सर्वम AI और भारत में सॉवरेन AI
प्रिलिम्स के लिये: कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सर्वम AI, सॉवरेन AI, इंडिया AI मिशन, लार्ज लैंग्वेज मॉडल
मेन्स के लिये: सॉवरेन AI और स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी, इंडियाAI मिशन और इंडिजिनस LLM डेवलपमेंट, AI गवर्नेंस
चर्चा में क्यों?
भारत की कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) महत्त्वाकांक्षाओं को बड़ी बढ़त देते हुए, बंगलुरु स्थित स्टार्टअप सर्वम AI के नवीनतम मॉडल—सर्वम विज़न और बुलबुल V3—ने कथित तौर पर भारत-विशिष्ट AI मानकों पर गूगल जेमिनी और OpenAI के चैटजीपीटी से बेहतर प्रदर्शन किया है। यह भारतीय आवश्यकताओं के अनुरूप सॉवरेन AI ईकोसिस्टम विकसित करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।
सारांश
- सर्वम् AI के मॉडल—सर्वम विज़न और बुलबुल V3—ने भारत-विशिष्ट मानकों पर वैश्विक मॉडलों से बेहतर प्रदर्शन किया है, जिससे इंडिया AI मिशन के तहत भारत की सॉवरेन AI महत्त्वाकांक्षाओं को मज़बूती मिली है।
- एक मज़बूत सॉवरेन AI ईकोसिस्टम के निर्माण के लिये डेटा संप्रभुता, सेमीकंडक्टर क्षमता, बहुभाषी समावेश, मितव्ययी नवाचार और AI शासन सुधारों पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है, ताकि वास्तविक तकनीकी आत्मनिर्भरता प्राप्त की जा सके।
सर्वम विज़न और बुलबुल V3 क्या है?
- सर्वम विज़न: यह 3 बिलियन पैरामीटर्स वाला एक विज़न-लैंग्वेज मॉडल है, जो कई प्रकार के विजुअल (दृश्य) कार्यों को करने में सक्षम है। इसमें इमेज कैप्शनिंग (चित्र का वर्णन), सीन टेक्स्ट रिकग्निशन (चित्र में लिखे टेक्स्ट की पहचान), चार्ट की व्याख्या और जटिल तालिकाओं (टेबल्स) का विश्लेषण शामिल है।
- यह भौतिक भारतीय अभिलेखों, जैसे– पांडुलिपियाँ, वित्तीय तालिकाएँ और ऐतिहासिक ग्रंथ को डिजिटाइज़ करने पर केंद्रित है।
- प्रमुख विशेषताएँ:
- जहाँ पारंपरिक ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकॉग्निशन (OCR) केवल टेक्स्ट को पढ़ता है, वहीं सर्वम् विज़न "ज्ञान निष्कर्षण" करने में सक्षम है।
- यह किसी दस्तावेज़ की संरचना को समझता है, जटिल तालिकाओं, चार्ट्स और पढ़ने के क्रम की व्याख्या करता है (जैसे– कैप्शन और हेडलाइन में अंतर पहचानना)।
- यह 22 आधिकारिक भारतीय भाषाओं को कवर करने वाले डेटासेट पर प्रशिक्षित है, जिससे यह मिश्रित लिपियों वाले दस्तावेज़ों (जैसे– हिंदी और अंग्रेज़ी में सरकारी फॉर्म) को सँभालने में सक्षम है।
- प्रदर्शन: olmOCR-Bench के तहत जो यह आकलन करता है कि AI कितनी सटीकता से PDF और जटिल दस्तावेज़ छवियों को व्यवस्थित टेक्स्ट में बदलता है, सर्वम विज़न ने 84.3% स्कोर प्राप्त किया। इस मामले में इसने गूगल जेमिनी 3 प्रो (Google Gemini 3 Pro) और डीपसीक OCR v2 को भी पीछे छोड़ दिया है।
- OmniDocBench v1.5 पर, जो विविध वास्तविक दुनिया के फॉर्मेट्स में दस्तावेज़ पार्सिंग का परीक्षण करता है, इसने 93.28% सटीकता हासिल की, जो जटिल लेआउट्स को सँभालने में इसकी मज़बूत क्षमता को दर्शाता है।
- बुलबुल V3: यह सर्वम् का उन्नत टेक्स्ट-टू-स्पीच (TTS) AI मॉडल है, जिसे भारत की विविध भाषायी परिस्थितियों के अनुसार प्राकृतिक और क्षेत्र-विशेष भाषण उत्पन्न करने के लिये डिज़ाइन किया गया है।
- यह 11 भारतीय भाषाओं में 35 से अधिक पेशेवर-स्तरीय आवाज़ों का समर्थन करता है और सभी 22 अनुसूचित भाषाओं तक विस्तार की योजना है।
- बुलबुल V3 प्राकृतिक भाषण के लिये प्रोसोडी (रोक, स्वर और ज़ोर) को कैप्चर करता है तथा भारतीय उच्चारण एवं भाषायी सूक्ष्मताओं के लिये अनुकूलित है।
- यह कोड-स्विचिंग, क्षेत्रीय विविधताओं, संक्षिप्त शब्दों और भावनात्मक स्वर को सँभालता है, जिससे यह भारत के बहुभाषी वातावरण के लिये अत्यंत उपयुक्त बन जाता है।
- यह 10,300 करोड़ रुपये के इंडिया AI मिशन के तहत भारत की सॉवरेन AI मॉडलों की व्यापक पहल का हिस्सा है।
नोट: भारत सरकार ने IndiaAI मिशन के तहत देश का पहला स्वदेशी लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLM) विकसित करने के लिये बेंगलुरु स्थित स्टार्टअप सर्वम को चुना है।
- सर्वम तीन प्रकार के मॉडल विकसित कर रहा है: सर्वम-लार्ज (उन्नत तर्क एवं विश्लेषण), सर्वम-स्माॅल (रियल-टाइम अनुप्रयोगों हेतु) और सर्वम-एज़ (डिवाइस पर प्रत्यक्ष उपयोग के लिये), ताकि 70-बिलियन पैरामीटर वाला AI मॉडल तैयार किया जा सके, जिसका उद्देश्य भारतीय भाषाओं में व्यापक स्तर पर कार्यान्वयन है।
- सर्वम ने बहुभाषी और एंटरप्राइज़ उपयोग के लिये अनुकूलित AI उपकरणों का एक सेट लॉन्च किया है:
- सर्वम संवाद: वार्त्तालापात्मक AI एजेंट जो एंटरप्राइज़ टूल्स के साथ इंटीग्रेट होकर प्राइवेट डेटा का उपयोग कर इनसाइट्स उत्पन्न करते हैं और कार्रवाई करते हैं।
- सर्वम ऑडियो: 3B भाषा मॉडल का ऑडियो विस्तार, जो अंग्रेज़ी और 22 भारतीय भाषाओं का समर्थन करता है।
- सर्वम डब: AI डबिंग मॉडल जिसमें ज़ीरो-शॉट वॉइस क्लोनिंग और क्रॉस-लिंग्वल स्पीच क्षमता है, जिससे बहुभाषी सामग्री निर्माण संभव होता है।
सॉवरेन AI क्या है?
