डेली न्यूज़ (20 Mar, 2026)



भारत में अवसंरचना वित्तपोषण

प्रिलिम्स के लिये: सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP), सिटी इकोनॉमिक रीजन (CER), विकास वित्तीय संस्थान (DFI), आंशिक क्रेडिट संवर्द्धन (PCE), केंद्रीय बजट 2026-27, राष्ट्रीय निवेश और अवसंरचना कोष, राष्ट्रीय अवसंरचना वित्तपोषण और विकास बैंक, UDAN योजना, अंतर्देशीय जलमार्ग, प्रगति प्लेटफॉर्म, InvITs, Reits, शहरी स्थानीय निकाय (ULB), राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन, ग्रीन हाइड्रोजन, अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र (IFSC), प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) 

मेन्स के लिये: अवसंरचना वित्तपोषण में परिवर्तन के प्रमुख स्तंभ, भारत में अवसंरचना विकास की स्थिति, भारत में अवसंरचना वित्तपोषण से संबंधित चुनौतियाँ और आगे की राह।

स्रोत: पीआईबी

चर्चा में क्यों?

भारत में अवसंरचना क्षेत्र के विकास में एक अभूतपूर्व रूपांतरण दृष्टिगत हुआ है, इस क्षेत्र ने बजट पर निर्भर मॉडल के स्थान पर सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) और नवोन्मेषी वित्तीय साधनों के एक परिष्कृत पारितंत्र को अपनाया है।

सारांश

  • भारत में अवसंरचना वित्तपोषण अब सीधे बजट पर निर्भर रहने से हटकर PPP-आधारित मॉडलों की ओर बढ़ गया है, जिसमें नेशनल इन्वेस्टमेंट एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड और नेशनल बैंक फॉर फाइनेंसिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर एंड डेवलपमेंट जैसी संस्थाएँ शामिल हैं।
  • उच्च पूंजीगत व्यय (Capex) वृद्धि के बावजूद, भूमि से संबंधित विलंबन और निजी निवेश की कमी जैसी समस्याएँ बनी हुई हैं।
  • भविष्य में ध्यान परिसंपत्ति मुद्रीकरण, जोखिम शमन और ग्रीन फाइनेंस पर रहेगा, ताकि USD 7 ट्रिलियन GDP लक्ष्य प्राप्त किया जा सके।

अवसंरचना वित्तपोषण में रूपांतरण के प्रमुख स्तंभ क्या हैं?

  • पूंजीगत व्यय वृद्धि: सार्वजनिक पूंजीगत व्यय वित्त वर्ष 2014–15 में ₹2 लाख करोड़ से बढ़कर वित्त वर्ष 2026–27 में ₹12.2 लाख करोड़ (बजट अनुमान) हो गया है, जिससे आर्थिक मांग एवं रोज़गार सृजन पर व्यापक गुणक प्रभाव उत्पन्न हुआ है।
  • शहरी विकास के इंजन: सिटी इकोनॉमिक रीजन (CER) की शुरुआत, जिनमें प्रत्येक हेतु ₹5,000 करोड़ का प्रावधान है, का उद्देश्य सुधार-आधारित ‘चैलेंज मोड’ के माध्यम से टियर-II एवं टियर-III शहरों (जनसंख्या 5 लाख से अधिक) का विकास करना है।
  • संस्थागत आधार:
    • NIIF (नेशनल इन्वेस्टमेंट एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड): यह 4.9 बिलियन USD की 'एसेट्स अंडर मैनेजमेंट' (AUM) का प्रबंधन करता है और ग्रीनफील्ड तथा ब्राउनफील्ड परियोजनाओं को वित्तपोषित करने के लिये वैश्विक सॉवरेन वेल्थ फंड्स (जैसे- टेमासेक) के साथ साझेदारी करता है।
    • NaBFID (नेशनल बैंक फॉर फाइनेंसिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर एंड डेवलपमेंट): यह एक प्रमुख विकास वित्तीय संस्थान (DFI) के रूप में कार्य करता है, जो 'लॉन्ग-टर्म नॉन-रिकोर्स' वित्त प्रदान करता है और बॉण्ड रेटिंग में सुधार के लिये आंशिक क्रेडिट संवर्द्धन (PCE) की सुविधा देता है।
    • IRFC (इंडियन रेलवे फाइनेंस कॉर्पोरेशन): यह रेलवे के एक समर्पित 'बाज़ार ऋण निकाय' के रूप में कार्य करता है, जो भारतीय रेलवे के लगभग 75% 'रोलिंग स्टॉक' का वित्तपोषण करता है।
  • परिसंपत्ति मुद्रीकरण मॉडल:
    • इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (InvITs) ने डेवलपर्स के लिये परिचालन संपत्तियों को एकत्र करने और उनके माध्यम से 1.5 लाख करोड़ रुपये जुटाने का मार्ग प्रशस्त किया है। इससे खुदरा निवेशकों को भी इन्फ्रास्ट्रक्चर से होने वाले लाभों तक पहुँच प्राप्त हुई।
    • REITs (रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट): सरकारी स्वामित्व वाली अचल संपत्ति के मुद्रीकरण को सुगम बनाता है; केंद्रीय बजट 2026-27 में विशेषरूप से केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों (CPSEs) के लिये समर्पित REITs की शुरुआत की गई थी।
  • जोखिम न्यूनीकरण: इन्फ्रास्ट्रक्चर रिस्क गारंटी फंड की स्थापना का मुख्य उद्देश्य जोखिम को कम करना है। यह फंड उधारदाताओं को आंशिक गारंटी प्रदान करता है, जिससे निर्माण के प्रारंभिक चरण में जोखिम कम हो जाता है। इस प्रकार, यह फंड निजी पूंजी को प्रभावी ढंग से आकर्षित करने में सहायक होता है।
  • ऋण बाज़ार सुधार: उपायों में पारदर्शिता के लिये इलेक्ट्रॉनिक बुक प्रोवाइडर (EBP) ढाँचा और वैश्विक जलवायु लक्ष्यों के साथ संतुलन स्थापित करने हेतु ESG वित्तपोषण उपकरणों (ग्रीन एंड सस्टेनेबिलिटी बॉण्ड्स) का शुभारंभ शामिल है।

