भ्रष्टाचार बोध सूचकांक 2025
प्रिलिम्स के लिये: भ्रष्टाचार बोध सूचकांक (CPI), भ्रष्टाचार, राजनीतिक वित्तपोषण, गैर-सरकारी संगठन (NGO), विधि का शासन, संसद, प्रगतिशील कर, संसदीय निगरानी, धन शोधन।
मेन्स के लिये: भ्रष्टाचार बोध सूचकांक (CPI) 2025 के प्रमुख निष्कर्ष, भ्रष्टाचार के कारण एवं परिणाम और CPI 2025 में सुझाए गए भ्रष्टाचार नियंत्रण के उपाय।
चर्चा में क्यों?
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने भ्रष्टाचार बोध सूचकांक (CPI) 2025 जारी किया, जिसमें 182 देशों का मूल्यांकन उनके सार्वजनिक क्षेत्र में कथित भ्रष्टाचार के आधार पर किया गया। इस सूचकांक में 0 का अर्थ अत्यधिक भ्रष्ट और 100 का अर्थ अत्यंत स्वच्छ माना गया है।
- यह रिपोर्ट वैश्विक भ्रष्टाचार प्रवृत्तियों, उनके अंतर्निहित कारणों, सामाजिक प्रभावों और व्यावहारिक सुधारात्मक सुझावों का व्यापक मूल्यांकन प्रस्तुत करती है।
सारांश
- वैश्विक औसत CPI 42 पर पहुँच गया, जिसमें 182 देशों में से 122 देशों का स्कोर 50 से नीचे है, जो व्यापक भ्रष्टाचार को दर्शाता है।
- लोकतंत्रों का औसत स्कोर 71 है, जबकि सत्तावादी शासन का औसत 32, जो यह दर्शाता है कि संस्थागत दृढ़ता भ्रष्टाचार नियंत्रण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
- अनुशंसाएँ स्वतंत्र न्यायपालिका, राजनीतिक पारदर्शिता, नागरिक क्षेत्र की सुरक्षा और अवैध वित्तीय प्रवाह के विरुद्ध अंतर्राष्ट्रीय सहयोग पर केंद्रित हैं।
भ्रष्टाचार बोध सूचकांक (CPI) 2025 के प्रमुख निष्कर्ष क्या हैं?
- वैश्विक औसत में गिरावट: ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के अनुसार, 182 देशों के समावेश वाले CPI 2025 में वैश्विक औसत स्कोर 42/100 पर आ गया है, जो पिछले दशक में सबसे निचला स्तर है और यह व्यापक भ्रष्टाचार की ओर संकेत करता है। इस सूचकांक में 122 देशों का स्कोर 50 से नीचे है, जो भ्रष्टाचार की गंभीरता को दर्शाता है।
- उच्च प्रदर्शन करने वाले देशों की कमी: 80 से अधिक अंक प्राप्त करने वाले देशों की संख्या एक दशक पहले 12 थी, जो इस वर्ष घटकर केवल 5 देशों तक रह गई है (डेनमार्क, फिनलैंड, सिंगापुर, न्यूज़ीलैंड, नॉर्वे)।
- शीर्ष एवं निचले प्रदर्शन करने वाले देश: 2025 के भ्रष्टाचार बोध सूचकांक (CPI) में डेनमार्क 89 स्कोर के साथ आठवीं बार लगातार शीर्ष पर रहा। वहीं सूडान और सोमालिया का सबसे कम स्कोर 9 है। इसके अलावा, वेनेज़ुएला (10) जैसे संघर्षग्रस्त और प्रतिबंधात्मक शासन वाले देश भी सूचकांक के निचले हिस्से में शामिल हैं।
- भारत की स्थिति: वर्ष 2025 में भारत भ्रष्टाचार बोध सूचकांक (CPI) में 91वें स्थान पर रहा, जिसका स्कोर 39/100 था, जो वर्ष 2024 में 96वें स्थान से थोड़ा सुधार दर्शाता है।
- भारत (स्कोर 39, 91वाँ स्थान) अधिकांश दक्षिण एशियाई पड़ोसियों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन करता है, लेकिन भूटान (71, 18) और चीन (43, 76) से पीछे है।
- भारत मालदीव (39, 91) के साथ बराबर है। अन्य की रैंकिंग कम है: श्रीलंका (35, 107), नेपाल (34, 109), पाकिस्तान (28, 136), बांग्लादेश (24, 150), अफगानिस्तान और म्याँमार (16, 169)।
- क्षेत्रीय औसत: पूर्ण लोकतंत्र का औसत 71 है, त्रुटिपूर्ण लोकतंत्र का औसत 47 है तथा तानाशाही शासन का औसत केवल 32 है, जो लोकतांत्रिक संस्थाओं और भ्रष्टाचार नियंत्रण के बीच दृढ़ संबंध को दर्शाता है।
रिपोर्ट में भ्रष्टाचार के क्या कारण बताए गए हैं?
- न्याय और कानून का कमज़ोर होना: न्यायिक नियुक्तियों का राजनीतीकरण, अभियोजन में हस्तक्षेप, अपर्याप्त संसाधन और स्वतंत्रता की कमी सज़ा से बचाव की स्थिति उत्पन्न करती है। जब न्याय प्रणाली किसी विशेष समूह के नियंत्रण में होती है, तो कानून आम जनता की बजाय शक्तिशाली वर्ग की रक्षा करते हैं।
- राजनीतिक निर्णय-निर्माण पर अनुचित प्रभाव: अस्पष्ट राजनीतिक वित्तपोषण, अनियंत्रित लॉबिंग, हितों का टकराव और धनी दानदाताओं या समीपस्थ सहयोगियों का प्रभाव निजी हितों को सार्वजनिक सत्ता पर कब्ज़ा करने की अनुमति देता है। इससे “महाभ्रष्टाचार” और राज्य के कब्ज़े की स्थिति उत्पन्न होती है, जहाँ संस्थाएँ सामान्य जनता की बजाय अभिजात वर्ग के हितों की सेवा करती हैं।
- नागरिक क्षेत्र और मीडिया स्वतंत्रता में कमी: प्रतिबंधात्मक NGO कानून, बदनाम करने के अभियान, निगरानी, सेंसरशिप और पत्रकारों के खिलाफ हिंसा (2012 से वैश्विक स्तर पर 829 पत्रकार मारे गए, जिनमें कई भ्रष्टाचार की जाँच करते समय) निगरानी संस्थाओं को चुप कर देती है। पारदर्शिता और जवाबदेही में कमी भ्रष्टाचार को पनपने का अवसर देती है।
- सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन में विफलताएँ: बजट बनाने, खरीद और ऋण प्रबंधन में निगरानी की कमी, साथ ही यह संरक्षण नेटवर्क और सार्वजनिक धन के प्रवाह को बदल देता है एवं रिश्वतखोरी तथा पक्षपात के अवसर उत्पन्न करते हैं।
भ्रष्टाचार के परिणाम क्या हैं?