- परिचय: सॉवरेन AI उस क्षमता को परिभाषित करता है जिसके तहत कोई राष्ट्र अपनी स्वयं की अवसंरचना, डेटा, कार्यबल और नियामक ढाँचे का उपयोग करके कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) प्रौद्योगिकियों का विकास, कार्यान्वयन और शासन कर सकता है, बजाय इसके कि वह विदेशी तकनीकी क्षेत्र की दिग्गज कंपनियों पर अत्यधिक निर्भर रहे।
- मुख्य दर्शन: इसका आधार ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) है, जो सुनिश्चित करता है कि किसी देश की महत्त्वपूर्ण डिजिटल अवसंरचना अन्य देशों के भू-राजनीतिक हितों या कॉर्पोरेट नीतियों के अधीन न हो।
- भारत के लिये महत्त्व:
- डेटा सुरक्षा: स्वदेशी मॉडल विकसित करने से संवेदनशील भारतीय डेटा (जैसे– आधार विवरण या वित्तीय रिकॉर्ड) को अमेरिका या चीन के सर्वरों तक भेजने की आवश्यकता नहीं रहती।
- सांस्कृतिक संदर्भ: वैश्विक मॉडल अक्सर ‘पश्चिमी मतिभ्रम’/Western Hallucinations से ग्रसित रहते हैं अर्थात उत्तर अमेरिकी संदर्भों के अनुसार प्रतिक्रिया देते हैं। सर्वम विज़न जैसे मॉडल भारतीय संदर्भ पर आधारित हैं, जिससे सांस्कृतिक पूर्वाग्रह कम होते हैं।
- संकुचित नवाचार (Frugal Innovation): सर्वम विज़न केवल 3 बिलियन पैरामीटर का उपयोग करके उच्च प्रदर्शन प्राप्त करता है, जबकि अन्य मॉडल, जैसे– Gemini ट्रिलियनों पैरामीटर पर आधारित हैं।
- किफायती और ऊर्जा-सक्षम: यह तकनीक किफायती और ऊर्जा-कुशल है, जो विकासशील अर्थव्यवस्था के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
- डिजिटल समावेशन: बुलबुल V3 जैसे उपकरण डिजिटल अंतराल को कम करने में सहायता करते हैं, जिससे अशिक्षित जनसंख्या अपनी स्थानीय भाषा में वॉइस के माध्यम से इंटरनेट से जुड़ सकती है।
भारत में सॉवरेन AI ईकोसिस्टम को विकसित करने में क्या-क्या चुनौतियाँ हैं?
- भाषायी बहिष्करण: इंटरनेट पर अंग्रेज़ी/लैटिन लिपियाँ प्रमुख हैं। भारत की 22 अनुसूचित भाषाओं और हज़ारों बोलियों के लिये उच्च-गुणवत्ता वाले टोकनाइज़्ड डेटासेट की कमी ‘टोकन असमानता’ उत्पन्न करती है, जिससे AI मॉडल स्थानीय भाषाओं के कार्यों में निम्नस्तरीय प्रदर्शन करते हैं।
- पक्षपात की पुनः पुष्टि: स्वदेशी मॉडल यदि असंगठित सामाजिक डेटा पर प्रशिक्षित किये जाएँ, तो वे अनजाने में जाति, लैंगिक या धार्मिक पूर्वाग्रहों को बढ़ा सकते हैं, जिससे कल्याण वितरण में एल्गोरिद्मिक भेदभाव उत्पन्न हो सकता है।
- जोखिम रहित पूंजीवाद: भारतीय वेंचर कैपिटल (VC) अक्सर अनुसंधान-गहन ‘डीप टेक’ की तुलना में ‘कंज़्यूमर टेक’ (क्विक कॉमर्स, फिनटेक) में सुरक्षित, कम-जोखिम वाले निवेश को प्राथमिकता देते हैं।
- सॉवरेन AI के लिये ‘धैर्यपूर्ण पूंजी’ (Patient Capital) की आवश्यकता होती है, जिसमें दीर्घ परिपक्वता अवधि हो, जो वर्तमान में दुर्लभ है।
- डेटा की गुणवत्ता और पहुँच: भारत विशाल डेटा उत्पन्न करता है, फिर भी इसका अधिकांश हिस्सा असंरचित है या सरकारी फाइलों में अलग-अलग रखा गया है। उच्च-गुणवत्ता वाले, मशीन-पठनीय डेटासेट तैयार करना अभी भी एक चुनौती है।
- ‘मोएट’ स्थिरता चुनौती: यदि वैश्विक तकनीकी दिग्गज (Google, Meta) अपने विशाल फाउंडेशनल मॉडल को विशेष रूप से उच्च-गुणवत्ता वाले भारतीय डेटासेट पर फाइन-ट्यून करने का निर्णय लेते हैं, तो प्रदर्शन में अंतर जल्दी से समाप्त हो सकता है, जिससे सर्वम का ‘मोएट’ प्रभावित हो जाएगा।
भारत की सॉवरेन AI ईकोसिस्टम को सशक्त बनाने हेतु किन उपायों की आवश्यकता है?