भारत में अवसंरचना विकास की स्थिति

  • सड़कें और राजमार्ग: वर्ष 2014 के बाद से भारत के राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क में 60% से अधिक की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। इस विस्तार के साथ वर्ष 2025 के अंत तक देश में राष्ट्रीय राजमार्गों की कुल लंबाई 1,46,572 किलोमीटर तक पहुँच गई है।
  • वर्ष 2014 में मात्र 93 किलोमीटर की तुलना में, नियंत्रित पहुँच वाले एक्सप्रेसवे का नेटवर्क आज 5,000 किलोमीटर से अधिक हो गया है। इस नेटवर्क का निर्माण औसतन 33-34 किलोमीटर प्रतिदिन की प्रभावशाली गति से जारी है।
  • रेलवे आधुनिकीकरण: ब्रॉडगेज नेटवर्क 99-100% विद्युतीकृत है और वंदे भारत रेल सेवा के तहत वर्ष 2026 की शुरुआत से 160 से अधिक ट्रेनें परिचालन में है। केंद्रीय बजट 2026-27 में 7 नए हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर (जैसे- मुंबई-पुणे, दिल्ली-वाराणसी) की घोषणा की गई है, जो ‘ग्रोथ कनेक्टर’ के रूप में कार्य करेंगे।
  • विमानन: परिचालन में मौजूद हवाई अड्डों की संख्या वर्ष 2014 में 74 से बढ़कर 2025 तक 164 हो गई है और UDAN योजना के तहत अगले दशक में 120 और हवाई अड्डे जोड़ने की योजना है।
  • बंदरगाह: कुल बंदरगाह क्षमता वर्ष 2014 में 1,400 मिलियन मीट्रिक टन से बढ़कर वर्ष 2025 में 2,762 मिलियन मीट्रिक टन प्रतिवर्ष हो गई है, जो लगभग दोगुनी है। राष्ट्रीय जलमार्ग परियोजना के तहत, 111 जलमार्गों को राष्ट्रीय जलमार्ग (NW) घोषित किया गया है।
  • सिटी इकोनॉमिक रीजन (CER) पहल: वर्ष 2026 में शुरू की गई यह एक महत्त्वपूर्ण पहल है, जिसका मुख्य उद्देश्य 5 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों पर ध्यान केंद्रित करना है। इसके तहत, समूह-आधारित विकास को प्रोत्साहित करने के लिये, 'चैलेंज मोड' का उपयोग करते हुए 5 वर्षों की अवधि में प्रत्येक क्षेत्र को 5,000 करोड़ रुपये प्रदान किये जाएँगे।
  • डिजिटल और हरित परिवर्तन: डेटा सेंटर (5 मेगावाट से अधिक क्षमता वाले) और ऊर्जा भंडारण प्रणालियों को अब ‘बुनियादी ढाँचे’ का दर्जा प्राप्त है, जिससे उन्हें AI-संचालित प्रबंधन एवं जलवायु-अनुकूल विकास को बढ़ावा देने के लिये वर्ष 2047 तक कर छूट का लाभ प्राप्त होगा।

भारत में अवसंरचना वित्तपोषण से जुड़ी चुनौतियाँ क्या हैं?