- न्याय एवं मानव अधिकारों का क्षरण: अपराधों पर सज़ा न मिलने से कानून की शासन प्रणाली कमज़ोर होती है, पीड़ितों (विशेषकर हाशिये पर रहने वाले समुदायों) को उपचार से वंचित किया जाता है तथा न्याय तक पहुँचने में बाधाएँ बढ़ती हैं, जिससे और अधिक भ्रष्टाचार का दुश्चक्र उत्पन्न होता है।
- लोकतांत्रिक पतन और राज्य पर नियंत्रण: भ्रष्टाचार चुनावों, संसदों तथा निगरानी संस्थाओं को कमज़ोर करता है, जिससे नीतियों पर कब्ज़ा, सार्वजनिक विश्वास में कमी एवं राजनीतिक ध्रुवीकरण होता है। यह तानाशाही प्रवृत्तियों को बढ़ावा देता है व लोकतांत्रिक पलटाव को कठिन बनाता है।
- नागरिक स्थान और मीडिया का दमन: पत्रकारों और नागरिक समाज पर हमले जवाबदेही को कम करते हैं, आत्म-नियंत्रण को बढ़ावा देते हैं और भ्रष्टाचार को छिपे रहने की अनुमति देते हैं। यह उच्च-स्तरीय भ्रष्टाचार पर खोजी पत्रकारिता को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है।
- सार्वजनिक सेवाओं का पतन और असमानता में वृद्धि: डाइवर्ट फंड के कारण स्वास्थ्य, शिक्षा, अवसंरचना तथा अन्य आवश्यक सेवाओं की गुणवत्ता खराब हो जाती है। अनौपचारिक भुगतान गरीबों पर प्रतिगामी कर के रूप में असर डालते हैं, कमज़ोर समूहों को बाहर रखते हैं एवं गरीबी, वित्तीय संकट व सामाजिक अशांति [उदाहरण के लिये वर्ष 2025 में नेपाल और मेडागास्कर में सरकारों को गिराने वाले जेन-ज़ेड (Gen-Z) के नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शन] को बढ़ावा देते हैं।
- विस्तृत सामाजिक और आर्थिक प्रभाव: भ्रष्टाचार आर्थिक अस्थिरता में योगदान देता है, निवेश को रोकता है, जलवायु संवेदनशीलता को बढ़ाता है (जैसे– हड़पे गए अनुकूलन फंड) तथा जनता में असंतोष को बढ़ावा देता है। गंभीर मामलों में यह राज्य को कमज़ोर स्थिति और संघर्ष तक ले जा सकता है।
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल
- परिचय: ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल (TI) एक प्रमुख वैश्विक नागरिक समाज संगठन है, जो भ्रष्टाचार से लड़ने के लिये समर्पित है। यह सरकार, व्यवसाय और नागरिक समाज में पारदर्शिता, जवाबदेही एवं ईमानदारी को बढ़ावा देता है।
- इसकी स्थापना वर्ष 1993 में हुई थी और इसका मुख्यालय बर्लिन, जर्मनी में स्थित है।
- मुख्य मिशन: यह संगठन एक ऐसे विश्व की कल्पना करता है जो भ्रष्टाचार-मुक्त हो, जिसे यह "सौंपे गए अधिकार का निजी लाभ के लिये दुरुपयोग" के रूप में परिभाषित करता है। इसका कार्यक्षेत्र सरकार, व्यवसाय, नागरिक समाज एवं रोज़मर्रा के जीवन तक विस्तृत है।
- मुख्य प्रकाशन: यह संगठन अपने वार्षिक भ्रष्टाचार बोध सूचकांक (CPI) के लिये सबसे अधिक जाना जाता है। यह वैश्विक भ्रष्टाचार बैरोमीटर भी प्रकाशित करता है।
भ्रष्टाचार को रोकने के लिये CPI 2025 में क्या सुझाव दिये गए हैं?
- स्वतंत्र और पारदर्शी न्याय संस्थान: न्यायिक नियुक्तियों को राजनीतिक हस्तक्षेप से सुरक्षित रखना, न्याय प्रणाली को पर्याप्त संसाधन प्रदान करना और भ्रष्टाचार के पीड़ितों (सहित समुदायों) को नागरिक समाज के माध्यम से न्याय पाने की सुविधा देना।
- राजनीतिक निर्णय लेने पर अनुचित प्रभाव से निपटना: राजनीतिक वित्तपोषण को पूरी पारदर्शिता के साथ और डोनेशन पर सीमा लगाकर नियंत्रित करना, लॉबिंग गतिविधियों का खुलासा करना तथा हितों के टकराव को प्रबंधित करना ताकि नीतियों पर नियंत्रण किया जा सके एवं सार्वजनिक हित की रक्षा हो सके।
- न्याय तक सुगम पहुँच: भ्रष्टाचार से प्रभावित व्यक्तियों और समुदायों के लिये प्रत्यक्ष कानूनी मार्ग उपलब्ध कराना, सीमांत समूहों के लिये समर्थन सुनिश्चित करना।
- नागरिक स्थान और भ्रष्टाचार-विरोधी रिपोर्टिंग को बढ़ावा देना: अभिव्यक्ति, संघ और सूचना की स्वतंत्रता की रक्षा करना; पत्रकारों, मुखबिरों और गैर-सरकारी संगठनों की सुरक्षा करना तथा नागरिक समाज के लिये घरेलू एवं अंतर्राष्ट्रीय वित्तपोषण में आने वाली बाधाओं को दूर करना।
- वित्तीय प्रबंधन में पारदर्शिता और निरीक्षण: सार्वजनिक व्यय, उधार और खरीद के संसदीय पर्यवेक्षण, स्वतंत्र लेखापरीक्षा एवं विनियामक निगरानी को सुदृढ़ बनाना। निरीक्षण तंत्रों में समावेशी भागीदारी सुनिश्चित करना।
- भ्रष्टाचार की रोकथाम, पहचान और दंड: सुदृढ़ राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय प्रवर्तन लागू करना, अपहृत संपत्तियों को ज़ब्त करना, सीमापार मनी लॉन्ड्रिंग चैनलों को बंद करना तथा सीमापार भ्रष्टाचार से निपटने हेतु बहुपक्षीय सहयोग को बढ़ावा देना।
निष्कर्ष
CPI 2025 ने एक चिंताजनक वैश्विक भ्रष्टाचार की प्रवृत्ति का खुलासा किया है, जिसमें औसत स्कोर एक दशक में पहली बार गिरकर 42 हो गया है। लोकतांत्रिक प्रतिगमन, प्रतिबंधित नागरिक स्थान और कमज़ोर संस्थान इस गिरावट के प्रमुख कारण हैं। इस प्रवृत्ति को उलटने के लिये पारदर्शी शासन, स्वतंत्र न्यायपालिका और संरक्षित नागरिक समाज का तत्काल कार्यान्वयन आवश्यक है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. लोक सेवा प्रदायगी और असमानता पर भ्रष्टाचार के सामाजिक-आर्थिक परिणाम क्या हैं? |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. भ्रष्टाचार बोध सूचकांक (CPI) क्या है?
