भारत के प्रौद्योगिकी-आधारित विकास की पुनर्समीक्षा | 18 Feb 2026

यह एडिटोरियल 10/02/2026 को द फाइनेंशियल एक्सप्रेस में प्रकाशित “Budget 2026: Decoding union govt’s ‘tech’ push” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख इस बात का विश्लेषण करता है कि भारत की प्रौद्योगिकी नीति प्रोत्साहन-आधारित असेंबली मॉडल से विकसित होकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, अंतरिक्ष, रक्षा और स्वच्छ ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में पारिस्थितिकी तंत्र-आधारित रणनीतिक क्षमता विनिर्माण की दिशा में किस प्रकार अग्रसर हुई है। यह उन संरचनात्मक बाधाओं पर भी प्रकाश डालता है जिन्हें भारत को प्रौद्योगिकी प्रगति को दीर्घकालिक आर्थिक और रणनीतिक शक्ति में परिवर्तित करने के लिये दूर करना आवश्यक है।

प्रिलिम्स के लिये: डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना 2.0, भारत सेमीकंडक्टर मिशन 2.0, DPDP अधिनियम 2023, विस्तारित निर्माता उत्तरदायित्व, राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन, भारत 6G गठबंधन

मेन्स के लिये: प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में वर्तमान घटनाक्रम, प्रमुख मुद्दे और आवश्यक उपाय।

केंद्रीय बजट 2026 भारत के प्रोत्साहन-आधारित इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबली से पारिस्थितिकी तंत्र-आधारित विनिर्माण की ओर संक्रमण का प्रतीक है। क्लाउड इन्फ्रास्ट्रक्चर, कंपोनेंट्स, लॉजिस्टिक्स और सेमीकंडक्टर्स को समाहित करते हुए इलेक्ट्रॉनिक्स को एक एकीकृत मूल्य शृंखला के रूप में परिकल्पित कर, यह बजट नीतिगत परिपक्वता और निरंतरता का संकेत देता है। यह बजट प्रौद्योगिकी-संचालित विकास की दिशा में भारत के व्यापक प्रयासों को दर्शाता है, जिसमें डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर, उन्नत विनिर्माण और नवोन्मेष को इसकी दीर्घकालिक विकास रणनीति के केंद्रीय स्तंभों के रूप में स्थापित किया गया है।

भारत प्रौद्योगिकी आधारित विकास की दिशा में किस प्रकार प्रगति कर रहा है? 