  • सार्वजनिक निधि पर निर्भरता: वर्ष 2030 तक भारत की GDP को USD 7 ट्रिलियन तक विस्तारित करने हेतु अवसंरचना विकास में अनुमानतः USD 2.2 ट्रिलियन निवेश आवश्यक है। भारत में अवसंरचना के विकास में निजी क्षेत्र हेतु निवेश अवसर USD 103 बिलियन से USD 324 बिलियन के मध्य है।
    • हालाँकि, निजी पूंजी का पर्याप्त उपयोग नहीं हो पा रहा है, जहाँ संस्थागत निवेशक (बीमा तथा पेंशन निधि) कथित जोखिमों के कारण अवसंरचना क्षेत्र में केवल लगभग 6% ही निवेश कर रहे हैं।
  • भूमि अधिग्रहण अवरोध: परियोजनाओं में विलंब का सबसे बड़ा कारण भूमि संबंधी मुद्दे हैं, जो प्रगति प्लेटफॉर्म के अंतर्गत समीक्षित लगभग 35% अपूर्ण परियोजनाओं के अवरोधों के लिये उत्तरदायी हैं तथा उच्च लागत (ग्रामीण क्षेत्रों में बाज़ार मूल्य का 4 गुना तक) एवं स्वामित्व विवाद प्रमुख बाधाएँ हैं।
  • बैंकिंग क्षेत्र में परिसंपत्ति-देयता असंतुलन: बैंक मुख्य रूप से अल्पकालिक जमा पर निर्भर होते हैं, जबकि अवसंरचना परियोजनाओं के लिये 20-30 वर्षों की अवधि वाले ऋणों की आवश्यकता होती है। यह संरचनात्मक असंतुलन प्रणालीगत अस्थिरता के जोखिम के बिना नई परियोजनाओं को वित्तपोषित करने की बैंकिंग क्षेत्र की क्षमता को सीमित करता है।
  • कम जोखिम वाले परिसंपत्ति मॉडल बनाम उच्च जोखिम वाले परिसंपत्ति मॉडल: निजी भागीदारी सीमित रखने वाले ‘कम जोखिम वाले’ मॉडलों की ओर एक निरंतर रुझान देखा जा रहा है। वैश्विक निवेशक प्रारंभिक निर्माण जोखिमों से बचते हुए ‘ब्राउनफील्ड’ परिसंपत्तियों (जैसे- InvITs एवं REITs) को प्राथमिकता देते हैं।
  • म्युनिसिपल बॉण्ड बाज़ार की नाजुक स्थिति: केंद्रीय एवं राज्य वित्तपोषण सुदृढ़ होने के बावजूद, म्युनिसिपल बॉण्ड बाज़ार अभी भी सीमित है। शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी) के पास अक्सर स्वतंत्र पूंजी जुटाने के लिये आवश्यक क्रेडिट रेटिंग या वित्तीय पारदर्शिता की कमी होती है, जिसके कारण वे सरकारी अनुदानों पर अत्यधिक निर्भर रहते हैं।
  • परियोजना की अपर्याप्त तैयारी और ऋणयोग्यता: कई परियोजनाओं में ठोस व्यवहार्यता अध्ययन, जोखिम का विस्तृत आवंटन या यथार्थवादी राजस्व मॉडल का अभाव होता है, जिसके परिणामस्वरूप परियोजनाओं में विलंब, लागत में वृद्धि और वित्तपोषण संबंधी संघर्ष उत्पन्न होता है। अपर्याप्त प्रारंभिक जोखिम निवारण उपायों से ऋणदाता और निवेशक हतोत्साहित होते हैं।

भारत में संधारणीय अवसंरचना वित्तपोषण सुनिश्चित करने हेतु कौन-से कदम आवश्यक हैं?

  • परिसंपत्ति मुद्रीकरण का विस्तार: नेशनल मोनेटाइज़ेशन पाइपलाइन (NMP) के माध्यम से परिचालन में मौजूद ‘ब्राउनफील्ड’ परिसंपत्तियों से पूंजी को नवीन ‘ग्रीनफील्ड’ परियोजनाओं में पुनर्चक्रित करके एक स्व-धारणीय निवेश चक्र निर्मित किया जाए।
  • संस्थागत जोखिम कम करना: आंशिक क्रेडिट संवर्द्धन (PCE) का उपयोग करके कॉर्पोरेट बॉण्ड बाज़ार को गहन बनाया जाए, जिससे अवसंरचना परियोजनाएँ अपनी क्रेडिट रेटिंग में उन्नयन कर सकें तथा बीमा एवं पेंशन निधियों से कम-लागत, दीर्घकालिक पूंजी आकर्षित कर सकें।
    • अवसंरचना जोखिम गारंटी कोष को परिचालन में लाकर ऋणदाताओं को आंशिक गारंटी प्रदान करना, विशेषरूप से उच्च जोखिम वाले निर्माण चरण के जोखिम को कम करना और वर्तमान में जोखिम-निरपेक्ष निजी डेवलपर्स को निवेश हेतु प्रोत्साहित किया जाए।
  • हरित एवं समेकित वित्तपोषण: ग्रीन बॉण्ड एवं ब्लू बॉण्ड को मुख्यधारा में लाकर तटीय संरक्षण एवं हरित हाइड्रोजन हब जैसी जलवायु-सहिष्णु अवसंरचना का वित्तपोषण किया जाए।
    • ब्लेंडेड फाइनेंस मॉडल का उपयोग किया जाए, जहाँ सरकार द्वारा प्रदान की गई ‘प्रारंभिक पूंजी’ या अनुदान का उपयोग ग्रामीण क्षेत्रों में पाइपलाइन द्वारा जल आपूर्ति या सीवेज उपचार जैसी सामाजिक रूप से महत्त्वपूर्ण, लेकिन कम लाभ वाली परियोजनाओं के लिये निजी वाणिज्यिक ऋण की बड़ी मात्रा जुटाने के लिये किया जाता है।
  • सुधार-आधारित शहरी वित्तपोषण (CERs): नगरीय आर्थिक क्षेत्रों के लिये निशुल्क अनुदान से हटकर ‘चैलेंज मोड’ अपनाया जाए। आवश्यक वित्तपोषण हेतु शहरों को संपत्ति कर सुधार और डिजिटल शासन लागू करना होगा।
    • सड़कों और बिजली के अलावा, वेयरहाउसिंग, डेटा सेंटर और शहरी परिवहन जैसे नए क्षेत्रों में InvITs और REITs के उपयोग का विस्तार किया जाए, ताकि घरेलू बचत एवं वैश्विक खुदरा पूंजी का लाभ उठाया जा सके।
  • गिफ्ट सिटी एक वैश्विक प्रवेश द्वार के रूप में: गुजरात स्थित अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र (IFSC) का उपयोग करते हुए विशेष निवेश तंत्रों तथा कर-तटस्थ सतत वित्तीय साधनों के माध्यम से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) आकर्षित किया जाए।