- AI को सेमीकंडक्टर मिशन से जोड़ना: भारत को केवल AI मॉडल (सॉफ्टवेयर) ही नहीं बनाना चाहिये बल्कि इसके लिये आवश्यक हार्डवेयर की सुरक्षा भी सुनिश्चित करनी चाहिये। इसके तहत, इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) को घरेलू स्तर पर AI-विशिष्ट चिप्स (ASIC/TPU) के निर्माण को प्राथमिकता प्रदान करने की आवश्यकता है।
- डिज़ाइन-प्रेरित विनिर्माण: स्वदेशी AI एक्सेलेरेटर (जैसे– IIT मद्रास द्वारा विकसित 'शक्ति' और 'वेगा' माइक्रोप्रोसेसर सीरीज़) के डिज़ाइन को प्रोत्साहित करना, ताकि NVIDIA/Intel पर निर्भरता कम हो और पूरी तरह से "आत्मनिर्भर" कंप्यूट स्टैक बनाया जा सके।
- ‘मितव्ययी AI' पर केंद्रित: पाश्चात्य देशों के विशाल मॉडलों का आँख मूँदकर अनुकरण करने के स्थान पर, भारत को स्माल लैंग्वेज मॉडल (SLM) पर ध्यान केंद्रित करना चाहिये, जो अत्यधिक दक्ष हों, कम ऊर्जा की खपत करते हों तथा उपभोक्ता उपकरणों (एज AI) पर संचालित होते हों।
- GPAI नेतृत्व: वैश्विक कृत्रिम बुद्धिमत्ता भागीदारी (GPAI) के प्रमुख अध्यक्ष के रूप में भारत अपनी स्थिति का उपयोग "वैश्विक दक्षिण" AI ढाँचे को बढ़ावा देने हेतु करे, जो केवल वाणिज्यिक लाभ के स्थान पर विकासात्मक लक्ष्यों (निर्धनता, रोग) को प्राथमिकता दे।
- डेटा रेजीडेंसी: डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 का कठोर प्रवर्तन वैश्विक दिग्गजों को डेटा को स्थानीय रूप से संसाधित करने हेतु बाध्य करेगा, जिससे घरेलू AI अवसंरचना प्रदाताओं के विकास को और प्रोत्साहन मिलेगा।
- पायलट परियोजनाओं पर आधारित: भारतीय AI स्टार्टअप्स के लिये एक प्रमुख बाधा "पायलट पर्गेटरी" है, जहाँ उद्यम अंतहीन परीक्षण (Endless Test) तो करते हैं, किंतु कार्यान्वयन नहीं करते। सरकार स्वयं अग्रणी भूमिका निभाते हुए रेलवे, रक्षा एवं डाक सेवाओं में सार्वजनिक खरीद हेतु (मेक इन इंडिया पहल के अंतर्गत) स्वदेशी AI समाधानों के उपयोग को अनिवार्य कर सकती है।
- AI सुरक्षा संस्थान: ब्रिटेन के AI सुरक्षा संस्थान के समान एक वैधानिक निकाय की स्थापना की जाए, जो सार्वजनिक सेवाओं में कार्यान्वयन से पूर्व "हाई-इंपैक्ट" मॉडलों की सुरक्षा एवं पूर्वाग्रह हेतु परीक्षण एवं प्रमाणन कर सके।
निष्कर्ष
सॉवरेन AI केवल एक तकनीकी उन्नयन नहीं, अपितु भारत के लिये एक सामरिक अनिवार्यता है, ताकि वह एक डेटा आपूर्तिकर्त्ता से स्वदेशी बुद्धिमत्ता के सृजनकर्त्ता के रूप में परिवर्तित हो सके। AI को डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना एवं मितव्ययी नवाचार में समाहित करके भारत 21वीं सदी में अपने एल्गोरिद्म एवं डेटा का स्वामित्व धारण करते हुए सच्ची आत्मनिर्भरता सुनिश्चित कर सकता है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. "सॉवरेन AI 21वीं सदी में राष्ट्रीय रक्षा का डिजिटल समकक्ष है।" स्वदेशी AI मॉडल में हाल के विकास को देखते हुए इस कथन पर चर्चा कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. सॉवरेन AI क्या है?
सॉवरेन AI से आशय किसी राष्ट्र की अपनी घरेलू अवसंरचना, डेटा, प्रतिभा एवं विधिक ढाँचों का उपयोग करते हुए AI को विकसित करने, कार्यान्वित करने तथा विनियमित करने की क्षमता से है, ताकि सामरिक स्वायत्तता सुनिश्चित की जा सके।
2. इंडियाAI मिशन क्या है?
10,300 करोड़ रुपये का इंडियाAI मिशन स्वदेशी AI क्षमताओं के निर्माण हेतु लक्षित है, जिसमें आधारभूत लार्ज लैंग्वेज मॉडल, AI कंप्यूट अवसंरचना तथा नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र का विकास सम्मिलित है।
3. सर्वम विज़न का क्या महत्त्व है?
सर्वम विज़न 22 भारतीय भाषाओं पर प्रशिक्षित एक 3 अरब-पैरामीटर विज़न-लैंग्वेज मॉडल है, जो दस्तावेज़ बुद्धिमत्ता में उत्कृष्ट है तथा भारत-विशिष्ट OCR बेंचमार्क्स पर वैश्विक मॉडलों से बेहतर प्रदर्शन करता है।
4. DPDP अधिनियम, 2023 सॉवरेन AI का कैसे समर्थन करता है?
डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 डेटा रेजीडेंसी एवं स्थानीय प्रसंस्करण आवश्यकताओं को सुदृढ़ करता है, जिससे डोमेस्टिक AI इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट को प्रोत्साहन मिलता है।
5. भारत के सॉवरेन AI इकोसिस्टम के निर्माण में प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?
