बिहार ने सेमीकंडक्टर पॉलिसी 2026 जारी की | बिहार | 10 Mar 2026
चर्चा में क्यों?
बिहार सरकार ने अपनी व्यापक औद्योगिकीकरण रणनीति के तहत सेमीकंडक्टर नीति 2026 शुरू की है। बिहार मंत्रिमंडल द्वारा स्वीकृत इस नीति का उद्देश्य निवेश आकर्षित करना, रोज़गार के अवसरों का सृजन करना और सेमीकंडक्टर तथा इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण उद्योगों को बढ़ावा देकर बिहार को पूर्वी भारत के एक प्रमुख प्रौद्योगिकी केंद्र के रूप में स्थापित करना है।
मुख्य बिंदु:
- लक्ष्य और विज़न: यह नीति सेमीकंडक्टर उत्पादन और उससे संबंधित क्षेत्रों के लिये एक सहायक पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करके बिहार में औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने का प्रयास करती है। यह राज्य सरकार की ‘सात निश्चय-3: समृद्ध उद्योग, सशक्त बिहार’ की परिकल्पना के अनुरूप है।
- इस नीति के तहत परियोजना लागत के प्रत्येक ₹100 करोड़ पर ₹1 प्रति एकड़ की प्रतीकात्मक दर से भूमि आवंटन, स्टाम्प शुल्क, पंजीकरण शुल्क और भूमि रूपांतरण शुल्क में छूट तथा परियोजना लागत कम करने के लिये पूंजी अनुदान प्रदान किये जाएंगे।
- प्रभाव: बिहार लगभग ₹5,000 करोड़ से अधिक के निवेश के साथ तीन प्रमुख सेमीकंडक्टर इकाइयाँ स्थापित करने की योजना बना रहा है, जिनमें फैब्रिकेशन तथा असेंबली-टेस्टिंग-मार्किंग-पैकेजिंग (ATMP) सुविधाएँ शामिल होंगी।
- इस नीति के माध्यम से बिहार के सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में लगभग ₹25,000 करोड़ का निवेश आकर्षित होने का अनुमान है।
- रोज़गार सृजन: नीति के क्रियान्वयन से विनिर्माण और संबद्ध सेवाओं में 2 लाख से अधिक प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोज़गार सृजित होने की संभावना है। इससे कौशल विकास को बढ़ावा मिलेगा और युवाओं में बेरोज़गारी कम करने में सहायता मिलेगी।
- कार्यान्वयन और निगरानी: नीति के क्रियान्वयन की निगरानी के लिये बिहार सेमीकंडक्टर मिशन का गठन किया गया है, जिसकी उच्च स्तरीय निगरानी राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा की जाएगी।
- निवेशकों को आकर्षित करने के लिये सिंगल-विंडो क्लीयरेंस और सरल नियामक प्रक्रियाएँ लागू की जाएंगी।
- महत्त्व: यह नीति भारत के बढ़ते इलेक्ट्रॉनिक्स बाज़ार में बिहार को प्रतिस्पर्द्धी बनाने, तकनीकी क्षमताओं को मज़बूत करने और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के राष्ट्रीय लक्ष्य को समर्थन देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
कुनो से राजस्थान की ओर चीतों का अंतरराज्यीय पुनर्स्थापन | मध्य प्रदेश | 10 Mar 2026
चर्चा में क्यों?