निष्कर्ष:

भारत के अवसंरचना वित्तपोषण (Infrastructure Financing) में NIIF और NaBFID जैसे संस्थागत आधारों, InvITs जैसे अभिनव उपकरणों और रिकॉर्ड पूंजीगत व्यय (Capex) वृद्धि के माध्यम से व्यापक परिवर्तन आया है। हालाँकि, वर्ष 2030 तक 7 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के GDP लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये भूमि अधिग्रहण की बाधाओं को दूर करना, नगर पालिका बॉण्ड बाज़ारों को सुदृढ़ करना और 'इन्फ्रास्ट्रक्चर रिस्क गारंटी फंड' जैसे जोखिम शमन तंत्रों को क्रियान्वित करना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

दृष्टि मेन्स का प्रश्न:

प्रश्न: भारत में अवसंरचना के लिये निजी निवेश जुटाने में प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं? सुधारों का सुझाव दीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. इन्फ्रास्ट्रक्चर रिस्क गारंटी फंड क्या है?
केंद्रीय बजट 2026-27 में घोषित यह प्रावधान, निजी पूंजी को आकर्षित करने और जोखिम को कम करने के लिये उच्च जोखिम वाले निर्माण चरण के दौरान उधारदाताओं को आंशिक गारंटी प्रदान करता है।

2. सिटी इकोनॉमिक रीजन (CER) का क्या महत्त्व है ?
शहरी विकास में सुधारों को प्रेरित करने के उद्देश्य से, CER कार्यक्रम ऐसे शहरों पर केंद्रित है, जिनकी आबादी 5 लाख से अधिक है। इस योजना के तहत, ‘चैलेंज मोड‘ वित्तपोषण का उपयोग करते हुए, पाँच वर्षों की अवधि में प्रत्येक क्षेत्र को 5,000 करोड़ रुपये आवंटित किये जाते हैं।

3. भारत में रेलवे विद्युतीकरण की वर्तमान स्थिति क्या है ?
भारत का ब्रॉड-गेज नेटवर्क 99-100% विद्युतीकृत है, जिसमें 160 से अधिक वंदे भारत ट्रेनें परिचालन में हैं और बजट 2026-27 में सात नए हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर की घोषणा की गई है।

4. आंशिक क्रेडिट संवर्द्धन (PCE) क्या है ?
PCE एक ऐसी सुविधा है, जो अवसंरचना कंपनियों द्वारा जारी किये गए बॉण्डों की क्रेडिट रेटिंग में सुधार करती है, जिससे बेहतर शर्तें संभव हो पाती हैं। NaBFID ने बीमा और पेंशन फंडों को आकर्षित करने के लिये इस उत्पाद को शुरू किया था।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)  

प्रिलिम्स

प्रश्न: भारत में ‘सार्वजनिक कुंजी अवसंरचना’ शब्द का प्रयोग किसके संदर्भ में किया जाता है ? (2020)

(a) डिजिटल सुरक्षा अवसंरचना

(b) खाद्य सुरक्षा अवसंरचना

(c) स्वास्थ्य देखभाल और शिक्षा का बुनियादी ढाँचा

(d) दूरसंचार और परिवहन अवसंरचना

उत्तर: (a) 

प्रश्न: 'राष्ट्रीय निवेश और बुनियादी ढाँचा कोष' के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (2017)

  1. यह नीति आयोग का अंग है।  
  2.  वर्तमान में इसके पास 4,00,000 करोड़ रुपये का कोष है।

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (d)


मेन्स 

प्रश्न. “अधिक तीव्र और समावेशी आर्थिक विकास के लिये बुनियादी ढाँचे में निवेश आवश्यक है।” भारत के अनुभव के आलोक में चर्चा कीजिये। (2021)


आदर्श आचार संहिता

प्रिलिम्स के लिये: भारत निर्वाचन आयोग, आदर्श आचार संहिता, मुख्य निर्वाचन आयुक्त, राज्य की नीति के निदेशक तत्त्व (DPSP), कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), डीपफेक्स

मेन्स के लिये: स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने में भारत के निर्वाचन आयोग (ECI) की भूमिका, आदर्श आचार संहिता: महत्त्व, सीमाएँ और सुधार, भारत में चुनावी सुधार और समितियों की सिफारिशें

स्रोत: डीडी

चर्चा में क्यों? 

भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और केंद्रशासित प्रदेश पुडुचेरी की विधानसभाओं के वर्ष 2026 के आम चुनावों की घोषणा कर दी है। इसके साथ ही कई राज्यों में होने वाले उपचुनावों के लिये आदर्श आचार संहिता (MCC) लागू कर दी है।

  • इस घोषणा के परिणामस्वरूप आदर्श आचार संहिता (MCC) तत्काल प्रभाव से लागू हो गई है। यह निष्पक्ष प्रतिस्पर्द्धा सुनिश्चित करने और सत्ताधारी दल द्वारा सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग को रोकने के उद्देश्य से किया गया है।

सारांश

  • आदर्श आचार संहिता (MCC) स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिये एक नैतिक उपकरण है। यह राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों और सत्तारूढ़ सरकार को नियंत्रित करती है। हालाँकि, यह केवल अनुच्छेद 324 और नैतिक अधिकार पर निर्भर करती है, क्योंकि इसमें वैधानिक समर्थन का अभाव है।
  • इसकी प्रभावशीलता डिजिटल मिस इन्फॉर्मेशन, पद के दुरुपयोग, मुफ्त सुविधाओं और कमज़ोर प्रवर्तन जैसी चुनौतियों से बाधित होती है। इन चुनौतियों के समाधान के लिये कानूनी और तकनीकी सुधारों की आवश्यकता है।

आदर्श आचार संहिता क्या है?

  • परिचय: आदर्श आचार संहिता निर्वाचन आयोग द्वारा जारी किये गए दिशा-निर्देशों का एक व्यापक समूह है, जिसका उद्देश्य चुनाव अवधि के दौरान राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों और सरकार के व्यवहार को विनियमित करना है।
  • उद्देश्य: चुनावी प्रक्रिया की पवित्रता बनाए रखना, चुनाव प्रचार के दौरान शांति और व्यवस्था सुनिश्चित करना और सत्ताधारी दल को सरकारी संसाधनों के माध्यम से अनुचित लाभ प्राप्त करने से रोकना।
  • वैधानिक समर्थन और प्रवर्तनीयता:
    • प्रत्यक्ष वैधानिक समर्थन का अभाव: MCC केवल राजनीतिक सहमति पर आधारित एक नैतिक संहिता है, न कि कोई कानूनी रूप से लागू करने योग्य कानून।
    • संवैधानिक अधिकार: निर्वाचन आयोग संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत MCC को लागू करता है, जो चुनावों की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण को अनिवार्य बनाता है।
    • अप्रत्यक्ष कानूनी प्रवर्तन: यद्यपि आदर्श आचार संहिता (MCC) अपने आपमें कोई कानून नहीं है, इसके अनेक प्रावधानों को मौजूदा कानूनी ढाँचे के तहत लागू किया जा सकता है। उदाहरण के लिये, रिश्वतखोरी, धमकी और प्रतिरूपण जैसे कृत्य विभिन्न कानूनों के तहत दंडनीय हैं। इनमें प्रमुख हैं: भारतीय न्याय संहिता, 2023 [जो पहले भारतीय दंड संहिता (IPC), 1860 थी]। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA), 1951, जिसकी धारा 123 ‘भ्रष्ट आचरण’ से संबंधित है।
  • अवधि: मुख्य चुनाव आचार संहिता (MCC) उस समय से लागू होती है जब भारत का निर्वाचन आयोग (ECI) चुनाव कार्यक्रम की घोषणा करता है और चुनाव परिणाम घोषित होने तक सक्रिय रहती है।
  • उत्पत्ति: यह अवधारणा 1960 में केरल विधानसभा चुनावों के दौरान राजनीतिक पार्टियों के बीच स्वेच्छा से बनाए गए समझौते के रूप में उभरी।
    • यह पहली बार वर्ष 1962 के समवर्ती चुनावों में व्यापक रूप से अपनाई गई थी, जब राजनीतिक दलों ने अधिकांशतः इसका पालन किया। वर्ष 1979 में भारत के निर्वाचन आयोग (EC) ने एक व्यापक मुख्य चुनाव आचार संहिता (MCC) जारी की, जिसे बाद में राजनीतिक दलों के साथ परामर्श करके संशोधित किया गया ताकि धन और माँसपेशी शक्ति पर नियंत्रण रखा जा सके।
    • वर्ष 1991 में मुख्य चुनाव आचार संहिता (MCC) को कड़ाई से लागू किया गया और इसे संस्थागत रूप से मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन के नेतृत्व में सशक्त बनाया गया। इसने इसे चुनावी प्रक्रिया की शुद्धता बनाए रखने का एक प्रभावशाली उपकरण बना दिया।
  • MCC के मुख्य प्रावधान:
    • सामान्य आचार संहिता: ऐसी गतिविधियों पर रोक लगाती है जो मौजूदा मतभेदों को बढ़ाती हों, समुदायों के बीच तनाव पैदा करती हों या मत सुनिश्चित करने के लिये जाति और सांप्रदायिक भावनाओं का इस्तेमाल करती हों
      • पूजा स्थलों का चुनावी प्रचार के मंच के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता।
    • सभाएँ और जुलूस: राजनीतिक दलों को सभा के स्थल और समय के बारे में स्थानीय पुलिस प्राधिकरण को पहले से सूचित करना अनिवार्य है, ताकि उचित सुरक्षा तथा यातायात व्यवस्था सुनिश्चित की जा सके।
      • विरोधी राजनीतिक दलों के जुलूसों को आपस में टकराने या एक-दूसरे के संचालन में बाधा डालने से बचना चाहिये।
    • चुनाव दिवस: चुनाव बूथ में अनधिकृत व्यक्तियों के प्रवेश पर रोक लगाई जाती है। चुनाव आयोग 100 मीटर के दायरे में कोई प्रचार करने की अनुमति नहीं देता और बूथ के पास शराब या खाद्य सामग्री परोसना सख्ती से प्रतिबंधित है।
    • पर्यवेक्षक: भारत का निर्वाचन आयोग (ECI), व्यय और पुलिस पर्यवेक्षकों की नियुक्ति करता है, जिन्हें उम्मीदवार आचार संहिता के उल्लंघन की रिपोर्ट कर सकते हैं।
    • सत्ताधारी दल: आदर्श आचार संहिता के अनुसार, मंत्रियों को अपनी आधिकारिक (सरकारी) यात्राओं के साथ चुनाव प्रचार को जोड़ने की सख्त मनाही है। साथ ही चुनाव प्रचार के उद्देश्यों के लिये सरकारी परिवहन, मशीनरी और कर्मियों का उपयोग नहीं किया जा सकता है।
      • इसके अलावा सत्ताधारी पार्टी नए वित्तीय अनुदान की घोषणा नहीं कर सकती, किसी परियोजना की आधारशिला नहीं रख सकती और न ही ऐसी अस्थायी नियुक्तियाँ कर सकती है जो मतदाताओं को प्रभावित कर सकें।
    • चुनावी घोषणा-पत्र: वर्ष 2013 में एस. सुब्रमण्यम बालाजी बनाम तमिलनाडु सरकार मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद इसे शामिल किया गया। इसमें यह अनिवार्य किया गया कि घोषणा-पत्र में ऐसे वादे नहीं होने चाहिये जो चुनाव की शुद्धता को प्रभावित करें और इसमें वादों का तर्क तथा उनके वित्तीय साधनों को पूरा करने के तरीके स्पष्ट रूप से दर्शाने चाहिये।
  • ECI द्वारा तकनीकी पहलें:
    • c-VIGIL ऐप: यह नागरिकों को मुख्य चुनाव आचार संहिता (MCC) के उल्लंघनों (जैसे– अवैध धन या शराब वितरण) की रीयल-टाइम रिपोर्टिंग करने में सक्षम बनाता है और फ्लाइंग स्क्वाड को शिकायतों का समाधान 100 मिनट के भीतर करने का आदेश दिया गया है।
    • SUVIDHA मॉड्यूल: यह राजनीतिक दलों के लिये सार्वजनिक स्थानों, मैदानों और हेलीपैड के उपयोग के लिये एक सिंगल-विंडो सिस्टम है, जो “पहले आओ, पहले पाओ” (first come, first serve) के आधार पर काम करता है और सत्ताधारी पार्टी द्वारा संसाधनों पर एकतरफा नियंत्रण को रोकता है।
    • स्वैच्छिक आचार संहिता (2019): डिजिटल चुनौतियों का समाधान करने के लिये भारत का निर्वाचन आयोग (ECI) और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स (जैसे– Meta, Google, X) ने 48 घंटे की मौन अवधि के दौरान ECI से कानूनी अनुरोधों को 3 घंटे के भीतर संसाधित करने के लिये ‘स्वैच्छिक आचार संहिता’ पर सहमति दी।