CPI ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा प्रकाशित एक वार्षिक सूचकांक है, जो देशों को सार्वजनिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार के कथित स्तरों के आधार पर 0 (अत्यधिक भ्रष्ट) से 100 (बहुत स्वच्छ) के पैमाने पर रैंक प्रदान करता है।
2. CPI 2025 में भारत का रैंक और स्कोर क्या था?
भारत 39 अंकों के साथ 100 में से 91वें स्थान पर रहा, जो वर्ष 2024 में 96वें स्थान से मामूली सुधार को दर्शाता है।
3. CPI 2025 में कौन-से देश शीर्ष पर और सबसे नीचे रहे?
डेनमार्क (89) लगातार आठवें वर्ष सूचकांक में शीर्ष पर रहा, जबकि सोमालिया और दक्षिण सूडान (9) सबसे निचले रैंक वाले देश थे।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रिलिम्स
प्रश्न 1. 'बेनामी संपत्ति लेन-देन का निषेध अधिनियम, 1988' (PBPT अधिनियम) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2017)
- किसी संपत्ति का लेन-देन बेनामी लेन-देन नहीं समझा जाएगा यदि संपत्ति का मालिक उस लेन-देन के बारे में अवगत नहीं है।
- बेनामी पाई गई संपत्तियाँ सरकार द्वारा ज़ब्त किये जाने के लिये दायी होंगी।
- यह अधिनियम जाँच के लिये तीन प्राधिकारियों का उपबंध करता है किंतु यह किसी अपीलीय क्रियाविधि का उपबंध नहीं करता।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) केवल 1 और 3
(d) केवल 2 और 3
उत्तर: (b)
मेन्स
प्रश्न. चर्चा कीजिये कि किस प्रकार उभरती प्रौद्योगिकियाँ और वैश्वीकरण मनी लॉन्ड्रिंग में योगदान करते हैं? राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर मनी लॉन्ड्रिंग की समस्या से निपटने के लिये किये जाने वाले उपायों को विस्तार से समझाइये। (2021)
प्रश्न. "आर्थिक प्रदर्शन के लिये संस्थागत गुणवत्ता एक निर्णायक चालक है।" इस संदर्भ में लोकतंत्र को सुदृढ़ करने के लिये सिविल सेवा में सुधारों के सुझाव दीजिये। (2020)
अर्बन चैलेंज फंड
प्रिलिम्स के लिये: अर्बन चैलेंज फंड, केंद्रीय बजट, शहरी स्थानीय निकाय, अटल मिशन फॉर रीजुवेनेशन एंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन 2.0 (AMRUT 2.0), स्वच्छ भारत मिशन-शहरी
मेन्स के लिये: भारत की आर्थिक वृद्धि और GDP में शहरों की भूमिका, बाज़ार-आधारित वित्तपोषण और नगरपालिका वित्त सुधार, शहरी शासन की चुनौतियाँ और वित्तीय विकेंद्रीकरण
चर्चा में क्यों?
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अर्बन चैलेंज फंड (UCF) को मंज़ूरी दे दी है, जो अनुदान-आधारित वित्तपोषण से बाज़ार-आधारित शहरी विकास की दिशा में बदलाव को दर्शाता है।
- यह 2025–26 के केंद्रीय बजट में भारत द्वारा घोषित दृष्टि को कार्यान्वित करता है, जिसमें शहरों को विकास के केंद्र के रूप में विकसित करना, शहरों का रचनात्मक पुनर्विकास और जल एवं स्वच्छता से संबंधित प्रस्तावों को लागू करना शामिल है।
सारांश
- अर्बन चैलेंज फंड (UCF) भारत की शहरी नीति को अनुदान-आधारित वित्तपोषण से बाज़ार-संबंधित, सुधार-प्रधान विकास की ओर ले जाता है। यह विकास केंद्रों और जल स्थिरता को बढ़ावा देता है, साथ ही नगरपालिका वित्त तथा निजी निवेश को सुदृढ़ करता है।
- चूँकि शहर GDP का 60–70% उत्पन्न करते हैं, लेकिन उन्हें अवसंरचना की कमी, जलवायु जोखिम और शासन संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, UCF का उद्देश्य टिकाऊ, समावेशी और आर्थिक रूप से प्रतिस्पर्द्धी शहरीकरण को संभव बनाना है।
अर्बन चैलेंज फंड (UCF) के संबंध में मुख्य तथ्य क्या हैं?