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) ने कहा है कि कुनो राष्ट्रीय उद्यान (मध्य प्रदेश) से राजस्थान के बारां ज़िले तक दो चीतों का जाना उनके प्राकृतिक क्षेत्रीय व्यवहार को दर्शाता है और यह चीतों के लिये अंतरराज्यीय वन्यजीव गलियारा स्थापित करने के महत्त्व को रेखांकित करता है।
मुख्य बिंदु:
- आवागमन: KP-2 और KP-3 नामक दो चीतों को लगभग 60–70 किमी की दूरी तय करने के बाद कुनो राष्ट्रीय उद्यान से राजस्थान के बारां ज़िले के मंगरोल रेंज तथा बांझ अमली संरक्षण रिज़र्व तक जाते हुए ट्रैक किया गया।
- NTCA के अनुसार परिदृश्य की सीमाओं को पार करते हुए उनका यह फैलाव प्राकृतिक क्षेत्रीय व्यवहार को दर्शाता है, जिसकी अपेक्षा प्रोजेक्ट चीता कार्ययोजना के अंतर्गत की गई थी।
- निगरानी और समन्वय: दोनों चीतों की GPS और रेडियो कॉलर के माध्यम से 24×7 निगरानी की जा रही है। इसके लिये मध्य प्रदेश और राजस्थान की संयुक्त फील्ड टीमें निगरानी एवं समन्वय के लिये तैनात की गई हैं।
- अंतरराज्यीय गलियारा: यह आवागमन लगभग 17,000 वर्ग किमी क्षेत्र में प्रस्तावित कुनो–गांधी सागर अंतरराज्यीय वन्यजीव गलियारे की आवश्यकता को दर्शाता है, जो राजस्थान के 7 ज़िलों और मध्य प्रदेश के 8 ज़िलों में फैला होगा। इसका उद्देश्य चीतों की संख्या के बीच सुरक्षित आवागमन और आनुवंशिक आदान-प्रदान को सुगम बनाना है।
- प्रोजेक्ट चीता, भारत सरकार की पहल है, जिसके तहत 1952 से भारत में विलुप्त हो चुके चीतों को उपयुक्त आवासों में पुनः स्थापित किया जा रहा है। इसके अंतर्गत अफ्रीका से चीतों को लाकर कुनो राष्ट्रीय उद्यान में बसाया गया है, ताकि उनकी एक स्थायी संख्या विकसित की जा सके।
- मानव-वन्यजीव सुरक्षा: अंतरराज्यीय निगरानी से मानव-चीता संघर्ष को कम करने और चीतों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में सहायता मिलती है।
- पारिस्थितिक प्रभाव: यह शिकारी-शिकार संतुलन बनाए रखने में सहायता करता है और मध्य प्रदेश व राजस्थान में पारिस्थितिकी तंत्र के पुनर्स्थापन को मज़बूत करता है।
- साथ ही यह भारत के व्यापक वन्यजीव संरक्षण और पुनर्स्थापन प्रयासों के अंतर्गत योजनाबद्ध वन्यजीव गलियारों की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है।
SC को सार्वजनिक स्थानों से रोकने के सबसे अधिक मामले उत्तर प्रदेश में | उत्तर प्रदेश | 10 Mar 2026
चर्चा में क्यों?
NCRB की वर्ष 2023 की ‘क्राइम इन इंडिया’ रिपोर्ट के अनुसार, अनुसूचित जातियों को सार्वजनिक स्थानों तक पहुँच से वंचित करने के मामले में SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत 180 मामले दर्ज किये गए, जिनमें से 173 मामले (96% से अधिक) केवल उत्तर प्रदेश से सामने आए।
मुख्य बिंदु:
- SC भेदभाव की प्रवृत्ति: वर्ष 2017 से अनुसूचित जातियों को सार्वजनिक स्थानों जैसे सामुदायिक क्षेत्र, साझा भूमि और सामाजिक स्थलों तक पहुँच से वंचित करने के मामलों में वृद्धि हुई है। यह कानूनी सुरक्षा के बावजूद जारी सामाजिक बहिष्कार को दर्शाता है।
- ऐसी घटनाओं में उत्तर प्रदेश का हिस्सा सबसे अधिक है, जो राज्य में सार्वजनिक जीवन में जाति-आधारित बहिष्कार से जुड़ी गहरी चुनौतियों की ओर संकेत करता है।
- अन्य रिपोर्टों के अनुसार वर्ष 2021 से अत्याचार के विरुद्ध राष्ट्रीय हेल्पलाइन पर आने वाली शिकायतों में सार्वजनिक स्थानों तक पहुँच से वंचित करने, सामाजिक बहिष्कार और जाति-आधारित दुर्व्यवहार से संबंधित शिकायतों का बड़ा हिस्सा शामिल है, जिनमें सबसे अधिक कॉल उत्तर प्रदेश से प्राप्त हुई हैं।
- SC/ST अधिनियम: अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत SC समुदाय को सार्वजनिक स्थानों तक पहुँच से वंचित करना तथा अन्य भेदभावपूर्ण कृत्य प्रतिबंधित हैं और ऐसे अपराध दंडनीय हैं।
- संवैधानिक अधिकार: भारत का संविधान अनुच्छेद 14 और 15 के तहत विधि के समक्ष समानता की गारंटी देता है और जाति के आधार पर भेदभाव को, विशेषकर सार्वजनिक स्थानों में प्रतिबंधित करता है।
- सामाजिक बहिष्कार: कानूनी संरक्षण के बावजूद ऐतिहासिक जातिगत भेदभाव सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर बना हुआ है, जिसके कारण आज भी कई घटनाओं में SC समुदाय को सार्वजनिक सेवाओं तथा सामुदायिक सुविधाओं से वंचित होना पड़ता है।
- महत्त्व: यह स्थिति कानून के क्रियान्वयन में कमियों, क्षेत्रीय असमानताओं और SC समुदाय के अधिकारों की मज़बूत सुरक्षा की आवश्यकता को उजागर करती है।
हुरुन ग्लोबल रिच लिस्ट 2026 | राष्ट्रीय करेंट अफेयर्स | 10 Mar 2026
चर्चा में क्यों?
