परिसीमन और विधानमंडलों में महिला आरक्षण
प्रिलिम्स के लिये: परिसीमन, जनगणना , अनुच्छेद 81 , अनुच्छेद 82 , नारी शक्ति वंदन अधिनियम
मेन्स के लिये: भारतीय लोकतंत्र में परिसीमन और प्रतिनिधित्व, संघवाद और केंद्र-राज्य संबंध, भारत में महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संवैधानिक संशोधन और चुनावी सुधार
चर्चा में क्यों?
केंद्र सरकार ने तीन प्रमुख विधेयक पेश किये हैं: संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026, परिसीमन विधेयक, 2026 और केंद्रशासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 ताकि नवीनतम उपलब्ध जनगणना के आधार पर नए परिसीमन को सक्षम किया जा सके, लोकसभा का विस्तार किया जा सके और विधानमंडलों में 33% महिला आरक्षण को संचालित किया जा सके।
सारांश
- सरकार ने तीन विधेयक पेश किये हैं ताकि हालिया जनगणना डेटा का उपयोग करके नए परिसीमन को सक्षम किया जा सके, लोकसभा का विस्तार 850 सीटों तक किया जा सके और महिलाओं के लिये 33% आरक्षण लागू किया जा सके।
- एक नया परिसीमन आयोग निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण करेगा और सीटें आवंटित करेगा, जिसके निर्णय अंतिम और कानूनी रूप से बाध्यकारी होंगे, हालाँकि यह निष्पक्षता और संघीय संतुलन पर बहस का विषय होगा।
- यह कदम "एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य" को बनाए रखने का लक्ष्य रखता है, लेकिन दक्षिणी राज्यों के कम प्रतिनिधित्व और संघवाद पर संभावित प्रभाव के बारे में चिंताएँ उत्पन्न करता है।
'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' को तेज़ी से लागू करने के लिये लाए गए तीन विधेयकों के प्रमुख प्रावधान क्या हैं?
संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026
- लोकसभा का विस्तार: यह अनुच्छेद 81 में संशोधन करता है ताकि लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 550 से बढ़ाकर 850 कर दी जाए (815 राज्यों से और 35 केंद्रशासित प्रदेशों से)।
- अनुच्छेद 81 समान प्रतिनिधित्व के सिद्धांत को निर्धारित करता है; किसी राज्य को आवंटित सीटों और उसकी जनसंख्या के बीच का अनुपात सभी राज्यों में लगभग समान होना चाहिये (केवल 6 मिलियन से कम जनसंख्या वाले बहुत छोटे राज्यों के लिये अपवाद के साथ)।
- परिसीमन स्थगन को हटाना: यह विधेयक अनुच्छेद 82 के शीर्षक को "प्रत्येक जनगणना के बाद पुन: समायोजन" से बदलकर "निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण" करता है और प्रत्येक जनगणना के बाद राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या को पुन: समायोजित करने की आवश्यकता को हटा देता है।
- इसी प्रकार यह राज्य विधानसभाओं (अनुच्छेद 170) और अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिये आरक्षण पर अनुच्छेदों में संशोधन करता है, जिससे आधार वर्ष 2001 की जनगणना से बदलकर "ऐसी जनगणना" (Such Census) हो जाता है जिसे संसद कानून द्वारा उपयोग करने का निर्णय लेती है।
- वर्तमान में, अनुच्छेद 81 (2) और (3) लोकसभा सीटों को वर्ष 1971 की जनगणना तथा विधानसभा सीटों को 2001 की जनगणना के अनुसार स्थिर रखते हैं, "जब तक वर्ष 2026 के पश्चात् की गई प्रथम जनगणना के प्रासंगिक आँकड़े प्रकाशित न हो जाएँ"।
- परिसीमन को वर्ष 2026 के बाद की जनगणना से अलग करके सरकार वर्ष 2011 की जनगणना के डेटा का उपयोग करके परिसीमन कर सकती है।
- महिला कोटा में तेज़ी लाना: यह अनुच्छेद 334A में संशोधन करता है ताकि इस नई परिसीमन प्रक्रिया के पूरा होने के तुरंत बाद लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33% महिला आरक्षण (नारी शक्ति वंदन अधिनियम (संविधान 106वाँ संशोधन अधिनियम, 2023)) के तत्काल कार्यान्वयन की अनुमति दी जा सके।
- संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026 को संसद में विशेष बहुमत और कम-से-कम आधे राज्यों द्वारा अनुसमर्थन की आवश्यकता होती है, क्योंकि यह संविधान में संशोधन करता है।
परिसीमन विधेयक, 2026
- जहाँ संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026 इस व्यापक परिवर्तन की अनुमति देता है, वहीं यह विधेयक उसे लागू करने की वास्तविक व्यवस्था प्रदान करता है।
- नया परिसीमन आयोग: यह वर्ष 2002 के परिसीमन अधिनियम का स्थान लेता है तथा केंद्र सरकार को एक नया परिसीमन आयोग गठित करने के लिये सशक्त बनाता है।
- इस निकाय की अध्यक्षता सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश द्वारा की जाएगी और इसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा राज्य निर्वाचन आयुक्त शामिल होंगे। इसे एक सिविल न्यायालय के समकक्ष शक्तियाँ प्रदान की जाएँगी।
- निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण: आयोग को सीटों के आवंटन का पुनः समायोजन करने तथा ‘नवीनतम प्रकाशित जनगणना आँकड़ों’ (जो वर्तमान में 2011 की जनगणना की ओर संकेत करते हैं) के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करने का दायित्व सौंपा गया है।
- परिसीमन आयोग को, पूर्व की भाँति, यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि सभी निर्वाचन क्षेत्र भौगोलिक दृष्टि से यथासंभव सघन हों। इसके साथ ही, उसे भौतिक विशेषताओं, वर्तमान प्रशासनिक सीमाओं, संचार सुविधाओं और जन-सुविधाओं को भी ध्यान में रखना चाहिये।
