार्य करता है। शेंगेन क्षेत्र बिना सीमाओं के यात्रा की सुविधा प्रदान करता है। चार गैर-यूरोपीय संघ देश (आइसलैंड, नॉर्वे, स्विट्ज़रलैंड और लिकटेंस्टीन) भी शेंगेन का हिस्सा हैं।
- 20 सदस्य देश यूरोज़ोन के तहत यूरो मुद्रा का उपयोग करते हैं और बुल्गारिया वर्ष 2026 में इसमें शामिल होने वाला है।
भारत-यूरोपीय यूनियन FTA से संबंधित चिंताएँ क्या हैं?
- EU की नियम-आधारित आक्रामकता और गैर-शुल्कीय बाधाएँ (NTBs): व्यापार समझौतों में पर्यावरण तथा श्रम मानकों को शामिल करने से ग्रीन प्रोटेक्शनिज़्म की संभावना उत्पन्न होती है, जहाँ ये मानक तटस्थ नियमों के बजाय वास्तविक रूप में गैर-व्यापारिक बाधाओं के रूप में काम कर सकते हैं।
- कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM): यह कार्बन कर सीधे भारतीय प्रमुख निर्यात, जैसे– इस्पात, एल्युमिनियम और रसायनों को प्रभावित करता है। वर्ष 2026 से, भारतीय इस्पात निर्यात पर 20–35% तक का कर लागू हो सकता है, जिससे शुल्क समाप्ति से मिलने वाले लाभ प्रभावित हो सकते हैं।
- यूरोपीय संघ वनोन्मूलन विनियमन (EUDR): EUDR 2020 के बाद वनों की कटाई वाले क्षेत्रों में उत्पादित कॉफी, रबर और लकड़ी जैसी वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध लगाता है। छोटे भारतीय किसानों को अपने खेतों का जियो-टैग करना तथा ट्रेसबिलिटी साबित करनी होती है, जो अधिकांश छोटे किसानों के लिये पालन करना आर्थिक रूप से असंभव है।
- कॉर्पोरेट सस्टेनेबिलिटी ड्यू डिलिजेंस डायरेक्टिव (CSDDD): वर्ष 2027 से लागू होने वाला यह निर्देश कंपनियों को उनकी मूल्य शृंखला में मानवाधिकार और पर्यावरणीय जोखिमों की जाँच (ऑडिट) करने के लिये बाध्य करता है। भारतीय निर्माता इसे संवेदनशील आपूर्तिकर्त्ता डेटा साझा करने के रूप में एक व्यावसायिक जोखिम मानते हैं।
- इंडस्ट्रियल एक्सलेरेटर एक्ट: इस प्रस्तावित अधिनियम में स्थानीय सामग्री मानक (न्यूनतम घरेलू मूल्य संवर्द्धन) लागू किये जा सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप भारत से होने वाले आयात सहित समस्त आयात पर दबाव पड़ेगा।
- बाज़ार पहुँच और टैरिफ संबंधी रियायतों में असमानता:
- पूर्व-निर्धारित यूरोपीय संघ के कम टैरिफ: भारत के 75% से अधिक निर्यात पहले से ही बिना मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के 1% से कम टैरिफ पर यूरोपीय संघ को निर्यात किये जाते हैं। इसलिये, भारतीय वस्तुओं के लिये बाज़ार पहुँच में महत्त्वपूर्ण लाभ सीमित हैं।
- भारत के उच्च टैरिफ: यूरोपीय यूनियन (EU) की वस्तुओं पर भारत की औसत टैरिफ (10–12%) दरें भारतीय वस्तुओं पर EU के शुल्क (3–4%) की तुलना में कहीं अधिक हैं। इसलिये भारत को विभिन्न यूरोपीय वस्तुओं पर शुल्क में बड़ी कटौती करनी होगी, जबकि EU बाज़ार पहुँच से मिलने वाला लाभ अपेक्षाकृत कम रहेगा।
- बांग्लादेश, वियतनाम और इथियोपिया जैसे प्रतिस्पर्द्धी देशों को पहले से ही अन्य योजनाओं के माध्यम से यूरोपीय यूनियन के बाज़ार में शून्य-टैरिफ पहुँच प्राप्त है, जिससे मुक्त व्यापार समझौते (FTA) होने पर भी भारतीय निर्यातों को संभावित नुकसान हो सकता है।
