प्रिलिम्स फैक्ट्स (28 Jan, 2026)



राष्ट्रीय मतदाता दिवस (NVD) 2026

स्रोत: पी. आई. बी.

भारत के राष्ट्रपति ने 25 जनवरी को मनाए गए राष्ट्रीय मतदाता दिवस (NVD) समारोह की अध्यक्षता की, जिसका उद्देश्य लोकतंत्र का उत्सव मनाना और निर्वाचन प्रक्रिया में नागरिकों की भागीदारी को प्रोत्साहित करना है।

  • राष्ट्रीय मतदाता दिवस (NVD), भारत का निर्वाचन आयोग (ECI) की स्थापना को चिह्नित करता है, जिसकी स्थापना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत 25 जनवरी, 1950 को की गई थी।

राष्ट्रीय मतदाता दिवस (NVD) 2026 के प्रमुख बिंदु क्या हैं?

  • थीम: राष्ट्रीय मतदाता दिवस 2026 की थीम “मेरा भारत, मेरा वोट” है, जिसका टैगलाइन “भारतीय लोकतंत्र के केंद्र में नागरिक” है।
    • यह मतदाता सुविधा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए नागरिक-केंद्रित निर्वाचन प्रक्रियाएँ विकसित करने की दिशा में भारत के निर्वाचन आयोग (ECI) के प्रयासों का प्रतीक है।
  • विशेषताएँ: यह लोकतंत्र में मतदाता भागीदारी के महत्त्व को रेखांकित करता है। भारत का निर्वाचन आयोग (ECI) के नेतृत्व में देशव्यापी समारोहों और जनसंपर्क गतिविधियों के माध्यम से, विशेष रूप से नए और युवा मतदाताओं पर ध्यान केंद्रित करते हुए, मतदाता पंजीकरण तथा जागरूकता को बढ़ावा देता है।
  • शुरू की गई पहलें:
    • 2026 के सर्वश्रेष्ठ निर्वाचन ज़िला पुरस्कार: राष्ट्रपति ने सर्वश्रेष्ठ निर्वाचन प्रथाएँ पुरस्कार प्रदान किये, जिनमें प्रौद्योगिकी के उपयोग, चुनाव प्रबंधन, मतदाता जागरूकता, आदर्श आचार संहिता के प्रवर्तन और प्रशिक्षण में उत्कृष्टता के लिये बिहार, केरल, तमिलनाडु, ओडिशा, गुजरात, मेघालय, मिज़ोरम, उत्तर प्रदेश, झारखंड और दिल्ली जैसे राज्यों को सम्मानित किया गया।
    • प्रकाशन: राष्ट्रीय मतदाता दिवस 2026 के अवसर पर “2025: ए ईयर ऑफ इनिशिएटिव्स एंड इनोवेशन्स” और “चुनाव का पर्व, बिहार का गर्व” नामक प्रकाशनों का विमोचन किया गया, जो निर्वाचन प्रबंधन में भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) के नेतृत्व को प्रदर्शित करते हैं।

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ECI द्वारा शुरू किये गए प्रमुख चुनावी सुधार क्या हैं?