- इन विधेयकों में मसौदा प्रकाशन, आपत्तियाँ और सार्वजनिक सुनवाई जैसे संरक्षण उपाय प्रदान किये गए हैं। हालाँकि, एक बार अधिसूचित होने के बाद आयोग के आदेश अंतिम होते हैं, उन्हें विधि का बल प्राप्त होता है और उन्हें न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती, जिससे परीक्षण और आलोचना की संभावना उत्पन्न हो सकती है।
- आरक्षण का कार्यान्वयन: आयोग को राज्यों के बीच सीटों का आवंटन करने, निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करने तथा अनुसूचित जातियों (SC), अनुसूचित जनजातियों (ST) और महिलाओं के लिये आरक्षण निर्धारित करने का दायित्व सौंपा जाएगा।
संघ राज्य क्षेत्र (कानून संशोधन) विधेयक, 2026
- यह वह सक्षम विधेयक है, जो इन संरचनात्मक परिवर्तनों को उन संघ राज्य क्षेत्रों तक विस्तारित करने के लिये आवश्यक है, जिनकी अपनी विधायिकाएँ हैं।
- यह दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी में महिलाओं के लिये 33% आरक्षण तथा संबंधित परिसीमन सुधार को लागू करता है।
- परिसीमन विधेयक, 2026 और संघ राज्य क्षेत्र (कानून संशोधन) विधेयक, 2026 सामान्य विधेयक हैं, जिन्हें संसद में साधारण बहुमत से पारित किया जा सकता है।
महिला आरक्षण का क्रियान्वयन
- नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लागू करना: आगामी परिसीमन प्रक्रिया आधिकारिक रूप से नारी शक्ति वंदन अधिनियम (106वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2023) के कार्यान्वयन को प्रारंभ करेगी।
- यह लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सभी सीटों में से एक-तिहाई (33%) सीटें महिलाओं के लिये आरक्षित करने का प्रावधान करता है।
- महत्त्वपूर्ण रूप से, इसमें अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिये आरक्षित सीटों के भीतर भी महिलाओं के लिये एक अनिवार्य उप-आरक्षण (sub-quota) शामिल है।
- आवर्तन और समाप्ति प्रावधान: महिलाओं के लिये आरक्षित विशिष्ट निर्वाचन क्षेत्रों का प्रत्येक आगामी परिसीमन चक्र के बाद क्रमिक रूप से आवर्तन किया जाएगा।
- इसके अतिरिक्त, इस आरक्षण में एक ‘सनसेट क्लॉज़’ (समाप्ति प्रावधान) शामिल है, यह प्रारंभिक रूप से 15 वर्षों के लिये मान्य होगा, हालाँकि संसद विधि के माध्यम से इसे बढ़ाने का अधिकार रखती है।
- यह अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की महिलाओं के लिये किसी अलग आरक्षण का प्रावधान नहीं करता है।
परिसीमन क्या है?
- परिभाषा: परिसीमन वह प्रक्रिया है जिसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिये निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएँ निर्धारित या पुनर्निर्धारित की जाती हैं, ताकि प्रत्येक सीट पर लगभग समान संख्या में मतदाता हों।
- उद्देश्य: इसका उद्देश्य ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के लोकतांत्रिक सिद्धांत को लागू करना है, जिससे जनसंख्या घनत्व में समय के साथ होने वाले परिवर्तन के अनुसार निर्वाचन क्षेत्रों का संतुलन सुनिश्चित किया जा सके।
- संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 82 के तहत प्रत्येक जनगणना के बाद संसद द्वारा परिसीमन अधिनियम बनाया जाता है, जिसके माध्यम से राज्यों को लोकसभा सीटों का पुनः आवंटन किया जाता है तथा राज्यों को क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है।
- अनुच्छेद 170 राज्य विधानसभाओं में सीटों के पुनः समायोजन तथा निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण का समान प्रावधान करता है।
- परिसीमन आयोग: यह केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त एक उच्च-शक्तिशाली एवं स्वतंत्र निकाय होता है, जिसमें 3 सदस्य शामिल होते हैं, एक अध्यक्ष (जो सर्वोच्च न्यायालय का सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायाधीश होता है), मुख्य निर्वाचन आयुक्त (या उनके द्वारा नामित कोई निर्वाचन आयुक्त) तथा संबंधित राज्यों के राज्य निर्वाचन आयुक्त।
- आयोग के आदेशों को विधि का बल प्राप्त होता है और उन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। इसके आदेश लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के समक्ष प्रस्तुत किये जाते हैं, किंतु उनमें कोई संशोधन नहीं किया जा सकता।
- मार्च 2026 तक इसे चार बार गठित किया गया है, अर्थात 1952, 1963, 1973 और 2002 में।
- परिसीमन पर स्थगन: 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 ने लोकसभा में सीटों की कुल संख्या को 1971 की जनगणना के आधार पर स्थिर कर दिया, ताकि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण उपाय लागू किये (मुख्यतः दक्षिणी राज्य), उन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी के रूप में दंडित न किया जाए।
- 84वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 ने कुल सीटों पर लगे स्थगन (freeze) को वर्ष 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक बढ़ा दिया।
- वर्ष 2002 में गठित परिसीमन आयोग ने वर्ष 2001 की जनगणना के आधार पर राज्यों के भीतर आंतरिक निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएँ पुनर्निर्धारित कीं, वहीं राज्यों के बीच सीटों का आवंटन अभी भी 1971 के आँकड़ों पर आधारित है।
- न्यायिक समीक्षा:किशोरचंद्र छंगनलाल राठौड़ बनाम भारत संघ और अन्य, 2024 मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि यदि परिसीमन आयोग का कोई आदेश स्पष्ट रूप से विवेकाधीन है और संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन करता है, तो उसकी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।
प्रस्तावित परिसीमन के संबंध में क्या तर्क हैं?