- समानता और छूट की कमी: यूरोपीय यूनियन (EU) ने कुछ पर्यावरणीय नियमों से अमेरिका को छूट प्रदान की है। भारतीय विशेषज्ञों का तर्क है कि बड़े प्रदूषक देशों को छूट देना और साथ ही भारत जैसे विकासशील देशों पर अनुपालन का दबाव डालना संभावित टैरिफ एडवांटेज को कम कर सकता है। इसलिये भारत ने संभवतः ऐसी छूटों में समानता की मांग की है।
- भारतीय स्थानीय कानूनों पर यूरोपीय यूनियन की चिंताएँ: यूरोपीय संघ भारत के गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों (QCO) को प्रमुख गैर-टैरिफ बाधाओं के रूप में देखता है, जिनमें फैसिलिटी ऑडिट अनिवार्य हैं। यूरोपीय यूनियन इनका सख्त विरोध करता है, यह तर्क देते हुए कि ये बाज़ार पहुँच में बाधा उत्पन्न करते हैं।
भारत-यूरोपीय यूनियन आर्थिक संबंधों को सुदृढ़ करने हेतु क्या उपाय आवश्यक हैं?
- मूल असमानताओं का सक्रियता से समाधान: व्यापारिक असंतुलन को संतुलित करने के लिये भारत को 144 सेवा उप-क्षेत्रों और पेशेवर गतिशीलता तक अपनी पहुँच का सक्रिय रूप से लाभ उठाना होगा, साथ ही मूल्य शृंखला में ऊपर बढ़ने के लिये EU के विनिर्माण संबंधी निवेश को आकर्षित करना होगा।
- संवाद और विवाद निवारण तंत्र: प्रस्तावित 'त्वरित प्रतिक्रिया मंच' की स्थापना करके यूरोपीय संघ के नियमों और गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों जैसी नवीन गैर-टैरिफ बाधाओं का वरिष्ठ स्तरीय हस्तक्षेप से तुरंत समाधान किया जाना आवश्यक है, ताकि विवादों को बढ़ने से रोका जा सके।
- समान छूट और परिवर्तन अवधि: स्टील और एल्युमिनियम जैसे प्रतिस्पर्द्धी क्षेत्रों की रक्षा के लिये भारत को कार्बन सीमा समायोजन तंत्र जैसे नियमों से अमेरिका को दी गई छूट के समान छूट सुनिश्चित करनी चाहिये। साथ ही, यूरोपीय संघ के वनोपज नियम और कॉर्पोरेट संधारणीयता संबंधी देखभाल निर्देश जैसे नियमों के लिये विस्तारित परिवर्तन अवधि पर बातचीत करनी चाहिये ताकि अनुकूलन सुविधाजनक हो।
- व्यापार से परे रणनीतिक साझेदारी का निर्माण: व्यापार समझौते को IMEC कॉरिडोर के साथ एकीकृत करना सुदृढ़ आपूर्ति शृंखला का निर्माण करेगा और लॉजिस्टिक लागतों को कम करेगा। साथ ही, IPOI और TTC के माध्यम से हिंद-प्रशांत सहयोग को सुदृढ़ करना साझा भौगोलिक-राजनीतिक हितों को बढ़ाएगा, जो दीर्घकालिक साझेदारी को संधारणीय बनाएगा।
निष्कर्ष
भारत–यूरोपीय यूनियन (EU) मुक्त व्यापार समझौता एक रणनीतिक मील का पत्थर है, जिसमें अपार संभावनाएँ निहित हैं। किंतु इसकी दीर्घकालिक स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि नियामकीय असमानताओं का प्रभावी प्रबंधन किया जाए, उचित छूट (कार्व-आउट्स) सुनिश्चित की जाए तथा सेवाओं और श्रम-आवागमन से मिलने वाले लाभों का समुचित उपयोग कर केवल टैरिफ-लिबरलाइज़ेशन से आगे बढ़ते हुए एक संतुलित, पारस्परिक रूप से साझेदारी का निर्माण किया जाए।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. भारत–यूरोपीय यूनियन (EU) मुक्त व्यापार समझौता भारत के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) के लिये जो अवसर और चुनौतियाँ प्रस्तुत करता है, उनका मूल्यांकन कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. FTA के अंतर्गत भारत ने किस स्तर का टैरिफ लिबरलाइज़ेशन हासिल किया है?