- परिचय: अर्बन चैलेंज फंड (UCF) आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय (MoHUA) की एक केंद्र प्रायोजित योजना है, जिसके लिये वित्तीय वर्ष 2025–26 से 2030–31 तक ₹1,00,000 करोड़ की केंद्रीय सहायता निर्धारित की गई है और इसे लागू करने की अवधि वित्तीय वर्ष 2033–34 तक बढ़ाई जा सकती है।
- इसका उद्देश्य चैलेंज-आधारित दृष्टिकोण के माध्यम से बैंकेबल (Bankable) शहरी अवसंरचना परियोजनाओं का समर्थन करना है, जिससे पाँच वर्षों में लगभग ₹4 लाख करोड़ के निवेश को उत्प्रेरित किया जा सके।
- यह योजना अनुदान-आधारित वित्तपोषण से बाज़ार-संबंधित, सुधार-प्रधान और परिणाम-केंद्रित शहरी विकास की ओर एक महत्त्वपूर्ण बदलाव को दर्शाती है, यह स्वीकार करते हुए कि केवल सार्वजनिक वित्त शहरी अवसंरचना की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकता।
- वित्तपोषण पैटर्न और वित्त मॉडल:
- केंद्रीय सहायता: केंद्र सरकार परियोजना की लागत का 25% वहन करेगी।
- बाज़ार लाभ: फंडिंग (वित्तपोषण) के लिये एक पूर्व शर्त यह है कि शहरों को परियोजना लागत का कम-से-कम 50% बाज़ार स्रोतों से जुटाना होगा, जिसमें नगर निगम बॉण्ड, बैंक ऋण और सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPPs) शामिल हैं।
- शेष हिस्सा: अंतिम 25% का योगदान राज्य, केंद्रशासित प्रदेश, शहरी स्थानीय निकाय (ULBs) या अतिरिक्त बाज़ार वित्तपोषण द्वारा किया जा सकता है।
- यह संरचना निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित करती है, जिससे शहरी अवसंरचना के निर्माण और प्रबंधन में वित्तीय तथा प्रबंधकीय साझेदारी दोनों संभव हो सकें।
- तीन रणनीतिक स्तंभ: UCF के तहत परियोजनाओं को इन तीन मुख्य स्तंभों में से किसी एक के अनुरूप होना चाहिये:
- विकास केंद्र के रूप में शहर: यह ट्रांजिट-ओरिएंटेड डेवलपमेंट (TOD), ग्रीनफील्ड टाउनशिप और आर्थिक गलियारों पर केंद्रित है, ताकि प्रतिस्पर्द्धात्मकता बढ़ाई जा सके।
- सृजनात्मक पुनर्विकास: इसमें भीड़भाड़ वाले शहर के केंद्र, सांस्कृतिक धरोहर स्थल और ब्राउनफील्ड पुनरुज्जीवन यानी परित्यक्त औद्योगिक भूमि का पुन: उपयोग शामिल है।
- जल और स्वच्छता: इसमें पेयजल आपूर्ति में सेवा पूर्णता हासिल करना तथा ठोस अपशिष्ट प्रबंधन का आधुनिकीकरण, साथ ही पुराने अपशिष्ट का निवारण शामिल है।
- छोटे शहरों के लिये क्रेडिट पुनर्भुगतान गारंटी: छोटे शहरों हेतु बाज़ार तक पहुँच सुगम बनाने के लिये ₹5,000 करोड़ का कोष तैयार किया गया है, जो ऋण पुनर्भुगतान गारंटी योजना उपलब्ध कराएगा।
- पात्रता: उत्तरपूर्वी/पहाड़ी राज्यों के शहरी स्थानीय निकाय (ULBs) और 1 लाख से कम आबादी वाले नगर इस योजना के लिये पात्र हैं।
- गारंटी: यह योजना पहली बार ऋण लेने वालों के लिये केंद्र सरकार द्वारा ₹7 करोड़ तक या ऋण राशि का 70% (जो भी कम हो) की गारंटी प्रदान करती है। वहीं बाद में लिये जाने वाले ऋण हेतु यह ₹7 करोड़ तक या ऋण राशि का 50% तक की गारंटी देती है।
- यह छोटे शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) को प्रारंभ में ₹20 करोड़ और बाद के चरणों में ₹28 करोड़ की परियोजनाओं को लागू करने में सक्षम बनाता है, जिससे ऋणदाताओं का भरोसा बढ़ता है तथा बाज़ार वित्त तक पहुँच का विस्तार होता है।
- कवरेज: यह निधि सभी ऐसे शहरों को कवर करेगी जिनकी जनसंख्या 10 लाख या उससे अधिक है (2025 के अनुमान के अनुसार), सभी राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों की राजधानियाँ जो इस श्रेणी में शामिल नहीं हैं और प्रमुख औद्योगिक शहर जिनकी जनसंख्या 1 लाख या उससे अधिक है।
- परियोजनाएँ बैंक योग्य, परिवर्तनकारी और तीन वर्टिकल्स के अनुरूप होनी चाहिये, जिनमें स्पष्ट परिणाम और विश्वसनीय बाज़ार वित्त पोषण योजनाएँ हों।
- अटल कायाकल्प और शहरी परिवर्तन मिशन (AMRUT) 2.0, स्वच्छ भारत मिशन-शहरी (SBM-U 2.0) या अन्य केंद्रीय प्रायोजित योजनाओं के तहत पहले से वित्तपोषित परियोजनाएँ पात्र नहीं हैं, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि UCF नई और नवोन्मेषी पहलों का समर्थन करना।
- सुधार-संबंधित चयन (चैलेंज मोड): पिछली योजनाओं के विपरीत, जहाँ फंड जनसंख्या के आधार पर आवंटित होते थे, UCF एक प्रतिस्पर्द्धात्मक चैलेंज मोड का उपयोग करता है।
- निधि तभी जारी की जाती है जब शहर अर्बन गवर्नेंस, डिजिटल सिस्टम और वित्तीय पारदर्शिता में विशिष्ट सुधार लागू करते हैं।
- परियोजनाओं का मूल्यांकन प्रदर्शन संकेतकों (KPI), जैसे– रोज़गार सृजन, राजस्व संग्रहण और जलवायु सहनशीलता के आधार पर किया जाता है।
भारत के आर्थिक भविष्य के लिये शहर क्यों महत्त्वपूर्ण हैं?
- उत्पादकता केंद्र: शहर बड़े इंजन के रूप में कार्य करते हैं जो आर्थिक गतिविधियों को छोटे, प्रभावी भौगोलिक क्षेत्रों में संकुचित करते हैं।
- जबकि केवल 3% भूमि शहरी है, शहर भारत की GDP में लगभग 60% से 70% का योगदान देते हैं।
- केवल 15 शहर (जिनमें मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद शामिल हैं) राष्ट्रीय GDP का 30% हिस्सा बनाते हैं। इन हब्स से 2047 तक वार्षिक GDP वृद्धि में अतिरिक्त 1.5% योगदान की आशा है।
- खपत और बढ़ता मध्यम वर्ग: शहर भारत को विश्व का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार बनने में केंद्र भूमिका निभा रहा है।
- वर्ष 2030 तक भारत की कुल उपभोक्ता खपत लगभग दोगुनी होकर 3.1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर होने की संभावना है, जिसमें शहरी मध्यम वर्ग इस वृद्धि का लगभग 60% हिस्सा देगा।
- शहरी आय ग्रामीण आय से चार गुना तक अधिक है, जो इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर प्रीमियम सेवाओं तक की मांग को बढ़ावा देती है।
- वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा और FDI: भारत में लगभग 90% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) प्रमुख शहरी क्षेत्रों में केंद्रित होता है।
- मेट्रो नेटवर्क, हाई-स्पीड इंटरनेट और स्थिर विद्युत जैसी प्रभावी शहरी अवसंरचना भारत के 2026 तक 5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर और 2047 तक 40 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य के लिये आवश्यक है।
- सामाजिक और आर्थिक अवसर: शहरीकरण गरीबी उन्मूलन और सामाजिक गतिशीलता के लिये एक प्रमुख माध्यम है।
- शहर स्वास्थ्य सेवाओं, विशेष शिक्षा और डिजिटल अवसंरचना तक बेहतर पहुँच प्रदान करते हैं, जिससे आर्थिक विकास और जीवन स्तर में सुधार होता है।
भारत के शहरी विकास और सततता को प्रोत्साहन देने हेतु पहलें
भारतीय शहरों के सतत विकास में क्या चुनौतियाँ हैं?