हुरुन रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा जारी हुरुन ग्लोबल रिच लिस्ट 2026 भारत में अरबपतियों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि को दर्शाती है।
मुख्य बिंदु:
- नए अरबपति: रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2025–26 में भारत में 57 नए अरबपति जुड़े, जिससे कुल संख्या बढ़कर 308 हो गई। इससे भारत वैश्विक स्तर पर धन सृजन के सबसे तेज़ी से बढ़ते केंद्रों में से एक बन गया है।
- भारत संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के बाद विश्व का तीसरा सबसे बड़ा अरबपति केंद्र बना हुआ है।
- कुल संपत्ति: भारतीय अरबपतियों की कुल संपत्ति में 10% की वृद्धि होकर लगभग ₹112.6 ट्रिलियन हो गई है।
- औसत संपत्ति: भारतीय अरबपतियों की औसत संपत्ति लगभग ₹36,570 करोड़ है, जो अब चीन के अरबपतियों की औसत संपत्ति से भी अधिक हो गई है।
- संपत्ति का वितरण: कुल अरबपतियों में से 199 व्यक्तियों की संपत्ति में वृद्धि हुई, जबकि 109 व्यक्तियों की संपत्ति में कमी आई या कोई बदलाव नहीं हुआ।
- मुंबई का प्रभुत्व: मुंबई, जिसे भारत की अरबपति राजधानी कहा जाता है, अब भी 95 अरबपतियों के साथ देश का प्रमुख अरबपति केंद्र बना हुआ है।
- भारत के अन्य प्रमुख अरबपति केंद्र हैं:
- नई दिल्ली
- बंगलूरू
- हैदराबाद
- विकास की गति: इस वर्ष मुंबई में 15 नए अरबपति जुड़े, जो वैश्विक वित्तीय केंद्रों, जैसे न्यूयॉर्क (14) और लंदन (9) से अधिक हैं।
- एशियाई रैंकिंग: हालाँकि मुंबई भारत में शीर्ष स्थान पर है, लेकिन उसने एशिया की अरबपति राजधानी का दर्जा शेन्ज़ेन को खो दिया है, जहाँ अब 132 अरबपति रहते हैं।
- शीर्ष भारतीय अरबपति (हुरुन ग्लोबल रिच लिस्ट 2026)
- मुकेश अंबानी
- रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के अध्यक्ष
- भारत के सबसे धनी व्यक्ति बने हुए हैं।
- गौतम अडानी
- अडानी समूह के संस्थापक
- वैश्विक स्तर पर प्रमुख धन सृजकों में शामिल।
- शिव नादर
- HCL टेक्नोलॉजीज़ के संस्थापक।
- साइरस पूनावाला
- सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के संस्थापक।
- राधाकिशन दमानी
- एवेन्यू सुपरमार्ट्स (डीमार्ट) के संस्थापक।
- आर्थिक परिवर्तन: वर्ष 2026 की सूची में शामिल 80% से अधिक भारतीय अरबपति एक दशक पहले इस सूची में नहीं थे, जो पारंपरिक पारिवारिक व्यवसायों से हटकर नए युग की उद्यमिता की ओर बदलाव को दर्शाता है।
- लैंगिक अंतर: भारत के अरबपतियों में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल 7% है, जो अत्यधिक उच्च संपत्ति वाले वर्ग में लैंगिक असमानता को दर्शाती है।
मोजतबा खामेनेई बने ईरान के नए सुप्रीम लीडर | राष्ट्रीय करेंट अफेयर्स | 10 Mar 2026
चर्चा में क्यों?
