भारत के कृषि क्षेत्र का पुनर्निर्माण एवं विकासोन्मुख परिवर्तन | 04 Feb 2026
यह लेख 02/02/2026 को द हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित “Budget implications for the agriculture sector” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख भारत की सब्सिडी-आधारित कृषि व्यवस्था से आगे बढ़कर अवसंरचना, प्रौद्योगिकी तथा मूल्य-शृंखला उन्मुख विकास की दिशा में हो रहे परिवर्तन का विश्लेषण करता है तथा आय-स्थिर और सुदृढ़ कृषि क्षेत्र के निर्माण में निहित अवसरों एवं संरचनात्मक चुनौतियों दोनों पर प्रकाश डालता है।
प्रिलिम्स के लिये: ज़ीरो बजट प्राकृतिक कृषि (ZBNF), प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY), कृषि अवसंरचना कोष, न्यूनतम समर्थन मूल्य, एग्रीस्टैक।
मेन्स के लिये: कृषि क्षेत्र में विकास, कृषि क्षेत्र के प्रमुख मुद्दे, कृषि क्षेत्र को सुदृढ़ करने के लिये आवश्यक उपाय।
भारत की कृषि व्यवस्था सब्सिडी-आधारित तथा उत्पादन-केंद्रित मॉडल से धीरे-धीरे एक ऐसे ढाँचे की ओर संक्रमण कर रही है, जो अवसंरचना, लॉजिस्टिक्स और डिजिटल शासन द्वारा संचालित है। बजट 2026–27 में बंदरगाहों, भंडारण (वेयरहाउसिंग), AI आधारित परामर्श सेवाओं तथा निर्यात सुविधा को प्रदान किये गए लक्षित प्रोत्साहनों से कृषि मूल्य-सृजन एवं मूल्य-प्राप्ति की प्रक्रिया में गुणात्मक परिवर्तन परिलक्षित हो रहा है। यह नीतिगत परिवर्तन कृषि सहायता से बाज़ार सुदृढ़ीकरण की दिशा में उन्मुख है, जिसके परिणामस्वरूप आय स्थिरता, विविधीकरण और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता पर व्यापक प्रभाव पड़ रहा है। हालाँकि सिंचाई तथा कृषि अनुसंधान एवं विकास में अपेक्षाकृत सीमित निवेश, जलवायु अस्थिरता और संसाधन दबाव के वर्तमान परिदृश्य में कृषि की दीर्घकालिक सुदृढ़ता को लेकर चिंताएँ उत्पन्न करता है।
भारत के कृषि क्षेत्र को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक क्या हैं?
- उच्च मूल्य वाली बागान फसलों की ओर संक्रमण: खाद्य सुरक्षा हेतु आवश्यक फसलों से आगे बढ़कर, बजट 2026-27 में किसानों की आय संवर्द्धन तथा आयात निर्भरता में कमी लाने के उद्देश्य से उच्च-मूल्य ‘नकदी फसलों’ को प्रोत्साहित किया गया है।
- यह नीति विशेष रूप से तटीय एवं पहाड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर केंद्रित है, जिसका उद्देश्य मेवा तथा बागवानी फसलों की खेती को प्रोत्साहित करना है, ताकि वैश्विक बाज़ारों में उच्च-गुणवत्ता वाले उत्पादों में हिस्सेदारी बढ़ाई जा सके और कोको एवं काजू जैसे कच्चे माल के लिये आयात-प्रतिस्थापन विकसित की जा सके।
- उदाहरण के लिये, बजट में नारियल संवर्द्धन हेतु एक समर्पित योजना का प्रावधान किया गया है।
- पुराने एवं कम-उपज वाले बागानों के पुनरुद्धार तथा अखरोट, बादाम और चीड़ फलों की उच्च-घनत्व खेती के विस्तार के लिये, बजट में किसानों की आय वृद्धि तथा युवाओं की भागीदारी के माध्यम से मूल्यवर्द्धन सुनिश्चित करने हेतु एक समर्पित कार्यक्रम के समर्थन का प्रस्ताव रखा गया है।
- इसके अतिरिक्त, राष्ट्रीय फाइबर योजना के अंतर्गत रेशम, ऊन और जूट जैसे प्रमुख रेशों पर विशेष ध्यान दिया गया है, जिससे इन क्षेत्रों में कार्यरत किसानों को प्रत्यक्ष लाभ सुनिश्चित किया जा सके।
- यह नीति विशेष रूप से तटीय एवं पहाड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर केंद्रित है, जिसका उद्देश्य मेवा तथा बागवानी फसलों की खेती को प्रोत्साहित करना है, ताकि वैश्विक बाज़ारों में उच्च-गुणवत्ता वाले उत्पादों में हिस्सेदारी बढ़ाई जा सके और कोको एवं काजू जैसे कच्चे माल के लिये आयात-प्रतिस्थापन विकसित की जा सके।