चुनौतियों में भाषाई डेटा का अभाव, एल्गोरिदमिक पूर्वाग्रह, गहन तकनीकी क्षेत्र हेतु सीमित पेटेंट पूंजी, डेटा साइलो तथा विदेशी AI हार्डवेयर एवं आधारभूत मॉडलों पर निर्भरता सम्मिलित हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रारंभिक परीक्षा
प्रश्न. विकास की वर्तमान स्थिति में, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, निम्नलिखित में से किस कार्य को प्रभावी रूप से कर सकती है? (2020)
- औद्योगिक इकाइयों में विद्युत् की खपत कम करना
- सार्थक लघु कहानियों और गीतों की रचना
- रोगों का निदान
- टेक्स्ट से स्पीच में परिवर्तन
- विद्युत् ऊर्जा का बेतार संचरण
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये-
(a) केवल 1, 2, 3 और 5
(b) केवल 1, 3 और 4
(c) केवल 2, 4 और 5
(d) 1, 2, 3, 4 और 5
उत्तर: (b)
मुख्य परीक्षा:
प्रश्न. कृत्रिम बुद्धि (ए.आई.) की अवधारणा का परिचय दीजिये। ए.आई. क्लिनिकल निदान में कैसे मदद करता है? क्या आप स्वास्थ्य सेवा में ए.आई. के उपयोग में व्यक्ति की निजता को कोई खतरा महसूस करते हैं? (2023)
भारत-ग्रीस संबंध
प्रिलिम्स के लिये: सूचना संलयन केंद्र–हिंद महासागर क्षेत्र, अलेक्जेंडर, गंधार कला, भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारा
मेन्स के लिये: भारत–ग्रीस रणनीतिक साझेदारी और रक्षा कूटनीति, इंडो-पैसिफिक और भूमध्य सागर में समुद्री सुरक्षा, भारत की रक्षा औद्योगिक नीति और आत्मनिर्भर भारत
चर्चा में क्यों?
भारत के रक्षा मंत्री ने नई दिल्ली में ग्रीस के राष्ट्रीय रक्षा मंत्री के साथ द्विपक्षीय बातचीत की।
- इस बैठक के परिणामस्वरूप रक्षा उद्योग सहयोग को मज़बूत करने के लिये एक संयुक्त आशय घोषणा-पत्र (JDI) पर हस्ताक्षर हुए।
- यह कदम दोनों प्राचीन समुद्री राष्ट्रों के बीच बढ़ते रणनीतिक संगम को उजागर करता है और उनकी रणनीतिक साझेदारी को महत्त्वपूर्ण रूप से प्रोत्साहित करता है।
सारांश
- भारत एवं ग्रीस ने रक्षा उद्योग सहयोग पर एक संयुक्त इरादे की घोषणा पर हस्ताक्षर करके और वर्ष 2026 के लिये एक सैन्य सहयोग योजना का आदान-प्रदान करके अपनी रणनीतिक साझेदारी को मज़बूत किया, जो संरचित तथा दीर्घकालिक सहयोग की ओर एक महत्त्वपूर्ण बदलाव को दर्शाता है।
- यह साझेदारी IFC-IOR के माध्यम से समुद्री सुरक्षा सहयोग को मज़बूत करती है, भारत के आत्मनिर्भर भारत दृष्टिकोण का समर्थन करती है और IMEC ढाँचे के तहत ग्रीस को यूरोप के लिये एक महत्त्वपूर्ण प्रवेश द्वार के रूप में स्थापित करती है।
भारत–ग्रीस द्विपक्षीय वार्त्ता के प्रमुख बिंदु क्या हैं?
- संयुक्त आशय घोषणा-पत्र: भारत और ग्रीस ने द्विपक्षीय रक्षा उद्योग सहयोग को मज़बूत करने हेतु एक JDI पर हस्ताक्षर किये, जो दीर्घकालिक सहयोग के मार्गदर्शन के लिये संगठित पाँच-वर्षीय रोडमैप की नींव रखेगा।
- इसके साथ ही दोनों पक्षों ने वर्ष 2026 के लिये द्विपक्षीय सैन्य सहयोग योजना का आदान-प्रदान किया, जिसमें उनकी सशस्त्र सेनाओं के बीच नियोजित सैन्य सहभागिताओं का विवरण दिया गया है।
- यह सहयोग भारत की आत्मनिर्भर भारत पहल को ग्रीस के एजेंडा 2030 के तहत रक्षा सुधारों से जोड़ने का लक्ष्य रखता है, जिससे दोनों देशों की स्वदेशी रक्षा उद्योगों की क्षमता का विस्तार हो सके।
- अस्थायी व्यवस्थाओं के बजाय लगातार औद्योगिक सहयोग को औपचारिक रूप देने से यह कदम भारत की उस व्यापक रणनीति को दर्शाता है, जिसमें पारंपरिक आपूर्तिकर्त्ताओं से परे रक्षा साझेदारियों का विस्तार करना शामिल है।
- साथ में ये कदम स्पष्ट रूप से यह संकेत देते हैं कि संवाद-आधारित सहभागिता से संरचित और समयबद्ध सहयोग की ओर एक बदलाव हो रहा है।
- समुद्री सुरक्षा सहयोग: ग्रीस ने गुरुग्राम स्थित सूचना संलयन केंद्र–हिंद महासागर क्षेत्र (IFC-IOR) में एक ग्रीक अंतर्राष्ट्रीय संपर्क अधिकारी की तैनाती की घोषणा की।
- इस कदम का उद्देश्य समुद्री क्षेत्र जागरूकता (Maritime Domain Awareness - MDA) और सूचना साझा करने को बढ़ाना है, जो इंडो-पैसिफिक और भूमध्य सागर में दोनों देशों के साझा समुद्री हितों को दर्शाता है।
भारत-ग्रीस संबंध कैसे हैं?