इसके विरुद्ध तर्क
- जनसांख्यिकीय सफलता के लिये दंड: दक्षिणी राज्यों का तर्क है कि पिछले 50 वर्षों में केंद्र सरकार की परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण नीतियों को सफलतापूर्वक लागू करने के कारण उन्हें प्रभावी रूप से दंडित किया जा रहा है।
- उनकी जनसंख्या वृद्धि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे उत्तरी राज्यों की तुलना में काफी हद तक धीमी हो गई है।
- राजनीतिक प्रतिनिधित्व का नुकसान: यदि सीटों का पुनर्वितरण केवल 2011 की जनसंख्या के आधार पर किया जाता है, तो लोकसभा में दक्षिणी राज्यों की सीटों का अनुपात कम हो जाएगा।
- उत्तर प्रदेश का हिस्सा 14.73% से बढ़कर 16% से अधिक हो सकता है। केरल का हिस्सा 3.68% से घटकर 2.7% और तमिलनाडु का 7.18% से घटकर 5.88% हो सकता है।
- यह बड़े उत्तरी राज्यों तथा दक्षिणी राज्यों के बीच अंतर को और बढ़ाता है, जिससे दक्षिण की सापेक्ष राजनीतिक आवाज़ कमज़ोर हो जाती है।
- राष्ट्रपति निर्वाचन मंडल पर प्रभाव: राष्ट्रपति चुनाव में सांसद या विधायक के वोट का मूल्य वर्तमान में राज्यों के बीच समानता बनाए रखने के लिये 1971 की जनगणना के आधार पर तय किया गया है।
- यदि परिसीमन के परिणामस्वरूप सांसदों और विधायकों की संख्या बदलती है, तो राष्ट्रपति निर्वाचन मंडल की मूल गणना भी बदल जाएगी। इससे यह संवैधानिक प्रश्न उठता है कि क्या उत्तरी राज्यों को भारत के राष्ट्रपति के चुनाव में असंतुलित और एकतरफा प्रभाव प्राप्त हो जाएगा।
- संघवाद पर आघात: आलोचकों का तर्क है कि यह राजनीतिक शक्ति के केंद्रीकरण का एक ‘परोक्ष’ तरीका है।
- यह किसी राजनीतिक दल को केवल कुछ अधिक जनसंख्या वाले उत्तरी राज्यों में भारी जीत हासिल करके राष्ट्रीय राजनीति पर प्रभुत्व स्थापित करने की अनुमति देता है, जिससे दक्षिणी राज्यों की चुनावी इच्छा काफी हद तक अप्रासंगिक हो जाती है।
- परिसीमन प्रक्रिया को लेकर यह आशंका व्यक्त की जाती है कि भविष्य में इससे ‘जेरिमैंडरिंग’ को बढ़ावा मिल सकता है—अर्थात किसी राजनीतिक दल को अनुचित लाभ पहुँचाने के लिये निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं में जानबूझकर बदलाव करना, जैसा कि असम जैसे उदाहरणों में चिंता के रूप में देखा गया है।
- आर्थिक असमानता: दक्षिणी राज्य राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद (GDP) और कर राजस्व में अनुपात से अधिक योगदान देते हैं।
- उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम होना ‘पर्याप्त प्रतिनिधित्व के बिना कराधान’ जैसी स्थिति उत्पन्न करता है।
पक्ष में तर्क
- लोकतांत्रिक सिद्धांत: प्रत्यक्ष लोकतंत्र का मूल सिद्धांत ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ है।
- सीमित परिसीमन के कारण उत्तर प्रदेश के एक सांसद द्वारा प्रतिनिधित्व किये जाने वाले नागरिकों की संख्या केरल के सांसद की तुलना में वर्तमान में लाखों अधिक है, जिससे समान लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के सिद्धांत का उल्लंघन होता है।
- सीटों की संख्या में समग्र वृद्धि: केंद्र सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि 850 सीटों वाली विस्तारित संसद में किसी भी राज्य की वर्तमान सीटों की संख्या में कोई कटौती नहीं की जाएगी।
- वास्तव में सभी राज्यों की कुल सीटों में लगभग 50% की वृद्धि (उदाहरण के लिये तमिलनाडु की सीटें 39 से बढ़कर लगभग 58 हो सकती हैं) होने का अनुमान है।
- महिला प्रतिनिधित्व को बढ़ावा देना: सदन का विस्तार करने से सरकार को 33% महिला आरक्षण लागू करने में सहायता मिलती है, जिससे मौजूदा राजनीतिक प्रतिनिधियों के लिये उपलब्ध सामान्य सीटों की संख्या में भारी कमी नहीं होती।
आगे की राह
- सहमति निर्माण: परिसीमन केवल एक गणितीय प्रक्रिया नहीं है, यह राजनीतिक शक्ति का एक संवेदनशील पुनर्वितरण है। अंतर-राज्य परिषद और राज्य सरकारों के साथ व्यापक परामर्श के माध्यम से राष्ट्रीय सहमति बनाना आवश्यक है।
- सीट आवंटन के लिये “हाइब्रिड मॉडल”: केवल जनसंख्या पर निर्भर रहने के बजाय एक नया सूत्र तैयार किया जा सकता है, जिसमें जनसांख्यिकीय प्रदर्शन, आर्थिक योगदान (GSDP) और भौगोलिक आकार को भी महत्त्व दिया जाए, ताकि बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को दंडित न किया जाए।
- राज्यसभा को सशक्त बनाना: जनसंख्या-आधारित लोकसभा के संतुलन के लिये राज्यसभा में सुधार किया जा सकता है, जिससे सभी राज्यों को समान प्रतिनिधित्व मिले (जैसे– अमेरिकी सीनेट में होता है) और छोटे राज्यों की संघीय आवाज़ सुरक्षित रहे सके।
- कोटा और परिसीमन को अलग करना: विपक्षी नेताओं का सुझाव है कि 33% महिला आरक्षण को परिसीमन जैसी अत्यधिक परिवर्तनशील प्रक्रिया पर निर्भर किये बिना वर्तमान सदनों की मौजूदा सीट संख्या के भीतर ही लागू किया जा सकता है।
निष्कर्ष
प्रस्तावित परिसीमन ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को बनाए रखने का उद्देश्य रखता है, लेकिन इसके साथ ही क्षेत्रीय असंतुलन, संघवाद और बेहतर जनसांख्यिकीय प्रदर्शन वाले राज्यों के साथ न्याय से जुड़ी चिंताओं को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। एक सहमति-आधारित और संतुलित दृष्टिकोण, संभवतः हाइब्रिड सूत्र और संस्थागत सुरक्षा उपायों के माध्यम से, आवश्यक है ताकि प्रतिनिधित्व और संघीय भावना दोनों को सुरक्षित रखा जा सके।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. “परिसीमन लोकतंत्र के लिये अनिवार्य है, किंतु संघवाद के लिये चुनौतीपूर्ण।” भारतीय संदर्भ में इसका आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. परिसीमन क्या है?