- AI-एकीकृत डिजिटल विस्तार: भारत-विस्तार का शुभारंभ स्थिर डेटा संग्रह से सक्रिय, AI-संचालित परामर्श सेवाओं की ओर एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन का प्रतीक है। ICAR के वैज्ञानिक डेटा के साथ ‘एग्रीस्टैक’ (किसान रजिस्ट्री) को एकीकृत करके, यह बहुभाषी मंच प्रभावी कृषि को लोकतांत्रिक बनाने का लक्ष्य रखता है और प्रयोगशाला से खेत तक सूचना के विशाल अंतर को पाटने हेतु वास्तविक समय में स्थान-विशिष्ट सलाह प्रदान करता है।
- बजट 2026 में इस AI फ्रेमवर्क को क्रियान्वित करने के लिये भारत-विस्तार के लिये विशेष रूप से 150 करोड़ रुपये आवंटित किये हैं।
- संबद्ध क्षेत्रों की ओर संरचनात्मक संक्रमण: आर्थिक समीक्षा 2025-26 एक निर्णायक संरचनात्मक परिवर्तन को उजागर करता है जहाँ पशुपालन और मत्स्य पालन कृषि विकास के प्राथमिक इंजन बन रहे हैं, जो पारंपरिक फसल क्षेत्र को पीछे छोड़ रहे हैं।
- यह ‘स्वाभाविक रूप से होने वाला विविधीकरण’ मानसून की अस्थिरता के विरुद्ध एक महत्त्वपूर्ण बीमा के रूप में कार्य करता है, जिससे पारंपरिक फसल उत्पादन में गिरावट आने पर भी ग्रामीण आय स्थिर रहती है।
- उदाहरण के लिये, वित्त वर्ष 2015 से 2024 के बीच मौजूदा कीमतों पर पशुपालन में 12.77% का CAGR दर्ज किया गया, जिसमें सकल मूल्य में लगभग 195% की वृद्धि हुई।
- इसके अतिरिक्त, मत्स्य उत्पादन वित्त वर्ष 2013-14 में 95.79 लाख टन से बढ़कर वित्त वर्ष 2024-25 में 197.75 लाख टन हो गया है, जिससे ग्रामीण आय और रोज़गार विविधीकरण को प्रोत्साहन मिला है।
- यह ‘स्वाभाविक रूप से होने वाला विविधीकरण’ मानसून की अस्थिरता के विरुद्ध एक महत्त्वपूर्ण बीमा के रूप में कार्य करता है, जिससे पारंपरिक फसल उत्पादन में गिरावट आने पर भी ग्रामीण आय स्थिर रहती है।
- ब्लू इकोनॉमी का एकीकरण और मूल्य शृंखला का विस्तार: सरकार ‘ब्लू संवृद्धि’ को बढ़ावा देने के लिये अंतर्देशीय जल निकायों को औपचारिक मूल्य शृंखलाओं में एकीकृत करके मत्स्य पालन क्षेत्र का औद्योगीकरण कर रही है।
- अब ध्यान केवल मछली पकड़ने की मात्रा पर नहीं, बल्कि प्रसंस्करण और निर्यात प्रतिस्पर्द्धा पर केंद्रित है तथा मछली पकड़ने वाले जहाज़ों को विदेशी मुद्रा आय को अधिकतम करने के लिये प्रभावी रूप से ‘मोबाइल एक्सपोर्ट यूनिट्स’ के रूप में माना जा रहा है।
- उदाहरण के लिये, बजट 2026 में 500 जलाशयों और अमृत सरोवरों को मत्स्य पालन मूल्य शृंखला में एकीकृत करने का प्रस्ताव है। साथ ही इसमें समुद्री निर्यात को बढ़ावा देने के उद्देश्य से भारतीय जहाज़ों द्वारा अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ) में पकड़ी गई मछलियों को शुल्क-मुक्त घोषित किया गया है।
- अब ध्यान केवल मछली पकड़ने की मात्रा पर नहीं, बल्कि प्रसंस्करण और निर्यात प्रतिस्पर्द्धा पर केंद्रित है तथा मछली पकड़ने वाले जहाज़ों को विदेशी मुद्रा आय को अधिकतम करने के लिये प्रभावी रूप से ‘मोबाइल एक्सपोर्ट यूनिट्स’ के रूप में माना जा रहा है।
- संरक्षणवाद के बीच निर्यात में वृद्धि: वैश्विक व्यापार बाधाओं और टैरिफ युद्धों के बावजूद, भारतीय कृषि निर्यात ने उल्लेखनीय वृद्धि दिखाई है, जो गैर-पारंपरिक बाज़ारों तथा प्रसंस्कृत वस्तुओं की ओर अग्रसर है।
- इस रणनीति में अस्थिर थोक वस्तुओं (जैसे गेहूँ) से अलग होकर कॉफी और प्रसंस्कृत फलों जैसे उच्च मूल्य वाले, टैरिफ-प्रतिरोधी उत्पादों पर ध्यान केंद्रित करना शामिल है, जिससे व्यापार अधिशेष की निरंतरता सुनिश्चित हो सके।