- ऐतिहासिक संबंध: भारत-ग्रीस के संबंध लगभग 2,500 वर्ष पुराने हैं। मौर्य साम्राज्य और ग्रीस के बीच व्यापारिक संपर्क प्राचीन सिक्कों और ग्रंथों में परिलक्षित होते हैं।
- 326 ईसा पूर्व में सिकंदर उत्तर-पश्चिमी भारत में हाइफैसिस (व्यास नदी) तक पहुँचा और उसने पौरव राज्य के राजा पुरु (झेलम और चिनाब के बीच का क्षेत्र) तथा तक्षशिला पर शासन करने वाले राजा आंभी से युद्ध किया।
- मौर्य वंश सिकंदर के समकालीन था। चाणक्य के अर्थशास्त्र में चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में यूनानी (यवन) राजदूत मेगस्थनीज़ का उल्लेख मिलता है।
- इसके बाद गांधार कला शैली भारतीय और यूनानी सांस्कृतिक प्रभावों के सम्मिश्रण के रूप में विकसित हुई।
- रणनीतिक साझेदारी: द्विपक्षीय संबंधों को अगस्त 2023 में ‘रणनीतिक साझेदारी’ के स्तर तक उन्नत किया गया।
- राजनयिक समर्थन: ग्रीस ने कश्मीर मुद्दे पर भारत के रुख तथा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता के लिये भारत की दावेदारी का लगातार समर्थन किया है। इसके विपरीत, साइप्रस मुद्दे पर भारत ग्रीस के पक्ष का समर्थन करता है।
- भारत साइप्रस मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के प्रस्तावों और अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुरूप द्वि-क्षेत्रीय, द्वि-सामुदायिक संघीय व्यवस्था का समर्थन करता है।
सहयोग का महत्त्व
- यूरोप का प्रवेशद्वार: पूर्वी भूमध्यसागर में ग्रीस की रणनीतिक स्थिति भारत के लिये यूरोप तक पहुँच का एक महत्त्वपूर्ण प्रवेशद्वार (Gateway) प्रदान करती है।
- ग्रीस, जिसका विशाल व्यापारी नौवहन बेड़ा वैश्विक शिपिंग की कुल वहन क्षमता के लगभग 20% पर नियंत्रण रखता है, भारत को यूरोपीय संघ (EU) बाज़ार में प्रवेश के लिये एक महत्त्वपूर्ण लॉजिस्टिक साझेदार प्रदान करता है।
- यह प्रस्तावित भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) में एक महत्त्वपूर्ण केंद्र है, जहाँ पिराएस जैसे ग्रीक बंदरगाह भारतीय वस्तुओं के लिये संभावित प्रवेश बिंदु के रूप में कार्य कर सकते हैं।
- भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों का संतुलन: ग्रीस के साथ घनिष्ठ संबंध तुर्की-पाकिस्तान धुरी के मुकाबले भारत को एक रणनीतिक संतुलन प्रदान करते हैं।
- तुर्की का पाकिस्तान के साथ घनिष्ठ सैन्य सहयोग भारत की ग्रीस के साथ साझेदारी (जो तुर्की का पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी है) को भू-राजनीतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण बनाता है।
- इंडो-पैसिफिक और भूमध्यसागर का अभिसरण: दोनों देश समुद्री शक्तियाँ हैं और नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था तथा नौवहन की स्वतंत्रता का समर्थन करते हैं, जिससे हिंद-प्रशांत और भूमध्यसागर क्षेत्रों में उनके हितों का समन्वय होता है।
- इंडो-पैसिफिक महासागर पहल (IPOI) में ग्रीस की रुचि तथा भूमध्यसागर में भारत की नौसैनिक उपस्थिति (जैसे– INS तबर के अभ्यास) अरब सागर से लेकर एजियन सागर तक विस्तृत एक सुरक्षा निरंतरता क्षेत्र निर्मित करती है।
भारत-ग्रीस संबंधों में चुनौतियाँ क्या हैं?
- आर्थिक अपेक्षाकृत निम्नस्तरीय प्रदर्शन: संभावनाओं के बावजूद द्विपक्षीय व्यापार लगभग 2 अरब अमेरिकी डॉलर (2022-23) के स्तर पर है।
- यह जर्मनी, फ्राँस या इटली जैसे अन्य यूरोपीय देशों के साथ भारत के व्यापार की तुलना में काफी कम है।
- व्यापार मुख्यतः प्राथमिक उत्पादों (एल्यूमिनियम, खनिज ईंधन, कपास) पर केंद्रित है, न कि उच्च-मूल्य प्रौद्योगिकी या सेवाओं पर, जिससे आर्थिक विस्तार सीमित रहता है।
- संपर्क की कमी (Connectivity Deficit): प्रत्यक्ष नौवहन लाइनों के अभाव में ट्रांस-शिपमेंट करना पड़ता है, जिससे भारतीय निर्यातों को ग्रीक बंदरगाहों तक पहुँचने में समय और लागत दोनों बढ़ जाते हैं।
- ‘चीन फैक्टर’: IMEC के माध्यम से ग्रीस को भारत के लिये ‘यूरोप का प्रवेशद्वार’ के रूप में देखा जाता है।
- हालाँकि, ग्रीस का सबसे बड़ा बंदरगाह पिरियस (Piraeus) COSCO शिपिंग, जो एक चीनी सरकारी स्वामित्व वाली कंपनी है, के बहुमत स्वामित्व में है।
- भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी चीन के नियंत्रण वाले बंदरगाह पर भारत की रणनीतिक निर्भरता उसकी यूरोपीय आपूर्ति शृंखलाओं के लिये दीर्घकालिक सुरक्षा दुविधा उत्पन्न करती है।
- संस्थागत निष्क्रियता: रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक उन्नयन के बावजूद भारत-ग्रीस संबंधों में 2+2 संवाद तथा विदेश नीति समीक्षा जैसे नियमित उच्चस्तरीय तंत्रों का अभाव है।
- इससे निरंतरता, नीतिगत अनुवर्तन तथा दीर्घकालिक रणनीतिक समन्वय सीमित हो जाता है।
भारत-ग्रीस संबंधों को सुदृढ़ करने हेतु क्या कदम उठाए जा सकते हैं?