यह निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को पुनः निर्धारित करने की प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य जनसंख्या के आधार पर समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है।
2. परिसीमन का विनियमन किन संवैधानिक प्रावधानों द्वारा किया जाता है?
अनुच्छेद 82 और 170 प्रत्येक जनगणना के बाद सीटों के पुनर्समायोजन को अनिवार्य बनाते हैं।
3. परिसीमन आयोग की क्या भूमिका है?
यह एक स्वतंत्र निकाय है, जिसके आदेशों को कानून का बल प्राप्त होता है और उन्हें न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
4. भारत में परिसीमन विवादास्पद क्यों है?
यह बेहतर जनसंख्या नियंत्रण के बावजूद दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधित्व को कम कर सकता है, जिससे संघवाद से संबंधित चिंताएँ उत्पन्न होती हैं।
5. 2026 का प्रस्ताव महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर किस प्रकार प्रभाव डालता है?
यह परिसीमन के बाद लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिये 33% आरक्षण का प्रावधान करता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. दिसंबर 2023 तक भारत सरकार द्वारा कितने परिसीमन आयोग गठित किये गए हैं? (2024)
(a) एक
(b) दो
(c) तीन
(d) चार
उत्तर: (d)
प्रश्न. परिसीमन आयोग के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2012)
- परिसीमन आयोग के आदेश को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
- जब परिसीमन आयोग के आदेश लोकसभा या राज्य विधानसभा के समक्ष रखे जाते हैं, तो वे आदेशों में कोई संशोधन नहीं कर सकते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (c)
मेन्स
प्रश्न. "भारत में जनांकिकीय लाभांश तब तक सैद्धांतिक ही बना रहेगा जब तक कि हमारी जनशक्ति अधिक शिक्षित, जागरूक, कुशल और सृजनशील नहीं हो जाती।" सरकार ने हमारी जनसंख्या को अधिक उत्पादनशील और रोज़गार-योग्य बनने की क्षमता में वृद्धि के लिये कौन-से उपाय किये हैं? (2016)
प्रश्न. "जिस समय हम भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश (डेमोग्राफिक डिविडेंड) को शान से प्रदर्शित करते हैं, उस समय हम रोज़गार-योग्यता की पतनशील दरों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं।" क्या हम ऐसा करने में कोई चूक कर रहे हैं? भारत को जिन जॉबों की बेसबरी से दरकार है, वे जॉब कहाँ से आएंगे? स्पष्ट कीजिये। (2014)
भारत में खाद्य अपशिष्ट की दुविधा
प्रिलिम्स के लिये: संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम, फूड वेस्ट इंडेक्स, ग्लोबल हंगर इंडेक्स (GHI), भारतीय खाद्य निगम, सतत विकास लक्ष्य (SDG) 2
मेन्स के लिये: भारत में खाद्य सुरक्षा और भूख, कृषि आपूर्ति शृंखला की अक्षमताएँ, फसल कटाई के बाद हानि और कोल्ड चेन अवसंरचना, अपशिष्ट कम करने में खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र की भूमिका
चर्चा में क्यों?
अंतर्राष्ट्रीय शून्य अपशिष्ट दिवस (30 मार्च) के उपलक्ष्य में, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के फूड वेस्ट इंडेक्स 2024 ने यह उजागर किया है कि भारत प्रतिवर्ष 78-80 मिलियन टन खाद्य पदार्थों की बर्बादी करता है, जो व्यापक क्षुधा और भारी खाद्य अपशिष्ट के बीच एक स्पष्ट विरोधाभास को दर्शाता है।
- अंतर्राष्ट्रीय शून्य अपशिष्ट दिवस बेहतर अपशिष्ट प्रबंधन और सतत उपभोग की आवश्यकता को रेखांकित करता है। इसे वर्ष 2022 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा घोषित किया गया था और इसका संचालन संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) तथा संयुक्त राष्ट्र मानव बस्तियाँ कार्यक्रम द्वारा किया जाता है।
- वर्ष 2026 का अंतर्राष्ट्रीय शून्य अपशिष्ट दिवस खाद्य अपशिष्ट पर केंद्रित है, जो पर्यावरणीय क्षति का एक प्रमुख, किंतु रोके जाने योग्य कारण है।
सारांश
- भारत में प्रतिवर्ष 78-80 मिलियन टन खाद्य पदार्थों की बर्बादी होती है (लगभग ₹1.55 लाख करोड़), जबकि लगभग 194 मिलियन लोग अभी भी कुपोषित हैं, जो खाद्य वितरण में गंभीर असमानता को दर्शाता है।
- यह संकट कमज़ोर फसल-उपरांत अवसंरचना, कमज़ोर आपूर्ति शृंखला और उपभोक्ता व्यवहार से उत्पन्न होता है, जिसके समाधान हेतु भंडारण, प्रसंस्करण, पुनर्वितरण और जागरूकता में सुधार आवश्यक है, ताकि खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
भारत में खाद्य अपशिष्ट का पैमाना क्या है?