  • मतदाताओं के लिये फोटो पहचान-पत्र (1993): भारत का निर्वाचन आयोग (ECI) ने मतदाताओं के प्रतिरूपण और फर्जी मतदान को रोकने के लिये मतदाता फोटो पहचान-पत्र (EPIC) योजना की शुरुआत की। प्रारंभ में यह एक भौतिक कार्ड के रूप में था, जिसे वर्ष 2004 में फोटो युक्त निर्वाचन नामावली (PER) को शामिल करते हुए और विकसित किया गया।
    • वर्ष 2021 में e-EPIC की शुरुआत की गई, जिससे मतदाता अपने पहचान-पत्र का सुरक्षित और गैर-संपादन योग्य डिजिटल संस्करण डाउनलोड कर सकते हैं, जिसे मोबाइल उपकरणों पर आसानी से ले जाना तथा उपयोग करना संभव हो गया।
  • इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें (EVMs) (1998): पहली बार वर्ष 1982 में केरल में प्रायोगिक रूप से उपयोग की गईं। इसके बाद वर्ष 1998 में मध्य प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली के राज्य विधानसभा चुनावों में इन्हें व्यापक स्तर पर औपचारिक रूप से लागू किया गया।
    • इससे अमान्य मतों (जो कागज़ी मतपत्रों में एक सामान्य समस्या थी) की समस्या समाप्त हुई, मतगणना में लगने वाला समय दिनों से घटकर घंटों में आ गया और कागज़ की बचत होने से यह प्रक्रिया पर्यावरण के अनुकूल भी सिद्ध हुई।
  • व्यवस्थित मतदाता शिक्षा और निर्वाचन सहभागिता (SVEEP) (2009): यह भारत का निर्वाचन आयोग (ECI) का प्रमुख कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य शहरी उदासीनता तथा युवाओं की कम भागीदारी जैसी चुनौतियों को दूर करते हुए “भागीदारी अंतर” को कम करना है।
    • यह कार्यक्रम लक्षित हस्तक्षेपों (जैसे- नुक्कड़ नाटक, सोशल मीडिया और कैंपस एंबेसडर) का उपयोग करता है, ताकि “कोई भी मतदाता पीछे न छूटे” सुनिश्चित किया जा सके।
  • मतदाता सत्यापन योग्य पेपर ऑडिट ट्रेल (VVPAT) (2013): वर्ष 2013 में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश (सुब्रमण्यम स्वामी बनाम भारतीय निर्वाचन आयोग) के बाद EVM में सत्यापन की एक अतिरिक्त परत जोड़ने के लिये VVPAT की शुरुआत की गई।
    • VVPAT मतदाताओं को उनके मत को एक काँच की खिड़की के माध्यम से सात सेकंड के लिये दिखाई देने वाले प्रिंटेड पर्चे के माध्यम से सत्यापित करने की अनुमति देता है।
  • राष्ट्रीय चुनावी रोल शुद्धिकरण और प्रमाणीकरण कार्यक्रम (NERPAP) (2015): इस कार्यक्रम ने चुनावी अधिकारियों को घर-घर जाकर सत्यापन अभियान करने की अनुमति दी।
    • इसका उद्देश्य EPIC डेटा को आधार से जोड़ना था ताकि विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में डुप्लीकेट या एकाधिक प्रविष्टियों की पहचान की जा सके और उन्हें हटाकर एक त्रुटिरहित और प्रमाणीकरण युक्त मतदाता सूची तैयार की जा सके।
  • ERO-NET (2018): यह चुनाव अधिकारियों के लिये एक डिजिटल फॉर्म-प्रोसेसिंग प्रणाली है, जो 14 भाषाओं और 11 लिपियों में उपलब्ध है। यह मतदाताओं को उनके आवेदन की स्थिति ट्रैक करने में मदद करती है तथा फॉर्म के रियल-टाइम प्रोसेसिंग की सुविधा देती है ताकि दोहरे पंजीकरण को रोका जा सके।
  • दिव्यांग व्यक्तियों के लिये सुलभ चुनाव (2018): भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने वर्ष 2018 को “सुलभ चुनाव वर्ष” घोषित किया।
    • दृष्टिबाधित मतदाताओं को ब्रेल-सक्षम मतदाता फोटो पहचान-पत्र (EPIC) उपलब्ध कराए गए, यात्रा दूरी घटाने हेतु सहायक मतदान केंद्र स्थापित किये गए तथा दिव्यांग मतदाताओं (PwDs) के लिये मतदान केंद्रों तक निशुल्क परिवहन सुविधा उपलब्ध कराई गई।
  • cVIGIL ऐप (2018): यह मोबाइल ऐप नागरिकों को “चुनाव पर्यवेक्षक” की भूमिका निभाने में सक्षम बनाता है।
    • नागरिक आचार संहिता उल्लंघन (जैसे घृणास्पद भाषण या रिश्वत वितरण) की फोटो या वीडियो अपलोड कर सकते हैं। यह ऐप जियो-टैगिंग तकनीक से घटना का स्थान स्वतः चिह्नित करता है।
    • निर्वाचन आयोग ने निर्देश दिया है कि प्राधिकरणों को cVIGIL शिकायतों की जाँच और कार्रवाई 100 मिनट के भीतर करनी होगी।
  • विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) (2025): यह एक व्यापक मतदाता सूची पुनरीक्षण अभियान है, जिसे निर्वाचन आयोग ने यह सुनिश्चित करने के लिये शुरू किया कि कोई पात्र नागरिक वंचित न रहे और कोई अपात्र व्यक्ति शामिल न हो।
    • SIR ने 12 राज्यों/केंद्र-शासित प्रदेशों में 51 करोड़ से अधिक मतदाताओं को कवर किया, जिसमें मृत मतदाताओं और दोहराव वाली प्रविष्टियों को हटाने पर विशेष ध्यान दिया गया।
  • ECINET (2026): यह निर्वाचन आयोग द्वारा शुरू किया गया एक उपयोगकर्त्ता-अनुकूल डिजिटल प्लेटफॉर्म है जो मतदाताओं, निर्वाचन अधिकारियों, राजनीतिक दलों और नागरिक समाज के लिये बनाया गया है। 40 से अधिक मौजूदा मोबाइल और वेब अनुप्रयोगों को इस प्लेटफॉर्म पर शामिल कर एक ही “वन-स्टॉप” इंटरफेस बनाया जाएगा।
  • अंतर्राष्ट्रीय सहयोग: भारत ने द्विपक्षीय सहयोग को मज़बूत करते हुए “इंडिया इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन डेमोक्रेसी एंड इलेक्शन मैनेजमेंट (IICDEM) 2026” का आयोजन नई दिल्ली में किया, जिसके परिणामस्वरूप “दिल्ली घोषणा 2026” अपनाई गई।
    • यह घोषणा पाँच स्तंभों को रेखांकित करती है - स्वच्छ मतदाता सूचियाँ, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव, अनुसंधान तथा प्रकाशन, प्रौद्योगिकी का उपयोग (भारत के ईसीआईनेट प्लेटफॉर्म को साझा करना सहित) एवं आईआईआईडीईएम के माध्यम से प्रशिक्षण व क्षमता निर्माण - ताकि वैश्विक चुनावी सत्यनिष्ठा और लोकतांत्रिक नवाचार को आगे बढ़ाया जा सके।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. राष्ट्रीय मतदाता दिवस क्या है और इसे क्यों मनाया जाता है?
राष्ट्रीय मतदाता दिवस प्रतिवर्ष 25 जनवरी को भारत निर्वाचन आयोग की स्थापना के उपलक्ष्य में और मतदाता जागरूकता, पंजीकरण तथा चुनावों में भागीदारी को बढ़ावा देने के लिये मनाया जाता है।