- IMEC का क्रियान्वयन: लाल सागर संकट के कारण पारंपरिक मार्गों के अस्थिर होने की स्थिति में, भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) को तीव्र गति से क्रियान्वित करना कनेक्टिविटी संबंधी चुनौतियों का समाधान करेगा जो ग्रीस को यूरोपीय संघ में भारतीय वस्तुओं के लिये प्रमुख प्रवेशद्वार का निर्माण करेगा।
- भारतीय और ग्रीक बंदरगाहों के बीच हरित हाइड्रोजन, अमोनिया बंकरिंग तथा डी-कार्बोनाइज़्ड शिपिंग पर केंद्रित एक हरित समुद्री गलियारा विकसित किया जाए।
- श्रम संबंधी लाभ: ग्रीस गंभीर जनसांख्यिकीय संकट और श्रम की कमी (कृषि, निर्माण, पर्यटन) का सामना कर रहा है, जबकि भारत के पास कुशल कार्यबल की प्रचुरता है।
- प्रवास एवं गतिशीलता साझेदारी समझौते (MMPA) के शीघ्र कार्यान्वयन से भारतीय श्रमिकों के वैध प्रवाह को प्रोत्साहन मिलेगा, अवैध प्रवासन पर अंकुश लगेगा तथा प्रेषण में वृद्धि होगी।
- रणनीतिक समूहों का गठन: भारत को भारत–ग्रीस–साइप्रस–इज़राइल (या फ्राँस) को सम्मिलित करते हुए एक लघुपक्षीय समूह को औपचारिक रूप देना चाहिये। यह संभावित “भूमध्यसागरीय क्वाड” ऊर्जा सुरक्षा और संयुक्त नौसैनिक गश्त पर केंद्रित होगा, जिससे भारत की सुरक्षा परिधि का प्रभावी विस्तार होगा।
- डिजिटल कनेक्टिविटी: ब्लू-रमन केबल सिस्टम (सबमरीन केबल) पर सहयोग करते हुए ग्रीस के माध्यम से भारत की डिजिटल अवसंरचना को यूरोप से जोड़ा जाए, जिससे स्वेज़ जलडमरूमध्य जैसे संवेदनशील अवरोध बिंदु को पार किया जा सके।
निष्कर्ष
भारत–ग्रीस संबंध ऐतिहासिक सद्भावना से आगे बढ़कर अब रक्षा, समुद्री सुरक्षा और कनेक्टिविटी पर आधारित एक संरचित और रणनीतिक साझेदारी में लगातार विकसित हो रहे हैं। यदि दोनों देश आर्थिक और तार्किक कमियों को दूर करते हुए साझा भू‑राजनीतिक हितों का लाभ उठाएँ, तो यह साझेदारी इंडो‑पैसिफिक को यूरोप से जोड़ने वाला एक महत्त्वपूर्ण सेतु बनकर उभर सकती है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. भारत–ग्रीस रक्षा सहयोग प्रतीकात्मक कूटनीति से संरचित रणनीतिक सहभागिता की ओर हुए परिवर्तन को प्रतिबिंबित करता है। चर्चा कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. भारत और ग्रीस के मध्य हस्ताक्षरित संयुक्त आशय घोषणा-पत्र (JDI) का क्या महत्त्व है?
यह रक्षा औद्योगिक सहयोग को संस्थागत स्वरूप प्रदान करता है तथा आत्मनिर्भर भारत और ग्रीस के एजेंडा 2030 के सुधारों के अनुरूप एक पाँच-वर्षीय रोडमैप तैयार करता है।
2. भारत–ग्रीस समुद्री सहयोग में IFC-IOR की क्या भूमिका है?
सूचना संलयन केंद्र–हिंद महासागर क्षेत्र (IFC-IOR) वास्तविक समय में सूचना साझाकरण और समन्वित समुद्री निगरानी के माध्यम से समुद्री क्षेत्र जागरूकता को बढ़ाता है।
3. IMEC भारत–ग्रीस संबंधों को कैसे सुदृढ़ करता है?
भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) ग्रीस को यूरोप के प्रवेशद्वार के रूप में स्थापित करता है, जहाँ पिरियस जैसे बंदरगाह यूरोपीय संघ के बाज़ार में भारतीय वस्तुओं के संभावित प्रवेश बिंदु बन सकते हैं।
4. भू-राजनीतिक दृष्टि से ग्रीस भारत के लिये रणनीतिक रूप से क्यों महत्त्वपूर्ण है?
ग्रीस तुर्किये–पाकिस्तान धुरी के प्रति संतुलन प्रदान करता है तथा पूर्वी भूमध्यसागर में भारत की उपस्थिति को सुदृढ़ करता है।
5. भारत–ग्रीस संबंधों में प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?
निम्न द्विपक्षीय व्यापार (लगभग 2 अरब अमेरिकी डॉलर), प्रत्यक्ष समुद्री कनेक्टिविटी का अभाव, यूरोपीय संघ के विनियामक प्रतिबंध तथा पिरियस बंदरगाह पर चीन का नियंत्रण—ये सभी गहन सहभागिता में बाधा उत्पन्न करते हैं।
पूंजीगत वस्तु क्षेत्र
प्रिलिम्स के लिये: पूंजीगत वस्तुएँ, सार्वजनिक पूंजीगत व्यय, औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP), उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन योजना (PLI), कस्टम ड्यूटी, लिथियम-आयन बैटरी
मेन्स के लिये: औद्योगिक वृद्धि में पूंजीगत वस्तुओं की भूमिका, अवसंरचना-प्रधान विकास, सार्वजनिक निवेश और निजी निवेश को आकर्षित करना, औद्योगिक नीति और ऊर्जा संक्रमण
चर्चा में क्यों?
केंद्रीय बजट 2026-27 में पूंजीगत वस्तु क्षेत्र को सशक्त करने हेतु उच्च सार्वजनिक पूंजीगत व्यय, लक्षित विनिर्माण योजनाएँ तथा कर और कस्टम ड्यूटी में प्रोत्साहन की घोषणा की गई।
सारांश
- केंद्रीय बजट 2026-27 पूंजीगत वस्तु क्षेत्र को अवसंरचना निर्माण और विनिर्माण वृद्धि का मुख्य प्रेरक मानता है।
- सार्वजनिक पूंजीगत व्यय ₹12.2 लाख करोड़ तक बढ़ाया गया है, जिससे निवेश-प्रधान आर्थिक विस्तार को प्रबलता प्राप्त होती है।
- नई विनिर्माण योजनाएँ और वित्तीय प्रोत्साहन घरेलू क्षमता निर्माण, आयात पर निर्भरता कम करने और दीर्घकालिक औद्योगिक प्रतिस्पर्द्धात्मकता को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से हैं।
केंद्रीय बजट 2026-27 में पूंजीगत वस्तु क्षेत्र सशक्त बनाने हेतु प्रमुख घोषणाएँ क्या हैं?