  • सॉवरेन AI अवसंरचना और 'कंप्यूट-एक-सार्वजनिक-हित': भारत कृत्रिम बुद्धिमत्ता को केवल सॉफ्टवेयर के रूप में नहीं बल्कि एक महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय अवसंरचना के रूप में देखता है और निजी क्लाउड लागतों को वहन करने में असमर्थ  स्टार्टअप और शोधकर्त्ताओं के लिये पहुँच को लोकतांत्रिक बनाने के लिये एक 'सॉवरेन कंप्यूट' रणनीति शुरू कर रहा है।
    • सरकारी सहायता प्राप्त हार्डवेयर पर स्वदेशी आधारभूत मॉडल विकसित कर, डेटा सॉवरेनिटी और सांस्कृतिक रूप से प्रासंगिक AI सुनिश्चित की जा रही है, जिससे वैश्विक तकनीकी एकाधिकार के विरुद्ध रणनीतिक सुरक्षा कवच बनता है।
  • फरवरी 2026 में आयोजित AI इम्पैक्ट समिट में भारतजेन (BharatGen) का प्रदर्शन किया गया, जो 22 से अधिक भारतीय भाषाओं को कवर करने वाला देश का पहला सॉवरेन टेक्स्ट-टू-स्पीच मॉडल है।
    • यह आयातित AI समाधानों से हटकर डिजिटल भाषायी संप्रभुता की ओर संक्रमण का प्रतीक है।
    • यह प्रमाणित करता है कि स्वदेशी AI समावेशिता बढ़ा सकता है, प्लेटफॉर्म निर्भरता घटा सकता है और तकनीकी विकास को भारत की सांस्कृतिक तथा संघीय विविधता से संरेखित कर सकता है।
  • सेमीकंडक्टर 2.0 - वाणिज्यिक निर्माण और घटक स्वदेशीकरण: प्रारंभिक असेंबली चरण से आगे बढ़ते हुए, पारिस्थितिकी तंत्र अब 'आईएसएम 2.0' में परिपक्व हुआ है, जो उपकरण, विशेष गैसें और सब्सट्रेट सामग्री सहित संपूर्ण आपूर्ति शृंखला विकसित करता है।
    • इससे इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण की आयात तीव्रता घटती है और तकनीकी ढाँचे की निर्णायक परत सुरक्षित होकर अर्थव्यवस्था को भू-राजनीतिक आपूर्ति झटकों से संरक्षण मिलता है।
      • केंद्रीय बजट 2026 में इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग स्कीम के लिये आवंटित राशि को बढ़ाकर ₹40,000 करोड़ कर दिया गया है, जो सेमीकंडक्टर उपकरण, सामग्री और घटकों के घरेलू उत्पादन के लिये नीतिगत समर्थन का संकेत है, जो पहले लगभग पूरी तरह से आयात किये जाते थे। 
  • भारत के अंतरिक्ष-प्रौद्योगिकी क्षेत्र में निजी क्षेत्र का प्रवेश: अंतरिक्ष क्षेत्र राज्य के एकाधिकार से निकलकर व्यावसायिक रूप से सक्रिय 'न्यूस्पेस' अर्थव्यवस्था में रूपांतरित हुआ है, जहाँ निजी कंपनियाँ उपग्रह निर्माण से प्रक्षेपण तक पूर्ण मिशन संचालित कर रही हैं।
    • इस संरचनात्मक सुधार से आईएसआरओ को गहन अंतरिक्ष अन्वेषण पर केंद्रित होने का अवसर मिलता है, जबकि निजी संस्थाएँ वैश्विक निम्न-पृथ्वी कक्षा (LEO) बाज़ार में हिस्सेदारी बढ़ाती हैं, जिससे वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भारत की भागीदारी में वृद्धि होती है।
    • भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र, जिसका मूल्य लगभग 8.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर है और जो वर्तमान में वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का लगभग 2-3% है, के न्यूस्पेस सुधारों और निजी भागीदारी के माध्यम से वर्ष 2033 तक 44 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक बढ़ने का अनुमान है।
    • स्काईरूट एयरोस्पेस (विक्रम-एस) और अग्निकुल कॉसमॉस (3डी-प्रिंटेड इंजन) जैसी कंपनियाँ इस वृद्धि को गति दे रही हैं।
  • AI-एकीकृत डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI 2.0): भारत अपनी विश्व-प्रसिद्ध डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (UPI, आधार) को 'DPI 2.0' में उन्नत कर रहा है, जिसमें वॉयस-आधारित AI एजेंट्स को जोड़ा जा रहा है ताकि निरक्षर और अर्द्ध-साक्षर आबादी के लिये डिजिटल सेवाएँ सुलभ बन सकें।
    • 'ऐप-आधारित' मॉडल से 'संवादात्मक' अंतःक्रियाओं की ओर यह परिवर्तन डिजिटल विभाजन को कम कर रहा है तथा ग्लोबल साउथ  के लिये एक नया निर्यात-योग्य मानक प्रस्तुत कर रहा है, जो कम लागत और उच्च तकनीक वाला शासन मॉडल प्रदान करता है।
    • भारत की डिजिटल सूचना प्रौद्योगिकी (DPI) वर्तमान में 97% आबादी को आधार डिजिटल आईडी से सशक्त बनाती है (NASSCOM, 2024) तथा वर्ष 2022 में UPI का भारत के GDP में अनुमानित योगदान 16.2 अरब अमेरिकी डॉलर रहा, जो डिजिटल अर्थव्यवस्था को गति देने में इसकी बढ़ती भूमिका को दर्शाता है।
  • रक्षा तकनीक का उदय – आयातक से उच्च-मूल्य निर्यातक तक: रक्षा क्षेत्र ने 'तकनीकी उत्क्रमण' (technological breakout) प्राप्त किया है, जिसमें लाइसेंस प्राप्त उत्पादन से आगे बढ़कर तोपखाना, मिसाइल तथा एवियोनिक्स जैसी जटिल प्रणालियों के डिज़ाइन और निर्यात की दिशा में प्रगति हुई है।
    • यह परिवर्तन 'पॉजिटिव इंडिजिनाइज़ेशन लिस्ट' द्वारा प्रेरित है, जो आयात पर प्रतिबंध लगाकर घरेलू उद्योग को उच्च-स्तरीय अनुसंधान एवं विकास में निवेश हेतु बाध्य करती है तथा गुणवत्ता-आधारित प्रतिस्पर्धा करने वाला एक स्वावलंबी सैन्य-औद्योगिक परिसर निर्मित करती है।