2. राष्ट्रीय मतदाता दिवस 2026 की थीम क्या है?
राष्ट्रीय मतदाता दिवस 2026 की थीम "मेरा भारत, मेरा वोट" है, जिसका टैगलाइन "नागरिक भारतीय लोकतंत्र के केंद्र में" था। इसके माध्यम से मतदाता-केंद्रित चुनावी सुधारों पर प्रकाश डाला गया।

3. ECINET क्या है और यह क्यों महत्त्वपूर्ण है?
ECINET एक एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म है जो 40 से अधिक ECI अनुप्रयोगों को एक इंटरफेस में समेकित करता है। यह सभी चुनावी हितधारकों के लिये पहुँच, पारदर्शिता और दक्षता में सुधार करता है।

4. cVIGIL चुनावी सत्यनिष्ठा को कैसे मज़बूत करता है?
cVIGIL ऐप नागरिकों को आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन की रिपोर्ट वास्तविक समय में करने में सक्षम बनाता है, जिसका अनुपालन 100 मिनट की अनिवार्य प्रतिक्रिया समय के साथ किया जाता है। यह प्रवर्तन और जवाबदेही को बढ़ाता है।

5. दिल्ली घोषणा 2026 का क्या महत्त्व है?
यह घोषणा IICDEM 2026 में अपनाई गई, जो स्वच्छ मतदाता सूची, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव, अनुसंधान, प्रौद्योगिकी उपयोग और क्षमता निर्माण – इन पाँच स्तंभों के माध्यम से वैश्विक लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को सुदृढ़ करने का रोडमैप प्रस्तुत करती है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न

प्रिलिम्स:

प्रश्न.1 निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2017)

  1. भारत का निर्वाचन आयोग पाँच-सदस्यीय निकाय है।
  2. केंद्रीय गृह मंत्रालय, आम चुनाव और उप-चुनाव दोनों के लिये चुनाव कार्यक्रम तय करता है।
  3. निर्वाचन आयोग मान्यता-प्राप्त राजनीतिक दलों के विभाजन/विलय से संबंधित विवादों को हल करता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा सही है/हैं?

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 2

(c) केवल 2 और 3

(d) केवल 3

उत्तर: (d)


मेंस:

प्रश्न 1 भारत में लोकतंत्र की गुणवत्ता बढ़ाने के लिये भारत निर्वाचन आयोग ने वर्ष 2016 में चुनावी सुधारों का प्रस्ताव दिया है। सुझाए गए सुधार क्या हैं और लोकतंत्र को सफल बनाने में वे किस सीमा तक महत्त्वपूर्ण हैं? (2017)


भारतीय माध्यस्थम परिषद

स्रोत: द हिंदू 

चर्चा में क्यों?

सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को उस याचिका पर अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है, जिसमें भारतीय माध्यस्थम परिषद (ACI) की स्थापना तथा माध्यस्थम संस्थानों और मध्यस्थों के विनियमन, आचरण एवं प्रत्यायन के लिये समान दिशा-निर्देश तय करने की मांग की गई है।

  • माध्यस्थम् और सुलह (संशोधन) अधिनियम, 2019 ने ACI को संस्थागत माध्यस्थम के लिये केंद्रीय नियामक के रूप में परिकल्पित किया था, किंतु लगभग छह वर्ष बीत जाने के बाद भी परिषद का गठन अब तक नहीं हो पाया है।

भारतीय माध्यस्थम परिषद (ACI) क्या है?

  • परिचय: यह माध्यस्थम और सुलह अधिनियम 1996 के भाग IA (धारा 43A–43M) के अंतर्गत स्थापित एक वैधानिक निकाय है, जिसे माध्यस्थम और सुलह (संशोधन) अधिनियम, 2019 द्वारा जोड़ा गया। यह न्यायमूर्ति बी.एन. श्रीकृष्ण समिति (2017) की सिफारिशों पर आधारित है।
  • संरचना एवं नियुक्ति:
    • अध्यक्ष: केंद्र सरकार द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श कर अध्यक्ष की नियुक्ति की जाती है। पात्र व्यक्तियों में सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश, उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश अथवा माध्यस्थम क्षेत्र के प्रतिष्ठित विशेषज्ञ शामिल हैं।
    • अन्य सदस्य: इनमें प्रतिष्ठित माध्यस्थम विशेषज्ञ, शिक्षाविद तथा पदेन (ex officio) सरकारी प्रतिनिधि शामिल होते हैं।
  • दायित्व एवं कार्य: यह संस्थागत माध्यस्थम के लिये केंद्रीय नियामक निकाय के रूप में कार्य करता है; माध्यस्थम संस्थानों का मूल्यांकन/श्रेणीकरण करता है; मध्यस्थों को मान्यता प्रदान करता है; माध्यस्थम पंचाट का अभिलेखागार बनाए रखता है; माध्यस्थम, सुलह आदि वैकल्पिक विवाद निवारण (ADR) प्रक्रियाओं को प्रोत्साहित करता है तथा समान एवं उच्च व्यावसायिक मानकों हेतु नीतियों का निर्माण करता है।
  • प्रमुख चिंताएँ:
    • सरकारी नियुक्तियों के वर्चस्व के कारण भारत की माध्यस्थम संस्थाओं की निष्पक्षता और दक्षता पर लगातार प्रश्नचिह्न बने हुए हैं। यह स्थिति विशेष रूप से तब गंभीर हो जाती है, जब स्वयं राज्य ही सबसे बड़ा वादकारी (litigant) हो।
    • नियामकीय चुनौतियाँ: असीमित संख्या में माध्यस्थम संस्थानों को प्रत्यायन देने की शक्ति से गुणवत्ता में कमी तथा प्रशासनिक बोझ बढ़ने की आशंका है। उदाहरण के तौर पर, भारत के विपरीत सिंगापुर और हॉन्गकॉन्ग में अनेक संस्थानों पर सरकारी नियामक के बजाय एक ही केंद्रीय माध्यस्थम संस्था पर निर्भरता है।
    • बहिष्करणकारी नीति: विदेशी विधि पेशेवरों को प्रत्यायन से बाहर रखने से वैश्विक मध्यस्थता केंद्र के रूप में भारत की आकर्षण क्षमता कम हो जाती है।
  • माध्यस्थम और सुलह (संशोधन) विधेयक, 2024 का प्रारूप: इसमें "माध्यस्थम संस्थान" की परिभाषा को संशोधित करके एक ऐसे निकाय या संगठन के रूप में परिभाषित किया गया है जो अपने स्वयं के प्रक्रियात्मक नियमों या पक्षकारों द्वारा सहमत नियमों के तहत माध्यस्थम का संचालन करता है। यह वर्ष 2019 के संशोधनों से अलग है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालयों द्वारा औपचारिक मान्यता अनिवार्य थी।
    • माध्यस्थम संस्थानों को माध्यस्थम पंचाटों की समय-सीमा बढ़ाने, माध्यस्थम पंचाट द्वारा किये गए विलंब की स्थिति में मध्यस्थ शुल्क को कम करने और प्रतिस्थापन मध्यस्थों की नियुक्ति करने का अधिकार प्राप्त होगा।
    • माध्यस्थम प्रक्रियाओं के दौरान अंतरिम राहत प्रदान करने की न्यायालय की शक्ति को सीमित कर दिया गया है और इसे आपातकालीन माध्यस्थम को हस्तांतरित कर दिया गया है।
    • वर्तमान व्यवस्था में, न्यायालय द्वारा पूर्व-माध्यस्थम अंतरिम राहत दिये जाने के 90 दिनों के भीतर माध्यस्थम की प्रक्रिया प्रारंभ करना अनिवार्य है। प्रस्तावित विधेयक में यह अवधि अंतरिम राहत हेतु आवेदन दायर किये जाने की तिथि से गिने जाने का प्रावधान किया गया है, ताकि लंबी न्यायिक प्रक्रिया से उत्पन्न होने वाले विलंब को रोका जा सके।
    • प्रस्तावित नई धारा 9-A के अंतर्गत, माध्यस्थम की कार्यवाही आरंभ हो जाने के बाद किंतु मध्यस्थ अधिकरण के गठन से पूर्व, पक्षकारों को आपातकालीन मध्यस्थ से अंतरिम संरक्षणात्मक उपाय प्राप्त करने की अनुमति दी जाएगी।