मोजतबा खामेनेई एक ईरानी धर्मगुरु हैं और इस्लामिक गणराज्य ईरान के तीसरे सुप्रीम लीडर हैं। उन्हें 8 मार्च, 2026 को इस पद पर नियुक्त किया गया। उन्होंने अपने पिता अली खामेनेई का स्थान लिया, जो वर्ष 1989 से देश पर शासन कर रहे थे।
मुख्य बिंदु:
- प्रारंभिक जीवन: मोजतबा खामेनेई का जन्म ईरान के मशहद शहर में हुआ था।
- उन्होंने शिया विद्वता के प्रमुख केंद्र कोम के धार्मिक शिक्षण संस्थानों (सेमिनरी) में इस्लामी धर्मशास्त्र का अध्ययन किया।
- ईरान–इराक युद्ध के दौरान उन्होंने कथित रूप से स्वयंसेवी बलों में सेवा दी।
- सैन्य संबंध: उन्होंने वर्ष 1987 में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) में शामिल होकर ईरान–इराक युद्ध के अंतिम वर्षों में सेवा की। उनके IRGC और खुफिया एजेंसियों के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ गहरे एवं दीर्घकालिक संबंध माने जाते हैं।
- राजनीतिक भूमिका: माना जाता है कि वर्ष 2005 और 2009 में कट्टरपंथी नेता महमूद अहमदीनेजाद के उभार के पीछे वे प्रमुख रणनीतिकार थे।
- विरोध का दमन: आलोचकों और सुधारवादी नेताओं ने लंबे समय से उन पर 2009 के ग्रीन मूवमेंट तथा बाद के सरकार-विरोधी प्रदर्शनों पर हुए हिंसक दमन की योजना बनाने का आरोप लगाया है।
- वंशानुगत उत्तराधिकार: उनका चयन ऐतिहासिक और विवादास्पद माना जा रहा है, क्योंकि वर्ष 1979 की ईरानी क्रांति ने वंशानुगत शासन को अस्वीकार किया था।
- इस प्रकार की ‘वंशवादी’ व्यवस्था की ओर यह बदलाव देश के भीतर असंतोष को और बढ़ा सकता है।
- कट्टर नीति की निरंतरता: विशेषज्ञों के अनुसार उनका नेतृत्व यह संकेत देता है कि ईरान अपनी टकरावपूर्ण नीतियों को जारी रख सकता है।
- उन्हें अपने पिता की तुलना में परमाणु हथियार विकसित करने के प्रति अधिक समर्थक माना जाता है।
- भूराजनैतिक तनाव: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उन्हें ‘कमज़ोर नेता’ बताते हुए इस चयन को ‘अस्वीकार्य’ कहा है, जबकि इज़राइल ने संकेत दिया है कि उनका उत्तराधिकारी अभी भी ‘निशाना बनाए जाने योग्य’ है।
- इसके विपरीत रूस और चीन ने ईरानी संविधान के आधार पर उनकी नियुक्ति का समर्थन व्यक्त किया है।
डेनमार्क ने HIV तथा सिफिलिस के माता से शिशु संचरण का उन्मूलन किया | राष्ट्रीय करेंट अफेयर्स | 10 Mar 2026
चर्चा में क्यों?
27 फरवरी, 2026 को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने डेनमार्क को यूरोपीय संघ का पहला देश प्रमाणित किया, जिसने HIV और सिफिलिस दोनों के माँ-से-शिशु में संचरण (EMTCT) को समाप्त कर दिया है।
मुख्य बिंदु:
- उपलब्धि: डेनमार्क ने वर्ष 2021 से 2024 के बीच EMTCT के लिये निर्धारित कड़े अंतर्राष्ट्रीय लक्ष्यों को पूरा किया, जिनमें शामिल हैं:
- संक्रमण दर: नवजात शिशुओं में नए संक्रमणों को प्रति 1,00,000 जीवित जन्मों पर 50 से कम रखना।
- जाँच और उपचार: यह सुनिश्चित करना कि कम से कम 95% गर्भवती महिलाओं की जाँच हो और उन्हें आवश्यक उपचार प्राप्त हो।
- सार्वभौमिक देखभाल: अपनी सार्वभौमिक स्वास्थ्य प्रणाली के माध्यम से मुफ्त या कम लागत पर प्रसवपूर्व जाँच और देखभाल उपलब्ध कराना।
- वैश्विक स्थिति: डेनमार्क अब बोत्सवाना, मलेशिया और क्यूबा सहित 20 से अधिक देशों तथा क्षेत्रों में शामिल हो गया है, जिन्हें WHO द्वारा इसी प्रकार की मान्यता प्राप्त है।
- ट्रिपल एलिमिनेशन लक्ष्य: अब डेनमार्क अपने प्रमाणित संक्रमण-मुक्त सूची में हेपेटाइटिस B को जोड़कर ‘ट्रिपल एलिमिनेशन’ हासिल करने की दिशा में कार्य कर रहा है।
- जन स्वास्थ्य: यह उपलब्धि समन्वित मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं और मज़बूत डेटा निगरानी प्रणालियों की प्रभावशीलता को दर्शाती है।
- मानवाधिकार: यह सफलता ऐसे अधिकार-आधारित नीतियों पर आधारित है, जो किसी भी पृष्ठभूमि के बावजूद सभी के लिये स्वास्थ्य सेवाओं तक समान पहुँच सुनिश्चित करती हैं।
- SDG लक्ष्य: यह उपलब्धि नवजात शिशुओं और बच्चों की निवारणीय मृत्यु को समाप्त करने, सतत विकास लक्ष्य 3 (अच्छा स्वास्थ्य और कल्याण) की प्राप्ति में प्रत्यक्ष रूप से सहायक है।
भारतीय सेना ने लखनऊ में रणनीतिक संचार सम्मेलन का आयोजन किया | उत्तर प्रदेश | 10 Mar 2026
चर्चा में क्यों?