- भारत की वैश्विक स्थिति: विश्व में प्रतिवर्ष लगभग 1.05 अरब टन खाद्य पदार्थों की बर्बादी होती है। इसमें से 60% बर्बादी घरों में, 28% खाद्य सेवा क्षेत्र में और 12% खुदरा क्षेत्र में होती है।
- भारत खाद्य अपशिष्ट में वैश्विक स्तर पर दूसरे स्थान पर है (जहाँ प्रतिवर्ष 78-80 मिलियन टन फसल-उपरांत एवं खाद्य सामग्री, जिसकी कीमत लगभग ₹1.55 लाख करोड़ है, बर्बाद होती है) और यह केवल चीन (108 मिलियन टन प्रति वर्ष) से पीछे है।
- तुलनात्मक रूप से, अमेरिका 24.7 मिलियन टन खाद्य पदार्थों की बर्बादी करता है, जबकि जापान, अपनी शून्य-अपशिष्ट ‘मोट्टाइनाई’ संस्कृति के मार्गदर्शन में, केवल 5.2 मिलियन टन खाद्य अपशिष्ट करता है।
- प्रति व्यक्ति अपशिष्ट: भारत में प्रति व्यक्ति घरेलू खाद्य अपशिष्ट प्रतिवर्ष 55 किलोग्राम है, जो अमेरिका (73 किलोग्राम) और जर्मनी (75 किलोग्राम) की तुलना में कम है, लेकिन भारत में घरेलू भूख संकट को देखते हुए यह अत्यंत चिंताजनक है।
- आर्थिक मूल्य: इस बर्बाद खाद्य पदार्थ का आर्थिक मूल्य लगभग ₹1.55 लाख करोड़ आँका गया है, जो संसाधनों की भारी क्षति करता है और किसानों की आय को प्रभावित करता है।
- द्वैध संकट: भारत हर वर्ष लाखों टन खाद्य पदार्थों की बर्बादी करता है, फिर भी लगभग 194 मिलियन लोग कुपोषित हैं, जो खाद्य उत्पादन और समान वितरण के बीच गहरे संरचनात्मक अंतर को उजागर करता है।
- खाद्य, उपभोक्ता मामले और सार्वजनिक वितरण पर स्थायी समिति (2020-21) ने रिपोर्ट किया कि पिछले चार वर्षों में परिवहन के दौरान नष्ट हुए गेहूँ और चावल से 82.30 मिलियन लोगों को एक महीने तक भोजन कराया जा सकता था।
- यह स्थिति ग्लोबल हंगर इंडेक्स (GHI) 2023 में भारत की 125 देशों में 111वीं रैंकिंग में परिलक्षित होती है, जो व्यापक खाद्य असुरक्षा को दर्शाती है।
- भोजन की बर्बादी के मुख्य कारण:
- अपर्याप्त कोल्ड चेन अवसंरचना: मज़बूत कोल्ड स्टोरेज सुविधाओं की कमी के कारण अत्यधिक नाशवान वस्तुएँ (जैसे– फल, सब्ज़ियाँ, डेयरी उत्पाद और माँस) कटाई के बाद 30–40% तक नुकसान झेलती हैं।
- नीति आयोग ने प्रमुख बाधाओं की पहचान की है, जिनमें कोल्ड चेन अवसंरचना में अपर्याप्त निवेश, ढँके हुए भंडारण की कमी, समय पर मशीनीकरण का अभाव और वैज्ञानिक पैकेजिंग की कमी शामिल हैं।
- कमज़ोर लॉजिस्टिक्स और आपूर्ति शृंखला का विखंडन: बिखरे हुए परिवहन नेटवर्क, रेफ्रिजरेटेड वाहनों (रीफर्स) की कमी तथा परिवहन में देरी के कारण कृषि उत्पाद शहरी बाज़ारों तक पहुँचने से पहले ही तेज़ी से खराब हो जाते हैं।
- भंडारण में अक्षमताएँ: पारंपरिक गोदाम [जैसे– भारतीय खाद्य निगम (FCI) का भंडारण] अक्सर वैज्ञानिक संरक्षण विधियों की कमी से जूझते हैं।
- खुले में भंडारण और अपर्याप्त पैकेजिंग (जैसे– छिद्रयुक्त जूट की बोरियों का उपयोग) के कारण अनाज नमी और कृंतकों (चूहों) से होने वाले नुकसान के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाता है।
- वर्ष 2019 से 2024 के बीच केवल पंजाब में ही भारतीय खाद्य निगम (FCI) की भंडारण सुविधाओं में 8,200 टन से अधिक खाद्यान्न खराब हो गया।
- अपर्याप्त रूप से उपयोग किया गया खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र: भारत अपने कृषि उत्पादों का लगभग 8–10% ही प्रसंस्करण करता है, जबकि अमेरिका में यह लगभग 65% और चीन में 23% है। मूल्य संवर्द्धन की कमी के कारण स्थानीय बाज़ारों में अतिरिक्त उत्पादन सड़ने लगता है।
- उपभोक्ता और घरेलू व्यवहार: बढ़ती शहरी आय, बदलती जीवनशैली और भव्य शादियों व भोजों की संस्कृति अंतिम उपभोक्ता स्तर पर खाद्य अपव्यय में काफी योगदान देती है।
- मौसमी संवेदनशीलता: अत्यधिक मौसमीय घटनाएँ उत्पादन और भंडारण से जुड़ी कमज़ोरियों को और बढ़ा देती हैं, जिससे खराब होने की दर में वृद्धि होती है।
- भ्रष्टाचार: भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) ने बताया कि वर्ष 2011–16 के बीच पंजाब में भारतीय खाद्य निगम (FCI) द्वारा खराब भंडारण के कारण 700 करोड़ रुपये मूल्य का गेहूँ नष्ट हो गया, जो अक्षमता, भ्रष्टाचार और खराब खाद्यान्न के दुरुपयोग जैसी समस्याओं को उजागर करता है।
- अपर्याप्त कोल्ड चेन अवसंरचना: मज़बूत कोल्ड स्टोरेज सुविधाओं की कमी के कारण अत्यधिक नाशवान वस्तुएँ (जैसे– फल, सब्ज़ियाँ, डेयरी उत्पाद और माँस) कटाई के बाद 30–40% तक नुकसान झेलती हैं।
खाद्य हानि, खाद्य अपशिष्ट और खाद्य अपव्यय
- खाद्य हानि: यह मानव उपभोग के लिये निर्धारित खाद्य पदार्थों के द्रव्यमान (सूखी मात्रा) या पोषण मूल्य (गुणवत्ता) में कमी को दर्शाता है।