    • रक्षा स्वदेशीकरण के प्रयासों के परिणामस्वरूप वित्त वर्ष 2025 में रक्षा निर्यात 23,622 करोड़ रुपए के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँचा, जो एक दशक में लगभग 34 गुना वृद्धि को दर्शाता है। \
      • साथ ही, पूंजीगत खरीद बजट का 75 प्रतिशत भाग अब घरेलू उद्योग के लिये आरक्षित किया गया है, जिससे स्वदेशी अनुसंधान एवं विकास तथा निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहन मिला है।
  • हरित हाइड्रोजन और स्वच्छ प्रौद्योगिकी विनिर्माण: भारत अपनी कम लागत वाली नवीकरणीय ऊर्जा का लाभ उठाकर यूरोप और एशिया को निर्यात के लिये हरित हाइड्रोजन और अमोनिया का उत्पादन करके खुद को विश्व का 'ग्रीन शॉप फ्लोर' के रूप में स्थापित कर रहा है।
    • यह दृष्टिकोण इलेक्ट्रोलाइज़र PLI योजनाओं को गारंटीकृत ऑफटेक दायित्वों से जोड़ता है, जिससे इस्पात और शिपिंग जैसे कठिन-से-न्यून क्षेत्रों के लिये जीवाश्म ईंधन का व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य विकल्प सृजित होता है।
    • भारत का हरित संक्रमण तीव्र गति से बढ़ रहा है, नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन वर्ष 2030 तक 5 MMT वार्षिक उत्पादन का लक्ष्य रखता है और JSW स्टील ने वर्ष 2025 में देश का सबसे बड़ा ग्रीन हाइड्रोजन संयंत्र चालू किया, ताकि स्टील उत्पादन में कार्बन उत्सर्जन कम किया जा सके।
  • 6G अनुसंधान और दूरसंचार मानकीकरण में नेतृत्व: पिछली पीढ़ियों की तरह पिछड़ने के बजाय, भारत सक्रिय रूप से 6G मानकों को आकार दे रहा है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि भविष्य के नेटवर्क ग्रामीण कवरेज और सामर्थ्य के लिये इसकी विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुरूप हों। 
    • 'भारत 6G गठबंधन' शिक्षा जगत और उद्योग को एक साथ लाता है ताकि आवश्यक पेटेंटों को जल्द से जल्द प्राप्त किया जा सके, जिससे भारत केवल रॉयल्टी देने वाला उपभोक्ता नहीं, बल्कि तकनीक निर्माता और लाइसेंसर बन सके।
    • भारत की 6G रणनीति वर्ष 2030 तक वैश्विक 6G पेटेंट का 10% सुरक्षित करने का लक्ष्य रखती है, जिसे 100 से अधिक 5G/6G अनुसंधान प्रयोगशालाओं के संचालन से समर्थन प्राप्त है, जिससे स्वदेशी R&D और भारत की वैश्विक दूरसंचार मानक-निर्धारण में भूमिका मज़बूत होती है।
  • डीप-टेक नीति और 'स्टार्टअप से स्केलअप' की ओर संक्रमण: सरकार ने औपचारिक रूप से 'डीप टेक' को एक अलग परिसंपत्ति वर्ग के रूप में मान्यता दी है और क्वांटम कंप्यूटिंग और बायोटेक जैसी  दीर्घावधि तकनीकों पर काम करने वाले स्टार्टअप्स के लिये 'दीर्घकालिक निवेश' प्रदान करने के लिये नीतियों में संशोधन किया है।
    • यह स्वीकार करता है कि विज्ञान-आधारित नवोन्मेष के लिये सॉफ्टवेयर सेवाओं की तुलना में अलग-अलग समर्थन संरचनाओं की आवश्यकता होती है, जिसका उद्देश्य ऐसी पीढ़ीगत कंपनियाँ बनाना है जो मूलभूत समस्याओं का समाधान करती हैं।
    • भारत के डीप-टेक प्रोत्साहन को फरवरी 2026 में एक नई 'डीप टेक स्टार्टअप' परिभाषा के साथ औपचारिक रूप दिया गया, जिससे लक्षित कर प्रोत्साहनों का लाभ मिला, साथ ही अंतरिक्ष स्टार्टअप के लिये ₹1,000 करोड़ के संप्रभु उद्यम पूंजी कोष की शुरुआत हुई।
  • डेटा-संचालित स्वास्थ्य सेवा और AI निदान: स्वास्थ्य प्रणाली कागज़ी अभिलेखों से “लॉन्गिट्यूडिनल डिजिटल हेल्थ रिकॉर्ड” मॉडल की ओर बढ़ रही है और अब नैदानिक एल्गोरिदम का बेंचमार्क करने और सार्वजनिक स्वास्थ्य में AI निदान की सुरक्षित तैनाती सुनिश्चित करने के लिये 'ज़िम्मेदार AI' मानकों (SAHI) को लागू कर रही है।
    • अगस्त 2025 तक 79.9 करोड़ ABHA आईडी सक्रिय थीं। इंडिया AI इम्पैक्ट समिट 2026 में, केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री ने भारत के स्वास्थ्य सेवा तंत्र में AI-संचालित नवोन्मेष को सुदृढ़ करने के लिये SAHI (स्वास्थ्य के लिये सुरक्षित AI पहल) और BODH (स्वास्थ्य AI के लिये बेंचमार्किंग ओपन डेटा प्लेटफॉर्म) का शुभारंभ किया।
  • जैव-विनिर्माण और कृषि प्रौद्योगिकी: सरकार कृषि और स्वास्थ्य में परिवर्तन हेतु जैव प्रौद्योगिकी को डिजिटल साधनों से जोड़ रही है, जीवाश्म-आधारित रसायनों के विकल्प के रूप में “जैव-विनिर्माण” को बढ़ावा दे रही है तथा उर्वरकों के अनुप्रयोग के माध्यम से कृषि उत्पादकता को आधुनिक बनाने के लिये ड्रोन सिस्टम स्थापित कर रही है।
    • उदाहरण के लिये, BioE3 नीति (अगस्त 2024) का लक्ष्य वर्ष 2030 तक 300 अरब डॉलर की जैव-अर्थव्यवस्था स्थापित करना है।
      • नमो ड्रोन दीदी योजना ने पारंपरिक श्रम-गहन कृषि पद्धतियों से सटीक कृषि प्रणाली की ओर महत्वपूर्ण बदलाव किया।
    • प्रमुख उर्वरक कंपनियों द्वारा महिला स्वयं सहायता समूहों को 1,094 ड्रोन वितरित किये गए हैं, जिनमें नमो ड्रोन दीदी पहल के तहत प्रदान किये गए 500 से अधिक ड्रोन सम्मिलित हैं।