- उदाहरण के लिये, वित्तीय वर्ष 2024-25 के दौरान, भारत का कॉफी निर्यात 1.80 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया, जो वित्तीय वर्ष 2023-24 में प्राप्त किये गए 1.28 बिलियन डॉलर की तुलना में 40.2% की वृद्धि दर्शाता है।
- इसके अतिरिक्त, भारत विश्व में बाजरा का सबसे बड़ा उत्पादक है, जिसकी वैश्विक उत्पादन में 38.4% हिस्सेदारी है (FAO, 2023)।
- इस रणनीति में अस्थिर थोक वस्तुओं (जैसे गेहूँ) से अलग होकर कॉफी और प्रसंस्कृत फलों जैसे उच्च मूल्य वाले, टैरिफ-प्रतिरोधी उत्पादों पर ध्यान केंद्रित करना शामिल है, जिससे व्यापार अधिशेष की निरंतरता सुनिश्चित हो सके।
- प्राकृतिक कृषि को संस्थागत रूप देना: प्राकृतिक कृषि को बढ़ावा देने का प्रयास अब एक पायलट परियोजना से आगे बढ़कर जन भागीदारी आंदोलन में परिवर्तित हो गया है, जिसका लक्ष्य उर्वरक सब्सिडी के बोझ को स्थायी रूप से कम करना और मृदा स्वास्थ्य को बहाल करना है।
- अब यह दृष्टिकोण क्लस्टर-आधारित और बाज़ार-आधारित है, जिसका उद्देश्य केवल संसाधन न्यूनीकरण आधारित रणनीति के बजाय रसायन-मुक्त उत्पादों के लिये एक विशिष्ट मूल्य शृंखला का निर्माण करना है।
- राष्ट्रीय प्राकृतिक कृषि मिशन को जैव-उपकरण संसाधन केंद्रों को सहायता प्रदान करने हेतु बजट 2026-27 में 750 करोड़ रुपये आवंटित किये गए हैं। इसका उद्देश्य बढ़ते जैविक निर्यात बाज़ार की मांग को पूरा करने के लिये 1 करोड़ किसानों को शामिल करना है।
- प्रभावी कृषि क्रांति में महिलाओं की भूमिका: नमो-दीदी योजना महिलाओं के बीच ग्रामीण तकनीकी कार्यबल का एक नया वर्ग सफलतापूर्वक तैयार कर रही है, जो श्रम की कमी और नैनो-उर्वरकों के प्रभावी अनुप्रयोग की आवश्यकता दोनों को पूरा कर रही है।
- यह एक सामाजिक बदलाव को दर्शाता है, जहाँ महिलाएँ केवल कृषि मज़दूर नहीं बल्कि संपत्ति की मालकिन और प्रौद्योगिकी प्रदाता भी बन रही हैं, जिससे ग्रामीण कृषि अर्थव्यवस्थाओं में शक्ति संतुलन बदल रहा है।
- 1,261 करोड़ रुपये के व्यय वाली इस योजना के तहत महिला स्वयं सहायता समूहों को 15,000 ड्रोन उपलब्ध कराए जा रहे हैं। ये ड्रोन 7–8 मिनट में 1 एकड़ क्षेत्र को कवर कर लेते हैं, जिससे स्वयं सहायता समूह किराये से आय अर्जित कर सकते हैं और प्रभावी छिड़काव के माध्यम से उर्वरक की खपत को कम किया जा सकता है।
- इसके अतिरिक्त, केंद्रीय बजट में स्वयं सहायता उद्यमियों को बढ़ावा देने के लिये 'SHE-मार्ट' का प्रस्ताव रखा गया है, जिसके तहत महिलाओं और स्वयं सहायता समूहों द्वारा निर्मित उत्पादों के विपणन के लिये प्रत्येक ज़िले में सामुदायिक स्वामित्व वाले खुदरा आउटलेट स्थापित किये जाएंगे, जिससे कृषि, पशुपालन और संबद्ध क्षेत्रों में महिलाओं को निर्वाह कार्य से उद्यमशीलता की ओर बढ़ने में सहायता मिलेगी।
- FPO के माध्यम से सामूहिकीकरण: छोटे किसानों का विखंडन तेज़ी से ‘10,000 FPO’ योजना के माध्यम से कम किया जा रहा है, जो सामूहिक सौदेबाज़ी के माध्यम से किसानों को ‘मूल्य स्वीकार करने वालों’ से ‘मूल्य निर्धारित करने वालों’ में परिवर्तित कर रही है।
- यह संस्थागत नवाचार अब परिपक्वता की ओर अग्रसर है, केवल पंजीकरण तक सीमित न रहकर वास्तविक व्यावसायिक एकीकरण की ओर बढ़ रहा है, जिससे प्रत्यक्ष बाज़ार संपर्क और कृषि स्तर पर मूल्यवर्द्धन की संभावनाएँ सशक्त हुई हैं।
- दिसंबर 2025 तक, 6,557 FPO को मैचिंग इक्विटी अनुदान के रूप में ₹430.77 करोड़ वितरित किये जा चुके हैं और 2,671 किसान उत्पादक संगठन (FPO) को ₹662.71 करोड़ मूल्य का क्रेडिट गारंटी कवर प्रदान किया गया है।
भारत के कृषि क्षेत्र से संबंधित प्रमुख मुद्दे क्या हैं?