- सार्वजनिक पूंजीगत व्यय: केंद्रीय बजट 2026-27 में अवसंरचना-प्रधान विकास को तेज़ करने के लिये सार्वजनिक पूंजीगत व्यय ₹12.2 लाख करोड़ तक बढ़ाया गया है।
- सरकारी पूंजीगत व्यय FY 18 से FY 26 (बजट अनुमान) तक 4.2 गुना बढ़ा है, जो सार्वजनिक निवेश पर सतत नीति फोकस को दर्शाता है।
- उच्च सार्वजनिक पूंजीगत व्यय से निजी निवेश को आकर्षित करने और विभिन्न क्षेत्रों में उत्पादक क्षमता बढ़ने की आशा है।
- विनिर्माण क्षमता संवर्द्धन: बजट में उच्च-सटीक विनिर्माण को समर्थन देने के लिये केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उद्यमों (CPSE) द्वारा हाई-टेक टूल रूम स्थापित करने का प्रस्ताव है।
- ये सुविधाएँ डिजिटली सक्षम डिज़ाइन, परीक्षण और विनिर्माण सेवाएँ कम लागत पर प्रदान करेंगी।
- उन्नत निर्माण मशीनरी के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के लिये निर्माण और अवसंरचना उपकरण संवर्द्धन योजना (Scheme for Enhancement of Construction and Infrastructure Equipment) भी शुरू की गई है।
- कंटेनर विनिर्माण योजना: बजट में पाँच वर्षों में लागू होने वाली ₹10,000 करोड़ की कंटेनर विनिर्माण योजना की घोषणा की गई है।
- यह योजना भारत में वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी कंटेनर विनिर्माण पारिस्थितिक तंत्र विकसित करने का लक्ष्य रखती है।
- इससे लॉजिस्टिक्स अवसंरचना सुदृढ़ होगी और निर्यात वृद्धि को भी समर्थन मिलेगा।
- टोल विनिर्माण और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण को समर्थन: बजट में बंधित क्षेत्रों (Bonded Zones) में कार्यरत टोल निर्माताओं (Toll Manufacturers) को पूंजीगत वस्तुएँ और उपकरण आपूर्ति करने वाले गैर-निवासी संस्थाओं (Non-Resident Entities) को पाँच वर्षों तक आयकर छूट प्रदान की गई है।
- बंधित क्षेत्रों में इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण का समर्थन करने वाले विदेशी आपूर्तिकर्त्ताओं (Foreign Suppliers) को अतिरिक्त कर छूट भी दी गई है।
- इन उपायों का उद्देश्य पूंजी निवेश लागत को कम करना तथा वर्ष 2030–31 तक भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण को बढ़ावा देना है।
- ऊर्जा संक्रमण एवं महत्त्वपूर्ण खनिज: बजट ने बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों के लिये लिथियम-आयन सेल के विनिर्माण हेतु प्रयुक्त पूंजीगत वस्तुओं पर सीमा शुल्क छूट का विस्तार किया है।
- यह भारत में महत्त्वपूर्ण खनिजों के प्रसंस्करण के लिये आवश्यक पूंजीगत वस्तुओं पर भी सीमा शुल्क में छूट प्रदान करता है।
- ये उपाय घरेलू मूल्य शृंखलाओं को सुदृढ़ करने तथा ऊर्जा सुरक्षा एवं ऊर्जा संक्रमण लक्ष्यों का समर्थन करने के लिये अभिप्रेत हैं।
पूंजीगत वस्तुएँ/कैपिटल गुड्स
- पूंजीगत वस्तुओं में संयंत्र, मशीनरी एवं उपकरण शामिल होते हैं, जिनका उपयोग उत्पादन या सेवा प्रदायगी हेतु किया जाता है, जिसमें आधुनिकीकरण, प्रौद्योगिकी उन्नयन तथा क्षमता विस्तार सम्मिलित है।
- इनका उपयोग विनिर्माण, अवसंरचना, कृषि, खनन, संबद्ध गतिविधियों तथा सेवा क्षेत्र में किया जाता है।
पूंजीगत वस्तुओं का महत्त्व
- उच्च आर्थिक गुणक प्रभाव: सार्वजनिक पूंजीगत व्यय अर्थव्यवस्था में सशक्त प्रसार के प्रभाव को उत्पन्न करता है; विभिन्न अध्ययनों के अनुसार इसका गुणक प्रभाव लगभग 2.5 से 3.5 गुना तक अनुमानित है।
- विनिर्माण की आधारशिला: पूंजीगत वस्तुएँ ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, वस्त्र एवं भारी उद्योग जैसे क्षेत्रों के लिये मशीनरी का आधारभूत ढाँचा प्रदान करती हैं।
- प्रौद्योगिकी उन्नयन का उत्प्रेरक: यह क्षेत्र स्वचालन, रोबोटिक्स, कृत्रिम बुद्धिमत्ता एवं इंटरनेट ऑफ थिंग्स जैसी उन्नत प्रौद्योगिकियों के व्यापक औद्योगिक ईकोसिस्टम में प्रसार को सक्षम बनाता है।
- सामरिक भूमिका: पूंजीगत वस्तुएँ नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियों, इलेक्ट्रिक वेहिकल की बैटरियों तथा महत्त्वपूर्ण खनिज प्रसंस्करण के लिये अनिवार्य हैं।
- रोज़गार और स्किल डेवलपमेंट इंजन: पूंजीगत वस्तु विनिर्माण कौशल-प्रधान होता है, जो अभियांत्रिकी, निर्माण-कार्य तथा तकनीकी व्यवसायों में व्यापक रोज़गार सृजन करता है।
पूंजीगत वस्तु संबंधी पहलें
- मेक इन इंडिया: आयात निर्भरता कम करने एवं औद्योगिक आत्मनिर्भरता को सुदृढ़ करने हेतु पूंजीगत वस्तुओं के घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देना।
- राष्ट्रीय पूंजीगत वस्तु नीति, 2016: पूंजीगत वस्तुओं के उत्पादन, निर्यात एवं प्रौद्योगिकीय गहनता को बढ़ाने हेतु एक व्यापक रोडमैप प्रदान करना।
- पूंजीगत वस्तु योजना: चरण-I साझा सुविधाओं के माध्यम से कौशल अंतराल, प्रौद्योगिकी विकास तथा उद्योग-शिक्षा जगत के सहयोग पर केंद्रित।
- चरण-II में स्वदेशी प्रौद्योगिकी विकास, कौशल प्रशिक्षण, परीक्षण एवं उद्योग भागीदारी को बढ़ाते हुए चरण-I के दायरे का विस्तार किया गया है।
- उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाएँ: PLI योजनाएँ ऑटोमोबाइल, बैटरी एवं इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे प्रमुख क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर विनिर्माण को प्रोत्साहित करके उन्नत पूंजीगत वस्तुओं की मांग को बढ़ाती हैं।
पूंजीगत वस्तुओं के समक्ष क्या चुनौतियाँ हैं?
