राष्ट्रीय आतंकवाद-रोधी नीति और रणनीति: प्रहार
प्रिलिम्स के लिये: मल्टी एजेंसी सेंटर, इंटेलिजेंस ब्यूरो, सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेज़, नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी, यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ़ ह्यूमन राइट्स, म्यूचुअल लीगल असिस्टेंस ट्रीटीज़
मेन्स के लिये: भारत का आतंकवाद-रोधी ढाँचे और प्रहार की भूमिका, इंटेलिजेंस-लेड पुलिसिंग और आंतरिक सुरक्षा में इंटर-एजेंसी कोऑर्डिनेशन, नेशनल सिक्योरिटी का ह्यूमन राइट्स और सिविल लिबर्टीज़ के साथ संतुलन।
चर्चा में क्यों?
गृह मंत्रालय (MHA) ने 'प्रहार' (PRAHAAR) शीर्षक से भारत की अब तक की पहली व्यापक राष्ट्रीय आतंकवाद-रोधी नीति और रणनीति का अनावरण किया है। यह एक प्रतिक्रियात्मक सुरक्षा स्थिति से परे एक सक्रिय और खुफिया-आधारित सिद्धांत की ओर एक बड़े नीतिगत बदलाव का प्रतीक है।
सारांश
- भारत की पहली व्यापक राष्ट्रीय आतंकवाद-रोधी नीति और रणनीति, जिसका शीर्षक 'प्रहार' है, एक सक्रिय, खुफिया-आधारित, 'संपूर्ण सरकार' और 'संपूर्ण समाज' के दृष्टिकोण की ओर बढ़ती है। यह उभरते हुए आतंकी खतरों से निपटने के लिये रोकथाम, त्वरित प्रतिक्रिया, कट्टरपंथी उन्मूलन, विधिक ढाँचे और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को जोड़ती है।
- इसकी प्रभावशीलता संघीय समन्वय की चुनौतियों, क्षमता अंतराल और नागरिक स्वतंत्रता संबंधी चिंताओं को दूर करने पर निर्भर करेगी। साथ ही विधि के शासन का पालन करते हुए सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये प्रौद्योगिकी के उपयोग, इंटर-एजेंसी कोओर्डिनेशन और वैश्विक भागीदारी को सुदृढ़ करना भी अनिवार्य होगा।
प्रहार क्या है?
- प्रहार (PRAHAAR): इस रणनीति को एक संक्षिप्त शब्द के रूप में परिभाषित किया गया है, जो भारत के सक्रिय रक्षा तंत्र के मुख्य स्तंभों का प्रतिनिधित्व करती है:
- P (Prevention): भारतीय नागरिकों और उनके हितों की रक्षा के लिये आतंकी हमलों की रोकथाम।
- R (Responses): खतरे के अनुरूप त्वरित और आनुपातिक प्रतिक्रिया।
- A (Aggregating): 'संपूर्ण-सरकार' के दृष्टिकोण में समन्वय हासिल करने के लिये आंतरिक क्षमताओं का एकत्रीकरण।
- H (Human rights): खतरों को कम करने के लिये मानवाधिकार और 'विधि के शासन' पर आधारित प्रक्रिया।
- A (Attenuating): कट्टरपंथ सहित आतंकवाद को बढ़ावा देने वाली स्थितियों को कम करना।
- A (Aligning): आतंकवाद का सामना करने के लिये अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों को संरेखित करना और उन्हें आकार देना।
- R (Recovery): 'संपूर्ण-समाज' के दृष्टिकोण के माध्यम से रिकवरी (बहाली) और लचीलापन।
- आतंकी हमलों की रोकथाम: भारत एक सक्रिय, खुफिया-आधारित आतंकवाद-रोधी दृष्टिकोण को अपनाता है, जो केंद्रीय और राज्य एजेंसियों के बीच वास्तविक समय में खुफिया जानकारी साझा करने के लिये इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधीन मल्टी एजेंसी सेंटर (MAC) और जॉइंट टास्क फोर्स ऑन इंटेलिजेंस (JTFI) द्वारा संचालित है।
- डिजिटल सुरक्षा: कानून प्रवर्तन एजेंसियाँ भर्ती, प्रचार और संचार के लिये इंटरनेट के दुरुपयोग का सक्रिय रूप से सामना करती हैं, साथ ही ओवर-ग्राउंड वर्कर (OGW) सपोर्ट नेटवर्क को विखंडित करती हैं।
- समन्वित अभियान अवैध हथियारों के सिंडिकेट और आतंकवादी समूहों के बीच उभरते गठजोड़ को लक्षित करते हैं और विधिक ढाँचे के माध्यम से टेरर फंडिंग (आतंकी वित्तपोषण) को बाधित करते हैं।
- सीमा सुरक्षा बल और राज्य सुरक्षा अधिकारी भूमि, वायु और समुद्री क्षेत्रों में खतरों से निपटने के लिये उन्नत तकनीकों का उपयोग करते हैं। इसके साथ ही बिजली, रेलवे, विमानन, बंदरगाह, रक्षा, अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा जैसे महत्त्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे की सुरक्षा को और सुदृढ़ किया गया है।
- प्रतिक्रिया: स्थानीय पुलिस प्राइमरी 'फर्स्ट रिस्पॉन्डर' (प्रथम प्रतिक्रियाकर्त्ता) के रूप में कार्य करती है, जिन्हें विशेष राज्य आतंक-रोधी (CT) बलों और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) द्वारा सहायता प्रदान की जाती है।
- राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG) गृह मंत्रालय (MHA) के तहत नोडल राष्ट्रीय एजेंसी के रूप में कार्य करता है, जो बड़े हमलों के दौरान विशिष्ट हस्तक्षेप प्रदान करता है और राज्य इकाइयों के लिये क्षमता निर्माण पहल का नेतृत्व करती है।
- मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) और मल्टी-एजेंसी सेंटर (MAC) के माध्यम से समन्वय को सुव्यवस्थित किया गया है, जो वास्तविक समय में खुफिया जानकारी के प्रसार और विश्लेषण की सुविधा प्रदान करते हैं।
- घटना के बाद, राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (NIA) राज्य पुलिस के साथ मिलकर कार्य करता है ताकि दोषसिद्धि की उच्च दर सुनिश्चित की जा सके, जिसका उद्देश्य भविष्य के आतंकी खतरों के खिलाफ एक मज़बूत कानूनी निवारक स्थापित करना है।
- क्षमताओं का एकत्रीकरण: यह भारत के सुरक्षा परिदृश्य में मानकीकरण और आधुनिकीकरण पर ध्यान केंद्रित करता है।
- यह वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं को शामिल करने के लिये प्रशिक्षण संकायों को अद्यतन करने के साथ-साथ उन्नत हथियारों और प्रौद्योगिकी के निरंतर अधिग्रहण को अनिवार्य बनाता है।
- मुख्य एजेंसियाँ, जैसे– पुलिस अनुसंधान और विकास ब्यूरो (BPR&D) और CAPFs बड़े पैमाने पर प्रशिक्षण का नेतृत्व करती हैं, जबकि NSG राज्य इकाइयों को शहरी युद्ध से जुड़े विशेष कौशल प्रदान करती है।
- संसाधन अंतर की पहचान करके और सभी राज्यों में एक समान आतंकवाद-रोधी संरचना की वकालत करके यह नीति सुनिश्चित करती है कि बहु-एजेंसी प्रतिक्रियाएँ सामंजस्यपूर्ण और अंतर-संचालनीय हों।
- मानवाधिकार और कानून शासन पर आधारित प्रक्रियाएँ: यह भारत की न्याय-आधारित आतंकवाद-रोधी ढाँचे के प्रति प्रतिबद्धता को प्रतिबिंबित करता है।
- यह राष्ट्रीय सुरक्षा और मूलभूत अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करता है, कानून के शासन, मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम (1993) और मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (1948) तथा नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय अनुबंध जैसे अंतर्राष्ट्रीय संधियों का पालन करके।
- कानूनी आधार गैर-कानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA), 1967 है, जिसे नए दंड संहिता कानूनों (भारतीय न्याय संहिता, 2023, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023) के साथ समर्थन प्राप्त है और इसके अलावा विशेष कानूनों, जैसे– धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002 और शस्त्र अधिनियम (1959) भी शामिल हैं।
- दुरुपयोग को रोकने के लिये नीति ज़िले की अदालतों से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक के मज़बूत बहु-स्तरीय न्यायिक प्रतिकार प्रणाली को रेखांकित करती है, जो सुसंगत प्रक्रिया, किफायती कानूनी प्रतिनिधित्व और अपील के पर्याप्त अवसर सुनिश्चित करती है।
- अनुकूल परिस्थितियों को कम करना: यह कठोर सुरक्षा के पूरक के रूप में “सॉफ्ट-पावर” दृष्टिकोण पर केंद्रित है।
- यह बहु-हितधारक डी-रेडिकलाइज़ेशन फ्रेमवर्क के माध्यम से उग्रवाद के मूल कारणों को संबोधित करता है, जिसमें सामुदायिक नेता, धार्मिक प्रमुख और NGOs को शामिल किया गया है ताकि अत्यधिक विचारधाराओं के प्रभाव रोका जा सके।
- नीति रेडिकलाइज़्ड युवाओं के प्रति क्रमिक प्रतिक्रिया अपनाती है, जिसमें छोटे मामलों में पुनर्वास को प्राथमिकता दी जाती है और कठोर मामलों में कानूनी कार्रवाई की जाती है।
- यह नीति भर्ती को रोकने के लिये सामाजिक-आर्थिक सशक्तीकरण पर भी केंद्रित है और कैदियों में उग्रवाद को कम करने के उपाय शामिल करती है, इसमें कट्टरपंथी विचारधारा के मुख्य संचालकों को संवेदनशील कैदियों से पृथक रखना शामिल है, ताकि उनके प्रभाव को फैलने से रोका जा सके।
- अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों का समन्वय और आकार देना: यह आतंकवाद की अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति को लक्षित करता है और इसके लिये बहु-स्तरीय कूटनीतिक और कानूनी रणनीति अपनाता है।
- यह सुरक्षित आश्रयों की अनुमति न देने पर केंद्रित है और इसके लिये पारस्परिक कानूनी सहायता संधियाँ (MLATs), प्रत्यर्पण संधियाँ और संयुक्त कार्य समूह (JWGs) का उपयोग करता है ताकि साक्ष्य साझा करना और भगोड़ों को प्रत्यर्पित करना आसान हो सके।
- एजेंसी-से-एजेंसी खुफिया जानकारी के आदान-प्रदान से आगे बढ़कर भारत अंतर्राष्ट्रीय मंचों का उपयोग वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा करने के लिये करता है और संयुक्त राष्ट्र में आतंकवादियों को नामित कराने हेतु साझेदार देशों के साथ सहयोग करता है, जिससे समग्र और वैश्विक रूप से समन्वित राष्ट्रीय प्रतिक्रिया सुनिश्चित हो सके।