- जलवायु बीमा की विषमता: एक गंभीर नीतिगत विरोधाभास यह है कि जहाँ चरम मौसम की घटनाओं की आवृत्ति राज्य के मुआवज़े की राजकोषीय क्षमता से कहीं अधिक है।
- जबकि ‘जलवायु संकट’ फसल चक्रों को बाधित करने वाली एक स्थायी विशेषता बन गई है, बीमा के लिये बजटीय आवंटन (PMFBY) में वास्तविक रूप से कमी देखी जा रही है, जिससे ‘मुआवज़े के बजाय ‘अनुकूलन’ पर निर्भरता बढ़ रही है, जो लघु कृषकों को तत्काल तरलता संकट के प्रति संवेदनशील बना देती है।
- उदाहरण के लिये वर्ष 2025 में भारत को 334 में से 331 दिनों तक अत्यधिक खराब मौसमीय घटनाओं का सामना करना पड़ा, जिससे 1,74,00,000 हेक्टेयर फसल क्षेत्र प्रभावित हुआ।
- फिर भी बजट 2026-27 में PMFBY के लिये ₹12,200 करोड़ आवंटित किये गए, जो संशोधित अनुमानों से कम है।
- प्रच्छन्न बेरोज़गारी और श्रम स्थिरीकरण: व्यापक अर्थव्यवस्था के संरचनात्मक परिवर्तन के बावजूद, कृषि क्षेत्र अभी भी कार्यबल का एक असमान हिस्सा अवशोषित करता है, जो ‘प्रच्छन्न बेरोज़गारी’ का संकेत देता है।
- विनिर्माण क्षेत्र द्वारा खेतों से श्रमिकों को आकर्षित करने में विफलता के कारण ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जहाँ कृषि उत्पादन में वृद्धि प्रति व्यक्ति कृषि आय में वृद्धि में परिवर्तित नहीं होती है, क्योंकि राजस्व का बड़ा हिस्सा बहुत से आश्रित लोगों के बीच बंट जाता है।
- आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) 2025 के अनुसार ग्रामीण कार्यबल का 57.7% अब भी कृषि में संलग्न है, जो पिछले वर्षों की तुलना में अधिक है और यह प्रभावी रूप से ग्रामीण मज़दूरी वृद्धि को दबाता है।
- NPK अनुपात में असंतुलन और मृदा अक्षमता: यूरिया पर अत्यधिक सब्सिडी के कारण पोषक तत्त्वों के अनुपात में विकृति उत्पन्न हो गई है, जिससे मृदा में गंभीर विषाक्तता तथा उपज वृद्धि में स्थिरता ('मृदा अक्षमता') आ गई है।
- किसान सस्ते नाइट्रोजन का अत्यधिक उपयोग करते हैं तथा फॉस्फोरस और पोटेशियम की उपेक्षा करते हैं, जिससे एक 'उपज अवरोध' उत्पन्न होता है, जहाँ अधिक उर्वरक लगाने से फसल का उत्पादन अनुपातहीन हो जाता है, जिससे अल्पकालिक लाभ के लिये दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है।
- उदाहरण के लिये, आर्थिक समीक्षा 2025-26 ने NPK खपत अनुपात को 10.9:4.1:1 के विषम अनुपात के रूप में चिह्नित किया (जबकि आदर्श अनुपात 4:2:1 है)।
- किसान सस्ते नाइट्रोजन का अत्यधिक उपयोग करते हैं तथा फॉस्फोरस और पोटेशियम की उपेक्षा करते हैं, जिससे एक 'उपज अवरोध' उत्पन्न होता है, जहाँ अधिक उर्वरक लगाने से फसल का उत्पादन अनुपातहीन हो जाता है, जिससे अल्पकालिक लाभ के लिये दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है।
- MSP-क्रय का असंतुलन: न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के लिये कानूनी गारंटी की मांग बाज़ार विफलता से उत्पन्न होती है, जहाँ खुले बाज़ार में फसल कटाई के समय कीमतें अक्सर उत्पादन लागत से नीचे गिर जाती हैं।
- वर्तमान क्रय संरचना मुख्यतः गेहूँ और चावल पर केंद्रित है तथा पंजाब तथा हरियाणा तक सीमित है, जिससे अन्य राज्यों के दाल, तिलहन एवं मोटे अनाज के किसान 'कागज़ी MSP' के बावजूद सुरक्षा जाल से बाहर रहते हैं।
- उदाहरण के लिये, जहाँ सरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 में 22 फसलों के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में वृद्धि की घोषणा की, वहीं तिलहन जैसी फसलों के लिये वास्तविक खरीद नगण्य रही।
- वर्तमान क्रय संरचना मुख्यतः गेहूँ और चावल पर केंद्रित है तथा पंजाब तथा हरियाणा तक सीमित है, जिससे अन्य राज्यों के दाल, तिलहन एवं मोटे अनाज के किसान 'कागज़ी MSP' के बावजूद सुरक्षा जाल से बाहर रहते हैं।
- भूमि का विखंडन और अक्षमता: पीढ़ियों से भूमि का निरंतर उपविभाजन औसत परिचालन जोत के आकार को इतना छोटा कर चुका है कि मशीनीकरण आर्थिक रूप से अव्यवहार्य हो गया है।
- यह भूमि विखंडन की अर्थव्यवस्थाओं को बाधित करता है, जिससे आधुनिक संसाधन (जैसे सिंचाई और फसल काटने की मशीनें) छोटे किसानों के लिये महॅंगे हो जाते हैं और वे कम संसाधन-कम उत्पादन संतुलन में फँस जाते हैं।
- वर्ष 2025 के अनुमान के अनुसार, औसत भूमि का आकार घटकर 1.08 हेक्टेयर हो गया है, जिसमें 86% लघु एवं सीमांत किसान हैं। इन छोटे भूखंडों पर कृषि मशीनरी का सीमित उपयोग उत्पादन लागत को बढ़ा रहा है।