नोट: भारत का मध्यस्थता परिषद (ACI) भारतीय मध्यस्थता परिषद (ICA) से अलग है, जो वर्ष 1965 में स्थापित एक गैर-सरकारी मध्यस्थता संस्थान है।

मध्यस्थता

  • परिचय: एक निजी, स्वैच्छिक और बाध्यकारी विवाद निवारण तंत्र है जिसमें एक निष्पक्ष मध्यस्थ तीसरे पक्ष के रूप में कार्य करता है। यह पारंपरिक न्यायालयीन प्रक्रिया के बाहर वैकल्पिक विवाद निवारण (ADR) का रूप है।
  • कानूनी ढाँचा: इसे मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 द्वारा नियंत्रित किया जाता है, जो UNCITRAL मॉडल कानून (1985) तथा UNCITRAL सुलह नियम (1980) पर आधारित है।
  • उपयोग का क्षेत्र: यह मुख्य रूप से वाणिज्यिक, नागरिक और अंतर्राष्ट्रीय विवादों के लिये पारंपरिक न्यायालयीन मुकदमेबाज़ी का विकल्प प्रदान करता है।
  • हाल के विकास: डॉ. टी.के. विश्वनाथन समिति (2024) ने संस्थागत मध्यस्थता को सुदृढ़ करने, न्यायालय हस्तक्षेप को कम करने और अधिक किफायती एवं समयबद्ध ढाँचा तैयार करने के लिये सुधारों की सिफारिश की है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. भारत का मध्यस्थता परिषद (ACI) क्या है?
यह मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 (2019 के संशोधन के माध्यम से प्रस्तुत) के तहत एक प्रस्तावित वैधानिक नियामक निकाय है, जिसका उद्देश्य मध्यस्थता संस्थानों को ग्रेड देना और मध्यस्थों को मान्यता प्रदान करना है, ताकि संस्थागत मध्यस्थता को बढ़ावा दिया जा सके।

2. ACI प्रस्तावित करने का आधार क्या था?
यह 2017 में न्यायमूर्ति बी.एन. श्रीकृष्ण की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय समिति की सिफारिशों के आधार पर प्रस्तावित किया गया था, जिसका उद्देश्य भारत की मध्यस्थता व्यवस्था में सुधार और सुदृढ़ता लाना था।

3. मध्यस्थता विधेयक, 2024 के मसौदे में कौन-सा प्रमुख सुधार प्रस्तावित है?
इसमें न्यायिक हस्तक्षेप को सीमित करने का प्रस्ताव है, जिसमें अदालतें मुख्यतः मध्यस्थता से पहले या बाद में अंतरिम राहत प्रदान कर सकेंगी और इसमें आपातकालीन मध्यस्थ की भूमिका को प्रस्तुत किया गया है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs) 

प्रश्न 1. लोक अदालतों के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है? (2010)

(a) लोक अदालतों के पास पूर्व-मुकदमेबाज़ी के स्तर पर मामलों को निपटाने का अधिकार क्षेत्र है, न कि उन मामलों को जो किसी भी अदालत के समक्ष लंबित हैं।

(b) लोक अदालतें उन मामलों से निपट सकती हैं जो दीवानी हैं और फौजदारी प्रकृति के नहीं हैं।

(c) प्रत्येक लोक अदालत में या तो केवल सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी होते हैं और कोई अन्य व्यक्ति नहीं होता है।

(d) उपर्युक्त कथनों में से कोई भी सही नहीं है।

उत्तर: (d)


प्रश्न 2: लोक अदालतों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2009)

  1. लोक अदालत द्वारा किया गया अधिनिर्णय सिविल न्यायालय का आदेश (डिक्री) मान लिया जाता है और इसके विरुद्ध किसी भी न्यायालय में कोई अपील नहीं होती।
  2. विवाह-संबंधी/पारिवारिक विवाद लोक अदालत में सम्मलित नहीं होते हैं ।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो  1 और न ही  2

उत्तर: (a)