- पुनर्प्राप्ति और लचीलापन: यह आतंकी हमलों के प्रभाव को कम करने के लिये “समग्र समाज” दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है।
- इसका मुख्य आधार सशक्त सार्वजनिक–निजी साझेदारी है, जो त्वरित पुनर्स्थापन और दीर्घकालिक सामुदायिक सुदृढ़ता को सक्षम बनाती है।
- राज्य के नेतृत्व में की जाने वाली पुनर्बहाली को सुदृढ़ पुलिस सुरक्षा उपायों के साथ जोड़कर, यह नीति शीघ्र सामान्य स्थिति बहाल करने और आतंकजनित व्यवधानों के विरुद्ध दीर्घकालिक मानसिक एवं भौतिक लचीलापन विकसित करने का लक्ष्य रखती है।
सीमा-पार और उभरते आतंकी खतरे
- राज्य-प्रायोजित आतंकवाद: भारत में हमलों की योजना बनाने और उन्हें अंजाम देने वाले जिहादी संगठनों तथा उनसे जुड़े समूहों को सीमा-पार से निरंतर समर्थन दिया जाना।
- वैश्विक आतंकवादी संपर्क: अल कायदा (Al‑Qaeda) और ISIS जैसे समूह स्लीपर सेल्स और ऑनलाइन कट्टरपंथीकरण के माध्यम से हिंसा भड़काने का प्रयास करते हैं।
- उन्नत प्रौद्योगिकियों का उपयोग: विदेश में बैठे संचालक ड्रोन तथा अन्य आधुनिक तकनीकी साधनों का प्रयोग करके आतंकी हमलों को अंजाम देने में सहायता करते हैं, विशेष रूप से पंजाब और जम्मू-कश्मीर में।
- अपराध-आतंक गठजोड़: आतंकी संगठन लॉजिस्टिक्स, भर्ती और वित्तपोषण के लिये संगठित अपराध नेटवर्कों के साथ बढ़ते स्तर पर सहयोग कर रहे हैं।
- डिजिटल पारिस्थितिक तंत्र का दुरुपयोग: सोशल मीडिया, एंक्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स, डार्क वेब और क्रिप्टोकरेंसी का उपयोग प्रचार फैलाने, आपसी समन्वय करने तथा गुमनाम वित्तपोषण के लिये किया जा रहा है।
- CBRNED खतरे: आतंकवादियों द्वारा रासायनिक, जैविक, विकिरणीय, परमाणु, विस्फोटक और डिजिटल (CBRNED) सामग्री तक पहुँच बनाने का जोखिम एक गंभीर चिंता बना हुआ है।
- ड्रोन और रोबोटिक्स से जुड़े जोखिम: राज्य एवं गैर-राज्य तत्त्वों द्वारा निगरानी और घातक अभियानों के लिये इनके दुरुपयोग की संभावनाएँ एक गंभीर खतरा हैं।
- साइबर खतरे: आपराधिक हैकर और शत्रुतापूर्ण राष्ट्र-राज्य लगातार महत्त्वपूर्ण प्रणालियों पर साइबर हमलों के माध्यम से भारत को निशाना बना रहे हैं।
प्रहार (PRAHAAR) रणनीति को लागू करने में क्या चुनौतियाँ हैं?
- कार्यान्वयन में संघीय तनाव: भारतीय संविधान की राज्य सूची के अंतर्गत ‘लोक व्यवस्था’ और ‘पुलिस’ विषय आते हैं। इसके कारण केंद्र और राज्यों के बीच अधिकार-क्षेत्र, प्राथमिकताओं एवं कार्यान्वयन क्षमता में अंतर उत्पन्न होता है, जो एक समान और प्रभावी रणनीति के क्रियान्वयन में बाधा बन सकता है।
- आतंकवाद-रोधी ढाँचे के अत्यधिक केंद्रीकरण से अधिकार-क्षेत्र की टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है और केंद्र–राज्य स्तर पर संचालन में देरी हो सकती है।
- प्रौद्योगिकीय और क्षमता संबंधी असमानताएँ: स्थानीय पुलिस, जो प्रथम प्रत्युत्तरकर्त्ता होती है, अक्सर पर्याप्त वित्तपोषण, साइबर प्रशिक्षण एवं उन्नत अवसंरचना से वंचित रहती है, जिससे ड्रोन, डार्क वेब जैसे आधुनिक खतरों से निपटना कठिन हो जाता है।
- इन राज्य इकाइयों के उन्नयन के लिये भारी वित्तीय निवेश की आवश्यकता होती है, जिसे कई राज्य अपने बलबूते पर वहन करने में सक्षम नहीं होते।
- डी-रेडिकलाइज़ेशन में विषयगतता: नीति व्यक्ति के कट्टरपंथी के स्तर के आधार पर ‘क्रमिक पुलिस प्रतिक्रिया’ का प्रस्ताव करती है।
- चूँकि कट्टरपंथी का आकलन मूलतः मनोवैज्ञानिक और व्यक्तिपरक होता है, इसलिये स्पष्ट कानूनी मानकों के अभाव में इसके असंगत प्रयोग, मनमाना प्रोफाइलिंग या स्थानीय असंतोष/शिकायतों को जन्म देने की आशंका रहती है।
- कठोर सुरक्षा कानूनों से जुड़ी चिंताएँ: कठोर सुरक्षा कानूनों पर अत्यधिक निर्भरता अक्सर कम दोषसिद्धि दर और लंबे समय तक विचाराधीन हिरासत जैसी चिंताओं को जन्म देती है।
- अंतर-विभागीय अलगाव: ‘समग्र सरकार’ दृष्टिकोण के समर्थन के बावजूद भारतीय सुरक्षा तंत्र में लंबे समय से संस्थागत प्रतिस्पर्द्धा और परस्पर समन्वय के अभाव की समस्या बनी रही है।
- स्थानीय पुलिस, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों और राष्ट्रीय खुफिया नेटवर्कों के बीच बिना नौकरशाही देरी के निर्बाध, वास्तविक-समय खुफिया जानकारी साझा करना और संचालनात्मक तालमेल सुनिश्चित करना अब भी एक व्यावहारिक चुनौती बना हुआ है।
PRAHAAR रणनीति को सुदृढ़ करने हेतु क्या उपाय किये जा सकते हैं?