- विपरीत शुल्क संरचना: कच्चे माल पर तैयार पूंजीगत वस्तुओं की तुलना में उच्च आयात शुल्क घरेलू उत्पादन लागत को बढ़ा देता है, जिससे स्थानीय मूल्यवर्द्धन हतोत्साहित होता है तथा आयात स्वदेशी विनिर्माण की तुलना में अधिक प्रतिस्पर्द्धी बन जाता है।
- प्रौद्योगिकी अंतर और कम अनुसंधान एवं विकास (R&D) निवेश: सीमित घरेलू तकनीकी क्षमता तथा कम R&D व्यय उच्च-सटीक विनिर्माण को बाधित करते हैं, जिससे उन्नत घटकों पर आयात की निर्भरता बढ़ती है और मूल्य शृंखला में ऊपर बढ़ने में रोक लगती है।
- उच्च लॉजिस्टिक्स और अवसंरचना लागत: परिवहन और बंदरगाहों में बढ़ती रसद लागत और अक्षमताएँ डिलीवरी की समय-सीमा और परिचालन व्यय को बढ़ा देती हैं, जिससे वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता कम हो जाती है—विशेष रूप से भारी और बड़े आकार के पूंजीगत सामानों के लिये।
- खंडित उद्योग संरचना: सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) की प्रधानता बड़े पैमाने की अर्थव्यवस्था, किफायती वित्त तक पहुँच और वैश्विक बाज़ारों के लिये आवश्यक उन्नत परीक्षण प्रमाणन तथा प्रौद्योगिकी उन्नयन में निवेश करने की क्षमता को सीमित करती है।
- सरकारी पूंजीगत व्यय पर निर्भरता: इस क्षेत्र की वृद्धि सार्वजनिक पूंजीगत व्यय चक्रों से गहराई से जुड़ी हुई है, जो इसे राजकोषीय सख्ती के प्रति संवेदनशील बनाती है।
पूंजीगत वस्तु क्षेत्र को मज़बूत करने हेतु आवश्यक उपाय कौन-कौन से हैं?
- हाई-टेक टूल रूम और साझा अवसंरचना का विस्तार: सरकार को डिजिटल रूप से सक्षम 'हाई-टेक टूल रूम' और 'कॉमन इंजीनियरिंग फैसिलिटी सेंटर्स' को मज़बूत और विस्तारित करना चाहिये, ताकि MSMEs को उच्च-सटीकता वाली 'मदर मशीनरी' (प्रमुख मशीनरी) तक पहुँच प्राप्त हो सके। इससे विनिर्माण गुणवत्ता, सटीकता और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता में वृद्धि होगी।"
- उन्नत मशीनरी के स्वदेशी विनिर्माण को बढ़ावा: तकनीकी रूप से उन्नत अवसंरचना और निर्माण उपकरणों, जैसे– टनल-बोरिंग मशीन (TBM) और भारी औद्योगिक प्रणालियों के घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिये लक्षित योजनाओं की आवश्यकता है, जिससे आयात पर निर्भरता कम हो सके।
- पूंजी की लागत में कमी: निर्माताओं पर शुरुआती पूंजीगत बोझ को कम करने और उन्नत वैश्विक तकनीक के अधिग्रहण को सुविधाजनक बनाने के लिये वित्तीय प्रोत्साहन, कर छूट और ऋण तक आसान पहुँच प्रदान की जानी चाहिये।
- अनुसंधान एवं विकास और उद्योग-अकादमिक सहयोग को सुदृढ़ करना: आयात-विकल्प तकनीकों को विकसित करने, कौशल विकास को बढ़ावा देने तथा तकनीकी आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिये 'उत्कृष्टता केंद्रों' व नवाचार केंद्रों में अधिक निवेश आवश्यक है।
- सुदृढ़ रसद (लॉजिस्टिक्स) का विकास: रसद अवसंरचना में सुधार और घरेलू कंटेनर विनिर्माण को बढ़ावा देने से परिवहन लागत कम होगी, आपूर्ति शृंखला (सप्लाई चेन) का लचीलापन बढ़ेगा तथा इस क्षेत्र की समग्र लागत प्रतिस्पर्द्धात्मकता में सुधार होगा।
निष्कर्ष
केंद्रीय बजट 2026-27 निवेश-आधारित विकास रणनीति के एक प्रमुख स्तंभ के रूप में पूंजीगत वस्तु क्षेत्र को और सुदृढ़ करता है। निरंतर सार्वजनिक पूंजीगत व्यय, विनिर्माण प्रोत्साहन तथा ऊर्जा संक्रमण के लिये समर्थन इस क्षेत्र को दीर्घकालिक औद्योगिक और बुनियादी ढाँचा विकास को गति देने के लिये तैयार करते हैं।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न "पूंजीगत वस्तु क्षेत्र भारत में अवसंरचना निर्माण और निवेश-प्रेरित वृद्धि के लिये केंद्रीय है।" टिप्पणी कीजिये। |
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
मेन्स:
प्रश्न. पूंजी बजट तथा राजस्व बजट के मध्य अंतर स्पष्ट कीजिये। इन दोनों बजटों के संघटकों को समझाइये। (2021)
प्रश्न. उत्तर-उदारीकरण अवधि के दौरान, बजट निर्माण के संदर्भ में, लोक व्यय प्रबंधन भारत सरकार के समक्ष एक चुनौती है। इसको स्पष्ट कीजिये। (2019)