भारत के प्रौद्योगिकी-आधारित विकास से जुड़े प्रमुख मुद्दे क्या हैं? 

  • AI पावर विरोधाभास और संसाधन तीव्रता: AI डेटा केंद्रों का तेज़ी से विस्तार भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं से असंगत रहा है, क्योंकि उच्च घनत्व वाले GPU क्लस्टर को शीतलन के लिये अत्यधिक ऊर्जा और जल की आवश्यकता होती है। 
    • इससे 'संवहनीयता संबंधी असंगतता' उत्पन्न होती है, जहाँ BharatGen जैसे सॉवरेन AI मॉडल के माध्यम से डिजिटल सॉवरेनिटी की खोज से स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों के क्षय एवं राष्ट्रीय विद्युत ग्रिड पर दबाव पड़ने का खतरा होता है।
    • भारत में बड़े पैमाने पर AI प्रशिक्षण और डेटा सेंटर विस्तार नवीकरणीय ऊर्जा एकीकरण से कहीं आगे निकल रहे हैं, जिससे कोयला आधारित आधारभूत बिजली पर निरंतर निर्भरता बनी हुई है।
      • उदाहरण के लिये, राष्ट्रीय डेटा सेंटर क्षमता का 50% से अधिक हिस्सा मुंबई में केंद्रित है और शेष बंगलुरु, चेन्नई और दिल्ली-NCR तक विस्तार है, ये सभी जल संकटग्रस्त महानगर हैं, जिससे शीतलन हेतु जल की मांग, भूजल की कमी और जलवायु-अनुकूल शहरी योजना को लेकर चिंताएँ बढ़ रही हैं।
  • सेमीकंडक्टर आपूर्ति शृंखला की 'अपस्ट्रीम' कमज़ोरियाँ: असेंबली और परीक्षण इकाइयों को आकर्षित करने में इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) की सफलता के बावजूद, यह इकोसिस्टम अल्ट्राप्योर जल, विशेष गैसों और सिलिकॉन वेफर्स जैसे कच्चे माल के लिये विदेशी आयात पर गंभीर रूप से निर्भर बना हुआ है। 
    • 'अपस्ट्रीम ऑटोनॉमी' हासिल किये बिना, भारतीय फैक्टरी संयंत्र उन्हीं भू-राजनीतिक आपूर्ति आघातों के प्रति संवेदनशील बने रहते हैं, जिन्हें कम करने के लिये उन्हें डिज़ाइन किया गया था, जिससे वे संभावित रूप से 'ग्रेट असेंबली लाइन' में परिणत कर सकते हैं।
    • भारत की सेमीकंडक्टर संबंधी महत्त्वाकांक्षाएँ वर्तमान में 'मध्य-चरण' पर अधिक केंद्रित हैं, क्योंकि फ्रंट-एंड फैब्रिकेशन के लिये आवश्यक 250 से अधिक विशेष रसायनों के लिये एक मज़बूत घरेलू आधार का अभाव है।
      • हालाँकि ₹1.60 लाख करोड़ की 10 ATMP (असेंबली, टेस्टिंग, मार्किंग और पैकेजिंग) परियोजनाओं को मंजूरी मिल चुकी है, फिर भी महत्त्वपूर्ण अपस्ट्रीम उपकरण (जिनमें अमेरिका, जापान और नीदरलैंड की ASML का वर्चस्व है) और उच्च-शुद्धता वाली गैसों और फोटोरेज़िस्ट जैसी विशेष सामग्रियाँ बड़े पैमाने पर आयात की जाती हैं, जिससे भारत आपूर्ति शृंखला एवं भू-राजनीतिक जोखिमों के प्रति संवेदनशील हो जाता है।
  • डीप-टेक भूमिकाओं में 'रोज़गार योग्यता अंतर': यद्यपि भारत विश्व में सर्वाधिक STEM (विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अभियांत्रिकी और गणित) स्नातक उत्पन्न करता है, फिर भी पारंपरिक IT कौशल और जनरेटिव AI, क्वांटम कंप्यूटिंग और VLSI डिज़ाइन जैसी विशिष्ट आवश्यकताओं के बीच एक गंभीर ‘गुणवत्ता-असंतुलन’ विद्यमान है।
    • प्रतिभा की यह कमी विशिष्ट वेतनमानों में अत्यधिक मुद्रास्फीति को बढ़ावा दे रही है, जबकि लाखों सामान्य इंजीनियरिंग स्नातकों को अल्प-रोज़गार की स्थिति में छोड़ रही है, जिससे 'जनांकिकीय लाभांश' खतरे में पड़ रहा है और यह एक सामाजिक चुनौती में बदल रहा है।
    • तकनीकी विकास की गति पाठ्यक्रम सुधार की गति से कहीं अधिक हो गई है, जिससे एक 'दोहरी गति' वाला श्रम बाज़ार बन गया है जहाँ केवल एक छोटा-सा अभिजात वर्ग ही गहन तकनीक के लिये तैयार है।
      • भारत में साइबर सुरक्षा पेशेवरों की बढ़ती मांग के कारण क्लाउड सिक्योरिटी, आर्किटेक्चर और ज़ीरो ट्रस्ट जैसी भूमिकाओं में 30-50% तक की आपूर्ति में अंतर (टीमलीज डेटा) आ गया है।