- एजेंसियों के बीच समन्वय: खुफिया साझेदारी के तंत्र को सुदृढ़ करना और उभरते जोखिमों से निपटने के लिये आतंकवाद-रोधी कानूनों को नियमित रूप से अपडेट करना।
- क्षमता निर्माण: राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों की आतंकवाद-रोधी इकाइयों और एंटी-टेररिज़्म स्क्वाड (ATS) को समान संरचना, आधुनिक संसाधन, उन्नत प्रशिक्षण और मानकीकृत जाँच विधियों के साथ सशक्त बनाना।
- जाँच प्रक्रियाओं में कानूनी विशेषज्ञों को शामिल करना जिससे अभियोजन की गुणवत्ता और सज़ा दर में सुधार हो।
- वैश्विक सहयोग: राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सहयोग को बढ़ाना ताकि अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद से सामना किया जा सके और प्रहार के अनुरूप एक व्यापक वैश्विक ढाँचे को आगे बढ़ाया जा सके।
- प्रौद्योगिकी उपाय: आतंकवादियों द्वारा सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (ICT) के दुरुपयोग को रोकने और बदलते डिजिटल जोखिमों का सामना करने के लिये प्रौद्योगिकी में निवेश करना और निजी क्षेत्र के साथ साझेदारी करना।
- सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को उग्रवादी सामग्री के प्रसार हेतु ज़िम्मेदार ठहराने और स्वतंत्र रेडिकलाइज़ेशन ऑडिट अनिवार्य करने के लिये आईटी नियमों में संशोधन करना।
- केंद्रीय बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) ढाँचे में क्रिप्टो-आधारित वित्त ट्रैकिंग उपकरणों को एकीकृत करना और आतंकवाद को मिलने वाली आर्थिक सहायता को रोकने के लिये विकेंद्रीकृत वित्त (DeFi) प्लेटफॉर्म पर सख्त KYC मानदंड लागू करना।
- हमलों के क्रियान्वयन से पहले संदिग्ध वित्तीय और व्यावहारिक पैटर्न का पता लगाने के लिये बिग डेटा फ्यूज़न और मशीन लर्निंग का उपयोग करना।
- विशेषीकृत आतंकवाद अभियोजन: दोषसिद्धि दर बढ़ाने के लिये साइबर फॉरेंसिक और आतंकवाद-रोधी कानूनों में प्रशिक्षित संघीय अभियोजकों का एक समर्पित संवर्ग तैयार किया जाए।
- डिजिटल साक्ष्य साझा करना: महत्त्वपूर्ण जाँच के दौरान एंक्रिप्टेड डेटा तक रियल-टाइम में पहुँच के लिये त्वरित अंतर्राष्ट्रीय समझौते किये जाएँ।
निष्कर्ष
प्रहार शून्य-सहनशीलता पर आधारित, सक्रिय और संपूर्ण-समाज दृष्टिकोण को दर्शाता है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ करने के लिये प्रौद्योगिकीय व्यवधान, विधिक कार्रवाई और समुदाय-आधारित डी-रेडिकलाइज़ेशन को एकीकृत करता है। इसकी सफलता दृढ़ प्रवर्तन और मूल अधिकारों की सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करने पर निर्भर करेगी।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न प्रश्न: भारत की विकसित होती आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों के संदर्भ में ‘PRAHAAR’ नीति के महत्त्व का मूल्यांकन कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. PRAHAAR क्या है?
PRAHAAR भारत की पहली व्यापक राष्ट्रीय आतंकवाद-रोधी नीति है, जिसे आतंकवाद के विरुद्ध सक्रिय, खुफिया-आधारित और शून्य-सहनशीलता दृष्टिकोण अपनाने हेतु गृह मंत्रालय द्वारा प्रारंभ किया गया है।
2. PRAHAAR के प्रमुख स्तंभ क्या हैं?
इसके प्रमुख स्तंभों में रोकथाम, त्वरित प्रतिक्रिया, क्षमता समेकन, मानवाधिकार अनुपालन, डी-रेडिकलाइज़ेशन, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग तथा संपूर्ण समाज दृष्टिकोण के माध्यम से पुनर्प्राप्ति शामिल हैं।
3. PRAHAAR को कौन-से विधिक ढाँचे समर्थन देते हैं?
मुख्य कानूनों में गैर-कानूनी गतिविधियाँ (निवारण) अधिनियम, 1967; धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002; शस्त्र अधिनियम, 1959 तथा 2023 के नए आपराधिक संहिताएँ शामिल हैं।
4. PRAHAAR के क्रियान्वयन में प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?
चुनौतियों में संघीय समन्वय से जुड़ी समस्याएँ, राज्य पुलिस की क्षमता में अंतर, डी-रेडिकलाइज़ेशन की व्यक्तिनिष्ठता, नागरिक स्वतंत्रताओं से संबंधित चिंताएँ तथा अंतर-एजेंसी समन्वय की बाधाएँ शामिल हैं।