भारतीय सेना के सेंट्रल कमांड ने शनिवार, 7 मार्च, 2026 को लखनऊ में अपने पहले रणनीतिक संचार सम्मेलन का आयोजन किया।
मुख्य बिंदु:
- स्थान: यह एक दिवसीय कार्यक्रम लखनऊ कैंटोनमेंट के सूर्य ऑडिटोरियम में आयोजित किया गया, जिसमें लगभग 500 प्रतिभागियों ने भाग लिया। इनमें वरिष्ठ सैन्य अधिकारी, राजनयिक और मीडिया पेशेवर शामिल थे।
- थीम: सम्मेलन में “उभरते संचार क्षेत्र में भविष्य की तैयारियों के लिये एक क्षमता के तौर पर रणनीतिक संचार का संस्थागतकरण (Institutionalising Strategic Communication as a Capability for Future Preparedness in the Emerging Information Space)” थीम पर संस्थागत और राष्ट्रीय सुरक्षा के आयामों पर एक विशेषज्ञ नीति-स्तरीय सत्र आयोजित किया गया।
- इसके साथ ही “उभरते बहु-क्षेत्रीय अभियानों में रणनीतिक संचार: रणनीतियाँ, संरचनाएँ, प्रक्रियाएँ और तैयारी” विषयवस्तु पर एक विशेष संवादात्मक सत्र आयोजित किया गया, जिसमें नीति तथा संचालन संबंधी दृष्टिकोणों को एकीकृत किया गया।
- मुख्य उद्देश्य: भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा संरचना में रणनीतिक संचार को एक महत्त्वपूर्ण संस्थागत क्षमता के रूप में परखना और उसकी भूमिका का विश्लेषण करना।
- मुख्य संबोधन: सेंट्रल कमांड के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ लेफ्टिनेंट जनरल अनिंद्य सेनगुप्ता ने कहा कि अब युद्धक्षेत्र में सूचना और संज्ञानात्मक क्षेत्र भी शामिल हो गए हैं, जहाँ धारणा प्रबंधन अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि “धारणा वैधता को आकार देती है, वैधता प्रभाव को और प्रभाव परिणामों को निर्धारित करता है।”
- इस सत्र को भारत के संयुक्त राष्ट्र में पहली महिला स्थायी प्रतिनिधि राजदूत रुचिरा कंबोज (सेवानिवृत्त), राजदूत यशवर्धन सिन्हा (सेवानिवृत्त) और लेफ्टिनेंट जनरल राज शुक्ला (सेवानिवृत्त) ने भी संबोधित किया।
- रणनीतिक महत्त्व: सम्मेलन में नैरेटिव को हथियार और पारंपरिक युद्ध की सीमा से नीचे मौजूद संघर्षों के बढ़ते खतरे पर चर्चा की गई।
- भविष्य की तैयारी: विशेषज्ञों के अनुसार, रणनीतिक संचार को केवल प्रतिक्रियात्मक या तात्कालिक उपाय के रूप में नहीं, बल्कि सिद्धांत-आधारित और संस्थागत क्षमता के रूप में विकसित करना आवश्यक है, ताकि भविष्य की सैन्य तैयारी को और अधिक सुदृढ़ बनाया जा सके।