UK ने चागोस समझौते का समर्थन किया

स्रोत: BL

संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति की आलोचना के बावजूद, यूनाइटेड किंगडम (यूके) ने चागोस द्वीपसमूह को मॉरीशस को हस्तांतरित करने और रणनीतिक सैन्य अड्डा (डिएगो गार्सिया) लीज़ पर बनाए रखने के समझौते का समर्थन किया।

चागोस द्वीपसमूह

  • परिचय: यह हिंद महासागर में स्थित 58 द्वीपों का एक समूह है, जो मालदीव से लगभग 500 किमी. दक्षिण में स्थित है। डिएगो गार्सिया सबसे बड़ा द्वीप है और एक प्रवाल छल्लाकार द्वीप (कोरल एटॉल) है, जो भूमध्यरेखा से 7° दक्षिण में स्थित है।
  • औपनिवेशिक इतिहास: फ्राँस ने वर्ष 1715 में मॉरीशस और चागोस द्वीपसमूह पर कब्जा किया और वर्ष 1814 के पेरिस संधि के तहत फ्राँस ने दोनों को ब्रिटेन को सौंप दिया।
    • वर्ष 1965 में, ब्रिटेन ने चागोस को मॉरीशस से अलग करके ब्रिटिश इंडियन ओशन टेरीटरी (BIOT) का गठन किया और इस पृथक्करण के लिये मॉरीशस को 3 मिलियन पाउंड की अनुदान राशि दी।
  • डिएगो गार्सिया का महत्त्व: वर्ष 1966 के समझौते के तहत, ब्रिटेन ने अमेरिका को BIOT का सैन्य उपयोग करने की अनुमति दी और डिएगो गार्सिया (एक संयुक्त UK–US सैन्य आधार) वर्ष 1986 में पूरी तरह से परिचालन में आ गया। इसने गल्फ युद्ध, इराक और अफगानिस्तान युद्धों और 9/11 के बाद के अभियानों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो इसके हिंद-प्रशांत रणनीतिक महत्त्व को रेखांकित करता है।
  • अंतर्राष्ट्रीय कानूनी विकास: वर्ष 2019 में अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) ने एक सलाहकार राय जारी की, जिसमें कहा गया कि चागोस का ब्रिटेन द्वारा पृथक्करण अवैध था। इसके बाद वर्ष 2024 में ब्रिटेन ने मॉरीशस को संप्रभुता हस्तांतरित करने पर सहमति दी, जबकि डिएगो गार्सिया आधार पर नियंत्रण बनाए रखने के लिये 99 वर्ष के लीज़ समझौते को सुरक्षित रखा।

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और पढ़ें: चागोस द्वीपसमूह और डिएगो गार्सिया द्वीप


8वीं सदी के प्रारंभ का तेलुगू अभिलेख

स्रोत: द हिंदू 

आंध्र प्रदेश के पिटिकायगुल्ला गाँव में 8वीं शताब्दी के प्रारंभिक काल का एक दुर्लभ तेलुगू अभिलेख प्राप्त हुआ है, जो तेलुगू भाषा और लेखन परंपरा (एपिग्राफी) के आरंभिक विकास को समझने के लिये महत्त्वपूर्ण जानकारी प्रदान करता है।