MCC को लागू करने में समकालीन चुनौतियाँ क्या हैं?

    • 'फ्रीबीज' की दुविधा: सत्यनिष्ठ कल्याणकारी योजनाओं (जो कि राज्य की नीति के निदेशक तत्त्वों पर आधारित होती हैं) और मतदाताओं को लुभाने के लिये चुनावी 'फ्रीबीज़' के बीच अंतर करना अभी भी एक स्पष्ट चुनौती है। अक्सर, ऐसी घोषणाएँ चुनाव आचार संहिता (MCC) लागू होने से ठीक पहले की जाती हैं।
    • कानूनी आधार की कमी: मुख्य चुनाव आचार संहिता (MCC) एक स्वेच्छा और सहमति पर आधारित दस्तावेज़ है और इसे कानूनी रूप से बाध्यकारी कानून नहीं माना जाता
      • भारत का निर्वाचन आयोग (ECI) मुख्य रूप से नैतिक प्रोत्साहन, चेतावनियाँ या अस्थायी प्रचार प्रतिबंधों पर निर्भर करता है। इसके पास केवल MCC उल्लंघनों के लिये राजनीतिक दलों को रद्द करने या उम्मीदवारों को स्थायी रूप से अयोग्य घोषित करने का स्पष्ट अधिकार नहीं है। आलोचक अक्सर MCC को ‘दंतहीन बाघ’ कहकर संदर्भित करते हैं।
    • चुनाव पश्चात शिकायत निवारण में अक्षमता: यदि MCC उल्लंघन को राजनीतिक दलों के पंजीकरण अधिनियम (RPA) या भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत दर्ज किया जाता है, तो न्यायिक प्रक्रिया में वर्षों लग सकते हैं
      • जब तक निर्णय आता है, चुनावी प्रक्रिया पहले ही पूरी हो चुकी होती है, जिससे कानून का निरोधक प्रभाव समाप्त हो जाता है।
    • तकनीकी और डिजिटल व्यवधान: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), डीपफेक और सूक्ष्म-लक्षित विज्ञापन के तेज़ी से फैलने के कारण भारत के निर्वाचन आयोग (ECI) के लिये हेट स्पीच और गलत सूचना को वास्तविक समय में मॉनिटर करना अत्यंत कठिन हो गया है।
      • सरोगेट विज्ञापन और डिजिटल चुनौतियाँ: राजनीतिक दल अक्सर व्यय सीमा तथा आदर्श आचार संहिता (MCC) के दिशा-निर्देशों को दरकिनार करने के लिये प्रॉक्सी मीम पेजेज़ (proxy meme pages), इन्फ्लुएंसर्स एवं असत्यापित सोशल मीडिया हैंडल का उपयोग करते हैं, ताकि विरोधी दलों के खिलाफ दुष्प्रचार चलाया जा सके।
      • व्हाट्सएप जैसे एंड-टू-एंड एनक्रिप्टेड प्लेटफॉर्म्स पर सांप्रदायिक और उत्तेजक विमर्श का अनियंत्रित प्रसार भारतीय निर्वाचन आयोग के निगरानी तंत्र के समक्ष एक बड़ी चुनौती है। इसके कारण चुनाव पूर्व की पारंपरिक '48 घंटे की मौन अवधि' (Silence Period) का अनुपालन डिजिटल युग में लगभग निष्प्रभावी हो गया है।
    • प्रवर्तन और विश्वसनीयता का अभाव: आचार संहिता के वे खंड, जो यह अनिवार्य करते हैं कि आलोचना केवल "नीतियों और कार्यक्रमों" तक ही सीमित होनी चाहिये या "चुनाव की शुचिता" बनाए रखनी चाहिये, वे काफी हद तक व्यक्तिपरक और अस्पष्ट हैं।
      • इसके परिणामस्वरूप कानून की अलग-अलग व्याख्याएँ और असमान प्रवर्तन संभव हो जाता है।
    • पक्षपात और देरी से कार्रवाई के आरोप: भारत का निर्वाचन आयोग (ECI) अक्सर सिविल सोसाइटी और विपक्षी दलों द्वारा आलोचना का शिकार होता है, क्योंकि उच्च-प्रोफाइल ‘स्टार प्रचारक’ तथा वरिष्ठ नेताओं के उत्तेजक भाषणों पर उसकी कार्रवाई में देरी या कमज़ोर प्रतिक्रिया देखी जाती है। इससे संस्था की निष्पक्षता पर जनता का भरोसा कम हो सकता है।

    MCC को सुदृढ़ करने हेतु उपाय क्या हैं? 