5. PRAHAAR आधुनिक आतंकवादी जोखिमों का समाधान कैसे करता है?
यह साइबर रेडिकलाइज़ेशन, क्रिप्टो-आधारित वित्तपोषण, ड्रोन खतरे, CBRN जोखिम तथा सीमा-पार आतंकी नेटवर्क को प्रौद्योगिकी, खुफिया साझाकरण और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से लक्षित करता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
मेन्स
प्रश्न. भारत द्वारा सामना की जाने वाली आंतरिक सुरक्षा चुनौतियाँ क्या हैं? ऐसे खतरों का मुकाबला करने के लिये नियुक्त केंद्रीय खुफिया और जाँच एजेंसियों की भूमिका बताइये। (2023)
प्रश्न. भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिये बाह्य राज्य और गैर-राज्य कारकों द्वारा प्रस्तुत बहुआयामी चुनौतियों का विश्लेषण कीजिये। इन संकटों का मुकाबला करने के लिये आवश्यक उपायों की भी चर्चा कीजिये। (2021)
प्रश्न. जम्मू और कश्मीर में 'जमात-ए-इस्लामी' पर पाबंदी लगाने से आतंकवादी संगठनों को सहायता पहुँचाने में भूमि-उपरि कार्यकर्त्ताओं (ओजीडब्ल्यू) की भूमिका ध्यान का केंद्र बन गई है। उपप्लव (बगावत) प्रभावित क्षेत्रों में आतंकवादी संगठनों को सहायता पहुँचाने में भूमि-उपरि कार्यकर्त्ताओं द्वारा निभाई जा रही भूमिका का परीक्षण कीजिये। भूमि-उपरि कार्यकर्त्ताओं के प्रभाव को निष्प्रभावित करने के उपाय की चर्चा कीजिये। (2019)
भारत निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता
प्रिलिम्स के लिये: मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC), मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें एवं कार्यकाल) अधिनियम, 2023, अनूप बरनवाल केस, निर्वाचन आयोग, लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता (LoP), भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI), गोस्वामी समिति, विधि आयोग।
मेन्स के लिये: भारत में संवैधानिक निकायों की स्वतंत्रता और निष्पक्षता, अनुच्छेद 324 तथा स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों के लिये संवैधानिक संरक्षण, भारत में निर्वाचन सुधार।
चर्चा में क्यों?
भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की स्वतंत्रता मतदाता सूची के पुनरीक्षण जिसमें बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) तथा लगभग 65 लाख मतदाताओं के कथित विलोपन को लेकर उठी चिंताओं के बाद जाँच के दायरे में आ गई है।
- विपक्षी गठबंधन द्वारा मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) को हटाने के लिये प्रस्ताव लाए जाने से ECI की निष्पक्षता तथा अनुच्छेद 326 के अंतर्गत वयस्क मताधिकार के संरक्षण पर पुनः ध्यान केंद्रित हुआ है।
सारांश
- भारत निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता संवैधानिक प्रावधानों द्वारा संरक्षित है, किंतु नियुक्तियों, मतदाता सूची पुनरीक्षण, वित्तीय स्वायत्तता तथा प्रवर्तन शक्तियों से जुड़ी चिंताओं ने इसकी निष्पक्षता और प्रभावशीलता पर प्रश्न उजागर किये हैं।
- संतुलित चयन प्रक्रिया, समान कार्यकाल सुरक्षा, प्रौद्योगिकीय पारदर्शिता तथा अधिक संस्थागत स्वायत्तता जैसे सुदृढ़ सुधार स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने और जनविश्वास बनाए रखने के लिये आवश्यक हैं।
भारत निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता को लेकर क्या चिंताएँ हैं?
- नियुक्ति प्रक्रिया पर चर्चा: ऐतिहासिक रूप से संविधान में मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और निर्वाचन आयुक्तों (EC) की नियुक्ति के लिये कोई विशिष्ट विधायी प्रक्रिया निर्धारित नहीं की गई थी, जिससे यह कार्य कार्यपालिका पर निर्भर रहा (राष्ट्रपति, मंत्रिपरिषद की सलाह पर)।
- अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक नियुक्तियाँ एक कोलेजियम, जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता (LoP) और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) शामिल हों, के माध्यम से की जानी चाहिये, ताकि निकाय को कार्यपालिका के पक्षपात से सुरक्षित रखा जा सके।
- इसके बाद संसद ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 पारित किया, जिसमें चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के स्थान पर प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री को शामिल कर दिया गया।
- आलोचक यह तर्क देते हैं कि इससे चयन प्रक्रिया में कार्यपालिका को 2:1 का बहुमत प्राप्त हो जाता है, जिससे संस्थागत तटस्थता से समझौता होने की आशंका उत्पन्न होती है।
- हटाने की प्रक्रिया में त्रुटियाँ: जहाँ एक ओर मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) को पद से हटाने के विरुद्ध वही संरक्षण प्राप्त है जो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को प्राप्त होता है (संसद द्वारा महाभियोग), वहीं अन्य दो निर्वाचन आयुक्तों (EC) को राष्ट्रपति द्वारा केवल मुख्य निर्वाचन आयुक्त की अनुशंसा पर हटाया जा सकता है।
- यह असमानता एक पदानुक्रमिक स्थिति उत्पन्न करती है तथा अन्य निर्वाचन आयुक्तों को संभावित रूप से संवेदनशील बना देती है, जिससे वे मुख्य निर्वाचन आयुक्त अथवा कार्यपालिका के साथ सामंजस्य स्थापित करने के दबाव का अनुभव कर सकते हैं।
- वित्तीय स्वायत्तता: भारत निर्वाचन आयोग का बजट भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) या भारत के सर्वोच्च न्यायालय की तरह भारत की संचित निधि पर ‘भारित’ नहीं होता।
- इसके बजाय यह ‘वोटेड व्यय’ है अर्थात इसके लिये संसद की स्वीकृति आवश्यक होती है, जिससे सैद्धांतिक रूप से भारत निर्वाचन आयोग की वित्तीय स्वतंत्रता उस समय की सरकार पर निर्भर हो जाती है।