  • DPI और बढ़ता साइबर अटैक क्षेत्र: UPI और आधार की अभूतपूर्व सफलता ने राष्ट्रीय डेटा को केंद्रीकृत कर दिया है, जिससे यह राज्य-प्रायोजित साइबर आक्रमणकारियों के लिये एक उच्च-मूल्य ‘एकल विफलता बिंदु’ बन गया है।
    • जैसे-जैसे भारत शासन में AI को एकीकृत (DPI 2.0) कर रहा है, वैसे-वैसे हमले का दायरा अति-व्यक्तिगत फिशिंग और डीपफेक-आधारित वित्तीय धोखाधड़ी तक विस्तारित हो गया है, जो वर्तमान में स्थानीय विधि प्रवर्तन की जाँच क्षमता से कहीं अधिक है। 
    • भारत की डिजिटल संरचना की ‘परस्पर संबद्धता’ का अर्थ है कि किसी छोटे से गेटवे में हुई चूक भी व्यापक वित्तीय या पहचान-संबंधी जोखिमों में परिवर्तित हो सकती है।
      • भारत में साइबर जोखिम का परिदृश्य गंभीर होता जा रहा है, रिपोर्ट की गई साइबर सुरक्षा घटनाओं की संख्या वर्ष 2022 में 10.29 लाख से बढ़कर वर्ष 2024 में 22.68 लाख हो गई है, जो दोगुने से भी अधिक है। वहीं, फरवरी 2026 के FICCI–EY सर्वेक्षण में पाया गया कि 51% फर्मों ने साइबर उल्लंघनों को अपने शीर्ष प्रदर्शन जोखिम के रूप में अभिनिर्धारित किया है, जो डिजिटल अर्थव्यवस्था में प्रणालीगत कमज़ोरियों को रेखांकित करता है। 
  • विनियामक व्याख्या-अंतर: डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम और इसके वर्ष 2025 नियमों के लागू होने से अनुपालन में एक अड़चन उत्पन्न हो गया है, जहाँ लघु एवं मध्यम उद्यम (SME) डेटा स्थानीयकरण और 'सहमति-प्रबंधक' ढाँचे की उच्च लागत से जूझ रहे हैं। 
    • इस विनियामक जटिलता से 'लीन स्टार्टअप' संस्कृति के कमज़ोर पड़ने का खतरा है क्योंकि कंपनियाँ सीमित पूंजी को अनुसंधान एवं विकास से हटाकर विधिक अनुपालन और डेटा-ऑडिटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की ओर मोड़ रही हैं। 
    • यद्यपि DPDP अधिनियम नागरिकों को सशक्त बनाता है, फिर भी गैर-महानगरीय फर्मों के लिये इसके कार्यान्वयन में 'नियामक स्पष्टता' का अभाव है, जिससे असमान रूप से इसका अंगीकरण किया जाता है तथा उच्च 'तकनीकी ऋण' उत्पन्न होता है।
      • EY की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, 71% भारतीय उद्यमों ने बताया कि उन्हें अधिनियम और इसके नए अधिसूचित नियमों की व्याख्या करने में अभी भी कठिनाई हो रही है। 
  • टियर-1-केंद्रित तकनीकी संकेंद्रण: भारत में प्रौद्योगिकी-संचालित विकास प्रमुख 'टियर-1' केंद्रों में अत्यधिक केंद्रित बना हुआ है, जिससे एक भौगोलिक असंतुलन उत्पन्न होता है, जिससे शहरी अचल संपत्ति पर दबाव बढ़ता है तथा देश के अन्य भाग केवल सेवाओं के उपभोक्ता बनकर रह जाते हैं।
    • इस केंद्रीकरण से AI प्रशिक्षण डेटा की विविधता सीमित हो जाती है तथा ग्रामीण उद्यमी उच्च-मूल्य वाले विनिर्माण और डिज़ाइन मूल्य शृंखलाओं से बाहर हो जाते हैं। 
    • 'भारत की सिलिकॉन वैली' मॉडल शहरी अधोसंरचना के पतन की सीमा तक पहुँच रहा है, जबकि 'BharatNet' अभी तक ग्रामीण कनेक्टिविटी को स्थानीय विनिर्माण में परिवर्तित करके लाभ कमाने में सफल नहीं हो पाया है।
      • अकेले बंगलुरु में ही AI से संबंधित कुल नौकरियों का 26-31% हिस्सा है, जो इस बात को रेखांकित करता है कि उच्च मूल्य वाली तकनीकी प्रतिभाएँ टियर-1 शहरों में केंद्रित हैं। शहरों के इस इस समूह के कारण रियल एस्टेट की कीमतें बढ़ जाती हैं और अधोसंरचना पर दबाव पड़ता है।
  • ई-अपशिष्ट और 'हार्डवेयर अप्रचलन' चक्र: इलेक्ट्रॉनिक विनिर्माण को प्रोत्साहन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता हार्डवेयर के 2–3 वर्षीय जीवन-चक्र ने एक विषाक्त ई-अपशिष्ट प्रवाह उत्पन्न कर दिया है, जिसे भारत का औपचारिक पुनर्चक्रण क्षेत्र संभालने में असमर्थ है।