    • पार्टी के पंजीकरण को रद्द करने का अधिकार: चुनाव आयोग (ECI) को वर्तमान में किसी पार्टी को पंजीकृत करने की शक्ति तो है, लेकिन उसके पास उसका पंजीकरण रद्द करने का अधिकार नहीं है।
      • जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA) में संशोधन किया जाना चाहिये ताकि निर्वाचन आयोग (ECI) को गंभीर और बार-बार आदर्श आचार संहिता (MCC) के उल्लंघन के मामले में राजनीतिक दलों का पंजीकरण रद्द करने या निलंबित करने का अधिकार मिल सके।
      • वर्ष 2013 में कर्मियों, सार्वजनिक शिकायतों, कानून और न्याय पर स्थायी समिति ने MCC को कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाने और इसे RPA 1951 में शामिल करने का प्रस्ताव दिया।
      • निर्वाचन सुधारों पर दिनेश गोस्वामी समिति (1990) ने सुझाव दिया कि MCC संबंधी कमियों को दूर करने हेतु इसे वैधानिक आधार देकर कानून के माध्यम से लागू करने योग्य बनाया जाना चाहिये।
    • ‘पेड न्यूज़’ और सरोगेट विज्ञापनों को रोकना: 255वीं कानून आयोग की रिपोर्ट (2015) में सिफारिश के अनुसार, ‘पेड न्यूज़’ और सरोगेट डिजिटल विज्ञापन को RPA के तहत स्पष्ट रूप से ‘भ्रष्ट आचरण’ के रूप में वर्गीकृत किया जाना चाहिये, जिससे यह एक चुनावी अपराध बन जाए।
    • ‘साइलेंस पीरियड’ का विस्तार: उमेश सिन्हा समिति (वर्ष 2019) की अनुशंसाओं के आधार पर RPA की धारा 126 (जो मतदान से 48 घंटे पहले प्रचार पर रोक लगाती है) में संशोधन किया जाना चाहिये ताकि इसमें इंटरनेट, सोशल मीडिया और OTT प्लेटफॉर्म्स को स्पष्ट रूप से शामिल किया जा सके।
    • फास्ट-ट्रैक चुनाव न्यायाधिकरण: विशेष न्यायाधिकरण स्थापित किये जाएँ जो चुनावी याचिकाओं और गंभीर MCC उल्लंघनों का निपटारा 6 महीने की समयसीमा के भीतर करें, ताकि न्यायिक देरी का दुरुपयोग रोका जा सके।
    • पूर्ण स्वायत्तता: ECI को एक स्वतंत्र सचिवालय प्रदान किया जाना चाहिये और इसका बजट भारत की संचित निधि पर ‘चार्ज्ड’ होना चाहिये (CAG और UPSC की तरह), ताकि इसे कार्यपालिका के दबाव से पूरी तरह स्वतंत्र रखा जा सके।
    • बिग टेक के लिये वैधानिक नियम: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिये वर्ष 2019 की ‘स्वैच्छिक आचार संहिता’ पर्याप्त नहीं मानी जाती।
      • इसे IT नियम, 2021 के तहत अनिवार्य वैधानिक दायित्वों से बदलना चाहिये, जिससे प्लेटफॉर्म्स (मेटा, गूगल, X) को ECI के निर्देश मिलने के 3 घंटे के भीतर MCC-उल्लंघन करने वाली सामग्री (घृणास्पद भाषण, डीपफेक्स) हटाने के लिये बाध्य किया जा सके।
    • अनिवार्य AI वाटरमार्किंग: डीपफेक्स से निपटने के लिये ECI को यह अनिवार्य करना चाहिये कि सभी राजनीतिक पार्टियाँ डिजिटल प्रचार सामग्री में क्रिप्टोग्राफिक वाटरमार्क का उपयोग करें, जिससे फेक न्यूज की ट्रेसिंग सीधे संबंधित IT सेल्स तक की जा सके।
      • वास्तविक समय डेटा एनालिटिक्स और AI के साथ c-VIGIL ऐप को एकीकृत किया जाए, ताकि मानव शिकायत दर्ज होने से पहले ही सांप्रदायिक भाषण या अवैध नकद वितरण को स्वतः फ़्लैग किया जा सके।
    • पार्टी व्यय की सीमा: जबकि व्यक्तिगत उम्मीदवार के व्यय पर सीमा है, पार्टी का कुल व्यय असीमित है।
      • चुनाव में धनशक्ति के कारण समान प्रतियोगिता को प्रभावित होने से रोकने के लिये कुल पार्टी व्यय पर तुरंत कानूनन सीमा लगाना आवश्यक है।