व्यापार मूल्य के 99.5% हिस्से को कवर करने वाली यूरोपीय संघ की 97% टैरिफ सीमाएँ भारतीय निर्यात को पहुँच प्रदान करती हैं।
2. FTA के अंतर्गत भारत के लिये प्रमुख नियामक संबंधी चिंताएँ क्या हैं?
CBAM, EUDR, CSDDD और अन्य गैर-टैरिफ बाधाओं (NTB) जैसे यूरोपीय संघ के उपाय भारतीय निर्यातकों के लिये टैरिफ एडवांटेज को निष्क्रिय कर सकते हैं।
3. FTA में प्रस्तावित 'रैपिड रिस्पांस फोरम' का प्राथमिक उद्देश्य क्या है?
'रैपिड रिस्पांस फोरम' का प्रस्ताव उच्च स्तरीय हस्तक्षेप के माध्यम से उभरती गैर-टैरिफ बाधाओं और व्यापार विवादों को शीघ्रता से संबोधित करने के लिये किया गया है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रिलिम्स
प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2023)
- यूरोपीय संघ का ‘स्थिरता एवं संवृद्धि समझौता’ (स्टेबिलिटी एंड ग्रोथ पैक्ट) ऐसी संधि है, जो:
- यूरोपीय संघ के देशों के बजटीय घाटे के स्तर को सीमित करती है
- यूरोपीय संघ के देशों के लिये अपनी आधारिक संरचना सुविधाओं को आपस में बाँटना सुकर बनाती है
- यूरोपीय संघ के देशों के लिये अपनी प्रौद्योगिकियों को आपस में बाँटना सुकर बनाती है
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
(a) केवल एक
(b) केवल दो
(c) सभी तीन
(d) कोई भी नहीं
उत्तर: (a)
प्रश्न. समाचारों में इस्तेमाल होने वाला शब्द 'डिजिटल सिंगल मार्केट स्ट्रैटेजी' किससे संबंधित है? (2017)
(a) ASEAN
(b) BRICS
(c) EU
(d) G20
उत्तर:(c)
प्रश्न. समाचारों में कभी-कभी देखा जाने वाला ‘यूरोपियन स्थिरता तंत्र’, क्या है? (2016)
(a) मध्य पूर्व से लाखों शरणार्थियों के आने के प्रभाव से निपटने के लिये यूरोपीय संघ द्वारा बनाई गई एक एजेंसी
(b) यूरोपीय संघ की एजेंसी, जो यूरोक्षेत्र (यूरोज़ोन) के देशों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराती है
(c) सभी द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय व्यापार समझौतों को सुलझाने के लिये यूरोपीय संघ की एक एजेंसी
(d) सदस्य राष्ट्रों के बीच मतभेद सुलझाने के लिये यूरोपीय संघ की एक एजेंसी
उत्तर: (b)
मेन्स
प्रश्न. 'नाटो का विस्तार एवं सुदृढ़ीकरण और एक मज़बूत अमेरिका-यूरोप रणनीतिक साझेदारी भारत के लिये अच्छा काम करती है।' इस कथन के बारे मे आपकी क्या राय है? अपने उत्तर के समर्थन में कारण और उदाहरण दीजिये। (2023)
स्टेट ऑफ फाइनेंस फॉर नेचर 2026
प्रिलिम्स के लिये: संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम, प्रकृति-आधारित समाधान, सतत कृषि पर राष्ट्रीय मिशन (NMSA), राष्ट्रीय जल मिशन, राष्ट्रीय वनरोपण कार्यक्रम (NAP)
मेन्स के लिये: जलवायु एवं जैव विविधता रणनीति के रूप में प्रकृति-आधारित समाधान, वैश्विक पर्यावरण शासन में वित्तपोषण की कमियाँ, पर्यावरण क्षरण में सब्सिडी की भूमिका, भारत का राजकोषीय संघवाद और जैव विविधता संरक्षण
चर्चा में क्यों?