- अवसंरचना और आवास की कमी: भारतीय शहर अपनी निर्माण क्षमता से तेज़ी से बढ़ रहे हैं। वर्ष 2031 तक शहरी जनसंख्या 600 मिलियन तक पहुँचने का अनुमान है, जिससे एक विशाल ‘स्केल’ समस्या उत्पन्न होगी।
- भारत को शहरी अवसंरचना के लिये वार्षिक ₹4.6 लाख करोड़ का निवेश आवश्यक है, जबकि वर्तमान वित्तपोषण लगभग ₹1.3 लाख करोड़ के आसपास है, जिससे 70% का बड़ा घाटा उत्पन्न होता है।
- किफायती आवासों की कमी 1 करोड़ है और यह संख्या 2030 तक तीन गुना होने की संभावना है। इसके परिणामस्वरूप 6.5 करोड़ लोग मलिन बस्तियों में आवास कर रहे हैं।
- पूर्णता में देरी: PMAY जैसी योजनाओं के तहत, जबकि स्वीकृतियों की संख्या अधिक है (1.08 करोड़), भूमि की बढ़ती लागत और नियामक बाधाओं के कारण परियोजनाओं की पूर्णता दर अक्सर लक्ष्यों से पीछे रहती है।
- पर्यावरणीय और संसाधन संबंधी दबाव: तीव्र शहरीकरण ने शहरी ‘कॉमंस’- वायु, जल और मृदा को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।
- वर्ष 2024 में, भारत विश्व का पाँचवा सबसे प्रदूषित देश था। वर्ष 2026 तक, ‘प्रदूषण अर्थव्यवस्था’ में तेज़ी आई है, जिसमें सार्वजनिक प्रणालियाँ स्वच्छ वायु प्रदान करने में विफल रहीं और घरों ने निजी वायु तथा जल शोधक उपकरणों पर अरबों रुपये खर्च किये।
- वर्ष 2030 तक, जल की मांग उपलब्ध आपूर्ति का दोगुना हो जाएगी। बेंगलुरु और दिल्ली जैसे शहर पहले ही गंभीर मौसमी संकटों का सामना कर रहे हैं, जहाँ पुराने इंफ्रास्ट्रक्चर और रिसाव के कारण पाइप के माध्यम से पहुँचाया गया जल का 40-50% नुकसान हो जाता है।
- शहर प्रतिदिन 1,50,000 टन से अधिक अपशिष्ट उत्पन्न करते हैं। गाज़ीपुर (दिल्ली) जैसे प्रमुख लैंडफिल भरे हुए हैं, फिर भी अपशिष्ट का केवल एक छोटा हिस्सा वैज्ञानिक तरीके से प्रसंस्कृत किया जाता है।
- गतिशीलता और जलवायु संवेदनशीलता: शहरों का भौतिक ‘प्रवाह’ दृढ़ होता जा रहा है, जबकि भौतिक ‘आकार’ असुरक्षित होता जा रहा है।
- मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों में यातायात संकट का स्तर प्रायः 50% से अधिक हो जाता है, जिससे उत्पादकता में कमी के कारण अर्थव्यवस्था को प्रतिवर्ष 22 अरब अमेरिकी डॉलर का नुकसान होता है।
- शहरी केंद्र अब आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में 3-4°C अधिक गर्म हो गए हैं, जिससे मृत्यु दर का जोखिम बढ़ता है तथा शीतलन हेतु विद्युत ग्रिड पर दबाव पड़ता है।
- शहरी बाढ़: तूफानी जल निकासी प्रणालियों के अतिक्रमण और "कंक्रीट-हेवी" योजना ने चेन्नई और मुंबई जैसे शहरों को अत्यधिक वर्षा के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बना दिया है। अब 85% भारतीय ज़िले चरम जलवायु घटनाओं की चपेट में हैं।
- शासन एवं राजकोषीय कमज़ोरी: यद्यपि शहर सकल घरेलू उत्पाद का दो-तिहाई हिस्सा योगदान करते हैं, फिर भी नगर निगम राष्ट्रीय कर राजस्व का 1% से भी कम नियंत्रित करते हैं।
- खराब GIS मैपिंग और दरों को संशोधित करने में राजनीतिक सुभेद्यता के कारण, भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 0.2% से भी कम भाग संपत्ति करों के माध्यम से एकत्रित किया जाता है, जबकि OECD देशों में यह 1.1% है।
- मुंबई मेट्रो विस्तार जैसी परियोजनाओं में "बहु-स्तरीय शासन" के कारण विलंब होता है, जहाँ कई एजेंसियाँ (राज्य, केंद्र और स्थानीय) प्रायः विपरीत उद्देश्यों से कार्य करती हैं।
भारतीय शहरों के सतत विकास के लिये क्या उपाय अपनाए जा सकते हैं?