- यह भूमि विखंडन की अर्थव्यवस्थाओं को बाधित करता है, जिससे आधुनिक संसाधन (जैसे सिंचाई और फसल काटने की मशीनें) छोटे किसानों के लिये महॅंगे हो जाते हैं और वे कम संसाधन-कम उत्पादन संतुलन में फँस जाते हैं।
- फसलोपरांत फर्स्ट-माइल में कमियाँ: कोल्ड चेन की क्षमता में सुधार के बावजूद, महत्त्वपूर्ण 'फर्स्ट-माइल' कनेक्टिविटी (फार्म गेट से एग्रीगेशन पॉइंट तक) अभी भी असंतोषजनक है।
- फसल कटाई के बाद होने वाली अधिकांश हानि कटाई के तुरंत बाद होती हैं, क्योंकि खेतों के पास पैकेजिंग हाउस और प्री-कूलिंग यूनिट की कमी होती है। इसका परिणाम यह होता है कि किसान संगठित बाज़ार में बेहतर कीमत पाने के बजाय स्थानीय व्यापारियों को 'मजबूरी में बिक्री' करने के लिये विवश होते हैं।
- उदाहरण के लिये, फसल कटाई के बाद होने वाली हानि के कारण भारत को वार्षिक लगभग ₹92,651 करोड़ की आर्थिक हानि उठानी पड़ती है (CIPHET)।
- फसल कटाई के बाद होने वाली अधिकांश हानि कटाई के तुरंत बाद होती हैं, क्योंकि खेतों के पास पैकेजिंग हाउस और प्री-कूलिंग यूनिट की कमी होती है। इसका परिणाम यह होता है कि किसान संगठित बाज़ार में बेहतर कीमत पाने के बजाय स्थानीय व्यापारियों को 'मजबूरी में बिक्री' करने के लिये विवश होते हैं।
- खाद्य तेल और दालों के आयात पर निर्भरता: आवश्यक प्रोटीन और वसा के लिये वैश्विक बाज़ारों पर भारत की निरंतर निर्भरता एक प्रमुख रणनीतिक कमज़ोरी है।
- 'मिशन मोड' के हस्तक्षेपों के बावजूद, तिलहन और दालों का घरेलू उत्पादन मानसून के साथ अत्यधिक घटता-बढ़ता रहता है, जिससे सरकार को मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिये शून्य-शुल्क आयात पर निर्भर रहना पड़ता है, जो विरोधाभासी रूप से घरेलू कीमतों को कम करता है और किसानों को उत्पादन बढ़ाने से हतोत्साहित करता है।
- उदाहरण के लिये, भारत ने अक्तूबर में समाप्त हुए 2024-25 विपणन वर्ष के दौरान घरेलू मांग को पूरा करने के लिये लगभग 1.61 लाख करोड़ रुपये में 16 मिलियन टन खाद्य तेल आयात किया, जिससे वैश्विक मूल्य अस्थिरता और विदेशी मुद्रा बहिर्वाह के प्रति संवेदनशीलता उजागर हुई।
- महाराष्ट्र में 2025-26 सीज़न के लिये तुअर (अरहर) के उत्पादन में अत्यधिक वर्षा, बाढ़ और जलभराव के कारण फसल को हुए गंभीर नुकसान के चलते 40% तक की गिरावट का अनुमान लगाया गया है, जिससे आपूर्ति की कमी को पूरा करने के लिये आयात में वृद्धि हो सकती है।
- 'मिशन मोड' के हस्तक्षेपों के बावजूद, तिलहन और दालों का घरेलू उत्पादन मानसून के साथ अत्यधिक घटता-बढ़ता रहता है, जिससे सरकार को मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिये शून्य-शुल्क आयात पर निर्भर रहना पड़ता है, जो विरोधाभासी रूप से घरेलू कीमतों को कम करता है और किसानों को उत्पादन बढ़ाने से हतोत्साहित करता है।
- भूजल की कमी और ऊर्जा-संबंध: प्रमुख कृषि प्रधान राज्यों में ट्यूबवेल के लिये मुफ्त बिजली नीति ने भूजल दोहन के लिये एक विकृत प्रोत्साहन उत्पन्न किया है, जिससे एक पारिस्थितिकी संकट उत्पन्न हो गया है।
- यह 'ऊर्जा-जल संबंध' अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में धान जैसी पानी की अधिक खपत करने वाली फसलों की खेती को प्रोत्साहित करता है, जिससे जल भंडार अपरिवर्तनीय दर से कम हो रहे हैं और प्रभावी रूप से शुष्क राज्यों से शेष विश्व में पानी का निर्यात हो रहा है।
- उदाहरण के लिये, गतिशील भूजल संसाधन आकलन 2025 के अनुसार 10.8% इकाइयाँ (6,762 में से 730) अति-शोषित हैं, जबकि कुल तनावग्रस्त इकाइयाँ (अति-शोषित, गंभीर और अर्द्ध-गंभीर) मिलकर लगभग 25% हैं।
- इसके अतिरिक्त, भारत की कुल बिजली खपत का लगभग एक चौथाई कृषि क्षेत्र में उपयोग होता है, जबकि देश की 70% बिजली कार्बन आधारित है (सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च)।
- यह 'ऊर्जा-जल संबंध' अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में धान जैसी पानी की अधिक खपत करने वाली फसलों की खेती को प्रोत्साहित करता है, जिससे जल भंडार अपरिवर्तनीय दर से कम हो रहे हैं और प्रभावी रूप से शुष्क राज्यों से शेष विश्व में पानी का निर्यात हो रहा है।
भारत के कृषि क्षेत्र को सुदृढ़ करने हेतु किन उपायों की आवश्यकता है?
- डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना का सार्वभौमीकरण: आधुनिकीकरण का प्राथमिक उपाय एग्रीस्टैक का राष्ट्रव्यापी विस्तार करना है, ताकि प्रत्येक किसान के लिये एक निर्बाध डिजिटल इकोसिस्टम बनाया जा सके।
- भूमि अभिलेखों, फसल सर्वेक्षणों और किसानों की विशिष्ट पहचान को एकीकृत करके, सरकार औपचारिक ऋण, फसल बीमा एवं अनुकूलित सलाहकार सेवाओं तक 'प्लग-एंड-प्ले' एक्सेस को सक्षम कर सकती है।
- यह डिजिटल ढाँचा मध्यवर्तियों की भूमिका को समाप्त करता है, ऋण प्रसंस्करण में लगने वाले समय को हफ्तों से घटाकर मिनटों तक कम करता है तथा सटीक लक्षित लाभ अंतरण की अनुमति देता है, जो लीकेज को रोकता है और यह सुनिश्चित करता है कि सहायता सीधे जुमीन जोतने वाले असली किसान तक पहुँचे।
- भारत-विस्तार के माध्यम से प्रभावी कृषि की ओर संक्रमण: सामान्य कृषि विस्तार से एक महत्त्वपूर्ण बदलाव की आवश्यकता है, जिसके लिये नव प्रस्तावित भारत-विस्तार जैसे प्लेटफॉर्मों के माध्यम से AI-संचालित सटीक परामर्श की आवश्यकता है।
- वास्तविक काल की उपग्रह छवियों और बहुभाषी AI का लाभ उठाकर, किसान मृदा-स्वास्थ्य, सिंचाई कार्यक्रम एवं स्थानीय कीटों की चेतावनी के बारे में खेत-विशिष्ट सिफारिशें प्राप्त कर सकते हैं।
- यह 'इंटेलिजेंस-एज़-ए-सर्विस' मॉडल छोटे किसानों को इनपुट के उपयोग को अनुकूलित करने में सहायता करता है, जिससे यूरिया और जल के अत्यधिक उपयोग को कम किया जा सकता है, इस प्रकार उत्पादन लागत कम होती है, साथ ही उपज की गुणवत्ता एवं पर्यावरणीय स्थिरता में वृद्धि होती है।
- बाज़ार-आधारित फसल विविधीकरण को प्रोत्साहन देना: पारिस्थितिक रूप से हानिकारक गेहूँ-चावल की एकल खेती के चक्र को तोड़ने के लिये, भारत को तिलहन, दालों और बागान फसलों (नारियल, काजू, कोको) जैसी उच्च मूल्य वाली एवं जलवायु-सहिष्णु फसलों के लिये उत्पादकता-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) लागू करना चाहिये।
- केवल MSP की घोषणा करने के बजाय, राज्य को क्षेत्रीय विशिष्ट फसल बोर्ड विकसित करने चाहिये, जो उच्च गुणवत्ता वाले जर्मप्लाज़्म से लेकर प्रसंस्करण उद्योगों के लिये गारंटीकृत खरीद तक, संपूर्ण सहायता प्रदान करें।
- इससे ध्यान 'मात्रा-केंद्रित' खेती से हटकर 'मूल्य-केंद्रित' उद्यमिता पर केंद्रित हो जाता है, जिससे घरेलू उत्पादन वैश्विक मांग के अनुरूप हो जाता है तथा खाद्य तेलों के भारी आयात बिल में कमी आती है।
- विकेंद्रीकृत फसल कटाई के बाद का अवसंरचना और 'फर्स्ट-माइल' कनेक्टिविटी: कृषि क्षेत्र को सुदृढ़ बनाने के लिये मूल्य-वर्द्धन की प्रक्रियाओं को खेत के निकट लाना आवश्यक है, जिसके लिये कृषि अवसंरचना कोष (AIF) से वित्तपोषित ग्राम-स्तरीय प्रसंस्करण केंद्र स्थापित किये जाने चाहिये।
- उपायों में 'फर्स्ट-माइल' लॉजिस्टिक्स को प्राथमिकता दी जानी चाहिये, जैसे कि सौर ऊर्जा से चलने वाले माइक्रो-कोल्ड रूम, पैक-हाउस और किसान उत्पादक संगठनों (FPO) या स्वयं सहायता समूहों द्वारा प्रबंधित ग्रेडिंग इकाइयाँ।
- बागवानी में फसल कटाई के बाद होने वाली बर्बादी को कम करके, किसान फसल कटाई के चरम समय में मजबूरी में बिक्री करने से बच सकते हैं तथा राष्ट्रीय एवं वैश्विक बाज़ारों में बेहतर कीमतों पर सौदा करने के लिये आवश्यक 'धारण शक्ति' प्राप्त कर सकते हैं।
- जलवायु-अनुकूल और प्राकृतिक कृषि पद्धतियों को मुख्यधारा में लाना: जलवायु अस्थिरता एक स्थायी जोखिम बनती जा रही है, इसलिये भारत को शून्य बजट प्राकृतिक कृषि (ZBNF) और उच्च घनत्व वाले बागवानी जैसे सतत कृषि पद्धतियों (SAP) को संस्थागत रूप देना चाहिये।