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने “स्टेट ऑफ फाइनेंस फॉर नेचर 2026” नामक रिपोर्ट जारी की, जिसमें एक गंभीर असंतुलन उजागर हुआ है अर्थात्, प्रकृति की सुरक्षा पर खर्च किये गए प्रत्येक 1 अमेरिकी डॉलर की तुलना में पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने पर 30 अमेरिकी डॉलर खर्च किये जा रहे हैं।
सारांश
- 'स्टेट ऑफ फाइनेंस फॉर नेचर 2026' एक गंभीर वित्तीय असंतुलन को उजागर करता है, जहाँ संरक्षण में निवेश किये गए प्रत्येक 1 डॉलर की तुलना में पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाली गतिविधियों पर 30 डॉलर खर्च किये जा रहे हैं। यह असंतुलन पर्यावरण के लिये हानिकारक सब्सिडी और प्रकृति संबंधी नकारात्मक वित्त में निजी क्षेत्र के वर्चस्व से प्रेरित है।
- भारत के लिये, दीर्घकालिक आर्थिक विकास को बनाए रखते हुए जैव विविधता की रक्षा करने हेतु, नेचर ट्रांजिशन एक्स-कर्व, ग्रीन टैक्सोनॉमी, सब्सिडी और प्राइवेट कैपिटल एकत्रित करने जैसे सुधारों के माध्यम से प्रकृति-आधारित समाधानों को बढ़ाना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
स्टेट ऑफ फाइनेंस फॉर नेचर 2026 के मुख्य बिंदु क्या हैं?
- प्रकृति-नकारात्मक वित्त: प्रकृति को नुकसान पहुँचाने वाली गतिविधियों (जैसे– जीवाश्म ईंधन निष्कर्षण, अस्थिर कृषि, वनों की कटाई) के लिये वैश्विक वित्तीय प्रवाह वर्ष 2023 में 7.3 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच गया। यह वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 7% है।
- निजी क्षेत्र प्रकृति-नकारात्मक प्रवाह में 4.9 ट्रिलियन डॉलर का योगदान करता है, जो मुख्य रूप से ऊर्जा, उपयोगिताओं और बुनियादी सामग्री जैसे क्षेत्रों में केंद्रित है।
- सरकारें प्रतिवर्ष लगभग 2.4 ट्रिलियन डॉलर की पर्यावरण के लिये हानिकारक सब्सिडी (EHS) प्रदान करती हैं, जिसमें जीवाश्म ईंधन का समर्थन प्रमुख है, उसके बाद अस्थिर कृषि और जल सब्सिडियाँ आती हैं।
- ये सब्सिडियाँ बाज़ार मूल्यों को विकृत करती हैं, जिससे पर्यावरण विनाश संरक्षण की तुलना में सस्ता हो जाता है।
- प्रकृति-सकारात्मक वित्त: प्रकृति-आधारित समाधानों (NbS) में निवेश केवल 220 बिलियन डॉलर पर था।
- इससे एक विशाल असमानता उत्पन्न होती है, जहाँ हानिकारक निवेश संरक्षण पर होने वाले व्यय और प्रकृति की सुरक्षा पर खर्च किये गए का अनुपात 30:1 है, जिसके परिणामस्वरूप एक स्पष्ट और अस्थिर असंतुलन उत्पन्न होता है।
- हालाँकि, जैव विविधता और परिदृश्य संरक्षण पर खर्च बढ़ रहा है — वर्ष 2022 और 2023 के बीच इसमें 11% की वृद्धि हुई है, जबकि वर्ष 2023 में प्रकृति-आधारित समाधानों के लिये अंतर्राष्ट्रीय सार्वजनिक वित्त 2022 की तुलना में 22% अधिक और 2015 के स्तर से 55% ऊपर था।
- प्रकृति-आधारित समाधानों (NbS) के लिये वित्तीय अंतराल: NbS वित्त मुख्य रूप से सार्वजनिक धन द्वारा संचालित होता है (कुल NbS वित्त का 90% सरकारों से आता है)।
- NbS में निजी निवेश नगण्य है, जो कुल का केवल 10% हिस्सा है।