    • अधिकांश 'AI-अपशिष्ट' अनौपचारिक क्षेत्र में पहुँच जाता है, जिससे भारी धातुओं का भूजल में रिसाव होता है और इस प्रकार अल्पकालिक तकनीकी लाभ के लिये दीर्घकालिक पर्यावरणीय स्वास्थ्य का प्रभावी रूप से सौदा किया जाता है। 
    • भारत में 'चक्रीय प्रौद्योगिकी अर्थव्यवस्था' नीति का अभाव है जो हार्डवेयर की दीर्घायु या स्क्रैप किये गए इलेक्ट्रॉनिक्स से दुर्लभ मृदा खनिजों के उन्नत निष्कर्षण को अनिवार्य बनाती हो।
      • CPCB के आँकड़ों से पता चलता है कि सत्र 2024-25 में ई-अपशिष्ट उत्पादन 13.98 लाख टन होगा, जो इलेक्ट्रॉनिक्स की खपत और प्रभावी रीसाइक्लिंग एवं चक्रीय अर्थव्यवस्था क्षमता के बीच बढ़ते अंतर को उजागर करता है।
  • गिग इकॉनमी में एल्गोरिदम आधारित शोषण: तेज़ी से बढ़ता 'क्विक कॉमर्स' क्षेत्र एक अपवर्जनकारी श्रम मॉडल पर आधारित है, जहाँ अपारदर्शी एल्गोरिदम बेरहमी से '10 मिनट की डिलीवरी' के लक्ष्य निर्धारित करते हैं, जिससे श्रमिकों को सामाजिक संरक्षण एवं शारीरिक सुरक्षा से वंचित कर दिया जाता है तथा उन्हें उच्च दबाव वाले लॉजिस्टिकल ग्रिड में मात्र डेटा पॉइंट्स तक सीमित कर दिया जाता है।
    • उदाहरण के लिये, दिसंबर 2025 में गिग वर्कर्स ने फूड डिलीवरी ऐप के असुरक्षित डिलीवरी मॉडल के खिलाफ देशव्यापी हड़ताल की थी। 
      • श्रमिक संघ वर्तमान में गिरती वास्तविक मज़दूरी और असुरक्षित कामकाज़ी परिस्थितियों का सामना करने के लिये न्यूनतम मूल वेतन में वृद्धि की मांग कर रहे हैं।
  • नवोन्मेष की कमी और बौद्धिक संपदा स्वामित्व संबंधी चुनौतियाँ: भारत का अनुसंधान एवं विकास (R&D) पर सकल व्यय सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के लगभग 0.64% पर ही स्थिर है। (आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26)।
    • 'मेक इन इंडिया' अभियान के बावजूद, भारत में निर्मित चिप्स और सॉफ्टवेयर से संबंधित अधिकांश उच्च-मूल्य वाली बौद्धिक संपदा (IP) विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के स्वामित्व में है। 
      • इससे भारत एक 'मूल्य जाल' में फँसा रह जाता है, जहाँ यह श्रम और संयोजन के कम मार्जिन को हासिल कर लेता है, जबकि मुनाफे का बड़ा हिस्सा (रॉयल्टी और डिज़ाइन मूल्य) अमेरिका या यूरोप में स्थित मूल कंपनियों के पास वापस चला जाता है।
      • भारत की तकनीकी प्रगति अभी भी मुख्य रूप से 'इनपुट-संचालित' (श्रम/पूंजी) है, न कि 'नवोन्मेष-संचालित' (पेटेंट/बौद्धिक संपदा), जो घरेलू अर्थव्यवस्था के लिये दीर्घकालिक धन सृजन को सीमित करती है।
    • उदाहरण के लिये, वित्त वर्ष 2025 में आईफोन का निर्यात 1.5 लाख करोड़ रुपये तक पहुँचने के बावजूद, भारत का 'घरेलू मूल्य संवर्द्धन' (DVA) केवल 20% से अधिक रहा। 
      • इसका मतलब यह है कि निर्यात किये गए प्रत्येक डॉलर का लगभग 80 सेंट आयातित घटकों और बौद्धिक संपदा रॉयल्टी के भुगतान के रूप में वापस विदेशों में चला जाता है।
    • निजी अकादमिक जगत में 'छद्म-नवोन्मेष' की बढ़ती संस्कृति, जहाँ अनुदान और रैंकिंग हासिल करने के लिये आयातित प्रौद्योगिकियों को स्वदेशी के रूप में पुनः ब्रांडेड किया जाता है, वास्तविक अनुसंधान एवं विकास को कमज़ोर कर रही है तथा भारत के नवोन्मेष पारिस्थितिकी तंत्र को विकृत कर रही है। 
      • AI इम्पैक्ट समिट- 2026 में गलगोटिया विश्वविद्यालय के कॉस्मेटिक रूप से रीब्रांड किये गए यूनिट्री Go2 रोबोडॉग से जुड़े हालिया विवाद ने यह प्रदर्शित किया कि किस प्रकार इस तरह के जनसंपर्क-प्रेरित दावे भारत की आत्मनिर्भर महत्त्वाकांक्षाओं की विश्वसनीयता को कमज़ोर कर सकते हैं।