- इसमें रासायनिक इनपुट के वित्तीय और पारिस्थितिक बोझ को कम करने के लिये जैविक उर्वरक एवं कीटनाशक उपलब्ध कराने हेतु पंचायत स्तर पर जैव-इनपुट संसाधन केंद्रों का एक विकेंद्रीकृत नेटवर्क स्थापित करना शामिल है।
- ऐसे उपाय न केवल मृदा में मौजूद कार्बनिक कार्बन और भूजल स्तर का पुनः भरण करते हैं, बल्कि भारतीय उत्पादों को अंतर्राष्ट्रीय निर्यात बाज़ारों के तेज़ी से सख्त होते जा रहे 'हरित' मानकों को पूरा करने में भी सहायता करते हैं।
- संबद्ध क्षेत्र का व्यवसायीकरण: चूँकि संबद्ध क्षेत्र अब फसल खेती की तुलना में तेज़ी से बढ़ रहे हैं, इसलिये उन्हें समर्पित मूल्य शृंखलाओं और ऋण-लिंक्ड सब्सिडी के माध्यम से औद्योगिक पैमाने पर संस्थागतकरण की आवश्यकता है।
- इन उपायों में ‘पशुधन FPOs’ का गठन तथा आंतरिक जल निकायों (जैसे अमृत सरोवरों) को गहन मात्स्यिकी के लिये औपचारिक ‘ब्लू इकोनॉमी’ से जोड़ना शामिल होना चाहिये।
- उच्च गुणवत्ता वाले सीमेन बैंकों, मोबाइल पशु चिकित्सा क्लीनिकों और दुग्ध एवं मांस उत्पादों के लिये डिजिटल ट्रेसबिलिटी तक सार्वभौमिक अभिगम्यता सुनिश्चित करने से ये 'मानसून-प्रतिरोधी' क्षेत्र ग्रामीण आय स्थिरता तथा निर्यात वृद्धि के प्राथमिक चालक बन सकेंगे।
- जोखिम-गारंटी ढाँचों के माध्यम से कृषि ऋण में सुधार: निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिये, वित्तीय संरचना को साधारण ब्याज सब्सिडी से क्रेडिट-जोखिम गारंटी फंड में विकसित करना चाहिये।
- बैंकों को आंशिक गारंटी प्रदान करके, राज्य कृषि स्टार्टअप, जलवायु प्रौद्योगिकी और छोटे पैमाने के मशीनीकरण (ड्रोन/रोबोटिक्स) जैसे 'उच्च जोखिम वाले' क्षेत्रों में ऋण देने को प्रोत्साहित कर सकता है।
- इस क्षेत्र में जोखिम कम होने से वेंचर कैपिटल आकर्षित होता है तथा युवा 'कृषि उद्यमियों' को मूल्य शृंखला का आधुनिकीकरण करने के लिये प्रोत्साहित किया जाता है, जिससे कृषि एक निर्वाह गतिविधि से बदलकर तकनीकी रूप से परिष्कृत एवं लाभप्रद व्यावसायिक उद्यम बन जाती है।
निष्कर्ष:
भारत के कृषि भविष्य का आधार केवल सब्सिडी विस्तार में नहीं, बल्कि मूल्य-शृंखलाओं के सुदृढ़ीकरण, निर्णय-प्रक्रिया के डिजिटलीकरण तथा जल-गहन मुख्य फसलों से परे फसल विविधीकरण में निहित है। सटीक AI-आधारित परामर्श, फसल कटाई के बाद अवसंरचना और संबद्ध क्षेत्रों के औद्योगीकरण को समेकित कर, जलवायु तथा मूल्य संबंधी संकटों के विरुद्ध किसानों की आय स्थिरता सुनिश्चित की जा सकती है। तिलहन में आत्मनिर्भरता, निर्यात-प्रतिस्पर्द्धी कृषि प्रसंस्करण और भूजल-तटस्थ खेती के लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु मूल्य समर्थन से आगे बढ़कर उत्पादकता संवर्द्धन एवं बाज़ार सशक्तीकरण की दिशा में संक्रमण आवश्यक होगा। इस प्रकार जलवायु-अनुकूल, बाज़ार-संबद्ध और प्रौद्योगिकी-आधारित कृषि भारत के विकास, खाद्य सुरक्षा एवं ग्रामीण अनुकूलन-क्षमता के लिये केंद्रीय महत्त्व रखती है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न “भारत की कृषि व्यवस्था फसल-केंद्रित वृद्धि मॉडल से आगे बढ़कर अब संबद्ध क्षेत्रों तथा मूल्य-शृंखला आधारित विकास की ओर एक संरचनात्मक संक्रमण का अनुभव कर रही है।” समालोचनात्मक परीक्षण कीजिये कि यह परिवर्तन किस प्रकार जलवायु तथा बाज़ार संबंधी अनिश्चितताओं के बीच कृषक आय की स्थिरता को सुदृढ़ कर सकता है। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1. बजट 2026-27 के तहत भारत की कृषि नीति में प्रमुख परिवर्तन क्या है?