- आदर्श आचार संहिता (MCC) का प्रवर्तन: आदर्श आचार संहिता को विधिक आधार प्राप्त नहीं है, जिसके कारण यह आशंका व्यक्त की जाती है कि घृणास्पद भाषण अथवा चुनावी उल्लंघनों के मामलों में उच्च-प्रोफाइल वाले राजनीतिक व्यक्तियों के विरुद्ध कार्यवाही करते समय निर्वाचन आयोग ‘अप्रभावी’ या चयनात्मक अभिवृत्ति अपनाता है।
- सेवानिवृत्ति उपरांत नियुक्तियाँ: संविधान सेवानिवृत्त मुख्य निर्वाचन आयुक्त या निर्वाचन आयुक्तों को सरकार द्वारा किसी अन्य पद पर नियुक्ति से वंचित नहीं करता।
- इससे संभावित ‘हितों का टकराव’ उत्पन्न हो सकता है, क्योंकि सेवानिवृत्ति उपरांत पदों (जैसे- राज्यपाल का पद या आयोगों की सदस्यता) की संभावना उनके कार्यकाल के दौरान निष्पक्षता को प्रभावित कर सकती है।
- मतदाता सूची की अखंडता और ‘मत चोरी’: मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) ‘मत चोरी’ के आरोपों का केंद्र बिंदु बन गया है। बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में लाखों मतदाताओं के संभावित विलोपन के संबंध में आरोप सामने आए हैं।
- विपक्षी दलों का आरोप है कि इस प्रकार की कटौतियाँ/विलोपन अल्पसंख्यक समुदायों और उनके समर्थकों को असमान रूप से निशाना बनाती हैं।
- ECI द्वारा SIR के प्रयोग को लेकर यह आलोचना की गई है कि “विदेशियों की पहचान” के नाम पर यह धर्म-आधारित चयनात्मक मताधिकार से वंचित करने की प्रक्रिया बनती जा रही है।
- यह चिंता जताई गई है कि घर-घर सत्यापन के दौरान बूथ लेवल अधिकारियों (BLOs) को दिया गया व्यापक विवेकाधिकार और उस पर सीमित निगरानी मनमाने ढंग से मतदाताओं के नाम हटाए जाने का कारण बन सकता है तथा चुनावी निष्पक्षता को कमज़ोर कर सकता है।
- प्रौद्योगिकी और पारदर्शिता पर बहस: भारत निर्वाचन आयोग ने राज्य निर्वाचन अधिकारियों को निर्देश दिया है कि यदि 45 दिनों के भीतर कोई न्यायिक चुनौती दायर नहीं होती, तो CCTV, वेबकास्टिंग और चुनावी वीडियो फुटेज नष्ट कर दी जाए। इस निर्णय ने पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर गंभीर चिंताएँ उत्पन्न की हैं।
- चुनावों के बाद विश्वसनीय ऑडिट सुनिश्चित करने और जन विश्वास को मज़बूत करने के लिये संरक्षण अवधि को बढ़ाकर कम-से-कम 180 दिन करने की मांग लगातार बढ़ रही है।
- इसी समय हाल के राज्य चुनावों में AI-जनित सामग्री और डीपफेक्स के बढ़ते प्रसार ने भारत निर्वाचन आयोग की इस क्षमता को चुनौती दी है कि वह किसी प्रकार के पक्षपात या राजनीतिक नैरेटिव को बढ़ावा देने की धारणा के बिना निष्पक्ष तथा संतुलित ढंग से दुष्प्रचार पर अंकुश लगा सके।
संवैधानिक जनादेश और सुरक्षा उपाय जो ECI की स्वतंत्रता सुनिश्चित करते हैं
- निर्वाचन प्राधिकरण का निहितीकरण: अनुच्छेद 324(1) के तहत संसद, राज्य विधानमंडलों तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के लिये निर्वाचक नामावलियों की तैयारी और निर्वाचन के संचालन का अधीक्षण, निर्देशन तथा नियंत्रण भारत निर्वाचन आयोग में निहित है।
- यह केंद्रीकृत अधिकार पूरी निर्वाचन प्रक्रिया के प्रबंधन में स्वायत्तता सुनिश्चित करता है।
- संरचना और नियुक्ति: अनुच्छेद 324(2) के अनुसार, भारत निर्वाचन आयोग में मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और अन्य निर्वाचन आयुक्त (ECs) शामिल होते हैं, जिनकी संख्या राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित की जाती है।
- राष्ट्रपति द्वारा की गई उनकी नियुक्ति, जो संसदीय कानून के अधीन होती है, इस निकाय को संवैधानिक मान्यता प्रदान करती है और साथ ही वैधानिक नियंत्रण की व्यवस्था भी सुनिश्चित करती है।
- अध्यक्ष के रूप में मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) की भूमिका: अनुच्छेद 324(3) के अनुसार, जब अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की जाती है, तो मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) भारत का निर्वाचन आयोग के अध्यक्ष के रूप में कार्य करते हैं।
- यह व्यवस्था प्रशासनिक नेतृत्व सुनिश्चित करती है साथ ही सामूहिक निर्णय-निर्माण संरचना को भी बनाए रखती है।
- क्षेत्रीय आयुक्तों की नियुक्ति: अनुच्छेद 324(4) के अंतर्गत राष्ट्रपति, भारत निर्वाचन आयोग से परामर्श करके, चुनावों के दौरान सहायता के लिये क्षेत्रीय आयुक्तों की नियुक्ति कर सकते हैं।
- इससे आयोग की स्वायत्तता को कम किये बिना उसकी परिचालन क्षमता मज़बूत होती है।
- कार्यकाल की सुरक्षा और हटाने से संबंधित संरक्षण: अनुच्छेद 324(5) निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिये महत्त्वपूर्ण सुरक्षा प्रावधान प्रदान करता है, ताकि निर्वाचन आयुक्त अपने दायित्वों का निर्वहन बिना दबाव या भय के कर सकें।
- मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) को केवल उसी प्रक्रिया और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिन पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है।
- नियुक्ति के बाद CEC की सेवा-शर्तों में उसके प्रतिकूल कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता।
- ये प्रावधान भारत के निर्वाचन आयोग को कार्यपालिका के मनमाने हस्तक्षेप से सुरक्षा प्रदान करते हैं, जिससे इसकी स्वायत्तता, स्वतंत्रता और निष्पक्षता सुनिश्चित होती है।
- प्रशासनिक सहयोग: अनुच्छेद 324(6) के अनुसार, राष्ट्रपति या राज्यपाल निर्वाचन आयोग के अनुरोध पर उसे आवश्यक कर्मचारी और संसाधन उपलब्ध कराएंगे, जिससे भारत निर्वाचन आयोग अपने कार्यों का प्रभावी रूप से निर्वहन कर सके।
ECI की स्वतंत्रता के संबंध में प्रमुख न्यायालयीन निर्णय क्या हैं?
- इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण (1975): सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान की आधारभूत संरचना का हिस्सा हैं। इसका अर्थ है कि निर्वाचन की निष्पक्षता से समझौता नहीं किया जा सकता और लोकतंत्र की रक्षा में निर्वाचन आयोग (ECI) की केंद्रीय भूमिका को सुदृढ़ किया गया।
- मोहिंदर सिंह गिल बनाम मुख्य निर्वाचन आयुक्त (1978): सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग (ECI) को पूर्ण अधिकार प्रदान करता है, ताकि वह उन क्षेत्रों में भी कार्रवाई कर सके जहाँ कानून मौन है और इस प्रकार स्वतंत्र तथा निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित किये जा सकें। इससे चुनाव आयोग की कार्यात्मक स्वायत्तता (functional autonomy) मज़बूत हुई।
- ए.सी. जोस बनाम शिवन पिल्लई (1984): सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि निर्वाचन आयोग (ECI) मौजूदा कानूनों को अधिभूत (override) नहीं कर सकता।
- इससे अनुच्छेद 324 के अधिकार केवल कानून में मौजूद अंतराल को पूरा करने तक सीमित रहते हैं और निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता कानून के शासन (Rule of Law) के भीतर सुनिश्चित होती है।
- टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ (1995): सर्वोच्च न्यायालय ने बहु-सदस्यीय निर्वाचन आयोग की वैधता को बनाए रखा और कहा कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ‘समानों में प्रथम’ है, अन्य आयुक्तों से उच्च नहीं। इस निर्णय ने सामूहिक निर्णय-निर्माण को बढ़ावा दिया और शक्ति का केंद्रीकरण रोकने में मदद की।
- विनीत नारायण बनाम भारत संघ (1997): सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) 'स्वत: संज्ञान' (Suo Motu) अन्य निर्वाचन आयुक्तों को हटाने की सिफारिश नहीं कर सकता।
- इससे आयुक्तों के कार्यकाल की सुरक्षा होती है और संस्थागत स्वतंत्रता की रक्षा सुनिश्चित होती है।
- मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति एक समिति के माध्यम से की जानी चाहिये, जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल हों, ताकि नियुक्तियों में कार्यपालिका का प्रभुत्व कम किया जा सके।
ECI की स्वतंत्रता के लिये मुख्य समिति/आयोग की सिफारिशें
- दिनेश गोस्वामी समिति (1990): इस समिति ने एक वैधानिक चयन समिति की सिफारिश की तथा आदर्श आचार संहिता को कानूनी रूप से प्रवर्तनीय बनाने का सुझाव दिया, ताकि इसके चयनात्मक अनुप्रयोग को रोका जा सके।
- इंद्रजीत गुप्ता समिति (1998): इस समिति ने "धन बल" को कम करने के लिये चुनावों के राज्य वित्तपोषण का समर्थन किया, जिस पर भारत निर्वाचन आयोग प्रायः प्रभावी रूप से निगरानी करने में संघर्ष करता है।
- द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (ARC) (2005): प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में एक कॉलेजियम का सुझाव दिया, जिसमें लोकसभा अध्यक्ष, नेता प्रतिपक्ष, कानून मंत्री और राज्यसभा के उपसभापति सदस्य के रूप में शामिल हों।
- विधि आयोग (255वीं रिपोर्ट) (2015): इस रिपोर्ट ने प्रस्तावित किया कि तीनों आयुक्तों (मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्तों) को पद से हटाने के विरुद्ध समान संवैधानिक संरक्षण प्राप्त हो, जिससे वह पदानुक्रम समाप्त हो जो चुनाव आयुक्तों को संवेदनशील बनाता है और कार्यकाल की समान संवैधानिक सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
- साथ ही, प्रशासनिक स्वायत्तता को सुदृढ़ करने हेतु भारत निर्वाचन आयोग के लिये एक स्थायी, स्वतंत्र सचिवालय की स्थापना का प्रस्ताव दिया।
भारत निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता को सुदृढ़ करने के लिये कौन-से उपाय किये जा सकते हैं?