  • प्रारंभिक तेलुगू लिपि और भाषा में लिखे इस अभिलेख के माध्यम से तेलुगू के प्राकृत प्रभाव से निकलकर एक स्वतंत्र प्रशासनिक तथा साहित्यिक भाषा के रूप में विकसित होने की प्रक्रिया को समझने में मदद मिलती है।
  • इस अभिलेख में “स्वस्तिस्री नंदेलु वारी, चेंसिनावंथु प्राणी, मिली अचारी” और “पदासीन नव कट्ट” जैसे शब्द अंकित हैं, जिन्हें अभिलेख विशेषज्ञ नवीन बांध (नव कट्ट) के निर्माण के लिये अभिलेख के रूप में व्याख्यायित करते हैं।
    • यह कार्य प्राणिमिल्ली अचारी नामक एक मूर्तिकार या कारीगर को समर्पित बताया गया है। माना जाता है कि यह अभिलेख उस समय के रेनाडु क्षेत्र से संबंधित है जो राजकीय प्रशासन के अधीन था, हालाँकि इसमें किसी भी शासक राजा का नाम दर्ज नहीं है।
  • तेलुगू भाषा: यह द्रविड़ भाषा परिवार की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओं में से एक है, जिसके 13 करोड़ से अधिक बोलने वाले आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, भारत के अन्य भागों और विदेशों में निवास करते हैं।
    • भाषावैज्ञानिक दृष्टि से माना जाता है कि प्रोटो-द्रविड़ियन लगभग 5000 वर्ष पूर्व विभिन्न उप-परिवारों में विभाजित हुआ और लगभग दसवीं शताब्दी ईसा पूर्व तक तेलुगू एक स्वतंत्र भाषा के रूप में उभरी।
      • जहाँ तेलुगू के तमिल और कन्नड़ से गहरे सांस्कृतिक संबंध हैं, वहीं भाषाई (आनुवांशिक) दृष्टि से यह केंद्रीय द्रविड़ भाषाओं के अधिक निकट मानी जाती है।
    • तेलुगू के सबसे प्राचीन ज्ञात अभिलेख लगभग 575 ईस्वी के माने जाते हैं, जो रेनाटी चोल वंश (इन्हें रेनाडू क्षेत्र के तेलुगू चोल भी कहा जाता है) से संबंधित हैं और आंध्र प्रदेश के कालमल्ला और एर्रागुडिपाडु में प्राप्त हुए हैं; ये तेलुगू भाषा के विकास में एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव माने जाते हैं।
    • तेलुगू के लिखित इतिहास की शुरुआत लगभग 200 ईसा पूर्व से मानी जाती है, जबकि इसकी प्राचीनता की जानकारी प्राकृत और संस्कृत अभिलेखों में मिलने वाले स्थानों और व्यक्तियों के तेलुगू नामों से मिलती है।
    • तेलुगू भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल है और भारत सरकार द्वारा वर्ष 2008 में इसे शास्त्रीय भाषा का दर्जा प्रदान किया गया।

और पढ़ें: सिंधु घाटी लिपि की समझ


लंबी दूरी की एंटी-शिप हाइपरसोनिक मिसाइल (LR-AShM)

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस 

77वीं गणतंत्र दिवस परेड में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने पहली बार लंबी दूरी की एंटी-शिप हाइपरसोनिक मिसाइल (Long Range Anti-Ship Hypersonic Missile- LR-AShM) का प्रदर्शन किया, जो भारत की मिसाइल क्षमताओं में एक महत्त्वपूर्ण मील का पत्थर सिद्ध होता है।

LR-AShM

  • परिचय: LR-AShM (लंबी दूरी की एंटी-शिप हाइपरसोनिक मिसाइल) एक हाइपरसोनिक ग्लाइड मिसाइल है जो अर्द्ध-बैलिस्टिक (Quasi-ballistic) पथ का पालन करती है, जिसमें बैलिस्टिक लॉन्च को कम ऊँचाई पर चलने वाली, दिशा-संवेदनशील उड़ान के साथ जोड़ा गया है।
  • गति और उड़ान प्रोफाइल: यह मिसाइल प्रारंभ में मैक 10 (Mach 10) की गति तक पहुँचती है और औसतन मैक 5 (Mach 5) की गति बनाए रखती है। यह कई वायुमंडलीय ‘स्किप’ प्रदर्शन करती है, जिससे इसकी दूरी और अप्रत्याशितता बढ़ती है।
  • दायरा और लक्ष्य: मिसाइल स्थिर तथा गतिशील, दोनों प्रकार के लक्ष्यों पर सटीक हमला करने में सक्षम है और इसकी प्रारंभिक सीमा लगभग 1,500 किमी. है, जबकि भविष्य में इसके संस्करण 3,500 किमी. तक की दूरी के लिये विकसित किये जाने की योजना है।
  • स्टील्थ और जीवित रहने की क्षमता: अत्यधिक गति और दिशा-संवेदनशीलता के साथ कम ऊँचाई पर उड़ान भरने के कारण, यह मिसाइल दुश्मन के ज़मीन और जहाज़ आधारित राडार द्वारा पहचान या रोकथाम को कठिन बना देती है।
  • प्रोपल्शन सिस्टम: मिसाइल दो-स्टेज सॉलिड रॉकेट मोटर का उपयोग करती है- स्टेज-1 बर्नआउट के बाद अलग हो जाता है, जबकि स्टेज-2 मिसाइल को अतिरिक्त गति देता है, जिसके बाद यह बिना शक्ति वाले हाइपरसोनिक ग्लाइड चरण में प्रवेश करती है।
  • वायुगतिकीय दक्षता: उच्च वायुगतिकीय दक्षता के कारण मिसाइल ड्रैग को कम करते हुए लिफ्ट और नियंत्रण बनाए रखती है, जिससे गति, दायरा एवं सटीकता अधिक होती है तथा ऊर्जा का उपयोग इष्टतम रहता है।
  • उद्देश्य और रणनीतिक भूमिका: यह भारतीय नौसेना की तटीय सुरक्षा आवश्यकताओं के लिये  डिज़ाइन की गई है और एक शक्तिशाली सी-डिनायल हथियार के रूप में कार्य करती है, जो सभी वर्ग के युद्धपोतों को निष्क्रिय करने में सक्षम है, विशेषकर रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण भारतीय महासागर क्षेत्र (IOR) में।
  • भविष्य का विकास और सेवा में समावेश: LR-AShM के संस्करण सेना, वायुसेना और जहाज़ से प्रक्षेपित नौसैनिक उपयोग के लिये विकसित किये जा रहे हैं। नवंबर 2024 में सफल परीक्षण के बाद, वारहेड और सेंसर एकीकरण चल रहा है और इसे अगले 2-3 वर्षों में सेवा में शामिल किये जाने की आशा है।