- यह मुख्यतः खाद्य आपूर्ति शृंखला में मौजूद अक्षमताओं के कारण होता है, जिनमें कमज़ोर अवसंरचना, अपर्याप्त लॉजिस्टिक्स, तकनीक की कमी तथा कौशल और प्रबंधन की अपर्याप्तता शामिल हैं। इसके अतिरिक्त प्राकृतिक आपदाएँ भी इन हानियों में योगदान देती हैं।
- खाद्य अपशिष्ट: यह उन खाद्य पदार्थों को संदर्भित करता है जो मानव उपभोग के लिये उपयुक्त होते हैं, लेकिन खराब होने या उनकी समाप्ति तिथि पार होने के कारण फेंक दिये जाते हैं।
- यह अपशिष्ट बाज़ार में अधिक आपूर्ति या व्यक्तिगत उपभोक्ताओं की खरीदारी और खान-पान की आदतों जैसे कारकों के कारण उत्पन्न हो सकता है।
- खाद्य अपव्यय: यह किसी भी ऐसे खाद्य को संदर्भित करता है जो खराब होने या बर्बाद होने के कारण नष्ट हो जाता है। इस प्रकार “अपव्यय” शब्द में खाद्य हानि और खाद्य अपशिष्ट दोनों शामिल होते हैं।
खाद्य अपशिष्ट के क्या प्रभाव हैं?
- आर्थिक क्षति: प्रतिवर्ष 1.55 लाख करोड़ रुपये का नुकसान सीधे कृषि अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। यह किसानों को उनके उत्पाद का वास्तविक बाज़ार मूल्य प्राप्त करने से रोकता है और उपभोक्ताओं के लिये खाद्य कीमतों पर मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ाता है।
- महत्त्वपूर्ण संसाधनों के अपशिष्ट: खाद्य अपशिष्ट से तात्पर्य उसके उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले संसाधनों के खराब होने से है।
- उदाहरणस्वरूप 1 किलोग्राम चावल उगाने के लिये लगभग 5,000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। जब यह चावल व्यर्थ जाता है, तो जल-संकट झेल रहे क्षेत्रों (जैसे– पंजाब और हरियाणा) से निकाला गया भूजल भी बेकार हो जाता है।
- ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन: खाद्य हानि और अपशिष्ट वैश्विक वार्षिक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग 8–10% हिस्सा बनाते हैं।
- यदि खाद्य अपशिष्ट को एक देश माना जाए, तो यह वैश्विक स्तर पर तीसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक होता।
- मीथेन उत्सर्जन: लैंडफिल में सड़ने वाला भोजन मीथेन उत्पन्न करता है, जो वायुमंडलीय ताप बढ़ाने की दृष्टि से CO₂ की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है।
- सामाजिक एवं मानवीय संकट: इतने बड़े पैमाने पर खाद्य का नुकसान सीधे सतत विकास लक्ष्य (SDG 2: शून्य भुखमरी) को प्रभावित करता है, जिससे कमज़ोर और वंचित वर्गों में कुपोषण, स्टनिंग और वेस्टिंग जैसी समस्याएँ और गंभीर हो जाती हैं।
भोजन की बर्बादी रोकने के लिये सरकारी पहल
- प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना (PMKSY): इसका उद्देश्य खेत से लेकर खुदरा बिक्री तक कुशल आपूर्ति शृंखला प्रबंधन के साथ आधुनिक अवसंरचना का निर्माण करना है, विशेष रूप से मेगा फूड पार्कों और कोल्ड चेन अवसंरचना पर ध्यान केंद्रित करते हुए।
- प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम औपचारिकीकरण (PMFME): यह आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत एक योजना है, जिसका उद्देश्य सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों को वित्तीय, तकनीकी और व्यावसायिक सहायता प्रदान करना है ताकि स्थानीय स्तर पर मूल्य संवर्द्धन को बढ़ाया जा सके।
- कृषि अवसंरचना निधि (AIF): यह एक मध्यम से दीर्घकालिक ऋण वित्तपोषण सुविधा है, जिसका उद्देश्य फसल-उपरांत प्रबंधन अवसंरचना और सामुदायिक कृषि परिसंपत्तियों के लिये व्यवहार्य परियोजनाओं में निवेश को बढ़ावा देना है।
- भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) की पहल: “सेव फूड, शेयर फूड, शेयर जॉय” जैसी पहलों के माध्यम से अतिरिक्त खाद्य को ज़रूरतमंदों तक पुनर्वितरित करने को प्रोत्साहित किया जाता है।
- ई-नाम (राष्ट्रीय कृषि बाज़ार): एक डिजिटल प्लेटफॉर्म जो मंडियों को एकीकृत करता है और मूल्य खोज में सुधार करता है, जिससे विलंबित बिक्री के कारण होने वाली बर्बादी कम होती है।
- PACS (प्राथमिक कृषि ऋण समितियाँ): भंडारण, एकत्रीकरण और वितरण के लिये बहु-सेवा केंद्रों के रूप में कार्य करने के लिये मज़बूत किया गया, जिससे ज़मीनी स्तर पर नुकसान को कम करने में मदद मिलती है।
- मिशन लाइफ: "उपयोग करो और फेंको" की आदतों पर टिकाऊ उपभोग को बढ़ावा देता है। प्रमुख कार्यों में खाद्य अपशिष्ट को कम करना, खाद बनाना और बायोगैस में योगदान शामिल है। इसका उद्देश्य स्थिरता को एक वैश्विक सांस्कृतिक मानदंड बनाने के लिये एक "प्रो-प्लैनेट पीपल" (P3) जन आंदोलन को बढ़ावा देना है।
भारत खाद्य बर्बादी से प्रभावी ढंग से कैसे निपट सकता है और उसे समाप्त कर सकता है?