    निष्कर्ष

    आदर्श आचार संहिता (MCC) की प्रभावशीलता केवल उसके नियमों में नहीं, बल्कि उसके प्रवर्तन की निश्चितता और शीघ्रता में निहित है। प्रशासनिक उपायों और डिजिटल निगरानी उपकरणों द्वारा समर्थित इसका सख्त कार्यान्वयन स्वतंत्र, निष्पक्ष और विश्वसनीय चुनाव सुनिश्चित करने के लिये निर्वाचन आयोग (ECI) की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। कानूनी और तकनीकी सुधारों के माध्यम से इसे सुदृढ़ करना MCC को "बिना दाँतों का बाघ"  (Tiger Without Teeth) के नाम से पहचाने गए भारत की लोकतांत्रिक अखंडता के एक प्रभावी संरक्षक में परिवर्तित कर सकता है।

    दृष्टि मेन्स प्रश्न:

    प्रश्न.  आचार संहिता को प्रायः 'बिना दाँतों वाला बाघ' कहा जाता है। समालोचनात्मक परीक्षण कीजिये।

    अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

    1. आदर्श आचार संहिता (MCC) क्या है?
    यह चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों और सरकारों के आचरण को विनियमित करने के लिये निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा जारी दिशानिर्देशों का एक समूह है।

    2. क्या MCC के पास कानूनी आधार है?
    नहीं, यह एक वैधानिक कानून नहीं है, लेकिन अनुच्छेद 324 के तहत लागू किया जाता है, जिसमें कुछ प्रावधान भारतीय दंड संहिता (IPC) और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA), 1951 द्वारा समर्थित हैं।

    3. MCC कब लागू होती है?
    यह चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के तुरंत बाद प्रभावी हो जाती है और परिणामों की घोषणा तक लागू रहती है।

    4. MCC के तहत सत्तारूढ़ दल पर क्या प्रमुख प्रतिबंध लागू होते हैं?
    सत्तारूढ़ दल सरकारी तंत्र का उपयोग नहीं कर सकता है, नई योजनाओं की घोषणा नहीं कर सकता है या आधिकारिक कर्त्तव्यों को चुनाव प्रचार के साथ नहीं जोड़ सकता है।

    5. आज MCC लागू करने में प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?
    चुनौतियों में वैधानिक समर्थन की कमी, डिजिटल गलत सूचना (AI, डीपफेक), लोक-लुभावन वायदों (फ्रीबीज) की बहस और पदाधिकारी का लाभ (इन्कम्बेंसी एडवांटेज) शामिल हैं।

    UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न 

    प्रिलिम्स

    प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2017)

    1. भारत का निर्वाचन आयोग पाँच सदस्यीय निकाय है।
    2. केंद्रीय गृह मंत्रालय आम चुनाव और उप-चुनावों दोनों के लिये चुनाव कार्यक्रम तय करता है।
    3. निर्वाचन आयोग मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के विभाजन/विलय से संबंधित विवादों को निपटाता है।

    उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

    (a) केवल 1 और 2

    (b) केवल 2

    (c) केवल 2 और 3

    (d) केवल 3

    उत्तर: (d)


    मेन्स:

    प्रश्न. आदर्श आचार संहिता के उद्भव के आलोक में, भारत के निर्वाचन आयोग की भूमिका का विवेचन कीजिये। (2022)