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SAMPANN-UMANG एकीकरण

स्रोत: पीआईबी 

SAMPANN (सिस्टम फॉर एकाउंटिंग एंड मैनेजमेंट ऑफ पेंशन) पेंशन प्रबंधन प्रणाली को UMANG (यूनिफायड मोबाइल एप्लिकेशन फॉरन्यू एज गवर्नेंस) प्लेटफॉर्म के साथ एकीकृत किया गया है, ताकि दूरसंचार पेंशनभोगियों को प्रमुख पेंशन सेवाओं तक डिजिटल पहुँच उपलब्ध कराई जा सके।

  • UMANG डिजिटल इंडिया पहल के अंतर्गत एक एकीकृत मंच के रूप में कार्य करता है, जो एंड्रॉयड, iOS और वेब के माध्यम से केंद्र, राज्य तथा स्थानीय सरकार की सेवाएँ प्रदान करता है।

SAMPANN

  • परिचय: SAMPANN, नियंत्रक महालेखा संचार लेखा कार्यालय द्वारा विकसित और संचालित एक प्रमुख डिजिटल पेंशन मंच है, जो पेंशन प्रशासन तथा वित्तीय प्रबंधन के लिये समर्पित है।
    • दिसंबर 2018 में राष्ट्रीय स्तर पर प्रारंभ किया गया SAMPANN, भौतिक उपस्थिति की आवश्यकता को समाप्त करते हुए प्रणाली-केंद्रित से पेंशनभोगी-केंद्रित शासन की ओर परिवर्तन को दर्शाता है।
  • प्रमुख विशेषता: यह मंच पेंशन के संपूर्ण जीवन-चक्र को डिजिटाइज़ करता है, जिसमें मामलों की प्रक्रिया, ई-पेंशन भुगतान आदेश (PPO) जारी करना, भुगतान वितरण, लेखांकन, शिकायत निवारण तथा रिपोर्टिंग शामिल हैं।
  • एकीकरण का उद्देश्य: इस पहल का लक्ष्य एकीकृत डिजिटल मंच के माध्यम से पेंशन से संबंधित जानकारी तक आसान पहुँच, पारदर्शिता तथा निर्बाध सेवा-प्रदान को सुदृढ़ करना है।
    • यह एकीकरण आवश्यक पेंशन जानकारी की चौबीसों घंटे उपलब्धता सुनिश्चित करता है, जिससे भौतिक कार्यालयों पर निर्भरता कम होती है।
  • सक्षम प्रमुख सेवाएँ: पेंशनभोगी अब UMANG मोबाइल ऐप या वेब पोर्टल के माध्यम से अपने पेंशन भुगतान आदेश (PPO) संख्या प्राप्त कर सकते हैं और जीवन प्रमाण-पत्र (LC) की वैधता की स्थिति जाँच सकते हैं।
  • डिजिलॉकर लिंकिंग: इस एकीकरण में डिजिलॉकर कनेक्टिविटी शामिल है, जो पेंशन रिकॉर्ड और आधिकारिक दस्तावेज़ों तक सुरक्षित डिजिटल पहुँच को सुदृढ़ करता है।

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भारतीय नौसेना का पहला प्रशिक्षण दस्ता थाईलैंड पहुँचा

स्रोत: पीआईबी

भारतीय नौसेना की प्रथम प्रशिक्षण स्क्वाड्रन (1TS) (जिसमें INS तीर, INS शार्दुल, INS सुजाता और ICGS सारथी शामिल हैं) फुकेट डीप सी पोर्ट पर पहुँचा, जो दक्षिण-पूर्व एशिया की प्रशिक्षण तैनाती को दर्शाती है और क्षेत्रीय सुरक्षा व स्थिरता के उद्देश्य से भारत-थाईलैंड के बीच बढ़ती समुद्री साझेदारी को रेखांकित करता है।

और पढ़ें: भारत-थाईलैंड संबंध