- रियो सम्मेलन के लक्ष्यों को पूरा करने के लिये, NbS निवेश को वर्ष 2030 तक प्रतिवर्ष 571 अरब डॉलर तक पहुँचाने के लिये 2.5 गुना बढ़ाना होगा।
- वर्ष 1992 के पृथ्वी सम्मेलन से उत्पन्न रियो सम्मेलन का लक्ष्य जलवायु स्थिरता, जैव विविधता संरक्षण और भूमि पुनर्स्थापना है।
- जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क अभिसमय (UNFCCC) का उद्देश्य वार्मिंग को 2°C से नीचे, अधिमानतः 1.5°C तक सीमित करना है।
- जैविक विविधता पर कन्वेंशन (CBD) का उद्देश्य वर्ष 2030 तक भूमि, जल और समुद्री क्षेत्रों के 30% भाग का संरक्षण करना तथा क्षतिग्रस्त पारिस्थितिक तंत्रों के 30% भाग को पुनर्स्थापित करना है।
- मरुस्थलीकरण से निपटने के लिये संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCCD) का लक्ष्य वर्ष 2030 तक 1.5 बिलियन हेक्टेयर निम्नीकृत भूमि की पुनर्स्थापना करना है।
प्रकृति-आधारित समाधान (NbS) क्या हैं?
- परिभाषा: प्रकृति-आधारित समाधान (Nature-based Solutions- NbS) से आशय ऐसे कार्यों से है जो प्राकृतिक अथवा संशोधित पारितंत्रों का संरक्षण करें, उनका सतत प्रबंधन करें तथा उनका पुनर्स्थापन करें, ताकि जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा और आपदा जोखिम जैसी सामाजिक चुनौतियों का प्रभावी एवं अनुकूलनशील ढंग से समाधान किया जा सके, साथ ही मानव कल्याण और जैव विविधता संरक्षण दोनों को एक साथ लाभ पहुँचे।
- उदाहरण:
- मैंग्रोव पुनर्स्थापन: तटीय क्षेत्रों को तूफानों से बचाता है (आपदा प्रबंधन) तथा कार्बन अवशोषण बढ़ाता है (जलवायु परिवर्तन)।
- कृषि-वानिकी: फसल उत्पादकता में वृद्धि करता है (खाद्य सुरक्षा) तथा मृदा स्वास्थ्य बनाए रखता है (जैव विविधता संरक्षण)।
- शहरी हरित क्षेत्र: शहरी ऊष्मा-द्वीप प्रभाव को कम करते हैं (शहरी नियोजन)।
प्रकृति-आधारित समाधानों (NbS) के वित्तपोषण को व्यापक बनाने में चुनौतियाँ क्या हैं?
- उच्च पूर्व-परीक्षण (Due Diligence) लागत: प्रत्येक स्थल की जैविक जटिलता और मानकीकृत डेटा की कमी के कारण विशेष, महंगी मूल्यांकन प्रक्रियाएँ आवश्यक होती हैं। इससे लेन-देन की लागत पारंपरिक ग्रे इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं की तुलना में काफी बढ़ जाती है, जिससे मुख्यधारा के निवेशक पीछे हटते हैं।
- NbS एक नवजात संपत्ति वर्ग है जिसमें सीमित ऐतिहासिक प्रदर्शन डेटा उपलब्ध है। जोखिम-समायोजित रिटर्न का प्रमाण न होने के कारण क्रेडिट रेटिंग एजेंसियाँ जोखिम का सटीक मूल्यांकन नहीं कर पातीं और निवेशक उच्च प्रीमियम की मांग करते हैं।
- NbS एक नवजात संपत्ति वर्ग है जिसमें सीमित ऐतिहासिक प्रदर्शन डेटा उपलब्ध है। जोखिम-समायोजित रिटर्न का प्रमाण न होने के कारण क्रेडिट रेटिंग एजेंसियाँ जोखिम का सटीक मूल्यांकन नहीं कर पातीं और निवेशक उच्च प्रीमियम की मांग करते हैं।
- तरलता संबंधी बाधाएँ: प्रकृति में निवेश स्वाभाविक रूप से अल्पतरल और दीर्घकालिक (10–20 वर्ष) होते हैं। सक्रिय द्वितीयक बाज़ार न होने के कारण निवेशक आसानी से अपनी हिस्सेदारी बेच या व्यापार नहीं कर सकते, जिससे ‘लॉक-इन’ जोखिम उत्पन्न होता है जो 3-5 वर्ष के छोटे निवेश क्षितिज वाले निजी निवेशकों को हतोत्साहित करता है।