- पारगमन-उन्मुख विकास (TOD): शहरी विकास निधि के तहत, पारगमन गलियारों के साथ उच्च-घनत्व, मिश्रित-उपयोग विकास को बढ़ावा देना ताकि आवागमन समय न्यूनतम हो और निजी वाहनों पर निर्भरता कम हो।
- बिना मोटर वाले परिवहन (NMT): पैदल यात्री-अनुकूल पथ और साइकिल ट्रैक के माध्यम से समर्पित "लास्ट-माइल" कनेक्टिविटी स्थापित करना, ताकि यातायात अक्षमताओं के कारण होने वाले नुकसान में कमी लाई जा सके।
- डिजिटल अवसंरचना (गति शक्ति): जल, विद्युत और परिवहन नेटवर्क की एकीकृत योजना हेतु पीएम गति शक्ति भू-स्थानिक प्लेटफॉर्म का उपयोग करना, जिससे बार-बार सड़क खुदाई और संसाधनों की बर्बादी से बचा जा सके।
- "स्पंज सिटी" की अवधारणा: शहरी बाढ़ के प्रबंधन हेतु "स्पंज सिटी" मॉडल (चीन और सिंगापुर में प्रयुक्त) का कार्यान्वयन, जिसमें पारगम्य सतहों, शहरी आर्द्रभूमियों और तूफानी जल को सोखने के लिये "वर्षा उद्यान" का निर्माण शामिल है।
- शहरी ताप द्वीपों (UHI) का न्यूनीकरण: "हरित-नीली" अवसंरचना (पार्क और जल निकाय) में वृद्धि तथा कूल रूफ की नीतियों को लागू करके शहरों का तापमान 2-3°C तक कम करना।
- अपशिष्ट में चक्रीय अर्थव्यवस्था: 100% अपशिष्ट पृथक्करण को अनिवार्य करके तथा गैर-पुनर्चक्रणीय पुराने अपशिष्ट (जैसे– गाज़ीपुर या ओखला जैसे स्थलों पर) के लिये अपशिष्ट-से-ऊर्जा संयंत्रों का उपयोग करके शून्य-अपशिष्ट शहरों की ओर अग्रसर होना।
- जल की तटस्थता: बड़े आवासीय परिसरों में विकेंद्रित सीवेज उपचार संयंत्र (STP) अनिवार्य करना, ताकि बागवानी और फ्लशिंग हेतु 100% "ग्रे वाटर" का उपचार और पुनः उपयोग किया जा सके।
निष्कर्ष
अर्बन चैलेंज फंड भारत में आर्थिक रूप से सतत शहरीकरण की दिशा में एक परिवर्तनकारी कदम है। बाज़ार पहुँच को सक्षम करके, शहरी शासन को सुदृढ़ करके, निजी भागीदारी को बढ़ावा देकर और छोटे शहरों का समर्थन करके इसका उद्देश्य भविष्य की विकास आवश्यकताओं के अनुरूप सुदृढ़, समावेशी और आर्थिक रूप से गतिशील शहरी केंद्रों का निर्माण करना है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. भारत में शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंसिंग को बदलने में अर्बन चैलेंज फंड के महत्त्व पर चर्चा कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. अर्बन चैलेंज फंड (UCF) क्या है?
यह आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA) की एक केंद्र प्रायोजित योजना है, जो बाज़ार-आधारित वित्तपोषण और सुधार-आधारित चयन के माध्यम से शहरी परियोजनाओं को बढ़ावा देती है।
2. UCF के तहत वित्तपोषण का पैटर्न क्या है?
केंद्र 25% सहायता प्रदान करता है, जिसमें कम-से-कम 50% बाज़ार स्रोतों से आता है और शेष 25% राज्यों/शहरी स्थानीय निकायों (ULB) या अतिरिक्त वित्त से आता है।
3. UCF के तहत कौन-से शहर पात्र हैं?
10 लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाले शहर, सभी राज्य/केंद्रशासित प्रदेश की राजधानियाँ और 1 लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाले प्रमुख औद्योगिक शहर।
4. UCF छोटे शहरों का समर्थन कैसे करता है?
5,000 करोड़ रुपये की ऋण चुकौती गारंटी योजना के माध्यम से, जो छोटे शहरी स्थानीय निकायों (ULB) को 70% तक सरकारी गारंटी के साथ बाज़ार ऋण प्राप्त करने में सक्षम बनाता है।
5. भारत के आर्थिक भविष्य के लिये शहर क्यों महत्त्वपूर्ण हैं?
शहर सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 60-70% उत्पन्न करते हैं, अधिकांश प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) आकर्षित करते हैं तथा उत्पादकता, उपभोग और सामाजिक गतिशीलता को बढ़ावा देते हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
मेन्स
प्रश्न. कई वर्षों से उच्च तीव्रता की वर्षा के कारण शहरों में बाढ़ की बारंबारता बढ़ रही है। शहरी क्षेत्रों में बाढ़ के कारणों पर चर्चा करते हुए इस प्रकार की घटनाओं के दौरान जोखिम कम करने की तैयारियों की क्रियाविधि पर प्रकाश डालिये। (2016)
प्रश्न. क्या कमज़ोर और पिछड़े समुदायों के लिये आवश्यक सामाजिक संसाधनों को सुरक्षित करने के द्वारा, उनकी उन्नति के लिये सरकारी योजनाएँ, शहरी अर्थव्यवस्थाओं में व्यवसायों की स्थापना करने में उनको बहिष्कृत कर देती हैं? (2014)
भारत में धार्मिक प्रथाओं की न्यायिक निगरानी
प्रिलिम्स के लिये: आवश्यक धार्मिक आचरणों (ERP) का परीक्षण, अनुच्छेद 25 और 26, विधि का शासन
मेन्स के लिये: भारत में धार्मिक आचरणों को नियंत्रित करने में न्यायपालिका की भूमिका, आवश्यक धार्मिक आचरणों (ERP) का परीक्षण: विकास, महत्त्व और आलोचना
चर्चा में क्यों?
थिरुपरनकुंद्रम दीपथून विवाद और काँचीपुरम वरदराज पेरूमल मंदिर में तेन्कलै संप्रदाय के भजन-पाठ के अधिकार से जुड़े मामलों में मद्रास उच्च न्यायालय के फैसलों ने धार्मिक मामलों में न्यायपालिका की बढ़ती भूमिका को उजागर किया है।
- ये मामले धार्मिक रीति‑रिवाज़ों को लेकर उत्पन्न विवादित प्रथाओं का मूल्यांकन करने के लिये संवैधानिक न्यायालयों द्वारा प्रयुक्त मूलभूत आवश्यक धार्मिक आचरणों (ERP) के परीक्षण की बढ़ती भूमिका को रेखांकित करते हैं।
भारत में धार्मिक विवाद कैसे विकसित हुए?