सब्सिडी और फसल-केंद्रित समर्थन से हटकर अवसंरचना आधारित, मूल्य-शृंखला उन्मुख और बाज़ार-प्रेरित कृषि की ओर संक्रमण।
प्रश्न 2. कृषि विकास में संबद्ध क्षेत्र इतने महत्त्वपूर्ण क्यों होते जा रहे हैं?
क्योंकि ये मानसून पर अपेक्षाकृत कम निर्भर होते हैं, तेज़ी से विकसित होते हैं तथा ग्रामीण आय और रोज़गार में विविधीकरण सुनिश्चित करते हैं।
प्रश्न 3. भारत-विस्तार क्या है?
यह कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित बहुभाषी डिजिटल परामर्श मंच है, जो एग्रीस्टैक और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद को एकीकृत कर प्रभावी कृषि को सक्षम बनाता है।
प्रश्न 4. भारतीय कृषि में फसल कटाई के बाद की प्रमुख चुनौती क्या है?
प्रथम चरण के अवसंरचना में कमियों के कारण प्रतिवर्ष 92,000 करोड़ रुपये से अधिक की क्षति होती है।
प्रश्न 5. खाद्य तेल का आयात रणनीतिक चिंता का विषय क्यों बना हुआ है?
क्योंकि मात्रा स्थिर रहने के बावजूद मूल्य अस्थिरता आयात बिल को बढ़ा देती है, जिससे किसानों की आय तथा विदेशी मुद्रा स्थिरता दोनों प्रभावित होती हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ)
प्रिलिम्स:
प्रश्न. जलवायु-अनुकूल कृषि (क्लाइमेट-स्मार्ट एग्रीकल्चर) के लिये भारत की तैयारी के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2021)
- भारत में 'जलवायु-स्मार्ट ग्राम (क्लाइमेट-स्मार्ट विलेज)' दृष्टिकोण, अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान कार्यक्रम-जलवायु परिवर्तन, कृषि एवं खाद्य सुरक्षा (सी.सी.ए.एफ.एस.) द्वारा संचालित परियोजना का एक भाग है।
- सी० सी० ए० एफ० एस० परियोजना, अंतर्राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान हेतु परामर्शदात्री समूह (सी० जी० आइ० ए० आर०) के अधीन संचालित किया जाता है, जिसका मुख्यालय फ्राँस में है।
- भारत में स्थित अंतर्राष्ट्रीय अर्द्धशुष्क उष्णकटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान (आई.सी.आर.आई.एस.ए.टी.), सी.जी.आई.ए.आर. के अनुसंधान केंद्रों में से एक है।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (d)
प्रश्न 2. निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिये: (2014)
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कार्यक्रम/परियोजना |
मंत्रालय |
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1. सूखा-प्रवण क्षेत्र कार्यक्रम |
कृषि मंत्रालय |
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2. मरुस्थल विकास कार्यक्रम |
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय |
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3. वर्षापूरित क्षेत्रों हेतु राष्ट्रीय जल संभरण विकास परियोजना |
ग्रामीण विकास मंत्रालय |
उपर्युक्त में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित है/हैं?
(A) केवल 1 और 2
(B) केवल 3
(C) 1, 2 और 3
(D) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर: D
प्रश्न 3. भारत में, निम्नलिखित में से किन्हें कृषि में सार्वजनिक निवेश माना जा सकता है। (2020)
- सभी फसलों के कृषि उत्पाद के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करना
- प्राथमिक कृषि साख समितियों का कंप्यूटरीकरण
- सामाजिक पूंजी विकास
- कृषकों को नि:शुल्क बिजली की आपूर्ति
- बैंकिंग प्रणाली द्वारा कृषि ऋण की माफी
- सरकारों द्वारा शीतागार सुविधाओं को स्थापित करना।
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1, 2 और 5
(b) केवल 1, 3, 4 और 5
(c) केवल 2, 3 और 6
(d) 1, 2, 3, 4, 5 और 6
उत्तर: (c)
मेन्स
प्रश्न 1. भारतीय कृषि की प्रकृति की अनिश्चितताओं पर निर्भरता के मद्देनज़र, फसल बीमा की आवश्यकता की विवेचना कीजिये और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पी.एम.एफ.बी.वाइ.) की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिये। (2016)
प्रश्न 2. भारत में स्वतंत्रता के बाद कृषि में आई विभिन्न प्रकारों की क्रांतियों को स्पष्ट कीजिये। इन क्रांतियों ने भारत में गरीबी उन्मूलन और खाद्य सुरक्षा में किस प्रकार सहायता प्रदान की है ? (2017)