- कार्यकाल की सुरक्षा में समानता: संविधान में संशोधन किया जाना, ताकि चुनाव आयुक्तों को हटाने के विरुद्ध वही संरक्षण प्रदान किया जा सके जो वर्तमान में मुख्य चुनाव आयुक्त को गारंटीकृत है।
- उन्हें केवल एक कठोर संसदीय महाभियोग प्रक्रिया के माध्यम से हटाया जाना चाहिये, जिससे वे कार्यपालिका के दबाव से स्वतंत्र रहें।
- नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार: कार्यपालिका के वर्तमान प्रभुत्व को कम करने के लिये मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की समीक्षा की जानी चाहिये ताकि एक संतुलित, न्यूट्रल सिलेक्शन कॉलेजियम बहाल किया जा सके।
- भारत के मुख्य न्यायाधीश को पुनः शामिल करना या समिति के भीतर सर्वसम्मति अनिवार्य करना वर्तमान कार्यपालिका प्रभुत्व को कम कर सकता है।
- अवमानना शक्तियाँ प्रदान करना: अवमानना न्यायालय अधिनियम, 1971 में संशोधन करके भारत निर्वाचन आयोग को उन लोगों को दंडित करने का अधिकार प्रदान करना, जो इसके विरुद्ध निराधार, दुर्भावनापूर्ण आरोप लगाते हैं, इसकी संस्थागत विश्वसनीयता और अधिकार को बनाए रखने में सहायता करेगा।
- वित्तीय एवं प्रशासनिक स्वायत्तता: पूर्ण वित्तीय स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के लिये भारत निर्वाचन आयोग का बजट सीधे भारत की संचित निधि पर "भारित" किया जाना चाहिये।
- अनिवार्य कूलिंग-ऑफ अवधि: भविष्य के राजनीतिक संरक्षण के प्रलोभन को समाप्त करने के लिये सेवानिवृत्त होने वाले मुख्य चुनाव आयुक्तों और अन्य चुनाव आयुक्तों के लिये सेवानिवृत्ति के बाद सरकारी नियुक्तियों (जैसे– राज्यपाल पद) पर एक अनिवार्य कूलिंग-ऑफ अवधि या पूर्ण संवैधानिक प्रतिबंध लगाया जाना चाहिये।
- मतदाता सूची संशोधन में पारदर्शिता: मनमाने ढंग से मतदाता विलोपन को रोकने के लिये, विशेष सारांश संशोधन अभ्यासों में पारदर्शी डेटा ऑडिट, अनुपूरक सूचियों का नियमित प्रकाशन और मज़बूत शिकायत निवारण तंत्र शामिल होने चाहिये।
- लोकतंत्र की बुनियाद के रूप में चुनावों में विश्वास बनाए रखने के लिये पारदर्शिता बनाए रखना और हितधारकों की चिंताओं का समाधान करना आवश्यक है।
- प्रौद्योगिकी संबंधी सुरक्षा उपाय: इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का मतदाता-सत्यापन योग्य पेपर ऑडिट ट्रेल के साथ सांख्यिकीय रूप से महत्त्वपूर्ण क्रॉस-सत्यापन अनिवार्य करना, विशेष रूप से डेटा विसंगतियों के मामलों में, चुनावी तंत्र में पूर्ण जनता का विश्वास बहाल करने और बनाए रखने के लिये महत्त्वपूर्ण है।
निष्कर्ष
भारत निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने व लोकतंत्र में जनता के विश्वास को बनाए रखने के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। हालाँकि संवैधानिक सुरक्षा उपाय मौजूद हैं, लेकिन नियुक्तियों और मतदाता सूची प्रबंधन में उभरती चुनौतियाँ तत्काल सुधारों की मांग करती हैं। भारत की लोकतांत्रिक अखंडता की रक्षा के लिये संस्थागत स्वायत्तता और पारदर्शिता को मज़बूत करना महत्त्वपूर्ण होगा।
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दृष्टि मेंस प्रश्न: प्रश्न. "निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता भारत के लोकतांत्रिक ढाँचे के लिये प्रमुख है।" इसकी स्वायत्तता के लिये संवैधानिक सुरक्षा उपायों और उभरती चुनौतियों का परीक्षण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. कौन-सा संवैधानिक उपबंध भारत निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है?
अनुच्छेद 324 चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण भारत निर्वाचन आयोग में निहित करता है और कार्यकाल की सुरक्षा तथा निष्कासन प्रक्रियाओं जैसे सुरक्षा उपाय प्रदान करता है।
2. मुख्य चुनाव आयुक्त की निष्कासन प्रक्रिया को सुरक्षा उपाय क्यों माना जाता है?
मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के समान प्रक्रिया के माध्यम से पदच्युत किया जा सकता है, जो मनमानी कार्यपालिका कार्रवाई को रोकता है।
3. वर्ष 2023 के नियुक्ति कानून को लेकर क्या विवाद है?
कानून ने चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश के स्थान पर एक केंद्रीय मंत्री को शामिल कर दिया, जिससे कार्यपालिका के प्रभुत्व की चिंताएँ उत्पन्न हुईं।
4. आदर्श आचार संहिता को कमज़ोर क्यों माना जाता है?
इसमें वैधानिक समर्थन का अभाव है, जो घृणास्पद भाषण और कदाचार जैसे उल्लंघनों के लिये दंड लागू करने की भारत निर्वाचन आयोग की क्षमता को सीमित करता है।
5. प्रौद्योगिकी चुनावी पारदर्शिता को कैसे सुदृढ़ कर सकती है?
CCTV फुटेज का संरक्षण, डिजिटल लॉग और मतदाता-सत्यापन योग्य पेपर ऑडिट ट्रेल के साथ इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का क्रॉस-सत्यापन जैसे उपाय लेखापरीक्षा क्षमता और जनता के विश्वास को बढ़ा सकते हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रिलिम्स
प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2017)
- भारत का निर्वाचन आयोग पाँच सदस्यीय निकाय है।
- संघ का गृह मंत्रालय आम चुनाव और उप-चुनावों दोनों के लिये उप-चुनाव तय करता है।
- निर्वाचन आयोग मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के विभाजन/विलय से संबंधित विवाद निपटाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2
(c) केवल 2 और 3
(d) केवल 3
उत्तर: (d)
मेंस
प्रश्न. आदर्श आचार संहिता के विकास के आलोक में भारत के चुनाव आयोग की भूमिका पर चर्चा कीजिये। (2022)