- मुद्रा और संप्रभु जोखिम: उच्च प्रभाव वाले NbS अवसरों का अधिकांश हिस्सा वैश्विक दक्षिण (उष्णकटिबंधीय क्षेत्र) में स्थित है, जबकि पूंजी ग्लोबल नॉर्थ में केंद्रित है।
- इससे निवेशक विदेशी मुद्रा अस्थिरता और संप्रभु जोखिम के संपर्क में आ जाते हैं, जिसके लिये अक्सर उच्च लागत हेजिंग उपकरणों की आवश्यकता होती है, जो रिटर्न को कम कर देते हैं।
- डेटा की कमी: कार्बन के विपरीत, ‘प्रकृति’ को मापना कठिन है। निवेशकों के पास जैव विविधता परियोजनाओं में निवेश पर प्रतिफल (ROI) का मूल्यांकन करने के लिये मानकीकृत मीट्रिक उपलब्ध नहीं हैं।
भारत के लिये कम NbS वित्तपोषण के निहितार्थ क्या हैं?
- सब्सिडी विरोधाभास: भारत एक गंभीर वित्तीय-पारिस्थितिक विरोधाभास का सामना कर रहा है, जहाँ ‘प्रकृति-नकारात्मक’ सब्सिडियाँ (जैसे– रासायनिक उर्वरक, भूमिगत जल पंपिंग के लिये मुफ्त विद्युत) ‘प्रकृति-सकारात्मक’ आवंटनों (जैसे– MoEFCC का बजट या जैविक कृषि के लिये बजट) की तुलना में कहीं अधिक हैं। यह व्यवहारात्मक रूप से उसी मृदा और जलभृतियों (Aquifers) को नुकसान पहुँचाने के लिये भुगतान करना है, जिन पर अर्थव्यवस्था निर्भर करती है।
- सार्वजनिक वित्त पर अत्यधिक निर्भरता: वैश्विक उत्तर के विपरीत, जहाँ संरक्षण में निजी पूंजी प्रवेश कर रही है, भारत में प्रकृति-आधारित समाधान (NbS) लगभग पूरी तरह से सरकारी वित्तपोषित हैं, जैसे– क्षतिपूर्ति वनरोपण निधि प्रबंधन और योजना प्राधिकरण (CAMPA) जैसी योजनाओं के माध्यम से।
- इससे खज़ाने (exchequer) पर अत्यधिक दबाव पड़ता है, जबकि निजी क्षेत्र का योगदान (CSR/इंपैक्ट निवेश) बहुत कम रहता है।
- सकल घरेलू उत्पाद (GDP) जोखिम: भारत का 50% से अधिक कार्यबल कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में संलग्न होने के कारण अर्थव्यवस्था में ‘प्रकृति-निर्भरता अनुपात’ असाधारण रूप से उच्च है।
- पारिस्थितिक तंत्र सेवाओं (जैसे– परागण, जलस्तर) का पतन भारत में औद्योगिक देशों की तुलना में तेज़ी से प्रणालीगत वित्तीय अस्थिरता को उत्पन्न कर सकता है।
- हरित वर्गीकरण/ग्रीन टैक्सोनॉमी का अभाव: भारत अभी भी एक औपचारिक ‘हरित वर्गीकरण/ग्रीन टैक्सोनॉमी’ विकसित करने की प्रक्रिया में है, जो यह परिभाषित करेगा कि कौन-से निवेश या परियोजनाएँ 'हरित' मानी जाएँ।
- इस नियामकीय अंतराल के कारण वित्तीय संस्थानों को ऐसी परियोजनाओं को ऋण देने की गुंजाइश मिल जाती है, जो स्वयं को सतत बताती हैं, किंतु वास्तव में ‘प्रकृति-नकारात्मक’ होती हैं (ग्रीनवॉशिंग)। इससे भारतीय NbS परियोजनाओं में वास्तविक वैश्विक पूंजी के प्रवाह में बाधा उत्पन्न होती है।
- वित्तीय संघवाद का विरोधाभास: जहाँ भारत की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताएँ (पेरिस समझौता, कुनमिंग-मॉन्ट्रियल रूपरेखा) केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित की जाती हैं, वहीं प्रकृति-आधारित समाधानों (NbS) का वास्तविक क्रियान्वयन विशेषकर भूमि और जल से संबंधित मुख्यतः राज्य विषय होता है।