- नागरिक अधिकारों का काल: 100 वर्ष से भी पूर्व मंदिर प्रवेश के विवादों को नागरिक अधिकार के मुद्दों के रूप में माना जाता था।
- शंकरलिंगा नाडन बनाम राजा राजेश्वर दोराई (1908) मामले में, लंदन की प्रिवी काउंसिल ने इस पर विचार किया कि क्या नाडर समुदाय को कमुधी मंदिर में प्रवेश का अधिकार है। यह नागरिक कानून के दायरे में पहुँच और पूजा के लिये व्यापक संघर्षों को दर्शाता है।
- विधायी निरीक्षण: वर्ष 1927 में मद्रास प्रेसीडेंसी ने हिंदू धार्मिक बंदोबस्ती अधिनियम पेश किया। इसके अंतर्गत मंदिर कोष के लेखांकन और स्थानीय समितियों की स्थापना की प्रक्रिया शुरू हुई, जिससे प्रेसीडेंसी सरकार की पर्यवेक्षी भूमिका स्थापित हुई।
- संवैधानिक परिवर्तन: वर्ष 1950 में संविधान को अपनाने के साथ अनुच्छेद 25 और 26 ने धर्म का पालन करने और प्रचार करने का अधिकार प्रदान किया।
- हालाँकि, इन अधिकारों को सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य और नैतिकता के अधीन रखा गया था, जिससे राज्य को उन प्रथाओं में हस्तक्षेप करने की अनुमति मिली जो सार्वजनिक चेतना को आहत करती थीं।
भारत में आवश्यक धार्मिक आचरणों की न्यायिक व्याख्या कैसे विकसित हुई?
- आवश्यक धार्मिक आचरणों (ERP) का परीक्षण: यह भारतीय न्यायपालिका द्वारा उपयोग किया जाने वाला एक विधिक सिद्धांत है, जिसका उद्देश्य यह निर्धारित करना है कि कौन-सी धार्मिक प्रथा किसी धर्म के लिये "अनिवार्य" हैं और इसलिये यह अनुच्छेद 25 और 26 के तहत संवैधानिक संरक्षण का हकदार है।
- यदि कोई धार्मिक आचरण "अनिवार्य अभिन्न अंग" (जैसे– सिख धर्म में गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ) पाया जाता है, तो उसे संरक्षण प्राप्त होता है। राज्य इसे आसानी से विनियमित या प्रतिबंधित नहीं कर सकता।
- यदि कोई आचरण सामाजिक, आर्थिक या व्यावसायिक प्रकृति का है, भले ही वह धर्म से संबंधित हो, तो उसे "पंथनिरपेक्ष" माना जाता है। राज्य के पास सामाजिक सुधार के लिये इन्हें विनियमित करने का अधिकार है।
- विकास:
- शिरूर मठ मामला (1954): भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने स्थापित किया कि "आवश्यक" क्या है, इसका निर्णय स्वयं उस धर्म के सिद्धांतों के आधार पर किया जाना चाहिये।
- दरगाह समिति मामला (1961): सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि अंधविश्वासी मान्यता या "गैर-आवश्यक तत्त्व" संविधान द्वारा संरक्षित नहीं हैं।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 26 के तहत संरक्षण केवल उन धार्मिक प्रथाओं तक सीमित है जो धर्म का अनिवार्य और अभिन्न अंग हैं।
- आनंद मार्ग मामला (2004): न्यायालय ने निर्णय दिया कि कोई भी प्रथा तभी अनिवार्य मानी जा सकती है जब उसकी अनुपस्थिति से धर्म का स्वरूप मौलिक रूप से बदल जाए।
- शायरा बानो मामला (2017): सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि 'तीन तलाक' इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है।
- इसमें कहा गया कि कोई प्रथा जो केवल ‘अनुमत’ है, लेकिन ‘अनिवार्य’ नहीं है, उसे आवश्यक धार्मिक प्रथा नहीं माना जा सकता।
- सबरीमाला मंदिर (2018): न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि यदि कोई प्रथा ‘आवश्यक’ मानी भी जाती हो, तब भी उसे संरक्षण नहीं दिया जा सकता, यदि वह संवैधानिक नैतिकता (समता, गरिमा और स्वतंत्रता) का उल्लंघन करती है।
- थिरुपरनकुंड्रम दीपाठून रूलिंग (2026): मद्रास उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि संभावित सांप्रदायिक तनाव की आशंका मात्र के आधार पर राज्य प्रशासन किसी दीर्घकालिक धार्मिक अनुष्ठान पर प्रतिबंध नहीं लगा सकता।
- इसमें न्यायालय ने यह कहा कि प्रशासन का दायित्व धार्मिक अनुष्ठानों को सुगम बनाना है, न कि सुरक्षा का बहाना बनाकर उन्हें प्रतिबंधित करना।
- कांचीपुरम वरदराज पेरूमल मंदिर (2026): न्यायालय ने थेंकलई संप्रदाय के भजन-पाठ (अध्यापक मिरासी) का नेतृत्व करने के विशेष अधिकार को मान्यता दी।
- इसमें न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि किसी व्यक्ति का पूजा करने का अधिकार (अनुच्छेद 25) किसी संप्रदाय को अनुच्छेद 26 के तहत प्राप्त धार्मिक संप्रदायिक अधिकारों तथा स्थापित अनुष्ठानिक पदों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
धर्म की स्वतंत्रता से संबंधित संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद 25: यह अंत:करण की स्वतंत्रता तथा धर्म को स्वतंत्र रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है।
- अनुच्छेद 26: यह धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक कार्यों के प्रबंधन की स्वतंत्रता देता है।
- अनुच्छेद 27: यह किसी विशिष्ट धर्म की अभिवृद्धि के लिये करों के संदाय के बारे में स्वतंत्रता प्रदान करता है।
- अनुच्छेद 28: यह कुछ शिक्षा संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक उपासना में उपस्थिति होने के संबंध में स्वतंत्रता प्रदान करता है।
भारत में ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथा’ (ERP) संबंधी न्यायिक सिद्धांत की आलोचनाएँ क्या हैं?