भारत के प्रौद्योगिकी आधारित विकास को सुदृढ़ करने हेतु किन उपायों की आवश्यकता है?  

  • 'अनुवादात्मक अनुसंधान' ढाँचों को संस्थागत रूप देना: अकादमिक पेटेंट और वाणिज्यिक उत्पादों के बीच 'वैली ऑफ डेथ' को समाप्त करने के लिये, सरकार को सभी प्रमुख संस्थानों के भीतर पेशेवर प्रौद्योगिकी अंतरण कार्यालयों (TTO) को अनिवार्य बनाना और उन्हें वित्त पोषित करना चाहिये।
    • इससे एक औपचारिक 'लैब-टू-मार्केट' प्रवाह सुनिश्चित होता है, जहाँ शोध-पत्रिकाओं में निष्क्रिय पड़े रहने देने के बजाय घरेलू स्टार्टअप्स को सक्रिय रूप से लाइसेंस किया जाता है।
    • शैक्षणिक प्रोत्साहनों को वाणिज्यीकरण की गति के साथ संरेखित कर भारत अपने विशाल अनुसंधान उत्पादन को ठोस आर्थिक मूल्य और स्वामित्व-आधारित गहन-तकनीकी परिसंपत्तियों में रूपांतरित कर सकता है।
  • एक 'सॉवरेन डीप-टेक फंड' की स्थापना: यह स्वीकार करते हुए कि निजी उद्यम पूंजी उच्च जोखिम और दीर्घ-अवधि वाली हार्डवेयर परियोजनाओं से बचती है, राज्य को 15 वर्ष की अवधि के लिये पूरी तरह से डीप साइंस नवोन्मेष हेतु समर्पित एक फंड-ऑफ-फंड्स की स्थापना करनी चाहिये। 
    • यह 'दीर्घकालिक निवेश' सेमीकंडक्टर, क्वांटम कंप्यूटिंग और बायोटेक में प्रारंभिक चरण के निवेश के जोखिम को प्रभावी ढंग से कम करती है, जिससे निजी निवेशकों को स्थिरता का संकेत मिलता है। यह उस बाज़ार विफलता को दूर करती है, जहाँ पूंजी मूलभूत, रणनीतिक प्रौद्योगिकी क्षमताओं के बजाय त्वरित सॉफ्टवेयर लाभ की ओर आकर्षित होती है।
  • ‘लचीले विनियामक सैंडबॉक्स’ का संचालन: नीति-निर्माण को ‘अनुमति-आधारित’ दृष्टिकोण से हटाकर ‘परामर्श-आधारित’ बनाना आवश्यक है, जिसके लिये कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ड्रोन और वित्तीय प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में विशिष्ट नवोन्मेष सैंडबॉक्स विकसित किये जाने चाहिये।
    • ये नियंत्रित वातावरण स्टार्टअप्स को सेफ हार्बर प्रावधानों के साथ विघटनकारी प्रौद्योगिकियों का परीक्षण करने की अनुमति देते हैं, जिससे उन्हें पायलट चरण के दौरान पुराने अनुपालन मानकों से अस्थायी छूट मिलती है। 
    • यह ‘पुनरावृत्त शासन’ व्यवस्था नवोन्मेष को लालफीताशाही से बाधित होने से रोकती है तथा अंतिम विधि निर्माण से पहले नियामकों को जोखिमों की समझ विकसित करने में सहायक होती है।
  • महत्त्वपूर्ण खनिज संपत्तियों को सुरक्षित करना: सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रिक वाहन विनिर्माण को केवल असेंबली लाइन बनने से रोकने के लिये, भारत को विदेशी लिथियम, कोबाल्ट और गैलियम खानों में इक्विटी हिस्सेदारी हासिल करने हेतु खनिज सुरक्षा साझेदारी को सक्रिय रूप से आगे बढ़ाना चाहिये।
    • संसाधन कूटनीति की यह रणनीति भू-राजनीतिक झटकों और कार्टेल के विरुद्ध कच्चे माल की आपूर्ति शृंखला को सुरक्षित करती है। 
    • ऊर्ध्वाधर एकीकरण करके, भारत यह सुनिश्चित करता है कि उसका उच्च-तकनीकी औद्योगिक आधार कच्चे माल की कमी का बंधक न बन जाए।
  • सार्वजनिक अवसंरचना में 'डिजिटल ट्विन' अनिवार्यता: सरकार को सभी प्रमुख पूंजीगत व्यय परियोजनाओं (रेलवे, बिजली ग्रिड, शहरी नियोजन) के लिये एक डिजिटल ट्विन मानक लागू करना चाहिये, जिससे भौतिक परिसंपत्तियों की आभासी प्रतिलिपियाँ तैयार की जा सकें। 
    • यह IoT और AI को अधोसंरचना के मूल में एकीकृत करता है, जिससे पूर्वानुमानित रख-रखाव और परिदृश्य नियोजन सक्षम होता है तथा परिचालन लागत में उल्लेखनीय कमी आती है।
    • यह स्थिर अवसंरचना को 'स्मार्ट एसेट्स' में परिवर्तित करता है, जो निरंतर अनुकूलन और दक्षता के लिये डेटा उत्पन्न करते हैं।
  • ‘चक्रीय प्रौद्योगिकी अर्थव्यवस्था’ नीति: संसाधनों की कमी से निपटने के लिये, नीति को शहरी खनन की ओर मोड़ना होगा, जिससे घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स आपूर्ति शृंखला को बढ़ावा देने के लिये ई-अपशिष्ट से  स्वर्ण एवं दुर्लभ मृदा तत्त्व के निष्कर्षण को प्रोत्साहित किया जा सके।
    • विस्तारित निर्माता उत्तरदायित्व (EPR) और ‘मरम्मत का अधिकार’ कानूनों के कठोर पालन से निर्माताओं को दीर्घायु एवं पुनर्चक्रण योग्य डिज़ाइन के लिये प्रेरित किया जाएगा।
    • इससे एक आत्मनिर्भर भौतिक पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण होता है, जो महत्त्वपूर्ण विनिर्माण आगत हेतु आयात पर निर्भरता को कम करता है।
  • 'टियर-2 इनोवेशन क्लस्टर' का विकास: महानगरों के अधोसंरचना पतन को रोकने हेतु विशिष्ट टियर-2 शहरों को विशेष टेक्नोवेशन ज़ोन घोषित किया जाना चाहिये, जहाँ रियायती हाई-स्पीड कनेक्टिविटी और R&D केंद्रों के लिये कर प्रोत्साहन उपलब्ध हों।
    • यह स्थानिक विकेंद्रीकरण द्वारा परिचालन लागत कम करता है और अप्रयुक्त प्रतिभा भंडार का लाभ उठाता है, जिससे तकनीकी अर्थव्यवस्था अधिक समावेशी और लचीली बनती है।
      • साथ ही, यह ‘हब रिस्क’ को रोकता है, जहाँ एक शहर में संकट (जैसे बंगलूरू में बाढ़) पूरे राष्ट्रीय IT उत्पादन को प्रभावित कर सकता है।
  • ‘ज़ीरो-ट्रस्ट’ सॉवरेन साइबर-शील्ड: जैसे-जैसे डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना का विस्तार हो रहा है, सुरक्षा प्रतिमान को ‘परिधि रक्षा’ से हटाकर सभी सरकारी और महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों के नेटवर्क के लिये अनिवार्य ‘शून्य-विश्वास संरचना’ की ओर ले जाना चाहिये।
    • इसमें स्वदेशी, AI-संचालित थ्रेट हंटिंग सिस्टम को तैनात करना शामिल है, जो यह मानते हैं कि उल्लंघन अपरिहार्य हैं तथा प्रत्येक डिजिटल इंटरैक्शन को लगातार सत्यापित करते हैं।
    • राज्य प्रायोजित साइबर वॉर के युग में राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा के लिये इस 'साइबर-काइनेटिक' रेज़िलिएंस को मज़बूत करना अपरिहार्य है।