- इससे असंगति उत्पन्न होती है, जहाँ केंद्र संरक्षण को प्राथमिकता देता है, जबकि राजस्व-संकटग्रस्त राज्य त्वरित वित्तीय लाभ के लिये खनन और रियल एस्टेट जैसे दोहनकारी उद्योगों को प्राथमिकता देते हैं।
भारत में NbS को बढ़ावा देने हेतु पहलें
प्राकृतिक समाधान को प्रभावी ढंग से बढ़ाने हेतु कौन-कौन से उपाय अपनाए जा सकते हैं?
- प्रकृति संक्रमण X-कर्व: UNEP ने प्रकृति संक्रमण X-कर्व की प्रस्तावना की है, जो एक दोहरी रणनीति है—एक ओर हानिकारक सब्सिडी जैसी प्रकृति-विरोधी गतिविधियों को तेज़ी से समाप्त करना और दूसरी ओर प्रकृति-सकारात्मक बाज़ारों का विस्तार करना। इसमें पूंजी को विनाशकारी गतिविधियों से हटाकर पुनर्योजी गतिविधियों में लगाकर विकास को पर्यावरणीय क्षति से अलग किया जाता है।
- बाह्य प्रभावों का मूल्य निर्धारण: पर्यावरणीय लागत को इसमें शामिल करने के लिये कार्बन टैक्स या "प्रकृति-उत्तरदायित्व" शुल्क जैसे तंत्र लागू करें, जिससे पर्यावरण को नुकसान पहुँचाना महंगा तथा संरक्षण करना लाभकारी बन सके।
- अनिवार्य प्रकटीकरण: सरकारों को प्रकृति से संबंधित वित्तीय प्रकटीकरणों को अनिवार्य (जो TNFD - प्रकृति संबंधी वित्तीय प्रकटीकरण कार्यबल के अनुरूप हों) करना चाहिये।
- कंपनियों को अपने शेयरधारकों को अपनी "प्रकृति पर निर्भरता" और "प्रकृति पर प्रभाव" की रिपोर्ट देना अनिवार्य है।
- नवोन्मेषी साधन: मुख्यधारा के निवेशकों को आकर्षित करने के लिये "ग्रीन बॉण्ड", "स्थिरता-संबंधित ऋण" और "जैव विविधता क्रेडिट" जैसे वित्तीय उत्पादों का विस्तार करना।
- सार्वजनिक संस्थाओं (जैसे– विश्व बैंक या राष्ट्रीय विकास बैंक) को NbS परियोजनाओं में निजी निवेश के जोखिम को कम करने के लिये "प्राथमिक नुकसान गारंटी" या रियायती पूंजी प्रदान करनी चाहिये।
- मानकीकृत मापदंड: केवल CO2 पर ध्यान देने के बजाय जैव विविधता के लिये मानकीकृत मापदंड (जैसे– औसत प्रजाति प्रचुरता) अपनाएँ, ताकि ग्रीनवॉशिंग रोकी जा सके।
- समेकित नीति: वित्त, कृषि और ऊर्जा मंत्रालयों को अपनी नीतियों को कुनमिंग-मॉन्ट्रियल ग्लोबल बायोडायवर्सिटी फ्रेमवर्क (GBF) लक्ष्यों के अनुरूप संरेखित करना चाहिये, जिससे एक मंत्रालय वही नीतिगत कार्रवाई न करे जिसे दूसरा मंत्रालय बचाने का प्रयास कर रहा हो।
निष्कर्ष
द स्टेट ऑफ फाइनेंस फॉर नेचर 2026 में चेतावनी दी गई है कि वर्तमान आर्थिक प्रणालियाँ पर्यावरणीय विनाश को वित्तीय समर्थन दे रही हैं। भारत के लिये यह आवश्यक है कि प्रकृति संक्रमण X-कर्व को लागू करके प्रकृति-निर्भर अर्थव्यवस्था से प्रकृति-सकारात्मक विकास मॉडल में बदलाव किया जाए, ताकि जैव विविधता की रक्षा हो और 5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के आर्थिक लक्ष्य की प्राप्ति सुनिश्चित हो सके।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. विकासशील देशों में जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता के नुकसान से निपटने में प्रकृति-आधारित समाधानों के महत्त्व की जाँच कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. द स्टेट ऑफ फाइनेंस फॉर नेचर 2026 रिपोर्ट में क्या बताया गया है?