- कोल्ड चेन का निर्माण: विशेष रूप से कृषि-प्रधान राज्यों में कोल्ड चेन के विकास को आवश्यक खाद्य सुरक्षा बुनियादी ढाँचे के रूप में मानना नुकसान की शृंखला को तोड़ने के लिये महत्त्वपूर्ण है।
- पंचायत या कृषक उत्पादक संगठन (FPO) स्तर पर सौर-ऊर्जा संचालित, विकेंद्रीकृत कोल्ड स्टोरेज इकाइयों को बढ़ावा देना संकटग्रस्त बिक्री और कटाई के बाद के नुकसान को काफी कम कर सकता है।
- खाद्य साझाकरण के लिये कानून बनाना: भारत को अधिशेष भोजन के पुनर्वितरण के लिये एक राष्ट्रीय कानून की आवश्यकता है। यूरोपीय देशों से मिले संकेतों के अनुसार, सुपरमार्केट और संस्थानों को कानूनी रूप से बिना बिके खाद्य दान करने के लिये बाध्य किया जाना चाहिये, जिसे कर संबंधी प्रोत्साहनों द्वारा समर्थित किया जाए।
- फार्म गेट को सशक्त बनाना: कृषक-उत्पादक संगठनों को मशीनीकृत सुखाने और मोबाइल कोल्ड यूनिट से लैस करके प्रारंभिक चरण के भंडारण को आधुनिक बनाना।
- अपशिष्ट को ट्रैक करना और मापना: UNEP की पद्धति पर आधारित एक समेकित राष्ट्रीय डेटाबेस स्थापित करना, जिसके लिये बड़े खाद्य व्यवसायों, खानपान करने वालों और संस्थागत रसोई को अपने खाद्य अपशिष्ट को सार्वजनिक रूप से रिपोर्ट करना आवश्यक हो।
- प्रसंस्करण क्षेत्र को बढ़ावा देना: विशुद्ध रूप से 'उत्पादन-केंद्रित' दृष्टिकोण से 'प्रसंस्करण और संरक्षण-केंद्रित' दृष्टिकोण की ओर बदलाव। खाद्य प्रौद्योगिकी और पैकेजिंग में निजी क्षेत्र के निवेश को प्रोत्साहित करना महत्त्वपूर्ण है।
- सांस्कृतिक नैतिकता को पुनरुज्जीवित करना: भोजन को पवित्र (अन्न ब्रह्मा) मानने के पारंपरिक दर्शन को पुनः जाग्रत् करना। स्कूलों और सार्वजनिक संस्थानों को खाद्य संरक्षण को केवल एक जागरूकता अभियान के रूप में नहीं, बल्कि एक मौलिक नागरिक ज़िम्मेदारी के रूप में बढ़ावा देना चाहिये।
- स्वच्छ भारत अभियान के समान एक राष्ट्रव्यापी व्यवहार परिवर्तन अभियान शुरू करना, जिसका उद्देश्य शहरी उपभोक्ताओं, रेस्तराँ और आयोजकों को भोजन भाग नियंत्रण और अधिशेष भोजन दान पर शिक्षित करना है।
- चक्रीय अर्थव्यवस्था: अनिवार्य खाद्य अपशिष्ट को SATAT योजना के तहत संपीड़ित बायोगैस (CBG) या कृषि के लिये जैविक खाद जैसे मूल्यवान उप-उत्पादों में परिवर्तित करने को प्रोत्साहित करना।
- वर्ष 2030 तक वैश्विक खाद्य अपशिष्ट को आधा करना (SDG 12.3) एक महत्त्वपूर्ण जलवायु कार्रवाई है जो वैश्विक मीथेन उत्सर्जन को 7% तक कम कर सकती है।
खाद्य अपशिष्ट से निपटने वाले अंतर्राष्ट्रीय मॉडल
- अमेरिका: PATH अधिनियम (2015) व्यवसायों को अधिशेष भोजन दान करने के लिये प्रोत्साहित करने हेतु कर प्रोत्साहन प्रदान करता है।
- इटली: चैरिटी को दान को बढ़ावा देकर खाद्य अपशिष्ट को कम करने के लिये वित्तीय प्रोत्साहन (~10 मिलियन अमेरिकी डॉलर वार्षिक) प्रदान करता है।
- संयुक्त राष्ट्र ढाँचा: खाद्य हानि और अपशिष्ट प्रोटोकॉल आपूर्ति शृंखलाओं में अपशिष्ट को मापने के लिये वैश्विक मानक निर्धारित करता है और SDG 12.3 लक्ष्यों का समर्थन करता है।
निष्कर्ष
भारत का खाद्य अपशिष्ट संकट व्यापक भूख के बीच गहन आपूर्ति शृंखला अक्षमताओं को दर्शाता है। इसे हल करने के लिये बेहतर कटाई-पश्चात प्रणालियों, खाद्य पुनर्वितरण और भोजन को महत्त्व देने के लिये एक सांस्कृतिक बदलाव की आवश्यकता है, जो इसे शून्य भूख (SDG 2) के अनुरूप एक आर्थिक आवश्यकता और नैतिक कर्त्तव्य दोनों बनाता है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. “भारत में भोजन की बर्बादी का संकट अभाव की समस्या नहीं, बल्कि वितरण और अक्षमता की समस्या है।” समालोचनात्मक परीक्षण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. खाद्य हानि और खाद्य अपशिष्ट में क्या अंतर है?