निष्कर्ष

भारत का प्रौद्योगिकी-आधारित विकास अब केवल घोषणाओं तक सीमित न रहकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, अंतरिक्ष, रक्षा और स्वच्छ ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में व्यवस्थित क्षमता निर्माण की दिशा में अग्रसर हो चुका है। तथापि, संरचनात्मक अवरोध, पूर्ववर्ती कारकों पर निर्भरता, प्रतिभा की कमी, स्थिरता संबंधी दबाव और शहरी केंद्रीकरण इन उपलब्धियों को सीमित करने की आशंका उत्पन्न करते हैं। अतः आगामी चरण में विस्तार से गहनता, संयोजन से स्वामित्व तथा अंगीकरण से नवोन्मेष की ओर संक्रमण आवश्यक है। प्रौद्योगिकी को संस्थागत सुधार, संसाधन सुरक्षा और समावेशिता के साथ संयोजित करके ही भारत अपनी तकनीकी प्रगति को स्थायी वैश्विक नेतृत्व में परिवर्तित कर सकता है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न 

कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना में उल्लेखनीय प्रगति के बावजूद, भारत को अनेक संरचनात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इन प्रमुख चुनौतियों की विवेचना कीजिये तथा उनके प्रभावी समाधान हेतु उपयुक्त उपाय सुझाइये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1. DPI 2.0 क्या है?
आवाज़ और संवादात्मक इंटरफेस के माध्यम से भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) को AI-सक्षम बनाने की पहल।

प्रश्न 2. ISM 2.0 क्या है?
इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन का अगला चरण, जो घटकों, सामग्रियों और अपस्ट्रीम आपूर्ति शृंखलाओं पर केंद्रित है।

प्रश्न 3. BharatGen क्या है?
भारत का पहला स्वदेशी टेक्स्ट-टू-स्पीच AI मॉडल, जो 22 से अधिक भारतीय भाषाओं को समर्थन देता है।

प्रश्न 4. डीप-टेक स्टार्टअप से किस प्रकार भिन्न है?
डीप-टेक में लंबे समय तक चलने वाली, विज्ञान-आधारित नवोन्मेष प्रक्रिया शामिल होती है, जिसके लिये दीर्घकालिक निवेश और नीतिगत समर्थन आवश्यक होता है।

प्रश्न 5. शहरी केंद्रित तकनीकी विकास का प्रमुख जोखिम क्या है?
अवसंरचना पर दबाव, क्षेत्रीय असमानता और ग्रामीण नवोन्मेष पारिस्थितिकी तंत्र का बहिष्कार।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ) 

प्रिलिम्स:

प्रश्न. विकास की वर्तमान स्थिति में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence), निम्नलिखित में से किस कार्य को प्रभावी रूप से कर सकती है? (2020)

  1. औद्योगिक इकाइयों में विद्युत की खपत कम करना 
  2.  सार्थक लघु कहानियों और गीतों की रचना 
  3.  रोगों का निदान 
  4.  टेक्स्ट-से-स्पीच (Text-to-Speech) में परिवर्तन 
  5.  विद्युत ऊर्जा का बेतार संचरण

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1, 2, 3 और 5
(b) केवल 1, 3 और 4
(c) केवल 2, 4 और 5
(d) 1, 2, 3, 4 और 5

उत्तर: (b)


मेन्स:

प्रश्न. कृत्रिम बुद्धि (ए.आई.) की अवधारणा का परिचय दीजिये। ए.आई. क्लिनिकल निदान में कैसे मदद करता है? क्या आप स्वास्थ्य सेवा में ए.आई. के उपयोग में व्यक्ति की निजता को कोई खतरा महसूस करते हैं?  (2023)