यह दिखाती है कि वैश्विक वित्त बड़ी मात्रा में प्रकृति-विनाशकारी गतिविधियों का समर्थन करता है, हानिकारक और संरक्षणात्मक निवेश के बीच 30:1 का असंतुलन है।
2. प्रकृति-आधारित समाधान (NbS) क्या हैं?
NbS वे क्रियाएँ हैं जो पारिस्थितिक तंत्र की सुरक्षा, पुनर्स्थापना या प्रबंधन करती हैं, ताकि सामाजिक चुनौतियों का समाधान हो और जैव विविधता तथा मानव कल्याण में लाभ मिले।
3. NbS में निजी निवेश सीमित क्यों है?
उच्च जाँच लागत, मानकीकृत मापदंडों का अभाव, लंबी परिपक्वता अवधि और द्वितीयक बाज़ारों की अनुपस्थिति निजी पूंजी को रोकती है।
4. भारत के लिये कम NbS वित्तपोषण क्यों जोखिमपूर्ण है?
भारत की अर्थव्यवस्था प्राकृतिक प्रणालियों पर अत्यधिक निर्भर है; पारिस्थितिक तंत्र का पतन कृषि, आजीविका और समग्र आर्थिक स्थिरता के लिये खतरा बन सकता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. बेहतर नगरीय भविष्य की दिशा में कार्यरत संयुक्त राष्ट्र कार्यक्रम में संयुक्त राष्ट्र पर्यावास (UN-Habitat) की भूमिका के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (2017)
- संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा संयुक्त राष्ट्र पर्यावास को आज्ञापित किया गया है कि वह सामाजिक एवं पर्यावरणीय दृष्टि से धारणीय ऐसे कस्बों एवं शहरों को संवर्द्धित करे जो सभी को पर्याप्त आश्रय प्रदान करते हों।
- इसके साझीदार सिर्फ सरकारें या स्थानीय नगर प्राधिकरण ही हैं।
- संयुक्त राष्ट्र पर्यावास, सुरक्षित पेयजल व आधारभूत स्वच्छता तक पहुँच बढ़ाने और गरीबी कम करने के लिये संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था के समग्र उद्देश्य में योगदान करता है।
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) 1, 2 और 3
(b) केवल 1 और 3
(c) केवल 2 और 3
(d) केवल 1
उत्तर: (b)
मेन्स
प्रश्न: कई वर्षों से उच्च तीव्रता की वर्षा के कारण शहरों में बाढ़ की बारंबारता बढ़ रही है। शहरी क्षेत्रों में बाढ़ के कारणों पर चर्चा करते हुए इस प्रकार की घटनाओं के दौरान जोखिम कम करने की तैयारियों की क्रियाविधि पर प्रकाश डालिये। (2016)
प्रश्न. क्या कमज़ोर और पिछड़े समुदायों के लिये आवश्यक सामाजिक संसाधनों को सुरक्षित करने के द्वारा, उनकी उन्नति के लिये सरकारी योजनाएँ, शहरी अर्थव्यवस्थाओं में व्यवसायों की स्थापना करने में उनको बहिष्कृत कर देती हैं? (2014)

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