खाद्य हानि उत्पादन और आपूर्ति शृंखलाओं के दौरान होती है, जबकि खाद्य अपशिष्ट खुदरा या उपभोक्ता स्तर पर खाद्य भोजन को त्यागने के कारण होता है।
2. UNEP खाद्य अपशिष्ट सूचकांक क्या है?
यह SDG 12.3 के लक्ष्यों को ट्रैक करने के लिये घरों, खुदरा और खाद्य सेवाओं में खाद्य अपशिष्ट को मापने वाली एक वैश्विक रिपोर्ट है।
3. खाद्य अपशिष्ट जलवायु चिंता का विषय क्यों है?
यह वैश्विक GHG उत्सर्जन का 8-10% योगदान देता है और मीथेन उत्सर्जित करता है, जो एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है।
4. भारत में खाद्य बर्बादी को कौन-सी योजनाएँ संबोधित करती हैं?
PMKSY, PMFME, कृषि अवसंरचना कोष और FSSAI पहल, जैसे– "भोजन बचाना, भोजन साझा करना"।
5. भारत में खाद्य बर्बादी को कैसे कम किया जा सकता है?
कोल्ड चेन को मज़बूत करके, खाद्य पुनर्वितरण कानूनों को बढ़ावा देकर, प्रसंस्करण में सुधार करके और व्यावहारिक परिवर्तन को प्रोत्साहित करके।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
मेन्स
प्रश्न. देश में खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र की चुनौतियाँ एवं अवसर क्या हैं? खाद्य प्रसंस्करण को प्रोत्साहित कर कृषकों की आय में पर्याप्त वृद्धि कैसे की जा सकती है? (2020)
प्रश्न. खाद्य सुरक्षा बिल से भारत में भूख व कुपोषण के विलोपन की आशा है। उसके प्रभावी कार्यान्वयन में विभिन्न आशंकाओं की समालोचनात्मक विवेचना कीजिये। साथ ही यह भी बताएँ कि विश्व व्यापार संगठन (WTO) में इससे कौन-सी चिंताएँ उत्पन्न हो गई हैं? (2013)
IMF द्वारा वैश्विक विकास के अनुमान में कटौती
हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अपने वैश्विक विकास के अनुमान में कटौती की और चेतावनी दी कि पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण विश्व अर्थव्यवस्था एक अधिक प्रतिकूल परिदृश्य की ओर बढ़ रही है, जो आधुनिक समय में सबसे बड़ा ऊर्जा संकट उत्पन्न कर सकता है।
- परिचय: यह संशोधन ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि और तेल आपूर्ति में व्यवधान, विशेष रूप से होर्मुज़ जलडमरूमध्य में चल रहे संघर्ष के कारण प्रेरित है।
- संघर्ष के बगैर IMF मज़बूत प्रौद्योगिकी निवेश, कम ब्याज दरों और राजकोषीय समर्थन द्वारा समर्थित विकास को 0.1 प्रतिशत अंक बढ़ाकर ~3.4% कर देता है।
- हालाँकि वर्ष 2026 के लिये वैश्विक विकास में अब लगभग 20 आधार अंकों की कटौती कर ~3.1% की गई, मुद्रास्फीति के कम होने से पहले बढ़ने की उम्मीद है और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के अधिक प्रतिकूल रूप से प्रभावित होने की संभावना है।
- विकास परिदृश्य: IMF ने संघर्ष के विकसित होने के तरीके के आधार पर तीन परिदृश्यों की रूपरेखा तैयार की– "कमज़ोर, बदतर और गंभीर"।
- आधारभूत (संदर्भ) परिदृश्य: एक अल्पकालिक संघर्ष, जिसमें वर्ष 2026 में तेल की कीमतें औसतन ~$82 प्रति बैरल रहेंगी, हालाँकि यह वर्तमान ब्रेंट क्रूड लेवल (~$96) से काफी नीचे है।
- प्रतिकूल परिदृश्य: लंबे संघर्ष के तहत वर्ष 2026 में वैश्विक विकास गिरकर ~2.5% (2025 में 3.4% से) हो सकता है, जिसमें तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल के आसपास रहेंगी।
- सबसे खराब परिदृश्य: वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी के करीब पहुँच सकती है, जिसमें तेल की कीमतें $110 (2026) और $125 (2027) तक पहुँच सकती हैं।
- भारत का दृष्टिकोण: भारत की विकास दर ~6.5% अनुमानित है, जो वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद सापेक्ष लचीलेपन को दर्शाती है।
- वर्तमान रुझान: IMF ने कहा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था पहले से ही प्रतिकूल परिदृश्य की ओर बढ़ रही है और निरंतर व्यवधानों एवं अनिश्चितताओं के कारण अनुमान पहले ही अप्रचलित हो सकता है।
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और पढ़ें: विश्व आर्थिक परिदृश्य रिपोर्ट, 2025 |