- न्यायिक विशेषज्ञता का अभाव: न्यायालय कभी-कभी ऐसे धर्मशास्त्रीय प्रश्नों में प्रवेश कर जाते हैं जिनमें विशेष धार्मिक-दार्शनिक विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है, फलस्वरूप निर्णय धार्मिक दृष्टि से विवादित हो सकते हैं।
- ERP परीक्षण में असंगति: विभिन्न पीठों द्वारा क्या ‘अनिवार्य’ है इस प्रश्न पर अलग-अलग निष्कर्ष दिये जाने से सैद्धांतिक अनिश्चितता उत्पन्न होती है और न्यायिक स्थिरता प्रभावित होती है।
- संप्रदायिक स्वायत्तता बनाम संवैधानिक नैतिकता का टकराव: अनुच्छेद 26 के अंतर्गत प्रदत्त संप्रदायिक स्वायत्तता और समानता-गरिमा जैसे संवैधानिक मूल्यों के मध्य संतुलन स्थापित करने की प्रक्रिया को कभी-कभी ‘धर्मनिरपेक्ष अभिभावकवाद’ (Secular Paternalism) के रूप में देखा जाता है।
- क्रियान्वयन संबंधी बाधाएँ: प्रमुख निर्णयों (जैसे–सबरीमाला) के बाद स्थानीय प्रतिरोध, सामाजिक बहिष्कार और संस्थागत असहयोग के कारण न्यायिक आदेशों का प्रभावी पालन कठिन हो जाता है।
- कार्यपालिका के लिये धार्मिक सुधारों को लागू करना प्रायः कठिन हो जाता है, क्योंकि इससे गंभीर विधि-व्यवस्था की समस्याएँ उत्पन्न होने की आशंका रहती है। परिणामस्वरूप ऐसी स्थिति बनती है जहाँ न्यायालय निर्णय तो दे देता है, परंतु समाज उसे स्वीकार नहीं करता और कानून व्यवहार में ‘निष्प्रभावी’ (Dead Letter) बनकर रह जाता है।
- राजनीतीकरण का जोखिम: चर्चित धार्मिक मामलों में दिये गए न्यायिक निर्णयों का प्रायः राजनीतीकरण हो जाता है, जहाँ विभिन्न पक्ष न्यायालय के निष्कर्षों का उपयोग जनसमर्थन जुटाने या सामाजिक विभाजनों को दृढ़ करने के लिये करते हैं।
- धार्मिक विवादों में न्यायपालिका की निरंतर संलग्नता कभी-कभी उसकी ‘पंथनिरपेक्ष निष्पक्षता’ की छवि को भी प्रभावित कर सकती है।
धार्मिक विवादों के प्रति न्यायिक दृष्टिकोण में कौन-से सुधार अपेक्षित हैं?
- सिद्धांताधारित दूरी: न्यायपालिका को ‘सिद्धांताधारित दूरी’ (Principled Distance) की नीति अपनानी चाहिये, अर्थात वह केवल उन्हीं स्थितियों में हस्तक्षेप करे जब कोई धार्मिक प्रथा मानव गरिमा और समता के मूल तत्त्वों का उल्लंघन करती हो।
- 21वें विधि आयोग (2018) ने ‘ऊपर से थोपे गए सुधार’ के बजाय ‘भीतर से सुधार’ पर बल दिया तथा व्यक्तिगत विधियों में संशोधन कर भेदभावपूर्ण प्रावधानों को समाप्त करने, लैंगिक पक्षपात को दूर करने और समानता सुनिश्चित करने की वकालत की।
- स्पष्ट और सुसंगत आवश्यक धार्मिक प्रथा (ERP) मानदंड अपनाए जाएँ तथा अनुष्ठानों के सूक्ष्म प्रबंधन के बजाय मूलभूत संवैधानिक सिद्धांतों पर ध्यान केंद्रित किया जाए।
- प्रशासनिक प्रशिक्षण: मंदिर प्रबंधन समितियों और सरकारी विभागों के सदस्यों को संवैधानिक साक्षरता में प्रशिक्षित किया जाना चाहिये, ताकि प्रशासनिक निर्णय अनुच्छेद 26 के तहत संरक्षित सांप्रदायिक स्वायत्तता का उल्लंघन न करें।
- सांप्रदायिक संवाद: प्रतिद्वंद्वी संप्रदायों (जैसे–काँचीपुरम में थेंकलाई और वाडाकलाई) के बीच नियमित संवाद को बढ़ावा देना, ताकि वह ध्रुवीकरण रोका जा सके, जो दशकों तक चलने वाले मुकदमों का कारण बनता है।
- संवैधानिक मानसिकता को बढ़ावा देना: शैक्षिक पाठ्यक्रम ऐसा नागरिक तैयार करें जो अपने अंतःकरण की स्वतंत्रता और कानून के शासन दोनों को महत्त्व दे और यह समझे कि धर्म और संविधान में संघर्ष नहीं, बल्कि परस्पर सम्मान का संबंध है।
निष्कर्ष
संविधान का “गर्भगृह” में प्रवेश धर्म के स्थानापन्न होने का संकेत नहीं, बल्कि उसका सुधार दर्शाता है। यह सुनिश्चित करके कि धार्मिक प्रथाएँ संविधान की नींव से जुड़ी रहें, न्यायपालिका धर्म की आध्यात्मिक सार्थकता की रक्षा करती है और उन तत्त्वों को समाप्त करती है जो मानव गरिमा को हानि पहुँचाते हैं।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. आवश्यक धार्मिक आचरण परीक्षण का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिये। क्या इसने भारत में संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता को मज़बूत किया है या कमज़ोर? |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. आवश्यक धार्मिक प्रथाएँ (ERP) परीक्षण क्या है?
यह एक न्यायिक सिद्धांत है, जिसका उपयोग यह निर्धारित करने के लिये किया जाता है कि कोई प्रथा धर्म का अभिन्न हिस्सा है या नहीं और इसलिये इसे अनुच्छेद 25 और 26 के तहत संरक्षण प्राप्त है।
2. भारत में धार्मिक स्वतंत्रता को कौन-से संवैधानिक प्रावधान नियंत्रित करते हैं?
अनुच्छेद 25 और 26 धार्मिक स्वतंत्रता और सांप्रदायिक अधिकारों की गारंटी देते हैं, हालाँकि ये सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य, नैतिकता और अन्य मौलिक अधिकारों के अधीन हैं।
3. सबरीमाला निर्णय (2018) का महत्त्व क्या था?
सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि सत्ता में धर्म की अनिवार्य प्रथाएँ भी संवैधानिक नैतिकता, विशेष रूप से समानता और गरिमा, के ऊपर नहीं हो सकतीं।
4. मंदिर प्रशासन में HRCE कानूनों की भूमिका क्या है?
हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ संपत्ति (HRCE) कानून राज्य को मंदिर प्रशासन, वित्त तथा प्रबंधन की निगरानी करने में सक्षम बनाते हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)
मेन्स:
प्रश्न. धर्मनिरपेक्षतावाद की भारतीय संकल्पना धर्मनिरपेक्षतावाद के पाश्चात्य माडल से किन-किन बातों में भिन्न है? चर्चा कीजिये।


